# क़ुरआन के वो चमत्कार जो आप पहली बार सुनेंगे!

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/3-miracles-hidden-in-qurans-one-letter-you-will-be-shocked
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=cRVrMexGapM
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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एक ऐसी किताब की कल्पना करें, इतनी स्पष्ट कि एक साधारण व्यक्ति भी समझ ले, पर इतनी गहरी कि विद्वान भी उसे समझने में अपनी उम्र बिता दें। एक ऐसी किताब जिसकी आयतें कभी पुरानी नहीं होती, और आज तक कोई भी इसके जैसा कुछ बना नहीं पाया है: अल-क़ुरआन क़ुरआन एक चुनौती पेश करता है। ऊपरी तौर पर यह सरल लगता है, लेकिन हक़ीक़त में यह नामुमकिन है। यह ऐसी चुनौती है कि अगर इसके दुश्मन इसे पूरा कर पाते, तो वे इस्लाम को बड़ी आसानी से खत्म कर सकते थे। न बद्र, न उहुद, न ही ख़न्दक़ किसी भी जंग की ज़रूरत ही न पड़ती। हम एक ऐसी चुनौती की बात कर रहे है जिसका जवाब 14 सदियों से कोई नहीं दे सका है। और जो आज भी प्रासंगिक है। तो आख़िर ये क्या है?

चलिए उस दौर में वापस चलते हैं—अरब, शायरी और वाकपटुता की सरज़मीं। ज़ुबान के माहिर और लफ़्ज़ों के सुल्तान, एक दिन वे सब खामोश हो गए और बड़े-बड़े सूरमाओं की आवाज़ें भी कांपने लगीं। जिस चीज़ ने उन्हें खामोश किया, वे थीं क़ुरआन की ये आयतें: "या क्या ये लोग कहते हैं कि इसने क़ुरआन ख़ुद गढ़ लिया है?

बात ये है कि ये लोग ईमान ही नहीं रखते' तो इस जैसा कोई कलाम ले आयें अगर अगर वह सच्चे हैं।" पैग़ाम साफ था - इस चुनौती का जवाब दो या हमेशा के लिए हार मान लो। यह वाक़ई बहुत ही अनोखा और अजीब है। पैगंबर मुहम्मद अलैहिस्सलाम, वह शख्स जिसने यह 'वही' (प्रकाशना) पहुँचाई और उन लोगों को चुनौती दी, पढ़ना या लिखना नहीं जानते थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी शायरी या साहित्य से वास्ता नहीं रखा था, मगर उन्होंने उस समाज को उसी फील्ड में चुनौती दी जिसमें वे सबसे माहिर थे। इस वीडियो के अंत तक, आप जान जाएंगे कि यह चुनौती आज तक अनुत्तरित (Unanswered) क्यों है और क़ुरआन तमाम किताबों से अलग और बेमिसाल क्यों है। मगर वहां तक पहुँचने से पहले, आपको क्या लगता है कि इस चुनौती के बाद क्या हुआ होगा?

क़ुरआन जितनी बार अपनी चुनौती दोहराता गया, उनकी खामोशी उतनी ही शर्मनाक होती गई। शुरुआत में, उन्हें बस किसी ग़ैर-पढ़े लिखे इंसान की तरफ़ से क़ुरआन की ही तरह कुछ ऐसा लाना था जैसा पैगंबर अलैहिस्सलाम लेकर आए थे। मगर चूंकि वे ऐसा नहीं कर सके, तो उन्हें किसी बड़े विद्वान या लेखक से मदद लेने का मौक़ा दिया गया। वे पहले की तमाम किताबों का सहारा ले सकते थे, अपने सारे संसाधन जुटा सकते थे, और अपने दौर के सभी दिग्गजों को एक साथ ला सकते थे। इतना ही नहीं, वे अपने देवताओं को भी पुकार सकते थे। शर्त यह थी कि अगर वे पूरे क़ुरआन की बराबरी न कर पाएं, तो कम से कम 10 सूरत (chapter) ही बना कर दिखा दें, और अगर ऐसा भी न कर सके, तो महज़ एक सूरत (Chapter) ही सही। उनकी यह खामोशी केवल नाकामी नहीं, बल्कि उनके लिए रुसवाई बन गई। अब वे क्या करेंगे?

यह महज़ हार नहीं थी; यह एक गहरा संकट था। एक ऐसी संस्कृति के लिए जिसे अपनी भाषाई दक्षता पर गर्व था, यह सबसे बड़ी ज़िल्लत थी। वे लफ़्ज़ों से इसका मुकाबला नहीं कर पाए, इसलिए उन्हें तलवारें उठाने और कई जंगों में लड़ने पर मजबूर होना पड़ा। क्या आपने यहाँ एक गौर करने वाली बात देखी?

यह चुनौती दूसरे धर्मों के लिए भी है। यह तो साफ है कि मूर्तिपूजकों को अपने बुतों से कोई मदद नहीं मिल सकी। मगर कई धर्म जैसे हिंदू, ईसाई और यहूदी, सब के सब ईश्वरीय होने का दावा करते हैं, बावजूद इसके कोई भी धर्म, विचारधारा या कोई हस्ती इसका जवाब न दे सकी—न 14 सदियों पहले और न ही आज। इन मान्यताओं के मानने वालों के लिए यह एक बड़ा सवाल होना चाहिए। आखिरकार, जिसने ये चुनौती दी है वह कोई ऐरी-गैरी विचारधारा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा धर्म है जिसने आधी दुनिया को प्रभावित किया है और जिसे दुनिया की एक-चौथाई आबादी मानती है। तो क़ुरआन में ऐसा क्या है जो इसे बेमिसाल बनाता है? क्या वाकई लाखों किताबों में से कोई भी इसके बराबर नहीं है?

विद्वान कहते हैं कि क़ुरआन के ईश्वरीय होने के 40 अलग-अलग पहलू हैं। ज़ाहिर है, हम महज़ एक वीडियो में इन सभी 40 पहलुओं को explore नहीं कर सकते, मगर चलिए हम चार दरवाज़े खोलते है, क़ुरआन के चमत्कारों की ओर चार दरवाज़े। पहला: इसकी ज़ुबान का असरदार और खूबसूरत इस्तेमाल; दूसरा: इसकी ग़ज़ब की गहराई और व्यापक दायरा; तीसरा: इसके शब्दों का दमदार बहाव (Flow); और चौथा: जिस तरह से यह ब्रह्मांड के रहस्यों को समझाता है जो आज जाकर खोजे जा रहे हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि क़ुरआन के एक-एक हर्फ़ में भी एक चमत्कार हो सकता है?

हम सुरह यासीन को देखते है - एक आयात में ये कहती है - और सूरज भी अपने नियत ठिकाने के लिए चला जा रहा है। इस आयत के अरबी शब्द में 'ली' अक्षर सब कुछ बदल देता है, क्योंकि यह एक ही वाक्य में तीन अलग-अलग मायने जोड़ देता है और ऐसा करके यह सूरज के बारे में तीन अहम वैज्ञानिक तथ्य बताता है। "लिमुस्तक़र्र" का एक मतलब है "एक कक्षा में," जिसका अर्थ है कि सूरज एक कक्षा में आगे बढ़ रहा है, आज अवलोकन वास्तव में दिखाते है कि सूरज आकाशगंगा के अंदर एक कक्षा में चल रहा है। दूसरा मतलब जो अक्षर 'लि' देता है वो है, "एक मंज़िल" हम इस आयत का यह अनुवाद भी कर सकते है, 'उस मंजिल की ओर बढ़ना जहाँ यह ख़त्म हो जायेगी।' अन्य आयत - चूँकि सूरज की ऊर्जा एक रोज़ ख़त्म जो जाएगी, यह उस अंत की ओर आगे बढ़ रहा है। इससे सूरज की physical और nuclear nature का भी पता चलता है। तीसरा अर्थ जो अक्षर 'लि' देता है, "कारण और प्रभाव," बेशक सूरज की हरकतें स्थिरता की वजह हैं। इसकी हरकत से गुरुत्वीय स्थिरता पैदा होती है जो ग्रहों को उनकी कक्षा में बनाए रखता है। ठीक हमारी पृथ्वी की तरह!

जब हम इन तीनों अर्थों को एक साथ लाते हैं, तो हम पाते हैं कि हमारे रब ने सूरज के अस्तित्व को अलग-अलग पहलुओं से महज़ एक अक्षर से समझा दिया है। क्या आपको नहीं लगता कि आयत का इतना शक्तिशाली ढंग से इस्तेमाल करना एक चमत्कार है?

और जहाँ विज्ञान अब जाकर इन तथ्यों की खोज कर रहा है, क़ुरआन ने 14 सदियों पहले ही इनका ज़िक्र कर दिया था। यह इसका एक और चमत्कारी पहलू है। अगर एक अक्षर में ही इतने मायने छिपे हैं, तो सोचिए पूरी किताब को न पढ़ना कितना बड़ा नुकसान होगा। आप एक आयत पढ़ते हैं जिसे आप पहले से जानते थे, मगर तभी एक नया अर्थ सामने आ जाता है। जैसे आपके सामने कोई छिपा हुआ खज़ाना मिल गया हो। क़ुरआन में ऐसे कई और अक्षर हैं जो अपने आप में गहरे अर्थ समेटे हुए हैं। अब, चलिए एक और मिसाल देखते हैं। क़ुरआन में एक भी शब्द बिना सोचे-समझे नहीं चुना गया है। हर शब्द तमाम संभावनाओं में से सबसे सटीक और बुद्धिमानी भरा चुनाव होता है। मिसाल के तौर पर, इस आयत को देखिए: "अगर उन्हें तुम्हारे रब के अज़ाब का एक हल्का सा झोंका भी छू ले..." आयत का बाक़ी हिस्सा इस अज़ाब के असर के बारे में है। यहाँ भाषा का एक कमाल का इस्तेमाल यह है: यह अज़ाब के महज़ एक छोटे से हिस्से का ज़िक्र करके उसकी पूरी ताक़त का अहसास करा देता है। इससे पढ़ने वाला कल्पना कर पाता है कि पूरा अज़ाब कितना भयानक होगा। और दिलचस्प बात यह है कि आयत में इस्तेमाल हुआ हर शब्द किसी छोटी, हल्की या मामूली चीज़ की ओर इशारा करता है। बिल्कुल वैसा ही जैसा इस आयत का मक़सद है। मिसाल के तौर पर, "लइन" का मतलब है "अगर।" तो, साफ-साफ "जब ऐसा होगा" कहने के बजाय, "अगर" जैसा एक doubtful expression इस्तेमाल किया गया है। यह किसी हल्की चीज़ की ओर इशारा करता है। और दूसरा शब्द "मस्सह" का मतलब है "छूना" तो यह कहने के बजाय कि अज़ाब सीधा उन पर आ गिरेगा, एक ऐसा शब्द इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब है "भले ही वह बस हल्का सा छू जाए।" अगला शब्द है "नफ़हतुन", जिसका मतलब है "हवा का झोंका।" यह कहता है कि महज़ एक मामूली झोंका ही उनके लिए बर्दाश्त से बाहर होगा। यहाँ फिर से, बहुत ही कम मात्रा का ज़िक्र है। दर्द को बयान करने के भारी शब्दों के बीच, अरबी ज़ुबान का सबसे हल्का शब्द, "अज़ाब", चुना गया। और आखिर में, अल्लाह के उन नामों के बजाय जो उसकी अज़मत और ताकत दिखाते हैं, आयत कहती है "रब", यानी वह जो पालता-पोसता है। इसमें रहम का एक अहसास है, है न?

तो यहाँ भी, बात को थोड़ा नरम रखा गया है। इसका मतलब है कि हर एक शब्द को असल मक़सद को पूरा करने के लिए बेहतरीन विकल्प के तौर पर चुना गया है। अगर महज़ एक झोंका ही उन्हें कुचलने के लिए काफी है, तो पूरे अज़ाब से क्या होगा? क्या आपको नहीं लगता कि यह एक बहुत ही अनोखा अंदाज़ है?

हज़ारों विद्वानों ने समझाया है कि क़ुरआन में किस तरह हर शब्द को इतनी सावधानी से चुना गया है। इस विषय के तहत आखिरी उदाहरण उन चीज़ों के बारे में है जिन्हें क़ुरआन जानबूझकर अधूरा छोड़ देता है। न केवल उन शब्दों में गज़ब की हिक़मत है जो वह कहता है, बल्कि उन चीज़ों में भी जिन्हें वह नहीं कहता। मिसाल के तौर पर, इस आयत को देखिए: "और वही कामयाब होने वाले होंगे।" आयत ईमान वालों की कामयाबी की बात करती है। मगर इसमें महज़ "कामयाब" शब्द का इस्तेमाल हुआ है। तो, वह कामयाबी क्या है?

यह साफ तौर पर नहीं बताया गया है। ताकि हर कोई इसे अपने तरीके से समझ सकें। ऐसा करके, यह आयत हर तरह के लोगों की हिम्मत बढ़ाती है। मिसाल के तौर पर, कुछ लोगों के लिए, कामयाबी का मतलब जहन्नुम से बचना है। वह व्यक्ति जहन्नुम से बचने के लिए वही करेगा जिसका इस आयत में हुक्म है। दूसरों के लिए, कामयाबी का मतलब जन्नत पाना है। कुछ के लिए, इसका अर्थ आख़िरत में अल्लाह से मिलना है। और अन्य के लिए, इसका मतलब इस दुनिया की समस्याओं से बचना हो सकता है। और इसी तरह। इसका अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि हर इंसान को क्या चाहिए। और यह प्रोत्साहन को और भी मज़बूत बनाता है। इतना ही नहीं, पाँच साल बाद आपके लिए कामयाबी के मायने बदल सकते हैं। इस तरह, यह आयत आपकी उम्मीद को ताज़ा रखती है जैसे आप इसे पहली बार पढ़ रहे हों। ऐसा करने के लिए, क़ुरआन अतिरिक्त शब्दों या वाक्यों का बोझ नहीं बढ़ाता। यह बस एक ऐसा शब्द चुनता है जिसके कई अर्थ निकाले जा सकें। जब हम इन तीनों उदाहरणों को देखते हैं, तो हम जान पाते हैं कि क़ुरआन की शब्दों की पसंद, यहाँ तक कि एक-एक अक्षर का इस्तेमाल, कितने गहरे और विशाल अर्थ समेटे हुए है। अब ज़रा कल्पना कीजिए कि पूरे वाक्य और आयतें क्या कुछ कह सकती हैं। इसीलिए क़ुरआन की आयतों पर 'तफ़सीर' (व्याख्या) की हज़ारों किताबें लिखी गई हैं। दुनिया में ऐसी कोई और किताब नहीं है जो इसके आस-पास भी हो। यहीं पर क़ुरआन का एक और चमत्कारी पहलू स्पष्ट हो जाता है। हमारा दूसरा बिंदु: इसकी अद्भुत गहराई और व्यापकता। व्यापकता का मतलब क्या है?

इसका मतलब है कि क़ुरआन केवल प्रार्थना या इबादत के लिए नहीं है। यह एक ऐसी किताब है जो हर चीज़ के बारे में बात करती है। यह आपको पौधों और जानवरों की दुनिया से human psychology तक ले जाती है। यह समाज, कानून, कूटनीति, विज्ञान, यहाँ तक कि आसमान के सितारों की बात करती है। यह पिछली क़ौमों की कहानियाँ सुनाती है, और भविष्य की ख़बर भी देती है। ऐसी ख़बरें जो पहले ही सच साबित हो चुकी हैं। यह एक विशाल समय सीमा को cover करती है। ब्रह्मांड की रचना से लेकर क़यामत के दिन तक। और उसके बाद के अनंत जीवन के बारे में भी। परिवार से संबंधित एक आयत आज क़ानूनी सलाह हो सकती है, और कल वही आत्मा की शुद्धि का मार्गदर्शन। एक और बात: ब्याज प्रतिबंधित है, और अन्याय खत्म होता है। या नफरत, ईर्ष्या, और नस्लवाद। ये वे समस्याएँ हैं जिन्हें मानवता सदियों से नहीं सुलझा सकी। फिर भी क़ुरआन चंद लाइनों में इनके जवाब देता है। हर बार जब आप इसे खोलते हैं, तो आप कुछ नया पाने की उम्मीद करते हैं। और वाक़ई, हर बार यह कुछ और ही देता है। और सबसे कमाल की बात ये है कि: हालाँकि विषय बहुत गहरे हैं, पर उन्हें समझाने का तरीक़ा इतना सरल है कि कोई भी समझ जाए। तो, क्या आपको किसी और किताब में इतनी व्यापकता मिल सकती है?

मानवीय विशेषज्ञों के बारे में सोचिए। एक ने कानून के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। दूसरे ने खगोल विज्ञान के लिए। तीसरे ने मनोविज्ञान के लिए। प्रत्येक अपने क्षेत्र में प्रतिभाशाली है। लेकिन आप वकील से अंतरिक्ष के रहस्य समझाने या खगोलशास्त्री से मानवीय आत्मा की गहराइयों को नापने के लिए नहीं कहेंगे। यह एक बुनियादी मानवीय सीमा है। लेकिन क़ुरआन जीवन के हर पहलू में अधिकार के साथ बोलता है। जैसे-जैसे सदियाँ बीतती हैं, इसकी अहमियत और भी समझ आती है। और जहाँ इस दुनिया की हर चीज़ समय के साथ पुरानी हो जाती है, क़ुरआन बस और अधिक ताज़ा, और भी प्रासंगिक व प्रभावशाली होता जाता है। और इसे हम तक पहुँचाने वाले पैगंबर अलैहिस्सलाम एक ऐसे व्यक्ति थे जो पढ़ना या लिखना नहीं जानते थे। निश्चित रूप से, यह एक बार फिर साफ दिखाता है कि कोई भी इस किताब के जैसा कुछ नहीं ला सकता। और क़ुरआन यह सब बिना किसी नीरस शब्दकोश जैसा लगे करता है। यही हमें तीसरे विषय पर लाता है: क़ुरआन के शब्दों का दमदार बहाव। मेरा क्या मतलब है?

मिसाल के तौर पर, सूरा अल-अनआम की एक आयत कहती है: "अल्लाह जिसे गुमराह करना चाहता है, उसका सीना तंग और संकुचित कर देता है, मानो वह आसमान की ओर चढ़ रहा हो।" आयत में यह expression है: ऐसा मालूम होता है जैसे कोई अपनी साँसें रोकने के लिए संघर्ष कर रहा हो। जब कहें - 'यस्साअदु' - इसका उच्चारण और भी कठिन हो जाता है। वैसे, उस समय लोग यह नहीं जानते थे कि जैसे-जैसे आप ऊँचाई पर जाते हैं, ऑक्सीजन कम हो जाती है और साँस लेना मुश्किल हो जाता है। जब हम इस बारे में भी सोचते हैं, तो हम पाते हैं कि इसी आयत में एक वैज्ञानिक चमत्कार भी मौजूद है। या सूरतुल-क़मर को लें। 'क़मर' शब्द का अंतिम अक्षर 'रा' है। अगर आप गौर से देखें, तो सूरत में 55 आयतें हैं। और बिना किसी अपवाद के, हर एक आयत 'रा' अक्षर पर समाप्त होती है। अरबी में क़मर का मतलब है चाँद। और अगर आप 'रा' अक्षर के आकार को देखें, तो यह आपको ठीक इसी की याद दिलाता है: एक हिलाल (नया चाँद)। एक जाना-माना उदाहरण सूरह अन-नास है। यह शैतान की गुपचुप फुसफुसाहटों की बात करती है। और इसकी आयतों का उच्चारण आपको फुसफुसाहट की याद दिलाता है। शुरू अल्लाह के नाम से जो निहायत रहम करने वाला है। तुम कह दो मैं पनाह माँगता हूँ इंसानों के रब की। इंसानों के बादशाह की। इंसानों के ईश्वर की। फुसफुसाने वाले की बुराई से जो बार-बार पलटकर आता है। जो लोगों के सीनों में वसवसे डालता है। चाहे वह जिन्नातों में से हो या इंसानों में से। जिस तरह शैतान दिल में गुपचुप तरीके से बात करता है, उसे इन शब्दों की आवाज़ के ज़रिए भी महसूस किया जा सकता है। क़ुरआन की sound harmony (ध्वन्यात्मक सामंजस्य) को अध्ययन का एक अलग क्षेत्र माना गया है। अगर किसी को क़ुरआन के flow (रवानी) के बारे में संदेह है, तो वह इसे महज़ पाँच मिनट के लिए online सुन सकता है। उसे इसका एहसास अपने दिल में होगा। ऐसे लोग हैं जिन्होंने पूरा क़ुरआन सैकड़ों बार पढ़ा है, और हर बार वे बिना बोर हुए इसे फिर से शुरू करते हैं। हमेशा उसी आध्यात्मिक उल्लास के साथ। क्या आप कोई और किताब बार-बार पढ़ सकते हैं, और फिर भी हमेशा उसी उत्साह के साथ शुरुआत कर सकते हैं?

कुछ समय बाद आप उससे थक जाएँगे। और यह केवल पढ़ने की बात नहीं है। लाखों लोग हैं जिन्होंने पूरा क़ुरआन हिफ़्ज़ किया है। हाँ, पूरे 600 पन्ने। यहाँ तक कि पाँच साल के बच्चों ने भी इसे याद किया है। यह कोई मज़ाक नहीं है। और क्या आप जानते हैं सबसे अद्भुत बात क्या है?

अल्लाह यह सब उन्हीं अक्षरों और शब्दों का इस्तेमाल करके करता है जिन्हें हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं। लेकिन वह उन्हें इतने सटीक तरीक़े से व्यवस्थित करता है कि भाषा के सबसे बड़े उस्तादों को भी स्वीकार करना पड़ा: "यह किसी इंसान का कलाम नहीं हो सकता। निश्चित रूप से यह केवल ईश्वर की ओर से है।" और अंत में, अब हम अपने चौथे विषय की ओर बढ़ते हैं: क़ुरआन में वैज्ञानिक व्याख्याएँ। आइए एक नज़र डालते हैं। सूरत अज़-ज़ारियात, आयत 47: ब्रह्मांड का विस्तार। सूरतुल-हदीद, आयत 25: यह तथ्य कि लोहा आसमान से उतारा गया है। सूरत अज़-जुमर, आयत 6: कोख में अंधेरे के तीन चरणों के माध्यम से बच्चे का विकास। सूरत अन-नूर, आयत 40: समुद्र की गहराइयों में अंधेरे का होना। सूरतुन-नबा, आयत 12: वायुमंडल की परतें। सूरतुल-अनआम, आयत 125: अधिक ऊँचाई पर हवा के दबाव में बदलाव। सूरत अन-नह्ल(NA'HL), आयत 68: शहद बनाने वाली मधुमक्खियों का लिंग (Gender)। सूरत अर-रअद, आयत 3: पौधों में नर और मादा का होना। सूरतुल-अअराफ़, आयत 57: बादलों का वज़न। सुरतुल-क़ियामह, आयत 4: मानवीय उंगलियों के निशानों की विशिष्टता। सुरतुल-हिज्र, आयत 22: हवाओं की निषेचन (Fertilizing) भूमिका। और भी बहुत कुछ। ऐसा भला कौन कर सकता है?

मिसाल के तौर पर, अरस्तू इतिहास के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक है। उसने कई लोगों को प्रभावित किया। उसने विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न विषयों पर बात की। लेकिन उसके 70% से अधिक वैज्ञानिक दावे आज के विज्ञान के ख़िलाफ़ जाते हैं। हालाँकि, क़ुरआन ने उसके दावों को नहीं दोहराया। या Isaac Newton को लें, जिन्हें Modern physics का जनक कहा जाता है। उन्होंने एक स्थिर ब्रह्मांड के विचार का समर्थन किया। दूसरी ओर, आज का विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। ठीक वैसा ही जैसा क़ुरआन ने कहा था। तो मैं जो कहने की कोशिश कर रहा हूँ वह यह है: उस समय, ऐसे विषयों पर बात करना बारूदी सुरंग के बीच चलने जैसा था। संक्षेप में, हम इसे इस तरह से समझ सकते हैं: सैकड़ों वर्षों तक, अनगिनत वैज्ञानिकों ने एक पहाड़ चढ़ने की कोशिश की। और जब वे अंततः शिखर पर पहुँचे, तो उन्हें एहसास हुआ कि क़ुरआन वहाँ पहले से ही मौजूद था। और यह तथ्य कि क़ुरआन ने एक भी गलती नहीं की, यह एक स्पष्ट संकेत है कि कोई भी इसकी बराबरी नहीं कर सकता। अगर आपको लगता है कि यह महज़ एक मानवीय भाषण है, तो एक ऐसी किताब लाएँ जो हर अक्षर में वैसी ही गहराई रखती हो। चूँकि क़ुरआन ने एक चुनौती दी है, आइए इसे अंतिम शब्द देकर समाप्त करें: "तो क्या वे क़ुरआन पर ग़ौर नहीं करते, या उनके दिलों पर ताले लगे हैं?"
