# एक पादरी ने इस्लाम अपनाया – यीशु के प्रति उनका प्यार उन्हें इस्लाम तक ले आया।

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/a-priest-converts-to-islam-his-love-for-jesus-led-him-to-islam
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=-Jrmp0XON7I
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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मेरा यीशु के प्रति प्रेम। मैं जानना चाहता था कि वास्तव में यीशु कौन थे। मेरे यीशु के प्रति प्रेम ने मुझे बुलाया कि मैं देखूं कि वह कौन थे। मेरे ईश्वर के प्रति प्रेम ने मुझे दिखाया कि यीशु ईश्वर नहीं हो सकते हैं। लोग मुस्लिम दुनिया के बारे में नहीं सोचते, और वे इस्लाम में स्वतंत्र रूप से धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों के बारे में नहीं सोचते। वे सोचते हैं कि इस्लाम तलवार के द्वारा फैलाया गया था। हमारे लिए, मेरे लिए, लैटिन अमेरिकी background से आने के कारण, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे लिए तो ईसाई धर्म हम पर तलवार के ज़ोर पर थोपा गया था। जब मैंने अपनी शहादा ली, मैंने आधी शहादा शुरू की, ला इलाहा इल्लल्लाह तो मेरे लिए प्रश्न थे। क्या पैगंबर मुहम्मद नउज़ुबिल्लाह एक दज्जाल हैं?

क्योंकि यही सिखाया जाता है, कि यीशु के बाद जो भी आता है वह झूठा पैगंबर है। पैगंबर एक ईमान और इंसाफ़ वाले समुदाय और समाज की स्थापना करने में सक्षम थे। मुस्लिम समुदाय मेरा परिवार बन गया। वे मेरे लिए शरण बन गए। अस्सलामुअलैकुम इमाम यूसुफ रियाज, हमारी दावत क़ुबूल करने का शुक्रिया। बतौर टुवर्ड्स इटर्निटी हम आपको अपने साथ पाकर बहुत खुश हैं। वालेकुमअस्सलाम वा रहमतुल्लाही व बरकातुहू अहमद भाई, यहाँ आकर अच्छा लगा। तो मेरा पहला सवाल है, इमाम यूसुफ रियाज़ कौन हैं? क्या आप हमें अपने जीवन के बारे में संक्षेप में बता सकते हैं?

खैर, संक्षेप में, मेरा जन्म अमेरिका में हुआ था। मैं एक कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट परिवार में पैदा हुआ था, और इसलिए मैं ईसाई धर्म की इन दो धाराओं के बीच बड़ा हुआ। अपनी किशोरावस्था में मुझे कुछ संघर्षों का सामना करना पड़ा, और फिर अपने बीसवें दशक के अंत में, मैं मुस्लिम बन गया। तो पिछले पच्चीस वर्षों से, दो और आधे साल की शिक्षा के बाद, मैं पादरी बनने की पढ़ाई कर रहा था। मैंने इस्लाम अपना लिया और मैं मुस्लिम समुदाय की सेवा पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ, दावत और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ। तो आपका जीवन आस्था के संबंध में कैसा था? आप किस पर विश्वास कर रहे थे?

मैं एक काफी धार्मिक पृष्ठभूमि, काफी धार्मिक परिवार में बड़ा हुआ। मेरे पिता का पक्ष प्रोटेस्टेंट का पालन करता था, और वे चर्चों के संस्थापक भी थे, और मेरी माँ का पक्ष कैथोलिक का पालन करता था, और वे कैथोलिक चर्च के प्रति काफी समर्पित थे। मेरा झुकाव ईसाई धर्म के रोमन कैथोलिक orientation की ओर अधिक था। तो अपनी किशोरावस्था में, मैंने थोड़ा संघर्ष किया धार्मिक होने का अर्थ समझने में, एक ऐसे समाज में जो तेजी से धर्मनिरपेक्ष हो रहा था। जिस शहर में मैं बड़ा हुआ, वहाँ यह काफी तीव्र था। जैसे, आप जानतेहैं, हमें अपराध और नशीली दवाओं से सामना करना पड़ा, और यहाँ तक कि संगीत भी सोचने और व्यवहार करने के ऐसे तरीकों के लिए खुल रहा था जो समाज में सामान्य नहीं थे। मेरे शुरुआती किशोरावस्था में, मैंने एक बहुत ही अंधेरे वास्तविकता का अनुभव किया कि एक इंसान होना क्या होता है, और जब मैं किशोरावस्था के आख़िरी पड़ाव से बाहर आने लगा, तो मैं अधिक धार्मिकता की तलाश में था, और मेरी दृष्टि दुनिया को लेकर बहुत नकारात्मक थी। मैं सोच रहा था कि दुनिया का अंत आ रहा है, यह आख़िरत की तैयारी का समय था, और इसी तरह की बातें, इसलिए मैं विपरीत Extreame पर चला गया। विपरीत Extreame यह था कि मैं सब कुछ छोड़ देना चाहता था और खुद को केवल एक सीमित इबादत में समर्पित करना चाहता था और दुनिया से खुद को अलग करना चाहता था, और एक पादरी बनना उस यात्रा का एक हिस्सा था, मैं वास्तव में उससे पहले एक साधु बनना चाहता था, लेकिन फिर मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया, और मैंने दो और आधे साल तक पादरी बनने के लिए पढ़ाई की, और फिर वहां मैंने इस्लाम में आने का फैसला किया। ये ढाई साल आपके लिए कैसे बीते, और उन वर्षों में आपने क्या अनुभव किया जिससे आपने मुस्लिम बनने का निर्णय लिया?

पादरी बनने के लिए अध्ययन करने के लिए, आप केवल धार्मिक शिक्षाओं का अध्ययन नहीं करते, बल्कि आपको दर्शनशास्त्र का भी अध्ययन करना होता है। आपको अन्य धर्मों का भी अध्ययन करना होता है, न कि केवल अपने धर्म का। तो फिर मेरे दार्शनिक अध्ययन से आने वाली विचारों की चुनौती के साथ, इसने मुझे प्रश्न करने पर मजबूर किया। और जहाँ मैं भावनात्मक रूप से था, जैसा कि मैंने आपको बताया, मैं वास्तव में दुनिया में बहुत अधिक शामिल नहीं था, इसलिए मैंने खुद से पूछना शुरू किया, "खैर, धर्म का जीवन के लिए क्या मतलब है?" और वहीं मैंने देखा कि, आप जानते हैं, मेरा ईसाई धर्म का अभ्यास वास्तव में परिवार के जीवन, समाज, और इसी तरह की बातों को डील करने में सक्षम नहीं था। यह था ...

जो विचार हमें दिया जा रहा था वह यह था कि धार्मिकता का मतलब है कि आपको दुनिया से अलग होना चाहिए, और जो लोग शादीशुदा हैं या समाज में हैं, उनकी धार्मिकता कमतर होती है। तो मेरे लिए यह समझ में नहीं आया कि, पैगंबर ने बनी इसराइल को ईश्वर के एक होने को सिखाने के लिए संघर्ष किया, और फिर अंत में, आप जानते हैं, हम कह रहे हैं कि ईश्वर एक इंसान है। फिर, हम, हम इब्राहीम अलैहिस्सलाम और मूसा अलैहिस्सलाम के संघर्ष को जानते हैं। इसलिए अंत में यह बहुत अधिक समझ में नहीं आया। साथ ही, जब मैं पादरी बनने के लिए अध्ययन कर रहा था, तो हम अक्सर जिन Psalms का पाठ करते थे, उसमें ईश्वर ने बुराई का निर्माण किया है, यह बात Psalms में बहुत स्पष्ट थी, लेकिन ईसाई धर्मशास्त्र में यह कुछ और ही था। इसलिए तौहीद का विचार मेरे लिए एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया, जैसे कि तौहीद का वास्तव में क्या मतलब है?

तो वे यह भी जानते हैं कि यीशु कौन हैं, और मैंने इसे अन्य प्लेटफार्मों पर उल्लेख किया है कि यीशु के बारे में स्पष्ट समझ नहीं थी, जिस तरह से हमें पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के जीवन के बारें में है। हमारे पास ऐतिहासिक डेटा है, यह सिर्फ भावनात्मक नहीं है यह कल्पना नहीं है। और फिर सवाल यह आया कि उन लाखों लोगों के साथ आप क्या करते हैं जो अन्य आस्थाओं से हैं? क्या आप कहते हैं कि वे नर्क में जा रहे हैं, आप उस reality से कैसे निपटते हैं? तो उन चीज़ों ने वास्तव में मुझ पर प्रभाव डाला और मुझे सवाल करने के लिए मजबूर किया। वे ही चीज़ें थीं जिन्होंने मुझे इस्लाम की ओर धकेला। और इस्लाम की ओर आपकी यात्रा कैसे शुरू हुई? वह कौन सी चीज़ थी जिसने आपकी यात्रा शुरू की?

यीशु के प्रति मेरा प्रेम। मैं जानना चाहता था कि यीशु कौन थे। जब आप इस्लाम अपनाते हैं, तो आपको एहसास होता है कि यह एक घटना नहीं है। कई अलग-अलग घटनाएँ होती हैं, लेकिन हमेशा एक मुख्य चीज़ होती है जो आपको आगे बढ़ाती है। लेकिन यीशु के प्रति मेरा प्रेम ही वह था जिसने मुझे इस्लाम की ओर धकेला। मैं जानना चाहता था कि आख़िरकार यीशु थे कौन। इसने मुझे फिलिस्तीन की ओर देखने के लिए प्रेरित किया। इसने मुझे उस वास्तविकता का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया, और फिर मैंने अजान सुनना शुरू किया। और जब मैंने अज़ान सुनना शुरू किया, तो इसने मुझे इस्लाम की ओर और अधिक खींचा। लेकिन ईश्वर की सच्ची उपासना करने और यीशु को वास्तव में जानने की मेरी इच्छा ने मुझे खुद से सवाल करने पर मजबूर कर दिया, जैसे, इसका वास्तव में क्या मतलब है?

और इसलिए मुझे उन प्रकार के मुद्दों पर काम करना पड़ा, जैसे उपासना के आदर्श के रूप में यीशु, यीशु वास्तव में कौन हैं, यीशु की वास्तविक शिक्षाएँ क्या थीं। क्या यीशु ने कहा कि वह ईश्वर हैं या यीशु हमें एकमात्र ईश्वर का अनुसरण करना सिखा रहे थे?

और यहां तक कि ईसाई विद्वानों में भी, पिछले दो सौ वर्षों से यह विचार संदेहास्पद रहा है कि यीशु ने कहा कि वो ईश्वर हैं। यह मुसलमानों द्वारा अपनी धारणा थोपना नहीं है। यह यहूदी नहीं हैं। यह खुद ईसाई हैं जो अपनी विद्वता में कह रहे हैं कि, "नहीं, हमारे पास वास्तविक ठोस सबूत नहीं हैं। ऐसी चीजें हो सकती हैं जो वैसी दिखती हैं, लेकिन हमारे पास वास्तविक ठोस सबूत नहीं हैं।" और इस प्रकार का प्रश्न प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म से आया। यीशु के प्रति मेरे प्रेम ने मुझे दिखाया “वह कौन थे।” ईश्वर के प्रति मेरे प्रेम ने मुझे यह दिखाया कि यीशु ईश्वर नहीं हो सकते, क्योंकि वह मूर्तिपूजा होगी। लेकिन यहाँ एक दिलचस्प बात है। जब मैंने प्रैक्टिस शुरू किया और मुझे यह उल्लेख करना चाहिए। जब मैंने कैथोलिक धर्म की practice शुरू की, मैंने आपको बताया कि मैं धार्मिक बनने लगा, क्योंकि किशोरावस्था में मेरे जीवन में एक बुरा अनुभव हुआ था। लेकिन जिसने मुझे मेरे ईसाई धर्म पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया, वह मेरा चचेरा भाई था, क्योंकि उसने मुझसे पूछा, उसने कहा, "तुम उस पर विश्वास करते हो, लेकिन तुम्हें क्या कहना है..

." क्योंकि मेरा चचेरा भाई मुसलमानों से बातचीत कर रहा था। उसने कहा, "लेकिन इन लाखों मुसलमानों के बारे में क्या? क्या आप दावा कर रहे हैं कि वे नरक में जाने वाले हैं?

वे नेक लोग हैं।" तो मेरे चचेरे भाई, वह मुसलमानों के साथ काफी घुलमिल रहे थे, और वह मुझे मुसलमानों के समूह में ले जा रहे थे, और वे मुझसे सवाल करते थे, और उससे मुझे ईसाई धर्म का अभ्यास करने में अधिक research-oriented बनने के लिए मजबूर होना पड़ा। कई मायनों में, वही थे जिन्होंने मुझे इस्लाम का अधिक गहन दृष्टिकोण दिया। और कुछ समय के लिए, उन्होंने अपनी शहादा नहीं ली। जब मैंने अपनी शहादा ली, तो मैंने आधी शहादा ली: लाइलाहा-इल्लल्लाह हमें सिखाया गया था कि यीशु के बाद कोई नबी नहीं आएगा। तो मेरे लिए, सवाल था, क्या पैगंबर मुहम्मद एक दज्जाल हैं? नाउज़ुबिल्लाह हम जो इस्लाम में समझते हैं, क्या वो झूठे पैगंबर थे?

क्योंकि यही सिखाया जाता है, कि यीशु के बाद जो भी आता है वह झूठा पैगंबर है। तो मुझे डर था कि रुको एक सेकंड लेकिन Oneness of God क्योंकि जब आप बाइबल में देखते हैं, तो बाइबल कहती है सुनो इस्राएल तुम्हारा खुदा एक है और आप Ten Commandments को देखते हैं और Ten Commandments आपको सिखाती हैं कि उस एक खुदा के अलावा कोई अन्य खुदा नहीं होना चाहिए। जो कि मूल रूप से शहादाहै। तो मैंने कहा, "मैं यहाँ तक आऊँगा," जो मुसलमानों के लिए स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि वे चाहते हैं कि आप पूरी शाहदा स्वीकार करें। लेकिन मैंने कहा, "मैं यहाँ तक आऊँगा, और बाकी की चिंता बाद में करूँगा, क्योंकि मैं विश्वास करता हूँ...

मैं इसके लिए आश्वस्त हूँ।" जब मैंने पादरी बनने की पढ़ाई छोड़ी, तो मैं एक संकट से गुज़रा मैंने पहले ही बौद्ध धर्म का अध्ययन किया था। मैं पैगंबरों में विश्वास करता था, इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था, लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि किस दिशा में जाना है, और मैं नास्तिक नहीं बनना चाहता था। मुझे यहूदी समुदाय से जुड़ाव महसूस नहीं होता था क्योंकि, आप जानते हैं, उनकी नस्ल-आधारित प्रतिबद्धता के कारण। आपको उनके ethnic group का हिस्सा होना पड़ता है। और इसलिए यह एक वास्तविकता है। और इसलिए मैंने कहा, "केवल एक चीज़ बची है, और वह है इस्लाम।" तो मैं इस हद तक आऊंगा और बाकी की चिंता बाद में करूंगा। और फिर जब मैंने अधिक से अधिक अध्ययन करना शुरू किया तो चीजें मेरे लिए अधिक स्पष्ट हो गईं। तो मुझे यीशु के बारे में स्पष्ट नहीं था, और मुझे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के बारे में स्पष्ट नहीं था। लेकिन मैं ला इलाहा इल्लल्लाह पर स्पष्ट था। और फिर मैं पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के बारे में अधिक स्पष्ट होने लगा। फिर आपको किस बात ने यह विश्वास दिलाया कि पैगंबर मुहम्मद ईश्वर के पैगंबर हैं?

तो आपने क्या सीखा जिससे आप इस तरह सोचने लगे?

जब मैंने पैगंबर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की जीवनी पढ़नी शुरू की, वो एक turning point था। हालांकि, आपको पता है कि जिस तरह से हम सीरत बयान करते हैं उसपर मेरे अपने मतभेद है। हमें सीरत बयान करने को लेकर सावधानी बरतनी होगी। बतौर मुसलमान यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्योंकि हम सीरत का बयान करते हैं, सीराह को व्यवस्थित करते है। यह ऐसा दिखाता है जैसे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जन्मे थे फिर वह जवान हुए, फिर एक मोड़ पर उन्होंने खुदा को जाना और फिर वो एक पैगंबर बने, और फिर उन्होंने दावत दी, फिर उन्होंने एक community की स्थापना की। फिर वहां से पूरे समुदाय की स्थापना की प्रक्रिया के दौरान जो आप पाते हैं वह ये है कि ये सभी उल्लेखित लड़ाइयाँ लड़ी गई। इसलिए वो पैगंबर अलैहिस्सलाम को एक योद्धा के रूप में दिखाता है। यह एक dimension है!

लेकिन हम मुसलमानों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि इस पर ज़ोर दें कि पैगंबर ने लोगों के साथ, उनके दुश्मनों के साथ, अन्य धर्मों के लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया। यह महत्वपूर्ण है, है ना? तो वे पहलू, पैगंबर की करुणा, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनका...

एक नेता के रूप में उनकी भूमिका, न्याय स्थापित करने में उनकी भूमिका, ये चीजें मुझे इस बात के लिए और अधिक आश्वस्त करती हैं कि पैगंबर कौन हैं। और साथ ही यह तथ्य कि हमारे पास documented evidence हैं। किसी अन्य नबी या किसी अन्य मानव के उस स्तर का कोई अन्य documented evidence नहीं है, जिसे हम देखें, जिसे हम verify कर सकें। यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे हमें कल्पना या बिना प्रमाण के विश्वास के आधार पर मानने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन मैंने यह भी सीखा कि इस्लाम क्या सिखाता है, इस्लाम को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, उसमें बहुत सारी गलतफहमियाँ हैं। अभी भी मन में ये फ्रेम किया गया है कि इस्लाम दुनिया के खिलाफ है। आप जानते हैं कि Henry Kissinger की यह मानसिकता थी कि इस्लाम सिर्फ युद्ध का धर्म है और जिस तरह से ओरिएंटलिस्टों ने इस्लाम को दर्शाया, वह अभी भी कुछ हद तक प्रभावी है। लोग मुस्लिम दुनिया के बारे में नहीं सोचते हैं और वे इस्लाम को स्वतंत्र रूप से अपनाने के बारे में नहीं सोचते हैं, वे सोचते हैं कि इस्लाम तलवार के द्वारा फैला। यह एक बहुत ही real reality है। तो इसका ऐतिहासिक पक्ष और सांस्कृतिक पक्ष और civilizational side वास्तव में प्रमुख नहीं है। हमारे लिए, मेरे लिए, लैटिन अमेरिकी पृष्ठभूमि से आने के कारण, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि तलवार के बल पर तो हमपर ईसाई धर्म थोपा गया था। तो आपके परिवार और आपके आस-पास के लोगों ने आपके इस्लाम अपनाने पर कैसी प्रतिक्रिया दी?

यह बहुत कठिन था, क्योंकि मैं एक ईसाई background से आया था। फिर कुछ साल बाद, nine eleven हुआ, तो यह सब built up हो गया। मैं पहले से ही कुछ समय के लिए मुस्लिम था, लेकिन nine eleven हुआ, और, और मेरे परिवार के साथ मेरे संबंध अच्छे नहीं रहे। मेरी माँ ने मुझे काफी हद तक ठुकरा दिया, खासकर जब मेरी शादी हुई। तो मैं उस दौर से गुज़रा जहाँ मेरी माँ ने मुझे ठुकरा दिया, धार्मिक कारणों से। जब भी मैं उनसे बात करता, पहले ऐसा नहीं था लेकिन अब हमारी बातचीत में वो हमेशा ऐसे ढंग अपनाती थी कि जिससे बात यहाँ पहुँचें कि कि यीशु खुदा हैं और अगर मैंने ये नहीं माना कि यीशु खुदा हैं तो ये एक problem है। क्योंकि उनकी नजर में मैं एक मुरतद था। आप जानते हैं, मैंने धर्म छोड़ दिया था। Puerto Rican culture में, विशेष रूप से कैथोलिक culture में, दोनों एक ही हैं। तो जब आप कैथोलिक धर्म छोड़ते हैं, तो यह ऐसा है जैसे...

ईसाई होना छोड़ देना। मेरा मतलब है, Puerto Rican होना छोड़ देना, Sorry तो वो बड़ा संघर्ष था। जब मेरी शादी हुई, तो मैं अपनी पत्नी को अपनी दादी से मिलाने ले गया, क्योंकि मेरी दादी एक कट्टर, सक्रिय कैथोलिक थीं। वह चर्च में सक्रिय थीं। सिर्फ एक साधारण अनुयायी नहीं, बल्कि वह सक्रिय थीं। उनका role थोड़ा leadership वाला था। तो जब उन्होंने मेरी पत्नी को हिजाब में देखा, तो उन्होंने कहा, "यह सही तरीका है।" शुरू में, वह मुझसे बात नहीं करती थीं, और फिर अंत तक बातचीत बहुत कम हो गई। फिर यह मेरे बच्चों के साथ बदल गया। जब मेरे बच्चे पैदा हुए, तो आप जानते हैं, एक निश्चित समय तक वह उनसे नहीं मिलती थीं, लेकिन फिर ऐसा हुआ कि मुझे लड़ना पड़ा ताकि वे मेरी माँ के साथ एक relationship में हों। फिर यह बदल गया, फिर बातचीत बहुत अच्छी हो गई। मुस्लिम उम्मत मेरी माँ बन गई। अब तक यह बहुत कठिन रहा। इसने मुझे अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील बना दिया ये है जो कि इसने मुझे बनाया, दूसरों के प्रति संवेदनशील इस मामले में मैं अभी भी आगे बढ़ रहा हूँ, लेकिन इसने मुझे निश्चित रूप से संवेदनशील बना दिया। इसने मुझे मुस्लिम समुदाय पर बहुत अधिक निर्भर बना दिया, शायद जितना मुझे होना चाहिए था उससे अधिक। लेकिन इसने मुझे निश्चित रूप से मुस्लिम समुदाय पर निर्भर कर दिया। क्योंकि यही मेरा परिवार बन गया। मुस्लिम समुदाय मेरा परिवार बन गया। वे मेरे लिए शरण बन गए। और क्या आपके परिवार के किसी सदस्य, जैसे extended family members ने आपके बाद इस्लाम अपनाया है?

हाँ। मेरे चचेरे भाई मुस्लिम बन गए, वही जिन्होंने मुझे इस्लाम में आने के लिए प्रेरित किया। वो मेरे भाई जैसे थे। वह मेरे चचेरे भाई जैसे थे। हम साथ बड़े हुए और जब मैं मुस्लिम बना, तब वो मुस्लिम नहीं बने, इसलिए मैंने सोचा कि वह मुस्लिम बन जाएंगे। और इसलिए ऐसा था कि वो अभी भी बहुत सी चीजों से जूझ रहे थे, तो मैं अपनी यात्रा पर था, जैसे इस्लाम का अध्ययन करना और, दावत देना वगैरह। तो मुझे किसी तरह आगे बढ़ते रहना पड़ा, इसलिए यह कठिन था। यह कठिन था क्योंकि ऐसा था कि मैं अपने परिवार से अलग हो गया था। मैं अपने समुदाय और सभी से अलग हो गया था। ऐसा महसूस होता है जैसे कोई और भी तो है, जो कि मुसलमान बना। तो अंतिम प्रश्न: पैगंबर मुहम्मद अलैहिस्सलाम के जीवन के बारे में आपको किस चीज़ ने सबसे अधिक प्रभावित किया?

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक समुदाय और विश्वास और न्याय का समाज स्थापित किया। यही वह चीज़ है जिससे हर कोई अभी जूझ रहा है: जीवन का अर्थ क्या है? हम हर स्तर पर, राजनीतिक, आर्थिक रूप से न्याय कैसे स्थापित करें? हम मतभेदों से कैसे निपटें? और आधुनिक दुनिया को उस दृष्टिकोण से पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन का अध्ययन करना चाहिए। अच्छा नेतृत्व कैसा दिखता है? क्योंकि आस्था और जीवन के बीच सीधा संबंध है, और वही मॉडल, वही संघर्ष था जो मेरे पास था। तो आपने कहा कि आपने कई धर्मों की खोज की। और सैकड़ों धर्मों में से इस्लाम क्यों?

विश्वास की सरलता, संसाधनों की प्रामाणिकता, जीवन से संबंधित व्यावहारिकता। इस्लाम मानव के हर पहलू से संबंधित है। इस्लाम पृथ्वी पर एकमात्र धर्म है, मैं यह यक़ीन के साथ कह सकता हूँ, जो इंसानों के हर पहलू से संबंधित है और संपूर्ण मानवता को शामिल करता है। यह एक नैतिकता, या जनजाति, या नस्ल पर आधारित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के लिए है। जीवन के हर स्तर पर मार्गदर्शन देता है। जीवन का जश्न मनाता है। जीवन बहुत सुंदर और सकारात्मक है, और इंसान अच्छा है। इंसान का मूल, बहुत आशावादी, इस संदर्भ में बहुत आशान्वित है। कल्पना कीजिए कि एक ईसाई आपके पास आता है। आप उन्हें इस्लाम को केवल एक मिनट में, संक्षेप में कैसे बतायेंगे?

मैं हमेशा कहता हूँ कि इस्लाम, संक्षेप में, जो हमारे पास ten Commandments में है, केवल खुदा की इबादत करना और खुदा के अलावा कोई अन्य खुदा नहीं, और मूर्तियाँ नहीं रखना। हम यीशु की वास्तविकता की पुष्टि कर रहे हैं, यीशु की शिक्षाओं की पुष्टि कर रहे हैं, यीशु केमिशन को पूरा कर रहे हैं। यीशु प्रेम और करुणा की ओर इशारा कर रहे थे, और आप यह पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन में पूरी तरह से सीखते हैं, जो पूरी मानवता के लिए हैं। और यीशु ने खुदा का एक होना सिखाया, और, और खुदा की इबादत करने के लिए, और एक सरल आस्था, सरल जीवन जीने के लिए। तो ये सभी बातें, आपको इस्लाम में अधिक स्पष्टता के साथ मिलती हैं। लेकिन यीशु एक मुस्लिम थे, उन्होंने खुदा के प्रति समर्पण किया। मुस्लिम, इसका सरल अर्थ है खुदा की मर्जी के आगे समर्पण करना। येशु ने ऐसा किया, हाँ। और अंत में अगर दुनिया के सभी गैर-मुसलमानों से बात करने का मौका मिले, तो आप उनसे क्या कहना चाहेंगे, अगर आपके पास सिर्फ कुछ क्षण हों?

अपने आप को कुरान के संपर्क में आने से वंचित न करें, दुनिया की शुरुआत से ही यहाँ पर एकमात्र प्रामाणिक धर्म इस्लाम है। आपके लिए इसकी प्रकाशना अब तक सुरक्षित है और यह आसान भाषा में है। और अपने आप को वास्तव में यह जानने से वंचित न करें कि पैगंबर मुहम्मद कौन हैं। वे ... उन पर शांति हो। ये दो बुनियादी चीजें हैं। और दूसरा, अंत में, आप जानते हैं, इस्लाम एक सभ्यता के रूप में, केवल एक धार्मिक प्रथा के रूप में नहीं, बल्कि इस्लाम का सभ्यता पर प्रभाव, मानवता को बहुत कुछ देने के लिए है। इसमें जो लाभदायक है, उसे लें। मुझे लगता है कि यही तीन मुख्य संदेश हैं जो मैं दुनिया भर के लोगों को देना चाहूंगा।
