# नास्तिक सर्जन ने इस्लाम अपनाया “मैंने अल्लाह से प्रार्थना की कि मेरी बेटी को बचाए”

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/atheist-surgeon-converts-to-islam-i-begged-god-to-save-my-daughter
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=-E7VYwZvbBM
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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मैं एक नास्तिक के रूप में पला-बढ़ा। मैं एक अकादमिक मेडिकल स्कूल गया, सफल, पैसे कमाना, अपनी ज़िंदगी से खुश! मेरी एक बेटी थी जो एक Congenital Heart Defect के साथ पैदा हुई थी। उसके शरीर का निचला हिस्सा मर रहा था क्योंकि...

उस हिस्से को ऑक्सीजन नहीं मिल रही थी। उन्होंने मुझे कमरे से बाहर भेज दिया। मैं सीधा अस्पताल के prayer room में चला गया। मैंने कहा, "ईश्वर, अगर तू है तो मुझे मदद चाहिए। अगर तू मेरी बेटी को बचा लेगा तो मैं मानने लगूँगा। फिर मैंने हर धर्म को पढ़ना शुरू किया। ताओइज़्म, buddhism, hinduism मेरे भाई ने मुझे कुरआन के अर्थ का अनुवाद भेजा। जब मैंने उसे पढ़ा, तो सब कुछ मेरे लिए साफ़ हो गया। मुसलमान बनने के बाद मेरी पत्नी ने जो 14 साल से मेरे साथ थी मुझे तलाक दे दिया। मेरे माँ-बाप ने भी मुझे ठुकरा दिया। "मेरे घर से निकल जाओ और कभी वापस मत आना!" एक रात मुझे एक सपना आया जिसमे हज़रत मुहम्मद ﷺ के समक्ष था। और उन्होंने पहाड़ों की तरफ इशारा करते हुए कहा, "पहाड़ों पर चले जाओ।" अस्सलामुअलैकुम, डॉ.

लॉरेंस ब्राउन। हमारा निमंत्रण स्वीकार करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हमें बहुत ख़ुशी है की आप हमारे साथ हैं। वअलैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु। मैं सबसे पहले ये जानना चाहूँगा कि डॉ. लॉरेंस ब्राउन कौन हैं। क्या आप हमें अपने जीवन के बारे में संक्षेप में बताए? तो मैं... मैं एक ophthalmologist और लेखक हूँ, और इस समय मैं सऊदी अरब में रह रहा हूँ और काम कर रहा हूँ। मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो Quaker था, लेकिन non-practising था। तो Quaker, ईसाई धर्म के Protestant मत का एक संप्रदाय है। मैंने करीब 30 साल पहले इस्लाम क़ुबूल किया। और इसी कारण से मैं सऊदी अरब पहुँचा, जहाँ मैं तब से ही रह रहा हूँ और काम कर रहा हूँ। आपका जीवन आस्था के मामले में कैसा था? आप किस पर विश्वास करते थे?

मेरा पालन-पोषण नास्तिक के रूप में हुआ था। मैं अमेरिका में पला-बढ़ा हूँ, मेरा जन्म व पालन-पोषण San Francisco में हुआ। मैंने एक academic high school, कॉलेज और फिर मेडिकल स्कूल में पढ़ाई की, उसके बाद इंटर्नशिप और रेजिडेंसी की। इन सभी शैक्षणिक माहौल में, मेरे ज्यादातर proffessors , colleagues और सहपाठी, सब नास्तिक थे। और आप जानते हैं, इसे intellectuals का आस्था माना जाता था। क्योंकि intellectuals तर्क और विचार से ईश्वर के अस्तित्व को नकार देते हैं। तो यही मेरा विश्वास था, जब तक कि मुझे spiritual awakening नहीं हुआ। कृपया हमें इस अनुभव के बारे में बताइए। ऐसा क्या हुआ जिसने आपके विश्वास पर सवाल उठाए। और आप इस सफर पर निकल पड़े?

इसे बिल्कुल साफ-साफ बताना थोड़ा मुश्किल है। लंबी पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद मैं एक कंसल्टेंट ophthalmologist बन गया था। मैं सफल था, अच्छी कमाई कर रहा था, और ज़रूरत की हर चीज़ खरीद सकता था, अपनी ज़िंदगी से खुश भी था, लेकिन फिर मैंने आसपास देखना शुरू किया और लगा कि ज़िंदगी में इससे ज़्यादा भी कुछ होना चाहिए। लेकिन मेरे लिए असली मोड़ तब आया जब मेरी एक बेटी हुई जो एक Congenital Heart Defect के साथ पैदा हुई। जिसे... खैर ये असल में ये दिल की नहीं, बल्कि दिल से जुड़ी मुख्य नस, यानी aorta की समस्या थी। और वह Aorta की coarctation के साथ पैदा हुई थी। तो जन्म के समय उसकी… उसके शरीर का निचला हिस्सा dusky blue था, इतना dark blue कि, उम्म…

मैंने जो surgical scrubs पहना है उससे भी गहरा। तो ऐसा लग रहा था मानो उसका शरीर… मर रहा हो, क्योंकि उसे ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही थी। और offcourse एक डॉक्टर होने के नाते, मेरे लिए ये सब भयभीत करने वाला था। और जैसा कि मैंने कहा, तब तक मैं नास्तिक था, हालाँकि मुझे एक creator की मौजूदगी का एहसास होना शुरू हो गया था, और वह…

वह एहसास केवल उस creator की तरफ़ से ही आ सकता है। मेरी पूरी ज़िंदगी में, मैं हमेशा ही नियंत्रण में रहा। मैंने कभी भी ऐसे हालात का सामना नहीं किया जिसमे मुझे लगा हो कि मैं नियंत्रण में नहीं हूँ। यह मेरी ज़िंदगी में पहली बार था जब मुझे लगा कि — अब मैं कुछ नहीं कर सकता। मैं कुछ भी नहीं कर सकता। पहले हमेशा ऐसा होता था कि अगर पैसों की ज़रूरत होती, तो मैं और मेहनत करता। अगर ये चाहिए, मैं वो करता। मेरी ज़िंदगी हमेशा से ही मेरे नियंत्रण में थी। लेकिन अब मैं ऐसी स्थिति का सामना कर रहा था, जहाँ अपनी बेटी को इस हालत में देखकर मुझे एहसास हुआ कि मैं कुछ नहीं कर सकता। उसे बचाने वाला अगर कोई है, तो वह सिर्फ मेरा creator है। उन्होंने मुझे कमरे से बाहर भेज दिया। मैं NICU से बाहर निकल आया…

और मेरे दिल के अंदर कुछ तो आया कि मैं सीधे अस्पताल के parayer room की ओर चला गया। मैंने parayer room में प्रवेश किया और... मैंने बस एक बहुत ही सादी-सी दुआ की। क्या आपने कभी *Skeptic's Prayer* के बारे में सुना है? तो... *Skeptic's Prayer* बस ये दुआ करना है कि "हे ईश्वर, यदि तू है तो मेरी, तो मेरी रूह को बचा ले, यदि मेरी कोई रूह है।" और यही…

इसी तरह से बहुत से skeptics, बहुत से नास्तिक दुआ करते हैं। मुझे उस समय *Skeptic's Prayer* के बारे में पता नहीं था, लेकिन मेरी दुआ लगभग वैसी ही थी। असल में, मेरी दुआ तो उससे भी कहीं ज़्यादा मेल खाती थी *सूरह अल-फ़ातिहा* से। इस मायने में कि मैंने अपने creator को पहचान लिया था। मैंने कहा, “हे ईश्वर, अगर तू है तो मुझे मदद चाहिए।” मैंने बस अपने creator से माँगा, directly ईश्वर से बात करते हुए मैंने कहा, “अगर तू मेरी बेटी को बचा ले और मुझे उस धर्म की राह दिखा दे जो तेरे लिए सबसे सही है ज़रूरी नहीं कि वह मुझे सबसे सही लगे, लेकिन जो तेरे नज़दीक सबसे सही हो, तो मैं उसे मानूँगा। फिर मैं prayer room से निकलकर वापस आईसीयू में गया। मैं लगभग 10–15 मिनट दूर रहा हूँगा। ताकि डॉक्टर अपनी जाँच करें और निर्णय ले सकें। और आप जानते हैं, नवजात शिशु के आईसीयू में जाते है एक प्रक्रिया होती है — आपको हाथ धोने पड़ते हैं, गाउन, दस्ताने, मास्क, टोपी — ये सब पहनना पड़ता है। जब मैं ये इन सब से निपट रहा था मैंखिड़की से अंदर झाँका रहा था और मैंने देखा कि सारे डॉक्टर्स कमरे के दूर कोने में मेरी बेटी के चारों ओर इकट्ठा थे। वे ऊपर और मेरी तरफ देख रहे थे, और उनके चेहरे के भाव देख सकता था...

मैं… …मैं उनके चेहरे से समझ गया कि कुछ तो बदला है। तो जब मैं कमरे के अंदर पहुँचा, और… …you know… अब लगभग 35–36 साल हो चुके हैं, लेकिन मैं आज भी बिना गला रुँधे ये क़िस्सा नहीं सुना पाता। जब मैं डॉक्टरों के पास पहुँचा, तो pediatric cardiothoracic surgeon ने मेरी तरफ देखा और कहा, “वह बिल्कुल ठीक हो जाएगी।” मुझे एहसास हुआ कि वहाँ मौजूद सब लोग इस वजह को मान रहे थे, लेकिन मेरे दिल में जो महसूस हो रहा था, वह ये था कि कुछ मिनट पहले जब मैं अपने creator से इस बच्ची को बचाने की दुआ कर रहा था, तब वे मेरे साथ नहीं थे। और सच कहूँ तो, यही वह पल था जब ईमान मेरे दिल में उतरा। मेरी बेटी, मेरी बेटी हन्ना, आगे चलकर…

पूरी तरह से सामान्य हो गई। उसे न दवा की ज़रूरत पड़ी, न सर्जरी की, और न ही किसी तरह के इलाज की। वह पूरी तरह से सामान्य हो गई। आप इसे चमत्कार कह सकते हैं या डॉक्टरों के explaination को मान सकते हैं, लेकिन मेरे लिए, यह वह पल था जब मुझे एहसास हुआ कि मैंने अपने creator से एक वादा किया था। मैंने उनसे दुआ की थी, वादा किया था कि अगर वह मेरी बच्ची को बचा लें और मुझे…

मुझे उस धर्म की राह दिखा दें जो उनके लिए सबसे सही है, तो मैं उसे मानूँगा। ज़रा इस भावुक पल से उबर लूँ, फिर आगे बताता हूँ। तो उसके बाद लगभग चार–पाँच सालों तक मैंने गहरी मानसिक उलझन का सामना किया, क्योंकि मैंने वादा किया था कि अगर अल्लाह मुझे उस धर्म तक पहुँचा दें जो उनके लिए सबसे सही है, तो मैं उसको मानूँगा। और मैं उसे ढूँढ नहीं पा रहा था। मेरा मतलब है, मैंने शुरू किया…

मैंने हर चीज़ के बारे में पढ़ना शुरू किया — Taoism, Buddhism, Hinduism, और आखिर में, मैंने वही किया जो west में ज़्यादातर लोग करते हैं। मैंने बाइबल उठाई और *ओल्ड टेस्टामेंट* पढ़ना शुरू किया। जब मैंने *ओल्ड टेस्टामेंट* पढ़ना शुरू किया, तो उसमें कुछ ऐसा था जो मुझे प्रासंगिक लगा। मैंने कहा, “ठीक है, इनमे से बहुत-सी बातों पर यक़ीन करता हूँ जो old testament में सिखाई जा रही हैं" इस तरह, creator के स्वरूप के बारे में मुझे इसमें बहुत-सी बातें मिलीं जिन पर मैं यक़ीन कर सकता था। लेकिन साथ ही, *ओल्ड टेस्टामेंट* तीन नबियों के आने की भविष्यवाणी भी करता है। तो मेरे मन में सवाल था — तीसरा नबी कहाँ हैं?

बाइबल में 'Paracletos' शब्द को लेकर काफी बातें की जाती हैं। कई लोग बताते हैं कि *पैराक्लेतोस* का अनुवाद *अहमद* भी किया जा सकता है, जो मुहम्मद ﷺ के नामों में से एक है। 'Paracletos' शब्द बाइबल में सिर्फ पाँच बार आता है। एक बार इस passage में, और एक दूसरे passage में जहाँ ईसा अलैहिस्सलाम को 'Paracletos' के तौर पर चिह्नित किया गया है। तो अब हमें मालूम है कि *Paracletos* कौन है। एक तो ख़ुद ईसा अलैहिस्सलाम थे, और वे एक और के बारें में बता रहे है जो उनके बाद आने वाला है। जहाँ ऐसे कई उल्लेख हैं। अगर यह नबियों की कड़ी में अंतिम नबी की निशानी नहीं है, तो फिर मुझे नहीं पता कि और क्या हो सकती है। और जब मैंने यह देखा, तो इससे मेरे दिल में यह यक़ीन पक्का हो गया कि एक आख़िरी नबी हैं, जिन्हें तलाशना है। मेरे मन में ये एहसास हर पल रहता था। हमेशा लगता था कि — “ठीक है, यहाँ कुछ तो connection है, एक ईश्वर पर विश्वास, और नबूवत की सिलसिले पर विश्वास, वह्यी के सिलसिले पर विश्वास, फ़रिश्ते, क़यामत का दिन, और अल्लाह का हर चीज़ पर नियंत्रण होने पर विश्वास।” हाँ, मैं ये सब समझ गया। लेकिन फिर एक और बात थी — ईसा को ख़ुदा का बेटा मानने का concept , नहीं…

मैं ये नहीं मानता त्रिमूर्ति — तीन में एक, एक में तीन, समान, एक ही सार वाले, अनादि-अनंत। नहीं, मैं… मैं इसे मान ही नहीं सकता था। और मैं पादरियों, चर्च नेताओं और धार्मिक प्रचारकों से सवाल करता रहता था। मैं हमेशा उनसे पूछता था, “आपके पास इन बातों का सबूत कहाँ है? यीशु ने कहाँ कहा है कि वह ख़ुदा के बेटे हैं?” और वे मुझे बाइबल का कोई हिस्सा दिखाते, तो मैं कहता, “नहीं, नहीं, नहीं…” बाइबल में यीशु ने खुद को 88 बार *इंसान का बेटा* कहा है। बाइबल में एक भी जगह ऐसी नहीं है जहाँ उन्होंने खुद को ख़ुदा का बेटा कहा हो। तो फिर आप लोग वो क्यों मानते हैं जो दूसरे लोग उनके बारे में कहते हैं? क्यों न वही मानें जो उन्होंने अपने बारे में ख़ुद कहा है?

उन्होंने खुद को *इंसान का बेटा* कहा। तो आप इस metaphorical term का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? बाइबल तो सभी ईमान वालों को ख़ुदा की औलाद कहती है। आप इस metaphorical term का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? क्यों न वही मानें जो यीशु ने शब्दशः कहा है? और फिर मैं अपने creator से कहता रहा, “मैं… मैं तलाश कर रहा हूँ, लेकिन मुझे मिल नहीं रहा।” फिर… फिर ऐसा हुआ कि मेरे भाई ने… जो मुझसे 21 महीने बड़े हैं और अल्हम्दुलिल्लाह, वो मुसलमान बन गए। अब, मैं और मेरा भाई कभी ज़्यादा क़रीब नहीं थे। हम ऐसे नहीं थे, बल्कि ऐसे थे। हम…

मेरे इस्लाम क़बूल करने के बाद से हम हमेशा कहते हैं कि हम असल में भाई तब बने जब हम इस्लामी भाई बने। सिर्फ़ इस्लाम अपनाने के बाद ही हम सच में भाई बने। और उस समय तो मुझे पता भी नहीं था क्यों। मुझे बस ये अजीब-सा लगता था। लेकिन करीब एक साल बाद, उन्होंने मुझे भेजा क़ुरआन के अर्थ का अनुवाद और सीरत की एक किताब यानी पैग़ंबर ﷺ के जीवन का इतिहास, खासतौर पर मार्टिन लिंग्स की किताब *biography of Muhammad according to the earliest sources.

जब मैंने इन्हें पढ़ा, तो सब कुछ सुलझ गया। यह ऐसा था जैसे कोई जिगसॉ पज़ल हो, जिसमें कुछ टुकड़े गायब हों, और फिर वे टुकड़े मिल जाएँ और अपनी जगह पर फिट हो जाएँ, और अब पूरी तस्वीर सामने आ जाए। ज़िंदगी में पहली बार मुझे लगा कि मेरे पास पूरी तस्वीर है। यही आख़िरी नबी थे, यही आख़िरी वह्यी थी, और यह पिछली नबूवतों की कड़ी में पूरी तरह फिट बैठती थी, यह *ओल्ड टेस्टामेंट* की उन भविष्यवाणियों से मेल खाती थी जो आख़िरी नबी की विशेषताओं के बारे में थीं। और तभी मैंने इस्लाम क़बूल कर लिया। मेरा मानना है कि ईमान तक पहुँचने का रास्ता उतना ही दिल की बात मानने में है जितना दिमाग की बात मानने में। और यह याद रखना चाहिए कि अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिदायत देता है। और वह हिदायत कैसे देता है?

वह दिल के ज़रिए हिदायत देता है और साथ ही वह्यी के ज़रिए भी। और वह्यी को समझना, बेशक, एक intellectual process है, जहाँ इंसान उसे पढ़कर और उसके सबूतों को समझकर उस वह्यी और धर्म की सच्चाई को पहचानता है। क्या आप हमें उस एहसास के बारे में बता सकते हैं?

मेरा ख्याल है कि सबसे बड़ा एहसास था — सुकून। जब मैं उस समय को याद करता हूँ, तो यह देखकर हैरान होता हूँ कि कितने लोगों ने नोटिस किया कि मैं खुद कितना शांत और सहज हो गया था। और भी कई भावनाएँ थीं, लेकिन मुझे बस याद है कि मैंने वुज़ू किया और महसूस किया — सुब्हानअल्लाह, यह तो एक दिल को सुकून देने वाली प्रक्रिया है। यह आपको मजबूर करता है कि आप थोड़ा ठहरें और जो काम कर रहे हों उसे छोड़कर सफ़ाई पर ध्यान दें, और सोचें कि आप यह क्यों कर रहे हैं, ताकि इसे आप नमाज़ से पहले खुद को पाक बनाने के लिए करें। और यह पूरी प्रक्रिया अपने आप में दिल को सुकून देने वाली है। आपके इस्लाम क़बूल करने पर आसपास के लोगों ने कैसी प्रतिक्रिया दी? आपके परिवार ने कैसी प्रतिक्रिया दी?

मुसलमान बनने के बाद मेरी पत्नी ने जो 14 साल से मेरे साथ थी मुझे तलाक दे दिया। तो मैंने अपनी पत्नी खो दी। और अपने बच्चे भी खो दिए, क्योंकि अदालत ने बच्चों की ज़िम्मेदारी उसे दे दी — सिर्फ़ इसलिए कि मैं मुस्लिम था। कस्टडी उसे दी गई। अदालत ने बच्चों की कस्टडी उसे सौंप दी। पूरा मामला साफ़ तौर पर मेरे खिलाफ झुका हुआ था, क्योंकि उदाहरण के लिए— जब…

मेरी अब की पूर्व पत्नी, जब वह अदालत में तलाक़ दायर करने गई, तो जज ने तलाक़ की कार्यवाही शुरू कर दी। लेकिन साथ ही मेरे ख़िलाफ़ एक आदेश भी जारी किया, जिसमें कहा गया कि मैं घर के 100 feet के दायरे में नहीं आ सकता, अपने ही घर से 100 फीट दूर रहना होगा, पत्नी से 100 फीट दूर, और अपने बच्चों से भी 100 फीट दूर रहना होगा। उससे पहले जज ने मेरी पत्नी से पूछा, “क्या तुम्हें इस शख़्स से खतरा महसूस होता है?” तो उसने कहा, “नहीं।” फिर उसने पूछा, “क्या उसने कभी तुम्हें मारा?” उसने कहा, “नहीं।” फिर पूछा, “क्या वह तुम्हें ज़ुबानी तौर पर परेशान करता है?” उसने कहा, “नहीं।” मेरा मतलब है, आज तक भी आप मेरी पूर्व पत्नी से पूछ सकते हैं, और वह इस बात की गवाही देगी। जज ने उससे पूछा, “तो फिर तुम तलाक क्यों चाहती हो?” तो उसने बस कहा, “मैं अब आगे बढ़ना चाहती हूँ। हमारी राहें अलग हो गई हैं। वह मुस्लिम हो गया है, मैं क्रिश्चियन हूँ,” वगैरह-वगैरह। और जज ने…

जज ने मेरे ख़िलाफ़ यह आदेश सिर्फ़ इसलिए जारी कर दिया क्योंकि मैं मुस्लिम था। मेरी नज़र में यही वजह थी, मेरी पूर्व पत्नी और जज के बीच हुई बातचीत के आधार पर। वो बातचीत मुझको लेकर कैसी थी — उससे ही मुझे ये लगा। तो परिणामस्वरूप, मैं एक ऐसे दौर से गुज़रा जब मैं अपने बच्चों को देख भी नहीं सकता था। ज़रा आपको पूरी तस्वीर बताऊँ कि यह प्रक्रिया कितनी अपमानजनक थी — अदालत ने यह शर्त रख दी कि अगर मुझे अपने बच्चों से मिलना है, तो मुझे एक बॉडीगार्ड रखना होगा। मुझे बॉडीगार्ड रखना पड़ा, ताकि वह मौजूद रहे और मेरे बच्चों को मुझसे “बचाए। वो ऐसी हालत में एक बाप को वो इतना अधिक अपमानित करते है। और ये सब हुआ इस तथ्य के बावजूद जबकि मेरा मौखिक न कभी शारीरिक दुर्व्यवहार, न धमकाने वाला रवैया — कभी कुछ नहीं रहा। मेरी पत्नी बस उस प्रक्रिया का हिस्सा बनती चली गई। आप उनसे उनकी वजहें पूछ सकते हैं, लेकिन पूरी प्रक्रिया इतनी अपमानजनक थी। तो खैर, मैंने और क्या खोया?

ठीक है, तो… मैंने अपना घर, पत्नी, बच्चे, कार, संपत्ति सब खो दिया। मेरा मतलब है, सिर्फ घर में ही मेरे पास…

ढाई लाख डॉलर की पेंटिंग्स थीं, सिर्फ़ दीवारों पर लगी कलाकृतियों में। मैंने वो सब खो दिया, सब कुछ चला गया। मैं अपने घर से केवल अपनी एक मेरी एसयूवी और 5,000 डॉलर के साथ निकल गया — बस। इसके अलावा, मैंने अपने कई दोस्त भी खो दिए। मेरी माँ और पिताजी ने भी मुझसे रिश्ता तोड़ लिया। उन्होंने मुझे एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया, “हमसे मिलने मत आना, फोन मत करना, खत मत लिखना। हम तुमसे कोई संबंध नहीं रखना चाहते। तुम वसीयत से बेदख़ल हो, वगैरह-वगैरह। और बस, यही सब हुआ। लेकिन इस कहानी की सबसे अच्छी बात यह रही कि कई सालों बाद हम फिर से एक-दूसरे से जुड़ पाए। जैसे-जैसे वे बड़े हुए, हमारा रिश्ता बेहतर होता गया, यहाँ तक कि दोनों ने अलग-अलग मौक़े पर मरने से पहले इस्लाम क़ुबूल किया। मेरे माता-पिता दोनों का इंतिक़ाल हो चुका है। हर एक ने व्यक्तिगत तौर पर इस्लाम कुबूला, और मेरी दुआ है कि अल्लाह उन्हें कबूल करे। तो, हमने सुना है कि आप मदीना में रहते हैं, जो हमारे पैग़ंबर ﷺ का शहर है। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ — आप अलैहिस्सलातु वस्सला के चरित्र के बारें में कौन सी बात ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?

मेरा मानना है कि उनके चरित्र की मज़बूती को लेकर सबसे ज़रूरी गवाहियों में से एक गवाही उनके संदेश की सच्चाई में है। जो लोग पैग़ंबर ﷺ की तौहीन करते हैं और कहते हैं कि वह सिर्फ़ दौलत या औरतों के पीछे थे, या फिर हुकूमत या बादशाहत चाहते थे, तो इस बात का जवाब उनके पास नहीं है। क्योंकि अगर वह इस्लाम छोड़ने को तैयार हो जाते, तो क़ुरैश उन्हें अपने बीच सबसे अमीर बना देने को तैयार थे, उन्हें अपना बादशाह बना देते, बिना इस्लाम की किसी पाबंदी के — यहाँ तक कि पत्नियों की संख्या पर भी कोई रोक न होती। वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत औरतों का सबसे बड़ा हरम रख सकते थे, और इसी तरह की बाकी चीज़ें भी। उन्हें हर चीज़ मिल सकती थी अगर वह इस्लाम की दावत देना बंद कर देते। लेकिन अगर वह इसे जारी रखते, तो नहीं। आगे का रास्ता तकलीफ़ों और मुश्किलों से भरा हुआ था, लेकिन उन्होंने खुद को उसी राह के लिए समर्पित कर दिया। तो यह उस इंसान की मिसाल है जो वह्यी की सच्चाई और अपने सृष्टिकर्ता की इबादत के लिए समर्पित था। मेरे लिए यह बेहद प्रभावित करने वाला है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई भी इंसान कभी हासिल नहीं कर पाएगा। क्या आपने कभी उन्हें (ﷺ) अपने ख़्वाब में देखा है?

अच्छा, अब तो आप मुझे सचमुच घेर रहे हैं। हाँ,मैंने देखा है, अल्हम्दुलिल्लाह!

एक रात मैंने ख़्वाब देखा, जिसमें मैं पैग़ंबर ﷺ के समक्ष था। और हम एक old style town में थे, जैसे आप किसी अमेरिकन काउबॉय फ़िल्म में देखते हैं। तो पैग़ंबर ﷺ पहाड़ों की ओर इशारा करके बोले, “पहाड़ों पर चले जाओ।” और मैंने उस ओर देखा — और वह मुझे कुछ अजीब-सा लगा। ऐसे पहाड़ मैंने कभी नहीं देखे थे। उन्होंने कहा, “पहाड़ों के लोगों के पास जाओ, क्योंकि पहाड़ों में जिहाद है।” और हम सब जानते हैं कि *जिहाद* का मतलब हमेशा लड़ाई नहीं होता, बल्कि इसका मतलब संघर्ष, या व्यक्तिगत संघर्ष भी हो सकता है। मुझे याद है कि मैंने उनसे कहा, “ठीक है, लेकिन हमारा दौर आपके दौर जैसा नहीं है।” “अगर मेरे दौर में मुझे कुछ हो गया, तो मेरी पत्नी और बच्चे का ख्याल रखने वाला कोई नहीं होगा।” पैग़ंबर ﷺ ने फ़रमाया, “मैं तुम्हारी पत्नी और बच्चे का ख्याल रखूँगा।” यह बिल्कुल फ़िल्मों के सीन कट जैसा था। हम अचानक पास की एक लकड़ी की इमारत के अंदर थे, जो किसी जनरल स्टोर जैसी लग रही थी। काउंटर पर बड़े-बड़े काँच के जार रखे थे, जिनमें मिठाइयाँ भरी हुई थीं। उन्होंने एक बड़ा काँच का जार उठाया — इतना बड़ा, जिसमें गोल-गोल मिठाइयाँ भरी हुई थीं — और उसे मेरे दाएँ हाथ में रख दिया। फिर उन्होंने एक और बड़ा काँच का जार उठाया, जिसमें गोल Gumballs भरे थे, और उसे मेरी दूसरी बाँह में रखा और कहा, “इन्हें पहाड़ों के लोगों तक पहुँचा दो।” तो ये था मेरा ख़्वाब। यह साल 1999 की बात है। तो मैंने मदीना आने का फ़ैसला कर लिया। मुझे सऊदी अरब में नौकरी का ऑफ़र मिला था। मैंने फ़ैसला किया और दो साल के कॉन्ट्रैक्ट पर सऊदी अरब आ गया। और, अल्हम्दुलिल्लाह, सब कुछ ठीक रहा। और अब, 26 साल बीत चुके हैं। तो आज भी मैं मदीना में ही हूँ — अल्हम्दुलिल्लाह। लेकिन अब उस ख़्वाब की अहम बात सुनिए। एक दिन मैं अपनी बालकनी में खड़ा था और उहुद पहाड़ की ओर देख रहा था। मैं उसे पहले भी कई बार देख चुका था, लेकिन उस दिन न जाने क्यों, दिन का समय, सूरज की स्थिति और पहाड़ पर पड़ने वाली रोशनी — सब कुछ बिल्कुल परफ़ेक्ट था। और पहली बार मुझे एहसास हुआ, “सुब्हानअल्लाह, यही वही पहाड़ है जिसे मैंने अपने ख़्वाब में देखा था।” इसका मतलब यह है कि यही हैं *पहाड़ों के लोग* — यानी मदीना के लोग। तो यही मेरा जिहाद है — मेरा संघर्ष। और यह यहीं ख़त्म नहीं होता, क्योंकि मैं अब इस हिस्से से गहराई से जुड़ चुका हूँ। मेरी बेटी, जैसा कि मैंने कहा, अब 27 साल की है। एक समय ऐसा भी आया जब उसे कॉलेज जाना था। और उस समय मैं…

अपनी नौकरी छोड़ने के लिए तैयार था ताकि अपने परिवार के साथ वापस west जा सकूँ, ताकि मेरी बेटी को western education मिल सके। लेकिन मेरी पत्नी ने मुझे उस ख़्वाब की याद दिलाई कि मेरी जगह यहीं है। और फिर वह अपनी बेटी को लेकर अमेरिका चली गईं। मेरी पत्नी फ़िलिस्तीनी हैं। वो अमेरिका जा रही थीं ताकि मेरी बेटी का ध्यान रख सके। लेकिन सच्चाई ये थी कि दोनों को ही अमेरिकी तौर-तरीकों की आदत डालनी थी, वहाँ के माहौल को समझना था, और समाज के नियम-क़ायदे सीखने थे। इस दौरान मेरी बेटी कॉलेज जा रही थी और मेरी पत्नी वहाँ उसके साथ थीं, ताकि उसे संभाल सकें, और उसे ढलने में मदद कर सकें। तो, एक दिन जब वो अमेरिका में थीं, उनके लिए सबसे मुश्किल बातों में से एक ये थी कि हर दिन वो अपनी बेटी के साथ कॉलेज जातीं Uber से, और फिर Uber से ही वापस आतीं। और दिन खत्म होने पर फिर से Uber बुलातीं और वापस आतीं। और उन्हीं Ubers को लेकर उन्हें हमेशा चिंता बनी रहती थी। एक औरत, अकेली कार में, किसी ऐसे आदमी के साथ जिससे वो कभी मिली भी नहीं थीं, वगैरह। और एक दिन उन्हें ये सपना आया कि वो Uber कार की ओर जा रही थीं, Uber में बैठने के लिए, और ड्राइवर बाहर निकलकर उनके लिए दरवाज़ा खोल देता है। और वो ड्राइवर...

sorry...

वो ड्राइवर जिसने उनके लिए दरवाज़ा खोला था, वो मुहम्मद ﷺ थे। तो उसी दिन बाद में, या शायद तुरंत ही—मुझे ठीक से याद नहीं, मेरी पत्नी ने मुझे फोन किया और बस इतना कहा, "देखो, तुम्हारा सपना पूरा हो गया। "मैं ने पूछा, "क्या मतलब?" तो उन्होंने कहा कि नबी ﷺ ने वादा किया था कि वो मेरी पत्नी और बेटी का ख्याल रखेंगे जब मैं उनके पास नहीं रहूँगा। उस सपने ने ही उन्हें वह हिम्मत दी कि वे अपना डर खोकर आगे बढ़ सके, अल्हम्दुलिल्लाह वाह, कितनी खूबसूरत कहानी। दो अलग-अलग ख़्वाब, और ताबीर wao, दूसरी ख़्वाब में हुआ। मेरे पास बस एक और अतिरिक्त सवाल है। मैं भी एक मेडिकल डॉक्टर हूँ, लेकिन मैं एक जनरल प्रैक्टिशनर हूँ। तो इंसानी शरीर में सबसे आश्चर्यजनक चीज़ क्या है, ख़ासकर आपकी फील्ड में। जो आपको ये कहने पर मजबूर करती है कि ये क़ुदरत का शानदार काम है। अन्य कामों की तरह। इंसानी शरीर में वह कौन सी चीज़ है जो आपको सबसे ज़्यादा चकित करती है?

खासतौर पर इंसानी आँख में, मुसलमान बनने से पहले, एक चीज़ जिसने मुझे मेरी रूहानी तलाश में डाला वो ये कि मैंने कुछ ऐसे लोगों से मिला जिन्हें near death experience था। near death experience का अनुभव करने वाले शख़्स का हाल ये होता है कि वे अपने जिस्म से बाहर निकल जाते हैं और अपने ही जिस्म को ऊपर से देखते हैं। और फिर जैसे-जैसे ऊपर उठते जाते हैं, नीचे सारा दृश्य दिखाई देता है। एक बहुत ही acute awareness होती है, ये सब सुन पाने के और देख पाना के क़ाबिल होना कि लोग क्या कह रहे है। यहाँ तक कि वो लोग भी, जो आपसे बहुत दूर होते हैं। जैसे कि एक औरत थी जिसे मौत के क़रीब का अनुभव हुआ। वो एक राहगीर थी, जिसे एक कार ने टक्कर मारी। और टक्कर इतनी ज़ोरदार थी, कि उसका सीना फट गया। उसके फेफड़े और दिल दिखाई दे रहे थे। पैरामेडिक्स ने मौके पर ही उसे मुर्दा क़रार दे दिया था, लेकिन वो बच गई। और उसने बताया कि वो ऊपर उठकर बादलों की ऊँचाई तक चली गई, लेकिन उसी समय, इतनी दूर होते हुए भी, वो हर चीज़ को बारीकी से देख पा रही थी। उसके शरीर पर जो कुछ कहा और किया जा रहा था, वो सब सुन पा रही थी। यहाँ तक कि वो उन लोगों को भी देख पा रही थी जो कई ब्लॉक दूर से हादसा देख रहे थे, और वो क्या कह रहे थे, ये भी सुन पा रही थी। अब, एक डॉक्टर के तौर पर मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था, लेकिन मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। उस समय लंदन में एक संस्था थी जिसने करीब 2,000 ऐसी near death experiences या शरीर से बाहर निकलने वाले अनुभव इकट्ठा किए थे और इन्हीं बातों में से एक जिसने मुझे रूहानी खोज पर लगा दिया वो थी ये ये चेतना कि हमारे जिस्म में भौतिक अस्तित्व से बढ़कर कुछ और भी है। और वो सिर्फ *रूह* ही हो सकती है। अब, कुछ लोग इसे समझेंगे, और कुछ नहीं समझ पाएंगे। लेकिन शायद...

तो मैं... मैं कहूँगा, देखिए, सबसे पहले, आपके सवाल का जवाब है कि— हमारे जिस्म के अंदर सबसे चमत्कारिक, शानदार, सबसे खूबसूरत चीज़ है हमारी *रूह*, हमारी आत्मा। तो अब मैं और कहूँगा: *ज़िंदगी*। यह सिर्फ़ इस सवाल का जवाब नहीं है कि हममें क्या खूबसूरत है— ये तथ्य कि हम जीवित हैं— बल्कि ये नास्तिकता का रद्द भी है। क्योंकि नास्तिकता बिग बैंग के सहारे और नेचुरल सेलेक्शन के जरिए हुए इवोल्यूशन के सहारे, इन चीज़ों से कुछ हद तक— पूरी तरह नहीं, उस पर बाद में आ सकते है — लेकिन कुछ हद तक ये समझाने की कोशिश करती है कि हम कैसे बने। लेकिन एक चीज़ है जिसका जवाब वे कभी नहीं दे सकते, और वो है ज़िंदगी कहाँ से आई? है ना! मेरा मतलब, something को किसने बनाया?

किसने उस पहले cell या पहले जीव को बनाया, जिससे सब कुछ evolve हुआ, अगर आप... अगर आप उस concept पर यक़ीन रखते हैं, तो किसने उसे ज़िंदा किया? अल्लाह हमें ज़िंदगी से चुनौती देता है। देखिए, अल्लाह काफ़िर को चुनौती देता हैं और कहता हैं, "इस मुर्दा जिस्म को लो, ठीक है?

और इसे फिर से ज़िंदा करो। इसके अंदर रूह डाल दो। उसके अंदर रूह वापस डालो और इसे ज़िंदा करो।" और इंसानों ने कोशिश की है। उन्होंने फ़्रेंकस्टाइन जैसी चीज़ें आज़माईं। उन्होंने मरे हुए जानवरों को लिया और उनके हिस्सों को जोड़ने की कोशिश की, लेकिन वे उन्हें ज़िंदा नहीं कर पाए। मैंने सुना है कि रूस में— मुझे नहीं पता यह सच है या नहीं— लेकिन मैंने सुना है कि उन्होंने इंसानों के साथ भी वैसी ही कोशिश की थी। लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली। आप उसे ज़िंदा नहीं कर सकते। फिर सवाल वही है, ज़िंदगी कहाँ से मिली?
