# जंग-ए-खंदक: मदीना के यहूदियों ने पैगंबर ﷺ से ग़द्दारी की! - AI विज़ुअलाइज़्ड - ऐ पैग़म्बर | एपिसोड 8

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/battle-of-the-trench-jews-of-madina-betrayed-the-prophet-ai-visualized-o-messenger-ep-8
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=QbV9WR28GCg
- Channel: Towards Eternity

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क्षितिज पर उठते धूल के बादल एक आने वाले तूफ़ान का साफ़ इशारा थे। अबू सुफ़ियान के प्रतिशोध भरे आदेश के तहत, पूरे अरब प्रायद्वीप से 10,000 योद्धाओं की एक विशाल सेना जमा हो गई थी, और मदीना की सरहदों तक पहुँच चुकी थी। "10,000 आदमियों की सेना के साथ, हम उन्हें उस दिन को कोसने पर मजबूर कर देंगे, जब वो पैदा हुए थे!" मूर्तिपूजक बदले की चाह में जल रहे थे। लेकिन उन्होंने अपने सामने जो देखा, उसने उन्हें दंग कर दिया। सेना के शहर तक पहुँचने का इकलौता रास्ता लगभग 6 किलोमीटर लंबी खाई ने रोक रखा था। वो खाई इतनी चौड़ी और गहरी थी, मानो कोई ऐसी रुकावट जिसे पार पाना नामुमकिन हो। आसान जीत के लिए जो आत्मविश्वास वो महसूस कर रहे थे, वो अचानक डर और उलझन में बदल गया। बचाव की ऐसी रणनीति देखकर दुश्मन को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसा कुछ नहीं देखा था। लेकिन बात यहाँ तक कैसे पहुँची?

और मुसलमानों ने इतनी बड़ी ताक़त के सामने डटे रहने के लिए ऐसी योजना कैसे बनाई? और सबसे ज़रूरी बात, अब आगे क्या होने वाला था?

धोखे, ख़ुफ़िया योजनाएँ, और चमत्कार। आइए एक साथ गवाह बनें जंगे ख़ंदक़ की इस अज़ीम कहानी के। यह वीडियो सीरीज़ भरोसेमंद इस्लामी रोतों के सैकड़ों हवालों पर आधारित है। सभी एआई विज़ुअल्स क़ाबिल मुस्लिम विद्वानों के मशवरे से तैयार किए गए हैं और ये इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ हैं। यहूदी क़बीले बनू नज़ीर को उनके धोखे की सज़ा के तौर पर मदीना से निकाल दिया गया था उनमें से कुछ मुल्क-ए-शाम चले गए जबकि कुछ ख़ैबर में बस गए। ख़ैबर में किसी भी दूसरे इलाक़े से ज़्यादा यहूदी आबादी थी। इसलिए, अपनी तादाद की वजह से, वो एक-दूसरे को लड़ने के लिए उकसा रहे थे। और उसी आत्मविश्वास ने उन्हें नबी अलैहिस्सलाम और उनके सहाबा के ख़िलाफ़ बदले की योजना बनाने के लिए प्रेरित किया। लेकिन ज़ाहिर है, यह कोई ऐसा काम नहीं था जो वो अकेले कर सकते थे। इसलिए, उन्होंने क़ुरैश और दूसरे अरब क़बीलों को नबी अलैहिस्सलाम के ख़िलाफ़ जंग के लिए मनाने के लिए। 19 आदमियों का एक वफ़द (प्रतिनिधि मंडल) भेजा वो पहले क़ुरैश के पास गए, फिर ग़तफ़ान और बनू सुलैम, और उनके बाद, कई दूसरे अरब क़बीलों के पास। इसीलिए इस जंग को जंग-ए-अहज़ाब भी कहा जाता है - यानी गुटों की जंग, क्योंकि कई छोटे-बड़े क़बीले, मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक साथ खड़े होने के लिए जमा हुए थे। योजना के मुताबिक़, वफ़द (प्रतिनिधि मंडल) का पहला पड़ाव मक्का था। क्या आपको उहुद का अंत याद है?

अबू सुफ़ियान ने नबी अलैहिस्सलाम को एक साल बाद बद्र के मैदान में मिलने की चुनौती दी थी। रसूल अलैहिस्सलाम ने इसे क़बूल कर लिया, और अगले साल, अपनी सेना के साथ बद्र की ओर कूच किया। लेकिन जब वो वहाँ पहुँचे, तो उन्हें वहाँ कोई नहीं मिला। क़ुरैश की उनका सामना करने की हिम्मत ही नहीं हुई। बद्र में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था, और तब से, अबू सुफ़ियान बदले की गहरी आग में जल रहा था। "तो फिर स्वागत है। जो मोहम्मद के ख़िलाफ़ हमारी जंग में हमारी मदद करते हैं, वो हमें सबसे ज़्यादा प्रिय हैं।" इस्लाम दिन-ब-दिन फैल रहा था, और क़ुरैश जानते थे, कि वो अब अकेले इसके ख़िलाफ़ खड़े नहीं रह सकते। इसलिए उनके पास इस प्रस्ताव को मानने के सिवा कोई चारा नहीं था। अबू सुफ़ियान यह देखना चाहता था कि क्या यहूदी वफ़द इस मक़सद में वाक़ई पक्के और गंभीर थे या नहीं। इसलिए उसने उन्हें आज़माने का फ़ैसला किया, और पाया कि वो उससे भी ज़्यादा बेताब थे। उसने कहा: "ऐ यहूदियों, हमें मोहम्मद के साथ हमारे मतभेदों के बारे में बताओ। किसका दीन बेहतर है, हमारा या उनका?" "अगर हमें सच ही बोलना है, तो अल्लाह की क़सम, तुम उनके मुक़ाबले में सच के ज़्यादा क़रीब हो।" हालाँकि, वो दिल ही दिल में जानते थे कि हक़ीक़त बिल्कुल इसके उलट थी। लेकिन फिर भी, बदले की प्यास में अंधे होकर, उन्होंने झूठ बोलने में ज़रा भी संकोच नहीं किया। यहूदी वफ़द ने क़ुरैश के साथ समझौता किया। और अपना पहला सहयोगी पक्का कर लिया। लेकिन यह उनके लिए काफ़ी नहीं था। और भी समर्थन हासिल करने के लिए, वो मक्का और नज्द के बीच रहते थे। ग़तफ़ान क़बीले के पास गए, और उन्हें भी मनाने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा। इसके तुरंत बाद, बनू सुलैम ने भी उनके साथ हाथ मिलाने पर सहमति जता दी। सिर्फ़ यहूदी वफ़द ही नहीं; क़ुरैश ख़ुद भी दूसरे क़बीलों को मनाने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे। फिर उन्हें अहाबीश क़बीले और उनके सहयोगी क़बीलों का भी समर्थन मिला। इन सभी गुटों को मिलाकर, उनकी ताक़त लगभग 4,000 आदमियों तक पहुँच गई। और मदीना के आस-पास के क़बीलों का समर्थन हासिल करने के बाद, बनू नज़ीर और क़ुरैश ने आख़िरकार 10,000 आदमियों की एक विशाल सेना तैयार कर ली। "10,000 आदमियों की सेना के साथ, हम उन्हें उस दिन को कोसने पर मजबूर कर देंगे जब वो पैदा हुए थे!" जब यह सब हो रहा था, तब ख़ुज़ाआ क़बीले की तरफ़ से नबी अलैहिस्सलाम के पास एक पैग़ाम आया। "वो आ रहा है!

अबू सुफ़ियान एक बड़ी सेना लेकर यहाँ आ रहा है!" -"कितने हैं?" -"हज़ारों।" "क्या तुमने ख़ुद उन्हें देखा है?" "मैं घाटी में उनके हरावल (अग्रिम दल) के पास से गुज़रा, वो तेज़ी से बढ़ रहे हैं।" नबी अलैहिस्सलाम ने तुरंत अपने सहाबा को मशवरे के लिए जमा किया। हर कोई अपनी राय दे रहा था। तभी एक ऐसी राय आई जिसने सब कुछ बदल दिया। "ऐ रसूलुल्लाह, फ़ारस में, जब भी हमें दुश्मन के घुड़सवारों के हमले का डर होता था, तो हम हिफ़ाज़त के लिए अपने शहर के चारों ओर खाइयाँ खोद लेते थे।" यह बात कहने वाले सलमान अल-फ़ारसी रज़ियल्लाहू अन्हु थे, जो फ़ारसी मूल के सहाबी थे। नबी अलैहिस्सलाम और उनके सहाबा ने इससे पहले ऐसी रणनीति के बारे में कभी नहीं सुना था। रसूल अलैहिस्सलाम को यह विचार सही लगा और उन्होंने इसे मंज़ूरी दे दी। वो इतनी चौड़ी और गहरी खाइयाँ खोदने वाले थे कि घोड़े भी उन्हें पार न कर सकें। लेकिन सबसे पहले, रसूल अलैहिस्सलाम यह तय करने के लिए बाहर गए कि खाई कहाँ खोदी जानी चाहिए। मदीना के एक तरफ़, ज्वालामुखीय चट्टानों के चौड़े मैदान थे। और दूसरी तरफ़ खजूर के बागों के बड़े-बड़े हिस्से थे। सेनाएँ इन दोनों में से किसी को भी पार नहीं कर सकती थीं। और दक्षिण में एक बड़ा पहाड़ खड़ा था, जिससे उस दिशा से भी अंदर आना नामुमकिन था। एक तरह से, अल्लाह ने मदीना को पहले ही प्राकृतिक सुरक्षा में रखा हुआ था। सिर्फ़ एक हिस्सा खुला था। और वहीं पर एक लंबी खाई खोदी जानी थी, ताकि दुश्मन के शहर में दाख़िल होने का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाए। लेकिन उनके पास इसे पूरा करने के लिए 10 दिनों से भी कम का वक़्त था। सभी ने अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ खुदाई शुरू कर दी। और रसूल अलैहिस्सलाम ख़ुद उनका नेतृत्व कर रहे थे। अपने हाथों में कुदाल और फावड़ा लिए, वो ख़ुद भी अपने सहाबा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर और उनका हौसला बढ़ाते हुए काम कर रहे थे, गर्मी और भूख के बावजूद, वो बिना आराम किए पूरे दिन खुदाई करते रहे। कभी-कभी सहाबा कहते थे: "या रसूलल्लाह, थोड़ा आराम कर लें। हमारी मेहनत ही काफ़ी है। आप ख़ुद को न थकायें।" वो चाहते तो बिल्कुल काम न करने का फ़ैसला कर सकते थे। आख़िरकार, वो रसूल थे, और किसी को एतराज़ भी नहीं होता। लेकिन उन्होंने ही फ़रमाया था, "क़ौम का सरदार वो है जो उनकी ख़िदमत करता है।" उनके लिए, बैठकर देखना काम करने से ज़्यादा मुश्किल था। वो जानते थे कि अल्लाह की बरकतें और रहमतें कठिनाई के बाद ही आती हैं। और इसलिए उन्होंने सभी से ज़्यादा मेहनत की। उस साल, अरब में भयानक सूखा और अकाल पड़ा था। भूख के दर्द को झेलने के लिए कई मुसलमानों को अपने पेट पर पत्थर बाँधने पड़े थे। ऐसा करके, वो पेट भरे होने के झूठे एहसास से अपना दर्द कम करने की कोशिश कर रहे थे। मायूसी से दोचार सहाबा का एक समूह नबी अलैहिस्सलाम के पास आया और उन्हें अपनी तकलीफ़ के बारे में बताया। लेकिन जब उन्होंने अपने सामने का दृश्य देखा, तो उनकी बातें उनके गले में ही अटक गईं। क्योंकि जब रसूल अलैहिस्सलाम ने अपने पेट से बँधा कपड़ा खोला, तो एक नहीं, बल्कि दो पत्थर ज़मीन पर गिरे। "क्या आपने भी अपने पेट पर पत्थर बाँधे हैं?

भूख की वजह से?" वो भी उसी तकलीफ़ को सह रहे थे, बल्कि उनसे भी ज़्यादा। एक दिन, जब जाबिर इब्न अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहू अन्हु) ने नबी अलैहिस्सलाम को उस हाल में देखा, तो उनसे यह और बर्दाश्त नहीं हुआ। वो घर गए और अपनी पत्नी से बोले: "मैंने रसूल अलैहिस्सलाम को भूख से कमज़ोर होते देखा है। कोई और होता तो ऐसी परेशानी में गिर ही पड़ता। क्या घर में खाने के लिए कुछ है?" उनकी पत्नी ने जवाब दिया, "अल्लाह की क़सम, हमारे पास इस छोटी सी बकरी और मुट्ठी भर जौ के सिवा कुछ नहीं है।" जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु ने बकरी ज़ब्ह की, और उनकी पत्नी ने जौ को पीसकर आटा बनाया। उन्होंने गोश्त को एक बर्तन में रखा और मिट्टी के चूल्हे पर पकने के लिए छोड़ दिया। जैसे ही जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु नबी अलैहिस्सलाम को बुलाने के लिए घर से निकलने वाले थे उनकी पत्नी ने कहा: "मेहरबानी करके मुझे रसूलुल्लाह के सामने मुश्किल में मत डालना।" उनका मतलब था कि उन्हें बहुत ज़्यादा लोगों को नहीं बुलाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने जो खाना पकाया है वो सिर्फ़ कुछ ही लोगों के लिए पर्याप्त है। जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु रसूल अलैहिस्सलाम के पास गए और उन्हें बताया कि उन्होंने थोड़ा सा खाना तैयार किया है। फिर उन्होंने उनसे कुछ सहाबा के साथ आने को कहा। नबी अलैहिस्सलाम ने कुछ ऐसा कहा जिसकी उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी। उन्होंने खाई खोद रहे सभी सहाबा को आवाज़ दी और फ़रमाया: "तुम्हारे भाई ने हमें दावत पर बुलाया है!" जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु की पत्नी को जिस बात का डर था, अब वही हो गया था। उनके पास सिर्फ़ कुछ ही लोगों के लिए खाना था, लेकिन अब सहाबा की पूरी फौज ही आ रही थी। जब जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु घर लौटे और अपनी पत्नी को बताया कि क्या हुआ, तो उन्होंने पूछा: "क्या नबी अलैहिस्सलाम ने आपसे पूछा था कि हमारे पास कितना खाना है?" "हाँ।" "तो फिर सब ठीक होगा।" उन्हें यक़ीन था कि रसूल अलैहिस्सलाम कुछ ऐसा जानते हैं जो वो नहीं जानती। जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु घबरा गए थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। जब नबी अलैहिस्सलाम पहुँचे, तो उन्होंने गोश्त और रोटी पर बरकत के लिए दुआ की। फिर उन्होंने अपने सहाबा को एक-एक करके दस-दस की टोलियों में अंदर बुलाया। फिर उन्होंने अपने हाथों से मिट्टी के चूल्हे से रोटी निकाली, उसके ऊपर गोश्त का एक टुकड़ा रखा, और ख़ुद हर एक सहाबी को दिया। धीरे-धीरे सभी का पेट भरने लगा। फिर भी, न तो गोश्त कम हुआ और न ही रोटी। वो वैसे के वैसे ही रहे। जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु और उनकी पत्नी जो देख रहे थे उससे हैरान थे। उस दिन के बारे में, जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हु ने बाद में फ़रमाया: "अल्लाह की क़सम, एक हज़ार लोग आए और पेट भर कर खाया। फिर भी हमारा बर्तन उबल रहा था और हमारे आटे से रोटियाँ बन रही थीं।" एक हज़ार लोगों ने इस चमत्कार को देखा। और जब इस वाक़ये को बार-बार सुनाया गया, तो उनमें से किसी एक ने भी कभी इससे इनकार नहीं किया। सोचिए: वो लोग जिन्होंने अपनी ज़िंदगी सच्चाई के लिए वक़्फ़ कर दी थी, वो कभी किसी ऐसी चीज़ के बारे में कैसे बोल सकते हैं जो कभी हुई ही न हो?

क्या वो सभी, मआज़ल्लाह, एक ही झूठ पर राज़ी हो सकते थे?

सहाबा के लिए, ये चमत्कार बिल्कुल साफ़ हक़ीक़त थे। अल्लाह ने अपने रसूल के हाथों ऐसी बरकतें कई बार अता कीं। वाक़ई, बद्र और तबूक जैसी जंगों के दौरान, शादी की दावतों में, और अकाल के समय में, इस तरह के चमत्कार बार-बार देखे गए। कभी 180 लोगों ने, कभी 400 ने, और कभी-कभी 1,500 लोगों ने भी इन्हें देखा। जब रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम और उनके सहाबा खाई खोद रहे थे, तो सहाबा का सामना एक बहुत बड़ी और सख़्त चट्टान से हुआ। खूब कोशिशों के बावजूद वो उसे तोड़ नहीं पाये। इसलिए उन्होंने तुरंत रसूल अलैहिस्सलाम को ख़बर दी। नबी अलैहिस्सलाम आए और सलमान अल-फ़ारसी रज़ियल्लाहू अन्हु की कुल्हाड़ी ली। फिर उन्होंने "बिस्मिल्लाह" कहा और चट्टान पर ज़ोरदार वार किया। उस एक ही वार से, चट्टान का एक तिहाई हिस्सा टूट कर गिर गया। उन्होंने फ़रमाया: "अल्लाहु अकबर!

मुझे मुल्क-ए-शाम की चाबियाँ दे दी गई हैं। अल्लाह की क़सम, मैं इसी पल उसके लाल महल देख सकता हूँ।" उन्होंने दूसरी बार वार किया, और चट्टान का एक और तिहाई हिस्सा टूट गया। उन्होंने फिर से पुकार कर फ़रमाया: "अल्लाहु अकबर! मुझे फ़ारस की चाबियाँ दे दी गई हैं। अल्लाह की क़सम, मैं मदाइन का सफ़ेद महल देख सकता हूँ।" जब उन्होंने तीसरी बार वार किया, तो पुकार कर फ़रमाया: "अल्लाहु अकबर! मुझे यमन की चाबियाँ दे दी गई हैं। अल्लाह की क़सम, मैं इसी पल सना के दरवाज़े देख सकता हूँ।" उस आख़िरी वार के साथ, चट्टान पूरी तरह चकनाचूर हो गई। जब मोमिनों ने ये ख़ुशख़बरी सुनी, तो उनका ईमान और भी मज़बूत हो गया। लेकिन मुनाफ़िक़ों का क्या? उन्होंने क्या प्रतिक्रिया दी?

वे खिल्ली उड़ाने वाले लहजे में बोले: "वो हमसे क़ैसर और किसरा के ख़ज़ानों का वादा कैसे कर सकते हैं, जबकि हम में से कोई भी शौच जाने के लिए भी सुरक्षित नहीं हैं?" वो अपने आस-पास हर किसी की हिम्मत तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। ज़रा सोचिए। जब ये वादे किए गए थे, तब मदीना उन दुश्मन क़बीलों से घिरा हुआ था जो सारे मिलकर मुसलमानों की पूरी आबादी को ख़त्म करने आए थे। मोमिनों ने अभी तक पूरी तरह से क़ुरैश को भी नहीं हराया था। उन्हें ख़ुद को बचाने के लिए एक खाई खोदनी पड़ी थी। वो भूखे, प्यासे और थके हुए थे। फिर भी, जिसने वाक़ई वो वादे किए थे वो अल्लाह था, आसमानों और ज़मीन का रब। और नबी अलैहिस्सलाम का फ़रमाया हुआ एक-एक शब्द सच था। और जीत के सभी वादे बहुत ही कम वक़्त में, उमर और उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हुमा की ख़िलाफ़त के दौरान एक-एक करके सच साबित होने वाले थे, वो खाई जिसने मुशरिकों की सेना को दंग कर दिया था सिर्फ़ छह दिनों में बनकर तैयार हो गई। यह लगभग 9 मीटर चौड़ी यानी लगभग पाँच आदमियों की लंबाई के बराबर थी। और इसकी गहराई लगभग उसकी आधी थी। यह इतनी चौड़ी थी कि सबसे माहिर घुड़सवार भी इसे लांघ कर पार नहीं कर सकता था। तक़रीबन 6 किलोमीटर लंबी इस खाई में, सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा इतना संकरा था जिसे कोई अकेला घुड़सवार पार कर सकता था। "मुझे लगता है वो आ रहे हैं।" अबू सुफ़ियान के नेतृत्व में 10,000 मुशरिकों की सेना आ चुकी थी। वो एक ऐसी जंगी रणनीति का सामना कर रहे थे जिससे वो अनजान थे। और यह उनके लिए एक बहुत बड़ी निराशा थी। "रुको!

अपने घोड़े रोक लो!" "यह क्या है? क्या हो रहा है?" "रुको! अपने घोड़े रोको!" उन्होंने सोचा था कि वो आसानी से मदीना में दाख़िल हो जाएंगे, सड़कों पर ख़ून बहाएंगे, और एक-एक करके मुसलमानों का शिकार करेंगे। -"रुको!

मैंने कहा रुको!" "क्या हो रहा है?" लेकिन फिर भी, अबू सुफ़ियान का पीछे हटने का कोई इरादा नहीं था। अपनी तैयारियां पूरी करने के बाद, उन्होंने खाई के उस पार से तीरों की बारिश शुरू कर दी। तीर एक डरावनी आवाज़ के साथ हवा को चीरते हुए मुसलमानों पर बरस रहे थे। लेकिन वो खाई उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा बड़ी रुकावट साबित हुई। उन्होंने चाहे जितनी भी कोशिश की, वो उसे पार ही नहीं कर पाए। अगर आपको याद हो, तो खाई का एक हिस्सा ऐसा था जो बाक़ी हिस्सों जितना चौड़ा नहीं था। कुछ लोगों ने वहाँ से पार करने की कोशिश की, लेकिन वो पार पहुँचने से पहले ही मार गिराए गए। लेकिन अम्र इब्न अब्द वुद्द किसी तरह पार जाने में क़ामयाब हो गया। वो पूरे अरब के सबसे मशहूर और ख़ौफ़नाक योद्धाओं में से एक था। सिर से पैर तक कवच में ढका हुआ, उसने अपने घोड़े की लगाम ज़ोर से खींची और ठीक मुस्लिम सेना के सामने आकर रुक गया। "मुझसे कौन लड़ेगा?" अली रज़ियल्लाहू अन्हु खड़े हुए और फ़रमाया, "या रसूलल्लाह, मुझे उससे लड़ने की इजाज़त दें।" अली का जज़्बा देखकर, उन्होंने दुआ की, "ऐ अल्लाह, इसे अपनी मदद अता फ़रमा।" फिर अली रज़ियल्लाहू अन्हु मैदान में आगे बढ़े। "देखो, अली...

अली जा रहे हैं।" "ज़ुल्फ़िक़ार।" "तुम कौन हो?" "मैं अली हूँ, अबू तालिब का बेटा।" "मैं तुम्हारा ख़ून नहीं बहाना चाहता। तुम्हारे पिता मेरे दोस्त थे।" "अल्लाह की क़सम, मैं तुम्हारा ख़ून ज़रूर बहाना चाहता हूँ।" अम्र आग-बबूला हो गया। उसने अपनी तलवार निकाली और अपने घोड़े पर सवार हो गया। लेकिन अली रज़ियल्लाहू अन्हु ने फ़रमाया: "मैं तुमसे कैसे लड़ सकता हूँ जब मैं पैदल हूँ और तुम घोड़े पर हो? नीचे आओ और मेरा सामना करो!" इसलिए अम्र नीचे उतर आया और अली रज़ियल्लाहू अन्हु के सामने खड़ा हो गया। "आओ!

देखते हैं तुझमें कितना दम है।" अली रज़ियल्लाहू अन्हु ने उसके सामने दो विकल्प रखे: "इस्लाम क़ुबूल कर लो, या वापस लौट जाओ।" लेकिन अम्र ने दोनों को ठुकरा दिया। अम्र के पहले वार से मुक़ाबला शुरू हो गया। अली रज़ियल्लाहू अन्हु ने इसे अपनी ढाल से रोक लिया। लेकिन तलवार ढाल को काटती हुई अंदर आ गई और उसकी नोक ने उनके सिर को ज़ख़्मी कर दिया। ज़मीन से धूल का एक बादल उठा और उन दोनों को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे किसी के लिए भी यह देखना नामुमकिन हो गया कि अंदर क्या हो रहा था। एक पल के लिए, कोई नहीं बता सकता था कि क्या हुआ था। जब तक कि एक आवाज़ सुनाई नहीं दी। अम्र का सिर ज़मीन पर गिर चुका था। वो आवाज़ अली रज़ियल्लाहू अन्हु की थी। जब नबी अलैहिस्सलाम और सहाबा ने तकबीर की आवाज़ सुनी, तो वो समझ गए कि अली रज़ियल्लाहू अन्हु ने अम्र को हरा दिया है। और उन सभी ने मिलकर नारा बुलंद किया - "अल्लाहु अकबर!"। दो-तीन और आदमियों ने भी अली रज़ियल्लाहू अन्हु पर हमला करने के लिए खाई पार की। लेकिन मौत के डर से, वो वापस लौट गए। दुश्मन अपने हमलों से कुछ भी हासिल नहीं कर सका। इसलिए उन्होंने मुहासरे (घेराबंदी) की स्थिति में ही रहने का फ़ैसला किया। उनके पास इसके अलावा कोई चारा ही नहीं था। कई दिनों तक, दोनों तरफ़ से एक-दूसरे पर दूर से तीर चलाए जाते रहे। लेकिन इससे सिर्फ़ जंग और भी लंबी खिंचती चली गई। और ये जितनी लंबी चलती, क़ुरैश के लिए उतना ही बुरा होता। क्योंकि मौसम हर दिन और भी यादा ख़राब होता जा रहा था। दिन में झुलसा देने वाली गर्मी होती थी, और रात में जमा देने वाली ठंड। रसूल अलैहिस्सलाम ने तक़रीबन 500 सहाबा को मदीना भेजा और शहर को महफ़ूज़ कर लिया। रात की ठंड में खाई के सबसे संकरे हिस्से पर उन्होंने ख़ुद पहरा दिया क्योंकि उन्हें लगा कि दुश्मन शायद वहीं से पार करने की कोशिश करे। आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने बाद में फ़रमाया कि जब नबी अलैहिस्सलाम घर लौटे, तो वो ठंड से काँप रहे थे। क्योंकि शहर के आस-पास की फ़सलें पहले ही काटी जा चुकी थीं, दुश्मन की सेना के जानवरों के पास खाने के लिए कुछ नहीं था। "कोई चारा नहीं बचा है। हम बहुत कम लाए थे।" इस तरह तो उनके जानवर एक-एक करके मरने लगेंगे। चूँकि उन्हें लगा था कि वो सिर्फ़ एक या दो दिन ही लड़ेंगे और आसानी से जीत जाएंगे, इसलिए वो अपने साथ बहुत कम खाना लाए थे। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो वो ज़्यादा देर तक टिक नहीं पाएंगे। अबू सुफ़ियान परिस्थिति से अवगत था। इसलिए उसने अपने आदमियों को तीरों की बौछार तेज़ करने का आदेश दिया। यह इतना तेज़ था कि मुसलमानों के लिए हिलना भी लगभग नामुमकिन हो गया। फिर क़ुरैश के घुड़सवारों का एक गुट मुसलमानों के ठीक सामने एक जगह पहुँचा और उन पर तीर बरसाने लगा। उनका हमला इतना भारी और लगातार था कि मुसलमानों को सूरज ढलने तक बिना रुके खाई का बचाव करना पड़ा। और इसी वजह से, रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम और सहाबा असर की नमाज़ वक़्त पर नहीं पढ़ सके। रसूल अलैहिस्सलाम को इतना ग़ुस्सा आया कि उन्होंने मुशरिक सेना के लिए बद्दुआ करते हुए फ़रमाया: "ऐ अल्लाह जिस तरह से उन्होंने हमें असर की नमाज़ पढ़ने से रोका है, उनके घरों और उनकी क़ब्रों को आग से भर दे!" फिर उन्होंने और सहाबा ने भी क़ज़ा नमाज़ अदा की। रसूल अलैहिस्सलाम ने तो उन लोगों को भी बद्दुआ नहीं दी थी जिन्होंने ताइफ़ में उन पर पत्थर बरसाए थे। फिर भी नमाज़ की अहमियत इतनी ज़्यादा थी कि उन्होंने नमाज़ से रोकने वालों के ख़िलाफ़ ऐसी दुआ की। खाई पर लड़ाई अभी भी बहुत तेज़ थी। लेकिन मुशरिकों की सेना इकलौता जोखिम नहीं थी। जिस चीज़ का रसूल अलैहिस्सलाम को शुरू से ही डर था वो अब सच हो गया था। क्या आपको हिजरत के बाद की मदीना की संधि याद है?

उस समझौते के अनुसार, मदीना के क़बीलों ने वादा किया था कि अगर कभी शहर पर हमला हुआ तो वो मिलकर इसकी हिफ़ाज़त करेंगे। लेकिन बनू क़ुरैज़ा ने वो वादा तोड़ दिया। और इससे भी बुरी बात यह थी कि उन्होंने दुश्मन की मदद करने का फ़ैसला किया और एक और भी बड़ा धोखा दिया। "बनू क़ुरैज़ा ने... वादा तोड़ दिया। क़िले...

दो ख़तरे। हमें मालूम था। यह साफ़ था कि वो संधि तोड़ देंगे।" वो मदीना के दक्षिणी हिस्से में मज़बूत क़िलों में रहते थे। और वहाँ से, वो मुसलमानों के ख़िलाफ़ कूच करने की योजना बना रहे थे। रसूल अलैहिस्सलाम ने तुरंत साद इब्न मुआज़ रज़ियल्लाहू अन्हु और कुछ दूसरे सहाबा को उनसे बात करने के लिए भेजा ताकि वो उन्हें इस फ़ैसले से पीछे हटने के लिए मना सकें। लेकिन यहूदियों ने अपना इरादा बदलने का कोई संकेत नहीं दिया। वो मुसलमानों को ख़त्म करने पर प्रतिबद्ध थे। तो अब, न सिर्फ़ बाहर से तीर आ रहे थे, बल्कि दक्षिण से यहूदी सेनाएँ भी मुसलमानों पर भारी दबाव डाल रही थीं। क़ुरैज़ा के यहूदी मदीना के अंदर, शहर के भीतर ही रहते थे। जिसका मतलब था कि मुसलमान अब दो तरफ़ा हमलों के बीच फँसने वाले थे। और हालात को और भी बदतर बनाने के लिए, मुनाफ़िक़ एक बार फिर से फ़ितना फैला रहे थे और कह रहे थे: "अल्लाह और उसके रसूल ने हमें झूठे वादों के सिवा कुछ नहीं दिया है।" अल्लाह सूरह अल-अहज़ाब में उस दिन का वर्णन करता हैं: "याद करो जब वो तुम्हारे ऊपर और तुम्हारे नीचे से तुम पर चढ़ आए, और जब डर से आँखें पथरा गईं और कलेजे मुँह को आ गए, और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे। यहीं पर मोमिन खूब आज़माए गए और बुरी तरह हिला मारे गए।" सब कुछ मुसलमानों के ख़िलाफ़ जाता हुआ प्रतीत हो रहा था। लेकिन ठीक उसी वक़्त, अल्लाह ने उनके लिए एक रास्ता खोला। एक ऐसा मौक़ा जो जंग का रुख़ बदल सकता था। ग़तफ़ान के अशजा क़बीले के सरदार, नूऐम इब्न मसूद रज़ियल्लाहू अन्हु, ने इस्लाम क़बूल कर लिया था लेकिन अभी तक किसी को बताया नहीं था। वो अपना ईमान ज़ाहिर करने के लिए चुपके से रसूल अलैहिस्सलाम के पास आए। कलमा पढ़कर मुसलमान होते ही, उन्होंने कहा: "ऐ रसूल अलैहिस्सलाम...

अगर कोई ऐसा काम है जो मैं कर सकता हूँ, तो बस मुझे हुक्म दें।" जिसने अभी-अभी ईमान की मिठास चखी हो, वो यूं ही शांत कैसे बैठ सकता था। जब नबी अलैहिस्सलाम ने उनका यह जज़्बा देखा, तो उन्होंने इसे एक मौक़े में बदल दिया। उन्होंने फ़रमाया: "दुश्मन के पास वापस जाओ और उनमें फूट डालने के लिए जो कर सकते हो करो।" नूऐम रज़ियल्लाहू अन्हु बिल्कुल समझ गए कि उनसे क्या कहा जा रहा है। नूऐम रज़ियल्लाहू अन्हु चुपचाप दुश्मन के तीनों गुटों में इस तरह शामिल हो गए, मानो उन्होंने कभी इस्लाम क़बूल ही न किया हो। वो सबसे पहले बनू क़ुरैज़ा के पास गए और उनके दिलों में शक पैदा कर दिया। "अगर क़ुरैश और ग़तफ़ान मुसलमानों को हराने में नाकाम रहे, तो वो वापस अपने घर लौट जाएंगे और तुम्हें अकेला छोड़ देंगे। और तब मोहम्मद के लिए तुम्हें सज़ा देना आसान हो जाएगा। अगर तुम नहीं चाहते कि ऐसा हो, तो क़ुरैश और ग़तफ़ान से कहो कि वो अपने कुछ आदमियों को ज़मानत के तौर पर तुम्हें दें। इस तरह, वो तुम्हें धोखा नहीं देंगे, क्योंकि वो कभी अपने ही लोगों को खोने का जोखिम नहीं उठाएंगे।" उसके बाद, नूऐम रज़ियल्लाहू अन्हु क़ुरैश के पास गए और बोले: "बनू क़ुरैज़ा को मुसलमानों पर हमला करने के अपने फ़ैसले पर पछतावा हो रहा है, और उन्होंने उनके साथ एक ख़ुफ़िया समझौता कर लिया है। उन्होंने मुसलमानों से वादा किया है कि, संधि तोड़ने की माफ़ी के बदले में, वो क़ुरैश के 70 आदमियों को पकड़कर उन्हें क़त्ल करने के लिए सौंप देंगे। इसलिए अगर यहूदी तुम्हारे किसी भी आदमी को बंधक के तौर पर माँगें, तो ऐसी कोई भी बात मत मानना।" फिर वो ग़तफ़ान के पास गए और उन्हें भी इसी तरह चेतावनी दी। अगर यहूदी बंधकों की माँग करें, तो उन्हें कोई भी आदमी नहीं देना चाहिए। चूँकि नूऐम रज़ियल्लाहू अन्हु ख़ुद ग़तफ़ान से थे, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया। और उन्होंने तुरंत उनकी सलाह मान ली। चूँकि नूऐम रज़ियल्लाहू अन्हु ख़ुद ग़तफ़ान से थे, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया। क़ुरैश और ग़तफ़ान से बंधकों की माँग की। अब मुशरिकों को यक़ीन हो गया कि नूऐम रज़ियल्लाहू अन्हु सच कह रहे थे। और ज़ाहिर है, उन्होंने किसी को भी सौंपने से इनकार कर दिया। बाद में, अबू सुफ़ियान उस दिन के बारे में कहता, "अगर उन्होंने मुझसे बकरी का एक बच्चा भी माँगा होता, तो मैं वो भी नहीं देता।" और इस तरह यह योजना काम कर गई। उनका गठबंधन अविश्वास में बदल गया था। घेराबंदी बहुत लंबे समय तक चली थी, और उनकी एकता टूटने लगी थी। मुसलमान और दुश्मन दोनों ही सेनाएँ थक चुकी थी। भूख, प्यास और ठंड ने दोनों पक्षों को उनकी बर्दाश्त की हद तक पहुँचा दिया था। लेकिन उनके बीच एक फ़र्क़ था। मुसलमानों को अपनी ताक़त अल्लाह से मिलती थी, जो आसमानों और ज़मीन का रब हैं, वो जो हर चीज़ पर क़ुदरत रखता हैं। जबकि दूसरा पक्ष बेजान मूर्तियों पर निर्भर था, ऐसे पत्थर जिनमें कोई ताक़त नहीं थी। रसूल अलैहिस्सलाम जानना चाहते थे कि दुश्मन की सेना क्या कर रही है और उनकी योजनाएँ क्या हैं। उस रात, उन्होंने किसी को उनके शिविर में भेजने का फ़ैसला किया। उन्होंने अपने इर्द-गिर्द पहरा दे रहे मुसलमानों के एक छोटे गुट से पूछा: "कौन है जो मुझे इन लोगों की ख़बर लाकर दे, और अल्लाह उसे क़यामत के दिन मेरा साथी बनाएगा?" आप सोचेंगे, क्या ही बड़े सम्मान की बात है!

भला ऐसा कौन नहीं चाहेगा?

लेकिन वो रात इतनी सख़्त थी कि किसी ने जवाब नहीं दिया। हुज़ैफ़ा इब्न अल-यमान रज़ियल्लाहू अन्हु, जो रात में वहाँ मौजूद थे, ने बाद में बताया: "हमने ख़ुद को कपड़ों के टुकड़ों में लपेट रखा था, और भूख, रात की दहशत, और जमा देने वाली ठंड में बस अपनी जगह पर ही डटे रहने की कोशिश कर रहे थे।" मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतनी अँधेरी रात और इतनी तेज़ हवा कभी नहीं देखी थी। अँधेरा इतना था कि हम अपनी उँगलियों के पोर भी नहीं देख पा रहे थे। और हवा बादलों की तरह गरज रही थी।" जब किसी ने जवाब नहीं दिया, तो रसूल अलैहिस्सलाम ने हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु को पुकारा। "जाओ और मुझे दुश्मन के बारे में जानकारी लाकर दो।" हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। वो उस जमा देने वाली ठंड में कैसे जा सकते थे?

तब नबी अलैहिस्सलाम ने उनके लिए दुआ की। "ऐ अल्लाह, इसकी हिफ़ाज़त फ़रमा, इसके आगे से, इसके पीछे से, दाएँ से, बाएँ से, इसके ऊपर से, और इसके नीचे से।" हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु ने फ़रमाया, "उसी पल, मेरे अंदर का सारा डर ग़ायब हो गया। मुझे ठंड लगनी बंद हो गई।" फिर नबी अलैहिस्सलाम ने मुझसे फ़रमाया: "हुज़ैफ़ा, जब तक तुम मेरे पास वापस न आ जाओ, ऐसा कुछ मत करना जिससे वो चौकन्ने हो जाएँ। न कोई तीर चलाना, न कोई पत्थर फेंकना, और न ही भाले या तलवार से वार करना।" फिर हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु चुपके से क़ुरैश के शिविर में घुस गए। वहाँ उन्होंने क़ुरैश के सरदार, अबू सुफ़ियान को आग तापते हुए देखा। हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु उसके ठीक पीछे थे। उनका तीर-कमान तैयार था। उनका सरदार ठीक वहीं सामने था। एक ही तीर से, वो दुश्मन को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा सकते थे। लेकिन उन्हें रसूल अलैहिस्सलाम की बात याद आ गया और उन्होंने ख़ुद को रोक लिया। दरअसल इसके पीछे अल्लाह की हिकमत थी। अल्लाह अपने उस बंदे को बचा रहा था जिसे वो बाद में इस्लाम की हिदायत देने वाले थे, ताकि वो कुफ़्र की हालत में न मरे। फिर हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु भीड़ के और क़रीब गए और उन्हीं में घुल-मिल गए। अबू सुफ़ियान एक अहम फ़ैसले का ऐलान करने ही वाला था। लेकिन उसके मन में एक शक पैदा हुआ। चूँकि अँधेरा इतना ज़्यादा था कि किसी को पहचाना नहीं जा सकता था, इसलिए उसने एहतियात बरती। "अपने बगल वाले आदमी का हाथ पकड़ो और उसका नाम पूछो।" हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु लगभग पकड़े ही गए थे। लेकिन अल्लाह ने उनके दिल में एक तरक़ीब डाल दी। जहाँ बाक़ी सबने सिर्फ़ अपने बगल वाले को ही पकड़ा, उन्होंने तेज़ी से अपने दाएँ और बाएँ दोनों आदमियों के हाथ पकड़ लिए और ग़ुस्से से पूछा: "तुम कौन हो?" दोनों ने अपने नाम बताए, और इस तरह किसी का ध्यान उन पर नहीं गया। "मेरे लोगो!

इस तेज़ हवा ने हमारे पास जो कुछ था सब तबाह कर दिया है। हमारे घोड़े और ऊँट मरने लगे हैं। अपना सामान बाँधो और फ़ौरन निकलो!

क्योंकि मैंने जाने का फ़ैसला कर लिया है।" हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु को जानकारी मिल गई और वो वापस चल दिए। उन्हें अभी भी कोई ठंड महसूस नहीं हो रही थी। लेकिन जैसे ही वो रसूल अलैहिस्सलाम के पास पहुँचे, ठंड वापस आ गई। उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम को विनम्रतापूर्वक अपने रब से दुआ करते हुए पाया। और जब उन्हें उनसे यह ख़ुशख़बरी मिली, तो नबी अलैहिस्सलाम को बहुत सुकून मिला। आख़िरकार, दुश्मन पीछे हटने वाला था। फिर एक रात, अल्लाह ने इतनी तेज़ हवा भेजी कि रेगिस्तान की रेत हवा में उड़ने लगी और मुशरिकों के तंबू फट गए। तूफ़ान ने उनके चेहरों पर रेत उड़ा दी, और उनके घोड़े और ऊँट घबरा गए, और हर तरफ़ भागने लगे। सब कुछ पूरी तरह अफ़रा-तफ़री का शिकार हो गया। दुश्मन की सेना समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या हो रहा है। बुरी हालत और दहशत के मारे वो पीछे हटने लगे और बिना पीछे मुड़े भाग गए। सूरह अल-अहज़ाब उस दृश्य का वर्णन करती है: "ऐ ईमान वालो, अल्लाह के उस एहसान को याद करो जो उसने तुम पर किया जब सेनाएँ तुम पर चढ़ आईं, और हमने उन पर एक ऐसी आँधी और सेनाएँ भेजीं जिन्हें तुमने नहीं देखा। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देखने वाला है।" घेराबंदी ख़त्म हो चुकी थी, और दुश्मन को खदेड़ दिया गया था। लेकिन जिन लोगों ने मुसलमानों को धोखा दिया था वो अभी भी मदीना के अंदर थे। उनकी ग़द्दारी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। रसूल अलैहिस्सलाम अभी-अभी ख़न्दक़ से वापस लौटे थे और उन्होंने अपना कवच भी नहीं उतारा था कि अचानक जिब्रील अलैहिस्सलाम आए। उन्होंने फ़रमाया: "ऐ रसूलुल्लाह, क्या आपने अपने हथियार रख दिए हैं?" रसूल अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया, "हाँ, रख दिए हैं।" फिर जिब्रील अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "लेकिन हमने अपने हथियार अभी तक नहीं रखे हैं। इसलिए अब उनकी तरफ़ कूच करें।" जंग अभी ख़त्म नहीं हुई थी। अगला निशाना साफ़ था: बनू क़ुरैज़ा। यहूदी भी जानते थे कि उनके धोखे की सज़ा उन्हें ज़रूर मिलेगी। उन्होंने कहा:"अल्लाह की क़सम, मोहम्मद अब हमारे पीछे आयेगा।" और वो अपने मज़बूत क़िलों के अंदर छिप गए। उन दीवारों के पीछे ख़ुद को महफ़ूज़ समझकर, उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम को बहुत बुरा-भला कहा। उनका आत्मसमर्पण करने का कोई इरादा नहीं था। वो उस वादे पर भरोसा कर रहे थे जो उनसे मदीना के मुनाफ़िक़ों ने किया था। मुनाफ़िक़ों ने चुपके से उन्हें पैग़ाम भेजा था कि: "मदीना छोड़कर मत जाना। हम हर तरह से तुम्हारी मदद करेंगे।" लेकिन एक बात थी जो यहूदी भूल गए। मुनाफ़िक़ कभी अपने वादे नहीं निभाते। अचानक उसी सण, उनमे से दो लोग चिल्लाये - "यह वही आदमी है जिसके बारे में इब्न हय्याबान ने हमें बताया था। इनसे जंग मत करो।" ये आदमी कौन थे?

और ये इब्न हय्याबान कौन था जिसके बारे में वो बात कर रहे थे? उसने क्या भविष्यवाणी की थी?

इब्न हय्याबान एक यहूदी विद्वान था जो रसूल अलैहिस्सलाम की नबूवत से पहले मदीना आया था उसने कहा था: "नबी का आना क़रीब है। और यही वो जगह है जहाँ वो हिजरत करेंगे।" नबी अलैहिस्सलाम के मिशन के शुरू होने से बहुत पहले, उसने बनू नज़ीर को उनके बारे में बता दिया था। और फिर वहीं उसकी मौत हो गई। जब उसने वो बातें कहीं थी, तो दो भाई, उसैद और सलबा, वो भी वहीं थे और उन्होंने उसकी बात साफ़-साफ़ सुनी थी। और अब, उन्होंने उन दोनों भाइयों की पुकार को अनसुना कर दिया। बनू क़ुरैज़ा अपने क़िलों के अंदर फँसे हुए थे। मुनाफ़िक़ों से उन्हें जिस मदद की उम्मीद थी, वो भी नहीं आ रही थी। और आख़िरकार उन्हें समझ आ गया था, कि घेराबंदी ख़त्म नहीं होने वाली। इसलिए मजबूर होकर, उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम के साथ बातचीत करने की माँग की। "अल्लाह की क़सम, हम तब तक घुटने नहीं टेकेंगे जब तक आप हमारी शर्तें नहीं मान लेते!" लेकिन उनका जवाब अटल था। "नहीं। तुम्हारे पास आत्मसमर्पण करने और बिना शर्त मेरा फ़ैसला मानने के सिवा कोई चारा नहीं है।" यह महसूस करते हुए कि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है, यहूदियों ने आख़िरकार आत्मसमर्पण कर दिया। बनू क़ुरैज़ा ने एक के बाद एक कई जुर्म किए थे। पहले उन्होंने अपनी संधि तोड़ी, और दुश्मन के साथ मिल गए। और उस पर भी, माफ़ी माँगने के बजाय, उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम को बुरा-भला कहा। उनके इतने बड़े धोखे के बावजूद, रसूल अलैहिस्सलाम ने उनके साथ ऐसा सुलूक किया जिसकी मिसाल तारीख़ में नहीं मिलती। उन्होंने हुक्म दिया कि सज़ा सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए दी जाए, न कि ग़ुस्से या बदले की आग में। क्योंकि इस्लामी कानून में, सज़ाएँ व्यक्तिगत भावनाओं को मिलाकर लागू नहीं की जा सकतीं। यह सुनकर शायद हैरानी हो, लेकिन जब उन्हें मौत की सज़ा दी जाने वाली थी, तो उन्होंने उन्हें खाना, पानी और दूध देने का हुक्म दिया। वो एक बहुत ही गर्म दिन था, और वो नहीं चाहते थे कि उन्हें उस तपती धूप में सज़ा दी जाए। उन्होंने फ़रमाया: "सूरज की गर्मी को तलवार की गर्मी के साथ मत मिलाओ।" सुभानअल्लाह। जंगे ख़ंदक़ मुसलमानों के लिए एक बहुत अहम मोड़ था। तीनों यहूदी क़बीलों को मदीना से निकाल दिया गया था, और मुशरिक अब कोई खतरा नहीं रह गए थे। रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "इस जंग के बाद, हम उन पर हमला करने जाएंगे, और वो हम पर हमला करने नहीं आएँगे।" और बिल्कुल वैसा ही हुआ। मुशरिक कभी अपनी ताक़त वापस नहीं जुटा पाए, जबकि मुसलमान पूरे अरब प्रायद्वीप में हर गुज़रते दिन के साथ और भी मज़बूत होते गए हिजरत के 5वें साल में, नबी अलैहिस्सलाम को ख़बर मिली कि बनू अल-मुस्तलिक़ क़बीले ने मदीना की बढ़ती हुई ताक़त को एक खतरा समझना शुरू कर दिया था, और वो उन पर हमला करने की योजना बना रहे थे। जैसे ही रसूल अलैहिस्सलाम ने यह सुना, उन्होंने अपने लगभग 700 सहाबा को जमा किया। और सूरज निकलने के बाद, वो उस जगह पहुँचे जहाँ बनू अल मुस्तलिक़ ने अपना शिविर लगाया था। वो क़बीला बिल्कुल भी तैयार नहीं था। फिर रसूल अलैहिस्सलाम ने अपनी सेना को जंग की कतारों में खड़ा किया, और एक अचानक हमले से, उन्होंने इस खतरे को ख़त्म कर दिया। दुश्मन हार चुका था। लेकिन एक कहीं ज़्यादा ख़तरनाक दुश्मन सेना के अंदर ही मौजूद था। मदीना वापस लौटते समय, कुछ ऐसी परेशानियां आने वाली थीं जिनकी किसी को उम्मीद नहीं थी। और इन सबके केंद्र में था मुनाफ़िक़ों का सरदार, अब्दुल्लाह इब्न उबै इब्न सलूल। अगर नबी अलैहिस्सलाम की ग़ैर-हाज़िरी में वो मदीना में ही रुक जाता, तो वो कोई परेशानी और हलचल खड़ी कर सकता था। इसीलिए रसूल अलैहिस्सलाम उसे भी इस सफ़र पर अपने साथ ले गए। जब वो मुसलमानों के साथ होता, तो वो नबी अलैहिस्सलाम की तारीफ़ करता और समर्थन दिखाता। लेकिन जब वो अपने क़रीबी दोस्तों के साथ अकेला होता, तो वो इस्लाम के ख़िलाफ़ बोलता और मोमिनों का मज़ाक़ उड़ाता। उसके और उसके जैसे लोगों के बारे में, अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया है: "जब वो मोमिनों से मिलते हैं, तो कहते हैं, 'हम ईमान लाए हैं'; और जब एकान्त में अपने शैतानों के पास पहुँचते हैं, तो कहते हैं, "हम तो तुम्हारे साथ हैं; और हम तो बस मज़ाक़ कर रहे थे।'" हर जुमे को, वो मस्जिदे नबवी आता और मुसलमानों के बीच बैठता। वो नबी अलैहिस्सलाम का ख़ुत्बा सुनता, और जब वो ख़त्म होता, तो वो अचानक खड़ा हो जाता और पुकारता: "ऐ लोगो!

इस रसूल की मदद करो जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे बीच भेजा है!

उनके ज़रिए, अल्लाह ने तुम्हें सम्मान दिया है, तुम्हें श्रेष्ठ और विजयी बनाया है। इसलिए उनकी बात सुनो, सम्मान करो, और उनका अनुसरण करो।" उहुद के दिन तक, जब वो 300 आदमियों को सेना से दूर ले गया। वो हर जुमे को ऐसा ही करता था। आम तौर पर, जब उसे किसी जंगी सफ़र में शामिल होने के लिए बुलाया जाता, तो वो नहीं जाता। वो हमेशा पीछे रहने का कोई न कोई बहाना ढूँढ लेता। लेकिन इस बार उसने शामिल होने का फ़ैसला किया, क्योंकि उसे कोई वास्तविक जोखिम नज़र नहीं आया और असल में वो माले-ग़नीमत की ताक में था। और साथ ही, वो कोई ऐसी परेशानी खड़ी करने के मौक़े की तलाश में था जो मुसलमानों के बीच फूट डाल सके, जो हर गुज़रते दिन के साथ और भी मज़बूत होते जा रहे थे। और उसे दो बार यह मौक़ा मिलने वाला था। तो इन घटनाओं में से पहला कौन सा था?

सफ़र से वापस आते वक़्त, मुस्लिम सेना ने एक कुएँ के पास पड़ाव डाला। हर कोई बारी-बारी से पानी निकाल रहा था। लेकिन एक छोटा सा विवाद मुनाफ़िक़ों के लिए एक मौक़ा बन गया। जब मुहाजिरीन में से जहजाह इब्न मसूद रज़ियल्लाहू अन्हु और अंसार में से सिनान इब्न वबर रज़ियल्लाहू अन्हु एक ही कुएँ से पानी निकाल रहे थे, तो उनके बीच बहस हो गई। फिर बात बढ़ने लगी, और जहजाह रज़ियल्लाहू अन्हु ग़ुस्से से सिनान रज़ियल्लाहू अन्हु की तरफ़ बढ़े। यह देखकर, सिनान रज़ियल्लाहू अन्हु ने आवाज़ दी: "ऐ मुहाजिरीन! तुम कहाँ हो?

आओ और मेरी मदद करो!" पल भर में, अंसार और मुहाजिरीन, जिन्होंने भाईचारे की बेहतरीन मिसालें पेश की थीं, एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हो गए। मुनाफ़िक़ों के सरदार, अब्दुल्लाह इब्न उबै ने, फ़ितना पैदा करने का सबसे अच्छा मौक़ा पा लिया था, और उसने इसका फ़ायदा उठाने की हर मुमकिन कोशिश की। "ऐ अंसार, इन मुहाजिरीन ने तुम्हारे ज़रिए ताक़त और सम्मान हासिल किया, और अब ये तुम्हारे साथ इतने घमंड और अनादर से पेश आते हैं। तुमने अपने शहर में उनका स्वागत किया और उन्हें रहने की जगह दी। तुमने उनके साथ अपनी दौलत और खाना बाँटा। तुम जो यह बेइज्जती सह रहे हो, इसके ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। अल्लाह की क़सम, अगर हम मदीना लौटते हैं, तो सबसे इज़्ज़तदार इंसान सबसे कमतर को बाहर निकाल देगा।" वो नबी अलैहिस्सलाम और मुहाजिरीन की तरफ़ इशारा कर रहा था, मआज़ल्लाह। इन भड़काने वाले शब्दों ने उस तनावपूर्ण माहौल को और भी बदतर कर दिया। जब रसूल अलैहिस्सलाम ने सुना कि क्या हुआ है, तो वो तुरंत अपने सहाबा के पास गए। उन्होंने ग़ुस्से से फ़रमाया: "यह जाहिलियत की कैसी पुकार है?" और यह देखकर कि इतनी छोटी सी बात पर, अंसार और मुहाजिरीन उलझ पड़े हैं उन्होंने फ़रमाया: "जाहिलियत के इस बुलावे को छोड़ दो, क्योंकि यह एक गंदगी है!" उन्होंने ये सख़्त चेतावनियाँ इसलिए दीं क्योंकि इस सबकी जड़ एक तरह का क़बायली घमंड, नस्लवाद, और दुनियावी श्रेष्ठता का एहसास था। लेकिन इस्लाम में, श्रेष्ठता सिर्फ़ तक़वा यानी, अल्लाह का डर रखने, गुनाहों से बचने, और उनके हुक्मों का अनुसरण करने से मिलती है;। रसूल अलैहिस्सलाम की इन बातों ने सहाबा के दिलों को गहराई से छू लिया। और सिनान रज़ियल्लाहू अन्हु ने जहजाह रज़ियल्लाहू अन्हु को माफ़ कर दिया। जो लोग इस तरह अपनी ही क़ौम पर फ़ख़्र करना जारी रखते हैं उनके लिए रसूल अलैहिस्सलाम ने बाद में फ़रमाया: "जो असबियत की तरफ़ बुलाए, वो हम में से नहीं है। जो असबियत के लिए लड़े, वो हम में से नहीं है। और जो असबियत के लिए मरे, वो हम में से नहीं है।" इस घटना के बाद, रसूल अलैहिस्सलाम ने एक बहुत अलग फ़ैसला लिया। दिन की सबसे तेज़ गर्मी के वक़्त, उन्होंने मुस्लिम सेना को मदीना की तरफ़ कूच करने का हुक्म दिया। उस दिन से पहले, वो इतनी झुलसा देने वाली गर्मी में कभी सफ़र पर नहीं निकले थे। लेकिन नबी अलैहिस्सलाम के इस हुक्म के पीछे एक हिकमत थी। वो अपने सहाबा को अब्दुल्लाह इब्न उबै की बातों पर चर्चा करने से दूर रखना चाहते थे वो दोपहर में निकल पड़े, और जब तक भोर की पहली किरण नहीं फूटी, वो नहीं रुके। वो इतने थके हुए और नींद से बेहाल थे कि उनसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। वो जहाँ थे वहीं गिर पड़े, और तुरंत सो गए। इस तरह, उनका ध्यान बँट गया, और बात को आगे बढ़ने से रोक दिया गया। इस घटना से, रसूल अलैहिस्सलाम ने हमें हमेशा के लिए एक सबक़ सिखाया। एक मुसलमान को ख़ुद को हमेशा व्यस्त रखना चाहिए। कभी खाली नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि आलस और कुछ न करना हराम ख़्वाहिशों और अन्ततः गुनाहों का दरवाज़ा खोलती है तो, क्या मुनाफ़िक़ों के सरदार ने इस वाक़ये के बाद परेशानी खड़ी करना बंद कर दिया?

बिल्कुल नहीं। वो अभी भी फ़ितना फैलाने के एक और मौक़े की तलाश में था। और जल्द ही, उसे वो दूसरा मौक़ा मिल गया। इस बार, उसने नबी अलैहिस्सलाम के अपने परिवार पर इल्ज़ाम लगाने का दुस्साहस किया। जब सेना वापस मदीना की तरफ़ जा रही थी, तो उन्होंने थोड़ी दूरी पर दो लोगों को देखा जो उन तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। उनमें से एक ऊँट पर सवार था, और दूसरा उसकी लगाम पकड़े हुए उसके बगल में चल रहा था। ऊँट पर सवार इंसान हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा थीं। और जो आदमी उसे ले जा रहा था वो सफ़वान इब्न मुअत्तल रज़ियल्लाहू अन्हु थे। अब्दुल्लाह इब्न उबै ने इस दृश्य को तोड़-मरोड़ कर नबी अलैहिस्सलाम की पाक, और सम्मानित पत्नी पर एक भयानक इल्ज़ाम लगाया। "अल्लाह की क़सम, वो उससे पाक नहीं रहा। और न ही वो उससे पाक रही।" इसका मतलब यह था कि, मआज़ल्लाह, उनके बीच कुछ हुआ था। और इन्हीं बातों से, उसने अफ़वाह और फ़ितना फैलाना शुरू कर दिया। वो भयानक इल्ज़ाम सेना में जंगल की आग की तरह फैल गया। एक इंसान से दूसरे इंसान तक। लेकिन इसके पीछे का सच क्या था?

आइए वापस वहीं चलते हैं जहाँ से यह सब शुरू हुआ। जब भी रसूल अलैहिस्सलाम किसी सफ़र पर जाते, तो वो अपनी पत्नियों में से किसी एक को अपने साथ ले जाते। इस बार, जो उनके साथ गई थीं वो हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा थीं। जब सहाबा आराम कर रहे थे, आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा अपनी निजी ज़रूरत के लिए सेना से काफ़ी दूर चली गईं जब वो लौटीं, तो वो लोग चलने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन उसी पल, उन्हें एहसास हुआ कि उनका हार ग़ायब था। यह सोचकर कि सेना उनके बिना नहीं जाएगी, वो उसे ढूँढने के लिए वापस उसी जगह गईं जहाँ वो अभी गई थीं। लेकिन उसे ढूँढने में उन्हें कुछ वक़्त लग गया। और तब तक, सेना पहले ही आगे बढ़ चुकी थी, उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वो वहाँ नहीं हैं। उस ज़माने में, औरतें परदे की हिफ़ाज़त के लिए, ऊँटों के ऊपर ढँककर रखे हुए, तंबू जैसे केबिन में सफ़र करती थीं जिसे हौदा कहा जाता था। चूँकि हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा का वज़न ज़्यादा नहीं था, जिन सहाबा ने हौदा उठाया उन्हें एहसास ही नहीं हुआ कि वो अंदर नहीं थीं। और वो निकल पड़े। जब हमारी माँ लौटीं, तो उन्होंने पाया कि सेना जा चुकी थी। चूँकि रेगिस्तान में अकेले सफ़र करना ख़तरनाक था, उन्होंने वहीं रहने का फ़ैसला किया जहाँ वो थीं। उन्होंने सोचा, "उन्हें एहसास होगा कि मैं नहीं हूँ और वो मेरे लिए वापस आएँगे।" और कुछ वक़्त बाद, उन्हें नींद आ गई। जब वो सो रही थीं, तो कोई धीरे-धीरे दूरी से क़रीब आया। वो सफ़वान इब्न मुअत्तल रज़ियल्लाहू अन्हु थे। सफ़वान रज़ियल्लाहू अन्हु सेना की छूटी हुई चीज़ों को इकट्ठा करने के ज़िम्मेदार थे। वो पीछे गिरी भूलवश छूती हुई चीज़ो को उठाने के लिए हमेशा पीछे रहते थे। और उन चीज़ों को अगले पड़ाव तक ले आते थे। उस दिन भी, सेना के आगे बढ़ने के बाद वो उस जगह की जाँच करने आए थे, और उन्होंने किसी को ज़मीन पर सोते हुए देखा। जब उन्हें एहसास हुआ कि वो हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा हैं, तो उन्होंने कहा: "इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन (बेशक हम अल्लाह ही के हैं, और बेशक हमें उसी की तरफ़ लौटना है)।" उनकी आवाज़ सुनकर, आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा जाग गईं। बिना एक भी लफ़्ज़ कहे, सफ़वान रज़ियल्लाहू अन्हु ने अपना ऊँट बिठाया और फिर एक तरफ़ हट गए ताकि वो आराम से और पूरे परदे के साथ उस पर सवार हो सकें। फिर उन्होंने ऊँट की लगाम पकड़ी और उसे सेना के पड़ाव की तरफ़ ले जाने लगे। कई घंटों के बाद, वो आख़िरकार बाक़ी सेना तक पहुँच गए। और जब अब्दुल्लाह इब्न उबै ने यह देखा, तो उसने इसे नबी अलैहिस्सलाम और उनके मक़सद को नुक़सान पहुँचाने के लिए एक मौक़े के तौर पर इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया यह इल्ज़ाम एक कान से दूसरे कान तक फैल गया। और जल्द ही, मदीना का पूरा शहर इससे सन्न रह गया। अफ़सोस की बात है कि तीन अहम सहाबा भी इस इल्ज़ाम पर यक़ीन कर बैठे और इसके बारे में बात करने लगे। जब यह फ़ितना पूरे मदीना में फैल रहा था, हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि क्या हो रहा है। क्योंकि सफ़र से वापस आने के तुरंत बाद, वो बहुत सख़्त बीमार पड़ गईं और उन्हें कुछ वक़्त बिस्तर पर रहना पड़ा। चूँकि वो नहीं जानती थीं कि क्या कहा जा रहा है, वो इन आरोपों का इनकार या ख़ुद का बचाव नहीं कर सकती थीं। यह साफ़ था कि यह अल्लाह की तरफ़ से एक और आज़माइश थी। बिल्कुल वैसी ही जैसी उहुद की जंग के दौरान हुई थी। याद है वो अफ़रा-तफ़री जो तब मची थी जब एक मुशरिक ने चिल्लाया था: "मैंने मोहम्मद को मार डाला!" "मैंने मोहम्मद को मार डाला!" "मैंने मोहम्मद को मार डाला!" जबकि हक़ीक़त में, रसूल अलैहिस्सलाम एक गड्ढे में गिर गए थे। उस वक़्त, सहाबा की आज़माइश की गई थी, यह देखने के लिए कि मैदान-ए-जंग में कौन डटा रहेगा, और कौन मुँह मोड़ लेगा। लेकिन अब, आज़माइश अलग थी। यह इस बारे में था कि कौन हैं, जो एक ऐसी अफ़वाह फैलाने में हिस्सा लेगा जिसे उन्होंने अपनी आँखों से नहीं देखा था, और कौन है जो इससे दूर रहेगा। अल्लाह ने आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा को जो कहा जा रहा था उससे पूरी तरह से बेख़बर रखा था। जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता गया, वो लोग जिन्होंने कहा था "जब तक यह साबित न हो जाए, यह इल्ज़ाम के सिवा कुछ नहीं" और वो लोग जिन्होंने इसे फैलाने में मदद की थी, वो एक-एक करके सामने आ गए। यह एक बहुत बड़ी आज़माइश थी, जिसे आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा जैसी मज़बूत औरत ही बर्दाश्त कर सकती थीं। हमारी माँ को अभी भी कोई अंदाज़ा नहीं था। लेकिन उन्होंने अपने साथ रसूल अलैहिस्सलाम के व्यवहार में कुछ बदलाव महसूस किया। वो अब पहले जैसा प्यार और परवाह नहीं करते थे। वो उनका नाम तक नहीं लेते थे। इसके बजाय, जब वो आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा का हाल जानना चाहते, तो वो उनकी माँ से पूछते, "आपकी मरीज़ कैसी है?" इस दूरी ने आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा के दिल पर भारी बोझ डाल दिया था उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि रसूल अलैहिस्सलाम उनके साथ ऐसा सुलूक क्यों कर रहे थे। तक़रीबन 20 दिन बाद, वो आख़िरकार बिस्तर से उठने के क़ाबिल ठीक हुईं, और मिस्तह इब्न उसासा रज़ियल्लाहू अन्हु की माँ के साथ बाहर गईं। जब आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने अपने बारे में अफ़वाहें सुनीं, तो वो सदमे से इतनी टूट गईं कि वो काँपीं, गिर पड़ीं, और बेहोश हो गईं। उसके बाद के दिनों में, वो इतना रोईं कि उनकी हालत पहले से भी ज़्यादा ख़राब हो गई। जब वो अपने माता-पिता के घर पहुँचीं, तो उन्होंने कहा: "मेरी प्यारी माँ, लोग मेरे बारे में क्या कह रहे हैं?

और आपने मुझे बताया क्यों नहीं?" और फिर वो फूट-फूट कर रोने लगीं। उनकी माँ ने उन्हें दिलासा देने की कोशिश की। ठीक उसी वक़्त, अबू बक्र रज़ियल्लाहू अन्हु छत पर क़ुरआन की तिलावत कर रहे थे। जब उन्होंने अपनी बेटी को रोते हुए सुना, तो वो नीचे आए, उनके बगल में बैठे, और उन्हें शांत करने की कोशिश की। उनका दिल अपनी बेटी की बेगुनाही पर पक्के यक़ीन से भरा हुआ था। लेकिन उस भयानक इल्ज़ाम की वजह से पूरा घर गहरे दुख में डूबा हुआ था। यह उन सबसे मुश्किल आज़माइशों में से एक थी जिनसे कोई भी औरत गुज़र सकती है। अगर वो ख़ुद का बचाव करने की कोशिश भी करतीं, तो भी हर कोई वो इल्ज़ाम सुन चुका था। और कुछ लोगों ने तो उस पर यक़ीन भी कर लिया था। हालाँकि उनमें से किसी ने भी अपनी आँखों से कुछ नहीं देखा था। वो तो बस दूसरों की कही बातों को दोहराने में शामिल हो गए थे। बाहर से देखने पर, यह सिर्फ कुछ शब्द कह देना था। यह एक मामूली सी बात लग रही थी। लेकिन असल में, इसका वज़न,अल्लाह के सामने इसकी जवाबदेही बहुत बड़ी थी। इसी घटना ने दिखाया कि ज़बान कितनी ख़तरनाक हो सकती है। और क्यों किसी पर व्यभिचार का इल्ज़ाम लगाना सात सबसे बड़े गुनाहों में से एक है। सिर्फ़ एक शब्द से, अनगिनत परिवारों का सुकून तबाह किया जा सकता था। आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा कसूर वार होने का थोड़ा भी संकेत नहीं था। लेकिन मुनाफ़िक़ों ने बात करना बंद ही नहीं किया। वो दिन आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा के लिए हर उस चीज़ से ज़्यादा मुश्किल थे जिसका उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी सामना किया था। न तो मेरे आँसू रुके, और न ही मैं सो सकी। मैं इतना रोई कि मुझे लगा रोने से मेरा कलेजा फट जाएगा। उन्हें इस हालत में देखकर, एक अंसार औरत आईं और उन्होंने इजाज़त माँगी कि वो उनके साथ रहें और उनके साथ रोएँ। जब आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा मान गईं, तो वो दोनों एक साथ रोईं। इस बीच, अब्दुल्लाह इब्न उबै, वो इंसान जिसने यह तोहमत शुरू की थी और यह सारी तकलीफ़ दी थी, वो इन हालात से ख़ुश था। उसने वो हासिल कर लिया था जो वो चाहता था। उसने एक भयानक झूठ से मुसलमानों को झकझोर कर रख दिया था। वो जहाँ भी जाता, इसके बारे में बात करता रहता, और इसे और ज़्यादा फैलाने की हर मुमकिन कोशिश करता। रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम बहुत अच्छी तरह जानते थे कि उनकी यारी आयशा इस तरह के इल्ज़ाम से पूरी तरह मुख्त हैं। लेकिन एक ऐसी ज़ालिम और धोखे से भरी तोहमत को लोगों के बीच इतनी तेज़ी से फैलते हुए देखकर उनके दिल पर बहुत भारी बोझ पड़ा। और उन तकलीफ़ भरे दिनों में, वो बिना किसी सबूत के हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा का बचाव नहीं कर सकते थे। अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो मुनाफ़िक़ उन पर इल्ज़ाम लगाते कि वो अपने प्यार और मुहब्बत की वजह से अपनी पत्नी का बजाव कर रहे हैं। और यह एक नबी के इंसाफ़ के मक़ाम के मुताबिक़ नहीं होता। और वो नाम-निहाद मुसलमान तादाद में कम भी नहीं थे। इसलिए रसूलल्लाह के पास इंतज़ार करने के सिवा कोई चारा नहीं था। वो अल्लाह की तरफ़ से वही(प्रकाशना) का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन इस ईश्वरीय आज़माइश के हिस्से के तौर पर, वो वही (प्रकाशना) पूरे एक महीने तक नहीं आने वाली थी। क्या यह लंबा इंतज़ार एक बार फिर साफ़-साफ़ साबित नहीं करता से कि वो वाक़ई एक नबी थे?

कि उन पर वही (प्रकाशना) सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ से आती थी? अगर नबी अलैहिस्सलाम अपने मन से बोल रहे होते, अगर मआज़ल्लाह, उन्होंने क़ुरआन की आयतें ख़ुद गढ़ी होतीं, क्या वो पूरे एक महीने तक ख़ुद को इतनी बड़ी तकलीफ़ में डालते?

30 दिन तो छोड़िए, वो 30 मिनट में ही एक आयत गढ़ सकते थे और बात को उसी वक़्त ख़त्म कर सकते थे। मआज़ल्लाह। लेकिन अपनी सारी तकलीफ़ के बावजूद, उन्होंने सब्र के साथ वही के आने का (प्रकाशना) इंतज़ार किया। रसूल अलैहिस्सलाम आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा के माता-पिता के घर गए। उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ़ रुख़ किया और फ़रमाया: "ऐ आयशा, मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी-ऐसी बातें बताई गई हैं। अगर तुम बेगुनाह हो, तो अल्लाह तुम्हारी बेगुनाही ज़ाहिर कर देगा। और अगर तुमने कोई गुनाह किया है, तो अल्लाह से माफ़ी माँगो और उनसे तौबा करो।" "अल्लाह की क़सम, मैं जानती हूँ कि लोग जो कह रहे हैं आपने वो सब सुना है। और वो बात आपके दिल में भी बैठ गई है, और आपने उसे सच मान लिया है। अब अगर मैं आपसे कहूँ कि मैं बेगुनाह हूँ, और अल्लाह जानता हैं कि मैं बेगुनाह हूँ, तो आप मुझ पर यक़ीन नहीं करेंगे। और अगर मैं आपके सामने झूठा इक़रार कर लूँ कि मैं क़सूरवार हूँ, जबकि अल्लाह जानता हैं कि मैं बेगुनाह हूँ, तो आप मुझ पर यक़ीन कर लेंगे। अल्लाह की क़सम, मैं अपने और आपके लिए कोई और मिसाल नहीं पाती। सिवाय यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पिता के, जब उन्होंने फ़रमाया था, 'तो बेहतरीन सब्र ही मेरे लिए सबसे मुनासिब है। जो कुछ तुम कह रहे हो उसे सहने के लिए, मैं सिर्फ़ अल्लाह से मदद माँगता हूँ।'" और उन्होंने बिल्कुल वैसा ही किया। उन्होंने सब्र किया, और अपनी आँखों में आँसुओं के साथ, उन्होंने अल्लाह की तरफ़ रुख़ किया और उनसे मदद माँगी। आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने अपनी बात अभी ख़त्म ही की थी कि अचानक रसूल अलैहिस्सलाम प र एक अलग ही हालत तारी हो गई। उनके मुबारक माथे से पसीने की बूँदें टपकने लगीं। यह इस बात का इशारा था कि इंतज़ार के लंबे दिन आख़िरकार ख़त्म हो गए थे। अल्लाह का पैग़ाम, वही (प्रकाशना), नाज़िल हो रही थी। लेकिन हमारी माँ आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा को ज़रा भी फ़िक्र नहीं हुई। उन्हें पक्का यक़ीन था कि अल्लाह अपना इंसाफ़ दिखायेगा और उनकी बेगुनाही जल्द ही सबके सामने ज़ाहिर हो जाएगी। आख़िरकार जब नबी अलैहिस्सलाम से वही (प्रकाशना) नाज़िल होने की यह हालत हटी, तो उनके मुबारक चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। फिर उन्होंने आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा की तरफ़ देखा और फ़रमाया: "ऐ आयशा, अल्लाह ने तुम्हारी बेगुनाही का ऐलान कर दिया है!" जो आयतें नाज़िल हुईं, उनमें अल्लाह ने फ़रमाया: "बेशक, जो लोग यह तोहमत लेकर आए हैं वो तुम ही में से एक जमात है। इसे अपने लिए बुरा मत समझो; बल्कि यह तुम्हारे लिए अच्छा है। उनमें से हर एक इंसान का उस गुनाह में उतना ही हिस्सा है जितना उसने कमाया है, और जिसने इसमें सबसे बड़ा हिस्सा लिया उसके लिए एक बहुत बड़ा अज़ाब है।" वो दुख जो कई दिनों से भरा हुआ था घर में आख़िरकार दूर हो गया। रसूल अलैहिस्सलाम, आयशा, और उनके माता-पिता सभी ने राहत की गहरी साँस ली। पूरे एक महीने की तकलीफ़ और इंतज़ार के बाद, आयतों ने आख़िरकार आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा की बेगुनाही पर मोहर लगा दी थी। और इसी के साथ, वो फ़ितना जो फैला हुआ था पूरे मदीना में आख़िरकार ख़त्म हो गया। सच आख़िरकार सामने आ ही गया। मुझे यक़ीन है कि आयशा रज़ियल्लाहू ‘अन्हा अब ख़ुश और सुकून से होंगी। अल्हम्दुलिल्लाह। उस आयत के बाद जिसने आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा को बरी कर दिया। और इसे शुरू करने वाले की सज़ा का ज़िक्र किया, कुछ और आयतें नाज़िल हुईं। इस बार, उन लोगों के बारे में जिन्होंने यह तोहमत फैलाई थी। "जब तुमने इसे एक ज़बान से दूसरी ज़बान तक पहुँचाया, और अपने मुँह से वो बात कही जिसका तुम्हें कोई इल्म नहीं था, और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थे; हालांकि वो अल्लाह के निकट एक भारी बात थी।" क्योंकि इल्ज़ाम लगाना एक गुनाह था, किसी के सम्मान और अधिकारों का हनन, इसलिए उन्हें इसकी सज़ा का सामना करना पड़ा। वो तीन सहाबा जिन्होंने उस अफ़वाह पर यक़ीन किया था और उसे दोहराया था, और इस तरह अनजाने में इसे फैलाने में मदद की थी, उन्हें नबी अलैहिस्सलाम के सामनेबुलाया गया। "रसूलुल्लाह तुम्हें बुला रहे हैं।" वो धीरे-धीरे अंदर आए, उनके दिल पछतावे से भरे हुए थे। रसूल अलैहिस्सलाम ने न तो ग़ुस्सा दिखाया और न ही उनके ख़िलाफ़ कोई रंजिश रखी। लेकिन तोहमत लगाने की, और उसमें हिस्सा लेने की सज़ा, इस्लाम में बिल्कुल साफ़ थी। उनमें से हर एक को सरेआम 80 कोड़े लगाए गए। यह सज़ा सिर्फ़ उनके लिए ही नहीं बल्कि पूरे मदीना के लिए एक अहम सबक़ बन गई, जिन लोगों ने वो सज़ा देखी वो फिर कभी किसी ऐसी चीज़ के बारे में बात नहीं करेंगे जिसका उन्हें कोई इल्म न हो। सिर्फ़ इस वाक़ये के लिए ही नहीं, बल्कि बड़े जुर्मों के लिए भी, इस्लाम ने साफ़ क़ानून और सज़ाएँ तय कीं ताकि लोग उन्हें करने से रुकें। उनका मुख्य मक़सद लोगों को डराना और रोकना था। और नतीजतन, जुर्म की दर बहुत कम रही। लेकिन उससे भी बढ़कर, इन क़ानूनों और सज़ाओं के ज़रिए, अल्लाह असल में अपने बंदों को आख़िरत के अज़ाब जैसी एक बहुत ही बदतर चीज़ से बचा रहा था और जब इन क़ानूनों पर अमल किया जा रहा था, तो किसी के साथ भी नाइंसाफ़ी नहीं की गई। हर कोई बराबर था। ताक़तवर को कमज़ोर पर या अमीर को ग़रीब पर या आज़ाद को ग़ुलाम पर कोई वरीयता हासिल नहीं थी, मिसाल के तौर परमदीना में, चोरी की एक घटना सामने आई। और बनू मख़ज़ूम क़बीले के एक समूह ने एक ऐसी औरत की सिफ़ारिश करने की कोशिश की जिसने चोरी की थी, और नबी अलैहिस्सलाम से दरख़्वास्त की कि उसे सज़ा न दी जाये। जब रसूलल्लाह ने यह सुना, तो उन्हें बहुत तकलीफ़ हुई। वो खड़े हुए और यह ख़ुत्बा दिया: "ऐ लोगो!

तुमसे पहले के लोग इसलिए तबाह हो गए क्योंकि जब उनमें से कोई इज़्ज़तदार इंसान चोरी करता, तो वो उसे छोड़ देते। लेकिन जब उनमें से कोई कमज़ोर इंसान चोरी करता, तो वो उसे सज़ा देते। अल्लाह की क़सम, अगर मोहम्मद की बेटी फ़ातिमा, भी चोरी करतीं, तो मैं उनके भी हाथ काटता।" तो अब्दुल्लाह इब्न उबै का क्या हुआ? वो इंसान जिसने ये सारी अफ़रा-तफ़री मचाई थी। क्या उसे सज़ा नहीं मिली? और जो उसने किया था, वो सिर्फ़ इसी घटना तक सीमित नहीं था। क्या आपको उहुद की जंग याद है?

अपनी मक्कारी से, जंग के शुरू होने से पहले ही मुस्लिम फौज के लगभग 300 लड़ाकों को वापस लौटने पर उसने मजबूर कर दिया वो चुपके से मुशरिकों और यहूदियों के साथ मिलकर काम करता, और लगातार मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें रचता रहता था। वो मोमिनों के बीच फ़ितना फैलाता, उनके बीच के भाईचारे के रिश्ते को तोड़ने की कोशिश करता था। रसूल अलैहिस्सलाम, यक़ीनन, वो सब जानते थे जो यह मुनाफ़िक़ों का सरदार कर रहा था। लेकिन उन्होंने सब्र का रास्ता चुना और ख़ामोश रहे। एक दिन, उमर रज़ियल्लाहू अन्हु एक ऐसे स्तर पर पहुँच गए जहाँ वो अब्दुल्लाह इब्न उबै के फैलाए जा रहे फ़ितनों को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते थे इसलिए वो नबी अलैहिस्सलाम के पास गए और बोले: "ऐ रसूलुल्लाह, मुझे इस मुनाफ़िक़ का सिर धड़ से अलग करने की इजाज़त दें!" लेकिन नबी अलैहिस्सलाम का जवाब उस हिकमत को दर्शाता है जो उनके सब्र के पीछे थी। उन्होंने फ़रमाया, "उसे छोड़ दो। वर्ना, लोग कहेंगे कि मोहम्मद अपने ही सहाबा को मार रहे हैं।" अगर आपको याद हो, तो नबी अलैहिस्सलाम की हिजरत से पहले, अब्दुल्लाह इब्न उबै मदीना का सरदार बनने ही वाला था। उसने तो अपने लिए एक ताज भी बनवा लिया था। लोगों के बीच उसका इतना सम्मान था। रसूल अलैहिस्सलाम जानते थे कि बहुत से लोग अभी भी इब्न उबै पर भरोसा करते हैं। वो अपने निफ़ाक़ को इतनी चालाकी से छुपा रहा था कि कई लोग उसे एक सच्चा मुसलमान समझते थे। कोई ऐसा जो भरोसामंद हो। अगर रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम ने उसके क़त्ल का हुक्म दिया होता, तो शायद यह अफ़वाहें फैल जातीं कि मोहम्मद अपने सहाबा को मार रहे हैं। जो क़बीले मुसलमान होने के बारे में सोच रहे थे वो यह सोचकर डर जाते, कि "वो जब भी चाहेंगे, हमें भी मार डालेंगे।" और इसीलिए, इससे बचाव के लिए, रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम ने सब्र का चुनाव किया। सालों बाद,उस तोहमत वाले वाक़ये के चार साल बाद वो उस फ़ैसले का फल देखने वाले थे हिजरत के 9वें साल में, अब्दुल्लाह इब्न उबै बीमार पड़ा और आख़िरकार उसकी मौत हो गई। उसका बेटा अब्दुल्लाह एक नेक और सच्चा मुसलमान था। वो रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम के पास आए और बोले: "ऐ रसूलुल्लाह, मेहरबानी करके मुझे अपनी क़मीज़ दे दें, ताकि मैं उसे अपने पिता के लिए कफ़न के तौर पर इस्तेमाल कर सकूँ।" फिर उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम से अनुरोध किया। कि वो जनाज़े की नमाज़ पढ़ाएँ और उनके पिता की मग़फ़िरत के लिए दुआ करें। क्या आप सोच सकते हैं कि यह एक बेटे के लिए कितना मुश्किल रहा होगा?

उनका पिता इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक रहा था। उसी पल से जब नबी अलैहिस्सलाम ने मदीना में क़दम रखा था। फिर भी, जो बात वाक़ई हैरान करने वाली है वो यह है कि रसूलल्लाह अलैहिस्सलाम ने उन्हें मना नहीं किया। उन्होंने अब्दुल्लाह इब्न उबै के कफ़न के लिए अपनी ही क़मीज़ दे दी। जब उन्हें बताया गया कि जनाज़े के लिए सब कुछ तैयार है, तो वो गए और उन्होंने पढ़ाई जनाज़े की नमाज़। वो दफ़नाने के लिए उसकी क़ब्र तक भी गए। सहाबा को हैरानी हो रही थी। रसूल अलैहिस्सलाम एक ऐसे इंसान के जनाज़े की नमाज़ क्यों पढ़ाएँगे जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िशें रचने में गुज़ार दी? वो किसी ऐसे इंसान पर इतनी मेहरबानी क्यों दिखाएँगे जिसने हर मौक़े पर मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश की?

इसके पीछे ज़रूर कोई वजह, कोई गहरी हिकमत रही होगी। और यक़ीनन वो थी। "ऐ रसूलुल्लाह, आपने उसे वो क़मीज़ क्यों दे दी जो आपने पहन रखी थी?" जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "मेरी क़मीज़ और मेरी नमाज़ उसे नहीं अल्लाह के अज़ाब से बचाएंगी। लेकिन मुझे उम्मीद है कि इसके ज़रिए, उसके क़बीले के हज़ारों लोग इस्लाम क़ुबूल कर लेंगे।" और वाक़ई, इस अमल ने अब्दुल्लाह इब्न उबै के आस-पास के लोगों पर एक गहरा असर डाला। हमारे कुछ इस्लामी स्रोतों के मुताबिक़, उस दिन नबी अलैहिस्सलाम के सब्र और रहम की वजह से, तक़रीबन 1,000 लोगों ने सच्चे दिल से इस्लाम क़ुबूल कर लिया। सुभानअल्लाह। सालों से, मुसलमानों को काबा जाने की चाहत थी। और अब, वो वक़्त आख़िरकार आ गया था। "हम आख़िरकार मक्का जा रहे हैं?" "हाँ।" यह एक ऐसे सफ़र के लिए था जो एक ऐसे ख़्वाब की वजह से शुरू होने वाला था। जो नबी अलैहिस्सलाम देखने वाले थे। लेकिन यह सफ़र इस तरह ख़त्म होने वाला था जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी। "तो फिर, तुम यहाँ हमारे क़ैदी बनकर रहोगे!" और मुसलमान ख़ुद को एक ऐसी संधि क़ुबूल करते हुए पाएंगे जिसे वो कभी क़ुबूल नहीं करना चाहते थे। वो किस तरह की संधि थी?

और उस महान सफ़र पर क्या हुआ था? हम वो सब देखेंगे, अगले एपिसोड में, इंशाअल्लाह। बने रहें।
