# "मुझे लगता था कि ईश्वर कमज़ोर लोगों के लिए है" - कनाडाई नास्तिक ने अपनाया इस्लाम

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/canadian-atheist-converts-to-islam-i-thought-god-was-for-weak-people
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=ygafmuwyokk
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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मैं पश्चिमी कनाडा के पहाड़ों में पला-बढ़ा हूँ। हमारे घर में दीन-धर्म की कोई जगह नहीं थी। ईश्वर सिर्फ़ उन कमज़ोर लोगों के लिए था, जिन्हें ज़िंदगी जीने के लिए किसी सहारे की ज़रूरत हो। आपको पता है, मेरे जीजाजी ने ख़ुदकुशी कर ली थी। मैंने अपनी बहन को fentanyl के ओवरडोज़ से खो दिया। एक रात तो ऐसा हुआ कि मेरा दोस्त आया और वह खून से लथपथ था। उसे कई जगह चाकू मारे गए थे। तब मुझे एहसास होने लगा कि, आख़िर मेरा अंजाम क्या होगा?

तभी अज़ान की आवाज़ आई, और मैं मज़ाक नहीं कर रहा, मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। ज़ाहिर है मुझे इसका मतलब नहीं पता था,लेकिन इसने मेरे दिल को छू लिया। वहाँ भाइयों का एक समूह था जो दुनिया भर से आए थे। वे सब नमाज़ के लिए इकट्ठा हो रहे थे। और जब मैंने वो एकता देखी, जहाँ रंग का कोई भेद नहीं था, तो मैं बस दंग रह गया। तो, पहली बार जब मैं उस इमारत में गया, मैंने उसे (अपनी पत्नी को) देखा, और वो पहली मुस्लिम थी जिससे मैं आज तक मिला था। उससे मिलने के बाद, मेरी समझ और नज़रिए की पूरी दुनिया ही पलट गई। हम कहते हैं न कि, ऊपर वाले के काम करने के तरीक़े निराले हैं; ये उन्हीं पलों में से एक था। एक दिन, उनकी माँ ने मुझे ख़त लिखा, और कहा कि मुझे ख़ुशी होगी अगर तुम मेरी बेटी से शादी कर लो। अस्सलामु अलैकुम ब्रदर विल सालेह, 'टुवर्ड्स इटर्निटी' की तरफ़ से, हमारा निमंत्रण स्वीकार करने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। मैं सबसे पहले पूछना चाहूँगा कि विल सालेह कौन हैं?

क्या आप हमें संक्षेप में अपने जीवन के बारे में बता सकते हैं?

वालैकुमअस्सलाम, अल्हम्दुलिल्लाह, मुझे बुलाने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। मुझे भी इसका बेसब्री से इंतज़ार था। तो संक्षेप में, मैं वेस्टर्न कैनेडा के पहाड़ों में पला-बढ़ा हूँ, और जैसे-जैसे हम बड़े हुए, हमारे घर में धर्म की कोई जगह नहीं थी। बल्कि, हमारा परिवार "नास्तिक" किस्म का था जहाँ हम ईश्वर को नहीं मानते थे; वहाँ ऐसा था कि, ईश्वर सिर्फ़ उन कमज़ोर लोगों के लिए है जिन्हें ज़िंदगी जीने के लिए किसी सहारे की ज़रूरत हो। धर्म को लेकर मेरी परवरिश कुछ ऐसी ही थी। जब मैं बहुत छोटा था, तो कई बार वहाँ करने को कुछ नहीं होता था सिवाय इसके कि वहाँ कम्युनिटी में 'जेहोवा विटनेस' थे, जो ईसाइयों का ही एक समुदाय है, वहाँ एक किंगडम हॉल था। तो हर कोई वहाँ जाता था। मेरे पिता, पुराने ज़माने के बाइकर (Biker) हैं, बड़ी दाढ़ी और टैटू वाले। तो जब आप लोगों से मिलते-जुलते हैं, जान-पहचान होती है, तो हम भी कभी-कभार वहाँ चले जाया करते थे। और मेरे लिए, यह एक बच्चे के तौर पर सजने-संवरने का मौका था, सूट और छोटी सी टाई पहनकर। लेकिन बस वही था। वही इकलौता वक़्त था जब हम कभी चर्च गए थे, और वो इसलिए नहीं कि हमारा परिवार ईश्वर को ढूँढ रहा था; वो इसलिए था क्योंकि वहाँ करने को और कुछ नहीं था। मैंने इस्लाम के बारे में कभी नहीं सुना था। हाई स्कूल में आने से पहले मैंने मुसलमानों के बारे में भी कभी नहीं सुना था। वो 9/11 की घटना थी जब पहली बार मैंने मुसलमानों के बारे में सुना। और मेरे पूरे हाई स्कूल के सालों के दौरान, मध्य पूर्व (Middle East) में 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' चल रहा था, और इस्लाम के बारे में मेरी समझ उसी चीज़ को दिमाग में भरने से बनी थी। जब आप ऐसे माहौल में बड़े होते हैं, तो आप बहुत सारे पूर्वाग्रह, नस्लवाद, और इस तरह की सभी चीज़ों का सामना करते हैं। और फिर उस बिंदु से, एक बहुत लंबी यात्रा शुरू होती है। खोजबीन की, दुनिया भर में घूमने की और आस्था (faith) को समझने की। और फिर बाद में, 20 साल की उम्र की शुरुआत में, मैंने असल में इस्लाम को जाना। जैसे मेरे हाई स्कूल के शुरुआती सालों में, शायद 2003 के आसपास, हमारे शहर में खतरनाक नशीली दवाओं का दौर आया, और इसने हमारे शहर को बर्बाद कर दिया। मेरी ज़िंदगी में ऐसी कई घटनाएँ हैं जहाँ लोग ड्रग्स की वजह से मर गए, जिनको चाकू मारा गया, क़त्ल हुआ, जेल गए, और बस ये सब चीज़ें…

जो सिर्फ तबाही लाती हैं। आपको पता है, जब मैं 17 साल का था, मैं वैंकूवर में काम करने गया, और एक शुक्रवार की रात मैं वैंकूवर के पूर्वी हिस्से में गया, और मैं हैरान रह गया क्योंकि मुझे लगता है कि यह दुनिया की 'हेरोइन राजधानी' है, वैंकूवर में हेस्टिंग्स और मेन का यह बहुत छोटा सा हिस्सा। मेरे कई ऐसे दोस्त हैं जो ड्रग ओवरडोज़ से मर गए, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली। मेरे बचपन का एक दोस्त, मैंने असल में इसके बारे में कुछ साल पहले सुना था जब मैं वहाँ से चला गया था, वो नहाने गया था, लेकिन वह नशे में था, और वो बाथटब में डूब गया। नया बच्चा, जवान, मेरा मतलब मुझसे शायद दो साल मुश्किल से दो साल बड़ा रहा होगा। जैसा कि मैंने पहले आपसे चर्चा की थी, मेरा एक सबसे करीबी दोस्त, बार–बार जेल जाना, उसने किसी को मार डाला। और अफ़सोस की बात है कि ये सब बातें कोई अनोखी नहीं हैं। आपको पता है, मेरे जीजाजी ने ख़ुदकुशी कर ली। मैंने कुछ साल पहले अपनी बहन को फेंटानिल के ओवरडोज़ से खो दिया। – आपकी बहन?

– जी, मेरी बहन, हाँ!

सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह है कि आप शायद ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल न उठाएं, लेकिन जब आप अपने आस–पास देखते हैं, तो सवाल ज़रूर खड़े होते हैं। मुझे एक घटना याद है, वहाँ सालाना बेसबॉल टूर्नामेंट होता है, और कैंपग्राउंड पर एक रेव पार्टी होती है और वहाँ सिर्फ पार्टियाँ चलती हैं, हर कोई शराब पी रहा होता है। और ख़ास तौर पर एक रात, मैं बस एक ग्रुप से मिलकर आया था, हम साथ बैठे थे, और फिर दूसरा ग्रुप, और तभी मेरा दोस्त आता है और वो खून से लथपथ था। उसे जगह–जगह चाकू मारे गए थे, पूरा खून में भीगा हुआ। और मैं सोच रहा था, "ये क्या हो रहा है?" दूसरे दोस्त के पास गया, वही हाल, उसे भी काटा गया था। ऐसी चीज़ों को देखना और ये न सोचना बहुत मुश्किल है कि, “इसका अंजाम अच्छा नहीं होने वाला।” तब मुझे एहसास होने लगा कि मेरे लिए, मैं आख़िर कहाँ जाकर रुकूँगा?

मेरी कहानी का अंत कैसा होने वाला है? तो मैंने तय कर लिया कि, ठीक है। मुझे शादी करनी है। मुझे नहीं पता कैसे, किससे, या कहाँ, लेकिन मुझे ख़ुद को बदलना होगा। जब मैंने वो फैसला लिया, तो मैंने उन सभी गलत कामों को छोड़ दिया जो मैं कर रहा था और बस अचानक से, मैं उस पूरी ज़िंदगी से दूर चला गया। इस्लाम की तरफ़ आपका सफ़र कैसे शुरू हुआ?

तो, इसकी शुरुआत तब हुई जब मैंने फैसला किया कि मुझे शादी करनी है और मुझे अपने तौर‑तरीके बदलने होंगे, और मैं एक नए शहर में चला गया। मैं बस नौकरी के लिए आवेदन कर रहा था, और मैं ‘फ्यूचर शॉप’ के पास से गुज़रा, एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान, और मैंने सोचा, "चलो, कोशिश करके देखते हैं।" और आखिरकार, तीन महीने बाद, मुझे एक seasonal employee के तौर पर रखा गया, वहाँ मैं अपनी पत्नी से मिला, जो बाद में मेरी जीवनसाथी बनीं, और वो पहली मुस्लिम थी जिससे मैं कभी मिला था। उससे मिलना ऐसा था, जिसने मेरी पूरी समझ को पलट कर रख दिया। है न?

क्योंकि बातचीत की शुरुआत ऐसे हुई, उसने कहा, "मैं एक मुस्लिम हूँ।" और मैं ऐसा था कि, "अच्छा, ये क्या होता है?" और फिर उसने कुछ बातें बताईं। और मैंने कहा, "लेकिन मैं तो इन लोगों के बारे में कुछ और ही मानता हूँ।" और उसने कहा, "नहीं, नहीं, तुम पूरी तरह ग़लत हो।" और यहीं पर इस्लाम के बारे में मेरी समझ और एक असली मुसलमान से सामना हुआ जो उसे जी रहा था। उसके पिता वहाँ मुस्लिम एसोसिएशन के प्रमुख थे उस शहर में जहाँ मैं गया था। और उसी चीज़ ने मुझे असल में उकसाया क्योंकि मैं ख़ुद को एक जाहिल इंसान समझना पसंद नहीं करता या जब आप मेरे सामने तथ्य लाएँ तो मैं आपसे बहस करूँ तथ्यों को झुठलाने के लिए, भले ही वो सच हों। तो इसी चीज़ ने शुरुआत में मेरे सफ़र को चिंगारी दी इस पश्चिमी मीडिया की ‘प्रोपेगेंडा मशीन’ को समझने की कोशिश में जो 2001 से मेरे दिमाग में बातें भर रही थी। तो यह कई सालों की बमबारी थी, और वो सब जो उन दिनों फ़िलिस्तीन में हुआ, इराक में, और अफ़गानिस्तान में, और सामान्य तौर पर। तो ऐसा था कि, मैं यह मानता हूँ, या कम से कम मुझे यह बताया और सिखाया गया था दिमाग में भरा गया था, और यह महिला जिसके पास प्रत्यक्ष अनुभव है वो मुझे बता रही है कि मैं पूरी तरह ग़लत हूँ। तो यहीं से वो सफ़र असल में शुरू हुआ। उस शुरुआती बातचीत के दौरान, हमने क़रीब तीन घंटे तक बात की। मैं इस बात से हैरान था कि, वो कभी किसी पार्टी में नहीं गई थी, उसने कभी सिगरेट नहीं पी थी, उसने कभी शराब नहीं पी थी, उसका कभी कोई बॉयफ़्रेंड नहीं था। ये सारी बातें, ये सारे विचार मेरे लिए बिल्कुल अजनबी थे। और मैंने कहा, "ये कैसे मुमकिन है?" और उसने बस इतना कहा, "यही मेरा ईमान है। इसी तरह मेरी परवरिश हुई है, मेरी संस्कृति और मेरा ईमान," यानी मुस्लिम संस्कृति और मुस्लिम ईमान। और मैं मंत्रमुग्ध हो गया था। जैसे, मैं इसे अपनी आँखों से देख रहा था, और मेरे लिए, मैंने सोच लिया था, "बस यही है। यही वो लड़की है। यही वो है।" उसी रात। हमारी वो बातचीत हुई, और फिर जैसे ही मैंने इस बारे में जानना शुरू किया चीज़ें थोड़ी धुंधली हो गईं सब कुछ समझने की कोशिश में; यह बहुत मुश्किल था। और मुझे एक डीवीडी मिली, मुझे नहीं पता कि आप जानते हैं या नहीं, अमेरिका के शेख ख़ालिद यासीन की, "द पर्पस ऑफ़ लाइफ़" (जीवन का उद्देश्य)। उस लेक्चर ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। मैंने उसे बार‑बार सुना, और मैं बस हैरान था कि वो सचमुच, जैसा कि मैंने संक्षेप में बताया, उन सभी समस्याओं का जवाब और समाधान दे रहे हैं जिनकी हम यहाँ पश्चिम में शिकायत करते रहते हैं कि इनका कोई हल ही नहीं है। वे सचमुच आपको इसका blueprint दे रहे हैं। लेकिन शुरुआत में, उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मेरे दिमाग में छप गया, और वो ये कि यह पानी के एक गिलास जैसा है। आपका दिल पानी के गिलास की तरह एक बर्तन है। अगर आप उस गिलास को उल्टा कर दें, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना पानी डालते हैं; आप उसे कभी नहीं भर पाएंगे। लेकिन एक बार जब आप ख़ुद को खोलते हैं, तब आप इसे भर सकते हैं। वो क्या बात थी जिसने आपको यह कहने पर मजबूर किया कि, "ठीक है, मैं मुस्लिम बनने जा रहा हूँ, बस बहुत हुआ, मैं अब यह क़दम उठा रहा हूँ?" तो आख़िरकार आपने वो छलांग क्यों लगाई?

मुझे लगता है, यह एहसास कि...

यह किताब यानि क़ुरआन बदली नहीं है। लेकिन इसमें वे सारे जवाब मौजूद हैं। आपको याद है मैंने कहा था कि मेरा मानना था कि अगर ख़ुदा सच में है, तो वो हमें बिना किसी निर्देश के नहीं छोड़ेगा। और एक बार जब मैंने क़ुरआन को एक ऐसी किताब के रूप में समझा जिसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है, तब मुझे सचमुच यह एहसास हुआ कि, बाक़ी धार्मिक किताबों के मुक़ाबले—और मैंने अलग‑अलग धर्मों का थोड़ा अध्ययन किया है। और जब आप ख़ुद क़ुरआन को देखते हैं, जैसे इस किताब को लीजिए और गायब कर दीजिए। इससे सचमुच कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आप इसे एक दिन के अंदर, शब्द‑ब‑शब्द, बिल्कुल वैसे ही दोबारा तैयार कर सकते हैं, उसी लहज़े में जैसा यह 1400 साल पहले Oral Transmission के ज़रिए थ। तो यह, यह मेरे लिए वास्तव में एक महत्वपूर्ण वजह थी। और फिर मैंने सोचा, ठीक है, अब कोई रास्ता नहीं है कि मैं...

आपके कलमा पढ़ने का पल कैसा था? क्या आप बता सकते हैं आपको कैसा महसूस हुआ?

वह डराने वाला था। तो, भाइयों के नमाज़ पूरी करने के बाद, उन्होंने कहा, दरअसल हम अंदर गए, और वहाँ शायद 30 लोग थे। तो मैं वहाँ बैठा हूँ, मैं 22‑23 साल का लड़का। और वहाँ 30 लोग बैठे हैं जो बस मुझे देख रहे हैं। मैं सोच रहा था, "यह अजीब है।" और इमाम साहब ने मुझसे पूछा, "क्या आपका कोई सवाल है जिसमें हम आपकी मदद कर सकें?" और वो सब देखने के बाद, मैंने कहा, "मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं।" मैंने कहा, "लेकिन मैं जानता हूँ कि मुझे यही होना चाहिए, मैं इसी के लिए बना हूँ।" और मैंने वहीं कलमा पढ़ा, अपने होने वाले ससुर के सामने, मेरे होने वाले सालों के सामने, और एक ऐसे समुदाय के सामने जिसके सामने मैं खड़ा होऊँगा और नमाज़ का नेतृत्व करूँगा। वह बहुत भावुक पल था। जैसे मेरे दिमाग में हज़ार बातें चल रही थीं, है न?

जैसे मेरा परिवार, वे क्या सोचेंगे?

एक नास्तिक नज़रिए से जो धर्म से नफरत करता था। और जिसके दिमाग में बातें भरी गई थीं। मुझसे भी बदतर। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। सच कहूँ तो, जैसे‑जैसे आप देखते हैं, सीखते हैं, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के संघर्षों को और उनके जीवन और उन सब चीज़ों को जिनसे उन्हें गुज़रना पड़ा। हम सभी के संघर्ष हैं। हम सभी के पास मुश्किलें और परेशानियाँ और इम्तिहान हैं। और फिर कुछ साल बीत गए जहाँ मैं सचमुच संघर्ष कर रहा था एक नए मुस्लिम के रूप में, कोई माहौल नहीं था। जब तक कि भाइयों में से एक ने, दरअसल वही भाई जिसने वो अज़ान दी थी उन्होंने मुझे उनके साथ तीन दिनों के लिए इधर‑उधर जाने के लिए आमंत्रित किया। और तब मैं सच में अपने आस‑पास मुसलमानों के साथ अभ्यास करने में सक्षम हो पाया और सवाल पूछने और सही तरीके से नमाज़ पढ़ना सीखने में और यह सब करना सीखने में सक्षम हुआ। और यहीं से वह यात्रा शुरू हुई। और फिर, ख़ुद पर काम करने में सक्षम होना, दीन को सीखना। मैं वहाँ से घर गया, उन चार महीनों के बाद, और मैं 3–4 साल के लिए मस्जिद में इमाम बना, चर्च के लोगों को लेक्चर देना, स्कूल बोर्ड के लोग आते थे, जुमे की नमाज़ के लिए ख़ुतबा और ये सब चीज़ें। और तब यह सब वास्तव में समझ में आने लगा। यह अद्भुत है। और अब आपकी होने वाली पत्नी के साथ उस कहानी पर वापस आते हैं, वो मामला कैसे आगे बढ़ा?

आखिरकार आपकी शादी कैसे हुई? क्या आप हमें उस बारे में बता सकते हैं? हाँ, हाँ। तो, सुबहानअल्लाह। क्या आपने ध्यान दिया? इस वीडियो को देखते समय आपको कोई विज्ञापन नहीं देखना पड़ा। चूँकि ‘टुवर्ड्स इटर्निटी’ एक अलाभकारी संगठन है, हम ये वीडियो सिर्फ आपके समर्थन से बना सकते हैं। अगर आप इस नेक काम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो ‘टुवर्ड्स इटर्निटी’ को दान दें और इस सुनहरे अवसर को न गँवाएँ। और अब आपकी होने वाली पत्नी के साथ उस कहानी पर वापस आते हैं, वो मामला कैसे आगे बढ़ा? आखिरकार आपकी शादी कैसे हुई? क्या आप हमें उस बारे में बता सकते हैं?

हाँ, हाँ। तो, सुबहानअल्लाह। थोड़ा पीछे चलते हैं। तो पहली बार जब मैं उस इमारत में गया, जो ट्रेनिंग के लिए थी, उनसे मिलने से तीन महीने पहले, मैंने उन्हें देखा था। और मैंने सोचा, "वाह, वो खूबसूरत है।" ठीक है?

लेकिन फिर मैंने तीन महीने तक उनसे बात नहीं की। और फिर जब हमने बात की, तो ज़ाहिर तौर पर एक स्पष्ट जुड़ाव था—मेरा मतलब बाद में, साथ काम करते हुए और बातचीत करते हुए। जिस रात हम मिले, मैंने उनसे कहा, मुझे नहीं पता, मैंने यह बात शेयर की है तो बता सकता हूँ, उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम के तौर पर, हम मानते हैं कि सब कुछ एक कारण से होता है। यह खुदा की मर्ज़ी है। उन्होंने कहा, "मुझे हैरानी है कि यह, हमारा मिलना," उन्होंने कहा, "मैं सोच रही हूँ कि इसका क्या मक़सद है।" और मैंने कहा, "ख़ैर, यह इसलिए है क्योंकि हमारी शादी होनी है और हमारे बहुत सारे बच्चे होने वाले हैं।" मैं थोड़ा सा बेबाक था। मैं थोड़ा मुँहफट था। – बिल्कुल पहली मुलाकात में?

हाँ, हाँ। पहली बार जब मैंने उनसे बात की थी। और वो थोड़ा हँसी और बोलीं, "वाह, यह अजीब है।" और हाँ, तो वो भाई जिसने अज़ान दी थी जिससे मेरे आँसू आ गए थे। वो दरअसल उनके और उनके माता‑पिता के पारिवारिक मित्र थे, और वो मेरे Mentor बन गए। तो वो मेरी तरफ से रिश्ता लेकर गए, और जवाब था ‘बिल्कुल नहीं’। इस बारे में दोबारा बात भी मत करना। नहीं। – सीधा इनकार? – सीधा इनकार। बिल्कुल नहीं। तो हमारे मिलने के समय से पाँच साल लग गए जब तक कि मैं पाकिस्तान से वापस नहीं आ गया। और हम वापस गए, और फिर वही बात, वो मेरी तरफ से परिवार को प्रस्ताव देने गए, और इस बार तो और भी सख़्त ‘ना’ सुनने को मिली। ऐसा था कि, "नहीं। मेरे सामने इस बात का ज़िक्र भी मत करना। बिल्कुल नहीं।" – वो कौन थे? मतलब...

– मेरी सास। मेरे ससुर मुझे बहुत मानते थे क्योंकि वो मस्जिद में मेरे पीछे नमाज़ पढ़ते थे। उन्होंने मेरे ख़ुतबे सुने थे और वो वहाँ मौजूद थे। तो वो मुझे काफ़ी अच्छे से जानते थे और उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन जब माँ ने ना कह दिया, तो ना हो गई। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि आपकी सास की राय बदल गई?

तो यही खूबसूरती है, जैसा कि हम अंग्रेज़ी में कहते हैं कि- The lord works in mysterious ways (ईश्वर की लीला अपरंपार है।) यह उन्हीं पलों में से एक है। रमज़ान के आख़िरी दस दिन थे। मैं मस्जिद में एतिकाफ़ में था। और वे पूरा परिवार मिलकर तरावीह की नमाज़ के लिए आते थे। और मैं अज़ान देता था क्योंकि हमारे पास एक इमाम, हाफ़िज़ जी आए हुए थे, तरावीह पढ़ाने के लिए। तो अज़ान मैं देता था, और उन्हें यह बहुत पसंद आई। उन्हें नहीं पता था कि यह आवाज़ किसकी है, लेकिन यह मैं ही था। वे घर गए, और मेरी सास ने मेरे ससुर से पूछा, उन्होंने कहा, "यह व्यक्ति कौन है जो तक़रीर कर रहा है और इतनी अच्छी अज़ान दे रहा है?" और वह बोले, "वह वही है जिसे आपने 'ना' कहा हुआ है।" और वह बोलीं, "क्या?", "सच में?" और क़ुरआन की एक आयत थी जिसे वह पढ़ रही थीं, अगर मैं ठीक याद कर पा रहा हूँ तो, और वह, मुझे excat आयत याद नहीं है पर वह लोगों को न अंकने और उन्हें ख़ुद को साबित करने का एक मौक़ा देने के बारें में था। और उन्होंने बताया कि जब उन्होंने वह पढ़ा, तो सब कुछ बदल गया। अल्लाह ने ही उनका दिल बदल दिया, और यही सच है, क्योंकि अल्लाह ही हमारे दिलों का मालिक है। और एक दिन अचानक, जैसे किसी को इसकी उम्मीद ही नहीं थी, उन्होंने मुझे एक चिट्ठी लिखी और कहा, "अगर आप मेरी बेटी से शादी कर लें तो मुझे बहुत खुशी होगी।" और मैंने कहा, "क्या?" और बकरीद में हमारी शादी हो गई। आपके परिवार और आस‑पास के लोगों ने धर्म परिवर्तन पर कैसी प्रतिक्रिया दी?

हाँ। तो जब मैं मुसलमान बनी, तो मेरा एक भाई है जिसे विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है और मेरी दो बड़ी बहनें हैं, जिनमें से एक का निधन हो गया है। लेकिन जब मैं मुसलमान बना तो मेरी बहनो के लिए ये ऐसा था मानो - "तुम क्या हो?" तुम हम में से नहीं हो। और इसलिए हम एक दूसरे के आस-पास नहीं रहते थे, और इसलिए हम काफी हद तक एक दूसरे से अलग-थलग थे। तो मैंने कुछ साल ऐसे बिताए कि जब वे मिलने आते थे तो मैं अपना जा-नमाज छोड़ देता था। या अगर मेरे पास क़ुरान वग़ैरह होती थी तो उसे भी... तो कुछ समय बाद आखिरकार मैंने कहा कि...

मैं फोन पर बात कर रहा था, मुझे ठीक से याद नहीं है कि किस संदर्भ में बात हो रही थी। मुझे पूरा यकीन है कि हम किसी बात पर बहस कर रहे थे। हो सकता है कि बात कुछ और हो - इस पर मुझे quote मत कीजिएगा। लेकिन हो सकता है कि मेरी माँ को क्रिसमस पर न आने के बारे में पता हो। मुझे लगता है कि ऐसा ही होगा।, और फिर मैंने कहा, मैं एक मुसलमान हूँ। यह मेरे लिए नहीं है। और फिर उनका जवाब तो बिलकुल classic था। और वो बोली, तुम्हें क्या लगता है हम बेवकूफ हैं? तो, मेरे लिए, ऐसा है जैसे मिशन पूरा हो गया, है ना?

माँ, अगर आप देख रही हैं, तो बस इतना कहना चाहती हूँ कि हमारी इस बारे में बातचीत हो चुकी है। अब आपकी बारी है। मेरे और मेरे पिताजी के बीच कुछ बार बहस भी हुई थी। लेकिन सबसे बड़ी बात तो तब हुई जब मैंने अपना नाम बदला, तब ऐसा लगा जैसे, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? क्योंकि मैं सबसे छोटा बेटा हूँ। जैसे कि मैं अपनी पारिवारिक पीढ़ी में आखिरी व्यक्ति हूं। यानी मेरा नाम मुझपर ही समाप्त होता है। अगर मेरा बेटा नहीं हुआ तो वह नाम आगे नहीं बढ़ेगा। तो फिर यह 'मुहम्मद विलियम सालेह' हो गया। इस्लाम की किस बात ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया?

इस्लाम की जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, शुरुआत में मैं कहूंगा, वो है मुसलमानों की एकता। जब मैंने कलमा पड़ा था, तो वहां दुनिया भर से आए भाइयों का एक ग्रुप था, वे हमारे शहर में थे, बहुत ही खूबसूरत माहौल था। मेरे मन में कुछ सवाल थे, और मेरी पत्नी के पिता, जो मस्जिद एसोसिएशन के हेड थे। उन्होंने उन लोगों से संपर्क किया था और फिर मुझे वहां बुलाया। तो मैं वहां गया, और भाइयों ने कहा, "ठीक है, अब हम नमाज़ पढ़ने जा रहे हैं।" तभी अज़ान हुई, और मैं मज़ाक नहीं कर रहा, बस मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। ज़ाहिर है मुझे उसका मतलब समझ नहीं आ रहा था, पर वो सीधे मेरे दिल को छू गई। फिर मैंने उन सबको एक साथ नमाज़ पढ़ते देखा। वहां पाकिस्तानी थे, अफ्रीकी थे और मैं एक गोरा आदमी वहां बैठा था, वहां हर रंग और नस्ल के लोग थे, अलग भाषाएं, सब कुछ अलग। लेकिन वे सब एक साथ मिलकर नमाज़ पढ़ रहे थे। वो मेरे लिए पहली और सबसे बड़ी बात थी। और जब मैंने यह एकता देखी, जो रंग पर आधारित नहीं थी, सच तो ये है कि किसी के दिमाग में दूर-दूर तक ये बात नहीं थी कि आपका रंग क्या है या आप कहाँ से हैं। बस वो एकता का एहसास था कि आप कहाँ से हैं, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अगर आप मुसलमान न बनते, तो अभी आप क्या कर रहे होते?

आप किस तरह के हालात में होते? ओह। मर चुका होता या जेल में होता। -सच में? -हाँ। यह दुखद है, लेकिन जब मैं अपने माहौल को देखता हूँ, अपने आस-पास के हालात, दोस्तों और अपनी संस्कृति को देखता हूँ। तो जिस माहौल और हालत में मैं पला-बढ़ा और जो मेरे साथ के लोगों की स्थिति थी, मुझे नहीं लगता कि मेरे लिए कुछ अच्छा होता। पैगंबर अलैहिस्सलाम की किस बात ने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?

सुबहानअल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम। यह एक लोडेड प्रश्न है। मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित ये बात करती है कि जब मैं उन्हें एक मिसाल के तौर पर देखता हूँ, तो मुझे समझ आता है कि अपनी मुश्किलों और तकलीफों का सामना कैसे करना है। कुछ साल पहले हमारी एक संतान का निधन हो गया था। और मैं कहूंगा कि एक पिता के तौर पर मेरे लिए शायद सबसे कठिन काम था, घर आकर अपने बच्चों को ये बताना कि उनका भाई या बहन अब इस दुनिया में नहीं है। आज भी ये बात मेरी आँखों में आँसू ला देती है, मेरा दिल छलनी हो जाता है। अपने लिए उतना नहीं, जितना बच्चों के reactions देखकर। और फिर मैं उस इंसान को देखता हूँ जिसने अपनी ज़िंदगी में एक को छोड़कर अपनी सारी संतानें खो दीं। मैं उस शख्स को देखता हूँ जिसके अपने परिवार वाले उसके खिलाफ हो गए, उसे मारने की कोशिश की, उसका सामाजिक बहिष्कार किया, उसे भूखा रखा। उनकी ज़िंदगी में कठिनाइयों के दौर में ये सब कुछ हुआ। और फिर भी वे अडिग रहे। फिर भी वे अपनी नमाज़ पढ़ते रहे। रमज़ान के महीने में रोज़े रखे। ऐसी कोई भी मुश्किल नहीं थी जो उनके सब्र से बड़ी हो। तो माता-पिता के रूप में, मुसलमानों के रूप में, और इंसानों के रूप में, जब हम उनके उस बेमिसाल हौसले और मज़बूती को देखते हैं, और उस अटूट यक़ीन को जो उन्हें इस्लाम के पैग़ाम पर था। इन सबके बाद, मक्का की फतह हुई, वे वापस घर लौटे और आकर कहा, "आज का दिन रहम का दिन है। हम यहाँ लड़ने या जान लेने नहीं आए हैं। हमारा मक़सद ये नहीं है।" तो जब मैं उनकी तरफ देखता हूँ, तो मुझे एक ऐसी मिसाल मिलती है जिस पर हम चल सकें और जिससे सुकून पा सकें। जब हम उनकी उन मुश्किलों को देखते हैं। अगर आपको दुनिया की पूरी गैर-मुस्लिम आबादी से बात करने का मौका मिले, तो आप उनसे चंद पलों में क्या कहना चाहेंगे?

मैं कहूंगा कि जिन समस्याओं से आप जूझ रहे हैं, आप जिन संघर्षों से गुज़र रहे हैं, उनका एक समाधान है। और बदकिस्मती से, वो समाधान जानबूझकर आपसे छिपाया जा रहा है, उन लोगों द्वारा जो नहीं चाहते कि आप सच को जानें। वे इसलिए नहीं चाहते कि आप सच जानें क्योंकि अगर आपने जान लिया, तो आप उनके बनाए हुए इस सिस्टम पर निर्भर नहीं रहेंगे। आप खुद को इस "मैट्रिक्स" (मायाजाल) से आज़ाद कर लेंगे। आप अपनी समझ और अपनी ज़िंदगी के मक़सद को लेकर खुद को स्वतंत्र कर लेंगे। कि हमारा एक मक़सद है। और हमारा मक़सद इन जालों में फंसना नहीं है कि हम बस उस मशीन का हिस्सा बन जाएं जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को तबाह कर देती है। आपका मक़सद इससे कहीं बड़ा है। और एक बार जब आप इस हक़ीक़त को मान लेते हैं कि मुझे विनम्र होना है, अहंकारी नहीं, तब आप इस्लाम को समझना शुरू करते हैं। तब आपको समझ आने लगता है कि - ज़रा रुको, यही तो मेरी उन तमाम परेशानियों का हल है। केवल मेरी अपनी समस्याओं का नहीं बल्कि आर्थिक समाधान के रूप में, और राजनीतिक स्थितियों के समाधान के रूप में भी। अगर आप इसे समझने के लिए समय निकालें, तो यह उन सभी समस्याओं का जवाब है।
