# रसूलुल्लाह का कैसर और बादशाहों के नाम खत! - हैरानी भरे जवाब - AI विज़ुअलाइज़्ड - ऐ पैग़म्बर | Ep 9

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/epic-conquest-of-khaybar-visualized-by-ai-alis-heroic-fight-o-messenger-ep-9
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=ebeAyx_E7pc
- Channel: Towards Eternity

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अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम ने चार सहाबा को ख़ास तौर पर चुना था। दिह्या अल-क़ल्बी, हातिब इब्न अबी बल्तआ, आमिर इब्न उमय्या, और अब्दुल्लाह इब्न हुज़ाफ़ा। उनमें से हर कोई अपने हाथ में एक ख़त लेकर निकलने वाले थे। लेकिन ये ख़त किसे लिखे गए थे?

उस दौर की बड़ी हुकूमत के हाकिमों को। बाज़न्तीनी सम्राट, हब्शा के राजा, मिस्र के शासक, और फ़ारस के राजा किसरा को। इस्लाम की दावत समेटे हर ख़त को उसे पाने वाले के लिए ख़ास तौर पर लिखा गया था। उन्होंने एक मुहर वाली अँगूठी भी बनवाई थी और उससे सभी ख़तों पर मुहर लगाई। यह वीडियो सीरीज़ भरोसेमंद इस्लामी किताबों के सैकड़ों हवालों पर आधारित है। सभी एआई विज़ुअल्स क़ाबिल मुस्लिम विद्वानों के मशवरे से तैयार किए गए हैं और ये इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ हैं। और इस्लामी उसूलों के बिल्कुल मुताबिक़ हैं। यह 629 ईसवी की शुरुआत का वक़्त था। हिजरत को सात साल बीत चुके थे। अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम का मक़सद इस्लाम का पैग़ाम पूरी दुनिया में फैलाना था। क्योंकि वो ऐसे नबी नहीं थे जिन्हें सिर्फ़ क़ुरैश या अरब के लिए भेजा गया हो; उन्हें पूरी इंसानियत के लिए भेजा गया था। इसलिए ख़त लिखे गए और जिन सहाबा को दूत बनाया गया था वे उन्हें पहुँचाने के लिए निकल पड़े। अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम ने दिह्या अल-क़ल्बी को बाज़न्तीनी साम्राज्य की तरफ़ भेजा। महल में आपका स्वागत है। जब वे वहाँ पहुँचे, तो गवर्नर ने उनका स्वागत किया और फिर उन्हें सम्राट हिरक़्ल के सामने ले जाया गया। सम्राट ने ख़त लिया और उसे ज़ोर से पढ़ने का हुक्म दिया। "हमें सुनाओ।" ख़त सुनते हुए, उन्हें अपनी मुक़द्दस किताबों में लिखी बातें याद आने लगीं। उन किताबों में भविष्य में आने वाले एक नबी की ख़ुशख़बरी दी गई थी और उनकी ख़ूबियों को बयान किया गया था। और अब, नबूवत का दावा करने वाले किसी शख़्स ने उन्हें एक ख़त भेजा था। क्या ये वही हो सकते हैं जिनका उन्हें इंतज़ार था?

इस बात ने उन्हें गहरी सोच में डाल दिया। "कृपया आराम करें। आप सफ़र से थक गए होंगे।" फिर उन्होंने दो अहम काम किए। पहला, उन्होंने अपने क़रीबी दोस्त, बाज़न्तीनी पादरी, दग़ातिर अल-उस्क़ुफ़ को को एक ख़त लिखा, उन्हें उनकी सलाह पर भरोसा था, इसलिए उन्होंने उन्हें पूरी बात समझाई और उनकी राय माँगी। और दूसरा, उन्होंने अपने आदमियों को हुक्म दिया: "जाओ और देखो कि नबी होने का दावा करने वाले इस शख़्स के क़बीले का कोई आदमी यहाँ मौजूद है या नहीं।" कुछ ही देर बाद, पादरी ने अपना जवाब भेज दिया। लेकिन उन्होंने क्या लिखा था?

हम उस पर थोड़ी देर में बात करेंगे। लेकिन पहले, आइए एक जाने-पहचाने नाम, अबू सुफ़ियान के साथ सम्राट की बातचीत पर नज़र डालते हैं हाँ, अबू सुफ़ियान व्यापार के सिलसिले में उसी इलाक़े में आए हुए थे। जब सिपाहियों ने उन्हें बाज़ार में देखा, तो वे उन्हें उनके साथियों के साथ सम्राट के पास ले आए। उन्हें इल्या के चर्च में ले जाया गया। फिर हिरक़्ल ने उन्हें दरबार में बुलाया। "महाराज।" उनके आस-पास रोम के सभी बड़े अधिकारी और मज़हबी रहनुमा मौजूद थे। सम्राट ने पूछा: "तुममें से कौन ख़ानदानी तौर पर नबूवत का दावा करने वाले उस शख़्स के ज़्यादा क़रीब है?" "मैं उनका सबसे क़रीबी रिश्तेदार हूँ।" "इन्हें मेरे क़रीब लाओ, और इनके साथियों को इनके पीछे खड़ा कर दो। मैं इनसे उस शख़्स के बारे में कुछ सवाल पूछने जा रहा हूँ। अगर ये मुझसे झूठ बोलें, तो तुम फ़ौरन इनकी सच्चाई बता देना।" इस तरकीब से, अबू सुफ़ियान के लिए झूठ बोलना मुमकिन नहीं था। फिर हिरक़्ल ने उनसे सवाल पूछने शुरू किए। "तुम लोगों में उनके ख़ानदान का रुतबा कैसा है?" "वे हमारे बीच एक बहुत इज़्ज़तदार ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं।" "क्या तुमने इससे पहले कभी उन पर झूठ बोलने का इल्ज़ाम लगाया है?" "नहीं।" "उनकी पैरवी कौन करता है?

अमीर लोग या ग़रीब?" "उनकी पैरवी ग़रीब और कमज़ोर लोग करते हैं।" "उनके माननेवालों की संख्या बढ़ रही है या घट रही है?" "वे बढ़ रहे हैं।" अबू सुफ़ियान इन सवालों के पीछे की वजह नहीं समझ पा रहा था, लेकिन हर सवाल का एक ख़ास मक़सद था। "क्या तुमने कभी उनके ख़िलाफ़ जंग लड़ी है?" "हाँ, हमने लड़ी है।" "उसका नतीजा क्या रहा?" "कभी वे जीते, और कभी हम जीते।" "वे तुम्हें क्या करने का हुक्म देते हैं?" "वे हमें हुक्म देते हैं कि हम सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें और किसी को उनका शरीक न बनाएँ। वे हमें उन बुतों को पूजने से रोकते हैं जिन्हें हमारे पूर्वज पूजते थे। वे हमें नमाज़ पढ़ने, सच बोलने, सदाचारी रहने, और अपने रिश्तेदारों के साथ अच्छे संबंध रखने का हुक्म देते हैं।" "तुमने जो भी बातें बताई हैं वे सब एक नबी की ख़ूबियाँ हैं। अगर तुम्हारी बात सच है, तो वे जल्द ही मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन पर हुकूमत करेंगे। मैं पहले से जानता था कि एक नबी आने वाले हैं, लेकिन मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि वो तुम लोगों में से होंगे।" और बिल्कुल ऐसा ही होने वाला था। हिरक़्ल को अब यक़ीन हो गया था कि इंजील और तौरात में जिस नबी की भविष्यवाणी की गई थी वो नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ही हैं। जब उन्होंने अपनी बात ख़त्म की, तो कमरे में आवाज़ें गूँजने लगीं। बड़े अधिकारी आपस में बात करने लगे, और शोर बढ़ता ही चला गया। अबू सुफ़ियान और उनके साथियों कोफ़ौरन बाहर ले जाया गया। "यह मामला इतना बड़ा हो गया है, कि रोम का सम्राट भी उनसे डरने लगा है।" हिरक़्ल बाद में इस्लाम क़ुबूल कर लेंगे, लेकिन हुकूमत छिन जाने के डर से अपना ईमान छुपा कर रखेंगे। लेकिन उस ख़त का क्या हुआ जो उन्होंने अपने दोस्त पादरी को भेजा था?

जवाब आ चुका था। अपने ख़त में, दग़ातिर ने लिखा था कि अल्लाह के रसूल वाक़ई एक नबी हैं। फिर सम्राट ने दिह्या से कहा कि वे पादरी के पास भी जाएँ और उन्हें इस्लाम की दावत दें। पादरी का जवाब और उनके साथ जो होने वाला था, वह वाक़ई चौंकाने वाला था। "अपने नबी के पास वापस जाओ, उन्हें मेरा सलाम कहना, और उनसे कहना कि मैं ईमान लाया हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। और मैं गवाही देता हूँ कि ईसा अल्लाह के बंदे हैं।" फिर पादरी अपने कमरे में गए, अपना काला लिबास उतारा, और अपना सफ़ेद मज़हबी लिबास पहन लिया। उन्होंने अपनी छड़ी ली और उन लोगों के सामने खड़े हो गए जो चर्च में जमा हुए थे। अब सच का ऐलान करने का वक़्त आ गया था। "ऐ रोम वासियों!

हमें अहमद नाम के एक नबी का ख़त मिला है। उसमें, उन्होंने हमें अल्लाह पर ईमान लाने की दावत दी है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है, और अहमद उनके बंदे और रसूल हैं।" यह सुनकर, भीड़ भड़क उठी। "यह कैसे मुमकिन है?!

तुमने अपने पूर्वजों का दीन छोड़ दिया!" वे दग़ातिर पर टूट पड़े और उन्हें इतना मारा कि वो शहीद हो गए। अल्लाह उन पर रहम फ़रमाए। एक और हुक्मरान जिन्हें ख़त भेजा गया था वो थे हब्शा के राजा नजाशी। आमिर इब्न उमय्या ने वह ख़त पहुँचाया। अगर आपको याद हो, जब मुसलमानों ने हब्शा का वह मुश्किल सफ़र तय किया था, तो नजाशी ने बहुत मेहरबानी से उनका स्वागत किया था। "तुम मेरी ज़मीन पर पूरी तरह सुरक्षित हो।" उन्होंने रसूलुल्लाह का भेजा हुआ ख़त लिया, सम्मान के तौर पर उसे अपनी आँखों से लगाया, उसे चूमा, और अपने माथे पर रखा। फिर उन्होंने अपने एक आदमी को उसे ज़ोर से पढ़ने का हुक्म दिया। ख़त सुनने के बाद, वो अपने सिंहासन से नीचे उतरे, विनम्रता से ज़मीन पर बैठ गए, और कलमा पढ़ा। "अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह, व अशहदु अन्ना मुहम्मदन रसूलुल्लाह (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है, और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं)। अगर मेरे लिए उनके पास जाना मुमकिन होता, तो मैं ज़रूर जाता।" दूत, आमिर इब्न उमय्या की एक और गुज़ारिश थी। "मैं चाहता हूँ कि जो मुसलमान अब भी हब्शा में रह रहे हैं, आप उन्हें मदीना भेज दें।" नजाशी को अल्लाह के रसूल (अलैहिस्सलाम) के दर्शन करने का मौक़ा कभी नहीं मिल पाया, लेकिन सालों तक, उन्होंने उन्हें दे खने वालों की मेज़बानी की थी। और अब, वो उन्हें उनसे दोबारा मिलाने के लिए घर भेज रहे थे। फ़ारस के हुक्मरान, किसरा परवेज़ को भी अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम का एक ख़त मिला था। अब्दुल्लाह इब्न हुज़ाफ़ा फ़ारस पहुँचे और उन्होंने ख़ुद किसरा को नबी अलैहिस्सलाम के इस्लाम की दावत का ख़त दिया। किसरा ने अपने मुंशी से उसे पढ़वाया। "बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर रहीम। अल्लाह के नाम से, जो निहायत मेहरबान, बहुत रहम करने वाले हैं। अल्लाह के रसूल मुहम्मद की तरफ़ से, फ़ारस के सरदार खुसरो के नाम।" किसरा अचानक आग-बबूला हो गया और उसने मुंशी को ख़त पूरा पढ़ने भी नहीं दिया। "यह देखो!

यह शख़्स, जो मेरी प्रजा, मेरे ग़ुलाम से बढ़कर कुछ नहीं है, मुझे ख़त लिखने की जुर्रत करता है और अपना नाम मेरे नाम से पहले लिखता है!" यह कहते हुए, उसने ख़त को फाड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। जब यह ख़बर रसूल अलैहिस्सलाम तक पहुँची, तो उन्होंने अपने हाथ उठाए और अल्लाह से दुआ की कि उन्हें, यानी उसे और उसकी सल्तनत को पूरी तरह टुकड़े-टुकड़े कर दें। अल्लाह ने अपने रसूल की दुआ क़ुबूल फ़रमाई, और कुछ ही वक़्त बाद, किसरा परवेज़ को उसी के बेटे शीरवीह ने छुरा घोंप कर मार डाला। बिल्कुल उस ख़त की तरह उसके भी टुकड़े-टुकड़े हो गए। नबी अलैहिस्सलाम ने उस महीने और दिन की भी सटीक भविष्यवाणी कर दी थी जब वह मारा जाएगा, और बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसा उन्होंने फ़रमाया था। और जहाँ तक उसके साम्राज्य की बात है, उसे साद इब्न अबी वक़्क़ास ने उमर रज़ियल्लाहू अन्हु के दौर-ए-ख़िलाफ़त में पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। मिस्र जाने के लिए जिस दूत को चुना गया, वे हातिब इब्न अबी बल्तआ थे। वो नबी अलैहिस्सलाम का ख़त हुक्मरान, मुक़ौक़िस को पहुँचाने के लिए निकल पड़े। चूँकि मुक़ौक़िस उस वक़्त सिकंदरिया में था, हातिब रज़ियल्लाहू अन्हु ने उससे वहीं मुलाक़ात की और ख़त पेश किया। "बिस्मिल्लाह इर-रहमान इर-रहीम। अल्लाह के बंदे और रसूल मुहम्मद की तरफ़ से, क़िब्तियों के सरदार मुक़ौक़िस के नाम। उन पर सलामती हो जो हिदायत की पैरवी करे। इसके बाद, मैं आपको इस्लाम की दावत देता हूँ। इस्लाम क़ुबूल कर लीजिए और आप सुरक्षित रहेंगे, और अल्लाह आपको दोगुना सवाब देगा। लेकिन अगर आप इस दावत को ठुकराते हैं, तो क़िब्तियों का गुनाह भी आप पर होगा। कह दीजिए: 'ऐ अहल-ए-किताब!

आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है: कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें, और उनके साथ किसी को शरीक न ठहराएँ, और हम अल्लाह को छोड़कर एक-दूसरे को रब न बनाएँ। लेकिन अगर वे मुँह फेर लें, तो कह दीजिए: गवाह रहना कि हम मुसलमान हैं।'" ख़त पढ़े जाने के बाद, मुक़ौक़िस ने दूत, हातिब इब्न अबी बल्तआ की बहुत ख़ातिरदारी की। लेकिन उसने उस वक़्त कुछ नहीं कहा। उसी रात बाद में, उसने हातिब रज़ियल्लाहू अन्हु को अपने पास बुलाया। एक लंबी और तफ़्सीली बातचीत के बाद, मुक़ौक़िस ने कहा: "मैं जानता था कि एक और नबी आने वाले हैं। लेकिन मुझे लगा था कि वे शाम से ज़ाहिर होंगे, क्योंकि पहले के ज़्यादातर नबी वहीं से आए थे। हालाँकि, मैंने मुक़द्दस किताबों में यह भी पाया है कि आख़िरी नबी अरब में ज़ाहिर होंगे, जो तकलीफ़ों और ग़रीबी की ज़मीन है। हमने अल्लाह की किताब में उनकी ख़ूबियाँ लिखी हुई पाई हैं। और उनके ज़ाहिर होने का यही बिल्कुल सही वक़्त है। लेकिन अगर मैं क़िब्तियों को उनकी पैरवी करने को कहूँगा, तो वे मेरी बात नहीं मानेंगे, और मुझसे अपना तख़्त छोड़ा नहीं जाएगा। वे नबी बहुत सी ज़मीनों पर हुकूमत करेंगे, और उनके बाद, उनके सहाबा हमारे शहर के चौराहों तक आएँगे और यहाँ बस जाएँगे। वे आख़िरकार यहाँ के लोगों को हरा देंगे।" वह इस हक़ीक़त को भूल गया कि आख़िरत के इनाम असीमित और कहीं ज़्यादा बेहतर हैं। सूरह अल-क़सस में, अल्लाह हमें याद दिलाता है कि हमारे पास जो कुछ भी है वह दरअसल उन्हीं का दिया हुआ है और वो फ़रमाता है: "और तुम्हें जो कुछ भी दिया गया है, वह तो सांसारिक जीवन की सामग्री और उसकी शोभा के सिवा कुछ नहीं है। लेकिन अल्लाह के पास जो कुछ है वह कहीं बेहतर और हमेशा बाक़ी रहने वाला है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?" तो, हुक्मरानों को ख़त भेजे जा चुके थे, और इस्लाम का पैग़ाम नई ज़मीनों तक फैलाने की जद्दोजहद जारी रहने वाली थी। हालाँकि, इन साहसी क़दमों के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ इतनी आसानी से नहीं बनी थीं। इसके पीछे एक ऐसा समझौता था जिसमें बहुत सब्र की ज़रूरत थी: सुलह हुदैबिया, जो मक्का के मुशरिकों के साथ तय की गई थी। इन खतोंको भेजे जाने से क़रीब आठ से दस महीने पहले की बात है। हर चीज़ की शुरुआत एक ख़्वाब से हुई। उस रात, रसूलुल्लाह ने एक ख़्वाब देखा जिसका पूरे मदीना पर बहुत गहरा असर होने वाला था। अपने ख़्वाब में, वे अपने सहाबा के साथ ख़ाना-ए-काबा की ज़ियारत कर रहे थे, और वो पूरी तरह सुरक्षित थे। वे सब साथ मिलकर मक्का गए थे। सुबह, जब नबी अलैहिस्सलाम ने अपना ख़्वाब सहाबा को सुनाया, तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। क्या तुमने सुना?

रसूलुल्लाह ने एक ख़्वाब देखा है! उनके ख़्वाब में, हम मक्का में उमराह कर रहे थे! पूरी हिफ़ाज़त के साथ!" लेकिन महज़ एक ख़्वाब का इतना बड़ा असर क्यों हुआ?

क्योंकि नबियों के ख़्वाब भी एक प्रकार की वही होते हैं। तो इसे एक ऐसी बात माना गया जो अवश्य ही होकर रहेगी। और हर कोई मक्का वापस जाने के ख़्वाब देखने लगे। जुदाई के छः लंबे सालों के बाद, वे आख़िरकार मक्का वापस जा पाएँगे और अल्लाह के घर की ज़ियारत कर पाएँगे। तैयारियाँ फ़ौरन शुरू हो गईं। सोमवार के दिन, 1,400 मुसलमान बड़े जोश के साथ मदीना से निकल पड़े। उन्होंने अपने साथ क़ुर्बानी के लिए 70 ऊँट लिए और सिर्फ़ वही तलवारें लीं जो मुसाफ़िर अपनी हिफ़ाज़त के लिए रखते थे। उनका इरादा जंग का नहीं, बल्कि उमराह करने का था। दूर से देखने पर भी यह साफ़ होना चाहिए था कि उनका लड़ने का कोई इरादा नहीं है। ज़रा सोचिए, वे उन्हीं लोगों की तरफ़ जा रहे थे जिनसे उनकी छः साल से, जंग चल रही थी और वह भी जंग की किसी तैयारी के बग़ैर। कितनी गज़ब की हिम्मत थी!

बाक़ी तमाम अच्छी ख़ूबियों की तरह, उनकी यह हिम्मत भी उनके ईमान से आई थी। जब वे ज़ुल-हुलैफ़ा के इलाक़े में पहुँचे, तो उन्होंने ज़ोहर की नमाज़ पढ़ी। नमाज़ के बाद, रसूलुल्लाह ने सफ़ेद कपड़े के दो टुकड़े पहने, उमराह की नीयत की, और एहराम बाँध लिया। फिर उन्होंने तल्बिया पढ़ना शुरू किया। "लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक (मैं हाज़िर हूँ, ऐ अल्लाह, मैं हाज़िर हूँ)।" सहाबा भी उसी जोश के साथ उनके साथ शामिल हो गए। वे मक्का के और क़रीब होते जा रहे थे। उनका जोश अपनी बुलंदी पर था। इसी बीच, यह ख़बर क़ुरैश तक पहुँच गई। जब उन्होंने सुना कि 1,400 मुसलमान मक्का की तरफ़ आ रहे हैं, तो वे घबरा गए। "क्या तुमने सुना? मुसलमान मक्का की तरफ़ आ रहे हैं! 1,400 मुसलमान!

यह कैसे हो सकता है?" "लेकिन उनके पास हथियार नहीं हैं। हम समझ नहीं पा रहे कि वे क्यों आ रहे हैं।" "तो फिर हमें कुछ करना होगा। फ़ौरन कुछ करो!

वजह चाहे जो भी हो, हम ऐसा नहीं होने दे सकते।" मुशरिकों को अंदाज़ा हो गया था कि यह कोई जंग का मामला नहीं है। यह कुछ अलग बात थी। लेकिन फिर भी, उन्होंने फ़ैसला किया कि वे मुसलमानों को मक्का में नहीं घुसने देंगे। इसलिए उन्होंने ख़ालिद इब्न वलीद की कमान में 200 घुड़सवारों की एक टुकड़ी तैयार की। जब रसूलुल्लाह को क़ुरैश की तैयारियों के बारे में पता चला, तो उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। वे किसी और रास्ते से मक्का में दाख़िल होने का इरादा कर रहे थे। लेकिन उनके रास्ते में एक रुकावट आ गई: उनकी ऊँटनी, क़सवा। याद कीजिए, मदीना हिजरत के आख़िर में, वह एक मैदान में बैठ गई थी और आगे बढ़ने से मना कर दिया था। और अब, जब वे मक्का की सरहद के क़रीब पहुँचे, तो वह फिर बैठ गई। उन्होंने उसे उठाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। सहाबा परेशान हो गए, और उन्होंने कहा: "क़सवा ज़िद्दी हो गई है।" रसूलुल्लाह ने जवाब दिया: "वह ज़िद्दी नहीं हुई है, क्योंकि ज़िद्द करना उसकी आदत नहीं है। बल्कि, उसे उसी ने रोका है जिसने हाथी को रोका था।" उनका मतलब अबरहा के हाथी से था जो काबा पहुँचने की कोशिश कर रहा था। "अल्लाह अपनी मख़लूक़ को जिस तरफ़ भी ले जाए उसमें कोई न कोई हिकमत होती है, और वो उन्हें जिस चीज़ से भी रोके उसमें भलाई होती है।" फिर उन्होंने हुदैबिया नाम की जगह पर एक कुएँ के पास अपना खेमा लगा लिया। उनका वतन, उनकी यादें, उनके घर, और उनके अपने अब बहुत क़रीब थे। लेकिन हर किसी के दिमाग़ में बस एक ही सवाल था: "हमें मक्का में कब जाने दिया जाएगा?" "मुझे नहीं मालूम। लेकिन रसूलुल्लाह बेहतर जानते हैं।" जब मुशरिकों को हालात का पता चला, तो उन्होंने भी फ़ौरन अपना खेमा मुसलमानों के क़रीब लगा लिया। अब दोनों तरफ़ से दूतों का आना-जाना शुरू होने वाला था। मुसलमानों की तरफ़ से पहला दूत क़ुरैश के पास गया और कहा कि वे सिर्फ़ उमराह करने आए हैं और रसूलुल्लाह सुलह चाहते हैं। मुशरिकों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। लेकिन, बुदैल इब्न वरक़ा, जो क़ुरैश का ही एक आदमी था, उसे यह बात सही लगी और वह रसूलुल्लाह से मिलने आया। उसने कहा: "ऐ मुहम्मद, क़ुरैश आपसे जंग करेंगे और आपको काबा जाने से रोकेंगे।" रसूलुल्लाह ने उसे बताया कि वे सिर्फ़ उमराह करने आए हैं। फिर उन्होंने फ़रमाया: "बेशक, जंग ने क़ुरैश को तबाह कर दिया है। अगर वे चाहें, तो हम सुलह कर सकते हैं। लेकिन अब, वो रास्ते से हट जाएँ और मेरे और बैतुल्लाह (अल्लाह के घर) के बीच न आएँ। हमें हमारा उमराह और अपनी क़ुर्बानियाँ करने दें।" दूत आते-जाते रहे, लेकिन वे किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके। आख़िरकार, रसूलुल्लाह ने उस्मान इब्न अफ़्फ़ान को दूत बनाकर भेजने का फ़ैसला किया। उस्मान (रज़ियल्लाहू अन्हु) मक्का में एक बहुत इज़्ज़तदार शख़्स माने जाते थे, और वहाँ उनके रिश्तेदार भी थे, जिसकी वजह से वो इस काम के लिए सबसे उपयुक्त थे। "मैं यहाँ रसूलुल्लाह का मक़सद बताने, और आपको सुलह और इस्लाम की दावत देने आया हूँ।" "जाओ और जिसने तुम्हें भेजा है उससे कह दो कि वो मक्का में कभी दाख़िल नहीं हो सकेंगे और न ही काबा का तवाफ़ कर सकेंगे। लेकिन अगर चाहो, तो तुम ख़ुद तवाफ़ कर सकते हो।" उस्मान ने काबा 13 लंबे सालों से नहीं देखा था। नबूवत के छठे साल में, उन्होंने हब्शा की तरफ़ हिजरत की थी, और हिजरत के बाद, वो मदीना में नबी अलैहिस्सलाम के पास लौट आए थे। इसके बावजूद, उनका जवाब बिल्कुल साफ़ था: "नहीं। अगर रसूलुल्लाह को तवाफ़ करने की इजाज़त नहीं है, तो मैं भी तवाफ़ नहीं करूँगा।" इस जवाब से मुशरिक बहुत गुस्सा हुए, और उन्होंने उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हु को मक्का में बंदी बनाने का फ़ैसला किया। उस्मान को गए तीन दिन हो चुके थे। फिर भी उनकी कोई ख़बर नहीं थी। तभी मुसलमानों के बीच एक अफ़वाह फैलने लगी: "उस्मान को शहीद कर दिया गया है!" वे यूँ ही हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते थे। रसूलुल्लाह के पास अब एक ही रास्ता बचा था: उस्मान की मौत का बदला लेना। उन्होंने बैअत लेने के लिए सहाबा को इकट्ठा किया। वे हर हाल में उनके साथ मिलकर लड़ने की क़सम खाने वाले थे। हालाँकि उनके पास जंग की कोई तैयारी नहीं थी, फिर भी उनमें से हर एक आगे आया, और नबी अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़ कर, उन्होंने बैअत की। "हम मरते दम तक क़ुरैश से लड़ेंगे और दुश्मन से कभी पीठ नहीं दिखाएँगे।" यह बहादुरी भरी घटना इस्लामी इतिहास में बैअत-ए-रिज़वान के नाम से जानी जाएगी। बस एक शख़्स ऐसा बचा था जिसने बैअत नहीं की थी। वो थे उस्मान (रज़ियल्लाहू अन्हु), जिनके बारे में अभी कुछ पता नहीं था। रसूलुल्लाह ने अपना दायाँ हाथ उठाया और फ़रमाया, "यह मेरा हाथ है।" फिर उन्होंने अपना बायाँ हाथ उठाया और फ़रमाया, "और यह उस्मान का हाथ है।" और फिर उन्होंने अपना दायाँ हाथ अपने बाएँ हाथ पर रखा। उसके बाद, वो मुसलमानों की तरफ़ मुड़े और फ़रमाया: "गवाह रहना। यह बैअत उस्मान की तरफ़ से है।" इस बात ने सहाबा का जोश और भी बढ़ा दिया। "हमें उस्मान को आज़ाद करना ही होगा!

वरना मुहम्मद के आदमी मक्का पर हमला कर देंगे!" जब क़ुरैश ने मुसलमानों की उस्मान का बदला लेने की क़सम के बारे में सुना, तो वे घबरा गए और उन्होंने फ़ौरन उन्हें रिहा कर दिया। उनके वापस लौटने सेसभी मुसलमानों और ख़ास तौर पर रसूलुल्लाह को बहुत ख़ुशी हुई। उन्हें ज़िंदा और सही-सलामत देखकर हर किसी के दिल को सुकून और राहत मिली। इस मज़बूत इरादे को देखकर, मुशरिक पीछे हटने पर मजबूर हो गए। उन्होंने सुलह के लिए सुहैल को रसूलुल्लाह के पास भेजने का फ़ैसला किया। जब रसूलुल्लाह ने उसे देखा, तो उन्होंने फ़रमाया: "जो आ रहा है वह सुहैल है। अब तुम्हारा मामला आसान हो गया है।" जब भी क़ुरैश सुलह चाहते हैं, तो वे हमेशा इसी आदमी को भेजते हैं। क़ुरैश अब सुलह के अलावा और कुछ नहीं सोच रहे हैं। सुहैल नबी अलैहिस्सलाम के पास आया और उसने कहा: "ऐ मुहम्मद, मैं क़ुरैश की तरफ़ से आपसे समझौता करने आया हूँ।" रसूलुल्लाह भी हमेशा से यही चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। फिर समझौते की शर्तें लिखने के लिए अली (रज़ियल्लाहू अन्हु) को बुलाया ‏गया। रसूल अलैहिस्सलाम ने उन्हें हिदायत दी: "ऐ अली, लिखो 'बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर रहीम'।" सुहैल ने फ़ौरन एतराज़ किया और कहा: "मैंने यह जुमला कभी नहीं सुना और मैं नहीं जानता कि 'अर-रहमान' का क्या मतलब है। जो हम जानते हैं और अपने समझौतों में इस्तेमाल करते हैं वह है 'बिस्मिका - अल्लाहुम्मा' (आपके नाम से, ऐ अल्लाह)। यही लिखो।" नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "'बिस्मिका - अल्लाहुम्मा' भी ठीक है।" और उसे वैसा ही लिखा गया। फिर रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "ऐ अली, लिखो: 'ये सुलह की वे शर्तें हैं जिन पर मुहम्मद, रसूलुल्लाह, और सुहैल इब्न अम्र ने रज़ामंदी दी है।'" सुहैल ने फिर एतराज़ किया। "अल्लाह की क़सम, अगर हम आपको अल्लाह का रसूल मानते, तो हम आपको काबा जाने सेनहीं रोकते, और न ही आपसे जंग करते। इसके बजाय, 'मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह' लिखो।" रसूल अलैहिस्सलाम ने इसे भी मान लिया और फ़रमाया: "ऐ अली, इसे मिटा दो और 'मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह' लिखो।" अली सदमे से सुन्न रह गए। बाक़ी सहाबा भी इस बात से बहुत बेचैन हुए। अली ने कहा: "अल्लाह की क़सम, मैं 'रसूलुल्लाह' का लक़ब कभी नहीं मिटा सकता। मैं इसे ख़ुद नहीं कर सकता।" रसूल अलैहिस्सलाम ने पूछा कि यह कहाँ लिखा है। जब अली ने उन्हें दिखाया, तो उन्होंने 'रसूलुल्लाह' का लक़ब अपने हाथों से मिटा दिया और अली से कहा कि इसकी जगह "मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह" लिखें। हालात ठीक नहीं चल रहे थे। लेकिन सहाबा को असली सदमा समझौते की पहली शर्त सुनकर लगा। "मुसलमान इस साल मक्का में दाख़िल हुए बग़ैर ही वापस लौट जाएँगे। वे अगले साल उमराह करेंगे। लेकिन वे म्यान में रखी तलवारों के सिवा कोई और हथियार लेकर नहीं आएँगे। और उनका यहाँ ठहरना सिर्फ़ तीन दिनों तक महदूद रहेगा।" जब रसूलुल्लाह ने इसे मान लिया, तो एक गहरी मायूसी छा गई। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर दूसरी शर्त लिखी गई: "दोनों पक्ष दस साल तक एक-दूसरे से जंग नहीं करेंगे।" तीसरी शर्त: "अगर मदीना का कोई शख़्स अपना दीन छोड़कर मक्का लौटता है, तो उसे मुसलमानों को वापस नहीं किया जाएगा। जबकि, अगर मक्का का कोई शख़्स मुसलमान हो जाता है, तो उसे क़ुरैश को वापस कर दिया जाएगा।" मुसलमानों के लिए ये बर्दाश्त से बाहर था। सहाबा ने कहा: "सुबहानअल्लाह!

हम अपने भाई को मुशरिकों के पास कैसे लौटा सकते हैं जबकि वह बतौर मुसलमान हमारे पास आए?" रसूल अलैहिस्सलाम, ने जो हर हाल में सुलह चाहते थे, जवाब दिया: "हाँ। अगर कोई हमें छोड़कर उनके पास जाता है, तो अल्लाह उसे हमसे दूर ही रखें। और जो लोग उनके पास से हमारे पास आएँगे, जिन्हें हम वापस भेज देंगे, यक़ीनन अल्लाह उन सभी को जानता हैं। वो उनके लिए कोई राहत और बाहर निकलने का रास्ता ज़रूर निकालेगा।" चौथी: "अरब क़बीले इस बात के लिए आज़ाद होंगे कि वे जिसके साथ चाहें अपना गठबंधन बना लें।" और समझौता ऐसी ही कुछ और शर्तों के साथ जारी रहा। और इन सख़्त शर्तों के ऊपर, कुछ ऐसा हुआ जिसने उनकी मायूसी को और भी बढ़ा दिया। समझौता लिखा जा चुका था, लेकिन अभी उस पर दस्तख़त नहीं हुए थे। उसी वक़्त, बेड़ियों में अपने पैर घसीटता हुआ एक आदमी गिरते-पड़ते मुसलमानों के खेमे में आ पहुँचा। यह क़ुरैश के दूत सुहैल के बेटे अबू जन्दल थे। उनके पिता ने उन्हें चार साल से क़ैद में रखा हुआ था सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। वो किसी तरह बच निकलने में क़ामयाब हो गए और बड़ी मुश्किल से,वो मुसलमानों तक पहुँचे थे। वो रसूलुल्लाह के पास अपने पिता के ज़ुल्म और सितम से पनाह माँगने आए थे। वो रो रहे थे: "मेरी मदद करो, ऐ मुसलमानों!" जब सुहैल ने यह मंज़र देखा, तो उसका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया। उसने कहा: "ऐ मुहम्मद!

यह हमारे समझौते की बिल्कुल पहली शर्त है। मुझे अपना बेटा वापस चाहिए।" रसूल अलैहिस्सलाम अबू जन्दल को वापस नहीं देना चाहते थे। उन्होंने सुहैल को समझाने की कोशिश की। उन्होंने उसे याद दिलाया कि अभी समझौते पर दस्तख़त नहीं हुए हैं और उससे कहा कि वह उस शर्त को अपने बेटे पर लागू न करे। लेकिन सुहैल ने सख़्ती से मना कर दिया। "जब तक मुझे मेरा बेटा वापस नहीं मिलता, मैं समझौते पर कभी दस्तख़त नहीं करूँगा।" उसी वक़्त, अबू जन्दल रज़ियल्लाहू अन्हु ने दिल चीर देने वाली आवाज़ में पुकारा: "ऐ मुसलमानों! क्या आप मुझे मुशरिकों को लौटा देंगे जबकि मैं मुसलमान होकर आपके पास आया हूँ?

क्या आप नहीं देखते मैंने कितनी तकलीफ़ें झेली हैं?" नबी अलैहिस्सलाम ने अबू जन्दल की तरफ़ देखा और भारी आवाज़ में,उन्होंने फ़रमाया: "थोड़ा और सब्र रखो। तुम जिस ज़ुल्म का सामना कर रहे हो उसे थोड़ा और बर्दाश्त कर लो। अल्लाह से इन तकलीफ़ों के सवाब की उम्मीद रखो। यक़ीनन अल्लाह तुम्हारे लिए और दूसरे बेबस मुसलमानों के लिए भी "राहत और बाहर निकलने का रास्ता बनायेगा "हम उन्हें दिया गया वादा नहीं तोड़ सकते।" इन तसल्ली भरी बातों के साथ, उन्होंने अबू जन्दल को उनके पिता को वापस सौंप दिया। वो असल में आने वाली आज़ादी की ख़ुशख़बरी दे रहे थे। अबू जन्दल और मक्का के सभी मज़लूम मुसलमानों के छुटकारे का एक रास्ता। यह एक ऐसा रास्ता था जो मुशरिकों समझौते में रखी गई, उस ख़ास शर्त पर पछताने पर मजबूर कर देता और तभी सुलह हुदैबिया के पहले नतीजे देखने को मिलने वाले थे। पहली नज़र में, शर्तें पूरी तरह मुसलमानों के ख़िलाफ़ मालूम होती थीं। हालाँकि, रसूलुल्लाह पहले ही उन बड़ी फ़तह को देख पा रहे थे जो इस सुलह के बाद मिलने वाली थीं। लेकिन सहाबा गहरी मायूसी में थे। उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि इन सख़्त शर्तों को क्यों क़ुबूल किया गया था। उस दिन तक, रसूल अलैहिस्सलाम अक्सर अपने सहाबा से मशवरा करते थे और उनकी राय सुनते थे। लेकिन हैरत की बात थी कि, उस दिन उन्होंने किसी से मशवरा नहीं किया, बावजूद इसके कि कोई भी उनसे सहमत नहीं था। वो जानते थे कि अल्लाह की योजना कुछ और है और इसे इसी तरह होना था। अब एहराम खोलने और मदीना वापस लौटने का वक़्त आ गया था। रसूलुल्लाह ने सहाबा को अपने बाल मुंडवाने और अपने जानवरों की क़ुर्बानी देने का हुक्म दिया। आमतौर पर, सहाबा उनका हुक्म मानने में एक-दूसरे से होड़ लगाते थे। लेकिन इस बार, बिल्कुल उल्टा हुआ। हालाँकि नबी अलैहिस्सलाम ने तीन बार अपना हुक्म दोहराया, फिर भी कोई अपनी जगह से नहीं उठा। रसूल अलैहिस्सलाम को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। वो अपनी पत्नी उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा के खेमे में गए और उन्हें बताया कि क्या हुआ है। उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा ने उन्हें एक राय दी। उन्होंने कहा: "ऐ रसूलुल्लाह, अगर आप चाहते हैं कि वे आपका हुक्म मानें, तो बाहर जाइए और बिना किसी से कुछ कहे, अपने जानवर की क़ुर्बानी दीजिए और अपना सिर मुंडवाने के लिए अपने नाई को बुलाइए। जब सहाबा यह देखेंगे, तो वे भी वैसा ही करेंगे।" रसूल अलैहिस्सलाम ने यह मशवरा मान लिया। उन्होंने अपने जानवर की क़ुर्बानी दी और अपना सिर मुंडवा लिया। और जब सहाबा ने यह देखा, तो उन्होंने भी ऐसा ही किया। थोड़ी देर बाद, हवा का एक झोंका आया और उनके कटे हुए बालों को ख़ाना-ए-काबा की तरफ़ उड़ा ले गया। सहाबा ने महसूस किया कि अल्लाह, जिनके हुक्म के बग़ैर हवा का एक झोंका भी नहीं चल सकता, दरअसल उन्हें तसल्ली दे रहा था। इसलिए उन्होंने इसे इस बात का इशारा समझा कि उनका उमराह क़ुबूल हो गया है। दरअसल, सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हु का हिचकिचाना नाफ़रमानी की वजह से बिल्कुल नहीं था। तो फिर इसके पीछे क्या वजह थी?

वे इंतज़ार कर रहे थे, इस उम्मीद में कि शायद कोई वही आ जाए और नबी का फ़ैसला बदल दे। आख़िरकार, उन्होंने ऐसे कई मौक़े देखे थे जहाँ अल्लाह ने अपने रसूल को क़ुरआन में आगाह किया था या उनकी इस्लाह की थी। वे सिर्फ़ इसलिए रुके हुए थे क्योंकि उन्हें लगा कि शायद कोई नई वही आ जाए। लेकिन जैसे ही नबी अलैहिस्सलाम ने अपना एहराम खोला, उन्होंने भी अपना एहराम खोलना शुरू कर दिया। अब मदीना वापस लौटने का वक़्त था। उन्होंने अपना सफ़र बहुत ख़ुशी के साथ शुरू किया था, लेकिन अब, वे ग़म के साथ लौट रहे थे। वे तनाव में थे और बहुत दुखी थे। उन्हें किसी ऐसी चीज़ की सख़्त ज़रूरत थी जिससे उनका हौसला बढ़ सके। और तभी उनके रब ने वह ख़ुशख़बरी भेज दी जिसके लिए वे तरस रहे थे और उनकी सारी उलझन और मायूसी को दूर कर दिया। अचानक, रसूलुल्लाह पर वही नाज़िल होने की निशानियाँ दिखाई देने लगीं। और पूरी सूरह अल-फ़तह एक ही बार में नाज़िल हो गई। "बेशक, हमने तुम्हें एक खुली फ़तह अता कर दी है। यक़ीनन, अल्लाह ने अपने रसूल के ख़्वाब को सच कर दिखाया है। यदि अल्लाह ने चाहा तो तुम अवश्य मस्जिदे हराम (काबा) में अमन के साथ प्रवेश करोगे, अपने सिर के बाल मुड़ाते और कतरवाते हुए, तुम्हें कोई ख़ौफ़ न होगा। वो उस बात को जानता था जो तुम नहीं जानते थे, इसलिए उसने तुमको यह क़रीबी फ़तह अता फ़रमा दी।" उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने पूछा: "ऐ रसूलुल्लाह, क्या यह समझौता वाक़ई एक फ़तह है?" उन्होंने जवाब दिया: "हाँ, अल्लाह की क़सम, यह यक़ीनन एक फ़तह है।" इन शब्दों ने सहाबा के दिलों को बड़ी राहत पहुँचाई। लेकिन वे यह बात वक़्त के साथ ही समझ पायेंगे कि यह समझौता आख़िर कैसे एक फ़तह में बदल जाएगा। अब उन्हें बस इंतज़ार करके देखना था। एक लंबे सफ़र के बाद, वे मदीना वापस लौट आए। रसूलुल्लाह ने मक्का के लोगों के साथ 10 साल तक जंग न करने का एक समझौता कर लिया था। सुलह हुदैबिया को शुरुआत में इस्लाम की हार समझा गया था। लेकिन इसके विपरीत, इससे बिल्कुल हैरान कर देने वाले नतीजे सामने आने वाले थे। ऐसे नतीजे जिनकी न तो क़ुरैश ने उम्मीद की थी, और न ही कभी मुसलमानों ने सोचे थे। क़ुरैश जल्द ही इस समझौते पर पछताने वाले थे और इसकी एक शर्त को ख़त्म करना चाहने वाले थे। क़दम-दर-क़दम, सब कुछ बिल्कुल अल्लाह की योजना के मुताबिक़ होने वाला था। अनपेक्षित दुश्मन...

अप्रत्याशित जीत। आपके ख़्याल में कौन सी फ़तह ज़्यादा बड़ी है? तलवार वाली या क़लम से मिलने वाली फ़तह?

भले ही तलवार से हासिल होने वाली फ़तह ज़्यादा मुश्किल होती है, लेकिन क़लम से मिलने वाली फ़तह कहीं ज़्यादा बड़ी होती है। रसूलुल्लाह यह बात जानते थे। और इसीलिए उन्होंने वह समझौता क़ुबूल किया था। सुलह हुदैबिया क़लम से हासिल की गई तारीख़ की सबसे बड़ी फ़तह में से एक बनने वाली थी कुछ ही वक़्त में, समझौते के पीछे छुपी फ़तह के असली बीज पनपने वाले थे। और उनमें सबसे पहले थे - अबू बसीर, जो मक्का से भागकर मदीना आ गए थे। लेकिन उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका यह भागना न सिर्फ़ उनके अपने लिए, बल्कि दर्जनों दूसरे मुसलमानों के लिए भी बाहर निकलने का रास्ता बन जाएगा। अबू बसीर सक़ीफ़ क़बीले से ताल्लुक़ रखते थे। वो एक बहादुर इंसान थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में ही इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। जब वे मक्का के सख़्त हालात और बर्दाश्त नहीं कर पाए, उन्होंने भागने का रास्ता निकाला और भाइयों से मिलने मदीना चल पड़े। लेकिन मुशरिकों का उन्हें जाने देने का कोई इरादा नहीं था। तीन दिन बाद, क़ुरैश ने अबू बसीर को वापस लाने के लिए दो आदमियों को भेजा। वे रसूलुल्लाह के पास आए और कहा: "हम आपको हमारे साथ किए समझौते की याद दिलाते हैं।" और फिर उन्होंने उनकी वापसी की माँग की। उनके समझौते के मुताबिक़, रसूलुल्लाह को अबू बसीर को वापस भेजना पड़ा। उन्होंने उनसे फ़रमाया: "ऐ अबू बसीर आप जानते हैं कि हमने क़ुरैश के साथ समझौता किया है और उन्हें अपनी ज़ुबान दी है। हमारे दीन में, हम अपना वादा नहीं तोड़ सकते। अल्लाह यक़ीनन आपके लिए और दूसरे बेबस मुसलमानों के लिए भी जो मुशरिकों के बीच फँसे हैं। "राहत और बाहर निकलने का एक रास्ता निकालेगा अबू बसीर ने पूछा: "ऐ रसूलुल्लाह, क्या आप मुझे मुशरिकों को वापस दे रहे हैं ताकि वे मुझ पर ज़ुल्म कर सकें और मुझे अपना दीन छोड़ने पर मजबूर कर सकें?" ज़रा उस बेबसी का अंदाज़ा लगाइए। लेकिन कुछ नहीं किया जा सकता था। तो रसूलुल्लाह ने क्या कहा?

"आप जाइए। अल्लाह यक़ीनन आपके लिए और आप जैसों के लिए रास्ता निकालेगा।" फिर उन्होंने उन्हें आए हुए उन आदमियों के हवाले कर दिया। क़ुरैश के भेजे हुए वे दोनों आदमी अबू बसीर को लेकर मदीना से निकल पड़े। लेकिन अबू बसीर का हार मानने या मक्का वापस जाने का कोई इरादा नहीं था। जब वे ज़ुल-हुलैफ़ा पहुँचे, तो वे आराम करने के लिए रुके। अबू बसीर लगातार भागने के मौक़े की तलाश में थे। पहले, उन्होंने दोस्ताना रवैया अपनाकर उनका भरोसा जीतने का फ़ैसला किया। इसलिए उन्होंने उनसे बातचीत शुरू कर दी। उन्होंने उनमें से एक से कहा: "मुझे लगता है कि तुम्हारी वह तलवार काफ़ी तेज़ है।" "हाँ, यह बहुत तेज़ है।" फिर अबू बसीर रज़ियल्लाहू अन्हु ने बहुत इत्मीनान से पूछा: "क्या मैं इसे देख सकता हूँ?" "ज़रूर, देख लो।" अबू बसीर रज़ियल्लाहू अन्हु को बिल्कुल सही मौक़ा मिल गया था। जैसे ही उन्होंने तलवार छीनी, उन्होंने उस आदमी पर हमला किया और उसे मार डाला। यह देखकर, दूसरा आदमी जितनी तेज़ भाग सकता था उतनी तेज़ वापस मदीना भाग गया। वह सीधा रसूलुल्लाह के पास गया और बोला: "मेरे साथी को मार दिया गया है, और मैं भी बाल-बाल बचा!" जब वह वहाँ था, अबू बसीर रज़ियल्लाहू अन्हु भी आ पहुँचे। उन्होंने कहा: "ऐ रसूलुल्लाह, आपने मुझे उनके हवाले करके अपना वादा पूरा कर दिया, और अब, अल्लाह ने मुझे उनसे बचा लिया है।" रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: "यह शख्स तो जंग की चिंगारी है। अगर इसका कोई साथ देने वाला होता तो ये कुछ भी कर सकता था।" लेकिन फिर भी, समझौते की वजह से अबू बसीर मदीना में नहीं रुक सकते थे। इसलिए वे वहाँ से चले गए और मक्का से शाम जाने वाले रास्ते पर 'ईस' की घाटी में, बस गए। यह जगह उनकी नई पनाहगाह बन गई। जब मक्का में क़ैद मुसलमानों को और अपना ईमान छुपाने वालों को इस बारे में पता चला, तो वे एक-एक करके भागने लगे और अबू बसीर के साथ मिल गए। और उनमें सबसे पहले अबू जन्दल रज़ियल्लाहू अन्हु थे। आपको याद है?

वो सुहैल इब्न अम्र के बेटे थे। सुलह हुदैबिया पर दस्तख़त होने के बाद, वो रसूलुल्लाह के पास आए थे लेकिन उन्हें मुशरिकों को वापस सौंपना पड़ा था। और अब, उन्होंने एक बार फिर बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ लिया था। और जब उन्हें अबू बसीर के ठिकाने के बारे में पता चला, तो वे उनसे जा मिले। थोड़े ही वक़्त में, उनकी तादाद 70 तक पहुँच गई। और जब आस-पास के क़बीलों के दूसरे लोग भी उनमें शामिल हो गए, तो वे 300 हो गए। इस तरह, अबू बसीर ने अपने पास एक ताक़तवर फ़ौज खड़ी कर ली थी। क़ुरैश उन्हें उन्हीं की ज़मीनों पर क़ैद करके ज़ुल्म किया करते थे। लेकिन अब, अबू बसीर और उनके आदमियों ने मुशरिकों को अपने फ़ैसले पर पछतावा कराने की ठान ली थी। क़ुरैश के लिए, शाम की तरफ़ जाने वाले व्यापारिक क़ाफ़िले बहुत अहमियत रखते थे। और अबू बसीर और उनके आदमियों का खेमा बिल्कुल उसी रास्ते पर था। उन्होंने व्यापार का रास्ता काटना और क़ुरैश के क़ाफ़िलों पर हमला करना शुरू कर दिया। अपने हमलों से, उन्होंने मुशरिकों को कमज़ोर करना शुरू कर दिया। क़ुरैश ने अपने ही हाथों यह मुसीबत मोल ले ली थी। अब बात यहाँ तक पहुँच गई थी कि अबू बसीर के आदमियों को और नहीं सँभाल सकते थे। अगर उन्होंने सुलह हुदैबिया में वह शर्त न रखी होती कि "हमारे यहाँ से आपके पास जो भी आदमी आएगा, आप उसे वापस भेज देंगे", तो ऐसा कोई गिरोह कभी नहीं बनता। यहाँ, उस समझौते के पहले नतीजे, जो मुसलमानों के पूरी तरह ख़िलाफ़ मालूम होता था, सामने आने लगे थे। जहाँ तक मदीना के लोगों की बात है, कोई भी मक्का वापस नहीं जाना चाहता था। जब से समझौते पर दस्तख़त हुए थे, तब से उनके और मक्का वालों के बीच कोई टकराव नहीं हुआ था। कुछ वक़्त के लिए हालात शांत थे। लेकिन सिर्फ़ क़ुरैश ही दुश्मन नहीं थे। यहूदियों से भी एक बड़ा ख़तरा था। मदीना से निकाले जाने के बाद, वे ख़ैबर में इकट्ठा हो गए थे। अगर आपको याद हो, तो उन्होंने ही अरब क़बीलों को उन्हें मदीना पर चढ़ाई करने के लिए भड़काया था और ग़ज़वा-ए-ख़ंदक़ की वजह बने थे। यहूदी एक-दूसरे को मदीना पर हमला करने के लिए भड़का रहे थे और एक-दूसरे को जोश दिलाने के लिए तक़रीरें कर रहे थे। रसूलुल्लाह, को ख़ैबर में चल रही कुछ हलचल की ख़बर मिली। इसलिए उन्होंने सूचनाएं जुटाने के लिए अपने कुछ सहाबा को वहाँ भेजा। यहूदी जंग की तैयारी कर रहे थे। हर गुज़रते दिन के साथ, ख़ैबर एक ऐसा ख़तरा बनता जा रहा था जिसका सामना करना जल्द ही बहुत मुश्किल हो जाता। इस ख़तरे को हमेशा के लिए ख़त्म करना ज़रूरी था। अगर क़ुरैश मुसलमानों के लिए अभी भी ख़तरा बने रहते, तो इन हालात से निपटना कहीं ज़्यादा मुश्किल हो जाता। और इसीलिए, अपनी बेहतरीन योजना के माध्यम से, अल्लाह ने अपने रसूल को वह ख़्वाब दिखाया था और उन्हें उमराह की तरफ़ भेजा था। और आख़िर में, सुलह हुदैबिया पर दस्तख़त हुए। और उससे दुश्मनों की तादाद दो से घटकर एक रह गई। मुसलमान अब ख़ैबर की तरफ़ कूच कर सकते थे। रसूलुल्लाह ने कूच करने का फ़ैसला किया और अपने सहाबा को फ़ौरन तैयारी करने का हुक्म दिया। मुस्लिम फ़ौज फ़ौरन जमा हो गई। उनकी संख्या 1,600 तक पहुँच गई, जिसमें 200 घुड़सवार भी शामिल थे। यह सिर्फ़ वे लोग थे जो नबी अलैहिस्सलाम के साथ मदीना से निकल रहे थे। बाद में, दव्स क़बीले के 400 और लोग भी उनके साथ शामिल होने वाले थे। और उनमें मशहूर सहाबी अबू हुरैरा भी थे। यह हिजरत का सातवाँ साल था। मुस्लिम फ़ौज का परचम अली रज़ियल्लाहू अन्हु ने थाम रखा था, और उमर रज़ियल्लाहू अन्हु फ़ौज के दाएँ हिस्से की कमान सँभाल रहे थे। फिर वे राजीअ नाम की एक जगह पर पहुँचे और वहाँ अपना खेमा लगाया। यह ख़ैबर और ग़तफ़ान के इलाक़े के बीच एक अहम स्थान था। रसूलुल्लाह के उस जगह को चुनने की एक वजह थी। ख़ैबर के यहूदियों ने ग़तफ़ान से मदद माँगी थी, और वे मान गए थे। उन्होंने वादा किया था कि ज़रूरत पड़ने पर, वे आएँगे और ख़ैबर के क़िलों के अंदर से मुस्लिम फ़ौज से लड़ेंगे। नबी अलैहिस्सलाम को इन हालात का पता चल गया था। और इस मदद को रोकने के लिए, उन्होंने ग़तफ़ान के सामने एक पेशकश रखी। अगर वे यहूदियों की मदद न करने पर राज़ी हो जाते, तो उन्हें फ़तह के बाद एक साल तक ख़ैबर की खजूरों की पैदावार दी जाती। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तो अपनी फ़ौज को वहाँ तैनात करके, रसूलुल्लाह ने रास्ता रोक दिया ग़तफ़ान से यहूदियों को मिलने वाली किसी भी मुमकिन मदद का रास्ता रोक दिया। फिर रसूल अलैहिस्सलाम अपनी फ़ौज के साथ रजीअ से ख़ैबर की तरफ़ आगे बढ़े। जब वे वहाँ पहुँचे, तो रात हो चुकी थी। चूँकि रात में हमला करना उनका तरीक़ा नहीं था, इसलिए उन्होंने सुबह तक इंतज़ार किया। सूरज निकलने के बाद, बिल्कुल बेख़बर, यहूदी अपने खेतों में जाने के लिए अपने क़िलों से बाहर आए। लेकिन जब उन्होंने मुस्लिम फ़ौज को अपने बिल्कुल सामने देखा, तो वे सन्न रह गए। वे चिल्लाए: "मुहम्मद और उनकी फ़ौज!" और घबराहट में वापस भागकर अपने क़िलों में पनाह ले ली। ‘’मोहम्मद और उनकी सेना आ रही हैं’’। उनमें से ज़्यादातर ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि नबी अलैहिस्सलाम उनका घेराव करेंगे। आख़िरकार, उनके क़िले मज़बूत थे, उनके पास बहुत से आदमी थे, और उनके पास हथियारों की भरमार थी। उन्हें लगा था कि रसूलुल्लाह इतनी मज़बूत क़िले-बंदी वाली जगह का घेराव करने की कभी हिम्मत नहीं करेंगे। लेकिन चीज़ें वैसी नहीं हुईं जैसी उन्होंने सोची थीं। रसूल अलैहिस्सलाम ने पहले उन्हें इस्लाम क़ुबूल करने की दावत दी। अगर वे मना कर देते, तो उन्हें मुसलमानों को टैक्स देना पड़ता। और उन्होंने ऐलान किया कि अगर इन दोनों में से किसी भी तरीक़े से सुलह नहीं हुई, तो फिर जंग होगी। ख़ैबर के यहूदी आपस में बात करने के लिए वापस अंदर चले गए। लेकिन थोड़ी ही देर बाद, उन्होंने मुसलमानों पर तीर चलाना शुरू कर दिया। उन्होंने पेशकश ठुकरा दी थी। सभी यहूदी सिपाही नतात में जमा हो गए, जो उनका सबसे मज़बूत क़िला था। और उन्होंने अपना सामान और परिवारों को दूसरे क़िलों में भेज दिया। 10,000 यहूदियों की फ़ौज सिर्फ़ 1,600 सहाबा पर तीर बरसा रही थी। उस दिन क़रीब 50 मुजाहिदीन ज़ख़्मी हुए। हर सुबह, नबी अलैहिस्सलाम और मुजाहिदीन नतात क़िले के पास ऊँची ज़मीन पर जाते और शाम तक यहूदियों से लड़ते। और शाम को, वे रजीअ वापस लौट आते। इस दौरान, रसूल अलैहिस्सलाम को सख़्त सिरदर्द होने लगा। और इस वजह से, वो दो दिनों तक फ़ौज की कमान नहीं सँभाल सके। उन्होंने पहले अबू बक्र (रज़ियल्लाहू अन्हु) को कमान सौंपी और उन्हें यहूदियों से लड़ने के लिए भेजा। लेकिन फ़तह हासिल नहीं हुई। अगले दिन, उन्होंनेउमर (रज़ियल्लाहू अन्हु) को परचम दिया। लेकिन उन्हें भी फ़तह नसीब नहीं हुई। इससे यहूदियों की हिम्मत बढ़ गई। इसलिए उन्होंने अपने दरवाज़े खोल दिए और आमने-सामने की जंग शुरू कर दी। शाम तक जंग इसी तरह चलती रही। लेकिन मुसलमान लाख कोशिशों के बावजूद कोई नतीजा हासिल नहीं कर सके। घेराबंदी के दौरान एक दिन, रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: "कल, मैं परचम उस शख़्स को दूँगा जिससे अल्लाह और उनके रसूल मुहब्बत करते हैं, और जो अल्लाह और उनके रसूल से मुहब्बत करता है। अल्लाह उसके ज़रिए फ़तह अता करेगा।" सहाबा के बीच जिज्ञासा की एक लहर दौड़ गई। हर कोई सोचने लगा। "यह सम्मान किसे मिलेगा?" आख़िरकार, ऐसा सम्मान कौन नहीं पाना चाहेगा?

दर्जनों सहाबा ने वह रात इसी उम्मीद और चाहत में गुज़ारी। उमर (रज़ियल्लाहू अन्हु) बाद में बताते: "मैंने कमान सँभालने की ख़्वाहिश उस दिन से ज़्यादा कभी नहीं की थी।" फ़ज्र की नमाज़ के बाद, रसूल अलैहिस्सलाम ने परचम लाने का हुक्म दिया। सबकी नज़रें उनके हाथ में मौजूद परचम पर टिकी थीं। सबके कान उनके मुंह से निकलने वाले शब्दों का इंतज़ार कर रहे थे। रसूलुल्लाह ने पूछा: "अली कहाँ हैं?" फ़तह दिलाने वाले का नाम अब स्पष्ट हो गया था। हालाँकि, उस वक़्त, अली की आँखों में तकलीफ़ थी और वो अपनी आँखें भी नहीं खोल पा रहे थे। सहाबा ने कहा: "ऐ रसूलुल्लाह, उनकी आँखों में दर्द है।" इसके बावजूद, रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "फिर भी उन्हें बुलाओ। उनसे आने को कहो।" यह सुनकर, अली रजियाल्लाहू अनुहू सहाबा की मदद से नबी अलैहिस्सलाम के पास आए। जब रसूल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह से दुआ की, तो उनकी दुखती आँखें फ़ौरन ठीक हो गईं। उस दिन के बाद से, अली को फिर कभी आँखों के दर्द की शिकायत नहीं हुई। रसूल अलैहिस्सलाम ने यह दुआ भी की: "ऐ अल्लाह, गर्मी और सर्दी की तकलीफ़ इनसे दूर कर दे।" अली (रज़ियल्लाहू अन्हु) ने बाद में बताया: "उस दिन के बाद से, मुझे कभी गर्मी या सर्दी ने परेशान नहीं किया।" उन्हें अक्सर गर्मियों में सर्दियों के कपड़े और सर्दियों में गर्मियों के कपड़े पहने देखा जाता था। रसूलुल्लाह ने परचम अली को सौंप दिया और उन्हें एक लोहे की ज़िरह पहनाई। फिर उन्होंने हुक्म दिया: "तब तक लड़ना जब तक अल्लाह तुम्हें फ़तह अता न कर दें। और पीछे मुड़कर मत देखना।" अली रजियाल्लाहू अनुहू ने परचम लिया और आगे बढ़े। कुछ दूर जाने के बाद, उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम से पूछा: "ऐ रसूलुल्लाह, मैं उनसे किस मक़सद के लिए लड़ूँ?" जवाब साफ़ था: "उनसे तब तक लड़ो जब तक वे गवाही न दें कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। उनके क़िलों तक पहुँचने तक सुकून से आगे बढ़ो। फिर उन्हें इस्लाम की दावत दो। अगर वे क़ुबूल कर लें, तो उन्हें उनके फ़र्ज़ के बारे में बताओ। अल्लाह की क़सम, अगर तुम्हारे ज़रिए एक भी इंसान को अल्लाह की तरफ़ से हिदायत मिल जाए, तो यह तुम्हारे लिए लाल ऊँटों के रेवड़ से भी बेहतर है।" यानी, सबसे क़ीमती दौलत से भी बेहतर। ये बातें इस्लामी फ़तह के असली मक़सद को भी ज़ाहिर करते थे। एकमात्र मक़सद इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाना और लोगों की आख़िरत को सुरक्षित बनाना था। अली मुजाहिदीन के आगे-आगे बहादुरी से बढ़ने लगे। जब वे नतात क़िले की दीवारों तक पहुँचे, तो उन्होंने परचम ज़मीन में गाड़ दिया। उन्होंने उन्हें इस्लाम के बारे में बताया और उन्हें मुसलमान होने की दावत दी। "ऐ अहल-ए-किताब!

दीने इस्लाम में दाख़िल हो जाओ और तुम बच जाओगे।" लेकिन यहूदियों ने इसे क़ुबूल नहीं किया। वे लड़ने के लिए अपने क़िलों से बाहर आ गए। उसी वक़्त, एक ज़ोरदार आवाज़ सुनाई दी। "मैं वह आदमी हूँ जो तलवार और नेज़े से दहाड़ते हुए शेरों को भी मार गिराता है!" हर कोई उस तरफ़ मुड़ा जहाँ से आवाज़ आई थी। और उन्होंने पाया कि वह एक रोबदार, ख़ौफ़नाक जंगी सिपाही था जो ज़िरह की दो परतें पहने हुए और दो तलवारें लिए हुए था। यह मरहब था, जो ख़ैबर के यहूदियों में सबसे बहादुर माना जाता था। उसने सुना था कि उसके भाई को मार दिया गया है। इसलिए वह अपने सिपाहियों के साथ क़िले से बाहर आ गया था। वह मुसलमानों में ख़ौफ़ पैदा करने की कोशिश कर रहा था और किसी को लड़ने के लिए ढूँढ़ रहा था। तभी एक और आवाज़ सुनाई दी। "मैं वह हूँ जिसकी माँ ने उसका नाम हैदर रखा है!

मैं जंगल के ताक़तवर शेरों की तरह हूँ! मैं तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा! मैं तुम्हें मार दूँगा!" यह अली थे (रज़ियल्लाहू अन्हु)। मुस्लिम फ़ौज के झंडाबरदार। वे दोनों आमने-सामने आ गए। अली रज़ियल्लाहू अन्हु नबी (अलैहिस्सलाम) की तलवार से लड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद, उन्होंने इतना ज़ोरदार वार किया कि उससे मरहब की ढाल टूट गई और उसका दो-परत वाला टोप भी। वही वार और भी गहरा गया और उन्होंने उसे वहीं ढेर कर दिया। जब यहूदियों ने अपने सबसे मज़बूत सिपाही का भयानक अंजाम देखा तो उनके दिल ख़ौफ़ से भर गए। यहीं से हालात का रुख़ बदलने वाला था। यह दृश्य देखकर, रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) ने मुजाहिदीन को ख़ुशख़बरी दी। "ख़ुशियाँ मनाओ!

ख़ैबर की फ़तह अब आसान हो गई है।" इसके बाद, मुसलमान बड़ी बहादुरी के साथ दुश्मन की तरफ़ आगे बढ़े। सहाबा लड़ते हुए क़िले के दरवाज़ों तक पहुँच गए। उसी वक़्त, एक यहूदी सिपाही ने अपनी तलवार से अली की ढाल पर वार किया और उसे उनके हाथ से गिरा दिया। अली ने आस-पास देखा और उनकी नज़र क़िले के दरवाज़े पर पड़ी। उस दिन के गवाह बताते हैं कि अली ने उस भारी दरवाज़े को उखाड़ दिया और उसे ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया। अपने आदमियों को एक के बाद एक गिरते देखकर, यहूदी बग़ैर पीछे देखे दहशत में भागने लगे, रसूल अलैहिस्सलाम की बात सच साबित हुई थी। अल्लाह ने अली के हाथों (रज़ियल्लाहू अन्हु) मुसलमानों को फ़तह अता कर दी थी दिलचस्प बात यह है कि जब 10,000 यहूदियों की फ़ौज पर यह ख़ौफ़ तारी हुआ, तब उनके सौ आदमी भी नहीं मारे गए थे। जहाँ एक तरफ़ सहाबा शहादत के लिए बेताब थे, वहीं दूसरी तरफ़ यहूदी ख़ौफ़ के मारे मौत से भागने की कोशिश कर रहे थे। दोनों ही पक्ष यह मानते थे कि उनका दीन सच्चा है। लेकिन यहूदियों को इस सांसारिक जीवन से बहुत गहरा लगाव था। क़ुरआन में, अल्लाह ने अपने रसूल के ज़रिए उन्हें इस तरह संबोधित किया: "कह दीजिए: 'अगर अल्लाह के यहाँ आख़िरत का घर दूसरे लोगों को छोड़कर सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही है, तो मौत की चाहत करो अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो।' लेकिन वे उन करतूतों की वजह से जो उनके हाथों ने किए हैं कभी उसकी चाहत नहीं करेंगे। और अल्लाह ज़ालिमों को ख़ूब जानता है। आप यक़ीनन उन्हें किसी भी दूसरे इंसान से ज़्यादा ज़िंदगी का लालची पाएँगे। मुशरिकों से भी ज़्यादा। उनमें से हर कोई यह चाहता है कि वो हज़ार साल जिए। लेकिन अगर वे इतना लंबा जी भी लें, तो यह उन्हें अज़ाब से नहीं बचा पाएगा। और वे जो कुछ भी करते हैं, अल्लाह उसे ख़ूब देखने वाला है।" भागते हुए दुश्मन के सिपाहियों का पीछा करते हुए, अली और मुजाहिदीन नतात क़िले में दाख़िल हो गए। लेकिन वहाँ उन्हें मिला बच्चों के सिवा कोई नहीं। उन्होंने उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया। यहूदी सिपाही नतात को छोड़कर जा चुके थे। फिर मुजाहिदीन नईम क़िले की तरफ़ बढ़े और उस पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। उसके बाद, साब इब्न मुआज़ क़िले ने भी हथियार डाल दिए। लंबी घेराबंदी के दौरान अपने क़िलों को एक के बाद एक गिरता हुआ देखकर, यहूदियों के पास सुलह की माँग करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा दरअसल ऐसी माँग के लिए बहुत देर हो चुकी थी। फिर भी रसूलुल्लाह ने इसे क़ुबूल कर लिया। उनकी जान बख़्श दी गई, और उन्हें अपने परिवारों के साथ ख़ैबर छोड़ने की इजाज़त दे दी गई। और हर परिवार को एक ऊँट के बराबर अपना सामान ले जाने की इजाज़त दी जब वे जाने की तैयारी कर ही रहे थे, तभी वे रसूलुल्लाह के पास आए एक प्रस्ताव लेकर। "ऐ अबुल-क़ासिम!

आपके लोग इन ज़मीनों से अवगत नहीं हैं, और हम जानते हैं कि सबसे अच्छी पैदावार कैसे हासिल की जाती है। क्यों न हम पैदावार को आपस में बाँटने का समझौता कर लें ?" रसूल अलैहिस्सलाम और सहाबा ख़ैबर में नहीं रुक सकते थे। और, उस ज़मीन की देखभाल करना उनके लिए मुमकिन नहीं था। इस वजह से, नबी (अलैहिस्सलाम) ने उनका प्रस्ताव मान लिया और यहूदियों को हर साल आधी पैदावार बाँटने की शर्त पर ख़ैबर में रुकने की इजाज़त दे दी। हालाँकि, नबी अलैहिस्सलाम जब भी चाहते इस समझौते को ख़त्म कर सकते थे। क्योंकि यह साफ़ नहीं था कि वे आगे चलकर क्या कर सकते हैं। यह शर्त उन्हें कोई भी ग़लत काम करने से रोकने के लिए रखी गई थी। हर साल फ़सल कटने के वक़्त, रसूलुल्लाह अब्दुल्लाह इब्न रवाहा को ख़ैबर भेजते थे। अब्दुल्लाह पैदावार को आधा-आधा बाँट देते थे और फिर वे यहूदियों को चुनने देते थे। और कहते: "जो आधा हिस्सा चाहो, ले लो।" यह इंसाफ़ देखकर, यहूदी कहते: "यही वह इंसाफ़ है जिस पर आसमान और ज़मीन क़ायम हैं।" फिर भी, वे इस समझौते पर सिर्फ़ 12 साल तक ही क़ायम रहे। उमर रज़ियल्लाहू अन्हु की ख़िलाफ़त के दौर में, उन्होंने परेशानी खड़ी की और समझौता तोड़ दिया। और इसलिए, आख़िरकार उन्हें ख़ैबर से निकाल दिया गया। ख़ैबर अब फ़तह हो चुका था, और समझौता तय हो गया था। रसूलुल्लाह अपने सहाबा के साथ आराम करने चले गए थे। लेकिन ज़ैनब नाम की एक यहूदी औरत ने विश्वासघाती योजना बनाई। वह रसूलुल्लाह को ज़हर देने की कोशिश करने वाली थी। उसने एक भेड़ को भूना और एक बहुत तेज़ ज़हर उसके हर हिस्से में मिला दिया। फिर वह उसे उनके पास ले आई। सभी सहाबा एक साथ खाने के लिए बैठ गए। रसूलुल्लाह ने भेड़ के कंधे से एक टुकड़ा लिया, "बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम" पढ़ा और उसे अपने मुँह में रखा। लेकिन जैसे ही उन्होंने उसे चखा, उन्होंने उसे फ़ौरन निकाल दिया और फ़रमाया: "अपने हाथ हटा लो!

गोश्त ने मुझे बताया है कि इसमें ज़हर मिला है!" सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हु ने फ़ौरन अपने हाथ खाने से पीछे खींच लिए। लेकिन उनमें से एक ने गोश्त का एक टुकड़ा निगल लिया। बिश्र इब्न बरा का रंग नीला पड़ गया और वे शहीद हो गए। जिस औरत ने ऐसा किया था, ज़ैनब, उसे पकड़ लिया गया और नबी अलैहिस्सलाम के सामने लाया गया। रसूल अलैहिस्सलाम ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया। उसने जवाब दिया: "मैंने ख़ुद से कहा: 'अगर वे वाक़ई एक नबी हैं, तो अल्लाह उन्हें बता देगा। लेकिन अगर वो नबी नहीं हैं, तो यह ज़हर उन्हें मार देगा, और इस तरह हमें उनसे छुटकारा मिल जाएगा।'" रसूल अलैहिस्सलाम हमेशा उन लोगों को माफ़ कर देते थे जो उनके साथ ज़्यादती करते थे। एक रिवायत के मुताबिक़, उन्होंने उस औरत को माफ़ कर दिया। एक दूसरी रिवायत के मुताबिक़, उसे मार दिया गया। उलेमा इस घटना को इस तरह समझाते हैं: रसूल अलैहिस्सलाम ने उसे उस बात के लिए माफ़ कर दिया जो उसने उनके साथ की थी। लेकिन चूँकि बिश्र शहीद हो गए थे, इसलिए उन्होंने यह फ़ैसला उनके परिवार पर छोड़ दिया। और उन्होंने क़िसास का अपना हक़ इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया, और उस औरत को मौत की सज़ा दी गई। जब नबी अलैहिस्सलाम अभी ख़ैबर में ही थे, कुछ ऐसा हुआ जिससे उन्हें बहुत ख़ुशी हुई। जाफ़र इब्न अबी तालिब के नेतृत्व में, हब्शा हिजरत करने वाले मुसलमान आ पहुँचे। अगर आपको याद हो, तो रसूलुल्लाह ने नजाशी से उन्हें वापस भेजने को कहा था। रसूलुल्लाह इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने फ़रमाया: "मुझे नहीं पता कि मुझे इन दोनों में से किस बात पर ज़्यादा ख़ुशी मनानी चाहिए। ख़ैबर की फ़तह पर, या जाफ़र के आने पर?" आपसे कारोबार करके ख़ुशी हुई। ख़ैबर की फ़तह के साथ ही, मदीना रहमतों और बरकतों से भर गया। "अपनी ताज़ा खजूरें यहाँ से लें!" लेकिन मक्का में, हालात बिल्कुल उलट थे। वहाँ एक भयानक अकाल पड़ गया था, और हर गुज़रते दिन के साथ, वे और ग़रीब होते जा रहे थे। "हम बस पहुँचने ही वाले हैं।" ये वे लोग थे जिन्होंने सालों तक सहाबा पर ज़ुल्म किया था, उन्हें उनके घरों से निकाला था, और उन्हें इस हद तक भूखा रखा था कि उन्हें अपने पेट पर पत्थर बाँधने पड़े थे। और अब, वे इस बेबसी की हालत में थे। क़ुरआन में, अल्लाह ने अपने रसूल से फ़रमाया: "हमने आपको तमाम जहानों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ रहमत बनाकर भेजा है।" रसूल अलैहिस्सलाम का दिल रहमदिली से इतना भरा हुआ था कि वे क़ुरैश जो उनके रिश्तेदार थे, की हालत बर्दाश्त नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने बहुत सारा खाना और राशन मक्का भेजा। उन्होंने अपने दुश्मनों पर भी रहम किया। हालाँकि कुछ मुशरिक यह मदद नहीं लेना चाहते थे, लेकिन अबू सुफ़ियान ने ये चीज़ें लीं और ग़रीबों में बाँट दीं। उसने कहा: "यह मेरे भतीजे ने भेजा है। अल्लाह उसे इसका इनाम दें।" तोहफ़ों में, अबू सुफ़ियान के लिए मदीना की खजूरें भी थीं। नबी अलैहिस्सलाम की अपने रिश्तेदारों की मदद ने उनके दिलों में ईमान के बीज बो दिए थे। और वक़्त के साथ, ये बीज अंकुरित होंगे और जड़ें जमा लेंगे। सुलह हुदैबिया को एक साल बीत चुका था। और आख़िरकार वह दिन आ ही गया जिसका सबको बेसब्री से इंतज़ार था। यह 'उमरा अल क़ज़ा' का वक़्त था। अगर आपको याद हो, तो सहाबा को मक्का गए बिना यहाँ तक कि काबा को देखे बग़ैर ही वापस लौटना पड़ा था, उस दिन वे जो उमराह नहीं कर पाए थे, वह अब होने वाला था। सात लंबे सालों के बाद, वे आख़िरकार अपने वतन से दोबारा मिलने और काबा का तवाफ़ करने वाले थे। रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा को उमराह की तैयारी करने को कहा। जब सब कुछ तैयार हो गया, तो रसूल अलैहिस्सलाम 2,000 सहाबा के साथ और क़ुर्बानी के 70 ऊँटों के साथ मक्का के लिए निकल पड़े। जब रसूल अलैहिस्सलाम मदीना से क़रीब 10 किलोमीटर दूर, ज़ुल-हुलैफ़ा पहुँचे, तो उन्होंने एहराम बाँधा। फिर सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हु ने भी ऐसा ही किया। और अब हर कोई सफ़ेद लिबास में था। और एक बुलंद आवाज़ में, उन सब ने तल्बिया पढ़ना शुरू कर दिया। "लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक (मैं हाज़िर हूँ, ऐ अल्लाह, मैं हाज़िर हूँ)।" "लब्बैक ला शरीका लका लब्बैक (मैं हाज़िर हूँ, आपका कोई शरीक नहीं, मैं हाज़िर हूँ)।" क़ुरैश के सरदार मक्का छोड़कर पहाड़ों पर चले गए थे ताकि उन्हें नबी अलैहिस्सलाम और सहाबा की ख़ुशी न देखनी पड़े। वे काबा को इस्लाम के केंद्र के तौर पर बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। रसूलुल्लाह अपनी ऊँटनी क़सवा पर, अपने पीछे सहाबा के साथ मक्का में दाख़िल हुए। कुछ मुशरिक मर्द, औरतों और बच्चों के साथ, दारुन नदवा से उन्हें देख रहे थे। जब रसूलुल्लाह काबा में दाख़िल हुए, तो उन्होंने अपना दायाँ कंधा खोल दिया। फिर उन्होंने अपने सहाबा से कहा: "अल्लाह उस शख़्स पर रहम करें जो आज इन मुशरिकों को अपनी ताक़त और जोश दिखाएगा।" मुशरिक पीछे से सहाबा को देख रहे थे और उनके मज़बूत अंदाज़ पर हैरान थे। क्योंकि ये अफ़वाहें फैल गई थीं कि मदीना जाने के बाद मुसलमान कमज़ोर हो गए हैं और बुखार से बीमार पड़ गए हैं और इस तरह रसूल अलैहिस्सलाम ने अपना जवाब दिया। उमराह के सभी अरकान पूरे कर लिए गए। फिर रसूलुल्लाह ने अपना सिर मुंडवाया और एहराम खोल दिया। और सहाबा ने भी ऐसा ही किया। और इस तरह, वह ख़्वाब जो नबी अलैहिस्सलाम ने ठीक एक साल पहले देखा था सच हो गया। इस उमराह के सफ़र के लिए,नबी अलैहिस्सलाम के लिए एक खेमा लगाया गया था । जबकि सहाबा उनके आस-पास के खेमों में तीन दिनों तक रुके। नमाज़ के वक़्त, वे ख़ाना-ए-काबा में इकट्ठा होते और जमात के साथ नमाज़ पढ़ते थे। इस दौरान, उन्होंने अपने रिश्तेदारों से मुलाक़ात की और उन्हें इस्लाम का परिचय अपनी बातों और व्यवहार से दिया। वे अपने रवैये और कामों से हर किसी के लिए एक मिसाल क़ायम कर रहे थे। इन तीन दिनों में, वे मक्का को अंदर से फ़तह करने की कोशिश कर रहे थे। कई क़ुरैश के लिए, अपने पुराने दोस्तों के लिए नफ़रत, ग़ुस्सा और जो पूर्वाग्रह था, वह दूर होने लगा था। हर कोई किसी पुराने दोस्त से मुहब्बत से बात करने को तरस रहा था। लोहे की तलवारें उनकी म्यान में रख दी गई थीं, और क़ुरआन की रूहानी तलवार बाहर आ गई थी। जब से सुलह शुरू हुई थी, उसी तलवार ने जिहाद का काम किया था। और यह काम करता हुआ मालूम हो रहा था। एक बार फिर, क़ुरैश ने अपनी हर उस बात पर सवाल उठाया जिस पर वे यक़ीन करते थे और इस्लाम के ख़िलाफ़ अपनी ज़िद्द पर भी। तीन यादगार दिन गुज़र चुके थे। और अब जाने का वक़्त आ गया था। रसूल अलैहिस्सलाम के हुक्म से, हर कोई वापसी के सफ़र के लिए तैयार हो गया, अपना सामान बाँधा, और मदीना के लिए निकल पड़े। इस बात का अंदाज़ा लगाना भी बहुत मुश्किल है कि वह जुदाई कितनी तकलीफ़देह रही होगी। जुदाई का दर्द महसूस करने वाले सिर्फ़ वे ही नहीं थे। अबू बसीर रज़ियल्लाहू अन्हु को 'ईस' की घाटी में बसे हुए एक या दो साल हो चुके थे। इस दौरान, उनके गिरोह ने मक्का वालों को जो नुक़सान पहुँचाया था उसने वाक़ई मुशरिकों को थका दिया था। उन्हें एहसास हो गया कि वे मुसलमानों को इस तरह नहीं रोक सकते। और इसके अलावा, एक भी शख़्स मदीना से यह कहते हुए मक्का नहीं आया कि "मैंने इस्लाम छोड़ दिया है"। तो इस शर्त से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ था। उस वक़्त उन्हें ख़ुद पर बहुत यक़ीन था। लेकिन जैसे हर किसी की एक योजना थी, अल्लाह की अपनी योजना थी। क़ुरैश को अब समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। इसलिए उन्होंने रसूलुल्लाह के पास एक दूत को ख़त के साथ भेजा। उसमें लिखा था: "अल्लाह के वास्ते और हमारे पारिवारिक रिश्तों की ख़ातिर, मेहरबानी करके अबू बसीर और उनके दोस्तों को पैग़ाम भेज दें कि, अब से, जो भी मदीना में आपके पास आएगा वह सुरक्षित है, उसे वापस नहीं भेजा जाएगा।" रसूल अलैहिस्सलाम ने यह गुज़ारिश क़ुबूल कर ली और अबू बसीर रज़ियल्लाहू अन्हु को एक ख़त भेजा, जिसमें उन्हें और उनके भाइयों को मदीना आने की दावत दी गई थी। लेकिन अबू बसीर उस वक़्त सख़्त बीमार थे। जब नबी अलैहिस्सलाम का ख़त उन तक पहुँचा, तो वे अपनी आख़िरी साँसें ले रहे थे। उनकी आँखों में आँसू भर आए। अपने कमज़ोर हाथों से, उन्होंने ख़त लिया और उसे अपने चेहरे और आँखों पर मला। वे रसूलुल्लाह से दोबारा मिलने की चाहत से भरे हुए थे। लेकिन ख़त पूरा पढ़ने से पहले ही उनका इंतिक़ाल हो गया। रसूल अलैहिस्सलाम से उनकी मुलाक़ात जन्नत के लिए रह गई। वे सिर्फ़ अपने दीन पर चलने के लिए मक्का से भागे थे। उन्होंने इस दुनिया में अपना फ़र्ज़ पूरा कर लिया था और अपने असली घर, आख़िरत के लिए निकल पड़े थे। अबू जन्दल रज़ियल्लाहू अन्हु और दूसरे मुसलमानों ने उनकी जनाज़े की नमाज़ पढ़ी और उन्हें दफ़ना दिया। फिर उन्होंने वहाँ एक मस्जिद बनाई ताकि उनकी क़ब्र को भुलाया न जाए। फिर अबू जन्दल और उनके दोस्त मदीना में नबी अलैहिस्सलाम के पास चले गए। आयत में सुलह हुदैबिया के बारे में क्या कहा गया था?

एक खुली फ़तह। और यह सच में थी। लेकिन यह तो सिर्फ़ शुरुआत थी। क़ुरैश एक-एक करके अपने आदमियों को खोने वाले थे। उनके सबसे मज़बूत आदमी, जिनसे उन्हें सबसे कम उम्मीद थी, वे इस्लाम की सफ़ों में शामिल होने वाले थे। हुदैबिया एक बड़ी फ़तह की वजह थी। और वे नाम आने वाली कई जीतों की वजह बनने वाले थे। और आख़िरकार, वह मुबारक दिन क़रीब आ रहा था। मक्का आज़ाद होने वाला था। सालों का इंतज़ार ख़त्म होने वाला था। और मक्का के मुसलमान अपने घरों को लौटने वाले थे। क्या आप इस्लाम की सबसे बड़ी जीतों में से एक का गवाह बनने के लिए तैयार हैं? फ़तह मक्का कई जज़्बाती दृश्यों के साथ अगले एपिसोड में हमारा इंतज़ार कर रही है। बने रहें। "अल्लाहु अकबर। अल्लाहु अकबर।" "अल्लाहु अकबर। अल्लाहु अकबर।"
