# प्रसिद्ध एशियाई मॉडल ने अपनाया इस्लाम! - “मैं गुलाम थी; इस्लाम ने मुझे आज़ादी दी!”

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/famous-asian-model-converts-to-islam-i-was-enslaved-islam-gave-me-freedom
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=CPLwLX5-0yQ
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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मैं अमेरिका में पली-बढ़ी हूँ। मेरे पिता प्रिस्बिटेरियन चर्च में पादरी हैं। जब लोग आपको चाहने लगते हैं या आप मशहूर हो जाती हैं, तो ज़िंदगी बहुत कंट्रोल्ड हो जाती है। देखने में लगता है कि सब आपके कंट्रोल में है और सब बहुत ग्लैमरस दिखता है, पर असल में, आप बँध जाती हैं— जैसे मैं एक एजेंसी से बँधी हुई थी। मुझे लगता था कि वो एजेंसी मेरी जान खींच ले रही थी। मेरी कोई choice नहीं होती थी। मुझे लग रहा था कि मैं अंदर से बिल्कुल खाली हो गई हूँ। मैं कौन हूँ? एलाइज़ा कौन है?

मैं तो अब जानती भी नहीं हूँ। मैं गुलाम बन गई थी। मैं डिप्रेशन के बढ़ने को महसूस कर पा रही थी। मैं अपने अंदर उस अंधकार का बढ़ना महसूस कर रही थी। और मैंने सोचा—अब मुझे sprituality की ज़रूरत है। इसी दौरान मेरी दोस्ती मलेशिया में एक शख्स से हुई जो सच में दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे। तो उन्होंने मुझे कुछ pamphlets दिए। एक-एक करके मेरी सोच बदलते हुए, आख़िर में उन्होंने कहा, “ऐलाइज़ा, मुझे लगता है आप अब काफ़ी कुछ जान चुकी हैं। मुझे लगता है, आपको मुसलमान बन जाना चाहिए! अगर अल्लाह चाहता है कि मैं ऐसा करूँ तो मुझे करना होगा। और मुझे बहुत हल्कापन महसूस हुआ। बहुत हल्का! और वो आज़ादी थी। एलाइज़ा किम कौन हैं? क्या आप संक्षेप में बता सकती हैं?

मैं थाई-अमेरिकी हूँ। मेरा जन्म ओक्लाहोमा के एनिड नाम के एक बहुत छोटे शहर में, एक पादरी परिवार में हुआ। तो मेरे पिता प्रिस्बिटेरियन चर्च के पादरी हैं। मैं अमेरिका में पली-बढ़ी हूँ। मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद, मैं थाईलैंड चली गई। वहीं मैंने मिस थाईलैंड पेजेंट में हिस्सा लिया। फिर वहीं से मैंने अभिनय और मॉडलिंग शुरू की। और बाद में मैं मलेशिया पहुँची, जहाँ मैं 12 साल पहले मुसलमान बन गई। अल्हम्दुलिल्लाह। आस्था के संदर्भ में आपकी ज़िंदगी कैसी थी? आप किस में मानती थीं?

मेरा जन्म एक धार्मिक ईसाई परिवार में हुआ। मेरे पिता प्रिस्बिटेरियन चर्च के पादरी हैं। मेरे दादा भी पादरी हैं, मेरे चाचा भी पादरी हैं, और वे थाईलैंड में काफ़ी ऊँची हैसियत वाले थे। तो जब मेरा जन्म ओक्लाहोमा में हुआ, तब मेरे पिता थियोलॉजी में पीएचडी कर रहे थे। तो मैं चर्च के माहौल में ही पली-बढ़ी। जब मैं तीन साल की थी, तब मैंने कॉयर में गाना शुरू किया। यानी ईसाई धर्म का अभ्यास हमेशा मेरी ज़िंदगी का हिस्सा रहा। मैं हर रविवार चर्च जाती थी। कॉलेज में भी मैं एक क्रिश्चियन अकापेला ग्रुप में गाती थी। मेरे लिए ईसाई धर्म, आध्यात्मिकता और ईश्वर में विश्वास बहुत अहम था। मुझे तो परीक्षाओं के वक़्त की बातें भी याद हैं। मैं सोचती—शायद मैंने काफ़ी पढ़ाई नहीं की, लेकिन मेरे पास मेरा क्रॉस होता, उसे मैं अपनी मेज़ पर रख देती, और अगर मेरा पेपर अच्छा हो जाता, तो मैं सोचती कि इसके पीछे ईश्वर का हाथ है। मैं काफ़ी धार्मिक स्वभाव की लड़की थी, लेकिन मैं हमेशा परमपिता परमेश्वर से ही प्रार्थना करती थी। मैंने कभी यीशु से प्रार्थना नहीं की। मैंने परमेश्वर-पुत्र से भी कभी प्रार्थना नहीं की। ऐसा क्या हुआ कि आपने अपनी आस्थाओं पर सवाल उठाना शुरू किया?

असल में, शायद यह तब शुरू हुआ जब मुझे थोड़ी-सी शोहरत मिलने लगी। मैं बारह साल की उम्र से ही टीवी पर आती रही हूँ। यह दुनिया मेरे लिए जानी-पहचानी है। मुझे लगता है, मेरी माँ को यूँ मेरा खिलना-निखरना अच्छा लगता था और मेरा थोड़ा मिलनसार होना भी उन्हें पसंद था। तो, जब माँ को लगा कि मैं और खुलकर बोल सकती हूँ, तब मैं किड्स मॉडलिंग वगैरह में आ गई। जैसे ही मेरी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी हुई, मैं पापा के साथ “छुट्टियाँ” मनाने थाईलैंड वापस चली गई। थाईलैंड पहुँचने पर, पापा ने—ठीक है— मेरा मतलब, ये उनका फैसला नहीं था; उन्हें बिज़नेस ट्रिप पर जेनेवा जाना था, और वह मुझे दो हफ्तों के लिए अकेला छोड़ गए। तो इसी दौरान मिस थाईलैंड पेजेंट प्रतियोगिता का एक विज्ञापन आया मैंने सोचा, ये तो मेरे लिए दो हफ्ते की फ्री छुट्टी होने वाली है। पापा तो बाहर चले गए हैं। तो आराम से अच्छी छुट्टियाँ मना लूँ। मैं बहुत लंबी भी नहीं हूँ, तो सोचा— अरे, ये मेरे बस की बात नहीं है। ये तो होने वाला नहीं है, पता है ना?

मैं तो बस फ्री खाने के लिए जा रही थी। लेकिन मैं top 5 में पहुँच गई, और मैं सोच रही थी—मैं कर क्या रही हूँ?

पर उसी ने मेरे लिए बहुत से दरवाज़े खोल दिए। तो मैंने पेजेंट वगैरह सब निपटा लिया, टीवी कमर्शियल्स करना शुरू कर दिया। असल में उन्हीं टीवी कमर्शियल्स की वजह से मैं मलेशिया पहुँची। तो मैं वही काम करने मलेशिया भी आ गई। तो मैंने उसी दौरान एक रियलिटी शो किया— इसी तरह मैंने और काम भी किए। आख़िर में मुझे एक टेलीफ़िल्म में काम मिला— यानी कि टीवी के लिए बनी फ़िल्म। मतलब टीवी। वो वैम्पायर फ़िल्म थी। और मेरी टीम मलय मुस्लिम थी। हालाँकि उस समय मेरी सोच काफ़ी ‘अमेरिकन’ ही थी, यहाँ आने के बाद मैंने धर्म-वगैरह के बारे में कुछ नहीं सोचा। मुझे तो यह खयाल ही नहीं आया था कि जो महिलाएँ हिजाब पहने हैं, वे मुस्लिम हैं। मैंने बस सोचा—ये यहाँ का फैशन है। यहाँ तक कि दाढ़ी वाले मर्दों के बारे में भी मैंने नहीं सोचा कि वे मुस्लिम हैं। मुझे लगा कि ये लोग दाढ़ी रखना पसंद करते है। मैंने इस बारे में सोचा ही नहीं। जब मैं सेट पर पहुँची, तो मुझे समझ नहीं आया कि मेरी टीम, मेरे डायरेक्टर और बाकी कलाकार खाना क्यों नहीं खा रहे हैं?

और रात को इतना ज़्यादा क्यों खा रहे हैं? तो मुझे पता चला कि रमज़ान चल रहा था। मुझे बस पता नहीं था; बस इतना दिख रहा था कि वे खाना नहीं खा रहे थे। वे मुझे खाने के लिए कहते थे, लेकिन खुद नहीं खाते थे। तो मैं सोचने लगी—अच्छा, यह तो अजीब है। इसे समझाने के लिए शायद मैं एक उदाहरण दूँ— कभी-कभी हम हॉलीवुड के कलाकारों को देखते हैं, कि थोड़ी-सी शोहरत के बाद वे डिप्रेशन में चले जाते हैं या उससे भी बुरा हो जाता है। और हम सोचते हैं—क्यों? उनके पास तो सब कुछ है। आपके पास तो सब कुछ है—फिर आप ये क्या कर रहे हैं? तो मुझे भी वैसा ही महसूस होने लगा, क्योंकि मन में ये सवाल उठने लगे— क्या लोग, मैं जो हूँ उस वजह से मुझे जानते है और मुझसे दोस्ती करना चाहते है या वो मेरे मुझे जो समझते है उस वजह से?

और सिर्फ़ इतना ही नहीं, एक स्तर पर, जब लोग आपको चाहते हैं या आप मशहूर हो जाती हैं, आपकी ज़िंदगी बहुत नियंत्रित हो जाती है। ऊपर से लगता है कि सब कुछ आपके नियंत्रण में है और सब बहुत ग्लैमरस दिखता है, लेकिन असल में आप बँध जाती है, और मैं एक एजेंसी से बँधी हुई थी। मुझे लगता था कि वो एजेंसी मेरी जान खींच ले रही थी। क्योंकि अगर आप कल्पना करें, जब आप एक certain level पर होते है। कम से कम, कमर्शियल मॉडलिंग इंडस्ट्री में— आप सुबह उठते हैं,और सेट पर चले जाते हैं, आपको अपने बालों को भी कंघी करने की ज़रूरत नहीं है—कुछ नहीं। बस सीधे सेट पर पहुँच जाइए। कुछ भी पहने हुए—चाहे पजामा ही सही। जैसे ही मैं बैठती हूँ, कोई मरे बाल संवरने के लिए आता है, कोई मेरे कपड़े देने आता है, कोई मेरा मेकअप कर देता है, और कोई मुझे खाना भी देने आता है। मेरी कोई choice नहीं होती—इस हद तक कि मुझे ये भी नहीं पता होता था कि मुझे किस तरह के अंडे खाना पसंद हैं। मुझे ये भी नहीं पता था कि मुझे किस तरह का हेयरकट चाहिए। सेट पर अगर मेरा हेयरकट हो भी जाता और क्लाइंट आकर कहते— “अरे, ये हेयरस्टाइल ज़्यादा पसंद नहीं,” तो वे मेरे बाल कटवाने के लिए सलून से किसी को वहीं बुला लेते। मुझे लगता था कि मैं अंदर से बिल्कुल खाली हो गई हूँ। मैं कौन हूँ?

ऐलाइज़ा कौन है? अब तो मुझे कुछ पता ही नहीं। मुझे तो यह भी नहीं पता कि क्या पहनूँ—सच में नहीं पता। मुझे लगा मेरी ज़िंदगी बेकाबू होती जा रही है और अंदर से मैं काफ़ी खाली-सी हूँ। और मैं ये महसूस कर पा रही थी कि—जैसे मैं जल्द ही nothingness में जाने वाली हूँ। और ऐसा भी नहीं कि—बस…

सच कहूँ तो, अब मुझे समझ ही नहीं आता है कि ख़ुशी होती क्या है। मुझे नहीं पता था कि मैं कौन हूँ। मुझे यह भी नहीं पता था, मुझे क्या महसूस करना चाहिए। क्योंकि मैं वही महसूस करती थी जो मेरी स्क्रिप्ट मुझसे कहती थी। जिस दिन स्क्रिप्ट के मुताबिक़ उदास होना होता, मैं उदास होती। जिस दिन खुश होना होता, उस दिन ख़ुश होती । मुझे तो यह भी नहीं पता चलता था कि मैं कैसा महसूस कर रही हूँ। मैं बिना किसी को बताए नाखून तक नहीं काट सकती थी। मैं अपनी त्वचा को ज़्यादा टैन भी नहीं होने दे सकती थी, बिना किसी को बताए, क्योंकि फिर मेकअप बदलना पड़ता। और मैं 300 ग्राम भी वज़न कम या ज़्यादा नहीं कर सकती थी, क्योंकि इससे चेहरे की बनावट या शरीर बदल जाता। मैं एक तरह से गुलाम बन गई थी। मैं अंदर से बिल्कुल खाली और पूरी तरह गुम हो गई थी। मुझे हमेशा लगता था—आखिर मैं हूँ कौन?

बतौर एक आत्मविश्वासी अमेरिकी लड़की, मैं डिप्रेशन के बढ़ने को महसूस कर पा रही थी। अपने अंदर उस अंधकार को महसूस कर पा रही थी। और मैंने सोचा—अब मुझे sprituality की ज़रूरत है। तो सबसे पहले, जैसा कि स्वाभाविक था—मैं पादरी की बेटी थी। मैंने ईसाई धर्म को फिर से समझना शुरू किया और मैंने ढेरों किताबें खरीद लीं—इतनी कि मेरे पिता ने पूछा, “क्या तुम सेमिनरी जाने वाली हो?

उपदेशक बनने का इरादा है क्या?” मैंने बहुत-सी किताबें यही सोचकर खरीदीं कि मैं बचपन से ईश्वर पर भरोसा करती आई हूँ। अब मैं खुद को धर्म में मज़बूती से जमाऊँगी। तो मैंने सोचा—ठीक है, अगर अब मुझे इसे बड़े होकर करना है, एक बच्ची की तरह नहीं जो बस उपदेशक की बात सुनती हो। तो मैं इसे ढंग से करूँगी। मैं रिसर्च करूँगी। तो मैंने पढ़ना शुरू किया। सच कहूँ, मैं पढ़ने की बहुत शौक़ीन नहीं हूँ—वास्तव में नहीं। पर यहीं से अल्लाह ने मेरी यात्रा में सचमुच मेरा मार्गदर्शन करना शुरू किया, क्योंकि मेरा मानना था कि अगर मैं सबसे शुरुआती चर्च ढूँढ़ पाऊँ, मेरा मिशन यही था— मैं सबसे प्राचीन चर्च ढूँढ़ूँगी और जानूँगी कि वे इबादत किस तरह करते थे, और मैं भी उसी तरह ईश्वर की इबादत करूँगी, क्योंकि मुझे लगा कि ईश्वर इसी तरह से राज़ी होंगे। क्योंकि मुझे पता था कि ईसाई धर्म में बहुत सारे denominations हैं। उस समय तो लगभग 200 अलग-अलग denominations थे। मैंने कहा—यह तो हो ही नहीं सकता। कोई एक तो ज़रूर होगा जो सबसे बेहतर होगा। जब मैंने पढ़ा कि बाइबल कैसे संकलित की गई, तो मैंने सोचा—एक मिनट, लोगों का एक समूह कैसे तय कर सकता है कि उस हस्तलिखित ग्रंथ में क्या-क्या शामिल होगा, जो ईश्वर की ओर से आया हुआ माना जाता है?

भला आप कैसे तय कर सकते हैं? यह तो बेतुका है। वे कैसे तय कर सकते हैं कि यह रहेगा और यह नहीं रहेगा? यह चौंकाने वाली बात थी—नहीं हो सकता। मैं खुद को बाइबल पर भरोसा करने के लिए तैयार ही नहीं कर पा रही थी। तो मैंने सोचा—ठीक है, अब इस बारे में और नहीं सोचती। मैं सच में घबरा गई थी। तो मैंने बाइबल को एक तरफ़ रख दिया और सोचा—ठीक है, अब इसे नहीं देखूँगी। अब इतिहास को ही देखते हैं। बेशक, ईसाई इतिहास काफ़ी रक्तरंजित रहा है। और मैंने सोचा, अगर लोगों को मनाने के लिए इतनी मारकाट करनी पड़े और लोगों को आस्था रखने के लिए force करना पड़े। ये ठीक नहीं लगता। तो अब—बाइबल out, इतिहास भी out. मैं सोच रही थी—अब क्या?

बतौर एक ईसाई लड़की हाँ, कभी-कभी मैं प्रार्थना करना भूल जाती थी, पर सिर्फ़ इतना ही नहीं, उस वक़्त मुझे नृत्य करना भी पसंद था। अगर मैं शनिवार की रात डांस करने चली जाऊँ, जो भी पहनना हो पहनूँ, , जो भी करना हो करूँ और फिर अगली सुबह चर्च चली जाऊँ—क्या यह ठीक है? वास्तव में, यह ठीक नहीं लगता। तो मैं सोचती थी—अच्छा, यहाँ कुछ ‘लूपहोल’ तो हैं। मुझे नहीं पता कि मैं इन लूपहोल्स से सहज हूँ या नहीं। मैं इस बारे में ज़्यादा सोचने से खुद को रोकने की कोशिश करती थी, लेकिन…

मुझे पता नहीं था कि मैं इससे सहज थी या नहीं। मैंने अब भी ईसाई धर्म को पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया था। मैंने सोचा, शायद मुझे बस और रिसर्च करनी चाहिए। इसी दौरान मेरी दोस्ती मलेशिया में एक ऐसे व्यक्ति से हुई जो सच में दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे। इससे पहले मेरी मुलाकात किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं हुई थी जो दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ता हो; मेरे दायरे में ऐसा नहीं था। मैं अपने दोस्त को देखती थी। और वे माशाअल्लाह, पूरे तन-मन से प्रतिदिन 5 वक़्त इबादत करते थे। उन्हें देखकर मैं सोचती—मैं तो पादरी की बेटी हूँ। मैं दिन में पाँच बार प्रार्थना नहीं करती। अगर मैं दो महीने तक प्रार्थना करना भी भूल जाऊँ,तो भी कुछ नहीं होता - you know तो मेरे एक दोस्त ने सुझाव दिया कि मैं उनके साथ एक क्लास में चलूँ, वही क्लास, जहाँ वे खुद जाया करते थे। और वह क्लास शेख हुसैन यी के इस्लामिक सेंटर में होती थी। मुझे नहीं पता था कि वे कौन हैं। मैं काफ़ी घबराई हुई थी। मुझे क्या पहनना चाहिए?

मैं तो मॉडल हूँ। मेरे पास ऐसे कपड़े भी नहीं थे जो उपयुक्त होते। तो फिर मैं शेख हुसैन के इस्लामिक सेंटर पहुँची। वहाँ उन्होंने मुझे कुछ pamphlets दिए। और सच कहूँ तो— ऐसा लगा मानो अल्लाह ने उन्हें मेरे लिए क्रम से सजाकर भेजा हो। मुझे बिलकुल ऐसा ही महसूस हुआ। पहला pamphlet मुझे आज भी याद है; उसका नाम “अनातू” था। अनातू, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का देवता है। और “अनातू” का ज़िक्र इसलिए था कि वहाँ ईश्वर की अवधारणा ऐसे अस्तित्व की है जो न खाता है और न शौच के लिए जाता है। यानी यह बात तौहीद की ओर ले जाती है। इस तरह एक के बाद एक पर्चे मेरी सोच बदलते गए, और मुझे यह सब बहुत सहज लगा। वह पैग़म्बरों की कहानियाँ सुनाते थे, तो मुझे लगता, ये कुछ जाना-पहचाना सा लगता है। मुझे समझ ही नहीं आया कि इब्राहीम वही अब्राहम है, मैं समझ नहीं पाई। ये भी समझ नहीं पा रही थी कि मूसा वही moses हैं। उस वक़्त अरबी भाषा मेरे सुनने में बिल्कुल अजनबी थी। कभी-कभी लोग पूछते हैं—आप मॉडल थीं, आप उस इंडस्ट्री में थीं—क्या यह सब मुश्किल था?

not really!

मैं एक मॉडल तो थी मगर वैसी steriotypical मॉडल जैसी नहीं थी। मैं पार्टी वग़ैरह में नहीं करती थी। मैं कोने में बैठकर अपनी किताब पढ़ती और बस अपनी बारी का इंतज़ार करती रहती थी। तो मैं सोचती—सच कहूँ तो, जो कुछ मैं पढ़ रही थी वह समझ में आ रहा था और मेरे मूल्यों से मेल खाता था। मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि मैं किसी ऐसी स्थिति में हूँ जो मेरी असली पहचान से मेल नहीं खाती। हाँ, मैं मॉडलिंग और एक्टिंग में थी, और बहुत से लोग उस इंडस्ट्री में जाना चाहते हैं, और मुझे सौभाग्यशाली महसूस होता था कि मैं उसमें थी, लेकिन मुझे कभी अपने आप में सहज महसूस नहीं हुआ। जब मैंने ये pamphlets पढ़ना शुरू किया, मुझे लगा कि उनमें लिखे मूल्य मेरे अपने मूल्यों से बहुत अच्छी तरह मेल खाते हैं। यह मुश्किल नहीं था। तौहीद को समझना— जैसे अलग-अलग हिस्से पज़ल की तरह अपनी जगह बैठते चले जा रहे हों। सच कहूँ तो, मुझे लगता है कि इस्लाम एक कॉन्सेप्ट की तरह है। यानि, मैं समझ सकी कि अगर हम आदम तक पीछे जाएँ, इस्लाम हमारे पास हमेशा से रहा है। मुसलमान हमेशा से रहे हैं— मैं समझ गई।तो अब मुझे सोचना था— और मुझे लगता है, ये मेरे अंदर की overthinking, perfectionist type, पढ़ाकू व्यक्तित्व का हिस्सा है। मैं एक अच्छी मुसलमान बनना चाहती हूँ। क्या मैं एक अच्छी मुस्लिम बन सकती हूँ?

मैं नहीं चाहती कि मैं एक मुसलमान बनू और तुरंत गुनाहों में पड़ जाऊँ। उस समय मेरी सोच यही थी। और मैंने सोचा—ठीक है, मुझे कुछ चीज़ें सीखनी होंगी। मैंने सोचा—ठीक है, मुझे अरबी सीखनी है, नमाज़ पढ़ना सीखना है, और बाकी सभी। और उसी वक़्त उस्ताज़ शरीफ़ सामने आए। असल में, जिस दिन उन्होंने मुझसे ज़्यादा गंभीरता से बात करनी शुरू की, उसी दिन मैंने ‘अल-ख़ादिम’ से एक volunteer बुक कर रखा था। मैंने सोचा—मुझे जानना है कि ये लोग कितनी सुबह उठते हैं, हिजाब पहनने में कितना समय लगता है— शायद काफ़ी समय लगता होगा। क्या उन्हें बहुत गर्मी नहीं लगती? और वे रोज़ा कैसे रखते हैं? क्योंकि उस समय मैं अभी से भी ज़्यादा दुबली थी। मैं सोच रही थी—मैं तो काफ़ी दुबली हूँ; फिर रोज़ा कैसे रख पाऊँगी?

कहीं मैं बीमार तो नहीं पड़ जाऊँगी? तो मैंने सोचा—ठीक है, मैं एक महिला को एक हफ़्ते तक फ़ॉलो करूँगी। मैं सुबह 5 बजे उनके घर जाऊँगी, और वह जो-जो करती हैं, वही करूँगी देखूँगी कि क्या मैं भी कर सकती हूँ। तो उस दिन मेरी उस volunteer से मिलने की बात तय थी, लेकिन वह रविवार था, जिस दिन हमारी नियमित कक्षा होती थी। तो मैं पहले कक्षा में गई, और उस्ताज़ शरीफ़ ने पहल की और कहा "ऐलाइज़ा, तो अब तक आप क्या जानती हैं?

क्या आप थोड़ी बातचीत करना चाहेंगी?" मैंने सोचा—नहीं, उस्ताद, मैं अपना रिसर्च कर चुकी हूँ। मैं तो पहले ही मुसलिम होना महसूस कर रही हूँ। मुझे कोई बात नहीं करनी। लेकिन वे इतने विनम्र थे कि मैंने सोचा— ठीक है, मैं उनके साथ बैठकर थोड़ी बातचीत कर लेती हूँ। तो हम सचमुच शेख हुसैन के घर के अंदर गए, और हम बैठ गए। और वे वही सब ध्यान से सुनने लगे जो मैं अभी आपको बता रही हूँ। फिर अंत में उन्होंने कहा, "ऐलाइज़ा, मुझे लगता है कि आप काफ़ी कुछ जान चुकी हैं।" “मुझे लगता है, अब आपको मुसलमान बन जाना चाहिए।” मैं बोली— मैं एक volunteer से करीब 15 मिनट में मिलने वाली हूँ। मुझे लगता है, आज नहीं। फिर उन्होंने पूछा, “अच्छा, आपको क्या चीज़ रोक रही है?” मैंने कहा, मुझे लगता है कि मुझे अरबी सीखनी चाहिए, मुझे क़ुरआन पढ़ना चाहिए, नमाज़ पढ़ना सीखना चाहिए। कम-से-कम कुछ हदीसें तो जान लेना चाहिए। वो मुझे देखते रहे और फिर सवाल किया मुझे वह सवाल आज भी याद है— मुझे लगता है, तब उन्हें समझ आ गया—या शायद पहले से पता था— उन्होंने मेरे अंदर के परफ़ेक्शनिज़्म को पहचान लिया। उन्हें यह बात कुछ समझ में आ गई और वे बोले— “अच्छा, आपको क्या लगता है, यह सब करने में आपको कितना समय लगेगा?

20 साल? 30 साल? 50 साल?” और फिर— मुझे नहीं पता यह बात आपको या दर्शकों को अजीब लगेगी या नहीं— एक चीज़ जिसने मुझे रुला दिया—और आप याद रखें, मैं पहले ही करीब तीन महीने से इस रिसर्च में लगी हुई थी— और फिर… हाँ। और मुझे वह knowledge सच में से चाहिए था। मैं समझना चाहती थी ताकि मैं एक अच्छी मुसलिम बन सकूँ। तो उन्होंने कहा, “ऐलाइज़ा, क्या आपको पता नहीं कि जिस स्तर का ज्ञान आप एक मुसलमान के लिए चाहती हैं, वो सिर्फ़ अल्लाह के पास है?” और यह बात मुझमें उतर गई और दिल को लगी—दर्द-सा हुआ। लेकिन तब तक मैं रो रही थी, क्योंकि मुझे इस बात का मलाल था कि मैं…

मैं परफ़ेक्ट नहीं हो सकती। लेकिन मैं समझ गई। उसी पल मुझे ये बात समझ में आई। और अल्लाह ने मेरे दिल में सबसे पहले यही ख़याल डाला सोचो ऐलाइज़ा, अगर अल्लाह सुब्हानहु व तआला तुम्हें इस सफ़र पर लेकर आया हैं और तुम्हें पहले ही दिखा दिया है कि तुम हमेशा से मुसलमान थी, तो क्या वह तुम्हारे पिता के मामले में तुम्हारी मदद नहीं करेगा?

तो मेरा वह संकोच दूर हो गया। फिर मैंने सोचा—उस्ताज़ सही कह रहे हैं। अब तक जो कुछ मैं कहती रही हूँ, उसमें थोड़ा-सा दिखावा भी रहा है। जो मैं जानती हूँ, जो महसूस करती हूँ—उसी का प्रदर्शन। लेकिन यह सब सिर्फ़ ज़बानी जमा-खर्च था—मैं बस बातें ही कर रही थी। जब तक मैं शहादत पढ़कर घोषणा नहीं करती। तब तक हक़ीक़त में मैंने बातों के सिवा कुछ किया ही नहीं। अल्लाह मुझे वो ज्ञान क्यों देगा जब मैं खुद को समर्पित करने का कदम भी नहीं उठा रही, और ये बात मैं समझ गई। जब मैं सबसे ज़्यादा रो रही थी—मुझे लगता है, माशाअल्लाह उस्ताज़ शहादत के मामलों से बहुत परिचित थे। शायद उन्हें लगा कि मैं समझ की एक और गहरी मंज़िल पर पहुँच गई हूँ। फिर उन्होंने पूछा, "क्या आप वाक़ई में तैयार हैं?" उसी unplanned बातचीत में—जब मैं अपनी volunteer से मिलने ही वाली थी। लेकिन मैं समझ गई। और जब उन्होंने यह पूछा, तो मेरे मन में आख़िरी ख़याल आया— अगर अल्लाह चाहता हैं कि मैं यह करूँ, तो मैं इसे रोक नहीं सकती। मैं इसे टाल नहीं सकती। तो मैंने कलमा पढ़ लिया। वो कैसा एहसास था?

वह एहसास—मुझे अभी भी हो रहा है। जब अरबी में कलमा पढ़ते हैं, तो थोड़ी उलझन-सी रहती है, क्योंकि पता नहीं चलता कि उच्चारण सही है या नहीं। लेकिन जब मैंने इसे अंग्रेज़ी में कहा, तो—मुझे वही एहसास फिर होने लगा। एक सिहरन-सी सिर के ऊपर से शुरू होकर गर्दन के पीछे से उतरती हुई पूरे शरीर में फैल जाती है। और ये एहसास अब मेरे घुटनों से होकर पैरों तक उतर रहा है। और एक लहर-सी महसूस होती है, जैसे मेरी पुरानी ज़िंदगी बस निकलती जा रही हो। पुरानी ज़िंदगी जा रही है, और नई ज़िंदगी आ रही है, सिर से— यानी ऊपर से नीचे तक—ठीक वैसे ही जैसे आदम में रूह ऊपर से नीचे तक फूँकी गई थी। मैंने उसे महसूस किया। और फिर, जैसे ही वह एहसास मेरी पैर की उँगलियों तक पहुँचा, जैसे कभी-कभी टीवी चैनल बंद हो जाता है— तो वो ‘ई’ जैसी बीप आती है?

मेरे कानों में ‘बीप’ सी आवाज़ गूँजी। मेरी नज़र भी हल्की-सी गुलाबी हो गई। मेरा मतलब, मेरी दृष्टि भी थोड़ी अलग-सी हो गई थी। फिर मुझे बहुत हल्का-हल्का महसूस हुआ—बहुत हल्का। जैसे—वाह! ठीक है, यही एहसास है—इतना हल्का!

और उसके तुरंत बाद, असर की अज़ान हो गई। और मैं वुज़ू करने चली गई, बिना ये जाने कि वुज़ू कैसे करते है। किसी ने कहा, “यह करें, वो करें, यह करें, वो न करें।” “ठीक है, ऐसा करें।” और मैं तुरंत अल-ख़ादिम के नमाज़ हॉल में चली गई। और वहाँ बनी अपनी एक दूसरी सहेली के पास खड़ी हो गई। पूरे समय, बस ऐसे ही—इसी तरह। बस ऐसे ही, हाँ—ऐसे ही। और वह मेरी पहली नमाज़ थी, और जहाँ तक मुझे याद है, मैंने तब से कोई नमाज़ नहीं छोड़ी। पहला सज्दा, जिसे मैंने सच में समझा, वह उसी रात मग़रिब की नमाज़ में हुआ। मैं अपनी volunteer से मिलने गई—वह अपनी सहेलियों के साथ थीं। वे कुल पाँच थीं; उनमें से चार ‘रिवर्ट’ थीं। तो हम कैफ़े में मिले और उसके बाद मग़रिब की नमाज़ के लिए हम उनमें से एक के घर गए। मेरे पहले इमाम एक पुरुष थे, और दूसरे इमाम एक महिला थीं। और उन चार रिवर्ट्स ने मुझे उस वक़्त सिखाया कि आख़िरी सज्दा ज़रा लंबा करें और उसी में दुआ करें, क्योंकि उस वक़्त अल्लाह क़बूल फ़रमाते हैं। और मैं आपको बताऊँ—एक दुआ थी जो मैंने हर नमाज़ में की साल के अंत तक। और उसके ठीक-ठीक शब्द मुझे याद हैं, क्योंकि मैंने वो हर नमाज़ में किया। “या अल्लाह, कृपया मेरे माता-पिता मुझे अपनी मुस्लिम बेटी के रूप में स्वीकार कर लें।” तो जब मैं अपनी इस्लाम क़बूल करने की कहानी बताती हूँ, आमतौर पर पहला बड़ा सवाल यही होता है— “अच्छा, आपके पिताका क्या हुआ?

आपकी माता का क्या हुआ?” और मैं बताती हूँ—यह सचमुच दुआ की ताक़त है, क्योंकि मैं तब भी बहुत डर रही थी, बहुत चिंतित थी। दिसंबर में वह बड़ा दिन आया जब मुझे अपने पिता को बताना था कि— मैं पहले ही मुसलिम बन चुकी हूँ। यह मेरा अल्लाह से किया हुआ वादा था। तो मैं उन्हें रात के खाने पर ले गई। खाया पिया इंसान खुश होता है। तो यही मेरी strategy थी। और याद रखिए, लगातार एक पूरा साल दुआ का रहा है— वही दुआ जो मैं हमेशा कहती थी: “या रब, कृपया, मेरे माता-पिता मुझे मुस्लिम बेटी के रूप में स्वीकार कर लें।” बार-बार, बार-बार—मैंने इस दुआ को नहीं छोड़ा। और dessert के अंत में, मैंने हिम्मत जुटाई और पिता से कहा, "डैड, मुझे अपने और इस्लाम के बारे में आपको बताना है।” उसके बाद उन्होंने कहा, “ठीक है, ऐलाइज़ा, आपको कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है।” अरे नहीं। लेकिन उसके बाद, मेरे पिता ने सबसे सुंदर बातें कहीं— सबसे सुंदर बातें। उन्होंने कहा, “जानती हो, ऐलाइज़ा?

अगर आप इब्राहीम (अब्राहम) के ईश्वर पर, मेरी ही तरह, विश्वास रखती हैं, तो मैं खुश हूँ। और अगर यह धर्म आपके दिल को थाम ले और आपको सुकून दे, तो यह ठीक है। और आपको मेरी चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं, और न ही अपनी माँ की और न ही हमारे परिवार की।” फिर उन्होंने गिनवाना शुरू किया—क्योंकि हमारे परिवार में बौद्ध भी हैं, कैथोलिक हैं, प्रोटेस्टेंट हैं— और अब एक मुसलिम भी है। तो सब ठीक हो जाएगा। और वे सचमुच सबसे ख़ूबसूरत— सबसे नरम, सबसे ख़ूबसूरत शब्द थे। और स्वाभाविक है, अगला सवाल यही होता है—मेरी माँ का क्या?

मेरी माँ अमेरिका में थीं। और मेरी योजना—क्योंकि मैं समझदार बेटी हूँ— पहले पिता को बताने की थी, क्योंकि पिता ज़्यादा नरमदिल हैं। और जब भी वे मुझसे मिलते, उसके बाद हमेशा माँ से मिलने जाते। उस वक़्त मेरी माँ अब भी बॉस्टन में रहती थीं। उन्हें किडनी की बीमारी है, इसलिए वो अपना ख्याल रख रही थीं। तो योजना यही थी: मैं डैड को बताऊँ, और डैड माँ को बता दें। तो मेरे डैड बॉस्टन चले गए, और जैसे ही वहाँ पहुँचे, मुझे कॉल किया— लैंड करने के बाद सब हालचाल बताया। मैंने सोचा, “ठीक है, कल वे कह देंगे कि उन्होंने माँ को बता दिया हैं।” एक दिन बीत गया, फिर दूसरा दिन भी। मैं सोच रही थी, मैं माँ को ख़ुद नहीं बताना चाहती। माँ मुझसे बहुत सारे सवाल पूछेंगी। लेकिन करीब पाँच दिन बीत गए—हाँ, पाँच दिन। और मुझे डैड से पूछना पड़ा—“डैड, खामोशी से, सुनिए, क्या आपने माँ को बता दिया?

वो कुछ नहीं कह रही है। और वे बड़े आराम से बोले, “हाँ, मैंने माँ को बता दिया है। सब ठीक है। क्या आप इस बारे में उनसे बात करना चाहेंगी?” मैं बोली, “नहीं, नहीं, नहीं—मैं उनसे इस बारे में बात नहीं करना चाहती।” तो मेरे माता-पिता के साथ यह सबकुछ आसानी से हो गया। वाक़ई, बहुत आसान रहा। और मैं पूरी, पूरी, पूरी, पूरी तरह से मानती हूँ कि यह सब दुआ की बरकत से हुआ। दुआ से कभी, कभी, कभी नाउम्मीद न हों। दुआ को कभी न भूलें। जब तक क़बूल न हो जाए, दुआ करते रहें। जब मैं मुसलिम बनी, तब मुझे ये एहसास हुआ कि मेरा एक परिवार है। पहली बार मुझे ऐसा परिवार मिला, जिसे यह परवाह नहीं थी कि मैं, मैंने अपनी पढ़ाई में क्या अच्छा किया या क्या नहीं। और न ही उन्हें मेरे past से कोई मतलब था। उनके लिए मेरे सिर्फ़ एक मुस्लिम बहन होने भर से ही मेहरबान होना और मेरी देखभाल करना काफ़ी था—यहाँ तक कि जब मैं मुसीबत में होती थी। और मुझे यह पहले कभी नहीं मिला था। मैं इकलौती संतान हूँ। मैं अकेले ही पली-बढ़ी हूँ। और शुरुआत में भले मुझे ऐसा महसूस नहीं होता था, मैं सोचती थी—सब एक-दूसरे को बहन, भाई क्यों कह रहे हैं?

पहले तो मुझे एहसास नहीं होता था, लेकिन अब—मैं किसी हिजाब पहनने वाली को देखती हूँ, तो वह मेरी बहन है। मुझे फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कहाँ से है। मैं उसे जानती भी नहीं, फिर भी वह मेरी बहन है। जब मैं थाईलैंड में चलती हूँ, कभी-कभी मुझे पता भी नहीं चलता कि वो मुस्लिम है या नहीं, लेकिन कोई भाई पास से गुज़रता है और मैं सुनती हूँ—“अस्सलामु अलैकुम।” और मैं वअलैकुम अस्सलाम।” कहती हूँ। जब इस्लाम मेरी ज़िंदगी में आया, तो पहले मैंने अपने मूल्यों को उसी के अनुरूप किया। और फिर धीरे-धीरे अपनी दिखावट भी उसी के मुताबिक़ करने लगी। और मैंने देखा कि हिजाब के साथ, लोगों ने अब मेरी बात सुनीं। सच में सुनी। लोगों ने अब मेरी समझ को सुना, जिसकी मुझे बहुत चाहत थी— क्योंकि मैं उसे शेयर ही नहीं कर पाती थी। मेरी बात ही नहीं सुनी जाती थी। मैं अपनी opinion share नहीं कर पाती थी। मैं कुछ भी शेयर नहीं कर पाती थी। और यह आज़ादी थी। उस गुलामी से आज़ादी। तो इस्लाम आज़ादी है— कहने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, यह चुनने की आज़ादी कि किसे क्या दिखाई दे, मैं क्या पहनूँ। माशाअल्लाह। एक ऐसी महिला के तौर पर जिन्होंने इस्लाम क़बूल किया है, क्या आपको लगता है कि यह धर्म महिलाओं का महत्व घटाता है, उन्हें नीचा दिखाता है?

देखिए, एक गलतफ़हमी है— कि इस्लाम महिलाओं को नीचा दिखाता है, उनका मूल्य कम करता है और उन्हें दबाता है। लेकिन मैं कहूँगी कि यह सत्य से परे है। अब मैं मानती हूँ कि कभी-कभी, कुछ जगहों पर, कल्चर का इस्लाम को मानने पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन अगर हम शुद्ध इस्लाम को देखें, तो मुझे मर्दों के लिए थोड़ा अफ़सोस होता है—माफ़ कीजिए। सच कहूँ, मुझे मर्दों के लिए थोड़ा बुरा लगता है, क्योंकि वही लोग होते हैं जिन्हें बाहर निकलकर काम करना पड़ता है और उन पर बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, जबकि अल्लाह ने औरतों के लिए वाक़ई बहुत-सी रियायतें और सहूलियतें रखी हैं। मर्दों पर यह फ़र्ज़ है कि वे औरतों की वित्तीय, शारीरिक मानसिक—हर तरह से देखभाल करें, हर बात में। हम औरतें—हम मर्दों के लिए नेकी की नीयत से खाना पकाती हैं, उनके कपड़े नेकी की नियत से धोती है। और बेशक, हम उन्हें अल्लाह की ख़ुशी के लिए खुश रखते हैं। लेकिन इस्लाम में, जब आप सही तौर पर अमल करने वाले मर्दों के बीच होती हैं— माशाअल्लाह, माशाअल्लाह—तो आप पर ज़ुल्म नहीं होता। वे...

मेरा मतलब, मेरी बात मानी जाती है, मैं देखी-सुनी जाती हूँ, मैं महफ़ूज़ महसूस करती हूँ। अगर मैं अमल करने वाले मर्दों के बीच हूँ—यक़ीन मानिए— एक वक़्त ऐसा भी था जब मैं एक इस्लामिक एनजीओ में काम कर रही थी, और हम बारी-बारी से तज़किरा करते थे। जब मेरी बारी आती थी, तो सभी पुरुष नज़रें फेर लेते या नीचे कर लेते थे। वे इतना सम्मान देते थे कि ताकते नहीं थे। वे मेरी बात सुनते थे और मेरे रिमाइंडर भी ध्यान से सुनते थे, लेकिन हर बार बहुत इज़्ज़त देते थे। यहाँ तक कि जब मैं Chili’s खाने जाऊँ - अमेरिकी रेस्टोरेंट में जो मलेशिया में हलाल है। मुझे याद है, मैंने यही कुछ पहना था जो अभी पहना है। और वेटर… बांग्लादेश का था। जैसे ही उसने मुझे देखा, उसने “हैलो!” कहा और नज़रें मेज़ की तरफ़ कर लीं। “हैलो मैडम, मैं…

मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?” उन्होंने मुझे पूरी इज़्ज़त दी। माशाअल्लाह। सैकड़ों तरह की जीवन-शैलियों और धर्मों में से—आख़िर इस्लाम ही क्यों? यह भी सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है: "इस्लाम क्यों?” तो मेरा जवाब है—क्योंकि मुझे शरीअत पसंद है। मुझे… मुझे नियम पसंद हैं। और सब लोग हैरान हो जाते हैं—“आपको नियम पसंद हैं?” “इसका मतलब क्या है? आपको नियम पसंद हैं?” “इसका मतलब क्या है?

आपको सच में नियम पसंद हैं?” “हमें तो नियम पसंद नहीं”—मेरे जन्मजात मुस्लिम दोस्त कहते हैं। “हम तो नियमों से दूर भागते हैं। आप क्या कह रही हैं?” तो मैंने कहा—देखिए, एक बहुत उलझी हुई और ख़ालीपन के एहसासों से गुज़रने के बाद, एक सो कॉल्ड semi-celebrity वाली ज़िंदगी जीने के बाद मुझे फ़र्क़ महसूस होता है। आप जो कर रहे है वो सही है या ग़लत, ये नहीं जानने से लेकर, बिल्कुल स्पष्ट होने तक। ये जानना कि यह सही है यह सही नहीं है। और जो बातें बीच में आती हैं— जब तक आप ऐसा कुछ नहीं कर रहे जो इस्लाम के ख़िलाफ़ हो, अल्हम्दुलिल्लाह—सब कुछ बिलकुल साफ़ है। मुझे पता है अपनी ज़िंदगी कैसे चलानी है। मुझे पता है क्या करना है। इसलिए मुझे नियम पसंद हैं। और जब कुछ नियम हमें समझ नहीं आते, जैसे— दो पुरुष गवाह क्यों ज़रूरी होते हैं, या एक पुरुष के बदले दो महिलाएँ क्यों?

एक अच्छा जवाब हमेशा ही मौजूद होता है। हमेशा अच्छा जवाब मिलता है। अगर कोई लड़की अपनी value सिर्फ़ ख़ूबसूरत दिखने में ढूँढ़े, बस दूसरों को सुंदर दिखने में, शोहरत या और चीज़ों में… ऐसी लड़की से आप क्या कहेंगी? खुद से वास्तव में ये पूछें कि क्या ये चीज़ें आपको खुश करेंगी, क्योंकि जब आप मेकअप करती हैं, बाल बनाती हैं, वे कपड़े पहनती हैं और ये सब करती हैं, अगर आप सच में सोचें तो, आप अपनी खुशी दूसरों के हाथ में दे देती हैं। आप उनकी वाहवाही और उनकी acceptence को आकर्षित करना चाह रही हैं। ताकि आप खुश रहें— ये अब उनपर है। आपकी value अब उनके पास चली जाति है। और नाम-शोहरत का क्या? क्या नाम-प्रसिद्धि सच में आपको संतोष देगी?

प्रसिद्धि भी बाहर से मिलती है। प्रसिद्धि भी दूसरे लोगों से ही आती है। आप तब तक मशहूर नहीं हो सकतीं, जब तक दूसरे लोग आपको बहुत बड़ा न कहें। तो क्या सच में आप अपने लिए ऐसा ही चाहती हैं?

हो सकता है—पर नाम कमाने के और भी तरीके हैं। आप फ़रिश्तों के बीच भी मशहूर हो सकती हैं। ठीक है, लेकिन वह तो दिखाई नहीं देते। आप अपनी नेकी की वजह से भी मशहूर हो सकती हैं। आप इससे भी प्रसिद्ध हो सकती है कि आप कितनी नेक हैं। अपने आप पर यक़ीन रख सकती है चाहे जो पहनें, जैसी भी दिखें—फिर भी अपनी बात खुलकर कह सकती हैं, आप दिलचस्प और आत्मविश्वास से लबरेज़ हो सकती है, तो ठीक है—शायद मैं आपकी बात मान लूँ। अपनी असली क़ीमत अपने अंदर ढूँढ़िए और इस्लाम को पढ़िए-समझिए, क्योंकि इस्लाम ही वो चीज़ है जो आपकी इज़्ज़त बढ़ाएगा। इस्लाम ही है जो आपको बोलने का हक़ देगा। आपकी इज़्ज़त करेगा। और यह समझाएगा कि आप कपड़ों और बालों से कहीं बढ़कर हैं। अपने भीतर झांकिये और उन जवाबों को तलाशते रहिए, और तब तक मत रुकिए जबतक वो आपको मिल न जाये।
