# बुद्ध से अल्लाह तक: एक चीनी बौद्ध की इस्लाम तक की यात्रा

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/from-buddha-to-allah-a-chinese-buddhists-journey-to-islam
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=5FCW9eM7G0o
- Channel: Towards Eternity

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मैं एक बौद्ध परिवार में पैदा हुआ। फिर जो मैंने देखा तो मुझे लगा कि ईसाई धर्म में एक खुलापन है। आपको लगभग कुछ भी करने की पूरी आज़ादी है। तब मैंने ईश्वर से प्रार्थना की, "मुझे नहीं पता असली ईश्वर कौन है। मैं आपको ढूँढ़ रहा हूँ, मेरा मार्गदर्शन कीजिए। जब मैं बौद्ध था, तब मैं मंदिर में रहता था। जब मैं ईसाई बना, तो मैंने चर्च की सेवा की। इसलिए मैंने चार साल तक मस्जिद में रहने का फैसला किया। फिर मैंने पाया कि इस्लाम बहुत व्यावहारिक है और संतुलित है, ऐसा मैंने किसी और धर्म में कभी अनुभव नहीं किया। अस्सलामु अलैकुम, शैख हुसैन यी। वालैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह। तो मैं अपने सवाल की शुरुआत यह पूछकर करना चाहता हूँ, शैख हुसैन यी कौन हैं?

क्या आप हमें अपने जीवन के बारे में संक्षेप में बता सकते हैं?

जब मैंने इस्लाम क़ुबूल किया, तो मेरा नाम रखा गया — मुहम्मद हुसैन यी। मैं एक चाइनीज़ हूँ। मेरे जीवन की शुरुआत ऐसे हुई कि मेरा जन्म एक बौद्ध परिवार में हुआ। जैसा कि आमतौर पर होता है, आप जिस परिवार में पैदा होते हैं, तो आपकी परवरिश भी उसी परंपरा और आप अक्सर अपने माता-पिता के रास्ते पर ही चलते हैं। मुझे आध्यात्मिक चीज़ें बहुत पसंद थीं, इसलिए मैं मंदिर से जुड़कर सेवा करना बहुत पसंद करता था। फिर अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह की मर्ज़ी से, एक दिन मैं ईसाई धर्म अपनाने की ओर बढ़ा। ईसाई धर्म अपनाने के बाद, क्योंकि मेरे परिवार के कुछ सदस्य भी इसमें हैं, हमारा परिवार बहुत मिला-जुला है। कोई ईसाई है, कोई बौद्ध है, कोई ताओ मत का मानने वाला है, और कुछ लोग फ्री थिंकर्स हैं। फिर अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह की मर्ज़ी से, मैं किसी ऐसी चीज़ की तलाश में था, जो मेरे दिल को सुकून दे सके और जिसमें मैं यकीन कर सकूं, सिर्फ सुनी-सुनाई बात नहीं, बल्कि कुछ ठोस। ऐसा यकीन जिसमें सबूत हो, फिर अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह की मर्ज़ी से, 1968 में मैंने हज़रत उमर इब्न खत्ताब की जीवनी पढ़ी। और उसके बाद मैं मुस्लिम बन गया। और इस तरह मैंने 1968 से एक मुस्लिम के रूप में अपना जीवन शुरू किया। तो जब आप बौद्ध धर्म पालन का कर रहे थे। तब आपका जीवन आस्था के मामले में कैसा था?

आप किस पर विश्वास कर रहे थे? ज़ाहिर है, एक बौद्ध के रूप में, आप गौतम बुद्ध की शिक्षा पर विश्वास करते हैं उनके मूल्यों और आध्यात्मिक मार्गदर्शन पर यक़ीन रखते हैं। सबसे अहम बात जो वो सभी को समझाने की कोशिश कर रहे थे, कि दुख एक हकीकत है। तो क्या वो आख़िरत में विश्वास करते थे? क्या उन्होंने आख़िरत की शिक्षा दी? या वो एक ईश्वर में आस्था रखते थे?

मुसलमान बनने के बाद मुझे ऐसा एहसास हुआ कि वो जानते थे। इसीलिए वो प्रार्थना करते थे। वो सजदा भी करते थे। उनकी प्रार्थना में आप एक गहराई देख सकते हैं। जब आप 'सुख' और 'दुख' की बात को देखते हैं, तो आप समझते हैं कि अल्लाह ने क्या कहा है: "वलक़द बअसना फी कुल्लि उम्मतिन रसूला" وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا मेरा मानना है कि अल्लाह ने फ़रमाया, "निश्चित ही हमने हर क़ौम की तरफ़ एक रसूल भेजा।" कुरान में 25 नबियों का उल्लेख हुआ है। लेकिन बहुत से नाम कुरान में उल्लेख नहीं हुए। मैं नहीं जानता, लेकिन मुझे महसूस होता है कि शायद वो भी उन्हीं में से थे। क्योंकि उन्होंने कभी नहीं कहा कि लोग उनकी पूजा करें। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि कोई ईश्वर नहीं है। बल्कि वो खुद सजदा करते थे। वो हमेशा किसी अदृश्य ताक़त से बातचीत करते थे। बाकी उनके अनुयायी ने बाद में क्या किया, वल्लाहु आलम। यह बिलकुल मूसा और ईसा की तरह है। ईसा ने कभी यह नहीं कहा कि वो ईश्वर हैं या ईश्वर के बेटे हैं। अब उनके अनुयायी कहते हैं कि वो ईश्वर हैं। वो पिता हैं, पवित्र पुत्र हैं और सब कुछ एक में है। यह ईसा की गलती नहीं है, यह उन लोगों की गलती है जो उनके बाद आए, लोगों ने नया धर्म बना लिया, और उनका नाम इस्तेमाल किया। तो मैं पर्सनली फील करता हूँ कि जब से मैं मुस्लिम बना, तो मैं बेहतर तरीके से समझ पाया जो गौतम बुद्ध कर रहे थे। और उन्होंने कैसे सभी को तज़कियतुन नफ़्स की ट्रेनिंग दी, कि अपनी इच्छा के ग़ुलाम मत बनें। यह दुनिया कुछ भी नहीं है। आप एक बौद्ध परिवार में पले-बढ़े थे। और किस बात ने आपको अपने आस्था पर सवाल उठाने पर मजबूर किया?

वो कौन सी चीज़ थी जिसने आपको सवाल करने पर मजबूर किया?

मेरे लिए, क्योंकि मुझे बचपन से ही आध्यात्मिक चीजें पसंद थीं। अगर कोई शैतान, भूत, या फ़रिश्तों की बात करता— तो मैं उन्हें अनुभव करना चाहता था, अगर संभव होता। अगर लोग कहते हैं, "कब्रिस्तान मत जाना, वहाँ भूत होते हैं।" तो मैं वहाँ जाना चाहता था, हाँ, बस कुछ घंटों के लिए, अगर एक रात वहाँ सोने को मिल जाए। हमने कोशिश की, पूरी कोशिश की, ज़िंदगी में नए अनुभव लेने की। क्योंकि ये सब किताबों में नहीं मिलता। अब हुआ यूँ कि बाद में मैंने देखा कि बहुत सी चीज़ें हैं, जो इस धर्म में मना थीं। मुझे नहीं पता वो बुद्ध की असली बात थी या नहीं, लेकिन जो हम मान रहे हैं उसके मुताबिक, हम कोई भी माँस नहीं खा सकते। किसी भी जीव को मारना सख़्त मना है। तो आपको शुद्ध शाकाहारी बनना पड़ता है। मतलब ये कि आप दुनिया से खुद को अलग कर लेते हैं। तो एक नौजवान होने के नाते मुझे लगता कि कुछ तो कमी है इसमें। ये संतुलित नहीं लगता। मेरे लिए ये तर्कसंगत नहीं था। लेकिन हाँ, कुछ अच्छी बातें थीं जैसे कि इंसान को विनम्र रहना चाहिए, हम अपना तज़क़िया-ए-नफ़्स कैसे कर सकते हैं?

अपनी ख्वाहिशों के पीछे मत भागो, दुनिया से ज़्यादा लगाव मत रखो। शादी के बारे में मत सोचो, बस एक अच्छा इंसान बनो। तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता कि इसमें कोई संतुलन नहीं है। इसलिए मेरे मन में शक़ पैदा हुआ। फिर मैंने किसी और रास्ते की तलाश शुरू की। तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये महसूस हुआ कि मेरी ज़िंदगी में जैसे कुछ कमी है। मैं सोचने लगा, क्या सच में धर्म इतना मुश्किल है? या फिर ये सब कुछ बाद में उन लोगों ने जोड़ दिया है जो अपने आप को अनुयायी कहते हैं?

बहुत सी बातें अब बिल्कुल सही नहीं लगती थीं। मुझे वाकई ऐसा महसूस हुआ कि मेरी ज़िंदगी में कुछ तो कमी है। और लगा, अब मुझे कुछ बदलना होगा। और फिर यहीं से मेरी बड़ी बहन से मेरा जुड़ाव हुआ, वो ईसाई थीं। मुझे उन्होंने encourage किया कि मैं उनके साथ चर्च जाऊँ, और मैंने वैसा ही किया। फिर जो मैंने देखा तो मुझे लगा कि ईसाई धर्म में एक खुलापन है। आपको लगभग कुछ भी करने की पूरी आज़ादी है। बहुत करने की छूट है। हालाँकि असली शिक्षा में भी बहुत सी पाबंदियाँ हैं, लेकिन जिस तरह आजकल लोग ईसाई धर्म को मानते हैं, जैसे उसमें सब कुछ चल जाता है। जब तक आप यीशु से प्रेम करते हैं, उनको मानते हैं, वही आपके उद्धार हैं। फिर आप बच जाएँगे। ये मुझे बहुत दिलचस्प लगा। क्योंकि पहले जहाँ बहुत सी चीज़ों से मना किया जाता था, अब बहुत कुछ करने की आज़ादी मिल रही थी। क्यूँकि मैं समर्पित रहना चाहता था। जब मैं बौद्ध था, तो मैं एक समर्पित बौद्ध बनना चाहता था। जब मैं ईसाई बना, तो मेरी ख्वाहिश थी कि मैं एक समर्पित ईसाई बनूँ। क्यों?

क्योंकि अगर ये सच में ईश्वर का संदेश है, तो इसे अकेले अपने तक सीमित रखना सही नहीं है। मुझे अपने दोस्तों के साथ साझा करना चाहिए। और मेरे बहुत सारे दोस्त मुसलमान थे। तो मैंने चाहा कि मैं उन्हें येशु की शिक्षा के बारे में बताऊँ। लेकिन जब मैंने ये मिशन शुरू किया, उनसे बातचीत करनी शुरू की, उन्होंने मुझसे कुछ सवाल पूछे, जिनसे मैं चौंक गया। वो भी येशु में मानते हैं। मुसलमान ईसा को मानते हैं। उन्हें ईसा मसीह पर यकीन करने में कोई दिक्कत नहीं है, बस फर्क ये है कि हम उन्हें अलग तरह से मानते हैं। हम मानते हैं कि वह पिता है, पवित्र पुत्र है, ट्रिनिटी की धारणा है और इसी तरह की बातें। तो उसी वक़्त मुझे महसूस हुआ — कि अब मुझे और रिसर्च करनी चाहिए। इस तथाकथित सत्य धर्म के बारे में और समझने की कोशिश करनी चाहिए। अल-हक़ सच्चाई जानना ज़रूरी है। आधी सच्चाई नहीं, पूरी सच्चाई। आपकी इस्लाम की ओर की यात्रा कैसे शुरू हुई?

और इस्लाम की किस बात ने आपको अत्यधिक प्रभावित किया?

जब मैंने अपने दोस्तों को ईसाई धर्म के बारे में बताना शुरू किया, तो उन्होंने मुझसे कुछ सवाल पूछे। मैं जवाब नहीं दे पाया। फिर मैं पादरी के पास गया और उनसे ट्रिनिटी के बारे में समझाने को कहा, यानी पवित्र पिता, पवित्र पुत्र और पवित्र आत्मा लेकिन वो मुझे संतुष्ट नहीं कर पाए। क्योंकि मुझे सोचना पसंद है, सवाल करना पसंद है। वे नहीं कर पाएँ और बस इतना कहा: "तो पवित्र आत्मा के तुम्हारे पास आने की प्रतीक्षा करो। पवित्र आत्मा तुम्हें सब समझाएगी।” तो बस, यही उन्होंने कहा और मैं इंतज़ार करता रहा। तो मैंने इश्वर से प्रार्थना की, “मुझे नहीं पता असली इश्वर कौन है।” मैं आपको ढूंढ रहा हूँ। मेरा मार्गदर्शन कीजिए। मैं कहता कि मुझे उस ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए जो जानता है कि मैं उसकी तलाश कर रहा हूँ। मैंने किसी नाम का इस्तेमाल नहीं किया। मैंने बस कहा, “हे ईश्वर, तू जानता है मैं तुझे ढूंढ रहा हूँ।” फिर अचानक मेरे दिल में कुरान पढ़ने की बहुत तेज़ चाहत हुई। मैं जानना चाहता था, मुसलमान आखिर क्या मानते हैं?

लेकिन किसी ने मुझे कुरान नहीं दिया। सच्चाई की खोज करने की मेरी प्रवृत्ति बहुत मज़बूत है। अल्हम्दुलिल्लाह, मैंने सैय्यिदना उमर अल ख़त्ताब की किताब पढ़ी। जो इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा थे, जो कभी इस्लाम के दुश्मन थे, रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के भी दुश्मन थे, यहाँ तक कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मारना चाहते थे। लेकिन कुरान से उनको हिदायत मिली। और फिर वो मुस्लिम बन गए। और सिर्फ़ नाम के मुसलमान नहीं, बल्कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथी बने। और फिर वो दूसरे ख़लीफ़ा बने। और उनके समय में, रोम और फ़ारस इस्लामी शासन के अधीन आ गए। और इतिहास में एक बहुत बड़ा बदलाव आया। यहीं से मेरा दिल खुल गया। यह धर्म बहुत ही ताकतवर है, जो एक आदमी को पूरी तरह बदल सकता है। वो आदमी जो इस्लाम के खिलाफ था, रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का दुश्मन था, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मारना चाहता था। फिर कुरान के साथ, कुरान की हिदायत के ज़रिए, वो पूरी तरह बदल गए। यही मेरी इस्लाम की यात्रा की शुरुआत थी। फिर मुझे लगा कि इस्लाम बहुत व्यावहारिक है, बहुत संतुलित है। हाँ, इसमें "करो" और "मत करो" दोनों ही बातें हैं— लेकिन "मत करो" वाली बातें बहुत कम हैं। आप नमाज़ पढ़ते हैं, लेकिन साथ ही मेहनत भी करनी पड़ती है। आप परिवार भी बना सकते हैं, आप लेन-देन कर सकते हैं, शादी-ब्याह कर सकते हैं, सब कुछ अच्छी तरह से संतुलित है। और जब मैंने इस्लाम को और गहराई से जाना, तो पाया कि इस्लाम परफेक्ट है। यह आपको A से Z तक सब समझाता है, सबकुछ तैयार है। आपको खुद कुछ बनाना नहीं पड़ता। बस उस तरीके को अपनाना होता है। कैसे खाना है, कैसे पीना है, कैसे कपड़े पहनने हैं, कैसे बात करनी है, कैसे काम करना है — सब कुछ बहुत ही साफ़ तरीके से बताया गया है। अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द। ऐसा मैंने किसी और धर्म में कभी अनुभव नहीं किया। दूसरे धर्म सिर्फ बातें करते हैं, लेकिन उनके पास कोई सबूत नहीं, कोई विस्तार नहीं। इस्लाम सिर्फ सुनी-सुनाई बात नहीं है। ना सिर्फ़ जो अल्लाह ने कहा, बल्कि पैगंबर ﷺ को इसलिए भेजा गया ताकि वो हर चीज़ करके हमें दिखाएं। तो वह मुख्य बात क्या थी जिसने आपको ये विश्वास दिलाया कि इस्लाम शत प्रतिशत सत्य है?

जब मैंने इस्लाम को गहराई से पढ़ना शुरू किया, और भी ज़्यादा सीखना शुरू किया। फिर मैं मदीना गया, वहाँ और भी ज्ञान मिला, और लगभग पूरी कुरान पढ़ी। अल्हम्दुलिल्लाह, मैंने पाया कि यह ईश्वर की एकमात्र किताब है, जिसमें कभी कोई बदलाव नहीं आया, ना इसमें कोई मिलावट हुई, ना इसमें छेड़छाड़ हुई। यहाँ तक कि एक आयत भी नहीं बदली जा सकती। कोई कमी नहीं। माशाअल्लाह। यह एक और चमत्कार है। मैं कहता हूँ कि मुझे गर्व है कि मैं उस किताब पर यकीन करता हूँ, जो 100% शुद्ध है। जिस दिन यह नाज़िल हुई तब से लेकर आज तक, बिना बदले, बिना छेड़छाड़ के। और जब मैं दुनिया भर में घूमता हूँ, यहाँ वहाँ जाता हूँ, जहाँ भी जाता हूँ, कुरान वही रहता है। और जब मुसलमान नमाज़ पढ़ते हैं — एक ही भाषा में। जब अज़ान दी जाती है — एक ही भाषा में। जब इबादत की जाती है — एक ही भाषा में। अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द। और जब मुझे ये समझ आया, तो मुझे यक़ीन हुआ कि मैं अल्लाह से दुआ कर रहा हूँ। मैं अल्लाह से दुआ नहीं, ईश्वर से दुआ कर रहा हूँ, की मुझे रास्ता दिखाए। और जब यह एहसास मेरी ज़िंदगी में बहुत गहराई से उतर गया, तो मैंने कहा, अब मैं तैयार हूँ। और देखिए, जब मैंने मुसलमान बनने का इरादा किया, भाई अहमद, यह इतना आसान नहीं था जितना मैं सोचता था। मैं खुद जाकर इमाम साहब से मिला और कहा, "मैं मुसलमान बनना चाहता हूँ, क्या आप मेरी मदद करेंगे?" कभी-कभी मुझे हैरानी होती थी जब मैं अपने किसी मुस्लिम दोस्त से मिलता और कहता, "मैं अब मुसलमान हूँ।" तो वे पूछते, "कब?

कब बने? और आपने इस्लाम क्यों चुना?" जैसे उन्हें इस बात पर हैरानी नहीं होती कि मैं मुसलमान बन गया, बल्कि उन्हें इस बात पर हैरानी होती थी कि मैंने इस्लाम क्यों चुना। यह बात मुझे बहुत दुख देती है। लेकिन मैं किसी को दोष नहीं देता, क्योंकि मेरे अपने अनुभव में जब मैं बुद्धिज़्म से, फिर क्रिश्चियनिटी से गुज़रा तो मैंने देखा कि बहुत से लोग बस अनुयायी होते हैं, अंधे अनुयायी। वे बस बिना नॉलेज के मानते हैं। वे बस कह देते हैं, "मैं बौद्ध हूँ", "मैं ईसाई हूँ", लेकिन वे खुद अपनी किताब तक नहीं पढ़ते। कितने ईसाई हैं जिन्होंने बाइबल पढ़ी है? कितने बौद्ध हैं जिन्होंने धर्मा पढ़ा है?

बहुत कम। आप गिन सकते हैं। लेकिन सभी मुसलमान कुरान पढ़ते हैं। लाखों मुसलमान कुरान को ज़ुबानी याद कर लेते हैं। क्या आप सोच सकते हैं?

यह चमत्कार अद्भुत है। और यही चीज़ मेरी आस्था को और मजबूत बनाती चली गई। अल्लाह पर मेरा यकीन, कुरान और इस्लाम की ओर मेरा झुकाव, कभी भी कम नहीं हुआ। हालाँकि मुझे कई जगहों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन इन सबके बावजूद मेरा ईमान कम नहीं हुआ। फिर मैं मस्जिद गया, इमाम साहब से मिला, उन्हें अपने इरादे के बारे में बताया। और जैसे ही कलमा पढ़ा, अल्हमदुलिल्लाह, मैं अब मुस्लिम हूँ। लेकिन मुझे ये नहीं पता था कि अब मैं कहाँ रहूँगा। क्योंकि मैं बचपन से ही आत्मनिर्भर रहा हूँ। मैं एक आत्मनिर्भर इंसान हूँ। इसलिए मैंने इजाज़त माँगी, "क्या मैं मस्जिद में रह सकता हूँ?" क्योंकि मैं किसी पर बोझ बनना पसंद नहीं करता। मुझे ये इसीलिए पसंद था क्योंकि जब मैं छोटा था और बौद्ध था, तो मैं बौद्ध मंदिर में ठहरता था। जब मैं ईसाई था, तब चर्च की सेवा करता था। तो मुझे इबादत की जगहों में रहना अच्छा लगता है। क्योंकि वहाँ आप किसी को परेशान नहीं करते और अच्छे लोग ही ऐसी जगहों पर आते हैं। ऐसा मेरा मानना है। सिर्फ प्रैक्टिसिंग मुस्लिम ही मस्जिद आएँगे। सिर्फ़ प्रैक्टिसिंग क्रिश्चियन ही चर्च जाएंगे। सिर्फ़ प्रैक्टिसिंग बुद्धिस्ट ही मंदिर जाएँगे। नॉन प्रेक्टिसिंग नहीं जाएंगे। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं चार साल के लिए मस्जिद में ही रहूँगा। हाँ, लेकिन मैं अलग-अलग मस्जिदों में रहता रहा। मैंने हिजरत की कभी एक हफ्ता यहाँ, कभी दो हफ्ते वहाँ, कभी कुछ महीने किसी और मस्जिद में। अगर माहौल अच्छा लगता तो मैं वहाँ ज़्यादा दिन रुक जाता। चार साल तक मैं मस्जिदों में ही रहा। अल्हम्दुलिल्लाह। मैंने बिलकुल सही फैसला किया, क्योंकि यही रहने के लिए सबसे बेहतरीन जगह थी, और यही तरीका है जल्दी सीखने का। क्योंकि जो लोग मस्जिद आते हैं, वो प्रैक्टिसिंग होते हैं। तो मैं उनसे पूछ सकता था, और सीख सकता था। आपके इस्लाम धर्म अपनाने पर आपके परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी?

आपके परिवार, आपकी माँ, आपके पिता की? उह...

हाँ, मेरी माँ थोड़ी हैरान थीं, क्योंकि मैं परिवार का सबसे छोटा बेटा था। क्योंकि मैं परिवार का सबसे छोटा बेटा हूँ, मुझे डर था कि उन्हें दुख होगा, या शायद वे मुझे रोकने की कोशिश करेंगे शायद मुझे मारेंगे, या मुझ पर कोई दबाव डालेंगे। यही एक डर मेरे दिल में था। लेकिन अल्लाह सबसे बड़ा है। इसीलिए जब मैंने इस्लाम क़बूल किया, तो फिर घर नहीं गया। मैंने अपने माँ-बाप को कुछ भी नहीं बताया। मेरी माँ उस समय ज़िंदा थीं, मेरी नानी भी थीं, लेकिन मैंने बस खुद को उनसे दूर रखा, ताकि वो न जानें कि मैं कहाँ हूँ, और वे मुझे परेशान न करें। फिर मेरे एक अच्छे उस्ताद ने मुझसे कहा, "तुम्हें वापस जाना चाहिए, उनसे बात करनी चाहिए।" फिर जब मैं घर पहुँचा, तो जाहिर है कि मेरी माँ थोड़ी आहत थीं। शुरुआत में उन्हें डर था कि शायद वो अपने बेटे को खो देंगी। मैं अलहम्दुलिल्लाह, मैंने थोड़ा-बहुत सीखा हुआ था — तो मैंने उनसे कहा: "माँ, मैं आपका बेटा ही हूँ, मैं एक चीनी ही हूँ।" इस पर वो चुपचाप अपने कमरे में चली गईं, और दरवाज़ा बंद कर लिया। लेकिन फिर मैंने अपनी नानी से बात की, अपने भाई- बहनों से बात की, और वे सभी बहुत खुले मिजाज़ के हैं। अल्लाहु अकबर। वे खुश थे, उन्होंने मुझसे पूछा, "तुम मुसलमान कब बने?" "कैसे बने?" "अब तुम्हारी हालत कैसी है?" वो सभी बहुत खुले मिजाज़ के हैं। और इससे मुझे बहुत सुकून मिला। बाद में मैं घर बार बार जाने लगा, जिससे उन्हें भी अच्छा महसूस होने लगा। फिक्र करने की ज़रूरत नहीं कि मैं कहाँ रहता हूँ। मैंने बस इतना कहा, "मैं एक अच्छे, बड़े घर में रह रहा हूँ।" मैंने ये नहीं बताया कि मैं मस्जिद में रहता हूँ। और फिर जैसे-जैसे वक्त गुज़रा, हम और करीब आते गए, और जब उन्होंने मेरी ज़िंदगी में बदलाव देखे, तो उन्हें मुझ पर गर्व होने लगा। और फिर वह ज़्यादा सहज महसूस करने लगी, क्योंकि अब मैं घर आने लगा था। मैं उनके साथ नहीं रहता था, लेकिन घर आता-जाता था। मैं उनके साथ समय बिताता, उनसे बातचीत करता, उन्हें फल लाकर देता, कुछ भी हलाल चीज़ हो, वो घर ले जाता। तो इस तरह उन्हें कोई फर्क महसूस नहीं होता था। देखिए, जब हम खुद को इस्लाम के मुताबिक संवारते हैं, और इस्लाम की खूबसूरत शिक्षाओं को अपने व्यवहार से दिखाते हैं, तो मेरा यकीन है कि हर कोई इस्लाम से मुहब्बत करेगा। हिदायत तो अल्लाह की तरफ़ से ही होती है, निश्चित तौर पर। ठीक है, क्या आपके परिवार या आपके करीबी सर्कल में से कोई आपके बाद मुसलमान बना?

अल्हम्दुलिल्लाह। मेरे बड़े भाई, वो इस दुनिया से जाने से पहले मुसलमान बन गए थे। हमने उनकी जनाज़े की नमाज़ अपने सेंटर में अदा की। और मेरी माँ, वो भी मुसलमान बन गई थीं। अल्हम्दुलिल्लाह। पश्चिमी में और तुर्की में और दुनिया में कई लोग बौद्ध धर्म में ध्यान लगाकर आराम पाने की कोशिश करते हैं। क्या बौद्ध धर्म वास्तव में इंसानी रूह को आराम दे सकता है? और ध्यान और नमाज़ के बीच क्या अंतर है?

आम तौर पर लोग ऐसी तुलना करते हैं। अगर आप गौर से देखें, तो आप पाएंगे कि इस्लाम हर चीज़ में ज़्यादा मुकम्मल और संतुलित है। इस्लाम आपको ये नहीं सिखाता कि बस बैठ जाएं, meditation करें और कुछ न करें। हम मानते हैं — كل حركة فيها بركة यानि जब आप चलते हैं, कुछ करते हैं — तो अल्लाह की बरकत आती है। तो आप देखेंगे, इस्लाम में नमाज़ कितनी खूबसूरत अमल है। क्योंकि हमारी नमाज़ — हमने खुद से नहीं बनाई है। हम जो कुछ भी नमाज़ पढ़ते हैं, वो हमारी तरफ़ से नहीं है। बल्कि अल्लाह ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को यह सिखाया,और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हमें सिखाया। ये एक बेहद ख़ास अंदाज़ का संवाद है। इसमें रुकू (झुकना) है, सजदा (सजदा करना) है। और बिलकुल, अगर आप बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को देखें, या मूसा (अलैहिस्सलाम), ईसा (अलैहिस्सलाम) की शिक्षा में भी आपको रुकू और सजदा मिलेगा। وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ , आदि। लेकिन फिर लोगों ने उस पर अमल करना छोड़ दिया। लोग बदल गए। और पीढ़ी दर पीढ़ी लोग असली शिक्षा को भूलते चले गए। उनके पास अब कोई असली ग्रंथ ही नहीं बचा। जिससे वो दुबारा सीख सकें। बौद्ध धर्म के साथ भी बिलकुल ऐसा ही हुआ। हर चीज़ का इतना ज़्यादा अनुवाद हो चुका है कि अब सब कुछ नियंत्रण से बाहर हो गया है। असली तौरात नहीं रही, उसकी जगह तलमूद ने ले ली है। इंजील का भी यही हाल है। और असली शिक्षा खो चुकी है। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह, सिर्फ कुरान ही है, जो आज तक वैसा ही है, जैसा भेजा गया था। अल्लाहु अकबर। ठीक है, जब ध्यान करते हैं तो क्या लोग कुछ भी न सोचने की कोशिश करते हैं?

और क्या आपको लगता है कि यह संभव है? और रूह के लिए वाकई ही मददगार है?

मैडिटेशन एक तरीका है अपने अंदर की नकारात्मक चीज़ों को दूर करने का। मैं मैडिटेशन को तज़किया-ए-नफ़्स मानता हूँ। मनन करें, अपनी सभी नकारात्मक बातों को याद करें और उन्हें शुद्ध करने की कोशिश करें। जो कुछ भी नकारात्मक है, उसे सकारात्मकता से जीतने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए बहुत सोच-विचार करना ज़रूरी है। अगर आप नकारात्मकता के बारे में सोचेंगे ही नहीं, तो उससे कोई मदद नहीं मिलेगी। आपको यह सोचना होगा कि जो कुछ भी हुआ, उसके पीछे कोई वजह ज़रूर थी। यही वजह है कि ‘कर्मा’ है। हम इसे क़ज़ा और क़द्र कहते हैं। जो भी हो وَرَاءَ كُلِّ مَسْأَلَةٍ سَعَادَةٌ जैसा की हम जानते हैं। कि इसके पीछे यानी, हर मुश्किल के पीछे एक सीख छुपी होती है। हमें हमेशा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। अल्लाह कभी भी कुछ बिना वजह नहीं करता। अब जब हम मुसलमान हैं, तो इस्लाम बहुत पारदर्शी है, बहुत मुकम्मल है। इस से जुड़ना और समझाना भी आसान है। तो मैडिटेशन उस दौर में एक तरीका था। लेकिन अगर आप इस्लाम में देखें, तो सबसे बेहतरीन तरीका है — अल्लाहु अकबर। सोचिए, नमाज़ शुरू करने से पहले आप कितना कुछ करते हैं। आपको पहले अपने जिस्म को साफ़ करना होता है। आप वुज़ू करते हैं। देखिए इस्लाम कितना मुकम्मल है। और आप क्या सीखते हैं जब आप अपने हाथ धोते हैं, मुँह, नाक, चेहरा धोते हैं?

क्योंकि ये सब दुनिया के लिए खुले होते हैं, और हमारे चारों ओर सब कुछ इतना करप्टेड है। इसीलिए मैं अपने छात्रों को, या जिससे भी मिलता हूँ याद दिलाता हूँ, कृपया कभी भी अपनी नमाज़ मत छोड़िए। आप बस अल्लाह से जुड़े रहिए, فَاذْكُرُونِي أَذْكُرْكُمْ अल्लाह हमेशा आपके साथ है। चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, कृपया कभी भी अपनी नमाज़ मत छोड़िए। आपको पैग़ंबर मुहम्मद अलैहिस्सलातु वस्सलाम के बारे में सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली बात क्या लगती है?

सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम। उनसे तुलना करने जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। क्योंकि उन्हें हम सबके लिए रहमत बनाकर भेजा गया था। उन्होंने हमें अल्लाह तक पहुँचाने का रास्ता दिखाने में अपनी ज़िंदगी लगा दी। और वही तो रास्ता है। इसलिए कभी भी नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत को नजरअंदाज़ मत कीजिए। मैं दुनिया भर में मौजूद अपने तमाम मुसलमान भाइयों और बहनों से गुज़ारिश करता हूँ आप जहाँ भी हो, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दरकिनार मत कीजिए। आप कहते हैं कि आप अल्लाह पर ईमान रखते हैं, तो अल्लाह ने एक शर्त रखी है "क़ुल इनकुन्तुम तुहिब्बुनअल्लाह फ़त्तबीऊनी युहबिबकुमुल्लाह" आपको पैग़म्बर को मानना ही चाहिए। तो कृपया विनम्र बनिए। जो अल्लाह ने फरमाया, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, बस उसी का पालन कीजिए। तो आप कभी गलत नहीं होंगे। एक चीनी के रूप में, आप शायद दुखी महसूस कर सकते हैं, कि आपका देश जैसे कि एक अरब से अधिक लोग, उनमें से अधिकांश अब नास्तिक हैं। आपको क्या लगता है, हम उनके दिलों तक कैसे पहुँच सकते हैं?

आपके अनुसार हम उन्हें इस्लाम से कैसे परिचित करा सकते हैं? आपको क्या लगता है? क्या तरीका है?

इसीलिए मैं बहुत मेहनत कर रहा हूँ। आप जानते हैं, मैं हमेशा उनके साथ संवाद में रहता हूँ। मैं हमेशा उनसे जुड़ा रहता हूँ। मैं बहुत खुले मिज़ाज का हूँ, और मुझे लगता है कि, वो लोग भी बहुत खुले मिज़ाज के हैं, भाई अहमद जब मैं अपने लोगों से बात करता हूँ, जो नास्तिक हैं, तो मैं उनसे कहता हूँ, "मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, क्या आप जानते हैं?" सबसे पहली बात, जब आप कहते हो कि "मैं किसी ईश्वर को नहीं मानता," तो आप समझो कि आप इस्लाम के आधे रास्ते पर हो। क्योंकि जब कोई मुस्लिम बनता है, उसे सबसे पहले कहना होता है: "ला इलाहा" "कोई ईश्वर नहीं है।" आपको बस "इल्लल्लाह" कहना है। और ये बहुत आसान है। "ला इलाहा" तो आप पहले ही कह चुके हैं। अगर आप कह देते हैं तो अलहम्दुलिल्लाह। तो मैं उन्हें समझाता हूँ, और उन्हें ये महसूस कराता हूँ कि इस्लाम हमारे सामने है, खूबसूरत है, आसान है, सादा है। अल्लाह ने कभी भी धर्म को मुश्किल नहीं बनाया। और आज तक, हाँ आज तक, जहाँ भी मैं सफ़र करता हूँ, जहाँ भी मैं अपने लोगों से मिलता हूँ, मैं हमेशा उनसे बात करता हूँ। और अलहम्दुलिल्लाह, कुछ लोग बहुत ही सकारात्मक हो जाते हैं, और सीखना शुरू कर देते हैं। मैं उन्हें कुरान देता हूँ, और कहता हूँ, "पढ़ो, इसका मतलब पढ़ो।" और दो साल बाद, वे मेरे पास आते हैं और कहते हैं, "शुक्रिया शेख, मैंने पूरा कुरान पढ़ लिया है।" और यह बहुत ही आश्चर्यजनक था, बहुत दिलचस्प। वे लोग बहुत ही सकारात्मक होते हैं। बेशक, हिदायत अल्लाह ही देता है। हमें दुख होता है, लेकिन उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। नमाज़ पढ़ते रहिए, और अपनी तरफ़ से भरसक कोशिश करते रहिए। और दावत का सबसे बेहतरीन तरीका है, भाई अहमद, खुद एक अच्छी मिसाल बनना। क्योंकि कर्म शब्दों से ज़्यादा प्रभावी होते हैं। यदि दुनिया के सभी गैर मुसलमानों से बात करने का मौका होता, तो आप उनसे क्या कहते?

अगर आपके पास सिर्फ कुछ पल होते। मैं हमेशा लोगों को एक बात याद दिलाता हूँ, मुसलमान और इस्लाम में बहुत बड़ा फ़र्क़ है। इस्लाम एक शिक्षा है, और मुसलमान इस्लाम को मानने वाले लोग हैं। मैं एक मुसलमान होने पर फ़ख्र करता हूँ क्योंकि मैं इस्लाम का पालन करता हूँ। इस्लाम मेरा पालन नहीं करता। कृपया इस्लाम और मुसलमान के बीच ये फ़र्क़ समझिए। और इस्लाम किसी एक नस्ल का नहीं है। इस्लाम हम सबका है। इसीलिए तो यह I-S-L-A-M है। मैं अंग्रेजी में इसका अनुवाद ऐसे करता हूँ: I Shall Love All Mankind अगर आपको समझ नहीं आती तो सवाल कीजिए और सीखिए। लेकिन सही जगह से सीखिए। और अच्छे लोगों के साथ ज़ुल्म मत कीजिए। हम तैयार हैं। घबराइए मत। हम यहाँ किसी को जज करने नहीं आए। क्योंकि हर इंसान के पास ये मौका है, कि वो सच्चाई की तलाश करे। नेक बनने का, और प्रैक्टिसिंग मुस्लिम बनने का। क्यूंकि इस्लाम हम सबका है। जज़ाकल्लाहु ख़ैरन शेख़ हुसैन यी। हमारे साथ होने के लिए आपका बहुत धन्यवाद। हम आपको साथ पाकर सम्मानित महसूस करते हैं। अल्लाह आपको इनाम दे और महफूज़ रखे। आमीन, भाई अहमद।
