# 3 दुश्मनों से मोमिनों तक – इस्लाम में 10 धर्मांतरण जो सभी को चौंका गए

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/from-enemies-to-believers-10-conversions-to-islam-that-shocked-everyone
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=_boXHMYe01w
- Channel: Towards Eternity

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ये इस्लाम था एक आक्रामक और खतरनाक धर्म ये सच नहीं हो सकता! Please God, Please!, कुछ भी हो पर इस्लाम नहीं!

मैं एक नास्तिक था। मुझे धर्म में कोई मतलब नहीं दिखा। ये आज़ादी को नियंत्रित करने का एक तरीक़ा था। और इसीलिए जब आप धर्म से छुटकारा पाते है तो उसके साथ ईश्वर से भी छुटकारा पा लेते है। मैं मानता था कि अगर ईश्वर का कोई धर्म होता तो उसके पास सुबूत होते उसके साकार, भौतिक और स्पष्ट सुबूत होते। इन तीन सालों के दौरान मैंने ये चीज़ बना ली थी। वो बम मेरे शहर में एक इस्लामिक सेंटर था। रमज़ान में जुमे की दोपहर वो सब वहाँ मौजूद थे। मैं उसे आधी रात को वहाँ रखने वाला था, उससे पहले की रात। और ये आसान था, क्योंकि सबको मुसलमानों से नफ़रत है। वो जिनसे मैंने इस्लाम के बारे में अपनी धारणा ली थी वह एक बुरी मिसाल थे। इस्लाम वह नहीं है। यह इस्लाम के ज़्यादा अनुरूप है। तो मैं बस पढ़ता रहा और पढ़ता रहा मेरी बुरी भावनाएँ धीरे-धीरे खत्म होने लगीं। वो बस दूर हो गईं। मैं इस्लाम से बड़ी आसानी से प्रभावित हो गया, लेकिन मैं झिझक रहा था, इस्लाम की नकारात्मक छवि के करण!

मैंने क़ुरान पढ़ा, और बार बार पढ़ता रहा। और फिर तीसरे दिन तक मैं क़ुरान में खो गया। जैसे कि मैं उसे घंटों पढ़ने के लिए प्रतिबद्ध था। फिर ऐसा हुआ कि मेरे सेलमेट ने कहा तुम ये किताब नाश्ते के बाद से पढ़ रहे हो। तुम खाना खाओगे या नहीं? और मैंने सोचा, ओफ़्फ़ "मैं इस किताब में डूब चुका हूँ।" पर क्यों? इस्लाम से पहले आपकी ज़िंदगी कैसी थी? आप किसमे आस्था रखते थे? अधिकांश अमेरिकी बच्चों की तरह मैं बहुत सी ईसाई शिक्षाओं के साथ पला-बढ़ा, मुझे वो सब पता थीं, लेकिन आपको सच बताऊं, तो मैं...

मुझमें राष्ट्रवादी सोच पैदा हो रही थी। धर्म का कोई अमलदखल नहीं था । वह बहुत mythological लगता था, छल-कपट, शायद, लेकिन मैं अपने देश में विश्वास करता था। बेहतर उदाहरण नहीं होने के कारण, मैं लोगों से कहता हूं, राष्ट्र का झण्डा ही मेरा सलीब था। यह समझाने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है। मैं एक Southern Baptist Christian था। मैं एक ऐसी जगह में पाला बढ़ा जिसे बाइबिल बेल्ट कहा जाता है, जहाँ जितने McDonalds है उससे अधिक churches है। मैंने बाइबिल पढ़ी, मैं एक यूथ मिस्टर था, मैं एक मिशनरी था। मैंने Guatemala में एक mission में काम किया है। जब मैंने Christianity को छोड़ा उस समय मैं Southern Baptist church में एक यूथ मिस्टर था। कुछ समय के लिए, हाँ, मैं नास्तिक था। मुझे धर्म में कोई मतलब नहीं दिखता था। मुझे लगा कि यह एक तरीक़ा है लोगों को खुश रहने से रोकने का और उन्हें वो करने से रोकने का जो वे करना चाहते हैं। ये आज़ादी को नियंत्रित करने का एक तरीक़ा था। और इसीलिए जब आप धर्म से छुटकारा पाते है तो उसके साथ ईश्वर से भी छुटकारा पा लेते है। खैर, इस्लाम की ओर मेरी यात्रा कॉलेज के अंतिम वर्ष में शुरू हुई जब मैंने फैसला किया कि मैं एक बैपटिस्ट उपदेशक बनना चाहता हूँ। मैंने कॉलेज छोड़कर सेमिनरी जाने का निर्णय नहीं लिया, बल्कि अपनी डिग्री पूरी करने और फिर सेमिनरी जाने का फैसला किया। तो, मेरे पास एक साल बचा था। और अपनी उत्सुकता के कारण, मैंने अपने सभी दोस्तों, सहकर्मियों, हर किसी को जिनसे मैं मिला, धार्मिक बातचीत में घसीटना शुरू कर दिया ताकि मैं सोच सकूँ कि लोगों को बचाने का कार्य कैसे किया जाये। ठीक है, पूरा मिशन उन्हें ईसाई धर्म में convert करने का होने वाला था। मैं हमेशा से ही ईश्वर में विश्वास करता रहा हूं। मेरे जीवन में कभी ऐसा क्षण नहीं आया, "हम्म, क्या हो यदि ईश्वर हो ही नहीं?" मेरे दिल में ऐसी समस्या कभी नहीं रही। मैं बाइबल पढ़ रहा था, और मैं जैकब के बारे में एक विशेष पद पढ़ रहा था जहाँ जैकब कहते है...

पहला पद जो मैंने पढ़ा, वह था, "कोई भी इंसान ईश्वर को देखकर उसके बाद ज़िंदा नहीं रह सकता।" और मैं सोच रहा था, लेकिन लोग यीशु को ईश्वर कहते हैं, और सबने यीशु को देखा है। और यीशु को देखकर भी कोई नहीं मरा। तो, पद था, "कोई भी मनुष्य ईश्वर को देखकर उसके बाद जीवित नहीं रह सकता।" मैंने पन्ना पलटकर दूसरा पद जैकब की दूसरी कहानी पढ़ी। जैकब न केवल ईश्वर को देखते हैं, वह ईश्वर के साथ कुश्ती लड़ रहे हैं। यह एक कुश्ती है, जिसमे उन्होंने ईश्वर को जांघ से पकड़ रखा है और कहते है, जबतक आप मुझे आशीर्वाद नहीं देते मैं आपको जाने नहीं दूँगा। ओके, एक मिनट! आपने अभी कहा कि यदि आप ईश्वर को देख भी लें, तो उसके बाद कोई भी इंसान जीवित नहीं रह सकता। ठीक है, तो फिर जैकब उसके बाद भी ज़िंदा कैसे है?

और ईश्वर का एक स्वरूप क्यों है? जिसे आप पकड़ सकें? और ईश्वर, सर्वशक्तिमान होते हुए भी जैकब से दूर क्यों नहीं हट सकता? कहानी आगे बढ़ती है। तो फिर मैंने क्या किया? 14 साल का मैं! मैंने अपना हाथ उठाया। पादरी आये और बोले, "मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?" मैंने उन्हें दो पद दिखाये और उनकी प्रतिक्रिया थी, "हम्म, मुझे तो यह भी नहीं पता था कि यह बाइबल में है।" और मैंने कहा, मैं एक तरह से... क्या? लेकिन आप तो बाइबल के पादरी हैं। आप ही तो हैं जिनको हमें बाइबिल सिखानी है। और बतौर एक 14 साल का लड़का, मैंने उनसे पूछा,"मैं इसे कैसे सुधारूं? "मैं इसका अर्थ कैसे समझूं?

मैंने स्वयं को अन्य धर्मों के बारे में पढ़ते हुए पाया। मैंने यहूदी धर्म के बारे में पढ़ा। मैंने लगभग पांच मिनट तक हिंदू धर्म के बारे में पढ़ा। मैंने एक किताब पढ़ी और मैंने कहा, यह तो... नहीं, बिलकुल नहीं। मैं मानता था कि अगर ईश्वर का कोई धर्म होता तो उसके पास सुबूत होते। उसके साकार, भौतिक और स्पष्ट सुबूत होते तो मैं इन सभी अन्य धर्मों से पूछ रहा था: Judaism, Hinduism, Buddhism,Taoism—जितने भी थे। इन सभी में एक जैसी परस्पर विरोधी बातें मिली। तो मेरे शहर में एक इस्लामिक सेंटर था। मैं उन लोगों के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानता था। मैंने उन्हें देखा था। तो मैं पहले उस जगह की निगरानी करता था, और कई बार, केवल एक बार नहीं। तो अगर मैं यहाँ एक बम रखूं, क्या वे इसे ढूँढ पाएंगे?

तो मैं नहीं चाहता था कि ऐसा हो। तो पीछे की तरफ़ मुझे इसके लिए एक अच्छी जगह मिल गई थी। और यह आसान था क्योंकि उस समय साझा दुश्मन, सभी मुसलमानों से नफरत करते थे। और मैंने इन तीन सालों के दौरान, मैंने वही किया मैंने यह चीज बना ली। वो बम। मैंने समय लिया। मैं एक बड़ा संदेश देने वाला था। अब, बहुत से लोग मानते है कि ये पागलपन था, कई स्तरों पर क्योंकि आप ऐसा कर के कैसे बच पाएंगे?

मेरा इससे बचकर निकलने का कोई इरादा नहीं था। मुझे पता था कि मैं पकड़ा जाऊंगा। मुझे पता था कि मुझे मुकदमे का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि वे मुझे फांसी दे देंगे। मैं इसपर सहमत था। क्योंकि मुझे अपना झण्डे में लिपटा हुआ ताबूत नहीं मिलने वाला लेकिन मुझे यक़ीन था कि अंततः ठीक यही लोग मुझे हीरो के तौर पर याद करने वाले हैं क्योंकि मैं सही था। और मेरी बेटी ने मुझे उस मुस्लिम बच्चे के बारें में बताया था जिसके साथ वह स्कूल मे थीं और मैँ गुस्से से फट पड़ा था। तो मैंने सोचा मैंने अपने परिवार को निराश किया क्योंकि मैं उसे सुरक्षा नहीं दे पाया। मैं उसे स्कूल में इन मुसलमानों से नहीं बचा पाया, तो ये मेरा मुद्दा था। मैं पूरी तरह से हार चुका था। और मेरी बेटी, सात साल की, मेरी तरफ ऐसे देखती है जैसे मैं सबकुछ खो चुका हूं। और वह, उसकी आँखों में देखने से ऐसा लग रहा था मानों वह इसपर भी सवाल उठा रही थी कि अब वह मुझसे प्यार भी करती है या नहीं क्यूंकि मैं बहुत नस्लवादी हो रहा था, या इसीलिए कि इन लोगों के खिलाफ हो रहा था। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे एक खास तरह से दिखते थे या वे कुछ खास करते थे, बस इतना ही। उसके बाद मेरे मुंह से कई तरह की गालियां निकलीं और उन्हें हर तरह की नस्लवादी गालियाँ दी मैं समझता हूँ कि यही सबसे सही तरीका है इसे कहने का। मैं ऊपर अपने बेडरूम में चला गया मैं बिस्तर पर बैठा और रुआँसा हो गया। मैंने खुद से कहा कहा, ठीक है, तुम्हें कोई सबूत ढूँढना होगा, तुम जानते हो, तुम सही हो। मुझे खुद पर यकीन था, मैं सही था क्यूंकि वे लोग बुरे हैं। वे लोग हम सबको मारना चाहते है, हैं ना?

और, और लेकिन अपनी बेटी को दिखाने के लिए मेरे पास कोई ठोस सबूत नहीं था, मेरे पास नहीं थे। इसीलिए मुझे सुबूत लाना था। मुझे वह कहाँ मिलेगा? मस्जिद में, और कहाँ...

और मैं वहाँ गया, उन लोगों से मिला और मैंने अपना परिचय एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करवाया जो इस्लाम के बारें में थोड़ा और सीखना चाहता है। ये पूरी तरह झूठ नहीं था, मगर मैंने उन्हें नहीं बताया कि मेरा असल मक़सद क्या है। तो, मैंने कइयों से बातचीत की, बहुतों से मेरा परिचय हुआ था और बहुतों से मेरी बातचीत हुई थी। वह शुक्रवार का दिन था। फिर मैं शुक्रवार को गया क्योंकि रविवार को वे वहाँ नहीं होते। मैंने उपदेश, यानि ख़ुत्बा सुना। और मुझे लगा, ये तो अच्छी बातें कर रहे है। ये लोग ऐसी बातें इसीलिए कर रहे हैं क्यूंकि मैं यहाँ हूं। मैं पहले से जानता हूँ। शायद उन्होंने लोगों को तहखाने में रखा होगा, प्रॉपगंडा videos के लिए मुझे पता है। यानी, ये सब चीजें थीं जो मेरे दिमाग में चल रही थी। सही?

और फिर उन्हौने मुझे कुरआन दिया और मुझे कहा गया कि इसे घर ले जाइए, इसे पढ़िए, अगर कुछ पूछना हो तो आकर पूछिये। मैं बहुत खुश था! क्योंकि मेरे मन में मुझे लगा कि मुझे बुराई का सबसे बड़ा प्रतीक सौंप दिया गया है। और मुझे कोई ऐसा भी मिलने वाला है जो इसे समझाएगा! Wao!

यह तो लॉटरी जीतने से भी बेहतर है। मैं कभी भी एक बुद्धिजीवी व्यक्ति नहीं कहलाया। लेकिन तभी मेरी समझ में आया। बेशक़, वो जिनसे मैंने इस्लाम के बारे में अपनी धारणा ली थी वह एक बुरी मिसाल थे। इस्लाम वह नहीं है। यह इस्लाम के ज़्यादा अनुरूप है। तो मैं बस पढ़ता रहा और पढ़ता रहा मेरी बुरी भावनाएँ धीरे-धीरे खत्म होने लगीं। वो बस दूर हो गईं। और मैंने कुरआन में कुछ आयतें पढ़ीं जैसे "अल्लाह ने हमें अलग-अलग क़ौम और क़बीलों में बनाया। ताकि हम एक-दूसरे से सीख सकें, एक दूसरे से नफरत करने के लिए नहीं" अच्छा, ठीक है। वो मैं यहाँ देख सकता हूँ, क्यूंकि यह व्यक्ति स्थानीय सरकार और रोटरी क्लब एवं अन्य संगठनों के साथ काम करता है। अच्छा ठीक है, मैं समझ गया। तो सब कुछ इस तरह से होने लगा। और मैंने इसे पढ़ा और मैं बस...

मेरे लिए कुरान की language और उसकी delivery बेहद unique थी। और मैंने सोचा, इस किताब को जिस तरह से लिखा गया है वह अद्भुत है। और इस तरह से मैंने क़ुरान को पढ़ा और खूब पढ़ा। और इस तरह, तीसरे दिन, मैं वास्तव में कुरान पढ़ने में मगन हो गया। ये ऐसा था कि मैं इसे घंटों तक पढ़ने के लिए प्रतिबद्ध था। तो हुआ ये कि, मेरे सेलमेट ने कहा, ए भाई, ए, क्या तुम खाना खाने नहीं जाओगे? मैंने कहा, "डिनर?" और मैंने अपने क़ुरआन से सर ऊपर उठाया। मैंने कहा, "डिनर?" उसने कहा, हाँ, तुम ये किताब नाश्ते के बाद से पढ़ रहे हो। तुम्हें खाना खाना है या नहीं? मैंने कहा, "हाँ, शायद मुझे खाना चाहिए।" मैंने कुरान को बंद किया और सोचा, "ओफ़्फ़, मैं इस किताब में पूरी तरह से मगन हो गया हूँ।" पर क्यों?

क़ुरआन के चमत्कार तो बेहिसाब है। कोई एक सबसे बड़ा चमत्कार जैसा कुछ नहीं है। लोग सोचते हैं कि चूँकि मैं क़ुरआन की भाषा पर बात करता हूँ, तो मेरे लिए यही क़ुरआन का सबसे बड़ा चमत्कार है। नहीं। भाषा सिर्फ़ उनमें से एक है। एक मनोवैज्ञानिक के लिए, आयत में नफ़्स चमत्कार हो सकती है। एक geologist के लिए, कुछ और हो सकता है। एक historian के लिए, कुछ और हो सकता है। एक sociologist के लिए, कुछ और हो सकता है। एक philosopher के लिए, कुछ और हो सकता है जो उनके लिए सबसे बड़ा चमत्कार हो। एक linguist के लिए, कुछ और हो सकता है। एक comparative religion expert के लिए, कुछ और हो सकता है। क़ुरआन के चमत्कार असल में इस पर निर्भर करते हैं कि उन्हें देखने वाला कौन है। यह क़ुरआन के चमत्कारों की सबसे शानदार बात है। और यह सिर्फ़ एक लकड़ी का एक साँप में बदल जाने जैसा नहीं है, सही?

बल्कि चमत्कार तो ये है कि हर इंसान के लिए इस किताब में अपना चमत्कार ढूँढ सकता है। ये सच नहीं हो सकता। और फिर भी... जैसे मैंने ख़ुद से कहा, "Please God, Please, कृपया ये सच न हो।" कुछ भी हो पर इस्लाम नहीं! Please! मतलब, कुछ भी हो, पर इस्लाम न हो। "आख़िर यही सच क्यों हो?" हाँ! क्यूंकि मैंने कहा नहीं! भला मैं इस धर्म को कैसे मान सकता हूँ? मुझे west में इस्लाम की छवि के बारें में पता था। और मैंने ख़ुद से कहा, अगर मैंने अपने माँ-बाप, दोस्तों, या किसी को भी बताया कि मैं मुसलमान बन चुका हूँ। असंभव!! तो इसलिए मैं इस्लाम से बड़ी आसानी से प्रभावित हो गया, लेकिन मैं इस्लाम की नकारात्मक छवि के करण झिझक रहा था!

एक शुक्रवार मैं वापस इस्लामिक सेंटर गया और दो लोगों से मिला उन्हीं दोनों बंदों से जिनसे मेरा परिचय कराया गया था। लेकिन मैं कुछ हद तक उनके साथ एक रिश्ता बना पाया था। और मैंने उनके पास गया, मैंने कहा, सुनो, मैं शहादा लेना चाहता हूं। सच्ची कहानी। वे एक दूसरे के अगल-बगल खड़े थे। उन्हौने एक दूसरे को देखा। उन्हौने वापस मुझे देखा। दोनों ने एक साथ कहा "नहीं" सच्ची कहानी। O my God! मैं हैरान था। मैंने कहा, "'नहीं' का क्या मतलब है?" उन्होंने कहा, "भाई, आपको अभी और भी सीखना होगा।" तो उन्हौने एक दूसरे को देखा और फिर मेरी तरफ देखा। ठीक है, आ जाओ सच्ची कहानी!

ये एक अलग ही अनुभव था जब हम कलमा पढ़ रहे थे, तो पहले इसे अंग्रेज़ी में कहा, और फिर हमने इसे अरबी में दोहराया। और उस दिन, जुमा 1991 को, मैंने कहा, और मैं मुसलमान हो गया। मैं अपने नाई के पास जा रहा था। मुझे याद है कि मैं अपने नाई के पास था। मैंने कहा, "अरे, क्या यह नमाज़ का समय नहीं है? अभी ज़ुहर का समय है, है ना?" वह बोला, "हाँ, लेकिन," उसने कहा, "क्या आप पहले से मुस्लिम है?" मैंने कहा, "नहीं, लेकिन मैं दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ने की कोशिश करता हूँ क्योंकि इससे मुझे शांति मिलती है और मैं काफ़ी करीब हूँ," मैंने कहा। "मैं वास्तव में काफ़ी करीब हूँ।" फिर उसने मुझसे कुछ पूछा जो शायद उस समय मुझे चाहिए था। उसने कहा, "क्या हो अगर कल आपकी मृत्यु हो जाये?

या अगर आप आज मर जाएँ?" क्या आप एक मुस्लिम के रूप में मरेंगे या गैर-मुस्लिम के रूप में?" और सुब्हानअल्लाह, इसने वास्तव में मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। और उस समय मुझे इसका उत्तर नहीं मिला, लेकिन नाई के पास जाने के बाद घर जाते समय, मैं वास्तव में खुद से पूछ रहा था, "हाँ, मैं कैसे मरने वाला हूँ? मैं कैसे मरूंगा?" मैं कहाँ जाऊं?

मेरा मतलब है, मौत कभी-कभी सबसे अच्छी reminder होती है। और मुझे याद है कि घर जाते समय मैंने अपने दोस्तों को फोन किया था कि कल मुझे कलमा पढ़ना है। मुझे ये करना है। मैं convinced हूँ। जब मैंने कलमा पढ़ा, तो वह दस महीनों के विरोध के बाद था। अंदर एक संघर्ष चल रहा था। एक भीतरी जंग। ये जानते हुए भी कि यही सच्चाई है, लेकिन कभी-कभी इसे न अपनाने के बहाने ढूँढना। दस महीनों तक। ये मेरे अंदर एक 10 महीनों के जंग की तरह थी। और अचानक से वह जंग ख़त्म हो गई। किसी और जंग की तरह इसके लिए मैं बस खुश था कि चलो ये जंग ख़त्म हो गई। लेकिन इस तरह नहीं कि जैसे मैं हार गया था बल्कि मैं इस जंग में जीत महसूस कर रहा था। और मैंने अपने दिल में ऐसा ही महसूस किया। यह एक सही फैसला था। बस मैंने ख़ुद से यही पूछा, "इतनी देर क्यों कर दी?" क्यों?

मैं उस स्टोर पर काम करता था, और फिर नमाज़ का वक्त हो जाता। मैं दौड़कर जूते वाले हिस्से, शू वेयरहाउस में जाता और जल्दी से नमाज़ पढ़ता। फिर वापस आकर काम करता, असर का वक्त होता तो फिर जाता, फिर लौटता, फिर जाता, फिर लौटता। मैंने नमाज़ को पाबंदी से पढ़ना शुरू कर दिया। मेरे सहकर्मी सभी हिस्पैनिक थे। वे मुझे नौमान नहीं बुलाते थे, वे मुझे अली कहते थे। जैसे, "यो, अली, क्या कर रहे हो, लड़के?" "तुम इतनी अजीब हरकतें क्यों कर रहे हो? "अरे, तुम मेरी तरफ देख क्यों नहीं रहे? मुझे समझाना पड़ता कि मैं नमाज़ पढ़ रहा हूँ। "अरे, भई तुम खुदा से बात करते हो।" "अरे, तुम उनसे कहकर मेरी प्रमोशन करवा दोगे?" "मुझे सैलरी बढ़वानी है। मतलब इस तरह...

फिर उन्होंने मुझसे इस बारे में सवाल पूछने शुरू कर दिए। मुझे इस्लाम के बारे में कुछ भी पता नहीं था। लेकिन मेरे दोस्त, मेरे Dominican, Puerto Rican, पड़ोस के Cuban दोस्त, सहकर्मी, वो सब यूं थे कि, "तो, क्या मैं जहन्नुम में जाने वाला हूँ?" मैं कहता, मैं नहीं जानता। "अरे, तुम pork नहीं खा सकते, है ना? मैं तो अभी खा रहा हूँ। "तुम्हें कैसा लग रहा है?" इसके पीछे एक मजेदार कहानी भी है, क्योंकि शहादा लेने के बाद, फिर भी मैं अपनी पत्नी को कुछ नहीं बता रहा था, ठीक है? वह जानती थी कि मैं मस्जिद जा रहा हूँ, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या सोचे। तो मैं वहाँ गया, और शहादा लिया, फिर घर वापस आया और बस सोफे पर धप्प से बैठ गया, जैसे... मैं अभी काम से वापस आया हूँ, कुछ ऐसा ही, ठीक है?

और वो बोली, तो सबकुछ ठीक है? क्योंकि वह परेशान है कि मैं कुछ कर बैठूंगा, है ना? उसे कोई अंदाजा नहीं था। और मैंने कहा, "नहीं, सब कुछ बढ़िया है।" वह बोली, "ठीक है, ठीक है।" मैंने उसे देखा और कहा, "मैं एक मुसलमान हूँ" यह एक और सच्ची कहानी है। मज़ेदार है, लेकिन यह पूरी तरह सच है। तो उसने कहा। मैंने कहा, "हां, मैंने शहादा लिया है" उसने कहा, "क्या? और फिर मेरी इस्लाम के बारे में सतही जानकारी, ठीक है?

मैंने इसको उससे जितना अच्छे से हो सकता था समझाने की कोशिश की। बपतिस्मा जैसे उदाहरणों का उपयोग करते हुए। और वह ऐसी थी कि जैसे उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या सोचे। वह उठी और कहा, ठीक है, मैं तुम्हें अभी कुछ बताने वाली हूँ। मैं अपने सिर में कुछ भी नहीं पहनने वाली हूँ। ठीक है, तुम मुसलमान नहीं हो, तो मुझे तो लगा ही नहीं कि यह कोई बातचीत हो सकती थी। कोई बात नहीं। और फिर वह थोड़ी देर बाद वापस आई और बोली, और एक और बात, अगर तुम एक से ज़्यादा बीवी रखना चाहते हो, तो मैं उनमें से एक नहीं बनने वाली। और मैंने सोचा, मैं सोच रहा था, जैसे, यार, मुझे नहीं लगता कि मुझे ये वाला चाहिए.

तो उसने शहादा लिया। हम यूनिवर्सिटी से निकल रहे थे। मैं अभी भी थोड़ी हैरानी में था, पर मैं मज़ाक़ करना चाह रहा था। मुझे मज़ाक़ करना पसंद है। तो मैंने उसे देखा और कहा, मैं गाड़ी चला रहा था और मैंने उसे देखा और कहा, तो अब तुम मुसलमान हो उस एक से ज़्यादा बीवी वाली बात पर क्या कहती हो? उसने मेरी तरफ देखा। इस तरह चेहरे पर गुस्से की झलक दिखाते हुए उसने कहा, मुझे यह गाड़ी रोकने पर मत मजबूर करो। मैंने कहा, गाड़ी तो मैं चला रहा हूँ। तुम गाड़ी कैसे रोकोगी? चला तो मैं रहा हूँ। वह कहती है, मैं इसे रोक दूँगी। तो मैंने कहाँ - ये सही है!

मेरी अब की पत्नी, जिनसे मेरी शादी को चौंतीस साल हो चुके हैं, से मेरी मुलाकात कॉलेज में हुई थी, और तब हम शादीशुदा नहीं थे। हम मेरी ग्रेजुएशन तक शादी का इंतजार कर रहे थे। लेकिन हम तीन साल से डेट कर रहे थे। हमारी सगाई हो चुकी थी। हमने शादी plan कर रखी थी। मैं यह सभी mental, research कर था हूँ। वह सोचती थी कि मैं एक बैपटिस्ट पादरी बनूंगा। मैंने तय किया था कि मुझे एक मुसलमान बनना है, ठीक है?

लेकिन मैंने किसी को बताया नहीं था। मैं ये सब अंदर ही अंदर केआर रहा था। जब मैं मस्जिद गया और मैंने फिर कलमा पढ़ा और मैं घर आया, मैंने कहा, "मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ। " वह बोली, "क्या?" "मैं मुसलमान बनने वाला हूँ। तुम्हें पता है, मैंने कलमा पढ़ा, मैं मुसलमान बन गया।" और उसका चेहरा, उसने मुझे देखा, मेरा मतलब है, वह Hi से "what" पर आ गई। तुमने क्या किया?" मैंने कहा, "मैं मुसलमान बन गया।" वह बोली, "तुमने ऐसा क्यों किया..." और वह चिल्लाने लगी और नाराज़ हो गई, और उसने कहा, "मुझे नहीं पता ये कहाँ से आया? मुझे नहीं..." और उसने उन चीज़ों की सूची बनानी शुरू कर दी जो वह कभी नहीं करने वाली थी। मैं बोला, "शांत हो जाओ।" बस, बस मेरे लिए खुश रहो। मुझे परवाह नहीं है कि तुम क्या करती हो।" सही?

"यह मेरे लिए है।" तो, वह शांत हो गई। मुझे वह किताब मिली, हलाल और हराम वाली। तो, मैं पढ़ रहा था, और मैंने बहुत जल्दी सीख लिया कि मुसलमान रिबा, interest में deal नहीं करते। खैर, मैंने फ़ाइनेंस में ग्रेजुएशन किया है। मैंने ब्याज दरों में विशेषज्ञता हासिल की, पैसे से पैसा कैसे कमाया जाता हैं, और अब मैं Baptist minister भी नहीं हूँ। तो मैंने सोचा, ठीक है, अब मैं क्या करने वाला हूं? तो मैं जो भी काम मिल सकता है, उसकी तलाश शुरू करता हूं और मुझे एक ट्रकिंग सेल्स प्रतिनिधि के रूप में काम मिल गया। तो, फोन पर businesses को कॉल करना, कहना, "अपने उत्पाद को भेजने के लिए हमारी ट्रक लाइनों का उपयोग करें।" ठीक है?

और बस ये शुरू किया, बस इनकम की खातिर। मैंने हलाल और हराम पुस्तक को थोड़ा और पढ़ा, और उसमें लिखा है, "मुसलमान सूअर का मांस नहीं खाते।" तो, मैं अपनी पत्नी के पास गया, मैंने कहा, "अरे, मैंने कुछ सीखा है।" वह बोली, "क्या?" मैंने कहा, "मुसलमान सूअर का मांस नहीं खाते।" तो, जब तुम डिनर बनाओ या कुछ भी, मुझे मत देना। बस इसे छोड़ दो।" वह कहती है, "तुम्हें क्या हो गया..." मेरा मतलब, वह मुझे sad look देती और थोड़ी नाराज़ होती। और फिर, जैसे मैंने किसी cult को join कर लिया हो, वास्तव में वह यही सोच रही थी। और वह बोली, "मैं यह नहीं करने वाली-" और वह आगे कहने लगी कि वह क्या-क्या नहीं करने वाली है। मैंने कहा, "तुम्हारे बारे में चिंता मत करो। जो चाहो करो। बस मुझे खुश रहने दो।" कुछ पन्ने और पढ़ा, और उसमें लिखा था, "मुस्लिम पुरुष सोना नहीं पहनते।" और मैंने पहले ही शादी के लिए सोने की एक अंगूठी चुन रखी थी। मैं उसके पास गया, मैंने कहा, "अरे, क्या हम इस अंगूठी को चांदी में बदल सकते हैं?" उसने अपनी सगाई की अंगूठी उतारकर कमरे में फेंक दी, और कहा, "मैं नहीं..." और वह नाराज़ हो गई, फिर शांत हो गई। और फिर, "मैं कभी नहीं..." और मैं सोच रहा था, "ठीक है।" लेकिन वह आगे बढ़ती रही। लंबी कहानी को संक्षेप में कहूँ तो, हमने अंततः उससे बात करके मस्जिद में जाने के लिए और इस्लामी रीति से शादी के लिए मना लिया ...

और मैं चर्च गया और पहले से नियोजित धन से भी शादी कर ली। तो, दो शादियाँ। लेकिन वह बस मुझे झेल रही थी। मैं उसे वास्तव में पसंद था, लेकिन उसे लगता था कि मैं जो कर रहा था वह अजीब है। कुछ और हलकों (बैठकों) के बाद, और एक दिन मैं घर आया, और उसने कहा, "मुझे लगता है कि मैं तैयार हूँ।" मैंने पूछा, "किसके लिए तैयार हो?" "मुस्लिम बनने के लिए। लेकिन मैं ये सब नहीं करने वाली..." और उसने मुझे उन चीजों की सूची दी जो वह नहीं करने वाली थी। मैंने सोचा, "अरे, यह तो मेरे मुताबिक से हो रही है। हाँ, ठीक है। अच्छा। तुम एक मुसलमान..." वह एक मुसलमान बन गई। लंबी कहानी को संक्षेप में कहें तो। उसने जो कुछ कभी भी नहीं करने का कहा था, अब करती है। मैंने अपने पिता को फोन किया, जैसा कि मैंने जेल में हमेशा किया था। और मैंने उनसे कहा कि मैं मुसलमान बन गया हूं। और मेरे पिता एक सुपर क्रिश्चियन और बहुत, कट्टर थे। उन्होंने पूछा, "तुमने क्या किया?" और मैंने कहा, "मैं मुसलमान बन गया हूं।" "तुम 'Moon God' की इबादत करते हो?" "नहीं, मैं किसी 'Moon God' या चाँद की पूजा नहीं करता, मैं एक ईश्वर की पूजा करता हूँ, यीशु के ईश्वर की, मूसा और अब्राहम का खुदा" और उन्होंने कहा, "नहीं, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।" "सुनो, तुम इस्लाम पर हो..." और उन्होंने एक अपशब्द कहा। और उन्होंने मुझसे कहा, मुझे अंतिम चेतावनी दी। उन्होंने कहा, "देखो, तुम जानते हो, तुम्हारी छह अंकों वाली आय, तुम्हारी छह अंकों वाली विरासत, वह खत्म हो जाएगी। जो चीजें तुम मेरे बाद विरासत में पाने वाले थे, वो सब खत्म हो जाएगी।” मेरा परिवार पेट्रोलियम उद्योग में है, इसीलिए काफी संपन्न है। और मैंने कहा, "आप मुझे disown करने वाले है?" उन्होंने कहा, “आज के बाद, अगर तुम इस्लाम धर्म पर अड़े रहे, तो तुम हमारे लिए मर चुके हो। तुम्हारी सारी विरासत, ख़त्म।” और उन्होंने कहा, “बेटा, मुझे परखने की कोशिश मत करो। मैं कल ही अपने वकील के पास जाऊँगा और वसीयत बदलवा दूँगा और तुम पूरी तरह कंगाल हो जाओगे। तुम्हारे पास कोई आमदनी नहीं होगी, मेरी तरफ से कुछ भी नहीं। तुम मेरे लिए मर चुके होगे। अपने भाइयों और बहनों के लिए मर चुके होगे। अब तुम्हारी खैर नहीं।" इसलिए जो भी कहना हो सोच समझकर कहो। अब बताओ, क्या तुम इस्लाम छोड़ोगे?

या इस झूठे धर्म में बने रहोगे?

और मैंने कहा "इससे पहले कि मैं इसका उत्तर दूं, मैं आपको कुछ बताना चाहता हूं। मैं आपकी हर बात मानूंगा सिवाय इस एक बात के।" और उन्होंने कहा, "क्यों, इससे पहले कि तुम मेरे लिए मर जाओ, मुझे समझाओ, क्यों?” मैंने कहा, "पिताजी, मुझे अपना फैसले ख़ुद करने होंगे। यह छह अंकों की विरासत से बढ़कर कुछ और है। यह विरासत में संपत्ति मिलने से भी बढ़कर कुछ और है। इस जीवन के बाद भी कुछ और है। और मुझे इस जीवन की परवाह नहीं। तो जब बात निजात (मुक्ति) की है, तो आप अपना पैसा अपने पास रख सकते हैं। इसे मेरे भाइयों, मेरी बहनों को दे दें। इसे दान में दे दें, मुझे कोई परवाह नहीं। मुझे इस पर अड़े रहना पड़ेगा कि मैं मुसलमान बनूँ और मुसलमान ही बना रहूँ।” और ये रहा मैं, 32 साल बाद भी, मुसलमान। अल्हमदुलिल्लाह। तो उसके बाद, मैंने मुसलमान बनने पर और मुसलमान बने रहने पर ज़ोर दिया, मुझे लगभग दो सप्ताह बाद डाक से एक पत्र मिला। उन्होंने ठीक वैसा ही किया था। वह अपने वकील के पास गए थे। मुझे जो धनराशि विरासत में मिलनी तय हुई थी वह 600,000 डॉलर थी। और यह 90 के दशक की शुरुआत की बात है। तो यह धनराशि बहुत बड़ी थी। तो फिर मैं इस पर क़ीमत क्यों लगाऊंगा...

मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता, चाहे वो 600 मिलियन डॉलर ही क्यों न हो। देखिए, आप और मैं कब्र में जाएंगे, और हमें अल्लाह सुब्हानहु व तआला के सामने खड़ा होना होगा, वो जो अल- कह्हार है। और हमसे अपनी ज़िंदगी में क्या किया उसको लेकर सवाल होना है। तो मेरे दादा को दिल का दौरा पड़ा था। वो अस्पताल में थे और मैं Pensacola, Florida, जहाँ मैं रहता था, से वापस आया था ताकि मैं उनके साथ रह सकूँ। अस्पतालों में एक waiting room होता है और वहाँ एक टेलीफोन होता है। कोई न कोई हमेशा ही उसके पास बैठा होता है जो उन सभी families के calls का जवाब देता है जिनके मरीज़ surgery के लिए भर्ती होते है। तो मैं वहीं बैठा हुआ था और मेरे इस्लामी भाइयों को पता था कि मेरे दादा बीमार है। वहाँ एक सऊदी भाई बैठे थे। उनका नाम मुहम्मद अल ओतैबी था। तभी फ़ोन बजा, और मेरी Aunt जो कि, जिनकी आवाज़ हमारी पूरी family में सबसे ऊँची है और बड़ी दूर से भी सुनाई देती है, तो फ़ोन बजा और उन्होंने झट से उठा लिया। मुझे नहीं पता क्या बातें हुई पर इतना अंदाज़ा लगा पा रहा हूँ कि उनसे पूछा गया होगा कि "क्या हारून वहाँ है?" और फिर मेरी आंटी बोलीं "हारून, हारून...

क्या यहाँ कोई हारून है? या हारून की फ़ैमिली? और मैं बस अपनी कुर्सी में दुबक गया और फिर मुहम्मद ने कहा ओ, ठहरो कार्ली, कार्ली क्या वहाँ कार्ली है? और फिर अब मेरी Aunt की जिज्ञासा बढ़ गई थी। वो हैरान हो गई। फिर मैं सुनता हूँ," हुँ? कार्ली? इस्लाम?

"तो,, इस्लाम?" "हुँह"उन्होंने ऐसे किया और फ़ोन मुझे पकड़ा दिया, और मैंने कहा, "हाँ, हेलो। वालेकुमस्सलाम। हाँ, ओके, मुझे जाना होगा। bye" तो उसी समय मेरी पूरी फ़ैमिली को एक ही बार में सबकुछ पता चल गया। सब जान गए। और उन सब का reaction बस ये था ‘हुँह’ ये बहुत simple था। कोई ऐसी असाधारण घटना जिसके बाद आपको महसूस हुआ हो कि अल्लाह के साथ आपका खास कनेक्शन है जब मैं जेल से बाहर आया तो एक शर्त यह थी कि मुझे नौकरी करनी होगी। अगर मुझे किसी कारण से नौकरी से निकाला गया, तो वह मेरी प्रोबेशन का उल्लंघन माना जाएगा। मुझे बाकी के दो साल के लिए फिर से जेल जाना पड़ेगा। और जब मैं जेल से बाहर आया, तो मुझे एक जॉब मिली जिसमे construction का काम था। जब पहला जुमा आया, तो मैंने बॉस से कहा कि जब, जब सब लोग लंच करते हैं, क्योंकि हमारे पास एक घंटे का लंच ब्रेक था, मैंने कहा, "मैं, लंच करने के बजाय चला जाऊंगा..." यह सड़क से तीन मील दूर था। मैंने कहा, "मैं जुमा की नमाज़ के लिए जाऊंगा, क्योंकि मैं..." वे जानते थे कि मैं मुस्लिम हूँ, और उन्होंने मुझे job site पर नमाज़ पढ़ते देखा था?

मैंने कहा, "मैं जुमे की नमाज़ के लिए जाऊँगा।" और उसने कहा, "तुम्हें job site छोड़ने की permission नहीं है।" और मैंने कहा, "ऐस नहीं है...

असल में मैं permission नहीं मांग रहा हूँ। मैं आपको बता रहा हूँ कि मैं क्या करने वाला हूँ।" और उसने कहा, "अगर तुम Job cite छोड़ते हो, तो तुम नौकरी से निकाल दिए जाओगे, जैसे कि तुम- तुम नौकरी छोड़ रहे हो।" तो मेरे पास यह विकल्प था कि नौकरी पर रहूँ और अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करूँ या जुमा के लिए जाऊँ। और मैंने कहा, "तुम्हें पता है, मैंने चार साल जेल में बिताए अपने धर्म को सीखने में सही काम करने के लिए। मैं सही काम करने वाला हूँ।" तो मैंने छोड़ दिया। मैंने कहा, "ठीक है, अपनी नौकरी रखो। मैं जा रहा हूँ।" तो मैं जुमा के लिए गया और उस जुमा के दौरान बहुत दुआ की, "या अल्लाह, मैं यहाँ आ गया हूँ तेरा हुक्म मानने के लिए, तो, तू जानता है, यहाँ मेरी मदद कर।" जुमा के बाद, एक नौजवान मेरे पास आया। वह आया और उसने कहा, "भाई, आपको...

क्या आपके पास कोई नौकरी है?" और मैंने कहा, "हाँ, आज तक तो थी।" दरअसल मैं जॉब साइट से बाहर हो गया और यहाँ आने के लिए नौकरी छोड़ दी।" उसने कहा, "मेरे पिताजी..." जो कि वहाँ के इमाम थे। उसने कहा, "मेरे पिताजी ने मुझे ये पूछने को कहा है कि, 'क्या तुम इस पिज्जा शॉप में काम करना पसंद करेंगे?'" मैंने कहा, "बिल्कुल, मुझे नौकरी की ज़रूरत है।" तो उन्होंने मुझे उसी दिन से नौकरी दी और अब मैं construction cite पर होने वाली कमाई से दोगुना पैसा कमा रहा था। नौकरी छोड़ने से लेकर नई नौकरी पाने में मुझे दो घंटे लगे। जब आप अल्लाह के लिए ईमानदारी से कुछ करेंगे, ۙيَجْعَلُهٗ مَخْرَجًاۖ. वह आपके लिए एक रास्ता बना देगा। इसलिए कभी-कभी सही काम करना भी डरावना होता है, लेकिन...

तो वो रात मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत रातों में से एक थी जो मुझे याद है। रसूल सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी जिसने आपको प्रभावित किया? उनकी दयालुता!

विशेषतः जब वो तायफ़ से लौट रहे थे। जब वो तायफ़ के लोगों को इस्लाम की ओर बुलाने की कोशिश करने गए और उनपर पत्थर बरसाये गए, उनका विरोध हुआ और जब पहाड़ों के फ़रिश्तों ने तायफ़ वालों को पहाड़ों से कुचल देने की इजाज़त माँगी तो उसके जवाब में जो उन्होंने कहा सुब्हानअल्लाह - ऐसा मत कीजिए, हो सकता है इनकी आने वाली नस्लें एक खुदा में ईमान ले आयें। नबी मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की दयालुता ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। जब मैंने पढ़ा कि लोगों ने उनके साथ कैसा बर्ताव किया, उनके ख़िलाफ़ जंग की, कई बार लड़ाई लड़ी, फिर जब वह मक्का लौटते है, और वो मक्का में एक विजेता के तौर पर प्रवेश करते है। और मैंने इसकी तुलना इतिहास के कई अन्य उदाहरणों से की है। कोई बुरे सुलूक से दोचार हुआ हो और जब वो विजेता बनकर लौटे तो वह उन लोगों को कैसे treat करता है। तो जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का लौटते है, लोग उनके इर्दगिर्द जमा है, वह उनसे पूछते है - "तुम्हें क्या लगता है, मैं अब क्या करूँगा?" लोगों ने कहा, "देखिए, हम आपको जानते हैं, हम आपसे सिर्फ भलाई की उम्मीद रखते हैं।" और फिर उन्होंने कहा, "ठीक है, तुमलोग जा सकते हो।" ठीक है!

ठीक इसी तरह!

इंसानों के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता। कितनी बार हम हमारे वास्तविक जीवन में अगर हम पर कोई आक्रमक हो, verbally physcially, तो हम जवाब देना चाहते है। ये नेचुरल है। लेकिन उनका सब्र सब कुछ सिर्फ़ मेसेज की ख़ातिर बर्दाश्त करते रहना, क्योंकि वो इंसानियत के लिए मिसाल थे। वो अपने अहंकार को रोक लेते थे, हमसे नहीं हो पाएगा। मैं इस्लाम की ऐसी मिसाल नहीं हूँ मैं तो बस एक आम मुसलमान हूँ। इतनी अलग-अलग किस्म की personalities को inspire करने की उनकी क्षमता जैसे सहाबा रज़िअल्लाहु अन्हुम हम उन्हें एक group समझते हैं, लेकिन वे ऐसे नहीं थे। कुछ तो थे जो बड़े temperamental थे। वे natural leaders थे। उनमें कुछ लोग झिझकने वाले और शांत स्वभाव के थे, कुछ बहिर्मुखी थे और कुछ अंतर्मुखी। कुछ बौद्धिक प्रवृत्ति के थे और कुछ भावनात्मक। हर तरह की personalities थीं। फिर भी, वो न सिर्फ़ सबको inspire करने में सक्षम थे, बल्कि उन्हें एक-दूसरे साथ काम करने और एक-दूसरे से मुहब्बत करने वाला बना दिया। आखिर यह कैसे मुमकिन है?

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को लेकर सबसे अविश्वसनीय बातों में से एक यह थी कि उन्होंने ऐसे लोगों के बीच जुड़ाव स्थापित कर दिया, जिन्होंने आगे चलकर पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। उनके जीवन के बारे में पढ़कर, मुझे ये स्पष्ट हो गया था कि वो एक ऐसे इंसान थे जो पूरी तरह से बेकुसूर थे। जीवन में पूरी तरह से सही काम कर रहे थे। मुझे लगता है ये एक महत्वपूर्ण बात थी। मैं हमेशा से एक perfectionisht रहा हूँ, हमेशा सही काम करना चाहता था अगर मुझे लगता था कि मैंने कुछ ग़लत किया है तो मैं गहरे अफ़सोस में पड़ जाता था। और इसलिए, ऐसे प्रेरणादायक व्यक्ति के जीवन के हर लम्हे को पढ़कर जान पाना, यही मेरे लिए राहत का सबसे बड़ा समान था। उनके बारें में पढ़कर ही मैं समझ पाया कि मैं अच्छा से अच्छा इंसान कैसे बन सकता हूँ। और जब मैं उनके बारें में ये सब narrations पढ़ता हूँ, उनकी कहानी सुनता हूँ, और उनको जानता हूँ तो समझ में आता है कि उनका पूरा जीवन मेरे लिए राहत का समान है। क्या आपने कभी नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम को अपने सपने में देखा है?

दो बार! सच में? अल्हमदुलिल्लाह! मैं रेगिस्तान में था और मैंने दूर से देखा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, "मैं चाहता हूं कि आप अन्य लोगों से मिलें।" और वह बैठ गए , और मैं उनके ठीक बगल में बैठ गया। और फिर उन्होंने कहा, "देखो, यह अबू बकर अल-सिद्दीक है।" और उन्होंने कहा, "और यहाँ पर उमर इब्न अल-खत्ताब हैं, और ये हैं उस्मान बिन अफ़्फ़ान और ये अली बिन अबि तालिब हैं। और वे सभी आपसे प्यार करते हैं।" और मैंने सपने में सोचा, वे मुझसे प्यार क्यों करते हैं? मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। वे मुझसे प्यार क्यों करते हैं?

लेकिन अल्हमदुलिल्लाह, ये मेरे जीवन के सबसे अच्छे सपनों में से एक है। मैं आपसे प्यार करता हूँ, रसूलल्लाह। मैं आपसे प्यार करता हूँ। अंत में अगर आपके पास कुछ ही पल हो और आपको पूरी दुनिया के ग़ैर-मुसलमानों से कुछ कहने का मौका मिले तो आप क्या कहना चाहेंगे? पूरी दुनिया के ग़ैर-मुसलमानों से जो बात कहनी है, मैं क़ुरआन की एक आयत पढ़ना चाहूँगा: "क्या तुमने समझा था कि हमने तुम्हें यूँ ही खेल-तमाशे के लिए पैदा किया है? और तुम कभी हमारे पास वापस नहीं लाए जाओगे?" अगर आप बस अपने अंदर झाँकें, तो आप समझ जाएँगे कि ख़ुदा एक ही है। और वह कभी इस पूरी कायनात को यूँ ही नहीं बना सकता। इसके पीछे कोई मक़सद ज़रूर है, जाइए, इस कायनात के पीछे के मक़सद को तलाश कीजिए।
