# "मैंने इस्लाम के लिए एक अरबपति की बेटी को ठुकरा दिया!" - एक हिंदू ने इस्लाम कुबूला

- Language: hi
- Published: 2026-09-05
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/masalmana-bnana-ka-btha-mara-paravara-na-majha-35-sal-bthhaka-bnae-rakha-parava-hatha
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=XNqzrQlLLFY
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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अगले दिन मैंने घरवालों को फ़ोन किया। मैंने कहा, मुझे आपसे कुछ कहना है। मैं मुसलमान बन गया हूँ। पागल हो गया है? तेरा दिमाग़ फिर गया है? तेरा ब्रेनवॉश कर दिया गया है। चल! और मुश्किल मत बना। साढ़े तीन साल मैं भारत में फँसा रहा। मुझे बंधक बना लिया गया था। मामा ने मुझे पकड़ा, और सचमुच नमाज़ पढ़ने से रोक दिया। मैं गाँव की तरफ़ भागा। पैरों में चप्पल भी नहीं, और सब लोग मुझे ढूँढ रहे थे। तभी एक पड़ोसी बाहर निकला और उसने मुझे ऐसे थप्पड़ मारा। और मैं सोच रहा था... वो मुझे घसीटकर घर के अंदर ले गया। उसने आकर मेरे मुँह पर घूँसा मारा। और उसने कहा — "वो लड़की दिख रही है?

वो इस इलाक़े के पंडित की बेटी है।" क्योंकि वो आदमी अरबपति है। बस इतना करो कि मेरी बेटी से शादी कर लो, और सब कुछ तुम्हारा। वो बोला — "बस सुअर का थोड़ा सा गोस्त खा लो।" क्या? और आख़िर में हम पहुँचे — वहाँ एक झरना था। गंगा नदी थी। और सर्दियों के दिन थे। "तुझे उसके नीचे जाना है।" झरने के नीचे चल!

फिर मैं दूतावास पहुँचा और उन्होंने कहा — "देखो, हमें पैसे मिल गए हैं। टिकट ले लिया है। आप शुक्रवार सुबह जा रहे हैं। लंदन जाने वाली पहली फ़्लाइट।" मैं दंग रह गया। बहुत ख़ुश था। जब मैं एयरपोर्ट पर था, वहाँ एक सिख आदमी था, और वही था जो पासपोर्ट पर मुहर लगा रहा था। एक आदमी आया, उसने पूछा कि — "पासपोर्ट कहाँ है?" "पता नहीं।" बोला — "उधर जाओ।" और मुझे थोड़ी घबराहट हुई, ये मेरा निकलने का मौक़ा है, कोई पंगा नहीं चाहिए। अस्सलामु अलैकुम, भाई मुहम्मद ईसा। टुवर्ड्स इटर्निटी में स्वागत है, हमारी दावत क़बूल करने के लिए शुक्रिया। शुरुआत इससे करता हूँ — मुहम्मद ईसा कौन हैं?

कृपया अपने बारे में संक्षेप में बताइए। वअलैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु। यहाँ आकर अच्छा लगा। मेरा जन्म भारत में, पंजाब के सनौर नाम के एक क़स्बे में, एक हिंदू परिवार में हुआ था। हम चार भाई-बहन थे, और चार साल की उम्र में मैं लंदन आ गया। फिर चौदह-पंद्रह साल की उम्र में मुझे हिंदू धर्म पर शक होने लगा — कि क्या यही सच है। मैंने दूसरे धर्म देखने शुरू किए, और फिर मैं मुसलमान बन गया। मेरे परिवार को बड़ा सदमा लगा, और इसी वजह से वो मुझे भारत ले गए — वहाँ साढ़े तीन साल बंधक बनाकर रखने के लिए। वहाँ मुझे बहुत कुछ झेलना पड़ा। थोड़ी-बहुत मार-पीट भी हुई। मुझे नशीली चीज़ें दी गईं, और मैं भारत से भाग निकला, और लंदन वापस आ गया। और मैंने इस्लाम पर चलना और उसे समझना जारी रखा, और घरवालों से रिश्ता बनाता रहा। आस्था के मामले में आपकी ज़िंदगी कैसी थी?

आप किसमे मानते थे?

हम कोई आम हिंदू नहीं थे। हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था है। सबसे नीचे वो लोग थे, जो लोग शौचालय साफ़ करते थे, उन्हें अछूत कहते थे। और सबसे ऊपर थे ब्राह्मण। ज़मीनें उनकी थीं। वही मंदिरों में मूर्तियाँ बिठाते थे, और समाज में उन्हें ऊँचा दर्जा मिलता था। लोग उन्हें तोहफ़े देते, शादियों में बुलाते, और पूरा समाज उनकी बात मानता था। और हम लोग वही थे। हम सबसे ऊपर वाले थे। तो हमारी परवरिश हिंदू के तौर पर हुई। हर कमरे में मूर्तियाँ थीं, और तस्वीरें भी — हनुमान यानी मंकी गॉड की, शिवजी की जिनके गले में साँप होता है। काली माँ भी थीं। काली माँ एक बहुत बुरी देवी थी। तो किसी का बुरा करवाना हो, तो उससे माँगते थे। तो घर भर में ये सब रखा रहता था, और मेरी माँ इनकी पूजा करती थीं। मेरी माँ शाकाहारी थीं। मेरे पिता हमें माँस खिलाते थे। मुर्ग़ा, बकरे का माँस। और हर रविवार वो रोस्ट बनातीं, और हमें माँस से नफ़रत थी। बस गोमांस नहीं खा सकते थे, क्योंकि गाय पवित्र थी, तो हम गोमांस नहीं चाहते थे, गाय नहीं खाते थे। तो इस्लाम की तरफ़ आपका सफ़र कैसे शुरू हुआ?

मेरा जिगरी दोस्त मुसलमान था। गुलामी वाली सोच — कि मुसलमान बुरे हैं, उन पर भरोसा मत करो। यूनिवर्सिटी पहुँचा, तो बहसें शुरू हुईं। दोस्त मुझसे बातें कहते थे। बोले — "देख, तू मंकी गॉड की पूजा करता है।" और मेरे पास कोई जवाब नहीं था, क्योंकि बात सच थी। फिर उसने मुझे अपने घर बुलाया, और खाते-खाते वो सवाल पूछता। बोला — "तू मानता क्या है? हिंदू क्यों है? मरने के बाद क्या होगा?" ये सवाल मेरे दिमाग़ में घूमते रहे, कोई जवाब नहीं सूझा। उसने कहा — "देख, तेरे किसी भगवान की मूर्ति, वही मंकी गॉड, ज़मीन पर गिरे, तो टूट जाती है। क्या वो ख़ुद उठ सकती है?" मैंने कहा — "नहीं, मूर्ति ही तो है।" वो बोला — "तो तू उसे क्यों पूजता है जो ख़ुद की भी मदद नहीं कर सकती?

वो तेरी क्या मदद करेगी?" फिर बोला — "देख, कायनात में हर चीज़ सीमित है। उसकी शुरुआत है, उसका अंत है। वो ख़ुद को अस्तित्व में नहीं ला सकती थी। किसी बाहरी हस्ती, किसी बनाने वाले ने ही उसे अस्तित्व में लाया होगा। और कायनात की हर चीज़ किसी न किसी पर निर्भर है। इंसान को खाना चाहिए, शौच जाना पड़ता है। पौधों को प्रकाश-संश्लेषण के लिए सूरज चाहिए। और वो शाश्वत नहीं। कुछ भी शाश्वत नहीं है। सूरज एक दिन बुझ जाएगा, कायनात की उम्र हो रही है, हमारी उम्र हो रही हैं। हम हमेशा के नहीं हैं, इसलिए कोई बनाने वाला ज़रूर है, जिसने ये सब कुछ शून्य से अस्तित्व में लाया, क्योंकि हर चीज़ की शुरुआत है। और उस बनाने वाले की न शुरुआत है, न अंत है — वो शाश्वत है, सब जानने वाला, सब कुछ कर सकने वाला।" और मैंने सोचा — "वाह, ये तो कमाल है।" फिर हमने सारे धर्मों को देखा। तो हमने ईसाइयत देखी, फिर तौरात देखी, यहूदियत। सारे धर्मों को देखने के बाद मैंने उससे पूछा — "अब क्या बचा?" बोला — "इस्लाम।" मैंने कहा — "इस्लाम क्या है?" उसने परिभाषा दी। बोला — "देखो, रचयिता, वो एक है, वो पूर्ण है, वो शाश्वत है। न कोई उससे पैदा हुआ, न वो खुदा पैदा हुआ — न उसकी कोई औलाद है, न वो किसी की औलाद। वो सब कर सकता है। वो मरता नहीं। उस बनाने वाले को जानने का एक ही रास्ता है — वो हमें कोई पैग़ाम भेजे। तो नबियों के ज़रिए किताबें भेजी गईं, और नबियों ने चमत्कार दिखाए।" मैंने पूछा — "आज कौन सा चमत्कार है?" बोला — "क़ुरआन।" मैंने कहा — "क़ुरआन का चमत्कार क्या है?" बोला — "वो उस दौर में उतरा जब अरबी का बोलबाला था। अरबी ही ज़ुबान थी, और हर कोई शायर था। वो अरबी में लंबे पन्नों की शायरी लिखते और आपस में मुक़ाबला करते थे। तो नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसी दौर में पैदा हुए। उन्हें अल-अमीन कहते थे — भरोसेमंद। और वो पढ़े-लिखे नहीं थे। वो अरबी पढ़-लिख नहीं सकते थे, और वो मूर्तियों को नहीं मानते थे — दूसरे लोग मूर्तियाँ पूजते थे। तो ख़ुदा ने उन्हें चुना, और क़ुरआन अनोखा था। वो शायरों की अरबी के स्तर से भी ऊपर था। शानदार था। उसमें ऐसी लय, ऐसा अंदाज़, ऐसा व्याकरण, और ऐसे गहरे अर्थ थे कि अरब लोग उस अरबी की गहराई नाप ही नहीं सके। वो वैसा कुछ बना ही नहीं सके। तो अल्लाह ने सारे अरबों को चुनौती दी कि क़ुरआन जैसा कुछ लिखकर दिखाओ, और सब बुरी तरह से नाकाम रहे। आज तक ये चमत्कार वैसा ही है। आज तक कोई क़ुरआन जैसा कुछ नहीं बना सका।" और मैंने सोचा — "वाह, बात तो सही है।" मुझे ये बहुत दिलचस्प लगा, और इसने मुझे क़ायल कर दिया। पर वो मुझे सबूत दिखाता, मैं देखता, मैं समझता, और मैं अपनी तरफ़ से भी खोजबीन करता। और मुझे समझ आया कि जो वो कह रहा था, वो सच था। मैं इनकार नहीं कर सका। आपने कलमा किस तरह पढ़ा?

क्या आप हमें उस लम्हे में ले जा सकते हैं? तो अगले दिन मैं गया और कहा — "पता है, तू जो मानता है?

मैं भी वही मानता हूँ। मुझे मुसलमान बनना है।" और हम यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट लंदन गए। उस यूनिवर्सिटी में एक बहस चल रही थी। तो वक्ता ने कहा — "मुझे एक ऐलान करना है।" बोले — "सामने बैठे लोगों में एक हिंदू हैं, और वो मुसलमान बनना चाहते हैं।" अचानक पूरा मंच खलबली से भर गया। सब कह रहे थे ये सब पहले से तय है, वे चिल्ला रहे थे, ग़ुस्से में थे, पर मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। तो वक्ता ने कहा — "मंच पर आ जाइए।" मैं मंच पर गया, उन्होंने पूछा — "क्या आप कलमा पढ़ने को तैयार हैं?" मैंने कहा — "हाँ।" वो बोले — "मेरे पीछे दोहराइए।" "अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह, व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुह" तो मैंने हूबहू वही दोहराया। और जैसे ही मैंने "मुहम्मदन रसूलुल्लाह" पूरा किया...

मुझे लगा जैसे पूरे बदन में कोई पाकीज़गी सी दौड़ गई हो। ऐसा एहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था, और मैं दंग रह गया। और अचानक लोग मुझे पकड़ रहे हैं, गले लगा रहे हैं, मैं सोचूँ — "गले क्यों लगा रहे हैं?" "तुम मुसलमान बन गए। तुमने वो रास्ता छोड़ दिया, असत्यता छोड़ दिया, और सच अपना लिया।" और मैंने कहा — "वाह।" और आपके इस्लाम अपनाने पर घरवालों और आस-पास वालों की क्या प्रतिक्रिया थी?

तो मुसलमान बनने के बाद मुझे सब अलग लगा, जैसे मैं नया इंसान हूँ, और मैं उस वक़्त माँ-बाप को नहीं बताना चाहता था कि मैं मुसलमान बन गया हूँ, क्योंकि उन्हें इस्लाम और मुसलमानों से नफ़रत थी। मुझे पता था कि वो मुझे मुसलमान के तौर पर नहीं अपनाएँगे, और वे नमाज़ और रोज़ा नहीं करने देंगे। तो मैंने घर छोड़ दिया। अगले दिन मैंने घरवालों को फ़ोन किया। मैंने कहा — "मुझे आपसे कुछ कहना है। मैं मुसलमान बन गया हूँ।" वो बोले — "पागल हो गया?

तेरा दिमाग़ फिर गया है?" और बोलीं — "तेरा ब्रेनवॉश हो गया है। क्या मुहम्मद ने ही तुम्हें इस्लाम में डाला?" मैंने कहा — "सुनो, चाहे मुहम्मद हो या कोई और" — "वो पैदा होते हैं और मर जाते हैं, पर इस्लाम सच है। बनाने वाला कभी नहीं मरता। और मैं यही मानता हूँ। कुछ भी हो जाए, मैं यही मानूँगा।" और पीछे से मैंने पिता की आवाज़ सुनी, माँ से कह रहे थे — "हमें ये नहीं चाहिए।" हाँ, बोले — "ये घर वापस नहीं आ सकता।" मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने फ़ोन रख दिया, और अपनी ज़िंदगी चलाता रहा। कुछ वक़्त बाद टाउन हॉल में एक प्रोग्राम था, और मेरी बहन उस प्रोग्राम में आई। उसने कहा — "पता है, माँ-बाप थोड़े दुखी हैं। पिता ने तो बहुत बुरा माना।" तो मैंने दोस्तों को बताया, और दो दोस्त — बड़े तगड़े लोग, एक तुर्क, एक पाकिस्तानी। तो हम उनके साथ घर गए, और मैंने उन्हें समझाया — "मैं मुसलमान बना हूँ क्योंकि मुझे यक़ीन है, दोस्तों की वजह से नहीं। और मुझे इस पर चलना है। तो अगर मुझे इस घर में रखना है, तो इस्लाम पर चलने दीजिए।" वो मान गए, लेकिन मुझे क्या पता था कि उनकी नीयत क्या थी, और उनकी योजना क्या थी। फिर मैं लंदन वापस जाना चाहता था, पर साढ़े तीन साल मैं भारत में फँसा रहा। मुझे बंधक बनाया गया, अगवा किया गया — सिर्फ़ इस्लाम मानने के लिए। और उन्होंने मुझे वहीं रखा, इस उम्मीद में कि एक दिन मैं इस्लाम छोड़ दूँगा, और फिर हिंदू बन जाऊँगा, पूरे परिवार की तरह ब्राह्मण रहूँगा, — यही उनकी उम्मीद और ख़्वाहिश थी। क़रीब डेढ़ साल बाद भी मैं इस्लाम पर क़ायम था, और माँ-बाप मुझे हिंदू धर्म में वापस लाने में नाकाम रहे। एक दिन वो मुझे एक सफ़र पर ले गए। बहुत लंबा सफ़र था। ये एक पहाड़ी इलाक़ा था, और वहाँ एक लड़की थी — काफ़ी गोरी, बहुत ख़ूबसूरत। और उन्होंने कहा — "वो लड़की दिख रही है?

वो इस इलाक़े के पंडित की बेटी है।" और बोले — "ये इतना बड़ा पहाड़ दिख रहा है? ये सारी जायदाद उसी पंडित की है, वो किराए पर देता है। ये आदमी अरबपति है, और अगर तुम इससे शादी कर लो, तो कभी काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। पैसे की कोई कमी नहीं रहेगी। तुम एक बड़ी जीप ले सकते हो, दुनिया घूम सकते हो, तुम ज़िंदगी के मज़े ले सकते हो। तुम्हें बस इतना करना है कि उसकी बेटी से शादी कर लो।" मैंने कहा — " सुनिए, जो मैं जानता हूँ, आप नहीं जानते। ये ज़िंदगी एक इम्तिहान है — उस बनाने वाले की इबादत करने का, और ज़िंदगी के हर पहलू में उसी पर चलने का। अगर हम ऐसा करें, तो पता है वो हमें क्या देगा?

जन्नत, हमेशा के लिए। जन्नत अगली ज़िंदगी में हमारा इंतज़ार कर रही है। अब मैं वो ज़िंदगी क़ुर्बान करके इस लड़की से शादी क्यों करूँ, और वो सब गँवा दूँ? ऐसा करने के लिए पागल होना पड़ेगा।" ख़ैर, उसने अनसुना किया, और हम झोंपड़ी के अंदर गए, और वो बोला — "बस इतना करो कि मेरी बेटी से शादी कर लो, और सब कुछ तुम्हारा।" सब तुम्हारा है।" फिर बोला — "बस सुअर का थोड़ा सा गोस्त खा लो।" क्या?

बोला — "बस इतना करो — सुअर का थोड़ा सा गोस्त खा लो और कांट्रैक्ट पक्का।" मैंने कहा — "सुनिए, अपनी बेटी रखिए, अपनी जायदाद रखिए, और सूअर का गोश्त भी। मुझे नहीं चाहिए। मेरे लिए इससे बेहतर कुछ इंतज़ार कर रहा है — जन्नत, हमेशा के लिए।" मैंने उस अरबपति की बेटी को ठुकरा दिया, क्योंकि मुझे इस्लाम पर चलना था। मुझे इस दुनिया की दौलत नहीं चाहिए थी। मुझे आख़िरत की दौलत चाहिए थी — अपने रब से मिलना, उसमे खुश रहना, और जन्नत में अपनी उम्मत से मिलना। जन्नत इन सबसे बढ़कर है। जन्नत इस सबसे कहीं बढ़कर है। भारत में जब मैं नमाज़ पढ़ता, तो मेरे चचेरे भाई-बहन मेरे सामने चीज़ें रख देते, क्योंकि उनके लिए ये अजीब था। मैं नमाज़ पढ़ूँ, पर सामने कुछ भी नहीं। तो — "किसकी इबादत कर रहे हो?" उन्हें ये अजीब लगता, पर मैं तो जानता था कि उनके भगवानों से इतर मैं उसकी इबादत कर रहा हूँ, जिसकी न तस्वीर है, न रूप। मेरी माँ को समझ आ गया कि बात बन नहीं रही है — वो बहुत ग़ुस्से में थीं। और फिर उन्होंने मुझे नमाज़ पढ़ने से रोक दिया। और मेरे मामा ने आकर मुझे पकड़ा, और सचमुच मुझे नमाज़ पढ़ने से रोक दिया। मैं बहुत दुखी था। ये मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं?

मैंने तो इनका कुछ नहीं बिगाड़ा। मैंने बस उस एक सच्चे ख़ुदा को माना था। तो जब उन्होंने मुझे छोड़ा, तो मैं थोड़ा रुका और फिर भागा। मैं बहुत दुखी था। फिर मैं गाँव की तरफ़ भागा। पैरों में चप्पल तक नहीं थी, बस — जितना भाग सका भागा, और छुप गया। और वो सब मुझे ढूँढ रहे थे, तभी एक पड़ोसी बाहर निकला — तगड़ा आदमी, और उसने मुझे ऐसा थप्पड़ मारा, और मैं सोच रहा था... और लगा भी। वो मुझे घसीटकर घर के अंदर ले गया। और एक पड़ोसी ने आकर, एक और पड़ोसी ने आकर सीधे मेरे मुँह पर घूँसा मारा। और मैं... घूँसे की वजह से मेरी आँखों में आँसू आ गए। और मैं सोच रहा था — "तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? तुम हो कौन?

बस एक इंसान ही तो हो। क़यामत के दिन का इंतज़ार करो।" मेरे एक रिश्तेदार उस आदमी को पूजते थे, उसी के पीछे चलते थे — वो कोई पीर जैसा था, कोई साधु था। और वो पहाड़ों में ऊपर-नीचे, हर जगह उसके पीछे-पीछे घूमते। तो उन्होंने मुझसे कहा — "वो सौ साल के हैं।" दरअसल उन्होंने कहा कि — वो दो सौ साल के हैं। मैंने कहा — "उनका जन्म प्रमाण-पत्र दिखाइए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, आँखें तरेरीं और बोले — "तेरी हिम्मत कैसे हुई? उन्हें देखने की हिम्मत कैसे हुई?

सवाल करने की हिम्मत कैसे हुई?" मैंने कहा — "मैं इस आध्यात्मिक इंसान से मिलना चाहता हूँ।" वो बोले — "हाँ, मिल सकते हो, और उनके पास अंग्रेज़ी की डिग्री है।" मैंने कहा — "वाह, ठीक है, कमाल है, तो बात हो सकेगी।" तो जब हम वहाँ पहुँचे — जंगल जैसा इलाक़ा था। वो नारंगी कपड़े पहनता है, लोग आते हैं और उसे तोहफ़े देते हैं, और समझते हैं कि वो बहुत आध्यात्मिक है, ईश्वर के बहुत क़रीब। ख़ैर, तो हम उससे मिलने गए, और सब उन्हें सम्मान देने के लिए उनके पैर छू रहे थे। मैंने सोचा — "मैं पैर नहीं छुऊँगा, मैं सिर्फ़ अल्लाह के आगे झुकता हूँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा और समझ गया — "बाक़ी सब मेरे पैर छू रहे हैं, ये नहीं छू रहा। थोड़ा अजीब है, ये मेरी बेइज़्ज़ती कर रहा है।" तो मैं उससे मिला और कहा — "सुनिए, मेरा नाम मुहम्मद है। मैं मानता हूँ कि रचयिता केवल एक है, और मैं साबित कर सकता हूँ। और मैं साबित कर सकता हूँ कि उसी बनाने वाले ने पूरी इंसानियत के लिए एक वही भेजी, जिसे क़ुरआन कहते हैं — और मैं बेशक साबित कर सकता हूँ कि वो उसी की तरफ़ से है।" और मैंने कहा — "आप हिंदू धर्म मानते हैं, आप हिंदू हैं। आप मानते हैं कि यही सच है। तो क्या आप ये साबित कर सकते हैं?" वो बोला — "पहले तुम मुहम्मदवाद साबित करो।" मैंने कहा — "ये मुहम्मदवाद नहीं, इस्लाम है। मतलब — रचयिता के आगे पूरी तरह झुक जाना।" फिर कहा — "ठीक है..." मैंने एक मिसाल दी। कहा — "ये झोंपड़ी देखिए। ये सीमित है। ये तार देखिए, जो रौशनी तक पहुँचाने के लिए बनाया गया — ये सीमित है, हमेशा का नहीं। कायनात में हर चीज़ सीमित है, सिवाय बनाने वाले के, क्योंकि उसी ने ये सब वजूद में लाया, और हम भी सीमित हैं। हम एक दिन मर जाएँगे। उसी ने सब बनाया। हम भगवान नहीं हैं। और उसने वही भेजी, ये क़ुरआन — और उसने ये किया कि पूरी इंसानियत को एक किताब दी, और उसे ग़लती से बचाया, चूक से, बदलाव से बचाया। और ये क़ुरआन अपने आप में चमत्कार है, आप वैसा कुछ लिख नहीं सकते। इसीलिए हम कहते हैं कि ये उसी बनाने वाले का पैग़ाम है, और वो अल्लाह पूरी इंसानियत का बनाने वाला है, और इबादत के लायक़ सिर्फ़ वही है।" और वही सिर्फ़ और सिर्फ़ इबादत के लायक़ है, सिर्फ़ वही है। और मैंने कहा — "अब आपकी बारी।" फिर वो बोला — "शुरू में..." वो पंजाबी बोल रहा था। बोला — "इक नहर था। नदी थी।" "जो नहर था, वो सिंधु लोग थे।" "उस नदी पर — सिंध नदी पर — जो लोग रहते थे, उन्हें सिंधु कहते थे।" फिर बोला — "फिर बिगड़ गए। उनमे बिगाड़ आ गया।" मैंने कहा — "समझ गया, समझ गया। तो सिंध नदी हिंद नदी बन गई, और सिंधु लोग हिंदू बन गए, और इसीलिए हिंदू धर्म सच है!" और वो मुझसे बोला — "बेवक़ूफ़!", यानि "यू इडियट।" और मैंने सोचा — "वाह, आप मुझे बेवक़ूफ़ कह रहे हैं।" फिर वो कहने लगा — "मैं भगवान को साबित कर सकता हूँ। हम सब भगवान बन सकते हैं।" और मैंने सोचा — "वाह, ठीक है।" और वो बोला — "ये तार देखो, ये अनंत है, असीमित है।" और वो मेरे ही शब्द इस्तेमाल कर रहा था। और बोला — "हम भी ऐसे ही ख़ुदा बन सकते हैं।" मैंने कहा — "सुनिए, ये तार असीमित नहीं है। सीमित है — ये इस पर है कि काटने वाले के पास कितना था। हाँ, ये असीमित नहीं, सीमित ही है। और सुनिए, जब आप छोटे थे, जब पाँच साल के थे, जब बीस साल के थे, और अब अस्सी या सत्तर के हैं — क्या आप कमरे के आर-पार उड़ सकते हैं?

नहीं, क्योंकि आप सीमित हैं। आप बस एक इंसान हैं। आप नहीं कर सकते। नामुमकिन है। आप कभी भगवान नहीं बन सकते। ख़ुदा हमारे जैसा नहीं है।" और वो मुझसे बोला —"बेवक़ूफ़, यू इडियट!" मैंने अपने रिश्तेदार की तरफ़ देखा, और कहा — "वाह, यही अक़्ल का स्तर है? यही वो इंसान है, जिसके पीछे आप चल रहे हैं?

ये मेरे सवालों का जवाब तक नहीं दे सका। आप इन्हें कैसे मान सकते हैं?" ख़ैर, वो बहस वहीं अचानक ख़त्म हो गई। तो मेरी माँ ने सोचा — "अब कुछ और तरीक़ा अपनाना पड़ेगा।" तो उन्होंने सख़्ती वाला रास्ता चुना। तो फिर हम एक जगह से दूसरी जगह घूमने लगे, बहुत दूर-दूर। तो हम उस जगह गए, और आख़िर में जहाँ पहुँचे — वहाँ एक झरना था। वो गंगा नदी थी। पानी वहाँ से आ रहा था, और सब लोग जा-जाकर कपड़ों सहित उसी पानी के नीचे नहा रहे थे — और सर्दियों के दिन थे। मैंने रिश्तेदार से और माँ से पूछा कि — "यहाँ हो क्या रहा है?" वो बोला कि — "तुझे उसके नीचे जाना है।" "सुन नहीं रहा, तुझे पानी के नीचे जाना है।" मैंने कहा - "नहीं जाऊँगा" वो बोला — "जाना होगा" और अगले ही पल उन्होंने मुझे पकड़ लिया, और क़तार में खड़ा कर दिया। अब मैं झरने की क़तार में था। मैं सोच रहा था — बाप रे, कसकर पकड़ रखा है। और अगले ही पल मैं झरने के नीचे था, और पानी सिर पर गिर रहा था। लगा जैसे मैं डूब रहा हूँ। और फिर उन्होंने मुझे कुछ देर वहीं रखा, और फिर बाहर खींचा। और मेरा रिश्तेदार बोला — "कुछ महसूस हो रहा है?

कुछ अलग महसूस हो रहा है?" मैंने कहा — "हाँ, सच में हो रहा है।" वो ख़ुश होने लगे। शायद कुछ असर हुआ है। मैंने कहा — "हाँ। पहले मुझे बस ठंड लग रही थी, अब ठंड भी लग रही है और गीला भी हूँ!" और वो बोले — "क्या?" मैंने कहा कि "आपको क्या लगता है? इस्लाम कोई प्रेतात्मा है जो मेरे अंदर घुस गई है, और गंगा का पानी, ये तथाकथित पवित्र पानी, इस बुरे इस्लाम को मेरे बदन से धो देगा? आपको लगता है गंगा का पानी — गंदा पानी, जिसमें मरी हुई गायें पड़ी हैं, लोग उसमें कपड़े धोते हैं — आपको लगता है ये अपवित्र पानी मुझे बदल देगा?

मेरे मन में पक्का है कि इस्लाम ही सच है।" तो अगले ही पल उन्होंने मुझे फिर पकड़ लिया। मैंने सोचा — "अब क्या?" और वो मुझे मंदिर के अंदर ले गए। और मंदिर में एक छोटे पंडित थे, और उनके पास अपनी बोतल थी, जिसमें कुछ छेद थे। और वो मुझ पर कोई लिक्विड छिड़क रहे थे। मैंने कहा — "अरे, ये क्या है?" मुझे नहीं पता था, पर वो मूत्र था — गौमूत्र — क्योंकि वो गाय को पवित्र मानते हैं। तो वो मुझ पर मंत्र पढ़ रहे थे। मैंने कहा — "आप क्या करने वाले हैं?" और वो पढ़ते रहे। और ज़ाहिर है, कुछ नहीं हुआ। गाय का पेशाब मुझे नहीं बदलेगा, और उसके मंत्रों का मेरे लिए कोई मतलब नहीं हैं। तो ज़ाहिर है, कुछ नहीं हुआ। अब हम आख़िर की तरफ़ आ रहे थे, और घूमते रहना मुमकिन नहीं था। तो हम क़स्बे के अपने एक घर में रुक गए। ख़ैर, मेरी माँ थोड़ा अजीब बर्ताव करने लगीं। बोलीं — "चाय पियेगा?" मैंने कहा — "हाँ।" उन्होंने चाय दी, और पीने के बाद मुझे अजीब लगने लगा। मेरी — जैसे मेरी गर्दन टूटने वाली हो। मुझे लगा जैसे गर्दन ऐसे मुड़ रही हो। और अगले ही पल उन्होंने टैक्सी बुला ली, और वो मुझे गाँव ले गए। और गाँव में मेरी चचेरी बहन मेरे पास थी, उसने कहा — "अब और चाय मत पीना, वो तुझे नशीली चीज़ें दे रहे हैं।" मैंने कहा — "क्या?" मैंने कई ख़त लिखे — "देखो, मैं थोड़ा परेशान हूँ, मुझे पता नहीं मेरे साथ क्या होगा।" मेरा एक रिश्तेदार आया और बोला — "तुम ख़त लिख रहे हो, है ना?

तुम्हारे दोस्त तुम्हें बचाने भारत आ रहे हैं। और जब वो आएँगे, तो हम उनसे निपट लेंगे।" मैंने कहा — "सुनिए, मेरे दोस्तों से आप कैसे निपटेंगे? जो ज़िंदगी से ज़्यादा मौत चाहते हैं, उनसे कैसे निपटेंगे?

वो अगली ज़िंदगी का इंतज़ार कर रहे हैं। वो कहीं बेहतर है। उन्हें डर नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा और सोचने लगा — "वाह।" वो कोई तर्क सामने नहीं रख सका। और मैं चलता रहा, क्योंकि मुझे हमेशा अल्लाह पर उम्मीद थी — कि हालात कैसे भी हों, अल्लाह हमेशा साथ है। और अल्लाह मेरे लिए हमेशा बेहतर ही करेगा। और सबसे ज़्यादा मुझे इस बात की कमी खलती थी कि परदेस में रहते हुए मस्जिद ढूँढना बहुत मुश्किल था, क़ुरआन की एक प्रति पाना भी। एक बार मैंने किसी इमाम से कहा, और क़रीब तीन हफ़्ते बाद मुझे क़ुरआन की एक प्रति मिल गई। जैसे सोना मिल गया हो। और मैं छुपकर, चोरी-छिपे उसे पढ़ता था। पर अफ़सोस, मेरे रिश्तेदारों ने वो क़ुरआन ढूँढ लिया और छीन लिया, और मुझे बहुत दुख हुआ। बहुत दुख हुआ। वो कमाल की बात थी — आपको पता है, अल्लाह से वो जुड़ाव, उसे पढ़ना — कमाल का एहसास है। ये सारी चीज़ें हुईं। मेरी माँ को समझ आ गया कि बात बन नहीं रही है, वो मुझे मना नहीं पाएँगी कि मैं फिर हिंदू बन जाऊँ, इस्लाम छोड़ दूँ। फिर वो कुछ दिन के लिए मुझे रिश्तेदारों के पास छोड़कर लंदन चली गईं। और यही — यही मेरा मौक़ा था, क्योंकि माँ कुछ पैसे छोड़ गई थीं। मैं फ़ौरन क़स्बे में गया, एक सूटकेस ख़रीदा, और सामान बाँधने लगा। ट्रेन का टिकट भी ले लिया। तो सोमवार की रात, कपड़े लिए, सब तैयार, और मैं सड़क पर चल रहा था। और तभी सोचिए कौन आ गया — मेरा वही रिश्तेदार, जो मेयर साहब का बेटा है। बोला — "सूटकेस लेकर कहाँ जा रहे हो?" मैंने सोचा — "बाप रे, हो गया। योजना पकड़ी गई।" और फिर मैंने सोचा — "क्या कहूँ?" मैंने कहा कि — "मैं बस दूतावास जा रहा हूँ, पासपोर्ट का काम है।" "ठीक है।" क्योंकि उन्हें पता था कि मैं मुसलमान बन गया हूँ, पर ये नहीं पता था कि चल क्या रहा है। मुझे राहत मिली। मैंने सोचा — "वाह।" फिर स्टेशन पहुँचा और ट्रेन लेट थी। सर्दियों के दिन थे, ठंड थी, कोहरा सा था। मैंने सोचा — "बाप रे, ट्रेन आ ही नहीं रही।" आख़िर कुछ देर बाद ट्रेन आई, तो मैं ट्रेन में चढ़ गया। फिर स्टेशन पहुँचा, वहाँ से रिक्शा-टेम्पो लेकर दूतावास गया, और कहा कि — "देखिए, मैं लंदन से हूँ, और मुझे भारत में बंधक बनाकर रखा गया है, मेरे माँ-बाप मेरी शादी करवाना चाहते हैं, और मुझे लंदन में अपनी ज़िंदगी जारी रखनी है, और ये सब सिर्फ़ इसलिए कि मैं मुसलमान बन गया।" उन्होंने कहा — "हमारी आपके दोस्तों से बात हो चुकी है।" और वो बोले — "देखो, पैसे मिल गए हैं, टिकट ले लिया है, इमरजेंसी एग्ज़िट वीज़ा मिल गया है। आप शुक्रवार सुबह निकल रहे हैं। लंदन की पहली फ़्लाइट। मैं दंग रह गया। मैं बहुत ख़ुश था। और जब मैं एयरपोर्ट पर था, तो वहाँ एक सिख आदमी था, और वही था जो पासपोर्ट पर मुहर लगा रहा था। और तभी एक आदमी आया, उसने पूछा — "पासपोर्ट कहाँ है?" और वो बोला — "पता नहीं।" बोला — "उधर जाओ।" और मुझे थोड़ी घबराहट हुई, यार। ये मेरा निकलने का मौक़ा है, और मुझे कोई पंगा नहीं चाहिए। पर उस आदमी ने मुझसे कहा — बोला — "कोई दिक्कत हो, तो मुझे बताना।" पर फिर मैंने सोचा — "आख़िर ये है कौन?

बस एक इंसान ही तो है। मैं बस — मैं बस उन्हें सारी बात बता दूँगा। मेरे पास सच है। मैं क्यों घबराऊँ?

अल्लाह मेरे साथ है। तो मैं उसके पास गया, और उसने बोला — "तुम्हारा पासपोर्ट कहाँ है?" मैंने कहा — "खो गया।" बोला — "पासपोर्ट कहाँ है?" मैंने कहा कि — "खो गया। बस ये इमरजेंसी वीज़ा है।" उसने देखा, मुहर लगाई, और बोला — "जाओ।" फिर मैं गया, जहाज़ में बैठ गया। पता है ना, कि फ़िल्मों में जहाज़ का दरवाज़ा बंद होने वाला होता है, आप बस इंतज़ार करते हैं कि कोई आकर पकड़ लेगा। उस पल मेरा वही हाल था। मैं बस इंतज़ार कर रहा था, और अचानक दरवाज़ा बंद हो गया। और मैं — अलहम्दुलिल्लाह। मैंने सोचा — "वाह।" तो अब मैं लंदन के रास्ते पर हूँ। मेरे दोस्त एयरपोर्ट पर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैं बहुत ख़ुश था। सूटकेस लिया, और लंदन वापस। उन साढ़े तीन साल के बाद मैं उस पूरी स्थिति से निकल आया, जिसमे उन्होंने मुझे डाला था। अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने — पता है उसी ने मुझे उससे बचाया। उन्होंने उन सारी आज़माइशों से मुझे परखा, और बचा लिया। और पता है, अब वो मुझे और नहीं रोक सकते, बिल्कुल भी नहीं रोक सकते हैं। क्या आपको कभी मुसलमान बनने का पछतावा हुआ?

कभी नहीं। जिस सच के लिए मुझे बनाया गया, अल्लाह की इबादत के लिए, उस पर चलने का पछतावा कैसा?

बस एक बात की ख़्वाहिश रह गई — कि मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौर में होता, उनके सहाबा के साथ रहता, दावत का काम करता, ज़मीन पर इस्लाम क़ायम करता — जैसी आज ज़रूरत है। एक बात का पछतावा ज़रूर है — मेरे पिता, वो कोविड से ठीक पहले गुज़र गए, और मुझे अफ़सोस है कि शायद मैंने उनसे बात करने में पूरी कोशिश नहीं की, जिससे उन्हें मुसलमान बनने के लिए मनाता। मैंने कोशिश तो की, पर वो अपने धर्म से ऐसे चिपके रहे, जैसे वो अपनी मूर्तियों से चिपके थे — उन्होंने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। वो मानते थे कि जिस पर वो चल रहे हैं, वही सच है। मैंने समझाया, पर उन्होंने कभी नहीं माना। और वो चल बसे। क्या आपने कभी अल्लाह से कोई ख़ास जुड़ाव महसूस किया?

मैं हमेशा हज पर जाना चाहता था। मुझे पत्नी के साथ वो मौक़ा मिला, और हम 2024 में हज पर गए। हज की एक बात ये है कि आप खो जाते हैं — और मैं तीन बार खोया। मैं तीन बार खोया — बिना पैसे के, बिना फ़ोन के। एक बार मैं खो गया, और होटल ढूँढने की कोशिश कर रहा था, पर होटल का नाम किसी तरह बदल गया था — पता नहीं, इंटरनेट पर। मैं थोड़ा परेशान हुआ, मेरे चेहरे पर आँसू बहने लगे, और मैंने बहुत दुआ की। मैंने कहा — "या अल्लाह, मुझे...

मुझे उस जगह तक पहुँचा दे।" और वहाँ जाने के तीन रास्ते थे। एक तो सीधा रास्ता था, एक जो दो में बँटता था, और एक तीसरा। मैंने सोचा — "इसी पर चलूँ, ये ज़रूर मुख्य सड़क पर होगा।" और जैसे ही चला, होटल पहुँच गया। और जब होटल पहुँचा, तो इमाम साहब — वो दंग रह गए, क्योंकि वो मुझे ईसा कहते थे। और वो बोले — "पता है, बहुत लोग खो गए, वापस नहीं आए। बस आप ही लौटे हैं।" बोले — "ईसा लौट आए!" और वो हैरान थे — जैसे नबी ईसा अलैहिस्सलाम, बोले — "आप लौट आए!" तो मैं लौटा, और फिर एक बार खोया, और तीसरी बार भी। और हर बार होटल पहुँच गया। मैं ख़ुद हैरान था। तो उन वक़्तों में, जब आप खो जाते हैं, अल्लाह लौटने का रास्ता ज़रूर निकाल देता है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कौन सी बात आपको सबसे ज़्यादा भाई?

वो अल-अमीन थे — सबसे भरोसेमंद। और उनके सारे क़बीले, चाहे इस्लाम के पैग़ाम से इत्तिफ़ाक़ न रखते हों, जानते थे कि वो सच्चे इंसान हैं। वो ईमानदार थे। लोग उन्हें अपना सामान सौंप देते, अपने झगड़े सुलझाने के लिए उन पर भरोसा करते — जैसे काबे में हजरे अस्वद को उतारकर रखना। आयत है — "लक़द काना लकुम फ़ी रसूलिल्लाहि उस्वतुन हसनह" यानी रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में इंसानियत के लिए सबसे अच्छी मिसाल है। बीवियों का ख़याल रखने में वो सबसे बेहतर थे, दावत में सबसे बेहतर, सिपहसालार के तौर पर सबसे बेहतर, और इस्लाम लागू करने में सबसे बेहतर। तो इस ज़िंदगी में इससे बेहतर इंसान नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सिवा कौन हो सकता है?

और आख़िर में — अगर दुनिया के सारे हिंदुओं से बात करने का मौक़ा मिले, अगर सिर्फ़ चंद लम्हे हों, तो आप उनसे क्या कहना चाहेंगे?

मैं कहूँगा — जो कुछ आप जानते हैं, सब भूल जाइए। अपने चारों तरफ़ देखिए, चीज़ों को देखिए, जानिए कि ये चीज़ें हमेशा की नहीं हैं, पर इन्हें किसी ने बनाया ज़रूर है। तो ये कायनात, ये सौर मंडल, आकाशगंगाएँ, अरबों सितारे — ये सब यूँ ही कहीं से नहीं आ गया। शून्यता से कुछ नहीं आता — बल्कि कोई बनाने वाला है, जिसने इन सबको वजूद में लाया। और उस बनाने वाले ने एक पैग़ाम, एक सबूत दिया है — क़ुरआन। और वो बाक़ी सब किताबों जैसा नहीं है। क़ुरआन पढ़िए। जब समझ आए कि यही सच है, जब पता चले कि इसमें कोई ग़लती नहीं, तो उस वही पर चलिए, मुसलमान बनिए — और जन्नत आपकी है। क्या आपने भी इस्लाम क़ुबूल किया है, पर समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें?

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