# नमाज़ की शुरुआती दुआ का वो राज़ जो हम चूक गए | अपनी नमाज़ बदलें - Ep. 3

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/the-secret-we-missed-in-opening-dua-for-salah-transform-your-salah-ep-3
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=h62l_cUVke0
- Channel: Towards Eternity

This is the cleaned transcript of the source video. The speech is unaltered.

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हम अपनी रोज़ाना की इबादतों के दौरान कई बार सुबहान अल्लाह कहते है। क़याम के दौरान, रुकू में, सजदों में, नमाज़ के बाद तस्बीह पढ़ने के दौरान। हम इसे बार-बार दोहराते रहते हैं। लेकिन इस शब्द का असल मतलब क्या है?

चलिए हिसाब लगाएँ ; रोज़ाना की सभी पाँच नमाज़ों के बाद हम 33 बार सुबहान अल्लाह पढ़ते हैं। अगर किसी ने 40 सालों तक ऐसा करना जारी रखा होगा तो वह इसे 24 लाख से अधिक बार पढ़ चुका होगा। इसके अलावा, यह तो बस वह है जो हम तस्बीह में पढ़ते हैं। अगर हम नमाज़ के दौरान पढ़े जाने वाले अन्य वाक्यांशों को भी जोड़ लें जैसे कि 'सुबहा-नका अल्लाहुम्मा' रुकु में 'सुबहान रब्बि यल अज़ीम' सजदों में 'सुबहान रब्बियल आला', तो इसकी संख्या सत्तर लाख तक पहुँच जाती है। यह संख्या ही आपको सुबहानअल्लाह कहने के लिए काफ़ी है। लेकिन क्या किसी व्यक्ति द्वारा किसी शब्द का सही अर्थ जाने बिना उसे लाखों बार दोहराना अजीब नहीं है?

अगर आप सोचें तो वास्तव में ये एक चौंकाने वाली बात है। इसीलिए आज हम नमाज़ में पढ़ी जाने वाली 'सना सुबहानका अल्लाहुम्मा' को वाक्यवार सीखेंगे। जब हम अल्लाहु अकबर कहकर नमाज़ शुरू करते हैं और क़याम करते में खड़े होते हैं, तो हम सारी दुनिया से ध्यान हटा लेते है। हम अपने हाथों के पिछले हिस्से से हर चीज़ को एक तरफ धकेल देते हैं। फिर, हम सबसे पहले क्या कहते है? سبحانکَ اللّهم यह प्रार्थना हमें क्या बता रही है? यह हमें कौन सी सच्चाइयों की याद दिला रही है? और हम इन शब्दों से नमाज़ की शुरुआत क्यों करते हैं?

यहाँ तक कि बिस्मिल्लाह से भी पहले हम 'सुबहानका अल्लाहुम्मा' कहते हैं। आइये हम सब मिलकर इसे explore करें और इस अनोखी दुआ को वाक्यवार समझें। वीडियो के अंत तक, आपको एक बिल्कुल नया दृष्टिकोण प्राप्त होगा, इंशा अल्लाह। आप एक ऐसे व्यक्ति बन जायेंगे जो सिर्फ शब्दों को दोहराता नहीं है, बल्कि उनके अर्थ के अनुसार जीता है। हमारा पहला expression है- सुबहानका अल्लाहुम्मा मूलतः इसका अर्थ है, "ऐ अल्लाह तू पाक है।" तो इसका क्या अर्थ है?

ऐ अल्लाह, तू किसी भी दोष या कमी से पाक हैं। तुझमें कोई कमी नहीं है। तू सही हैं। यह पहला अर्थ है जो दिमाग में आता है। दूसरा अर्थ है "आश्चर्य", जिसके बारे में हम वीडियो के बाद के भाग में चर्चा करेंगे, इंशा अल्लाह। ज़रा इसके पहले अर्थ पर फोकस कीजिए। जब हम ये वाक्यांश सुनते हैं तो दिमाग़ में क्या आता है? खासतौर से वे भद्दे और अतिशयोक्तिपूर्ण शब्द जो गैर-मुस्लिम लोग ईश्वर के बारे में कहते हैं। अल्लाह उन सब से पाक है। लेकिन सिर्फ यह कहना कि, "मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ" काफ़ी नहीं है। आप किस तरह के अल्लाह पर ईमान रखते हैं?

आपका ईमान उसके अनुसार होना चाहिए जो अल्लाह ने क़ुरआन में बयान किया है। सिर्फ यह कहना कि, "मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ" काफ़ी नहीं है। उदाहरण के लिए, आपके अनुसार क्या अल्लाह सोता है? नहीं! क्या वह थकता है? कभी नहीं। क्या वह जानता है कि किसी व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है? हाँ सब कुछ। क्या उसकी शक्ति हर काम के लिए पर्याप्त है? बिल्कुल है। हमें अल्लाह के बारें में सही description establish करने की ज़रूरत है ताकि हम उसपर बिल्कुल सही ईमान रख सकें। यह ईमान के सबसे महत्वपूर्ण steps में से एक है। मैंने एक बार किसी को यह कहते सुना था, "मैं अल्लाह को मानता हूँ, मेरा उसपर ईमान है, लेकिन जिस अल्लाह को मैं मानता हूँ वह अपनी मख़लूक़ को जलाता नहीं है।" अब, क्या वह व्यक्ति सचमुच अल्लाह को मानता है?

वह उस अल्लाह को मानता है जिसे उसने ख़ुद अपने मन में गढ़ा है। उस अल्लाह को नहीं जिसका ज़िक्र क़ुरआन में है। पता है, ऐसे लोग हैं जो कहते हैं, "अल्लाह का एक बेटा है।" ऐसा कौन कहते है? ईसाई, है ना? वे यीशु को परमेश्वर का पुत्र कहते हैं। तो फिर हम सुबहानका अल्लाहुम्मा कहकर क्या कहते हैं? अल्लाह इन सबसे बहुत ऊपर है। लेकिन आप कहते हैं कि यह सच नहीं है। अल्लाह को किसी बच्चे या किसी और चीज़ की कोई ज़रूरत नहीं है। ईसाईयों की धार्मिक पुस्तक ओल्ड टेस्टामेंट के बुक ऑफ़ जेनिसिसमें एक अनुच्छेद है, जिसमे कहा गया है - "परमेश्वर ने आराम किया।" इसका मतलब यह है कि परमेश्वर थक गया था और उसे आराम की ज़रूरत थी, माज़ अल्लाह!

अल्लाह इस कमी से पाक है। इस्लाम के बाहर प्रत्येक विश्वास प्रणाली में ईश्वर के बारे में अपना गलत दृष्टिकोण है। हिंदू धर्म में ऐसे भगवान हैं जो एक-दूसरे को दंड देते हैं और एक-दूसरे से लड़ते हैं। पारसी धर्म में एक दूसरा ईश्वर है जो बुराई का सृजन करता है। ओल्ड टेस्टामेंट में एक परमेश्वर है जो पैगंबर याकूब के साथ कुश्ती लड़ता है, इत्यादि। क्या यह सुनना भी परेशान करने वाला नहीं लगता?

यह सब एक प्रकार का Slander (अपमानवचन) है। और जब आप यह शुरुआती दुआ, सुबहानका अल्लाहुम्मा, पढ़ते हैं, तो आप इन झूठी मान्यताओं को भी चुनौती दे रहे होते हैं। आप एक ऐसे सत्य का बचाव कर रहे हैं जिसे लाखों लोग नहीं देख सकते। जब हम सुबहानका अल्लाहुम्मा कहते हैं, तो जो अर्थ हमारे मन में आता है वह स्पष्ट हो जाना चाहिए। ऐ अल्लाह, तू किसी भी दोष या कमी से पाक हैं। तुझमें कोई कमी नहीं है, आप परफेक्ट हैं। सृष्टि स्वयं दर्शाती है कि अल्लाह कितना परफेक्ट है। उसने ब्रह्माण्ड की रचना इस प्रकार की है कि सब कुछ व्यवस्थित और संतुलित है। एक स्नोफ्लैक के बारे में सोचें.

प्रत्येक को एक unique पैटर्न के साथ बनाया गया है। पृथ्वी पर अरबों स्नोफ्लैक्स एक दूसरे से भिन्न हैं। चाहे आप माइक्रोस्कोप से स्नोफ्लैक की क्रिस्टल संरचना की जांच करें या दूरबीन के माध्यम से आकाशगंगाओं के विशाल स्पाइरल का निरीक्षण करें आप एक ही संदेश सुनेंगे: अल्लाह सर्वोच्च है। जब आप सुबहानका अल्लाहुम्मा कहते हैं, तो आप वही शब्द कह रहे होते हैं जो संपूर्ण ब्रह्मांड कह रहा है। आइये सुबहानका अल्लाहुम्मा के दूसरे अर्थ पर आते हैं। जब हम किसी चीज़ से आश्चर्यचकित होते हैं, तो हम कहते हैं, "सुबहानअल्लाह।" एक आयत में अल्लाह कहता है, "ऐसी एक भी चीज़ नहीं है जो उसकी हम्द बयान न करती हो।" पौधे, फूल, जानवर, हर चीज़ अल्लाह की महिमा गाती है। जब हम सुबहानअल्लाह कहते हैं, तो हम उनकी महिमा को विस्मय से देखते हैं और उसी प्रकार की महिमा का बखान करते हैं। आइये आसमान को देखें, तारों को देखें, और साथ ही समुद्र तट और रेगिस्तान में रेत के कणों को भी देखें। आपके विचार से इनमें से कौन अधिक है?

रेत के कण या तारे?

उत्तर सुनकर आपको आश्चर्य हो सकता है, लेकिन तारे उनसे कहीं अधिक है। सुबहानअल्लाह। macro और micro दोनों ही दुनियाएँ पूरी तरह से भिन्न हैं। दोनों में हम अल्लाह के perfect creation (उत्तम रचना) के पाते हैं। एक मुहावरा है जो कहता है, سُبحان مَن تَحَیَّر فی سُنِهِ العُقول इसका अर्थ है, "एक ऐसी शक्ति जो अपनी उत्कृष्ट कृतियों से मन को आश्चर्यचकित कर देती है, वह सभी अपूर्णताओं से मुक्त है।" अब, एक बच्चे के बारे में सोचिए। यह माँ के गर्भ में एक निर्जीव मांस के टुकड़े के रूप में शुरू होता है, लेकिन एक निश्चित अवधि के बाद, वह एक आकार लेना शुरू कर देता है, और इसे ज़िंदगी दी जाती है। किसी पक्षी के airodynamics के बारे में सोचिए जब वह उड़ता है। किसी documentary को देखते समय ध्यान दें कि पेड़ के शीर्ष पर स्थित पत्तियों को पानी से पोषण मिलता है। गुरुत्वाकर्षण पानी को नीचे खींचता है, लेकिन अल्लाह द्वारा निर्धारित क़ानून के कारण पानी ऊपर उठता है। ये कानून अल्लाह ने बनाए हैं और हम उन पर गौर-फ़िक्र करते हैं। अब, एक तरबूज़ की कल्पना करें जो भीषण गर्मी में भी ताज़ा और स्वादिष्ट होता है। अल्लाह ने इसे खराब होने से बचाने के लिए इसके अन्दर एक प्रकार की प्राकृतिक संरक्षण प्रणाली रखी है। यह तरबूज के चारों ओर एक शेल (खोल) की तरह है। इस प्रणाली के बिना तरबूज बहुत कम समय में खराब हो जाएगा। उसने इसकी प्रजाति को आगे बढ़ाने के लिए इसके अंदर बीज भी बनाए हैं। यदि उसके अन्दर कोई बीज न होता, तो तरबूज़ केवल आदम अलैहिस्सलाम के समय में ही खाया जाता और उसके बाद वह लुप्त हो जाता। लेकिन अल्लाह ने इसके अन्दर सैकड़ों बीज रखे हैं। आप उन्हें लगाते हैं और आपको नए तरबूज़ मिलते हैं। इससे आप इन्हें बार-बार खा सकते हैं। ब्रह्माण्ड एक आर्ट गैलरी है। प्रत्येक उत्कृष्ट कृति के कोने पर एक ही हस्ताक्षर पाया जाता है: सुबहान अल्लाह!

वे सब एक साथ कहते हैं, "हम एक दोषरहित शक्ति की रचना हैं।" तो, आइए हम हर उस कलाकृति के लिए सुबहानअल्लाह कहने की आदत डालें जो हमें आश्चर्यचकित करती है। अब तक हमारे मन में यह स्पष्ट हो गया होगा कि जब हम सुबहानका-अल्लाहुम्मा कहते हैं तो हम दो अर्थों को सोचेंगे। पहला, अल्लाह इन सभी दोषों, अपूर्णताओं और झूठे विश्वासों से दूर है। दूसरा मतलब सुबहानअल्लाह है जो हम आश्चर्य और विस्मय के क्षणों में कहते हैं। जैसे हम कह रहे हैं, "ऐ अल्लाह, तूने सबकुछ परफेक्ट बनाया है। तू सभी दोषों से मुक्त हैं।" हम आगे पढ़ते है "व बिहम्दिका।" इसका अर्थ है, "सब हम्द तेरे लिए है, मैं हम्द के साथ तेरी महिमा का बखान करता हूँ।" हम्द क्या है? यह प्रशंसा और कृतज्ञता का संयोजन है। क्या आपने आज किसी की सराहना की है?

आपने बस धन्यवाद कहा हो, शायद किसी दोस्त को। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस नेअमत का असली स्रोत कौन है? हां, हमें एक-दूसरे का शुक्रिया अदा करना चाहिए, लेकिन जो वास्तव में हम्द का हकदार है, वह है अल्लाह, नेअमतों का असली मालिक। किसी ऐसे उपहार के मिलने की कल्पना कीजिए जिसकी आपको चाहत थी। आप डिलीवरी करने वाले को धन्यवाद देते हैं लेकिन देने वाले के बारे में कभी नहीं पूछते। यह कितना उचित होगा? यह बेतुका लगता है, है ना?

खैर, यह वही है जो लोग अक्सर अल्लाह की नेअमतों के साथ करते हैं। जब हम कहते है "व बिहम्दिका" तो हमें इस पर गौर करना चाहिए। "ऐ अल्लाह, आज लाखों लोगों ने एक-दूसरे का शुक्रिया अदा किया, लेकिन मैं जानता हूँ कि उन सभी शुक्रिया के असली हक़दार आप ही है। उन्होंने अनजाने में आपका ही शुक्रिया अदा किया। उन्हें इसका एहसास नहीं है, लेकिन उन्होंने वास्तव में आपकी ही हम्द बयान की।" जब आप सूर्यास्त देखते हैं, तो प्रकृति लगभग गुलाबी, पीले और लाल रंगों से रंगी हुई दिखाई देती है। यहाँ भी हम्द का हक़दार अल्लाह ही है। जब आप किसी बच्चे को अपनी बाहों में लेते हैं, जब आप घुटन के वातावरण से निकलकर गहरी सांस लेते हैं, जैसे "...!" इन सबका बनाने वाला भी अल्लाह है। आप बारिश की आवाज़ सुनते हैं, यह आपकी रूह को सुकून देता है, या आप अपने दोस्त के साथ अपनी परेशानियां साझा कर रहे हों। आप अपना दिल खोलकर बात कहते हैं और हल्का महसूस करते हैं। आप अपने जीवनसाथी, अपने बच्चे को गले लगाते हैं, आपके दिल को सुकून मिलता है। भाई, बहन, शायद आपने ध्यान नहीं दिया हो, लेकिन आप कारणों का धन्यवाद और उनकी तारीफ़ करने के लिए बहुत उत्सुक हैं। लेकिन जब आप कहते है "व बिहम्दिका" तो आप ख़ुद को मिलने वाली सारी ख़ुशियों के असल मालिक अल्लाह को पा लेते है जो हम्द का असल हक़दार है। आप समझ जाते है कि इन सब के ज़रिए वह आपसे अपनी मुहब्बत का इज़हार कर रहा है। हमारे पैगंबर अलैहिस्सलाम ने हमें यह दुआ सिखाई, सुबहानका अल्लाहुम्मा क्योंकि हमें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। दुनिया आपको कारणों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर करती है। किसी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी बाधाओं में से एक उसकी आंखों के सामने पड़ा पर्दा है। तो क्या आप उस परदे को उठाएंगे और सच्चाई देखेंगे?

यह अनुभव आपको अल्लाह के क़रीब ले आएगा। अब हम अगले हिस्से पर आते हैं, "व तबारकस्मुक।" इसका अर्थ है, "तेरे नाम में बरकत है। आपका नाम बरकत से भरा है।" आइये बरकत शब्द को थोड़ा और विस्तार से समझाएं। यह बरकत एक विशेष अच्छाई है जो केवल अल्लाह से आती है। यह वह गुण है जो किसी चीज़ की थोड़ी मात्रा को आपकी अपेक्षा से अधिक बना देता है। हमें वास्तव में अपने जीवन में बरकतों की आवश्यकता है। जब आपके पास बरकत होती है, तो एक क़दम आगे बढ़ना हज़ार क़दम हो सकता है, लेकिन जब आप बरकत खो देते हैं, तो आप हज़ार क़दम भी उठा लें तो भी आप केवल एक क़दम आगे बढ़ते हैं। कभी-कभी आप इसे महसूस कर सकते हैं जब आप पैसा कमा रहे होते हैं, आपके पास बरकत होती है। या जब आप पैसों को जल्दी से खो देते हैं तो आपको बरकत की कमी महसूस होती है। लेकिन बरकत केवल पैसे के बारे में नहीं है। इसे समय से भी जोड़कर देखें। उदाहरण के लिए, जब आपके समय में बरकत होती है तो आपको एक घंटा भी बहुत productive लगता है, जैसे अपने 5 घंटों का काम कर लिया हो। अगर आपकी सेहत में बरकत न हो तो हो सकता है आप बार-बार बीमार पड़ जाएँ। अगर आपके रिश्तों में बरकत न हो तो आपको अपने प्यारों के साथ समस्याएं हो सकती है और आप दुखी हो सकते है। तो ये बरकत प्राप्त करने का क्या उपाय है?

हमें अपने जीवन में इसकी बहुत अधिक ज़रूरत है, सही? उस दुआ के अनुसार जिसकी हम चर्चा कर रहे है एकमात्र उपाय अल्लाह के नाम से अमल करना है। इसका मतलब है कि किसी भी काम को करने से पहले "बिस्मिल्लाह" कहना। और यह सिर्फ़ कहना नहीं है, बल्कि अपने दिल में इसके अर्थ को सचमुच महसूस करना भी है। तो, बिस्मिल्लाह कहने में बरकत है। हर चीज़, जानवर, पौधे इत्यादि सभी बिस्मिल्लाह कहते हुए अल्लाह के नाम के साथ चलते है। एक गाय के बारे में सोचिए। वह सिर्फ़ घास खाती है, फिर भी लीटर भर पौष्टिक दूध देती है। यह कैसे संभव है?

घास और दूध। एक दिन की मधुमक्खी मीलों दूर तक उड़ सकती है और बिना रास्ता भूले वापस आ सकती है। अगर हम एक तीन साल के बच्चे को बाज़ार भेजें, तो वह वापस नहीं आ पाएगा। लेकिन मधुमक्खी ऐसा कर सकती है। वह ऐसा कैसे कर पाती है?

यह सब बातें एक बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करती है। अपने- अपने अमल से, ये सभी जानवर कहते है "बिस्मिल्लाह", "अल्लाह के नाम पर" सभी जानवर, पौधे और हर चीज़ अल्लाह के नाम से चलते हैं, और उन्हें बरकत मिलती है। इसलिए जहाँ सभी जानवर ऐसा करते हैं, वहीं हम इंसानों को भी अपने कामों की शुरुआत बिस्मिल्लाह से करनी चाहिए। तब हम भी उस विशाल श्रृंखला का हिस्सा बन जाएँगे। आपका जीवन बरकतों से भर जाएगा। आप मेज़ पर बैठते हैं, और कहते हैं, "बिस्मिल्लाह"। तो आप जो खाना खाते हैं वह बरकत वाला हो जाता है। एक गिलास पानी पीने से पहले, आप कहते हैं, "बिस्मिल्लाह"। वह पानी शिफा बन जाता है। आप अपनी कार में बैठते हैं, और कहते हैं, "बिस्मिल्लाह"। आपकी यात्रा सुरक्षित हो जाती है। आप अपनी किताब खोलते हैं और कहते हैं, "बिस्मिल्लाह"। आपका मन साफ़ हो जाता है। इसी तरह हर काम में बरकत मिलती है। अब हम इसपर आते है "व तआला जद्दुक" इसका अर्थ है, "आपकी महानता और महिमा सबसे ऊपर है।" बहुत सी चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें हम सबसे महान समझते हैं, कुछ चीज़ें जिनसे हम सबसे ज़्यादा डरते हैं, लेकिन अल्लाह उन सबसे कहीं अधिक महान है। ज़रा सोचिए। हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर 1,670 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से घूमती है, और साथ ही, यह सूर्य के चारों ओर 1,08,000 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से घूमती है। और फिर भी, इस अविश्वसनीय गति के बीच, आप अपनी मेज़ पर बैठकर बिना गिराए अपनी कॉफ़ी पी सकते हैं। यह कैसी शक्ति है?

यह कैसा संतुलन, यह कैसी महानता है? भाइयो, बहनो, सूर्य में हर सेकंड 60 करोड़ टन हाइड्रोजन हीलियम में बदल जाता है। फिर भी, उसी क्षण, एक विशाल energy transformation बिना रुके हो रहा है। और यह मत भूलिए कि सूर्य तो केवल अंतरिक्ष में मौजूद छोटे तारों में से एक है। उससे कहीं बड़े तारे मौजूद हैं। और अल्लाह, इन सभी विशाल आकाशगंगाओं का प्रबंधन करते हुए, उसी समय में वह हमारे मन में आने वाले सबसे छुपे हुए विचारों को भी जानता है। "या अल्लाह, तू ही है जो हमें हैरानी से भर देता है, और तू ही है जिसने हमें इसे व्यक्त करने के लिए शब्द सिखाए हैं, 'सुबहान अल्लाह'। 'व तआला जद्दुक,' तेरी महानता और महिमा सबसे ऊपर है।" लेकिन क्या होता है जब हम अल्लाह की असली शक्ति को भूल जाते हैं?

हम अपनी सुरक्षा की भावना खो देते हैं। "अल्लाह मेरी रक्षा करेगा" की वह भावना, ख़त्म होने लगती है। धीरे-धीरे, छोटी-छोटी समस्याएँ बड़ी लगने लगती है और हमारा दिल डर और चिंता से भर जाता है, जैसे, "अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा? ओह, मैं इसका क्या करूँगा?

अगर मैं बीमार पड़ गया तो क्या होगा?" हमारे मन में ऐसे विचार आने लगते हैं। हमारा रब वह है जो अपने बंदों का साथ कभी नहीं छोड़ता। बस जो चाहिए होता है वह है उसका हुक्म - "कुन," "हो जा," और वह हो जाता है। इसीलिए अल्लाह की शक्ति के प्रति जागरूकता बनाए रखना बेहद ज़रूरी है। यह ज्ञान आपको बदल देता है, आपको यह गहरा एहसास दिलाता है, "मैं अपनी लड़ाई अकेले नहीं लड़ रहा। मुझे ख़ुद अल्लाह की शक्ति का समर्थन प्राप्त है। उसके एक आदेश, "हो जा," से पूरी स्थिति बदल सकती है। जो चीज़ें आपको नामुमकिन लगती थीं, वे मुमकिन हो जाती हैं।" कभी-कभी जब मैं इस दुआ पर गौर करता हूँ, मेरा मतलब है सुबहानका अल्लाहुम्मा तो मैं हमें मिली उस बेमिसाल समझदारी से बिल्कुल हैरान रह जाता हूँ। पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने हमें केवल शब्द नहीं सिखाए; उन्होंने हमें अल्लाह से बातचीत शुरू करने की एक अचूक कुंजी दी। एक और वाक्य है जिसे सिर्फ़ जनाज़े की नमाज़ में पढ़ा जाता है: "व जल्ला षनाउक।" इसका अर्थ है, "तेरी प्रशंसा महान है।" जनाज़े में, जब हम मौत के आमने-सामने होते हैं, तो यह हमें याद दिलाता है कि प्रशंसा का असली हक़दार सिर्फ़ अल्लाह हैं। भले ही कोई व्यक्ति करोड़ों का मालिक ही क्यों न हो!

व फिर भी जन्नत के लायक़ नहीं होता। सारी प्रशंसा का सच्चा हक़दार केवल अल्लाह ही है। हम हाल ही में एक जनाज़े में गए थे, और वहाँ कब्रों के पास हमारी एक बातचीत हुई। मैंने भाइयों से कहा, "हमारे पीछे इन कब्रों में, वे लोग हैं जिनके पास कभी करोड़ों की दौलत थी। वहाँ एक प्रसिद्ध star भी है, लेकिन अब वे सब खामोश हैं, सब ज़मीन के नीचे पड़े है।" जनाज़े की नमाज़ में हम पढ़ते है "व जल्ला षनाउक" "सिर्फ़ अल्लाह ही है जिसकी प्रशंसा महान है" पद, प्रतिष्ठा, बुद्धि, शक्ति, muscles, इनमें से कुछ भी बाक़ी नहीं रहता। सफलता, सोशल मीडिया फ़ॉलोअर्स, इनमें से कुछ भी बाक़ी नहीं रहता। यह सब मिट जाता है। और उस पल जब हम मौत का सामना करते हैं, तो सच्चाई स्पष्ट हो जाती है। वास्तव में प्रशंसा का असल हक़दार सिर्फ़ अल्लाह हैं। कल्पना कीजिए कि एक उस दिन, आपके जनाज़े में भी लोग कहेंगे "व जल्ला षनाउक" मौत आपको भी ढूँढ लेगी। तो उस दिन, कौन सा पद, कौन सी दौलत, कौन सी खूबसूरती आपको बचाएगी?

इसलिए हमें अभी से उसे पहचान लेना चाहिए। और अगर आप इसे दूसरे नज़रिए से देखें, तो यही वह चीज़ है जो इंसान को सबसे बड़ी आज़ादी देती है। अगर बाक़ी सब कुछ ख़त्म भी हो जाए तो भी आप उस अनंत शक्ति से जुड़े रहते हैं जो कभी ख़त्म नहीं होती। और अब हम अपने अंतिम वाक्य पर हैं, "वा ला इलाहा ग़यरुक।" "तेरे सिवा कोई इलाह (ईश्वर) नहीं है।" यह कलमा "ला इलाहा इल्लल्लाह" जैसा है। infact, "ला इलाहा इल्लल्लाह" इतनी गहरी सच्चाई है कि ज़िंदगी भर का चिंतन भी इसे पूरी तरह समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम ने कहा कि - " सबसे अच्छे शब्द जो उन्होंने ख़ुद कहे और उनसे पहले के नबियों ने कहे वो है - "ला इलाहा इल्लल्लाह" उदाहरण के लिए, "ला इलाहा इल्लल्लाह" के कलमे में, हम "इलाह" शब्द को हम अल्लाह के दूसरे नामों से बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए, "ला रज़्ज़ाक़ा इल्लल्लाह।" इसका क्या अर्थ है?

अल्लाह के सिवा कोई रिज़्क देने वाला नहीं है। "ला शाफिया इल्लल्लाह," अल्लाह के सिवा कोई शिफा (healing) देने वाला नहीं। "ला क़ादिर इल्लल्लाह," अल्लाह के सिवा कोई ताक़तवर नहीं। "ला मुहिय् इल्लल्लाह," अल्लाह के सिवा कोई जीवनदाता नहीं। इस प्रकार, "ला इलाहा इल्लल्लाह" का कलमा अर्थ की दर्जनों परतों तक पहुँचता है। दिल एक सच्चे आश्रय की खोज करता है, और वाक्य "व ला इलाहा ग़ैरुक" इस ज़रूरत को पूरा कर देता है। अब, आइए संक्षेप में बताते हैं कि हमने शुरू से किस बारे में बात की है। سبحانکَ اللّهُمَّ.

ऐ अल्लाह, तू किसी भी दोष या कमियों से पाक हैं। तू ऐसे चमत्कार करता हैं जो दिमाग़ को हैरान कर देते हैं। "و بحمدِک." "तू ही है जो हम्द का असली हक़दार है।" जब भी कोई किसी की प्रशंसा करता है, तो वास्तव में, वह आपकी प्रशंसा कर रहा है। "و تبارکَ اسمُک." आपका नाम बरकत वाला है। आपके नाम से शुरू होने वाले हर काम में बरकत होती है। "و تعالَی جَدُّک." आपकी महानता, शक्ति, अस्तित्व और महिमा सर्वोपरि है, अतुलनीय है। "و لا اله غَیرُک." आपके सिवा कोई इलाह (ईश्वर) नहीं है। भाइयो, बहनो, हर वो चीज़ जिसक बारे में हम बात कर रहे हैं, वह सब असल में एक ही बिंदु पर आती है। नमाज़ को सिर्फ़ अदा ही नहीं करना है, बल्कि नमाज़ को जीना, महसूस करना है। जब हम अपने अल्लाह के सामने खड़े हों, तो ज़ुबान के कहे को अपने दिल से महसूस करना है। उसे अपने दिमाग़ से समझना है। तभी जाकर नमाज़ सिर्फ़ एक फ़र्ज़ नहीं रह जाती, बल्कि एक सच्ची मुलाक़ात बन जाती है। बेशक, जब हम इन गहरे अर्थों के बारे में नहीं सोचते, तब भी हम नमाज़ के अपने फ़र्ज़ को पूरा कर रहे होते हैं। हमें इसमें कोई शक़ नहीं होना चाहिए। जब यह श्रृंखला समाप्त हो जाएगी, अगर आप इसे सही मायने में समझ पाए और इसे अपनी नमाज़ में लागू कर पाए, तो इंशाअल्लाह, यह बिल्कुल अलग अनुभव होगा। इस भाग में, हमने सबसे बुनियादी दुआओं में से एक पर फोकस किया। दूसरे भागों में, हमने सुरह अल-फ़ातिहा को explore किया। और एक अन्य वीडियो में, हमने सूरह अल-फ़लक और सूरह अन-नास के अर्थों को explore किया। जब हम इन अर्थों पर विचार करते हैं, तो इबादत एक प्रकार की थेरेपी में बदल जाती है, क्योंकि शब्दों के एक-एक अर्थ में ये शक्तिशाली संकेत मिलते है कि हमारा ईमान किस तरह के खुदा पर है। अपनी पूरी ज़िंदगी में आप इस दुआ को हज़ारों बार दोहराएँगे, लेकिन मुद्दा दोहराने का नहीं है। बाल्कि मुद्दा यह है कि हर बार दोहराए जाने के साथ आप ख़ुद को अल्लाह के और क़रीब लायें। भाइयो, बहनो, एक दिन हमारी ज़बानें ख़ामोश हो जाएँगी। हमारे साथ कब्र में वही ईमान जाएगा जो हमारे दिलों में स्थापित हुआ होगा। उस दिन कामयाब लोगों में शामिल होने के लिए, हमें आज ही इन शब्दों को सही से समझना होगा। वैसे, उन लोगों के लिए कि जिन्हें नियमित रूप से पाँचों नमाज़ें अदा करने में मुश्किल होती है, लिए हमारी टीम ने एक बहुत ही लोकप्रिय ऐप विकसित किया है। यह पूरी तरह से फ्री और विज्ञापन-मुक्त है। मैं आपको इसे ज़रूर देखने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ!

इंशाअल्लाह।
