# हमने 10 धर्मांतरित महिलाओं से पूछा: "इस्लाम क्यों?"

- Language: hi
- Published: 2026-08-26
- Canonical: https://blog.towardseternity.com/hi/blog/we-asked-10-female-converts-why-islam
- Source video: https://www.youtube.com/watch?v=qc3s8FHAnq4
- Channel: Towards Eternity

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मुझे लगता है मैं डर जाती थी जब भी "अल्लाहु अकबर" सुनती थी। बहुत सारे स्टीरियोटाइप थे। मैं सोचती थी कि मुस्लिम औरतें दबाई जाती हैं। उन्हें हिजाब क्यों पहनना पड़ता है?

ये ठीक नहीं है। मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे। मैं वो लड़की थी जो जब भी बाहर जाती थी, तो चाहती थी कि लोग मुझे देखें, लेकिन गलत इंसान देखें, तो बुरा भी लगता था। मैं क़ुरआन पढ़ने लगी एक बहुत ही Arrogant Reason से। और वो ये था कि, मैं ढूंढना चाहती थी कोई विरोधाभास। इस्लाम औरतों को बहुत से तरीकों से आज़ादी देता है। असल में इस्लाम ने औरतों को बहुत ऊँचा मक़ाम दिया है। मेरे दिमाग़ में यही था कि औरतों को दबाया जाता है। लेकिन जब मैंने इस्लाम के बारे में पढ़ना शुरू किया, तो समझ में आया— "नहीं, औरतों को समाज ने दबाया है।" जो कुछ मुझे मिला, वो थी एक व्यापक जीवन प्रणाली । जो मुझे मिले, वो क़ुरान के वैज्ञानिक सबूत थे। मेरी रिसर्च में जो मिला, वो था क़ुरान का साहित्यिक चमत्कार। शून्य विरोधाभास। फिर मैंने सड़कों पर चलना एंजॉय किया, बस यूं ही — कोई दिखावा नहीं, कोई बनावट नहीं। पहली बार मैंने ज़िंदगी को वाक़ई महसूस किया, बिना डर के कि लोग क्या कहेंगे। यही तो इस्लाम ने दिया। मेरा नाम लॉरेन बूथ है। मैं एक पत्रकार, लेखिका और अभिनेत्री हूं। मैं 1967 में नॉर्थ लंदन के हैम्पस्टेड में पैदा हुई थी। साल 2010 में मैंने इस्लाम क़ुबूल किया। अल्हम्दुलिल्लाह। मैं एक सिख परिवार में बड़ी हुई। मेरे माता-पिता भारतीय हैं। मैं UK में पैदा हुई और पली-बढ़ी। मैंने लगभग 24-25 साल की उम्र में इस्लाम अपनाया। मैं लंदन में पैदा हुई और वहीं बड़ी हुई। सच कहूं तो मैं खुद को नास्तिक मानती थी। मैं ईस्ट लंदन में पैदा हुई और पली-बढ़ी। मेरी मां इटालियन हैं। मुझे मेरी मां के साथ चर्च जाना याद है। मैं चर्च जाती, और ये रूहानी और जज़्बाती तौर पर बड़ा सुकून भरा था, पर मेरे कुछ सवाल थे। मैं logically और rationally ये समझ नहीं पाती थी कि मैं किसी इंसान की इबादत कैसे कर सकती हूं। मुझे ये ठीक नहीं लगा। छोटी उम्र में ही मैं सवाल पूछने लगी। और मुझे वो दिन याद है, जब मैंने चर्च के पादरी से बात करते हुए ये पूछा — यानि उनसे मैंने यह सवाल पूछा, तो वो बोले, "बस इसे मान लो।" मेरी नानी के लिए एक इज़्ज़त का भाव था जिसकी वजह से ज़्यादा सवाल नहीं पूछ पाती थी। जब मैं बड़ी हो रही थी, तो उनसे पूछती थी, "तीन क्यों होते हैं?" तो वो कहती थीं, "तुम्हें बस यक़ीन करना है।" ऐसा लगता था जैसे दरवाज़ा बंद कर दिया हो। कई ऐसे सवाल थे जिनके जवाब मुझे नहीं मिलते थे, और यीशु को ईश्वर का बेटा मानने वाला विचार, मुझे मुश्किल लगता था। अगर खुदा सर्वशक्तिमान और ताक़तवर है, तो फिर, क्यों...

मतलब, यीशु को हमारे गुनाहों के लिए मरने की क्या ज़रूरत थी? और क्यों हमें यीशु से दुआ करनी चाहिए? मेरे लिए ये सोच बहुत अजीब थी। मैं इसे समझ ही नहीं पाई। मुझे याद है कि मैं सवाल किया करती थी, और मुझे अक्सर चुप करा दिया जाता था। मुझे ऐसा कहा जाता था कि ऐसे सवाल नहीं पूछने चाहिए। लोग शायद गुस्सा नहीं होते थे, लेकिन ऐसा लगता था कि मुझे नजरअंदाज़ कर दिया गया हो। समझ नहीं पाई—कि अगर वो खुदा है, तो मर कैसे सकता है? खुदा नहीं मरता। ये बात हमेशा समझना मुश्किल था। खुदा अपने बच्चे को ऐसा क्यों करेगा? बच्चा था, तो फिर तकलीफ़ क्यों? उसे बचाया क्यों नहीं, अपने पास बुलाया क्यों नहीं? मैं बचपन से ही सोचती थी। कि कैसा खुदा है जो अपने बच्चे के साथ ऐसा होने देता है? आपने सबसे पहले इस्लाम के बारे में कैसे सुना?

शायद मैं थोड़ा इस्लामोफ़ोबिक भी थी। मुझे लगता था कि बहुत कुछ गलत हो रहा है — जैसे इराक़ में, और भी बहुत कुछ। मुझे लगता है मैं डर जाती थी जब भी "अल्लाहु अकबर" सुनती थी। ये मुझे डरा देता था। मुझे लगता था कि मुसलमान मर्द बहुत सख्त होते हैं, बीवियों को मारते हैं और ऐसे बहुत सारे स्टिरियोटाइप्स थे। मैं लगा मुस्लिम औरतें दबाई जाती हैं। उन्हें हिजाब क्यों पहनना पड़ता है? ये ठीक नहीं है। मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे। इस्लाम में आपको सबसे ज़्यादा क्या प्रभावित किया?

मुसलमान औरतों को लेकर जितने भी मेरे मन में स्टिरियोटाइप थे, इस्लाम में सबसे पहले मैंने औरतों के बारे में ही पढ़ना शुरू किया। मैंने बहुत सारे लेक्चर सुने और इंटरनेट पर काफी कुछ पढ़ा। एक किताब है The Great Women of Islam जो दारुस्सलाम ने प्रकाशित की है, वो वाकई ज़बरदस्त है। मेरे दिमाग़ में था कि औरतों को दबाया जाता है। लेकिन जब मैंने इस्लाम के बारे में पढ़ना शुरू किया, तो समझ में आया—"नहीं, औरतों को समाज ने दबाया है।" इस्लाम तो बहुत आगे की सोच रखता है। कि हम अब भी समाज के रूप में इसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। और इंशा'अल्लाह, ये मज़बूती से लौटेगा, क्योंकि आज जो भी परेशानियाँ हैं — जेंडर रोल्स और पहचान को लेकर — मुझे लगता है कि इसका जवाब इस्लाम के पास है। वक़्त आ गया है कि इस सोच को अपनाने का, क्योंकि इस्लाम औरतों को बहुत से तरीकों से आज़ादी देता है। इस्लाम ने औरतों को बहुत ऊँचा मक़ाम दिया है। अगर समाज इसे समझे,तो उन्हें भी मेरी तरह एहसास होगा कि सुभानअल्लाह, इस्लाम औरतों को कितने सारे अधिकार देता है। ऐसे अधिकार, जो हमें इस देश में पहले कभी नहीं मिले थे, लेकिन मुस्लिम देशों में थे। नबी मुहम्मद ﷺ ने हमें सिखाया कि औरतों की इज़्ज़त कैसे करनी है। जैसे कि, नबी ﷺ ने हमें मेहर का हक़ दिया, मिसाल के तौर पर। पहले औरत को मर्द को पैसे देने पड़ते थे, अब मर्द औरत को मेहर देता है। ये एक बहुत बड़ी बात है। उन लोगों के लिए जो जो बेटी पैदा होने पर उदास हो जाते थे, इतना कि उसे मार ही डालते थे। नबी मुहम्मद ﷺ ने फरमाया, कि अगर तुम बेटियों की परवरिश करो, तो तुम्हें जन्नत नसीब होगी। "जन्नत में तुम मेरे साथ ऐसे (करीब) होगे।" और फिर, छोटी-छोटी बातों में भी— अगर कोई औरत तुमसे बहस कर रही हो, नाराज़ हो, चिल्ला रही हो, तो चुप रहो। यही उन्होंने ने किया। वो चुप रहते थे। उमर इब्न ख़त्ताब ने भी यही सीखा। पहले वो अपनी बीवी से बहस कर लिया करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने समझा— चुप रहना बेहतर है। कोई बात नहीं — उन्हें जज़्बाती होने दो, औरतों को उनके जज़्बात महसूस करने देने दो। सुभानअल्लाह, कौन सा मज़हब ये सिखाता है?

ऐसी बहुत मिसालें हैं जो मैं दे सकती हूं, लेकिन रिकॉर्डिंग लंबी हो जाएगी। मुझे याद है, 2008 में, जब मैं मुस्लिम नहीं थी, मैं ग़ज़ा में फँस गई थी, उन लोगों के साथ जो उस वक़्त घेराबंदी में थे, और आज भी उसी हालत में हैं। औज़ु बिल्लाह। और वो रमज़ान का महीना था, लोग एक-दूसरे के लिए अच्छे काम कर रहे थे। हालांकि वो खुद भी ग़रीब थे, तो मैंने सोचा, "मैं भी अच्छा काम करूं, रफ़ा रिफ्यूजी कैंप में किसी परिवार को गोश्त दे आऊं।" मैं खाना लेकर, रिफ्यूजी कैंप में मुस्लिम परिवार के पास गई। मां ने दरवाज़ा खोला और बोलीं, "तफ़द्दल, अस्सलामु अलैकुम।" चेहरे पर नूर था, कमरा छोटा न खाने को कुछ था, न पीने को कुछ। मैंने कहा, "फिर रोज़ा क्यों रखा?

मुझे नहीं लगता कि आपके खुदा को आपसे प्यार है।" Sorry to Say, लेकिन मुझे नहीं लगता। "वो आपको Gazan क्यों बनाया, 30 दिन प्यासे रहते हो — फिर 31वें दिन... क्या आपके पास पानी होता है?" वो बोली, "नहीं होता।" तो मैंने कहा, "तो अब क्या?" ग़ज़ा में 30 दिन बिना खाए-पिए रहते हो, तो क्या 31वें दिन आपका फ्रिज भर जाएगा?

वो बोली, "नहीं, बिल्कुल नहीं।" मैंने कहा, "तो फिर, आपका खुदा आपसे मोहब्बत नहीं करता।" "तो फिर रोज़ा क्यों रखती हो?" और उस खाली कमरे में वो बोली, "मैं गरीबों को याद रखने के लिए रमज़ान में रोज़ा रखती हूँ । और उस पल मैंने सोचा, "अगर यही इस्लाम है, तो मैं भी मुस्लिम बनना चाहती हूं।" क्योंकि ये faith ऐसा है, जहां God के कुछ नहीं देने के बावज़ूद, आप God में Belive करते हुए उसके शुक्रगुज़ार हैं, तो कोई ऐसा Faith है जहां आपके पास एक कटोरा खाना हो और वो भी आप किसी अजनबी को दे दें— या अल्लाह...

वाक़ई। अल्लाह ने किसी को मेरे रास्ते में भेजा था। वो मेरी सेकेंडरी स्कूल की एक क्लासमेट थी, और वो एक प्रैक्टिसिंग मुस्लिम थी। तो मैंने इस्लाम के बारे में पढ़ना शुरू किया, आर्टिकल्स पढ़ने लगी। उस वक़्त ऑडियो कैसेट्स सुना करती थी। मैंने क़ुरान पढ़ना शुरू किया एक arrogant reason से। और वो ये था कि मैं उसके मज़हब में कोई विरोधाभास ढूँड़ना चाहती थी, ताकि उसे बचा सकू। क्योंकि मुझे लगता था कि हिजाब ग़लत है। मुझे लगता था कि वो मुझे कामयाब करियर से रोक देगा, एक अच्छी ज़िंदगी से भी। जहां मैं बड़ी हुई, वहां मुझे जो चीज़ें दिखीं, वो ये थीं कि मर्द आगे-आगे चलते थे, और उनकी बीवियां पीछे-पीछे। आप समझ रही हैं, मेरे मन में ऐसे ही स्टीरियोटाइप थे। और ये सब थोड़ा दिलचस्प था, क्योंकि एक तरफ़, मैं देख सकती थी कि इस मज़हब में कुछ तो है जो उसे ख़ूबसूरत सुकून देता था। और दूसरी तरफ़, मुझे लगता था कि ये उसके लिए रुकावट बनेगी ये उसे दबाएगी, उसकी तरक्की में रुकावट बनेगी। तो मैंने उससे बात करना शुरू किया, हम अक्सर डिबेट करते और हम रोज़ बात किया करते। और जैसे-जैसे वक्त गुज़रा, मैं convenience होने लगी। कि इस्लाम ही सच है। और इस बात ने मुझे डरा दिया। मैं convenience होती जा रही थी। मेरा दिल बदलने लगा, मेरी सोच बदलने लगी। मुझे कुछ भी नहीं मिला, जो कुछ मुझे मिला, वो था एक “Comprehensive way of Life” जो कुछ भी मुझे मिला, वो क़ुरान में साइंटिफिक सबूत थे। मेरी रिसर्च में जो मिला, वो था क़ुरान का साहित्यिक चमत्कार। “No Contradiction” और यही बात मुझे डराने लगी, क्योंकि भले मैं छोटी थी, लेकिन मैं हमेशा से वैसी इंसान रही हूं कि अगर कुछ अपनाऊं, तो फिर उसे पूरी शिद्दत से निभाती हूं — 150%। तो मुझे मालूम था कि जिस तरह मैं बदल रही हूँ, मैं convenience हो रही हूँ इसका मतलब है कि मुझे मेरी ज़िन्दगी में बदलाव लाना होगा। और ये डरावना था मेरे दिमाग़ में बस इस्लाम ही चलता रहता था। जो कुछ मैंने जाना, बस वही बातें दिमाग़ में घूम रही थीं। क़ुरान में जो साइंटिफिक सबूत हैं, “ख़ुदा का वजूद है ” “Proof of Prophethood” बस एक के बाद एक ख़याल, रुक ही नहीं रहे थे। तो मैंने सोचा कि थोड़ा बाहर टहल लूं, जहां उस वक़्त मैं रहती थी। थोड़ी सांस लेने के लिए। मैं एक ऐसी सड़क पर पहुंची, जहां से मैं अक्सर गुज़रती थी। मैं वहां खड़ी हो गई, ग्रीन सिग्नल के इंतज़ार में। ग्रीन सिग्नल हुआ , लोग पार करने लगे, लेकिन मैं हिल नहीं पाई। ऐसा लगा जैसे मेरे पैर ज़मीन में धँस गए हो। मेरे मन में बस एक ही ख़याल चल रहा था — अगर मैंने ये सड़क पार की, या कोई और सड़क, और मेरा Accident हो गया, और मैं मर गई, ये सब जानते हुए, जो मैं जानती हूँ, तो इसका मेरे लिए क्या ही मतलब रहेगा?

और इसने मुझे ताने दिए मैं उस चीज़ की गवाही क्यों नहीं दे रही जो मेरे दिल में उतर चुकी है? एक बात जिसने मुझे पूरी तरह यक़ीन दिलाया कि इस्लाम ही सच है — वो ये कि क़ुरान कभी बदला नहीं गया, और लाखों लोग इसे हिफ़्ज़ करते हैं। मैंने कभी नहीं सुना कि लाखों लोग बाइबल को ज़बानी याद करते हों। तो मेरे लिए, ये मोज़िज़ा था। क्योंकि ये कोई छोटी किताब नहीं है, काफ़ी बड़ी किताब है। और इसी बात ने मेरा ध्यान खींचा। हमारे नबी ﷺ के बारे में आपको सबसे ज़्यादा क्या प्रभावित किया?

उनका किरदार। हमेशा उनका किरदार। हमेशा उनका किरदार। औरतों के साथ उनका बर्ताव — सबसे पहले। औरतों के साथ उनका रवैया, जैसे जब उन्होंने उस आदमी से बात करना पसंद नहीं किया जो अपनी बेटी को चूमता नहीं था। और ये बात कि वो अपनी बीवियों को उनके जज़्बात उनकी भावनाओं को समझते थे, और खूबसूरती से उन्हें संभालते थे। उन्होंने एक सहाबी के खाने में इसलिए शिरकत नहीं की, क्योंकि उस सहाबी ने उनकी बीवी आयशा को दावत नहीं दी। हर बात — उनका नरम स्वभाव, और अपनी बीवियों के साथ इंसाफ़ का बर्ताव। घर के माहौल में उनकी नरमी, और फिर मैदान-ए-जंग में उनकी ताक़त। उनकी नर्मी उस वक़्त भी नज़र आई जब वो ताइफ़ गए थे मदद माँगने, लेकिन वहां जो हुआ, वो तो जानते ही हैं। ये बात कि वो रो सकते थे। आजकल के मर्द सोचते हैं कि "हम बच्चे की तरह रो नहीं सकते। , नहीं, वो रोते थे। आजकल हम जेंडर की बात करते हैं — कि मर्द कैसा हो, औरत कैसी हो। तो बस नबी मुहम्मद ﷺ को देख लीजिए। अभी मैं यासिर क़ादी की लिखी हुई सीरत-उन-नबी ﷺ पढ़ रही हूं, और हर पैराग्राफ से कुछ नया सीख रही हूं। क्या ज़बरदस्त किताब है। किसी को पढ़नी चाहिए। हर चीज़ — यहां तक कि उनके आख़िरी वक्त का ज़िक्र, जब आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) अपने सिरदर्द की शिकायत कर रही थीं, जब वो शिकायत कर रही थीं तो नबी ﷺ मज़ाक में बोले, "अरे, मेरा क्या?

मुझे भी सिरदर्द है — मैं तो जा रहा हूं।" और सुब्हानल्लाह, उन्होंने जो कुछ भी सहा, इसलिए ताकि हम बेहतर इंसान बन सकें और जन्नत पा सकें। उन्होंने जो कुर्बानियां दीं — अपने परिवार के लिए, संपत्ति, जितनी भी आज़माइशें झेली — किसके लिए? हमारे लिए। आपने शहादा (कलमा) कैसे लिया?

वो मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ुशनुमा दिन था। सच कहूं तो, वो पल एहसास से भरा हुआ। मैं उस एहसास को बयान भी नहीं कर सकती। ऐसा लगा सारी बोझिल चीज़ें कंधों से उतर गई हों। बहुत हल्कापन महसूस हुआ है। ऐसा लगा कि नई इंसान बन गई हों। वो मेरी ज़िंदगी का सबसे खुशहाल दिन था। मैंने कभी मस्जिद या किसी जगह शहादा नहीं लिया, क्योंकि शहादा तो मेरे और अल्लाह बीच की चीज़ है। मैं तो चाहती थी कि एम्पायर स्टेट बिल्डिंग की सबसे ऊपर जाऊं और नीचे लोगों को चिल्लाकर कहूं— "क़ुरान लो और पढ़ो! तुम्हें अंदाज़ा ही नहीं है!

इस किताब को पढ़ लोगे तो इस दुनिया की हर सच्चाई जान जाओगे। तो मस्जिद में मेरा अगला जाना तब हुआ जब मैंने शहादा लिया। हाँ, अलहम्दुलिल्लाह। वहां 60–70 लोग थे। और उस वक़्त जो लोग मेरे सबसे करीब थे, जिनकी मौजूदगी में मैंने शहादा लिया — वो आज भी मेरे सबसे करीब हैं। अलहम्दुलिल्लाह। तो मेरा शहादा लेना वाक़ई एक शानदार तजुर्बा था। मुझे याद है मैं बहुत कांप रही थी, लेकिन बहुत अच्छा लगा। सच में बहुत सुकून मिला था। मुझे याद है जब मैंने शहादा लिया और ग़ुस्ल किया, तो ऐसा लगा, ज़िंदगी दोबारा शुरू हो रही है। ये एक नया आगाज़ था। जब ये जानती हूं कि अल्लाह हर गुनाह माफ़ कर देता है, लेकिन अच्छे कामों का सवाब फिर भी देता है। तो वो एहसास बहुत अच्छा था, और मैं पूरी तरह तैयार थी एक मुस्लिम औरत की पहचान अपनाने के लिए। तो मैं पढ़ती गई, पढ़ती गई, पढ़ती गई, मैं घर गई और अगले सात दिनों में सब कुछ बदल गया था मुझे नमाज़ पढ़नी थी। अल्लाह से रो-रो कर बात करनी थी। मैंने सजदा किया, जैसे मुसलमानों को करते देखा था, और दो बातें बार-बार कहती रही — "शुक्रिया" और "माफ़ कीजिए।" मैंने कहा, "शुक्रिया” मुझे ये ज़िंदगी देने के लिए, इतनी मोहब्बत देने के लिए, यहां तक कि वो सब कुछ जो कभी मैंने पहचाना नहीं। खूबसूरत बेटियां दीं, मुझे मोहब्बत मिली, मौक़े मिले। अच्छा परिवार मिला। मैं आपको जानती हूं — तो शुक्रिया।" और "माफ़ कीजिए।" बहुत माफ़ी मांगी। और हफ्तों तक रोती रही। आपके परिवार और आसपास के लोगों का क्या रिएक्शन था?

शहादा लेने के बाद मैंने सबको बताया नहीं कि मैं मुस्लिम बन चुकी हूं। अगर पता चल भी जाता, तो कोई फर्क नहीं पड़ता था — मंज़ूर था। लेकिन इस्लाम कबूल करने के शुरुआती दौर में, मैं खुद नहीं बताती थी कि अब मैं मुस्लिम हूं। मैंने अपने परिवार को भी यह नहीं बताया था, एक वजह ये भी थी, और शायद बहुतों के लिए ये मायने रखता था। कि हमें अपने अंदर वो हिम्मत ढूंढनी होती है, खासकर तब जब आप अकेले हों। आपको पहले ये समझना होता है कि इस मज़हब में आप कौन हैं, और खुद को मजबूत बनाना है, इससे पहले कि आप किसी और को इसके बारे में बताए, मेरे लिए बस इतना था कि मैं बहस नहीं चाहती थी। मैं ये नहीं चाहती थी कि लोग अपनी राय देकर मुझे परेशान करें, या ये कहें कि मैंने ग़लत किया, भले ही वो सवाल मोहब्बत में ही क्यों न पूछे जाएं। वो मुझसे इसलिए पूछते है क्योंकि वो मुझसे मोहब्बत करते हैं, उन्हें परवाह है, फिक्रमंद है वो। क्योंकि उनके लिए ये नया था। मुझे पता था मैं क्या कर रही हूं, और जैसा की मैंने पहले भी कहा— ये सब मेरे और अल्लाह के बीच की बातचीत थी, और मैं ये नहीं चाहती थी कि कोई और उसके बीच में आए। मुझे लगता था कि आख़िर में मुझे अपने रब के सामने खड़ा होना है, जो फैसला मैंने लिया है, और जो भी अमल आने वाले हैं, उनमें किसी और का कोई रोल नहीं होगा। तो मैंने किसी को कहा। शायद थोड़ा डर भी था लोगों को बताने का। लेकिन मेरे परिवार को कैसे पता चला — उन्हें याद नहीं होगा, लेकिन मुझे याद है। हम डिनर पर गए, और हम सब रेस्टोरेंट में बैठे हुए थे, और मैं घर की अकेली लड़की हूं। सबसे बड़ी और इकलौती। अब्बू के लिए तो मैं "लिटिल गर्ल" ही रही हूं। और वो मेरी शादी की बात कर रहे थे। अब्बू कह रहे थे, "जब आल्मा की शादी होगी, एक खूबसूरत चर्च में, और उसे लेकर आइज़ल तक जाऊंगा..." मतलब वो मेरी शादी को लेकर बहुत सारी प्लानिंग कर रहे थे। मैं बिलकुल चुप थी, बस अपना खाना खा रही थी, शांति से बैठकर उन्हें बातें करने दे रही थी। फिर मम्मी ने अचानक कहा, "ऐसा नहीं होने वाला।" अब्बू का रिएक्शन तो ज़ाहिर था — उन्होंने पूछा कि, "क्यों नहीं होगा?" तो मम्मी बोलीं, “क्योंकि आपकी बेटी अब मुस्लिम है।" तो मैंने खाना तेज़ी से खाना शुरू कर दिया। उन्होंने नमाज़ पढ़ते हुए देखा था। शायद उन्होंने नमाज़ पढ़ते देखा और वहीं उन्हें शक हो गया, कि मैंने शहादा लिया है और अब मैं मुस्लिम बन चुकी हूं। लेकिन मुझे लगा कि उन्हें काफ़ी समय तक यही लगा कि ये एक फेज़ है। शायद मेरी उम्र की वजह से, या फिर उस वक़्त मैं जैसी थी, उस वजह से। चीज़ों को लेकर जुनून होता था — इस्लाम भी उनमे में से एक था — तो मैं उसे लेकर बहुत प्रोटेक्टिव हो जाती थी। इसलिए मैंने मज़हब का बचाव किया। मुझे डर था कि मैं अपना मज़हब न खो दूं। जो अभी-अभी पाया है, उसे छिनने का डर था। तो उन्होंने मेरे फैसले की बहुत इज़्ज़त की। शायद समझ नहीं पाए, लेकिन मेरा परिवार है। मेरी नानी ने मुझे एक तरफ ले गई और पूछा, "क्या तुम खुश हो?" मैंने कहा, "हाँ, मैं बहुत खुश हूं।" तो कहा, "जो दिल कहे, वो करो।" और फिर उन्होंने मेरे परिवार से कहा, "इसे अपने हाल पर छोड़ दो।" "ये न तो शराब पीती है, न ही स्मोक करती है, रात में बाहर नहीं घूमती, अपने बेटे का ख्याल रखती है। कपड़े भी ठीक पहनती है — तो फिर ठीक है ना।" आख़िरकार उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया, और पूरे परिवार से कहा कि मेरी नए मज़हब की इज़्ज़त करें। क्या मुस्लिम बनने और हिजाब पहनने से आपकी आज़ादी पर कोई बंदिश आई?

इस्लाम अपनाने के बाद मुझे असली आज़ादी मिली है। क्योंकि आज़ादी का मतलब है लोगों की बनाई ज़ंजीरों को तोड़ देना। जब आप अपने रब से सच्चा रिश्ता जोड़ लेते हैं, और अपने मक़सद को समझ लेते हैं, तो फिर आप सिर्फ उसके लिए जीते हैं, लोगों के लिए नहीं। तो यही है असली आज़ादी। तो हाँ, अब मैं हिजाब पहनती हूं, और हाँ, अब कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जिन्हें मुझे निभाना होता है, अपने रब के लिए लेकिन मैं आज़ाद हूं, क्योंकि मेरे फैसले, मेरी पसंद, मैं कहां जाती हूं, क्या करती हूं, क्या नहीं करती — ये सब उस के लिए है जिसने मुझे पैदा किया, किसी और के लिए नहीं है जो मेरी तरह ही सफ़र पर हैं। तो हाँ, मैं आज़ाद हूं। मुझे सच में आज़ादी का एहसास हुआ। मैंने महसूस किया कि हिजाब ने मुझे पूरी तरह से आज़ाद कर दिया। अब ये मेरा फ़ैसला है कि कौन मुझे देख सकता है और कौन नहीं। ना कि उस होर्डिंग की तरह जिस पर शराब का विज्ञापन होता है और एक अधनंगी औरत को दिखाया जाता है। मेरे लिए, वो असल ज़ुल्म है। और ये असल आज़ादी। ये सच में मुश्किल था, क्योंकि मैं वो लड़की थी जो जब भी बाहर जाती थी, तो चाहती थी कि लोग मुझे देखें, लेकिन गलत इंसान देखें, तो बुरा भी लगता था। और उस सोच को पीछे छोड़ना पड़ा — जो बहुत मुश्किल था, क्योंकि मेरी पहचान का हिस्सा यही था, कि लोग मुझे देख रहे हैं या नहीं। और ये मुश्किल था, क्योंकि जब मैं यूके की सड़कों पर चलती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे मैं मौजूद ही नहीं हूं — अदृश्य हूं। और ये उसके लिए, जो एक्ट्रेस बनना चाहती थी, जो खास कपड़े पहनती थी। अब वो उसकी चाहत का हिस्सा नहीं रहा। तो ये वाकई मेरे लिए बहुत बड़ा बदलाव था। लेकिन फिर मैंने उस "invisibleness" को अपनाना, एंजॉय करना शुरू किया। सड़कों पर चलना एंजॉय किया, बस यूं ही — कोई दिखावा नहीं, कोई बनावटीपन नहीं। पहली बार मैंने ज़िंदगी को वाक़ई महसूस किया, बिना डर के कि लोग क्या कहेंगे, यही तो इस्लाम ने दिया है। जब आप मुस्लिम बनने का सोच रहे होते हैं, तो आपको अल्लाह से रिश्ता बनाने की कोशिश करनी होती है। एक तरह का प्रोसेस होता है जिसे धीरे-धीरे समझना पड़ता है, ताकि आपको ये समझ आए कि बालों को क्यों ढकना हैं, जिस्म को क्यों ढकना है, और कुछ चीज़ों से दूर रहना क्यों ज़रूरी है। तो उन लोगों के लिए यही सलाह है, जो सोच रहे हैं, तलाश में हैं। "कि मैं मुस्लिम बनना चाहती हूं, मुझे अल्लाह पर यक़ीन है, नबी ﷺ की सुन्नत पर यक़ीन है, लेकिन मैं बाल ढँकना नहीं चाहती, मैं ये छोड़ना नहीं चाहती, वो छोड़ना नहीं चाहती।" तो वो सब धीरे-धीरे आ जाएगा। बदलाव तब आता है जब आप अल्लाह से रिश्ता बना लेंगे। ऐसी बहुत सी चीज़ें थीं, सोचा भी नहीं था कि मैं कर पाऊंगी। हिजाब उनमें से एक था। और पार्टियों में जाना बंद करना उनमे से एक था, लेकिन जब अल्लाह से रिश्ता मज़बूत होता गया, इस्लाम को जानना शुरू किया, तो बस रब को राज़ी करने की चाह होने लगी। फोकस होना चाहिए कि आप अल्लाह से कैसा रिश्ता बनाना चाहते हैं, कि आप उसकी रहमत को समझें, उसकी मोहब्बत को समझें, और ये जानें कि अल्लाह हकीकत में है कौन। अपना वक्त लीजिए, इबादत की कोशिश कीजिए, इबादत को समझिए, बाक़ी चीज़े ख़ुद ब ख़ुद होती जायेंगी। हर किसी का अपना एक सफ़र होता है, और ये बात कन्वर्ट्स को देखकर समझी है। हम सीरत में भी देखते हैं कि इस्लाम में लोग किस तरह दाख़िल हुए, नबी मुहम्मद ﷺ के दौर में भी। धीरे-धीरे चीज़ आसान होती है। शराब छोड़ने में भी थोड़ा वक्त लगा। सब कुछ एकदम से नहीं हुआ। लोगों ने मुझसे कई बार पूछा है— "इस्लाम मुश्किल नहीं है?

कठिन नहीं लगता?" और बिना किसी हिचकिचाहट के मैं कह सकती हूं, बिना इस्लाम के जिंदगी मुश्किल है। रहमत वाले रब ने हमें इस्लाम तोहफ़े के रूप में दिया है ज़बरदस्ती नहीं की। “ये लो तुम्हें फैसला करना है।" फैसला तुम्हारा है, अंजाम भी तुम्हारा होगा। ध्यान से चुनो। लोगों को लगता है कि जब आप मुस्लिम बनते हैं तो आपको अरबी बनना पड़ेगा, आपको अपना नाम बदलना होगा, कपड़े बदलने होंगे, और अपनी परंपराएं भी छोड़नी होंगी। क्या ये मुमकिन है कोई अपनी संस्कृति के साथ भी मुस्लिम रहे?

मुझे लगता है लोगों में बहुत बड़ा भ्रम ये है जब आप इस्लाम अपनाते हैं, तो आप अरबी बन जाते हैं, या फिर किसी ऐसी संस्कृति को अपनाते हैं जो आपकी अपनी नहीं है। सच कहूं तो जब मैंने 20 साल पहले इस्लाम अपनाया, तो मुझे कोई भी रिवर्ट मुस्लिम, कोई कन्वर्ट या लैटिनो मुस्लिम नहीं मिले थे। और उस वक़्त ये सब बहुत मुश्किल था। लेकिन अब सब कुछ बहुत अलग है। हालात और सब बदल चुके हैं। अब सोशल मीडिया, अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स और इस्लाम के खुले प्रचार की वजह से, हम ये समझते हैं कि आपको अरबी ना ही देसी, और ना ही आपको रूसी होने की जरूरत है। आप जैसे हैं, वैसे ही रहकर भी आप मुस्लिम हो सकते हैं। इस्लाम इंसानियत के लिए नाज़िल किया गया था.

और आप भी शामिल हैं। तो अफ़सोस की बात है कि अब भी बहुत से भ्रम मौजूद हैं, जैसे कि इस्लाम अपनाते ही आपको अपना नाम बदलना पड़ेगा। ये ग़लतफ़हमी है। कहीं नहीं कहा गया है कि नाम बदलना ज़रूरी है, जब तक कि आपके नाम का मतलब कोई बुरा अर्थ न रखता हो। आप कुछ भी हो सकती है, मारिया, फ़िलिप, पाब्लो — कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बहुत अहम बात है, क्योंकि यही आपकी पहचान है। आप अपनी संस्कृति की अच्छाइयों को ज़रूर बनाए रख सकते हैं। मैं खुद आज भी मोले, टाकोस, और फ्लॉटास बनाती हूं। मैं अपनी संस्कृति को पूरी तरह एंजॉय करती हूं। आपको यीशु मसीह से प्यार करना या उन पर ईमान लाना भी नहीं छोड़ना पड़ेगा। और ये समझना कि उनकी मां मरियम का ज़िक्र क़ुरान में एक पूरे सूरह के तौर पर है तो ये शख्सियतें हमारे लिए बिल्कुल अजनबी नहीं हैं। हम उनसे मोहब्बत, अदब करते हैं। आपको उनसे मोहब्बत या अदब करना छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। बल्कि इसके बिल्कुल उलट, इस्लाम हमारी ज़िंदगी को कई तरीकों से बेहतर बनाता है। तो टाकोस खाना जारी रखिए, अपनी संस्कृति का पूरा लुत्फ उठाइए, और साथ-साथ इस्लाम के बारे में सीखते रहिए, क्योंकि इस्लाम ज़िंदगी जीने का एक तरीका है।
