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क़ौम-ए-लूत पर अज़ाब AI द्वारा चित्रित - 3 क़ुरआनी चमत्कारों की खोज हुई!

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सदियों पहले क़ुरआन में जिन बरबाद शहरों का ज़िक्र हुआ, वो आख़िरकार एक-एक करके जीवंत हो रहे हैं। कूटवाचित चित्रलिपि, आसमान से बरसे पत्थर, तबाही के निशान लिए हुए खंडहर। इस वीडियो में हम आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से क़ौमे लूत, क़ौमे सबा और फ़िरऔन के अचानक मिट जाने को दिखाएँगे। हज़ारों साल पहले वो दौलत में जीते, शानदार इमारतें बनाते, और घमंड और वासना के पीछे भागते थे। पर एक दिन सब कुछ बदल गया। क़ुरआन ने उनकी तबाही को सिलसिलेवार बयान किया। और नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने ये सच्चाइयाँ अटल विश्वास के साथ बताईं, जबकि उनका ये सब जानना नामुमकिन था। और सदियों बाद विज्ञान उन सबकी पुष्टि करने लगा। तो, क़ुरआन के पन्ने पुरातात्विक खोजों से पूरी तरह कैसे मेल खाते हैं?

इतने लंबे वक़्त तक ज़मीन के नीचे दबे रहने के बाद ये सब बाहर कैसे आए? और आख़िर ये तीनों क़ौमें कैसे बरबाद हुईं? अगर आप ये सब देखने को तैयार हैं, तो चलिए शुरू करते हैं। "तो सूरज निकलते ही उन्हें एक चीख़ ने आ पकड़ा। फिर हमने उस बस्ती को उलट दिया, और उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए। बेशक वो (बस्ती) एक आबाद रास्ते पर पड़ती है।" क़रीब चार हज़ार साल से छिपा हुआ एक राज़ खुलने का इंतज़ार कर रहा था। 2005 में सच की तलाश स्टीवन कॉलिन्स को जॉर्डन घाटी की एक विशाल, ख़ामोश पहाड़ी तक ले आई — तल अल-हम्माम। वहाँ के लोग इसे मनहूस कहते और इससे दूर रहते थे। पर ये जगह आख़िर कहाँ थी?

ये सदोम और गमोरा थे — वो शहर, जो कभी अपनी बेहिसाब दौलत, ऐशो-आराम और ख़ूबसूरती के लिए मशहूर थे। पर जब नैतिकता ही गिर जाए, तो दौलत किस काम की? ये शहर अभूतपूर्व यौन विकृति के दलदल में फँसे हुए थे। नबी लूत अलैहिस्सलाम ने सालों तक उन्हें चेतावनी दी, हालाँकि वो अकेले खड़े थे। पर उन्होंने सुना ही नहीं। और आख़िर में वो मिटा दिए गए — ठीक वैसे ही, जैसे क़ुरआन ने बताया था। सालों तक, लोग ऐसी किसी तबाही के वास्तव में होने की बात पर हँसते रहे। क्या ऐसी सभ्यता के अवशेषों का मिलना मुमकिन था? क्या पुरातत्व सचमुच नबी लूत अलैहिस्सलाम की कहानी साबित कर सकता था?

इसका जवाब राख और पत्थरों की परतों तले दफ़न, बस खोजे जाने के इंतज़ार में था। सबकी निगाहें मृत सागर पर थीं। ये इलाक़ा सदियों से क़ौम-ए-लूत से जोड़ा जाता रहा है। जैसे ही पुरातत्वविदों ने तल अल-हम्माम में खुदाई शुरू की, हैरान कर देने वाली चीज़ें सामने आने लगीं। जैसे पिघले हुए बरतन, राख की परतें, और जले हुए इंसानी अवशेष। ऐसा लगता था मानो इन शहरों पर अचानक कोई आफ़त टूटी हो और सब कुछ एक ही पल में ढह गया हो। पर कैसे?

अमेरिकी और जॉर्डन के शोधकर्ताओं ने कई सालों तक इस इलाक़े में खुदाई की। और उन्हें जो मिला, वो जल्द ही पूरी दुनिया को हिला देने वाला था। ये सिर्फ़ एक शहर नहीं था — ये एक विशाल नगर-राज्य था। यह संयोगवश हुई तबाही नहीं थी बल्कि इसकी एक स्पष्ट दिशा थी। ये धमाका इतना ज़बरदस्त था कि इमारतें नींव से उखड़ गईं, और चीज़ें और लाशें एक ही दिशा में कई मीटर दूर जा गिरीं। पुरातत्वविदों को ऐसे कंकाल मिले, जो टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे। कुछ हड्डियाँ बारीक टुकड़ों में बिखर गई थीं। एक कंकाल रक्षात्मक अवस्था में पाया गया, जैसे वह भीषण ताप से अपना चेहरा बचाने की चेष्टा कर रहा हो। शोधकर्ताओं को शॉक्ड क्वार्ट्ज़ और हीरे जैसी संरचनाएँ मिलीं, जो सिर्फ़ बेहद ज़्यादा दबाव में ही बनती हैं। उन्हें मिट्टी में पिघले हुए इरिडियम और प्लैटिनम जैसे दुर्लभ तत्व मिले। ये खनिज अंतरिक्ष से आए किसी धमाके की पहचान होते हैं। इन धातुओं को पिघलाने के लिए तापमान 2500 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचना ज़रूरी था। ज्वालामुखी से भी ज़्यादा गरम। धरती पर मौजूद कोई भी शक्ति इतनी कम ऊँचाई पर इतना प्रचंड ताप और दबाव पैदा नहीं कर सकती थी। ये एक दुर्लभ और ख़ौफ़नाक तबाही थी, जो अंतरिक्ष से उतरी थी। इस खोज ने दुनिया को दंग कर दिया। पर मुसलमानों के लिए ये ऐसा था, जैसे क़ुरआन की आयतें उनकी आँखों के सामने जीवित हो उठी हों। "हमने उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थरों की बारिश बरसाई।" "फिर जब हमारा हुक्म आया, तो हमने उनकी बस्ती को उलट दिया।" तो आज मृत सागर कैसा है?

ठीक वैसा ही, जैसा नाम से ज़ाहिर है — मुर्दा। क़ुरआन पर्यावरण के बारे में एक ऐसी बात कहता है, जो सचमुच हैरान कर देती है — ख़ासकर तब, जब आप ये सोचें कि वो किस दौर में उतरा था। "थल और जल में तबाही फैल गई है, लोगों के अपने हाथों की कमाई से, ताकि अल्लाह उन्हें उनके कुछ अमाल का मज़ा चखा दे।" आज, मृत सागर में कोई भी मछली या दृश्यमान जीव निवास नहीं करता। क्योंकि वो जगह कभी उस समाज का घर थी, जिसने अल्लाह की तय की हुई हदों को ठुकरा दिया। "अजनबियो, इतनी दूर से आए हो और कोई औरत साथ नहीं लाए?" "हमारे साथ कोई औरत नहीं है। बस, हमें जाने दीजिए।" अल्लाह ने उनके पास अपना रसूल भेजा था, पर उन्होंने उनकी बात ठुकरा दी। अब आफ़त सिर्फ़ चंद घंटे दूर थी। अल्लाह के फ़रिश्ते ख़ूबसूरत नौजवानों की शक्ल में नबी लूत अलैहिस्सलाम के पास आए। पर...

"आज रात मैंने एक और ख़ूबसूरत नौजवान को उनके घर जाते देखा।" जब शहर के बदचलन लोगों को ये बात पता चली, तो उन्होंने घर घेर लिया। उनकी नीयत स्पष्ट थी। "अब तुम उन्हें छुपा नहीं सकते। बाहर निकलो। हमारा सब्र मत आज़माओ।" नबी इतनी शर्म और झेंप से भर गए, कि उसे बयान नहीं किया जा सकता। वो चिल्लाए — "अल्लाह से डरो, और मेरे मेहमानों के मामले में मुझे शर्मिंदा मत करो। क्या तुममें कोई समझदार आदमी नहीं?" "निकल जाओ! हमें हमारे हाल पर छोड़ दो!" जिस नज़ारे को उन्होंने कभी मासूम समझा था, उस रात वह अपने सबसे अंधकारमय पड़ाव पर पहुँच गया था। नबी लूत ने ज़रा भी देर नहीं की, और चंद ईमान वालों के साथ शहर छोड़ दिया। रात जैसे ही सुबह में बदली, पूरी क़ौम मिटा दी गई। दौलत, शोहरत, गुरूर...

भोर होते-होते, ये सब इतिहास के पन्नों से हमेशा के लिए मिट चुके थे। पीछे कुछ बचा था, तो बस राख और पत्थर। इस बार हम प्राचीन मिस्र की तरफ़ चलते हैं। इतिहास की सबसे ताक़तवर सभ्यताओं में से एक। ये बेशुमार दौलत, महलों और मज़बूत फ़ौजों की सरज़मीन थी। पर एक दिन उनके बादशाह फ़िरऔन को एक सपने ने डरा दिया। उसमें बनी इसराईल के एक लड़के के हाथों उसका पतन दिखा था। तो अपनी हुकूमत बचाने के लिए उसने एक क्रूर आदेश दिया। "हर नवजात लड़के को क़त्ल कर दिया जाए!" और ठीक तभी मूसा अलैहिस्सलाम पैदा हुए। पर उनकी माँ ने एक ईश्वरीय संकेत पर अमल करते हुए उन्हें लकड़ी के संदूक़ में नील नदी में बहा दिया। क़िस्मत का अजीब खेल कि नदी उन्हें दुश्मन के महल तक पहुँचा आई। फ़िरऔन को पता ही नहीं था कि जिस बच्चे से वो डरा था, वो अब उसी के घर में पल रहा है। और सालों बाद क़िस्मत मूसा अलैहिस्सलाम को महल से दूर ले गई, ताकि उन्हें उनके असल मक़सद के लिए तैयार किया जा सके। रेगिस्तान में ख़ामोश ज़िंदगी बिताने के बाद, उन्हें सौंपी गई इलाही ज़िम्मेदारी को पूरा करने मूसा अलैहिस्सलाम मिस्र के दिल में लौट आए। एक बादशाह के घमंड और एक नबी के मक़सद के बीच सबसे बड़ी जंग शुरू होने वाली थी। सदियों तक कोई भी प्राचीन मिस्री लिखावट को समझ नहीं सका। पर एक ही खोज ने सब कुछ बदल दिया — द रोज़ेटा स्टोन। यही पत्थर अतीत की चाबी बना, जिससे हम आख़िरकार चित्रलिपि पढ़ सके। और एक बार फिर, जब हम क़ुरआन को देखते हैं, तो हमें ऐसी सटीक ऐतिहासिक जानकारी मिलती है, जो आज की खोजों से मेल खाती है। नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए इन छिपी सच्चाइयों तक पहुँचना नामुमकिन था, क्योंकि वो भाषा मर चुकी थी। इससे एक तार्किक नतीजा निकलता है। अगर क़ुरआन ऐसा छिपा हुआ इतिहास बताता है, जो सदियों बाद सच निकलता है, तो वो ज़रूर रचयिता का कलाम है। ये खोजें साबित करती हैं कि मूसा अलैहिस्सलाम का सफ़र एक सच्ची, ऐतिहासिक घटना थी। ये भी ध्यान देने की बात है कि मिस्र के बारे में ये ख़ास सच्चाइयाँ तौरात में मौजूद नहीं हैं। एक आसान मिसाल के लिए, क़ुरआन में इस्तेमाल हुई उपाधियों को देखिए। मूसा अलैहिस्सलाम के क़िस्से में शासक को फ़िरऔन कहा गया है। पर यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के क़िस्से में शासक को बादशाह कहा गया है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 'फ़िरऔन' शब्द सिर्फ़ नए साम्राज्य के दौर से इस्तेमाल होने लगा, जो ठीक मूसा अलैहिस्सलाम का ही दौर है। उससे पहले, यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के दौर में, मिस्र के शासकों को बादशाह कहा जाता था। पर तौरात ये फ़र्क़ किए बिना दोनों दौर के लिए 'फ़िरऔन' ही इस्तेमाल करती है। वो दोनों को फ़िरऔन कहती है। इससे पता चलता है कि क़ुरआन में ऐसी अनोखी ऐतिहासिक सटीकता है, जो ओल्ड टेस्टामेंट में मौजूद नहीं थी। क़ुरआन छिपे हुए इतिहास को कैसे खोलता है इसकी एक और मिसाल देखने के लिए हम उस बड़े मुक़ाबले के दिन पर नज़र डाल सकते हैं। जब फ़िरऔन ने मूसा अलैहिस्सलाम का पैग़ाम सुना, तो वो घमंड और ग़ुस्से से भर गया। अपनी ताक़त दिखाने के लिए उसने मूसा अलैहिस्सलाम को सबके सामने मुक़ाबले की चुनौती दी। "ये दरबार तुम्हारे ख़ुदा के जादू के आगे नहीं झुकेगा। मिस्र अपने बेहतरीन जादूगरों से जवाब देगा। एक ऐसे उपयुक्त स्थान पर मिलने का समय निर्धारित करो जहाँ सब आ सकें।” मूसा अलैहिस्सलाम ने बहुत सोच-समझकर तारीख़ चुनी। उन्होंने ऐसा दिन चुना, जब सब लोग इकट्ठा होते। दिलचस्प बात ये कि क़ुरआन इस दिन को 'यौम अल-ज़ीनत' कहता है, यानी सजावट, सिंगार और ख़ूबसूरती का दिन। और यही बात इस त्योहार को बाक़ी सबसे अलग बनाती थी। जब हम प्राचीन मिस्र के इतिहास को देखते हैं, तो हमें 'ओपेट उत्सव' नाम का एक बड़ा जश्न दिखाई देता है। और इस त्योहार की सबसे ख़ास बात थी — सजावट। घर सजाए जाते, मर्द और औरतें ख़ुद को सँवारते, मंदिर सजाए जाते, मूर्तियाँ सजाई जातीं, और उन मूर्तियों को ख़ूबसूरती से सजी सड़कों पर निकाला जाता। तो ये सचमुच सजावट का ही दिन था। एक बार फिर क़ुरआन वो सच खोल देता है, जिसे इतिहास भुला चुका था। और फिर से — ये ब्यौरा आपको तौरात में नहीं मिलेगा। मूसा अलैहिस्सलाम के दिखाए साफ़ चमत्कारों के बावजूद...

फ़िरऔन ने मानने से इनकार कर दिया। उसने बनी इसराईल पर अपना ज़ुल्म जारी रखने का फ़ैसला किया। और इसका नतीजा ये हुआ कि मिस्र पर चेतावनी के तौर पर एक के बाद एक क़ुदरती आफ़तें और महामारियाँ भेजी गईं। बाढ़... टिड्डियाँ... कीड़े-मकोड़े... मेंढक... पानी का ख़ून में बदल जाना, और अकाल के साल। "ये हमारे साथ हो क्या रहा है?" "उसका शाप!

मूसा का क़हर हम पर उतर आया है!" आज भी हम इन आफ़तों को उस दौर के दस्तावेज़ों में दर्ज देख सकते हैं। 'इपुवर पपाइरस' में, जो नीदरलैंड्स के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा है। उसकी कुछ पंक्तियाँ सचमुच हैरान कर देती हैं। "हर तरफ़ ख़ून है। सच ये है कि नदी ख़ून है, फिर भी लोग उसी से पीते हैं। लोग एक-दूसरे से डरने लगे हैं। पानी पीने के बाद भी उनकी प्यास नहीं बुझती। जो कल दिखता था, वो आज यहाँ नहीं है। धरती निचोड़ ली गई है और उजड़ी पड़ी है। जैसे कोई खेत, जिससे सन उखाड़ लिया गया हो।" ऊपरी मिस्र खंडहर बन चुका है।’’ सचमुच, अनाज हर तरफ़ तबाह हो गया है। धरती पर रौशनी नहीं है।" "क्या मूसा को सचमुच किसी ताक़तवर ख़ुदा ने भेजा है? शायद...

वो सच ही कह रहा था।" "पूरे मुल्क में एक जानलेवा महामारी फैली है।" आख़िरकार बनी इसराईल के मिस्र छोड़ने का वक़्त आ गया। अल्लाह के हुक्म पर मूसा अलैहिस्सलाम ने आधी रात को चुपके से ईमान वालों को इकट्ठा किया, और आज़ादी की तरफ़ निकल पड़े। पर फ़िरऔन को पता चलने में ज़्यादा देर नहीं लगी। "मूसा... इस सूरज के डूबने से पहले तू मेरे आगे घुटने टेकेगा। सिपाहियो! आज कोई बचकर न जा पाए!" फ़िरऔन और उसकी विशाल फ़ौज उनके पीछे लग गई। ईमान वाले समंदर के किनारे पहुँच गए, पानी और पीछे आती फ़ौज के बीच फँसे हुए। "अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा।" "वो रहा मूसा! और उसके लोग!" "मूसा!

तुझे लगता है तू मुझसे भाग सकता है?" अल्लाह के हुक्म से मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी समंदर पर मारी, और बीच में सूखा रास्ता बनाते हुए पानी दो विशाल दीवारों में बँट गया,। ईमान वाले एक साथ उन दीवारों के बीच से समंदर में दौड़ पड़े। ये नज़ारा देखकर फ़िरऔन ज़रा भी नहीं हिचका। "समंदर भी मेरी मरज़ी मानता है। मुझसे भागने वाले को कोई नहीं बचा सकता!" ग़ुस्से में अंधा होकर वो अपनी फ़ौज को समंदर के बीचोंबीच ले गया। उसने समझा कि ये रास्ता उसके लिए भी है। पर असल में वो एक ईश्वरीय फंदे में फँसता जा रहा था। "आज तुझे तेरा ख़ुदा भी नहीं बचा सकता, मूसा!" अचानक एक ज़ोरदार, ख़ौफ़नाक गरज उठने लगी। और समंदर अपनी पूरी ताक़त से उन पर बंद होने लगा। भागने की कोई जगह नहीं थी। "हम मारे गए हैं!

ये मूसा का क़हर है!" फ़िरऔन ने तौबा करनी चाही, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। सदियों तक सभी फ़िरऔन ख़ुद को ख़ुदाई हस्ती बताते रहे। वो तो ये तक मानते थे कि उनकी मौत पर प्रकृति भी तड़प उठती है। पाँचवें राजवंश के पिरामिड लेख ये साफ़-साफ़ कहते हैं — "आसमान तेरे लिए रोता है, धरती तेरे लिए काँपती है।" पर क़ुरआन इस शाही प्रोपेगंडे को चुनौती देता है। वो कहता है कि जब फ़िरऔन और उसकी फ़ौज डूबी, तो न आसमान उन पर रोया, न धरती। सूरह अद-दुख़ान, आयत 29 क़ुरआन द्वारा इन पिरामिड शिलालेखों के एकदम विपरीत तथ्यों का उपयोग एक अद्भुत ऐतिहासिक चमत्कार है। ये साबित करता है कि क़ुरआन का स्रोत प्राचीन मिस्र की सबसे गुप्त लेखों को जानता था। और क़ुरआन फ़िरऔन का क़िस्सा एक चौंका देने वाले वादे पर ख़त्म करता है। "तो आज हम तेरे बदन को बचा लेंगे, ताकि तू अपने बाद वालों के लिए एक निशानी बने।" ये बात उस दौर में कही गई, जब मिस्री ज़ुबान और उसकी परंपराएँ पूरी तरह मर चुकी थीं। और सचमुच, पुरातत्वविदों को प्राचीन शासकों के ममी बने शरीर मिले हैं। और दिलचस्प बात ये है कि उनमें से कुछ को मूसा अलैहिस्सलाम के दौर का माना जाता है। आज उन्हें देखना उस सच की एक ज़बरदस्त गवाही है। क़ुरआन प्राचीन मिस्र का ब्यौरा किसी बारीक नक़्शे की तरह देता है। मिसाल के तौर पर, उसमें हामान नाम के एक आदमी का ज़िक्र है, जो फ़िरऔन का क़रीबी था और निर्माण कार्य का ज़िम्मेदार था। जब आख़िरकार चित्रलिपि पढ़ी गई, तो एक नाम सामने आया — हामान। और उसकी उपाधि — पत्थर की खदानों के मज़दूरों का प्रमुख। ये बिल्कुल सटीक मेल है। क़ुरआन भी मूसा अलैहिस्सलाम के दौर के एक आदमी 'सामरी' का नाम बताता है। और आज हमें मिस्र के एक पुरोहित समूह का पता है, जिसे 'सेमेरयू' कहते थे — जो क़ुरआन में बताए गए उस आदमी की ख़ूबियों से पूरी तरह मेल खाता है। नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ये ख़ास उपाधियाँ कैसे मालूम हो सकती थीं?

फिर भी क़ुरआन उन्हें सौ फ़ीसद सटीकता से बताता है। ये सिर्फ़ इतिहास नहीं है। ये एक इलाही दस्तख़त है। ये किसी इंसान का काम नहीं है। ये वक़्त के बनाने वाले का ही काम है। हमारा आख़िरी पड़ाव यमन की जलती धूप में फैली एक बंजर घाटी है। सदियों से यहाँ आधे रेत में दबे हुए, पत्थरों के विशाल खंडहर पड़े थे। लोगों को रेत में पुरानी दीवारें और टूटे खंभे दिखते थे, पर वो नहीं जानते थे कि ये किस काम के थे। क़रीब 150 साल पहले, जोसेफ़ हालेवी और एडुआर्ड ग्लेज़र जैसे खोजियों को रहस्यमय लिखावट से ढके प्राचीन पत्थर मिले। इन लेखों में एक बाँध और दो उपजाऊ ज़मीनों की कहानी थी। रेगिस्तान के बीचों-बीच एक बाँध? वो वहाँ क्या कर रहा था?

दशकों बाद, जब आख़िरकार बड़ी खुदाई शुरू हुई, तो उन्हें दो विशाल द्वार मिले, जो पानी को ठीक दो दिशाओं में भेजते थे। दिलचस्प बात ये है कि जिस खोज ने लोगों को हैरान किया, वो क़ुरआन में बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी। "बेशक सबा वालों के लिए उनके अपने वतन में एक निशानी थी — दो बाग़, एक दाईं तरफ़, एक बाईं तरफ़।" सबा एक ऐसा समाज था, जिसका यमन में रहना पक्के तौर पर मालूम है। कभी इसी बंजर घाटी के बीचों-बीच एक शानदार नज़ारा था — बाग़, पानी की नहरें, और हरी-भरी ज़मीन। इसका राज़ था 580 मीटर लंबा मारिब बाँध — एक ऐसा ढाँचा, जो हज़ारों हेक्टेयर को सींचता था। उसकी चतुर बनावट पानी को दो दिशाओं में मोड़ देती थी। इससे घाटी की दाईं और बाईं, दोनों तरफ़ हरे-भरे बाग़ खिल उठे। तो अगर अल्लाह चाहे, तो रेगिस्तान भी बाग़ बन सकता है। पर जैसे-जैसे सबा वाले अमीर होते गए, वो शुक्र करना भूल गए। उन्होंने अल्लाह की तय की हुई हदें पार कर दीं। ऐसी नेअमत पर अल्लाह का शुक्र करने के बजाय, उन्होंने उसी से अपना घमंड बढ़ाया। हर गुनहगार क़ौम की तरह उन्हें भी चेतावनी दी गई। पर वो चेतावनियों को अनसुना करके अपनी ज़िंदगी जीते रहे। तो जब उनकी दौलत अपने शिखर पर थी, और उन्हें ज़रा भी उम्मीद न थी — बाँध चटख गया। एक बड़ा सैलाब आ रहा था। अचानक पत्थर की दीवारें तोड़ कर बाग़ों को उजाड़ते हुए पानी शहर में घुस आया। ये उनकी सारी शान बहा ले गया। आयत कहती है — "पर उन्होंने मुँह मोड़ लिया, तो हमने उन पर बाँध का सैलाब भेज दिया, और उनके दोनों बाग़ों को ऐसे दो बाग़ों में बदल दिया, जिनके फल कड़वे थे, और झाऊ की झाड़ियाँ और कुछ बेरी के पेड़ थे।" आयत में आया 'अरिम' - सैलाब का कोई यूँ ही रखा गया नाम नहीं था। अरबी में 'अरिम' का मतलब है बाँध या रोक। तो 'अरिम का सैलाब' ठीक-ठीक बताता है कि वो सैलाब आया कैसे — बाँध के टूटने से। 'सीआईएच 541' नाम के एक मशहूर शिलालेख में, हमें बाँध बचाने का बेताब संघर्ष दिखता है। ये कोई छोटी-मोटी मरम्मत नहीं थी — ये एक विशाल राष्ट्रीय परियोजना थी। बाँध की मरम्मत के लिए हज़ारों लोग महीनों तक काम करते रहे। तो पहेली पूरी हो गई। क्या आप जानते हैं क़ुरआन क्या कहता है?

"क्या इनकार करने वालों ने ज़मीन में सफ़र नहीं किया, और नहीं देखा कि उनसे पहले वालों का अंजाम क्या हुआ?" आज शोधकर्ता उन निशानों को एक-एक करके ढूँढ रहे हैं। और ये सब तो बस शुरुआत है। क़ुरआन अतीत के बारे में बहुत सारे ब्यौरे पहले ही दे चुका था। पर जिन्होंने ये क़िस्से सुनाए — नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम — वो न पढ़ सकते थे, न लिख सकते थे। अगर वो पढ़ना-लिखना जानते भी, तो भी वो पुरातत्वविद तो नहीं थे। उन्होंने न कोई खुदाई की थी, न किसी खोज को परखा था, और न ही एक भी शिलालेख पढ़ा था। वह उन शहरों और घटनाओं के बारे में कैसे बता सकते थे, जिनका पता इतिहास को सदियों बाद चलने वाला था?

जवाब साफ़ है — उन्हें अल्लाह ने बताया था। वो, जिसे हर चीज़ की पूरी जानकारी है। ये क़ौमें इसलिए बरबाद हुईं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की चेतावनियाँ अनसुनी कर दीं। पर सबसे डरावनी बात ये है — जिन वजहों से पिछली क़ौमें तबाह हुईं, वो हमारे पास ज़रूरत से ज़्यादा हैं। शायद फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अब सज़ा ऊपर या नीचे से नहीं, बल्कि हमारे अंदर से ही आती है। आज शायद ही कोई ये पूछता है कि हमें चेतावनी कैसे दी जा रही है। रूहानी थकान। सामाजिक बिगाड़। पारिवारिक रिश्तों में टूट। अवसाद की आधुनिक महामारी। जो ज़िंदगी कभी सुख देती थी, अब दुख देती है। अपराध की दरें। संक्रामक बीमारियों की लगातार लहरें। प्रकृति की तबाही। जलवायु संकट, और न जाने क्या-क्या। क्या आपने कभी इस पर सोचा है?

शायद इस दौर की सज़ा एक ख़ामोश, लगातार होता हुआ पतन है। क्या ये समझदारी है कि वही काम बार-बार किया जाए और अलग नतीजे की उम्मीद रखी जाए? उनका मौक़ा ख़त्म हो चुका। पर हम अभी साँस ले रहे हैं। आयत की वो बात याद रखिए — "अल्लाह उन्हें उनके कुछ कामों का मज़ा चखाता है, ताकि वो लौट आएँ।" इनकी वजह साफ़ है... ताकि वो लौट आएँ। हमारा रब वो है, जो चाहता है कि हम उसकी तरफ़ लौट आएँ। क्या आपका दिल नहीं कहता कि इस पुकार को गंभीरता से लेना चाहिए? अगर आप अपने आने वालों के लिए एक चेतावनी नहीं बनना चाहते, तो अभी आँखें खोल लीजिए। क्योंकि सबक़ तब तक दोहराया जाएगा, जब तक वो सीख न लिया जाए।