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इस्लाम बनाम ईसाई धर्म में औरतों का दर्जा – अधिकार, पॉलीगामी, हिजाब... @DrSabbelAhmed

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ईसाई, विशेष रूप से महिलाएँ, अक्सर इस्लाम के बारे में पूछती हैं, मुस्लिम महिलाएँ हिजाब क्यों पहनती हैं? क्या ये एक तरह की restriction नहीं है?

पूरे दुनिया की सबसे पुरानी और लगातार चलने वाली यूनिवर्सिटी, उसकी नींव एक मुस्लिम महिला ने रखी थी, जो हिजाब पहनती थीं। पैग़ंबर के आने से पहले महिलाओं को दबाया जाता था। उन्हें एक जायदाद की तरह समझा जाता था। उन्हें वास्तव में विरासत में लिया जाता था। दुर्भाग्यवश, लोग इस्लाम को judge इसके सांस्कृतिक प्रथाओं से करते हैं। या फिर सोशल मीडिया पर जो देखते हैं, उसके आधार पर। लेकिन इस्लाम को judge इसके दिए गए guidance, अधिकार और सशक्तिकरण के बुनियाद पर करना चाहिए। Old testament के ज़्यादातर पैगंबर एक से अधिक शादी करते थे। कई शादियाँ। कोई पाबंदी नहीं, न कोई ज़िम्मेदारी। इस्लाम ने polygamy (एक से ज़्यादा शादी को) सीमित किया। इस देश में लगभग 18,000 गैर-मुस्लिम महिलाएँ, जब वे इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को समझती हैं, तो वे इस्लाम स्वीकार कर रही हैं। अस्सलामुअलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु डॉ.

सबील अहमद। Towards Eternity में आपका एक बार फिर से स्वागत है। पिछली वीडियो में हमने उन सवालों को पूछा था, जो कई ईसाई इस्लाम के बारे सोचते हैं। आज हमने उन सवालों को इकट्ठा किया है, जो सोशल मीडिया में लगातार उठते रहते हैं। अगर आप तैयार हैं, तो चलिए शुरू करते हैं। इतिहास में महिलाओं के साथ अन्याय हुआ है। और उन्हें अलग अलग समाजों में दूसरी श्रेणी का माना गया है। कई ईसाई सोचते हैं, कि इस्लाम में भी ये ज़्यादा अलग नहीं है। क्या आप हमें इस्लाम में महिलाओं की स्थिति के बारे में बता सकते हैं? जब लोग इस्लाम में महिलाओं के बारे में सोचते हैं, तो वे सोच सकते हैं, पता है?

महिलाएं उत्पीड़ित हैं, दमित हैं। कोई अधिकार नहीं, second class, कोई आज़ादी नहीं। हक़ीक़त इससे बहुत अलग है। दुर्भाग्यवश, लोग इस्लाम को इसके cultural practices से judge करते हैं। या फिर सोशल मीडिया पर जो देखते हैं, उसके आधार पर। लेकिन इस्लाम का आंकलन कुरान में दिए गए मार्गदर्शन और अधिकारों के आधार पर किया जाना चाहिए। जो अल्लाह का शब्द है। और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के उदाहरणों के माध्यम से किया जाना चाहिए। हाँ, आप बिल्कुल सही हैं, जब आप इतिहास में देखते हैं कि पैग़म्बर के आने से पहले महिलाएं oppressed थीं। उन्हें संपत्ति के रूप में लिया जाता था और उन्हें सचमुच विरासत में दे दिया जाता था। लेकिन जब इस्लाम आया, जब अल्लाह ने मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के माध्यम से मार्गदर्शन दिया, महिलाओं को empowerment दी गई, महिलाओं को समानता इनाम में दी गई और महिलाओं को आज़ादी दी गई। क्या आप उनमें से कुछ को mention कर सकते हैं?

Quick list सबसे पहला शिक्षा का अधिकार। 1844 से पहले तक, अमेरिकी महिलाएँ, वे उच्च शिक्षा में जाने, विश्वविद्यालयों में जाने और वहाँ से graduate करने का अधिकार चाहती थी, सही?

जबकि इस्लाम ने महिलाओं को यह अधिकार सातवी शताब्दी में ही दे दिया था। इस्लाम ने ना केवल यह अधिकार दिया, बल्कि इस्लाम ने पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शिक्षा हासिल करना अनिवार्य बना दिया। मुस्लिम महिलाओं को केवल empower ही नहीं किया | उस अनिवार्यता एवं शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से महिलाएं इतनी सशक्त हुई कि दुनिया का सबसे पुराना Continuous University देखें। पूरी दुनिया में सबसे पुरानी Continuous University की नींव एक मुस्लिम महिला द्वारा रखी गई थी, जो हिजाब पहनती थी। उनका नाम फातिमा अल - फ़िहरी था। वर्ष 859, मोरक्को देश के फेज़ शहर में। ऐसा कौन कहता है?

गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और यूनेस्को। दूसरा अधिकार जो इस्लाम ने महिलाओं को दिया है, वो है — महिलाओं को विरासत (जायदाद) में हिस्सा पाने का अधिकार। अगर आप Old Testament में देखें, अगर पिता के दो बेटे और एक बेटी है, तो बेटी को कोई विरासत नहीं मिलती। शून्य विरासत । क्योंकि बेटा है। बेटा पूरी विरासत लेता है। लेकिन अगर वे केवल बेटियाँ हैं, तब उन्हें थोड़ी विरासत मिलती है। लेकिन इस्लाम ने महिलाओं को पत्नियों के रूप में, माताओं के रूप में, बेटियों के रूप में, बहनों के रूप में विरासत की गारंटी दी है, है ना? तो विरासत में हिस्से की गारंटी। जब बात जायदाद के मालिकाना हक़ की आती है, तो आप जानते हैं, इस देश में मध्य 1800 के दशक तक, यहाँ की white women के लिए, समझे?

काले नहीं, भूरे नहीं, न ही चीनी, ना भारतीय, बल्कि White women, शादीशुदा white women ने इस देश में स्टेट ऑफ इलिनॉयज में, उन्होंने संपत्ति का मालिक बनने का अधिकार हासिल किया। सन 1870, 1861 में, शिकागो में, इस्लाम ने यह अधिकार सातवीं सदी में दे दिया था। देखिए, सातवीं सदी और तेरहवीं सदी बाद की तुलना। महिलाओं को इस्लाम द्वारा दिए गए दो और महत्वपूर्ण अधिकार हैं। तलाक के लिए पहल करने का अधिकार। Old Testament में, उनके पास यह अधिकार नहीं है, यहाँ तक कि Catholicism में भी उनके पास यह अधिकार नहीं है। इस्लाम ने यह अधिकार दिया क्योंकि वास्तव में, हम जानते हैं कि हर शादी हमेशा ideal marriage ही नहीं होगी। कुछ मतभेद हो सकते हैं, है ना?

कुछ लोग ऐसे शादी में फंसे होते हैं, जिससे वे बाहर निकलना चाहते हैं। इस्लाम practical है, इसलिए इस्लाम ने महिलाओं को तलाक की पहल करने का अधिकार दिया। अन्य धर्मों में यह अधिकार नहीं है। इस्लाम ने महिलाओं को यह अधिकार दिया है और साथ ही, घर में बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उनके ऊपर होती है। लेकिन आर्थिक जिम्मेदारी उन पर बिलकुल नहीं है। वह बिल गेट्स हो सकती है, वह महिलाओं की जेफ बेजोस हो सकती है, वह अरबों की मालकिन हो सकती है, पूरी दुनिया की सबसे अमीर इंसान। फिर भी उन्हें घर या परिवार पर एक पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। वो चाहती तो खर्च कर सकती है, सही है?

कर सकती है, लेकिन उन्हें करना जरूरी नहीं है। ये आर्थिक जिम्मेदारी पति की होती है, 100%। ये कुछ अधिकार हैं जो इस्लाम ने महिलाओं को दिए हैं। बहुत महत्वपूर्ण सलाह है मेरी गैर-मुस्लिम बहनों और भाइयों के लिए इस्लाम को cultural practices या सोशल मीडिया से judge ना करें। इस्लाम को कुरान पढ़कर judge करें और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अद्भुत जीवन को देखें। Amazing fact, amazing fact, One amazing fact। इस्लाम के बारे में लोगों की सभी गलतफहमियों में, सबसे बड़ी गलतफहमी इस्लाम में महिलाओं को लेकर है। लेकिन जब हमारी गैर-मुस्लिम बहनें और भाई, जब वे इस्लाम को देखते हैं और अधिकारों को देखते हैं, सम्मान को, empowerment को, जो इस्लाम ने मुस्लिम महिलाओं को दिया है, तो वे इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं। तो इस देश में लगभग 18,000 गैर-मुस्लिम महिलाएं, जब वे इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को समझती हैं, लोग इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं। हर साल 18,000 लोग, यूके में हर साल लगभग 5,000 इस्लामी कानून में कहा गया है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधी विरासत मिलती है। क्या यह न्याय के विपरीत और महिलाओं के लिए अपमानजनक नहीं है?

कुछ लोग विरासत के कानूनों को देखकर कहते हैं कि भाइयों को बहनों की तुलना में दुगुनी विरासत मिलती है और जाहिर सी बात है कि कारण यह है कि मर्द, जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, वह शादीशुदा होने के कारण आर्थिक जिम्मेदारी उठाता है। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी पूरी तरह से उसकी होती है। वैसे औरत की आर्थिक जिम्मेदारी शून्य होती है। पत्नी की आर्थिक जिम्मेदारी बिल्कुल नहीं होती। इसलिए यह सही है कि मर्द को ज़्यादा विरासत मिले क्योंकि उसे परिवार पर खर्च करना होता है। औरत को खर्च नहीं करना पड़ता। इसका मतलब है कि उसे उतनी विरासत नहीं मिलनी चाहिए। इसलिए इस कारण विरासत में अंतर होता है। अगर आप इसे बाइबिल के दृष्टिकोण से देखें और इस्लामिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह तरीका कहीं अधिक न्यायपूर्ण है। यह ज़्यादा common sense की बात है और परिवार के practical पहलू को ध्यान में रखता है। ईसाई, विशेषकर महिलाएं, अक्सर इस्लाम के बारे में पूछती हैं। मुस्लिम महिलाएं हिजाब क्यों पहनती हैं?

क्या यह एक प्रतिबंध नहीं है? क्या यह अत्याचार नहीं है? जब मैं कोलंबस गया था, वहाँ एक ओपन हाउस था। ओपन हाउस में एक ईसाई महिला ने सवाल पूछा। उन्होंने कहा, महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए मजबूर क्यों किया जाता है? उस समय ईरान में हिजाब को लेकर विवाद चल रहा था। मैंने उन्हें कहा, हम सभी कपड़े पहनते हैं। हम सभी कपड़े क्यों पहनते हैं? मैंने कहा और वह जानती थी, Decency और modesty की खातिर। तो हिजाब पहनना भी Decency और modesty के लिए ही है. सही, क्योंकि मैं उनसे logically बात करना चाहता था। तो उसके बाद मैंने उस ईसाई महिला से कहा, क्या यह ठीक है कि कोई भी किसी भी तरह के कपड़े पहन सकता है?

हमारी लड़कियाँ, हमारे लड़के हमारे बुजुर्ग कोई भी। या समाज में एक तरह के Modesty laws होने चाहिए। उन्होंने कहा, Modesty laws ज़रूर होने चाहिए, वरना लोग, महिलाएं बिना कपड़ों या बिना कमीज के बाहर निकलने लगेंगे। इसलिए कुछ modesty laws होने ही चाहिए। तो यह कौन तय करेगा कि ये modesty laws क्या होंगे? क्या यह culture से तय होगा?

यह ठीक नहीं होगा, क्योंकि एक व्यक्ति ऐसा कहेगा तो दूसरा व्यक्ति कुछ और कह सकता है। इस तरह यह सब्जेक्टिव हो जाता है। तो modesty laws और सभी नियम, यह creator की ओर से आने चाहिए जो हमें अच्छे से जानता है, जो यह बेहतर जानता है कि हमारे लिए और समाज के लिए क्या लाभकारी है। उसने ही इस्लाम में modesty laws का concept दिया है। तो जल्दी से महिलाएं modesty के लिए हिजाब पहनती हैं क्योंकि वे Creator की बात मानती हैं। यह उनके लिए एक फ़र्ज़ है। यह कुरान में दो जगह है। सूरह नंबर 24, आयत नंबर 31, और बिल्कुल सही आयत है —सूरह 33, आयत नंबर 59। फिर मैं लोगों को एक उदाहरण देता हूँ, एक quick analogy, कि जैसे schools और colleges में dress code होते है। आपको कुछ हद तक शॉर्ट्स पहनने होते हैं। उदाहरण के लिए, आप बहुत छोटे शॉर्ट्स नहीं पहन सकते। आपको कुछ नियमों का पालन करना होता है — जैसे हुडी नहीं पहन सकते, वगैरह वगैरह। तो schools और colleges में भी नियम होते हैं। अगर आप अस्पताल में काम करते हैं, तो वहाँ भी कुछ नियम होते हैं कि आपको एक विशेष प्रकार की पोशाक पहननी होती है। अगर आप किसी Restaurant में जाते हैं, तो लिखा होता है — बिना कमीज , बिना जूते, सेवा नहीं — कुछ ऐसा ही। इसलिए अल्लाह ने भी हमें modesty laws दिए हैं। फिर मैं अपने ईसाई और यहूदी भाइयों-बहनों से कहता हूँ, कि modesty laws सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं हैं, बल्कि पुरुषों के लिए भी हैं। इस्लाम में Modesty केवल पहनावे तक सीमित नहीं है। नज़रों की भी modesty है। मैं किसी महिला को देखकर उसे घूर नहीं सकता, या lustful निगाह से नहीं देख सकता। लेकिन modesty laws केवल इस्लाम में ही नहीं हैं। अगर आप यहूदी धर्म को देखें, तो एक शादीशुदा यहूदी महिला अपने बाल नहीं दिखा सकती। एक ईसाई महिला, खासकर जब वह गिरिजाघर जाती है, वह भी अपने बाल नहीं दिखा सकती। तो हिजाब का concept Old और New Testament में भी मौजूद है। तो Book of First Corinthians, अध्याय 11, आयत 5 और 6 में, एक ईसाई महिला को हिजाब पहनना होता है। वह अपने बाल नहीं दिखा सकती। अगर वह अपने बाल दिखाती है, तो यह अपमान माना जाता है। यह ऐसा ही है जैसे उसे उसका सिर मुंडाया गया हो, है ना?

मरियम, यीशु की माँ, जो पवित्रता की प्रतीक हैं, वे भी हिजाब पहनती थीं। तो जब मुस्लिम महिलाएँ हिजाब पहनती हैं, तो वे भी यीशु की माँ मरियम को अपना आदर्श मान रही होती हैं। एक बार मैं एक lecture दे रहा था। कुछ ईसाई लोग अमीश गिरिजाघर से आए थे। वे lecture के बाद आए। मैंने देखा कि उनमें से हर एक ने अपने सिर को ढका हुआ था। तो मैंने उनसे एक सवाल किया। मेरी प्रिय बहन, आपने मुस्लिम महिलाओं की तरह हिजाब पहन रखा है। मुझे इसका कारण बताइए। उन्होंने कहा, हम बाइबिल को follow कर रहे हैं। बाइबिल हमें आदेश देता है कि हम हिजाब पहनें या अपने बाल ढकें। तो हिजाब की परंपरा सभी cultures में, यहाँ तक कि secular समाजों में भी है। बिलकुल इसी वजह से उन्हें उनके modesty और chastity के लिए सराहा और परखा जाना चाहिए और उनके व्यक्तित्व और उन नेमतों के लिए, जो अल्लाह ने उन्हें दी हैं। इस्लाम में, अगर कोई पुरुष चाहे, तो वह चार महिलाओं से शादी कर सकता है। इस समय और युग में यह कितना उचित है?

इस्लाम में ऐसी व्यवस्था क्यों है?

यह वाकई एक अहम बात है। इससे पहले कि सातवीं सदी में इंसानियत तक क़ुरआन की रहनुमाई पहुँचे, उससे पहले हर तहज़ीब और हर मज़हब में एक से ज़्यादा शादी करने का रिवाज़ मौजूद था। कई शादियाँ, कोई पाबंदी नहीं, न कोई ज़िम्मेदारी। इस्लाम ने polygamy (एक से ज़्यादा शादी) को सीमित किया। क़ुरान की सूरह नंबर 4, आयत नंबर 3 में कहा गया है— दो, तीन या चार शादियां करो। लेकिन यदि न्याय नहीं कर सकते, तो केवल एक ही शादी करो। तो इस्लाम ने, अल्लाह ने, क़ुरान की हिदायत ने जो किया वह यह था कि— सबसे पहले polygamy को सीमित कर के अधिकतम चार तक कर दिया। पहला बिंदु। दूसरा यह कि — अब पति पर ज़िम्मेदारी डाली गई कि — अगर तुम एक से अधिक या केवल एक शादी भी करते हो, तो तुम्हें अपनी पत्नी की पूरी तरह से देखभाल करनी होगी। आर्थिक रूप से, सही, हर तरह से, रहने का जगह, कपड़े और खाने, वे सभी बराबर और समान होने चाहिए - यदि आप एक से अधिक से शादी करना चाहते हैं। तो, polygamy को सीमित करना और पति पर ज़िम्मेदारी देना और महिलाओं को उनके अधिकार देना यह फ़र्ज़ नहीं है। यह encouragement भी नहीं है। यह कुछ परिस्थितियों में दी गई अनुमति है। जैसे कि अफ़ग़ानिस्तान उदाहरण के लिए। सही संभव है कि बहुत से मर्द युद्ध में मारे गए हों। अब महिलाओं की संख्या अधिक हो जाती है। वे बस अपनी ज़िंदगी वैसे ही जी सकती हैं, लेकिन वे बच्चों से वंचित हो जाएंगी। परिवार का स्नेह और पति के सहयोग से भी वंचित होंगी। तो वे इन चीज़ों से वंचित हो जाएंगे। लेकिन इस्लाम चाहता है कि हर कोई एक घर से सहारा मिले और सुरक्षित महसूस करे। और सिर्फ इतना ही नहीं, वैसे भी, अगर आप Old Testament को देखें। Old Testament में, वहाँ लगभग हर एक पैगंबर, जो Old Testament में हैं, वे polygamous थे। चाहे वह मूसा (अलैहिस्सलाम) हों, या इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) जैसी तीन बीवियाँ या दो बीवियाँ, दाऊद (अलैहिस्सलम)। Old Testament में, ईश्वर ने polygamy से मना नहीं किया है। ईश्वर polygamy को सीमित नहीं करता। ईश्वर polygamy की निंदा नहीं करता। तो अगर कोई यहूदी या ईसाई मुझे कहे, polygamy गलत है, इस्लाम ऐसा कैसे कह सकता है?

तो मैं कहूँगा अगर यह गलत है, तो Old Testament में polygamy से मना कहां किया गया है? ईसा मसीह (पैगंबर) के समय में भी polygamy पर कोई प्रतिबंध नहीं था। उन्होंने इसे प्रतिबंधित नहीं किया। वह बस उस culture का पालन कर रहे थे, सही?

जब आप American culture को देखते हैं, शिकागो ट्रिब्यून ने हाल ही में एक survey publish किया है। इस देश का एक सामान्य मर्द, कम से कम सात extra girlfriends रखता है या extramarital affairs या premarital affairs। असल में, जब मैं भारत से तुलना करता हूँ, भारत में मुस्लिम मर्दों को एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है। फिर भी, एक से अधिक पत्नी रखने वाले मुसलमानों की संख्या उन हिंदूओं की तुलना में कम है, जिनकी एक से अधिक पत्नियाँ हैं। तो भले ही इसकी अनुमति है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। क्योंकि यदि कोई मर्द शादी करता है, तो उसे पूरी तरह ज़िम्मेदार होना पड़ता है, वरना क़यामत के दिन उसे इसका इसका जवाब देना होगा।