क्या दज्जाल आ चुका है? | आख़िरी ज़माने की हदीसों की असल हक़ीक़त
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दज्जाल असल में है कौन? क्या महदी आ चुके हैं? याजूज-माजूज? दाब्बतुल-अर्ज़? हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का आसमान से उतरना, और भी बहुत कुछ। नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें आख़िरी ज़माने की बहुत सी घटनाएँ एक-एक करके बताईं। हालांकि इनमें से कुछ हदीसें हमारे दैनिक जीवन की वास्तविकता से दूर लग सकती हैं। मिसाल के तौर पर, इसका क्या मतलब है कि दज्जाल का एक दिन एक साल जैसा होगा और दूसरा दिन एक महीने जैसा? उड़ते बादलों जैसी रफ़्तार से पूरी ज़मीन पर उसका सफ़र? सिर्फ़ चालीस दिनों में हर शहर में उसका दाख़िल हो जाना? उसकी सवारी, जिसके दोनों कानों के बीच चालीस हाथ का फ़ासला होगा?
या उसका आसमान को बरसने का हुक्म देना, और ज़मीन को अपने छुपे ख़ज़ाने निकालने का हुक्म देना, वग़ैरह। इन सबका असल में क्या मतलब हो सकता है? आज के ज़माने में ये बातें नामुमकिन सी लगती हैं। और इसी वजह से, कुछ लोग शक़ में पड़ जाते हैं, और कुछ हदीसों की प्रामाणिकता पर ही सवाल उठाने लगते हैं। पर क्या हो, अगर इसमें कोई प्रतीकात्मक भाषा हो, जिसे हम समझ ही नहीं पा रहे हों? क्या हो, अगर ये बातें एक ख़ूबसूरत रूपकात्मक भाषा में कही गई हों? और इससे भी बड़ी बात, क्या हो, अगर जिन भविष्यवाणियों का हम इंतज़ार कर रहे हैं, उनमें से कुछ पूरी हो चुकी हों? क्या हो, अगर हम आज जिस दौर में जी रहे हैं, वो पहले से ही उनके असर से आकार ले रहा हो, पर हमें अभी तक इसका एहसास ही न हुआ हो?
इस वीडियो में हम मुश्किल सवालों से मुँह नहीं मोड़ेंगे। हमारा मक़सद बस इतना है: हर सवालिया निशान मिटा देना, और ऐसे जवाब देना जो साफ़ भी हों और संतोषप्रद भी। वीडियो के आख़िर में आप देखेंगे, कि ये निशानियाँ आज की हक़ीक़त से किस तरह पूरी-पूरी मेल खाती हैं। और आप देखेंगे कि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किस तरह एक सच्चे मोजिज़े के तौर पर भविष्य की ख़बर दी। हदीसों को एक बिल्कुल नए नज़रिए से देखने के लिए तैयार हो जाइए। आइए, अपना सफ़र इस बुनियादी हदीस से शुरू करते हैं: “आदम की पैदाइश से लेकर क़यामत के दिन तक, दज्जाल के फ़ितने से बड़ा कोई फ़ितना नहीं।” ज़रा सोचिए। अगर कोई आपकी जान ले ले या आपका माल ले ले, तो वो सिर्फ़ आपकी अस्थायी दुनिया का नुक़सान करता है। पर अगर कोई आपका ईमान छीन ले, तो आप हमेशा की ख़ुशी खो देते हैं और हमेशा के लिए आग का सामना करते हैं। इसलिए, मानवता की शुरुआत से अंत तक का सबसे बड़ा फ़ितना सिर्फ़ कुफ़्र का एक विशाल आंदोलन ही हो सकता है। इस पूरे वीडियो में हम दूसरी हदीसों के संकेतों से अपना दायरा छोटा करते जाएँगे। हम जो भी पहलू खोलेंगे, वो एक पहेली के टुकड़े जैसा होगा, जो पूरी तस्वीर बनाने में मदद करेगा, ताकि हम पहचान कर सकें। अब इन दो स्थितियों की तुलना कीजिए और ख़ुद से पूछिए: आपके लिए कौन सी स्थिति ज़्यादा बड़ा ख़तरा है?
पहली स्थिति: एक अलौकिक, काल्पनिक राक्षस अचानक आपके सामने आ खड़ा होता है और कहता है, “मैं दज्जाल हूँ। अब नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इनकार करो।” और जो इनकार नहीं करता, वो बस उसे मार डालता है। दूसरी स्थिति: दज्जाल हमारे जैसा ही एक इंसान है। वो कुफ़्र फैलाने के लिए शक्तिशाली वैचारिक आंदोलनों का नेतृत्व करता है। और वो इस भ्रष्ट व्यवस्था को आकर्षक, आधुनिक और सुंदर बनाकर पेश करता है। वो मीडिया और प्रोपेगैंडा के ज़रिए आम लोगों को गुमराह करता है। ज़ाहिर है, दूसरी स्थिति की वजह से लाखों लोग अपना ईमान गँवा बैठेंगे, और उन्हें भनक तक नहीं लगेगी। जबकि पहली स्थिति में कोई धोखा नहीं खाएगा, क्योंकि वो बहुत खुली हुई बात है। बल्कि शायद, दज्ज़ाल ख़ुद भी अपनी पहचान ना समझ पाए। वो बस एक इंसान होगा, जो अपने इम्तिहान से गुज़र रहा होगा। अगर उसे पता होता कि वो असल में दज्जाल है, तो शायद वो भी इस्लाम क़बूल कर लेता। इसीलिए हमें समझना होगा कि हदीस में आए ये वर्णन असल में प्रतीकात्मक हैं। हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने शब्द इस तरह चुने कि जब वक़्त आए, तो इन घटनाओं को पहचाना जा सके। मिसाल के तौर पर, हदीस के मुताबिक़ दज्जाल ज़मीन पर चालीस दिन रहेगा। और उस दौरान वो मक्का और मदीना के सिवा हर एक शहर में दाख़िल होगा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में दुनिया का सफ़र दिनों का नहीं, बरसों का काम था। लोग ऊँटों और घोड़ों पर सफ़र करते थे, एक रेगिस्तान पार करने में भी हफ़्तों लग जाते थे। हज़ार साल से ज़्यादा तक हदीस की ये बात बिल्कुल अवास्तविक लगती रही। पर जब हम पिछली सदी को देखते हैं, तो सब कुछ बदल जाता है। आधुनिक परिवहन ने दुनिया की तस्वीर ही बदल दी। रेलगाड़ियाँ और रेल की विशाल लाइनें धरती पर फैलने लगीं। हवाई जहाज़ों ने दो दिन से भी कम में पूरी दुनिया का चक्कर लगाना मुमकिन कर दिया। पर इससे भी अहम बात, वैश्विक संचार के बारे में सोचिए। पिछली सदी में, एक ही विचारधारा अख़बारों और रेडियो के ज़रिए बहुत तेज़ी से फैल सकती थी। “सरकार के आदेश से, इबादत के अलावा हर धार्मिक गतिविधि पर पाबंदी है। जो भी धार्मिक संस्था इन नियमों को तोड़ेगी, उसे बंद कर दिया जाएगा।” और आज, कोई वैचारिक आंदोलन कुछ ही सेकंड में दुनिया के हर शहर और हर स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन तक पहुँच सकता है। और ठीक इसी तरह दज्जाल सिर्फ़ चालीस दिनों में अपने विचार और अपनी बुराई फैला सकता है, और पूरी दुनिया पर अपना असर जमा सकता है। इस तकनीक के आने से बहुत पहले, हमारे नबी ने त्वरित संचार के इस दौर की ओर सटीक इशारा कर दिया था। क्या ये एक गहरा मोजिज़ा नहीं?
उन्होंने चौदह सदियों के पार देखा और आज की हक़ीक़त देख ली। अल्लाह ने उन्हें भविष्य के राज़ दिखाए। और इसीलिए दज्जाल की सवारी का वर्णन इतना अहम है। हदीस कहती है कि उसके दोनों कानों के बीच चालीस हाथ का फ़ासला है। पिछली सदी में मानवता ने एक बहुत बड़ा बदलाव देखा, जानवरों की सवारी से लेकर स्टील की विशाल मशीनें बनाने तक। हवाई जहाज़, रेलगाड़ियाँ, कारें, वग़ैरह। नबी अलैहिस्सलाम के सिखाने के अंदाज़ की ख़ूबसूरती देखिए। चूँकि सहाबा उनके पहले और सबसे क़ीमती शागिर्द थे, इसलिए उन्होंने अपनी भाषा पूरी तरह उस सदी की समझ पर आधारित रखी। अगर हम आज की एक कार उस ज़माने में ले जाएँ, तो वो लोग उसे कैसे देखेंगे?
उनके लिए, तेज़ हेडलाइट्स चमकती आँखों जैसी लगेंगी, सामने की जाली एक बड़े मुँह जैसी लगेगी, और साइड के शीशे, या खुले हुए दरवाज़े भी, बिल्कुल दो कानों जैसे लगेंगे। ये सातवीं सदी के किसी देखने वाले की नज़र से देखी गई एक आधुनिक मशीन का बिल्कुल सटीक वर्णन है। जैसा हम जानते हैं, आज के कुछ आधुनिक वाहनों के दोनों किनारों के बीच का फ़ासला आसानी से चालीस हाथ, यानी लगभग बीस मीटर तक पहुँच जाता है। तो हदीस की ये बात कोई ख़ामी नहीं है। ये उस तकनीकी दौर का साफ़ संकेत है, जिसकी ओर हदीस इशारा करती है। जब सहाबा ने पूछा, “ऐ अल्लाह के रसूल, वो ज़मीन पर कितने दिन रहेगा?” तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया, “चालीस दिन। एक दिन एक साल जैसा, एक दिन एक महीने जैसा, एक दिन एक हफ़्ते जैसा, और उसके बाक़ी दिन तुम्हारे दिनों जैसे।” समय का ये कैसा पैमाना है?
तफ़सीर और हदीस के बड़े आलिम बदीउज़्ज़मान इस राज़ को समझने के लिए दो गहरी व्याख्याएँ देते हैं। पहली व्याख्या में वो बुराई की रफ़्तार पर ध्यान दिलाते हैं। शुरुआती दौर में दज्जाल भयानक रफ़्तार से काम करता है। उसका पहला दिन एक ऐसे काले दौर का प्रतीक है, जिसमें बरसों की रूहानी तबाही बस थोड़े समय में हो जाती है। अपने दूसरे दौर में उसकी रफ़्तार कुछ धीमी पड़ती है, पर फिर भी वो ग़ज़ब का काम कर डालता है, जैसे पूरे महीने की बड़ी-बड़ी योजनाएँ एक ही दिन में समेट दी हों। अपने तीसरे दौर में भी वो बहुत ताक़तवर रहता है, और एक दिन में हफ़्ते भर का भारी नुक़सान कर देता है। आख़िरकार ये व्यवस्था धीमी होकर आम दिनों की रफ़्तार पर आ जाती है। लेकिन बदीउज़्ज़मान की दूसरी व्याख्या बताती है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इन गहरे शब्दों में एक बिल्कुल अलग चमत्कार छुपा है। उनके मुताबिक़, इस हदीस में दरअसल भूगोल की एक अद्भुत जानकारी है। ज़रा एक पल के लिए इस पर सोचिए। धरती पर वो कौन सी जगह है जहाँ एक दिन एक साल का होता है?
ऐसा उत्तरी ध्रुव के आस-पास होता है, रूस के साइबेरिया के ठीक ऊपर। वहाँ छह महीने लगातार दिन रहता है, और उसके बाद छह महीने लगातार अँधेरा। पूरा साल एक दिन और एक रात का होता है। और बात यहीं ख़त्म नहीं होती। जैसे-जैसे आप थोड़ा दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, दिन छोटा होता जाता है। उन इलाक़ों में ऐसी जगहें मिलती हैं जहाँ एक दिन और एक रात एक महीने के होते हैं, और उससे आगे एक हफ़्ते के। फिर जैसे-जैसे आप बाक़ी दुनिया की ओर और दक्षिण में जाते हैं, ये विचित्रता ख़त्म हो जाती है। दिन-रात का चक्र आख़िरकार सामान्य हो जाता है। तो इसका मतलब है कि यही इलाक़ा दज्जाल के आंदोलन की जन्मभूमि है। और वहीं से ये बाक़ी दुनिया में फैलेगा। और दिलचस्प बात ये है कि पिछली सदी में यही उत्तरी इलाक़ा कुफ़्र की एक विशाल लहर का केंद्र बन गया। उन्होंने संपूर्ण नास्तिकता फैलाने के लिए सरकार, स्कूलों और मीडिया की पूरी ताक़त लगा दी। पचानवे प्रतिशत से ज़्यादा मस्जिदें और गिरजाघर पूरी तरह तबाह या बंद कर दिए गए। उन्होंने धार्मिक किताबें जला दीं और धार्मिक शिक्षा को पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी बना दिया। हज़ारों धार्मिक विद्वानों को साइबेरिया के बर्फ़ीले कैंपों में निर्वासित किया गया, या उससे भी बुरा मार डाला गया। दशकों तक लाखों बच्चों को भारी प्रोपेगैंडा के बीच पाला गया, जो उन्हें सिखाता था कि धर्म एक झूठ है। उन्होंने 'लीग ऑफ़ मिलिटेंट एथिस्ट्स' (यानी उग्र नास्तिकों का एक संगठन) भी बनाया, एक आधिकारिक समूह जिसे सरकार का पूरा समर्थन हासिल था। इस समूह ने लाखों नागरिकों को आस्था के ख़िलाफ़ सक्रिय सिपाही बना दिया। 'शर्म मुर्दाबाद' नाम का एक आंदोलन शुरू किया गया। लोग सचमुच पूरी तरह नंगे होकर सड़कों पर जुलूस निकालते थे, बदन पर सिर्फ़ एक बैनर होता था, जिस पर लिखा होता था 'शर्म मुर्दाबाद'। एक दौर में तो इस सरकार ने विवाह की पारंपरिक अवधारणा को भी ख़त्म कर दिया था। हर जगह नग्नता वाले क्लब खुल गए, और पारंपरिक स्नानघरों को क़ानूनन मिले-जुले बनाने का आदेश दिया गया, ताकि मर्द और औरतें अंदर एक साथ नंगे रह सकें। वो ऐसा समाज चाहते थे जहाँ कोई इबादत न करे, कोई आख़िरत पर यक़ीन न रखे, और कोई ईश्वरीय क़ानूनों पर न चले। और अंदाज़ा लगाइए क्या हुआ?
ये रूहानी वायरस सीमाओं के पार फैल गया, और आज हम इसी वायरस की गढ़ी हुई दुनिया में जी रहे हैं। बरसों तक धर्म को शिक्षा और विज्ञान से बाहर रखा गया, और एक नई व्यवस्था बनाई गई। और ये व्यवस्था आपको धोखे से ब्रह्मांड को सिर्फ़ भौतिकवादी चश्मे से देखने पर मजबूर कर देती है, भले ही आप धार्मिक हों। दो सदी पहले तक दुनिया में नास्तिक लगभग न के बराबर थे। पर आज लगभग एक अरब तीस करोड़ लोग ख़ुद को नास्तिक बताते हैं, यानी मोटे तौर पर हर छह में से एक इंसान। बेशक, अंतिम सत्य और हर बात का सही मतलब सिर्फ़ अल्लाह जानता है। पर इसके बाद क्या इससे भी ज़्यादा कोई विनाशकारी आंदोलन उठ सकता है?
सच कहें तो, ये बात वाक़ई सोचने पर मजबूर करती है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि दज्जाल को सत्तर हज़ार यहूदियों का साथ हासिल होगा। अभी जिन घटनाओं की हमने बात की, उन पर नज़र डालिए। उस नास्तिक आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व में यहूदी हस्तियाँ प्रमुखता से मौजूद थीं। और ये सिर्फ़ 'एक मिसाल' है। चाहे, खुलकर हो या परदे के पीछे, उन्होंने उन विशिष्ट समूहों में अपनी जगह बनाई जिन्होंने विश्व राजनीति को आकार दिया। और अरबी में ये बात मशहूर है कि चालीस, सत्तर, सत्तर हज़ार, अस्सी या अस्सी हज़ार जैसी गिनतियाँ ठीक-ठीक हिसाब के लिए नहीं होतीं। ये बस बहुत बड़ी तादाद बताने का एक आम तरीक़ा है। दूसरे शब्दों में, हमें ये नहीं मान लेना चाहिए कि ठीक सत्तर हज़ार लोगों की भीड़ खुलेआम नारे लगाकर उनका साथ देगी। ऐसी व्यवस्थाएँ हर इंसान को एक बेहद कठिन फ़ैसला लेने पर मजबूर करती हैं। रसूल अलैहिस्सलाम ने हमें ख़बरदार किया: “उसके, यानी दज्जाल के साथ एक जन्नत और एक जहन्नम होगी। पर उसकी जहन्नम जन्नत है, और उसकी जन्नत जहन्नम।” इसका असल मतलब क्या है?
जवाब साफ़ है। दज्जाल एक ऐसी व्यवस्था बनाता है जिसमें आपका रोज़ का गुज़ारा उसके प्रति आपकी वफ़ादारी पर टिका होता है। अगर आप उसकी भौतिकवादी लहर में शामिल हो जाएँ और उसकी अस्थाविहीन व्यवस्था का साथ दें, तो वो आपके लिए अपनी जन्नत के दरवाज़े खोल देता है। आपको आराम, दौलत और ऊँचे रुतबे का इनाम मिलता है। लेकिन अगर आप अल्लाह का पक्ष चुनते हैं, तो दज्जाल की जहन्नम खुली बाहों से आपका स्वागत करती है, और आपको कठोर श्रम शिविरों, जेल की कोठरियों और मौत की सज़ा तक पहुँचा देती है। पर हक़ीक़त में, दज्जाल की जन्नत असली जहन्नम का रास्ता है। जबकि वो दुनियावी जहन्नम, जो वो ईमान वालों पर थोपता है, वही असली, हमेशा की जन्नत के दरवाज़े खोलती है। एक और हदीस में हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “क़यामत की निशानियों में से ये है कि मर्दों की संख्या कम हो जाएगी और औरतें इतनी बढ़ जाएँगी कि पचास औरतों की देखभाल के लिए एक ही मर्द होगा।” और अगर आप वास्तविकता पर नज़र डालें, तो पिछली सदी में हमने ठीक यही देखा। विश्व युद्धों में भयानक तादाद में इंसानी जानें गईं। और मरने वालों में ज़्यादातर मर्द थे। जो मर्द बचे, उनमें से बहुत से या तो बच्चे थे, या बूढ़े, या ज़ख़्मी सैनिक। युद्ध की मार झेलने वाले देशों में, औरतों की देखभाल कर सकने वाले वयस्क और स्वस्थ मर्द बहुत कम रह गए। और एक बार फिर, इतिहास ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शब्दों को सच साबित कर दिया। और हाँ, जैसा हमने पहले देखा, हदीस में पचास की गिनती भी ठीक-ठीक हिसाब नहीं है। ये बड़ी तादाद बताने का एक आम तरीक़ा है। तो चलिए, इन हदीसों से एक और संकेत बताते हैं। और इस बार, आप अंदाज़ा लगाइए कि ये असल में किस चीज़ की ओर इशारा है। फिर वो, यानी दज्जाल, “आसमान को बरसने का हुक्म देगा, और वो बरसेगा। वो वीराने से गुज़रेगा और कहेगा, 'अपने ख़ज़ाने निकाल,' फिर चल देगा, और उसके ख़ज़ाने शहद की मक्खियों के झुंड की तरह उसके पीछे-पीछे चलेंगे।” अब आज की दुनिया पर नज़र डालिए। इसका क्या मतलब हो सकता है?
लगभग 1940 के दशक में, इंसान ने क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम वर्षा की तकनीक खोज ली। इतिहास में पहली बार, वैज्ञानिकों ने सीखा कि बादलों को कृत्रिम तरीक़े से कैसे सक्रिय किया जाए और सचमुच मनचाही बारिश कैसे कराई जाए। ये आसमान को बरसने का हुक्म देने जैसा ही है। और ये सचमुच काम कर गया। और ठीक उन्हीं बरसों में, खनन के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी क्रांति आई। आधुनिक तकनीक से, खरबों डॉलर का तेल, गैस और क़ीमती धातुएँ मनचाहे ढंग से ज़मीन से निकलने लगीं। क्या आपने एक बात पर ध्यान दिया?
जब भी कोई इन हदीसों पर हमला करने की कोशिश करता है, इनके पीछे छुपे चमत्कार और भी ज़्यादा चमक उठते हैं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए ये बातें ख़ुद से जान लेना मुमकिन ही नहीं था। बेशक ये सब अल्लाह ने ही उन पर ज़ाहिर की थीं। इससे एक बड़ा सवाल सामने आता है। ये सारा रहस्य क्यों? क्या बेहतर न होता कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमें ठीक-ठीक नाम और तारीख़ें बता देते, ताकि हर कोई आसानी से समझ जाए? चलिए, जवाब में आपसे ही एक सवाल पूछते हैं। इन हदीसों का असल मक़सद क्या था? हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें ख़बरदार क्यों किया?
उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि उनकी उम्मत सतर्क रहे। पर नबी अलैहिस्सलाम सिर्फ़ किसी एक सदी के मार्गदर्शक नहीं थे। वो क़यामत के दिन तक हर इंसान के मार्गदर्शक थे। वो चाहते थे कि हर सदी में महदी और दज्जाल की मौजूदगी का एहसास बना रहे। अगर वो दज्जाल और महदी की ठीक-ठीक पहचान बता देते, और कोई ख़ास समय और तारीख़ दे देते, तो सिर्फ़ एक पीढ़ी को इसकी फ़िक्र होती। और बाक़ी सारी सदियाँ बेफ़िक्र हो जातीं। वो चाहते थे कि पूरी उम्मत सतर्क, जागरूक और चौकस रहे। उन्होंने एक शानदार तरीक़ा चुना, ताकि हर एक पीढ़ी हदीस के सामने अपने दौर को रखकर देखे और कहे, “कहीं ये वही वक़्त तो नहीं?” दज्जाल से सामना होने की संभावना हमें सावधान रखती है। और महदी की उम्मीद हमारा हौसला बनाए रखती है। डर और उम्मीद के बीच का यही ख़ूबसूरत संतुलन इन हदीसों की प्रतीकात्मक भाषा के पीछे का असली राज़ है। इसी से ये भी समझ आता है कि दज्जाल कहाँ से निकलेगा, इसके वर्णन में अलग-अलग रिवायतें अलग-अलग जगहों की ओर इशारा क्यों करती हैं। एक रिवायत ख़ुरासान की ओर इशारा करती है, दूसरी इराक़ और शाम के बीच के एक इलाक़े की ओर, और एक और इस्फ़हान के यहूदियों की ओर। क्यों?
क्योंकि जैसा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “…क़यामत आने से पहले, लगभग तीस दज्जाल होंगे।” बुराई का कोई एक ही सरग़ना नहीं है। ऐसे बहुत से हैं। इसका मतलब है कि दज्जाल की सारी निशानियों को एक ही इंसान में जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं। क्योंकि जब एक हदीस एक दज्जाल की ख़ूबियाँ बता रही होती है, तो दूसरी रिवायत किसी बिल्कुल दूसरे दज्जाल की बात कर रही होती है। और फिर, जब आप पिछली सदी पर नज़र डालते हैं, तो आपको एहसास होता है कि हमने जिस धर्म-विरोधी व्यवस्था का ज़िक्र किया, उसने बिल्कुल एक विशाल ऑक्टोपस की तरह काम किया। उसका सिर और दिमाग़ रूस में था, पर उसकी भुजाएँ पड़ोसी मुस्लिम देशों तक फैली थीं। कई देश, जैसे उज़्बेकिस्तान, क़ज़ाख़िस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और अज़रबैजान, भारी ज़ुल्म के शिकार हुए। उनकी मस्जिदें ज़बरदस्ती बंद कर दी गईं। इस्लामी लिबास पर पाबंदियाँ लगीं, इस्लामी आलिमों को सुनियोजित तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया, निर्वासित किया गया या मार दिया गया। आबादी का ज़्यादातर हिस्सा मुसलमान होने के बावजूद, अज़ान पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई, और लोगों को अपना दीन छुपकर सीखना पड़ा। अब एक पल के लिए, अब तक जितने संकेतों की हमने बात की, उन सबको अपने ज़ेहन में फिर से दोहराइए। दुनियावी जन्नत और जहन्नम का भ्रम, आस्था पर हमला, थोड़े समय में बरसों की रूहानी तबाही, वग़ैरह। अब ज़रा सोचिए। एक इंसान लाखों लोगों के दिमाग़ में ज़हर भर देता है। नई पीढ़ियाँ बड़ी होती हैं, और उन्हें विज्ञान के पाठ भी नास्तिक प्रोपेगैंडा के रूप में पढ़ाए जाते हैं। ऐसी दुनिया में, क्या सिर्फ़ एक आदमी को ख़त्म करके आप सब कुछ ठीक कर सकते हैं?
मुझे नहीं लगता। जो चीज़ ख़ुद दज्जाल से कहीं ज़्यादा अहम है, वो है दज्जालियत, यानी वो विचारधाराएँ जो वो पीछे छोड़ जाता है। दज्जाल नाम का वो इंसान तो किसी मामूली वायरस या आम बीमारी से भी आसानी से मर सकता है। पर पूरी दुनिया में फैली एक विचारधारा को मिटाने, और लाखों लोगों को सच क़बूल करने के लिए राज़ी करने का क्या?
ऐसे ही बड़े काम के लिए किसी महान नबी का दोबारा आना उचित हो जाता है। तो जब हदीसें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हाथों दज्जाल के ख़ात्मे की बात करती हैं, तो हम इसे दो लोगों की एक सीधी-सादी लड़ाई नहीं समझ सकते। बल्कि ये दो बड़ी विचारधाराओं का टकराव है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ईमान वालों के अपने गठबंधन के साथ क़ुरआन की हीरे जैसी तलवार उठाएँगे, और दज्जालियत की पूरी विचारधारा को काट डालेंगे। इंशाअल्लाह, वो उस विचारधारा को इस तरह दफ़न करेंगे कि वो फिर कभी साँस नहीं ले पाएगी। इस तर्क से, हदीस के शब्दों के सच होने के लिए ज़रूरी नहीं कि दज्जाल और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक ही दौर में हों। अब आप सोच रहे होंगे, भाई, क्या आख़िरी ज़माने की हदीसों में कुछ भी शाब्दिक अर्थ में नहीं है?
बेशक है। मिसाल के तौर पर, सूरज का पश्चिम से निकलने को लीजिए। ये ठीक वैसे ही होगा जैसे आप समझते हैं। और चूँकि ये पूरी तरह शाब्दिक अर्थ में है, इसलिए जिस पल ये होगा, तौबा के दरवाज़े बंद हो जाएँगे। ईमान लाने या न लाने का इम्तिहान अपनी मर्ज़ी से चुनने पर टिका है। पर इस घटना को अनदेखा करना इतना नामुमकिन होगा कि अपनी मर्ज़ी से चुनने की अवधारणा ही ख़त्म हो जाएगी। ये ऐसा है जैसे आसमान में सितारों से लंबे समय तक “ला इलाहा इल्लल्लाह” लिखा हो, ताकि पूरी दुनिया देख सके। उस पल मानना आपकी मर्ज़ी नहीं रहेगा, बल्कि आप देखने के लिए बाध्य होंगे। जैसे फ़िरऔन ने बिल्कुल आख़िरी पल में, समंदर में डूबते हुए, ईमान लाने की कोशिश की, वैसे ही उस पल में ईमान लाना बिल्कुल बेकार होगा। दज्जाल के माथे पर लिखा “काफ़िर” शब्द, जिसे हर कोई पढ़ सकेगा, चाहे वो अनपढ़ ही क्यों न हो...
याजूज-माजूज...
दाब्बतुल-अर्ज़ का निकलना, और किस तरह वो हर इंसान के असली ईमान को उजागर कर देगा। इन और ऐसी बहुत सी दिलचस्प हदीसों के तर्कसंगत जवाब रिसाले-नूर में समझाए गए हैं। अगर आप असल स्रोत में और गहराई से उतरना चाहते हैं, और ज़्यादा जानना चाहते हैं, तो हमारा 'माई रिसाले' ऐप डाउनलोड कर सकते हैं। ये बिल्कुल मुफ़्त है और इसमें कोई विज्ञापन नहीं है। हम वहाँ आपका इंतज़ार करेंगे। आज हम देखते हैं कि इन हदीसों को लेकर लोग दो बिल्कुल उलटे छोरों पर जा पहुँचते हैं। एक तरफ़ के लोग इन पर शक़ करते हैं और कहते हैं कि इसका कोई मतलब नहीं बनता। आख़िर में वो इन रिवायतों को ही ठुकरा देते हैं। और कुछ लोग, जिनका अहंकार उनके ईमान से कहीं ज़्यादा मज़बूत है, हदीसों के पूरे संग्रह का ही इनकार कर देते हैं। और दूसरी तरफ़ के लोग इन हदीसों को पूरी तरह शाब्दिक अर्थ में लेते हैं। ऐसा करके वो अपने सुनने वालों को और उलझा देते हैं। और ज़ाहिर है, इस्लाम के दुश्मन इसी वजह से इन ख़ास रिवायतों को उछालना पसंद करते हैं। पर सच ये है कि हमारे नबी अलैहिस्सलम की हदीसों में से दो प्रतिशत से भी कम इतनी मुश्किल हैं। बाक़ी सब साफ़ हैं, और ज़िंदगी के हर पहलू के लिए ठोस मार्गदर्शन और गहरी सीख देती हैं। और पता है असल में हैरान करने वाली बात क्या है?
पूरे मानव इतिहास में, किसी और इंसान ने ज़िंदगी के हर एक क्षेत्र में ऐसे सबक़ नहीं दिए, जैसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दिए। आम तौर पर, जब कोई इतिहास में प्रसिद्ध होता है, तो वो अक्सर सिर्फ़ एक ही क्षेत्र में होता है, जैसे क़ानून। पर दूसरे क्षेत्रों में उनके पास कोई ख़ास समझ नहीं होती। उनके पास देने को ज़्यादा कुछ नहीं होता। फिर भी, जब हम हदीस की किताबें देखते हैं, तो पाते हैं कि उन्होंने कितने सारे क्षेत्रों में सबक़ दिए। मिसाल के तौर पर, क़ानून, व्यापार, अर्थव्यवस्था, पारिवारिक जीवन, बच्चों की परवरिश, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से संबंध, सफ़ाई और स्वच्छता, सेहत, नैतिकता, रूहानी तरक़्क़ी, और नफ़्स का अनुशासन। यहाँ तक कि जानवरों से प्यार भी इसमें शामिल है। और अगर आप हदीस की किताबों में देखें, तो इनसे कहीं ज़्यादा विषय मिलेंगे। तो सिर्फ़ इसलिए कि हम किसी चीज़ की गहराई पूरी तरह नहीं समझ पाते, उसे काटकर अलग कर देना और ठुकरा देना, किसी समझदार इंसान का रवैया नहीं हो सकता। ख़ासकर जब आप देखें कि ये हदीसें सदियों तक कितनी सावधानी और भरोसे के साथ सुरक्षित रखी गईं। दरअसल, ये जाँच की ऐसी कई-स्तरीय प्रक्रिया से गुज़रीं, जिसकी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। कोई हदीस तब तक सहीह नहीं मानी जाती, जब तक वो इन सख़्त कसौटियों पर खरी न उतरे। एक: रावियों का जुड़ा हुआ सिलसिला। हमें सिलसिले के हर एक रावी को एक-एक करके जानना ज़रूरी है, कि ठीक-ठीक किसने किससे रिवायत की, और ये सिलसिला सीधा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक पहुँचे। दो: रावियों की ईमानदारी, अदालह!
सिलसिले का हर इंसान अपनी पूरी ईमानदारी, गहरे तक़वा और मज़बूत ईमान के लिए जाना जाता हो, और उसका झूठ बोलने या किसी बुरे बर्ताव का कोई रिकॉर्ड न हो। तीन: पक्की याददाश्त। उनकी याददाश्त पक्की हो, या उनके पास ऐसे पक्के लिखित रिकॉर्ड हों, ताकि वो शब्द भूलें नहीं या गड्डमड्ड न करें। चार: कोई विरोधाभास नहीं, जिसे शाज़ कहते है। रिवायत ज़्यादा भरोसेमंद या ज़्यादा मशहूर रावियों द्वारा बयान की हुई बात के ख़िलाफ़ नहीं जा सकती। पाँच: कोई छुपी ख़ामी नहीं, जिसे 'इल्लत' कहते हैं। मतन और सिलसिला, दोनों ऐसी किसी भी छुपी ख़ामी से पूरी तरह पाक हों, जिसे सिर्फ़ हदीस के इल्म के गहरे जानकार ही पकड़ सकते हैं। इतिहास में बीस हज़ार से ज़्यादा हदीस के रावी मिलते हैं। और विशाल रिकॉर्ड उनकी जीवनियों, उनके चरित्र और उनकी याददाश्त की ताक़त का ब्योरा रखते हैं। हर एक छोटी से छोटी बात दर्ज है, सिर्फ़ उनकी बातों की सच्चाई परखने के लिए। इतिहास ने सचमुच ऐसा कुछ कभी नहीं देखा। आख़िर में, हर एक झूठी रिवायत छानकर पूरी तरह अलग कर दी गई। इसे यूँ समझिए। अगर बाइबल, जिसे दो अरब ईसाई मानते हैं, हदीस के इल्म के सख़्त नियमों पर परखी जाए, तो वो पास होने लायक़ अंक भी न ला पाए। ये व्यवस्था पहले दिन से ही बेहद मज़बूत बनाई गई थी। सैकड़ों लोगों के हदीस याद करने के अलावा, बावन सहाबा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी में ही उन्हें बाक़ायदा लिख रहे थे। एक मशहूर मिसाल 'सहीफ़ा सादिक़ा' है, लगभग एक हज़ार हदीसों का संग्रह, जिसे सीधे सहाबी अब्दुल्लाह बिन अम्र ने लिखा था। हिजरी कैलेंडर के साल पचास से एक सौ पचास के बीच, लगभग चार सौ अलग-अलग विशेषज्ञों ने इन्हें बचाने और दर्ज करने पर ध्यान दिया। पर इन सबसे बढ़कर, हमारा सबसे बड़ा सबूत सहाबा का चरित्र है। हम ये शब्द उन लोगों से पा रहे हैं जिन्होंने अपनी ज़िंदगियाँ अल्लाह के लिए वक़्फ़ कर दीं और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर दिया। वही इस पूरी व्यवस्था की बुनियाद हैं। उनके पास झूठ बोलने की ज़रा भी वजह नहीं थी। बल्कि, वो इस मशहूर हदीस के भारी बोझ तले जीते थे: “जिस किसी ने जान-बूझकर मुझ पर झूठ बाँधा, वो अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।” इतनी डरावनी चेतावनी के साथ, वो हर एक शब्द में बेहद सावधान रहते थे। पर यहाँ हमें एक बहुत अहम बात स्पष्ट करनी होगी। जब हम किसी हदीस को ज़ईफ़ कहते हैं, तो वो सिर्फ़ सहीह हदीस के पूर्ण मानकों के मुक़ाबले ज़ईफ़ होती है। दरअसल, वो छापेख़ाने के आविष्कार से पहले लिखे गए लगभग किसी भी दस्तावेज़ से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद है। उसका ऐतिहासिक महत्व आज भी बहुत बड़ा है। मिसाल के तौर पर, इस्तांबुल वाली मशहूर हदीस लीजिए: “तुम क़ुस्तुंतुनिया ज़रूर फ़तह करोगे। उसका अमीर क्या ही बेहतरीन अमीर होगा, और वो लश्कर क्या ही बेहतरीन लश्कर होगा।” तकनीकी तौर पर इस पर ज़ईफ़ का ठप्पा है, फिर भी इतिहास ने ये फ़तह देखी। और ज़ईफ़ के ठप्पे से उसकी ऐतिहासिक ताक़त नहीं बदली। तो जब तक आप इस्लाम के बुनियादी अक़ीदों पर बात नहीं कर रहे, या सख़्त शरई क़ानून नहीं बना रहे, तब तक ज़ईफ़ हदीस को कमतर समझने की कोई वजह नहीं। अब जब हम हदीस के इनकार के इस पूरे चलन को देखते हैं, तो हमें एक बहुत सीधा सवाल पूछना होगा। अगर आप हदीस का इनकार करते हैं, तो आपको असल में क्या हासिल होता है?
कुछ नहीं। पर अगर जिन हदीसों को आप ठुकराते हैं, वो सच्ची हैं, तो इसकी ज़िम्मेदारी बहुत भयानक है। इससे भी बढ़कर, आख़िरत के बारे में सोचिए। क्या आपको नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सामना करते हुए गहरी शर्मिंदगी नहीं होगी? आप क्या कहेंगे? “अम्म, पता है क्या? हाँ, आपने हमारे लिए अपनी पूरी ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी। आप पर पत्थर बरसाए गए, आपका अपमान किया गया, आप पर झूठे इल्ज़ाम लगाए गए। आपने अनगिनत बार मौत का सामना किया और सबसे सख़्त हालात झेले। पर सच कहूँ तो, आपकी बातें मेरे लिए कुछ ख़ास अहम नहीं थीं।” क्या आप सचमुच ऐसा कह सकते हैं? और आप सैकड़ों सहाबा को झूठा कैसे कह सकते हैं?
हम अपने दावों का वज़न समझे बिना यूँ ही बात नहीं कर सकते। और आख़िर में, अंतिम बात ख़ुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर छोड़ते हैं: “मैं तुममें से किसी को ऐसा न पाऊँ कि वो अपने तख़्त पर टेक लगाए बैठा हो, और उसके पास मेरा कोई हुक्म या मेरी कोई मनाही पहुँचे, तो वो कहे, 'मैं नहीं जानता। हम तो जो अल्लाह की किताब में पाते हैं, उसी की पैरवी करते हैं।'”
या उसका आसमान को बरसने का हुक्म देना, और ज़मीन को अपने छुपे ख़ज़ाने निकालने का हुक्म देना, वग़ैरह। इन सबका असल में क्या मतलब हो सकता है? आज के ज़माने में ये बातें नामुमकिन सी लगती हैं। और इसी वजह से, कुछ लोग शक़ में पड़ जाते हैं, और कुछ हदीसों की प्रामाणिकता पर ही सवाल उठाने लगते हैं। पर क्या हो, अगर इसमें कोई प्रतीकात्मक भाषा हो, जिसे हम समझ ही नहीं पा रहे हों? क्या हो, अगर ये बातें एक ख़ूबसूरत रूपकात्मक भाषा में कही गई हों? और इससे भी बड़ी बात, क्या हो, अगर जिन भविष्यवाणियों का हम इंतज़ार कर रहे हैं, उनमें से कुछ पूरी हो चुकी हों? क्या हो, अगर हम आज जिस दौर में जी रहे हैं, वो पहले से ही उनके असर से आकार ले रहा हो, पर हमें अभी तक इसका एहसास ही न हुआ हो?
इस वीडियो में हम मुश्किल सवालों से मुँह नहीं मोड़ेंगे। हमारा मक़सद बस इतना है: हर सवालिया निशान मिटा देना, और ऐसे जवाब देना जो साफ़ भी हों और संतोषप्रद भी। वीडियो के आख़िर में आप देखेंगे, कि ये निशानियाँ आज की हक़ीक़त से किस तरह पूरी-पूरी मेल खाती हैं। और आप देखेंगे कि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किस तरह एक सच्चे मोजिज़े के तौर पर भविष्य की ख़बर दी। हदीसों को एक बिल्कुल नए नज़रिए से देखने के लिए तैयार हो जाइए। आइए, अपना सफ़र इस बुनियादी हदीस से शुरू करते हैं: “आदम की पैदाइश से लेकर क़यामत के दिन तक, दज्जाल के फ़ितने से बड़ा कोई फ़ितना नहीं।” ज़रा सोचिए। अगर कोई आपकी जान ले ले या आपका माल ले ले, तो वो सिर्फ़ आपकी अस्थायी दुनिया का नुक़सान करता है। पर अगर कोई आपका ईमान छीन ले, तो आप हमेशा की ख़ुशी खो देते हैं और हमेशा के लिए आग का सामना करते हैं। इसलिए, मानवता की शुरुआत से अंत तक का सबसे बड़ा फ़ितना सिर्फ़ कुफ़्र का एक विशाल आंदोलन ही हो सकता है। इस पूरे वीडियो में हम दूसरी हदीसों के संकेतों से अपना दायरा छोटा करते जाएँगे। हम जो भी पहलू खोलेंगे, वो एक पहेली के टुकड़े जैसा होगा, जो पूरी तस्वीर बनाने में मदद करेगा, ताकि हम पहचान कर सकें। अब इन दो स्थितियों की तुलना कीजिए और ख़ुद से पूछिए: आपके लिए कौन सी स्थिति ज़्यादा बड़ा ख़तरा है?
पहली स्थिति: एक अलौकिक, काल्पनिक राक्षस अचानक आपके सामने आ खड़ा होता है और कहता है, “मैं दज्जाल हूँ। अब नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इनकार करो।” और जो इनकार नहीं करता, वो बस उसे मार डालता है। दूसरी स्थिति: दज्जाल हमारे जैसा ही एक इंसान है। वो कुफ़्र फैलाने के लिए शक्तिशाली वैचारिक आंदोलनों का नेतृत्व करता है। और वो इस भ्रष्ट व्यवस्था को आकर्षक, आधुनिक और सुंदर बनाकर पेश करता है। वो मीडिया और प्रोपेगैंडा के ज़रिए आम लोगों को गुमराह करता है। ज़ाहिर है, दूसरी स्थिति की वजह से लाखों लोग अपना ईमान गँवा बैठेंगे, और उन्हें भनक तक नहीं लगेगी। जबकि पहली स्थिति में कोई धोखा नहीं खाएगा, क्योंकि वो बहुत खुली हुई बात है। बल्कि शायद, दज्ज़ाल ख़ुद भी अपनी पहचान ना समझ पाए। वो बस एक इंसान होगा, जो अपने इम्तिहान से गुज़र रहा होगा। अगर उसे पता होता कि वो असल में दज्जाल है, तो शायद वो भी इस्लाम क़बूल कर लेता। इसीलिए हमें समझना होगा कि हदीस में आए ये वर्णन असल में प्रतीकात्मक हैं। हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने शब्द इस तरह चुने कि जब वक़्त आए, तो इन घटनाओं को पहचाना जा सके। मिसाल के तौर पर, हदीस के मुताबिक़ दज्जाल ज़मीन पर चालीस दिन रहेगा। और उस दौरान वो मक्का और मदीना के सिवा हर एक शहर में दाख़िल होगा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में दुनिया का सफ़र दिनों का नहीं, बरसों का काम था। लोग ऊँटों और घोड़ों पर सफ़र करते थे, एक रेगिस्तान पार करने में भी हफ़्तों लग जाते थे। हज़ार साल से ज़्यादा तक हदीस की ये बात बिल्कुल अवास्तविक लगती रही। पर जब हम पिछली सदी को देखते हैं, तो सब कुछ बदल जाता है। आधुनिक परिवहन ने दुनिया की तस्वीर ही बदल दी। रेलगाड़ियाँ और रेल की विशाल लाइनें धरती पर फैलने लगीं। हवाई जहाज़ों ने दो दिन से भी कम में पूरी दुनिया का चक्कर लगाना मुमकिन कर दिया। पर इससे भी अहम बात, वैश्विक संचार के बारे में सोचिए। पिछली सदी में, एक ही विचारधारा अख़बारों और रेडियो के ज़रिए बहुत तेज़ी से फैल सकती थी। “सरकार के आदेश से, इबादत के अलावा हर धार्मिक गतिविधि पर पाबंदी है। जो भी धार्मिक संस्था इन नियमों को तोड़ेगी, उसे बंद कर दिया जाएगा।” और आज, कोई वैचारिक आंदोलन कुछ ही सेकंड में दुनिया के हर शहर और हर स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन तक पहुँच सकता है। और ठीक इसी तरह दज्जाल सिर्फ़ चालीस दिनों में अपने विचार और अपनी बुराई फैला सकता है, और पूरी दुनिया पर अपना असर जमा सकता है। इस तकनीक के आने से बहुत पहले, हमारे नबी ने त्वरित संचार के इस दौर की ओर सटीक इशारा कर दिया था। क्या ये एक गहरा मोजिज़ा नहीं?
उन्होंने चौदह सदियों के पार देखा और आज की हक़ीक़त देख ली। अल्लाह ने उन्हें भविष्य के राज़ दिखाए। और इसीलिए दज्जाल की सवारी का वर्णन इतना अहम है। हदीस कहती है कि उसके दोनों कानों के बीच चालीस हाथ का फ़ासला है। पिछली सदी में मानवता ने एक बहुत बड़ा बदलाव देखा, जानवरों की सवारी से लेकर स्टील की विशाल मशीनें बनाने तक। हवाई जहाज़, रेलगाड़ियाँ, कारें, वग़ैरह। नबी अलैहिस्सलाम के सिखाने के अंदाज़ की ख़ूबसूरती देखिए। चूँकि सहाबा उनके पहले और सबसे क़ीमती शागिर्द थे, इसलिए उन्होंने अपनी भाषा पूरी तरह उस सदी की समझ पर आधारित रखी। अगर हम आज की एक कार उस ज़माने में ले जाएँ, तो वो लोग उसे कैसे देखेंगे?
उनके लिए, तेज़ हेडलाइट्स चमकती आँखों जैसी लगेंगी, सामने की जाली एक बड़े मुँह जैसी लगेगी, और साइड के शीशे, या खुले हुए दरवाज़े भी, बिल्कुल दो कानों जैसे लगेंगे। ये सातवीं सदी के किसी देखने वाले की नज़र से देखी गई एक आधुनिक मशीन का बिल्कुल सटीक वर्णन है। जैसा हम जानते हैं, आज के कुछ आधुनिक वाहनों के दोनों किनारों के बीच का फ़ासला आसानी से चालीस हाथ, यानी लगभग बीस मीटर तक पहुँच जाता है। तो हदीस की ये बात कोई ख़ामी नहीं है। ये उस तकनीकी दौर का साफ़ संकेत है, जिसकी ओर हदीस इशारा करती है। जब सहाबा ने पूछा, “ऐ अल्लाह के रसूल, वो ज़मीन पर कितने दिन रहेगा?” तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया, “चालीस दिन। एक दिन एक साल जैसा, एक दिन एक महीने जैसा, एक दिन एक हफ़्ते जैसा, और उसके बाक़ी दिन तुम्हारे दिनों जैसे।” समय का ये कैसा पैमाना है?
तफ़सीर और हदीस के बड़े आलिम बदीउज़्ज़मान इस राज़ को समझने के लिए दो गहरी व्याख्याएँ देते हैं। पहली व्याख्या में वो बुराई की रफ़्तार पर ध्यान दिलाते हैं। शुरुआती दौर में दज्जाल भयानक रफ़्तार से काम करता है। उसका पहला दिन एक ऐसे काले दौर का प्रतीक है, जिसमें बरसों की रूहानी तबाही बस थोड़े समय में हो जाती है। अपने दूसरे दौर में उसकी रफ़्तार कुछ धीमी पड़ती है, पर फिर भी वो ग़ज़ब का काम कर डालता है, जैसे पूरे महीने की बड़ी-बड़ी योजनाएँ एक ही दिन में समेट दी हों। अपने तीसरे दौर में भी वो बहुत ताक़तवर रहता है, और एक दिन में हफ़्ते भर का भारी नुक़सान कर देता है। आख़िरकार ये व्यवस्था धीमी होकर आम दिनों की रफ़्तार पर आ जाती है। लेकिन बदीउज़्ज़मान की दूसरी व्याख्या बताती है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इन गहरे शब्दों में एक बिल्कुल अलग चमत्कार छुपा है। उनके मुताबिक़, इस हदीस में दरअसल भूगोल की एक अद्भुत जानकारी है। ज़रा एक पल के लिए इस पर सोचिए। धरती पर वो कौन सी जगह है जहाँ एक दिन एक साल का होता है?
ऐसा उत्तरी ध्रुव के आस-पास होता है, रूस के साइबेरिया के ठीक ऊपर। वहाँ छह महीने लगातार दिन रहता है, और उसके बाद छह महीने लगातार अँधेरा। पूरा साल एक दिन और एक रात का होता है। और बात यहीं ख़त्म नहीं होती। जैसे-जैसे आप थोड़ा दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, दिन छोटा होता जाता है। उन इलाक़ों में ऐसी जगहें मिलती हैं जहाँ एक दिन और एक रात एक महीने के होते हैं, और उससे आगे एक हफ़्ते के। फिर जैसे-जैसे आप बाक़ी दुनिया की ओर और दक्षिण में जाते हैं, ये विचित्रता ख़त्म हो जाती है। दिन-रात का चक्र आख़िरकार सामान्य हो जाता है। तो इसका मतलब है कि यही इलाक़ा दज्जाल के आंदोलन की जन्मभूमि है। और वहीं से ये बाक़ी दुनिया में फैलेगा। और दिलचस्प बात ये है कि पिछली सदी में यही उत्तरी इलाक़ा कुफ़्र की एक विशाल लहर का केंद्र बन गया। उन्होंने संपूर्ण नास्तिकता फैलाने के लिए सरकार, स्कूलों और मीडिया की पूरी ताक़त लगा दी। पचानवे प्रतिशत से ज़्यादा मस्जिदें और गिरजाघर पूरी तरह तबाह या बंद कर दिए गए। उन्होंने धार्मिक किताबें जला दीं और धार्मिक शिक्षा को पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी बना दिया। हज़ारों धार्मिक विद्वानों को साइबेरिया के बर्फ़ीले कैंपों में निर्वासित किया गया, या उससे भी बुरा मार डाला गया। दशकों तक लाखों बच्चों को भारी प्रोपेगैंडा के बीच पाला गया, जो उन्हें सिखाता था कि धर्म एक झूठ है। उन्होंने 'लीग ऑफ़ मिलिटेंट एथिस्ट्स' (यानी उग्र नास्तिकों का एक संगठन) भी बनाया, एक आधिकारिक समूह जिसे सरकार का पूरा समर्थन हासिल था। इस समूह ने लाखों नागरिकों को आस्था के ख़िलाफ़ सक्रिय सिपाही बना दिया। 'शर्म मुर्दाबाद' नाम का एक आंदोलन शुरू किया गया। लोग सचमुच पूरी तरह नंगे होकर सड़कों पर जुलूस निकालते थे, बदन पर सिर्फ़ एक बैनर होता था, जिस पर लिखा होता था 'शर्म मुर्दाबाद'। एक दौर में तो इस सरकार ने विवाह की पारंपरिक अवधारणा को भी ख़त्म कर दिया था। हर जगह नग्नता वाले क्लब खुल गए, और पारंपरिक स्नानघरों को क़ानूनन मिले-जुले बनाने का आदेश दिया गया, ताकि मर्द और औरतें अंदर एक साथ नंगे रह सकें। वो ऐसा समाज चाहते थे जहाँ कोई इबादत न करे, कोई आख़िरत पर यक़ीन न रखे, और कोई ईश्वरीय क़ानूनों पर न चले। और अंदाज़ा लगाइए क्या हुआ?
ये रूहानी वायरस सीमाओं के पार फैल गया, और आज हम इसी वायरस की गढ़ी हुई दुनिया में जी रहे हैं। बरसों तक धर्म को शिक्षा और विज्ञान से बाहर रखा गया, और एक नई व्यवस्था बनाई गई। और ये व्यवस्था आपको धोखे से ब्रह्मांड को सिर्फ़ भौतिकवादी चश्मे से देखने पर मजबूर कर देती है, भले ही आप धार्मिक हों। दो सदी पहले तक दुनिया में नास्तिक लगभग न के बराबर थे। पर आज लगभग एक अरब तीस करोड़ लोग ख़ुद को नास्तिक बताते हैं, यानी मोटे तौर पर हर छह में से एक इंसान। बेशक, अंतिम सत्य और हर बात का सही मतलब सिर्फ़ अल्लाह जानता है। पर इसके बाद क्या इससे भी ज़्यादा कोई विनाशकारी आंदोलन उठ सकता है?
सच कहें तो, ये बात वाक़ई सोचने पर मजबूर करती है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि दज्जाल को सत्तर हज़ार यहूदियों का साथ हासिल होगा। अभी जिन घटनाओं की हमने बात की, उन पर नज़र डालिए। उस नास्तिक आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व में यहूदी हस्तियाँ प्रमुखता से मौजूद थीं। और ये सिर्फ़ 'एक मिसाल' है। चाहे, खुलकर हो या परदे के पीछे, उन्होंने उन विशिष्ट समूहों में अपनी जगह बनाई जिन्होंने विश्व राजनीति को आकार दिया। और अरबी में ये बात मशहूर है कि चालीस, सत्तर, सत्तर हज़ार, अस्सी या अस्सी हज़ार जैसी गिनतियाँ ठीक-ठीक हिसाब के लिए नहीं होतीं। ये बस बहुत बड़ी तादाद बताने का एक आम तरीक़ा है। दूसरे शब्दों में, हमें ये नहीं मान लेना चाहिए कि ठीक सत्तर हज़ार लोगों की भीड़ खुलेआम नारे लगाकर उनका साथ देगी। ऐसी व्यवस्थाएँ हर इंसान को एक बेहद कठिन फ़ैसला लेने पर मजबूर करती हैं। रसूल अलैहिस्सलाम ने हमें ख़बरदार किया: “उसके, यानी दज्जाल के साथ एक जन्नत और एक जहन्नम होगी। पर उसकी जहन्नम जन्नत है, और उसकी जन्नत जहन्नम।” इसका असल मतलब क्या है?
जवाब साफ़ है। दज्जाल एक ऐसी व्यवस्था बनाता है जिसमें आपका रोज़ का गुज़ारा उसके प्रति आपकी वफ़ादारी पर टिका होता है। अगर आप उसकी भौतिकवादी लहर में शामिल हो जाएँ और उसकी अस्थाविहीन व्यवस्था का साथ दें, तो वो आपके लिए अपनी जन्नत के दरवाज़े खोल देता है। आपको आराम, दौलत और ऊँचे रुतबे का इनाम मिलता है। लेकिन अगर आप अल्लाह का पक्ष चुनते हैं, तो दज्जाल की जहन्नम खुली बाहों से आपका स्वागत करती है, और आपको कठोर श्रम शिविरों, जेल की कोठरियों और मौत की सज़ा तक पहुँचा देती है। पर हक़ीक़त में, दज्जाल की जन्नत असली जहन्नम का रास्ता है। जबकि वो दुनियावी जहन्नम, जो वो ईमान वालों पर थोपता है, वही असली, हमेशा की जन्नत के दरवाज़े खोलती है। एक और हदीस में हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “क़यामत की निशानियों में से ये है कि मर्दों की संख्या कम हो जाएगी और औरतें इतनी बढ़ जाएँगी कि पचास औरतों की देखभाल के लिए एक ही मर्द होगा।” और अगर आप वास्तविकता पर नज़र डालें, तो पिछली सदी में हमने ठीक यही देखा। विश्व युद्धों में भयानक तादाद में इंसानी जानें गईं। और मरने वालों में ज़्यादातर मर्द थे। जो मर्द बचे, उनमें से बहुत से या तो बच्चे थे, या बूढ़े, या ज़ख़्मी सैनिक। युद्ध की मार झेलने वाले देशों में, औरतों की देखभाल कर सकने वाले वयस्क और स्वस्थ मर्द बहुत कम रह गए। और एक बार फिर, इतिहास ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शब्दों को सच साबित कर दिया। और हाँ, जैसा हमने पहले देखा, हदीस में पचास की गिनती भी ठीक-ठीक हिसाब नहीं है। ये बड़ी तादाद बताने का एक आम तरीक़ा है। तो चलिए, इन हदीसों से एक और संकेत बताते हैं। और इस बार, आप अंदाज़ा लगाइए कि ये असल में किस चीज़ की ओर इशारा है। फिर वो, यानी दज्जाल, “आसमान को बरसने का हुक्म देगा, और वो बरसेगा। वो वीराने से गुज़रेगा और कहेगा, 'अपने ख़ज़ाने निकाल,' फिर चल देगा, और उसके ख़ज़ाने शहद की मक्खियों के झुंड की तरह उसके पीछे-पीछे चलेंगे।” अब आज की दुनिया पर नज़र डालिए। इसका क्या मतलब हो सकता है?
लगभग 1940 के दशक में, इंसान ने क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम वर्षा की तकनीक खोज ली। इतिहास में पहली बार, वैज्ञानिकों ने सीखा कि बादलों को कृत्रिम तरीक़े से कैसे सक्रिय किया जाए और सचमुच मनचाही बारिश कैसे कराई जाए। ये आसमान को बरसने का हुक्म देने जैसा ही है। और ये सचमुच काम कर गया। और ठीक उन्हीं बरसों में, खनन के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी क्रांति आई। आधुनिक तकनीक से, खरबों डॉलर का तेल, गैस और क़ीमती धातुएँ मनचाहे ढंग से ज़मीन से निकलने लगीं। क्या आपने एक बात पर ध्यान दिया?
जब भी कोई इन हदीसों पर हमला करने की कोशिश करता है, इनके पीछे छुपे चमत्कार और भी ज़्यादा चमक उठते हैं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए ये बातें ख़ुद से जान लेना मुमकिन ही नहीं था। बेशक ये सब अल्लाह ने ही उन पर ज़ाहिर की थीं। इससे एक बड़ा सवाल सामने आता है। ये सारा रहस्य क्यों? क्या बेहतर न होता कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमें ठीक-ठीक नाम और तारीख़ें बता देते, ताकि हर कोई आसानी से समझ जाए? चलिए, जवाब में आपसे ही एक सवाल पूछते हैं। इन हदीसों का असल मक़सद क्या था? हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें ख़बरदार क्यों किया?
उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि उनकी उम्मत सतर्क रहे। पर नबी अलैहिस्सलाम सिर्फ़ किसी एक सदी के मार्गदर्शक नहीं थे। वो क़यामत के दिन तक हर इंसान के मार्गदर्शक थे। वो चाहते थे कि हर सदी में महदी और दज्जाल की मौजूदगी का एहसास बना रहे। अगर वो दज्जाल और महदी की ठीक-ठीक पहचान बता देते, और कोई ख़ास समय और तारीख़ दे देते, तो सिर्फ़ एक पीढ़ी को इसकी फ़िक्र होती। और बाक़ी सारी सदियाँ बेफ़िक्र हो जातीं। वो चाहते थे कि पूरी उम्मत सतर्क, जागरूक और चौकस रहे। उन्होंने एक शानदार तरीक़ा चुना, ताकि हर एक पीढ़ी हदीस के सामने अपने दौर को रखकर देखे और कहे, “कहीं ये वही वक़्त तो नहीं?” दज्जाल से सामना होने की संभावना हमें सावधान रखती है। और महदी की उम्मीद हमारा हौसला बनाए रखती है। डर और उम्मीद के बीच का यही ख़ूबसूरत संतुलन इन हदीसों की प्रतीकात्मक भाषा के पीछे का असली राज़ है। इसी से ये भी समझ आता है कि दज्जाल कहाँ से निकलेगा, इसके वर्णन में अलग-अलग रिवायतें अलग-अलग जगहों की ओर इशारा क्यों करती हैं। एक रिवायत ख़ुरासान की ओर इशारा करती है, दूसरी इराक़ और शाम के बीच के एक इलाक़े की ओर, और एक और इस्फ़हान के यहूदियों की ओर। क्यों?
क्योंकि जैसा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “…क़यामत आने से पहले, लगभग तीस दज्जाल होंगे।” बुराई का कोई एक ही सरग़ना नहीं है। ऐसे बहुत से हैं। इसका मतलब है कि दज्जाल की सारी निशानियों को एक ही इंसान में जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं। क्योंकि जब एक हदीस एक दज्जाल की ख़ूबियाँ बता रही होती है, तो दूसरी रिवायत किसी बिल्कुल दूसरे दज्जाल की बात कर रही होती है। और फिर, जब आप पिछली सदी पर नज़र डालते हैं, तो आपको एहसास होता है कि हमने जिस धर्म-विरोधी व्यवस्था का ज़िक्र किया, उसने बिल्कुल एक विशाल ऑक्टोपस की तरह काम किया। उसका सिर और दिमाग़ रूस में था, पर उसकी भुजाएँ पड़ोसी मुस्लिम देशों तक फैली थीं। कई देश, जैसे उज़्बेकिस्तान, क़ज़ाख़िस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और अज़रबैजान, भारी ज़ुल्म के शिकार हुए। उनकी मस्जिदें ज़बरदस्ती बंद कर दी गईं। इस्लामी लिबास पर पाबंदियाँ लगीं, इस्लामी आलिमों को सुनियोजित तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया, निर्वासित किया गया या मार दिया गया। आबादी का ज़्यादातर हिस्सा मुसलमान होने के बावजूद, अज़ान पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई, और लोगों को अपना दीन छुपकर सीखना पड़ा। अब एक पल के लिए, अब तक जितने संकेतों की हमने बात की, उन सबको अपने ज़ेहन में फिर से दोहराइए। दुनियावी जन्नत और जहन्नम का भ्रम, आस्था पर हमला, थोड़े समय में बरसों की रूहानी तबाही, वग़ैरह। अब ज़रा सोचिए। एक इंसान लाखों लोगों के दिमाग़ में ज़हर भर देता है। नई पीढ़ियाँ बड़ी होती हैं, और उन्हें विज्ञान के पाठ भी नास्तिक प्रोपेगैंडा के रूप में पढ़ाए जाते हैं। ऐसी दुनिया में, क्या सिर्फ़ एक आदमी को ख़त्म करके आप सब कुछ ठीक कर सकते हैं?
मुझे नहीं लगता। जो चीज़ ख़ुद दज्जाल से कहीं ज़्यादा अहम है, वो है दज्जालियत, यानी वो विचारधाराएँ जो वो पीछे छोड़ जाता है। दज्जाल नाम का वो इंसान तो किसी मामूली वायरस या आम बीमारी से भी आसानी से मर सकता है। पर पूरी दुनिया में फैली एक विचारधारा को मिटाने, और लाखों लोगों को सच क़बूल करने के लिए राज़ी करने का क्या?
ऐसे ही बड़े काम के लिए किसी महान नबी का दोबारा आना उचित हो जाता है। तो जब हदीसें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हाथों दज्जाल के ख़ात्मे की बात करती हैं, तो हम इसे दो लोगों की एक सीधी-सादी लड़ाई नहीं समझ सकते। बल्कि ये दो बड़ी विचारधाराओं का टकराव है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ईमान वालों के अपने गठबंधन के साथ क़ुरआन की हीरे जैसी तलवार उठाएँगे, और दज्जालियत की पूरी विचारधारा को काट डालेंगे। इंशाअल्लाह, वो उस विचारधारा को इस तरह दफ़न करेंगे कि वो फिर कभी साँस नहीं ले पाएगी। इस तर्क से, हदीस के शब्दों के सच होने के लिए ज़रूरी नहीं कि दज्जाल और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक ही दौर में हों। अब आप सोच रहे होंगे, भाई, क्या आख़िरी ज़माने की हदीसों में कुछ भी शाब्दिक अर्थ में नहीं है?
बेशक है। मिसाल के तौर पर, सूरज का पश्चिम से निकलने को लीजिए। ये ठीक वैसे ही होगा जैसे आप समझते हैं। और चूँकि ये पूरी तरह शाब्दिक अर्थ में है, इसलिए जिस पल ये होगा, तौबा के दरवाज़े बंद हो जाएँगे। ईमान लाने या न लाने का इम्तिहान अपनी मर्ज़ी से चुनने पर टिका है। पर इस घटना को अनदेखा करना इतना नामुमकिन होगा कि अपनी मर्ज़ी से चुनने की अवधारणा ही ख़त्म हो जाएगी। ये ऐसा है जैसे आसमान में सितारों से लंबे समय तक “ला इलाहा इल्लल्लाह” लिखा हो, ताकि पूरी दुनिया देख सके। उस पल मानना आपकी मर्ज़ी नहीं रहेगा, बल्कि आप देखने के लिए बाध्य होंगे। जैसे फ़िरऔन ने बिल्कुल आख़िरी पल में, समंदर में डूबते हुए, ईमान लाने की कोशिश की, वैसे ही उस पल में ईमान लाना बिल्कुल बेकार होगा। दज्जाल के माथे पर लिखा “काफ़िर” शब्द, जिसे हर कोई पढ़ सकेगा, चाहे वो अनपढ़ ही क्यों न हो...
याजूज-माजूज...
दाब्बतुल-अर्ज़ का निकलना, और किस तरह वो हर इंसान के असली ईमान को उजागर कर देगा। इन और ऐसी बहुत सी दिलचस्प हदीसों के तर्कसंगत जवाब रिसाले-नूर में समझाए गए हैं। अगर आप असल स्रोत में और गहराई से उतरना चाहते हैं, और ज़्यादा जानना चाहते हैं, तो हमारा 'माई रिसाले' ऐप डाउनलोड कर सकते हैं। ये बिल्कुल मुफ़्त है और इसमें कोई विज्ञापन नहीं है। हम वहाँ आपका इंतज़ार करेंगे। आज हम देखते हैं कि इन हदीसों को लेकर लोग दो बिल्कुल उलटे छोरों पर जा पहुँचते हैं। एक तरफ़ के लोग इन पर शक़ करते हैं और कहते हैं कि इसका कोई मतलब नहीं बनता। आख़िर में वो इन रिवायतों को ही ठुकरा देते हैं। और कुछ लोग, जिनका अहंकार उनके ईमान से कहीं ज़्यादा मज़बूत है, हदीसों के पूरे संग्रह का ही इनकार कर देते हैं। और दूसरी तरफ़ के लोग इन हदीसों को पूरी तरह शाब्दिक अर्थ में लेते हैं। ऐसा करके वो अपने सुनने वालों को और उलझा देते हैं। और ज़ाहिर है, इस्लाम के दुश्मन इसी वजह से इन ख़ास रिवायतों को उछालना पसंद करते हैं। पर सच ये है कि हमारे नबी अलैहिस्सलम की हदीसों में से दो प्रतिशत से भी कम इतनी मुश्किल हैं। बाक़ी सब साफ़ हैं, और ज़िंदगी के हर पहलू के लिए ठोस मार्गदर्शन और गहरी सीख देती हैं। और पता है असल में हैरान करने वाली बात क्या है?
पूरे मानव इतिहास में, किसी और इंसान ने ज़िंदगी के हर एक क्षेत्र में ऐसे सबक़ नहीं दिए, जैसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दिए। आम तौर पर, जब कोई इतिहास में प्रसिद्ध होता है, तो वो अक्सर सिर्फ़ एक ही क्षेत्र में होता है, जैसे क़ानून। पर दूसरे क्षेत्रों में उनके पास कोई ख़ास समझ नहीं होती। उनके पास देने को ज़्यादा कुछ नहीं होता। फिर भी, जब हम हदीस की किताबें देखते हैं, तो पाते हैं कि उन्होंने कितने सारे क्षेत्रों में सबक़ दिए। मिसाल के तौर पर, क़ानून, व्यापार, अर्थव्यवस्था, पारिवारिक जीवन, बच्चों की परवरिश, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से संबंध, सफ़ाई और स्वच्छता, सेहत, नैतिकता, रूहानी तरक़्क़ी, और नफ़्स का अनुशासन। यहाँ तक कि जानवरों से प्यार भी इसमें शामिल है। और अगर आप हदीस की किताबों में देखें, तो इनसे कहीं ज़्यादा विषय मिलेंगे। तो सिर्फ़ इसलिए कि हम किसी चीज़ की गहराई पूरी तरह नहीं समझ पाते, उसे काटकर अलग कर देना और ठुकरा देना, किसी समझदार इंसान का रवैया नहीं हो सकता। ख़ासकर जब आप देखें कि ये हदीसें सदियों तक कितनी सावधानी और भरोसे के साथ सुरक्षित रखी गईं। दरअसल, ये जाँच की ऐसी कई-स्तरीय प्रक्रिया से गुज़रीं, जिसकी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। कोई हदीस तब तक सहीह नहीं मानी जाती, जब तक वो इन सख़्त कसौटियों पर खरी न उतरे। एक: रावियों का जुड़ा हुआ सिलसिला। हमें सिलसिले के हर एक रावी को एक-एक करके जानना ज़रूरी है, कि ठीक-ठीक किसने किससे रिवायत की, और ये सिलसिला सीधा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक पहुँचे। दो: रावियों की ईमानदारी, अदालह!
सिलसिले का हर इंसान अपनी पूरी ईमानदारी, गहरे तक़वा और मज़बूत ईमान के लिए जाना जाता हो, और उसका झूठ बोलने या किसी बुरे बर्ताव का कोई रिकॉर्ड न हो। तीन: पक्की याददाश्त। उनकी याददाश्त पक्की हो, या उनके पास ऐसे पक्के लिखित रिकॉर्ड हों, ताकि वो शब्द भूलें नहीं या गड्डमड्ड न करें। चार: कोई विरोधाभास नहीं, जिसे शाज़ कहते है। रिवायत ज़्यादा भरोसेमंद या ज़्यादा मशहूर रावियों द्वारा बयान की हुई बात के ख़िलाफ़ नहीं जा सकती। पाँच: कोई छुपी ख़ामी नहीं, जिसे 'इल्लत' कहते हैं। मतन और सिलसिला, दोनों ऐसी किसी भी छुपी ख़ामी से पूरी तरह पाक हों, जिसे सिर्फ़ हदीस के इल्म के गहरे जानकार ही पकड़ सकते हैं। इतिहास में बीस हज़ार से ज़्यादा हदीस के रावी मिलते हैं। और विशाल रिकॉर्ड उनकी जीवनियों, उनके चरित्र और उनकी याददाश्त की ताक़त का ब्योरा रखते हैं। हर एक छोटी से छोटी बात दर्ज है, सिर्फ़ उनकी बातों की सच्चाई परखने के लिए। इतिहास ने सचमुच ऐसा कुछ कभी नहीं देखा। आख़िर में, हर एक झूठी रिवायत छानकर पूरी तरह अलग कर दी गई। इसे यूँ समझिए। अगर बाइबल, जिसे दो अरब ईसाई मानते हैं, हदीस के इल्म के सख़्त नियमों पर परखी जाए, तो वो पास होने लायक़ अंक भी न ला पाए। ये व्यवस्था पहले दिन से ही बेहद मज़बूत बनाई गई थी। सैकड़ों लोगों के हदीस याद करने के अलावा, बावन सहाबा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी में ही उन्हें बाक़ायदा लिख रहे थे। एक मशहूर मिसाल 'सहीफ़ा सादिक़ा' है, लगभग एक हज़ार हदीसों का संग्रह, जिसे सीधे सहाबी अब्दुल्लाह बिन अम्र ने लिखा था। हिजरी कैलेंडर के साल पचास से एक सौ पचास के बीच, लगभग चार सौ अलग-अलग विशेषज्ञों ने इन्हें बचाने और दर्ज करने पर ध्यान दिया। पर इन सबसे बढ़कर, हमारा सबसे बड़ा सबूत सहाबा का चरित्र है। हम ये शब्द उन लोगों से पा रहे हैं जिन्होंने अपनी ज़िंदगियाँ अल्लाह के लिए वक़्फ़ कर दीं और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर दिया। वही इस पूरी व्यवस्था की बुनियाद हैं। उनके पास झूठ बोलने की ज़रा भी वजह नहीं थी। बल्कि, वो इस मशहूर हदीस के भारी बोझ तले जीते थे: “जिस किसी ने जान-बूझकर मुझ पर झूठ बाँधा, वो अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।” इतनी डरावनी चेतावनी के साथ, वो हर एक शब्द में बेहद सावधान रहते थे। पर यहाँ हमें एक बहुत अहम बात स्पष्ट करनी होगी। जब हम किसी हदीस को ज़ईफ़ कहते हैं, तो वो सिर्फ़ सहीह हदीस के पूर्ण मानकों के मुक़ाबले ज़ईफ़ होती है। दरअसल, वो छापेख़ाने के आविष्कार से पहले लिखे गए लगभग किसी भी दस्तावेज़ से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद है। उसका ऐतिहासिक महत्व आज भी बहुत बड़ा है। मिसाल के तौर पर, इस्तांबुल वाली मशहूर हदीस लीजिए: “तुम क़ुस्तुंतुनिया ज़रूर फ़तह करोगे। उसका अमीर क्या ही बेहतरीन अमीर होगा, और वो लश्कर क्या ही बेहतरीन लश्कर होगा।” तकनीकी तौर पर इस पर ज़ईफ़ का ठप्पा है, फिर भी इतिहास ने ये फ़तह देखी। और ज़ईफ़ के ठप्पे से उसकी ऐतिहासिक ताक़त नहीं बदली। तो जब तक आप इस्लाम के बुनियादी अक़ीदों पर बात नहीं कर रहे, या सख़्त शरई क़ानून नहीं बना रहे, तब तक ज़ईफ़ हदीस को कमतर समझने की कोई वजह नहीं। अब जब हम हदीस के इनकार के इस पूरे चलन को देखते हैं, तो हमें एक बहुत सीधा सवाल पूछना होगा। अगर आप हदीस का इनकार करते हैं, तो आपको असल में क्या हासिल होता है?
कुछ नहीं। पर अगर जिन हदीसों को आप ठुकराते हैं, वो सच्ची हैं, तो इसकी ज़िम्मेदारी बहुत भयानक है। इससे भी बढ़कर, आख़िरत के बारे में सोचिए। क्या आपको नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सामना करते हुए गहरी शर्मिंदगी नहीं होगी? आप क्या कहेंगे? “अम्म, पता है क्या? हाँ, आपने हमारे लिए अपनी पूरी ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी। आप पर पत्थर बरसाए गए, आपका अपमान किया गया, आप पर झूठे इल्ज़ाम लगाए गए। आपने अनगिनत बार मौत का सामना किया और सबसे सख़्त हालात झेले। पर सच कहूँ तो, आपकी बातें मेरे लिए कुछ ख़ास अहम नहीं थीं।” क्या आप सचमुच ऐसा कह सकते हैं? और आप सैकड़ों सहाबा को झूठा कैसे कह सकते हैं?
हम अपने दावों का वज़न समझे बिना यूँ ही बात नहीं कर सकते। और आख़िर में, अंतिम बात ख़ुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर छोड़ते हैं: “मैं तुममें से किसी को ऐसा न पाऊँ कि वो अपने तख़्त पर टेक लगाए बैठा हो, और उसके पास मेरा कोई हुक्म या मेरी कोई मनाही पहुँचे, तो वो कहे, 'मैं नहीं जानता। हम तो जो अल्लाह की किताब में पाते हैं, उसी की पैरवी करते हैं।'”