बौद्ध से मुस्लिम समुराई तक - “मैं समझता था कि धर्म एक कारोबार जैसा है!”
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तो मैं सामुराई वंश से हूँ। मेरा परिवार बौद्ध है। मैं मानता था कि धर्म एक कारोबार की तरह है। इसमें लोग बस अनुयायियों की संख्या को बढ़ाते है ताकि उनसे पैसे हासिल हो सके। मुझे बांग्लादेश में थोड़े अलग तरह के लोग मिले बस केवल इसीलिए कि कोई जापान में पैदा हुआ, उनकी सेहत और शिक्षा सुरक्षित है। और महज इसीलिए कि कुछ लोग बांग्लादेश में पैदा हुए, वे बेहद गरीब है। मुझे इसमें कोई इंसाफ़ नहीं दिखता। तो मुझे जापानी भाषा का क़ुरआन मिला और मैं उसे पढ़ने लगा। तब मैंने कुछ unique concept समझा जैसे आख़िरत यानी मरने के बाद की ज़िन्दगी और तौहीद यानी ईश्वर का एक होना, एकेश्वरवाद तब मुझे ये इतना तार्किक लगा कि मैं ख़ुद मुसलमान बन गया। अस्सलामुअलैकुम, डॉक्टर क्योईचिरो सुगिमोटो हमारा निमंत्रण स्वीकार करने के लिए शुक्रिया बतौर टुवर्ड्स इटर्निटी हम आपको अपने साथ पाकर बेहद खुश है। वालेकुमअस्सलाम व रहमतुल्लाही व बरकातुहू यह मेरी ख़ुशक़िस्मती है तो मैं बस इस सवाल से शुरुआत करूँगा कि क्योईचिरो सुगिमोटो कौन है?
क्या आप हमें अपने जीवन के बारें में संक्षेप में बता सकते है?
मेरा नाम क्योईचिरो सुगिमोटो है। सुगिमोटो मेरे परिवार का नाम है। ये सुगिमोटो क़बीले से संबंधित है। सुगिमोटो क़बीला दरअसल एक सामुराई क़बीला है। तो मैं सामुराई वंश से हूँ। और मैं Gifu prefecture के Seki City में जन्मा एवं पला बढ़ा। ये जापान एक मध्य भाग है। और बाद में जब मैं एक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट था। मैंने अलग-अलग cultures पर research करने के लिए cultural anthropology की पढ़ाई की। और जब मैं 19 साल का था तब मैं इस्लाम से रूबरू हुआ। और जब मैं 20 साल का था, मैंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया उसके बाद अब मैं बतौर इमाम और चिबा के चिबा इस्लामिक कल्चर सेंटर के चेयरपर्सन के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। ये tokyo के पास है। मुसलमान बनने से पहले आप किसमे आस्था रखते थे?
दरअसल मैं किसी भी धर्म में नहीं मानता था। बस नाम का बौद्ध था क्यूंकि मेरा परिवार बौद्ध था। मगर असल में कोई धर्म नहीं था बस सांस्कृतिक रूप से बौद्ध था, जैसे आम जापानी लोगों की तरह पूर्वजों का आदर करना। मैं किसी और धर्म में नहीं मानता था क्यूंकि मैं मानता था कि धर्म एक कारोबार की तरह है। यानी इसमें लोग बस अनुयायियों की संख्या को बढ़ाते है, ताकि उनसे पैसे हासिल हो सके। और इसके बाद वे ख़ुद अमीर बन जाते है। तो इस तरह से ये एक व्यवसाय की तरह है। पहले मैं ऐसे ही सोचता था। ज़्यादातर जापानी लोग सोचते है कि ये ज़िंदगी ही आखरी है। इसके बाद कुछ नहीं है। वैसे ये एक बदगुमानी है। अपने पहली बार इस्लाम के बारें में कैसे जाना?
हाँ, तो जब मैं एक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट था तो मैं एक बांग्लादेशी स्टूडेंट से मिला। वो पहला मुसलमान था जिनसे मैं मिला वो जापानी बहुत कम बोल पाता था और उसे ये बोली सीखनी थी। तो मैं उसका दोस्त बन गया क्यूंकि मैं उसके साथ अंग्रेज़ी का अभ्यास करना चाहता था। तो हम कभी साथ होते। आखिरकार हमारी अपनी ज़िंदगी के बारें में भी बातचीत अच्छी हो गई। फिर उसने मुझे गर्मी की छुट्टियों में बांग्लादेश आने की दावत दी। और मैं विभिन्न संस्कृति में रुचि रखता था। मेरे जीवन के पहले विदेशी दौरे पर मैं बांग्लादेश गया ये एक मुस्लिम मुल्क था। फिर मैंने एक बड़ा culture gap पाया क्योंकि बांग्लादेश एक बेहद गरीब मुल्क है। मैंने बहुत सी विभिन्नताएँ पाईं। रास्तों में बहुत से बच्चे मिलते थे जो गलियों में सो रहे होते थे। तो मैं बहुत हैरान था कि ये सब क्या है?
क्यूंकि सामान्यतः आपको जापान में ऐसे लोग नहीं मिलेंगे। जब मैं अपने दोस्त के घर पहुँचा, उनका परिवार, उनके parents, उनके भाइयों और बहनों ने मुझे welcome किया। और उनके यहाँ मेहनानवाज़ी और अपनापन खूब है। तो ये एक और culture shock था। क्यूंकि वे परिवार को वैल्यू देते और इज़्ज़त देते थे। उनके यहाँ extended family system है जिसे उन्हौने maintain कर रखा है। और बाद में मैं शहर से बाहरी, गांव में घूमा। वे लोग बड़े ऊर्जावान थे। मतलब बड़े ज़िंदादिल। ये कुछ ऐसा था जो जापान में नहीं मिल सकता था। क्यूंकि वहाँ सबकुछ नियंत्रित है। और वो शहरी जीवन। तो जब आप लोगों की आँखों में देखें तो जापान में बहुत से लोग मिलेंगे जिनकी आँखे मुरझाई हुई हैं। क्योंकि उनके पास ज़िंदगी का कोई मकसद नहीं है। उन्हें नहीं मालूम वे क्या कर रहे है। उन्हें कुछ नहीं पता कि ज़िंदगी का असल मक़सद क्या है। तो उन्हें नहीं मालूम कि वे काम करने के लिए जी रहे हैं या जीने के लिए काम कर रहे हैं। मुझे बांग्लादेश में अलग तरह के लोग मिले वे माली तौर पर गरीब लोग थे मगर मैं उनकी आँखें देखता था उसमे उनकी शख़्सियत का रौब दिखता था। जबकि उनमे से अक्सर लोग किसान थे और उनके लिए मैं पहला विदेशी था जिसे उन्हौने देखा था। पर उन्होंने मुझे चाय की दावत दी। वे उसे चाय कहते है। दूध की चाय और पेठा। पेठा यानि एक तरह की मिठाई। तो वे बुलाते कि आइए और खाइए। तो मैं हैरान था। जापान में ऐसा कभी नहीं हुआ। ऐसे कि आपने पहली बार किसी विदेशी को देखा और आप उन्हें अपने घर दावत दे दें। ऐसा कभी नहीं हुआ। पर मैंने ये बाग्लादेश में एक्सपीरियंस किया। तो आख़िर ऐसा क्यों है?
इस्लाम के बारें में सोचने के पीछे ये पहला नुक़्ता था। क्यूंकि मुझे पता था कि वे सब मुसलमान हैं। तो मुमकिन है कि उनका बर्ताव और उनका ढंग इस्लामी मूल्यों पर आधारित हो। बाद में जापान आकर मैंने इस्लाम के बारें में किताबें ढूँढनी शुरू कर दी। क्यूंकि ये 1996 का समय था जब इंटरनेट नहीं हुआ करता था। इसलिए कोई जानकारी लेनी हो तो मुझे लाइब्रेरी और bookstores में ही मिल सकती थी। तो मुझे जापानी भाषा का क़ुरआन मिला जो कि इस्लाम के बारें में जानकारी का मुख्य स्रोत है। तो मुझे वो मिला और मैं उसका जापानी अनुवाद पढ़ने लगा। तब मैंने कुछ unique concept समझा जैसे आख़िरत यानी मरने के बाद की ज़िन्दगी और तौहीद यानी ईश्वर का एक होना, एकेश्वरवाद ये कॉन्सेप्ट मेरे लिए बिल्कुल नए थे मैंने इसके बारें में कभी नहीं सोचा था। चूँकि जापान में लोग व्यस्त होते है तो उन्हें मरने के बाद की ज़िंदगी के बारें में सोचने का समय ही नहीं मिलता। वे तो अपने दैनिक जीवन में 1 सेकंड के लिए भी नहीं सोचते है। और ऐसा ही हाल खुदा के कॉन्सेप्ट का है। जापान में बहुदेववाद बहुत मशहूर है, polytheism। और जापान में खुदा की कोई परिभाषा नहीं है। कोई भी ये नहीं बताता कि खुदा कौन है। और ऐसे में मुझे क़ुरआन में खुदा की स्पष्ट रूप से वर्णित परिभाषा मिली। जैसे उदाहरण के लिए सुरह इख़्लास - أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ कह दो कि ख़ुदा एक है ये बिल्कुल सरल है मगर ये मेरे लिए हैरानीभरा है। ओ...
खुदा की एक परिभाषा होती है। तो इस तरह ये जानने को कि आख़िर और क्या कुछ लिखा है मैं क़ुरआन को पढ़ने में दिलचस्पी लेने लगा क्यूंकि ये लगभग 600 पन्ने की है। तो मुझे ये check करना था कि आख़िरकार सबका बनाने वाला अल्लाह हमसे क्या कहना चाहता है। इसीलिए मैंने इसे personally पढ़ा जैसे कि सबका बनाने वाला अल्लाह मुझसे personally बात कर रहा हो। एक 7वीं शताब्दी की किताब के तौर पर नहीं बल्कि आज के दौर में हमें ज़िंदगी के सबक़ सिखाने वाली किताब की तरह। मैं उत्सुक था कि शायद मैं इस किताब से कुछ सीख पाऊँ। तो इस तरह से आख़िरकार मैं आख़िरत और तौहीद के बुनियादी concept से सहमत हो गया। मैं आख़िरत के कॉन्सेप्ट से इसीलिए सहमत हुआ क्यूंकि जैसा कि मैंने पहले बताया मैं बांग्लादेश में एक cultural shock में था क्यूंकि वहाँ ग़रीबी है। सही?
तो उस वक्त मैं सोच रहा था, ये लोग गरीब क्यों है? महज इसीलिए क्यूंकि इनका जन्म एक गरीब मुल्क में हुआ इसीलिए वे गरीब हैं। मतलब, बस केवल इसीलिए कि कोई जापान में पैदा हुआ, उनकी सेहत और शिक्षा सुरक्षित है। और महज इसीलिए कि कुछ लोग बांग्लादेश में पैदा हुए, वे बेहद गरीब है। आख़िर ये सब तय करने का अधिकार किसको है?
हमारे पास ये तय करने का कोई अधिकार नहीं कि हम कहाँ जन्म लें। इसका मतलब है कि हम सबकी ज़िंदगी शुरू में एक जैसी नहीं रही है। आप इसका इनकार नहीं कर सकते। तो शुरू से ही हमारी ज़िंदगी में एक बड़ा फ़र्क़ है जिसे आप अपनी ज़िंदगी के छोटे से अरसे में एडजस्ट नहीं कर सकते। तो इसका मतलब है कि मुझे इसमें कोई इंसाफ़ नहीं दिखता। क्यूंकि बिल्कुल शुरुआत से ही कुछ चीज़ें तय है। हालांकि जब मैंने क़ुरआन पढ़ा तो मुझे आख़िरत का कॉन्सेप्ट मिला। उसके बाद ये समझ में आया। क्यूंकि हमें इस ज़िंदगी में जो कुछ मिला है वो महज एक आज़माइश है। चाहे आपको ज़्यादा मिला हो या कम इसका फाइनल result से कोई लेना देना नहीं है। जैसे मान लीजिए कि भले ही कोई बांग्लादेश में पैदा हुआ और उसकी कंडीशन बुरी थी फिर भी अगर वे अपनी ज़िंदगी में अच्छे काम कर रहे हैं तो उनकी ज़िंदगी आख़िरत में सुरक्षित रहेगी। जिसका मतलब है कि वे जन्नत जाएँगे जहाँ वे हमेशा ज़िंदा रहेंगे। और जब हम इस ज़िंदगी के बारें में सोचें तो ये ज़्यादा से ज़्यादा 100 साल होगी मगर हमेशा की ज़िंदगी बेइंतहा होगी, है ना?
जब हम 100 सालों की तुलना अनंत से करें तो ये तो कुछ भी नहीं है। एक सेकंड से भी कम। इसी वजह से आख़िरत का ये इंसाफ़ हमें इस ज़िंदगी में एक मकसद देता है। वो कौन सी वजह थी जिससे आपने इस्लाम अपनाने का फैसला लिया? किस चीज़ ने आपको यह सोचने पर मजबूर किया कि मुझे मुसलमान बन जाना चाहिए? क्या आपने ध्यान दिया? इस वीडियो को देखते समय आपको कोई विज्ञापन नहीं देखना पड़ा। चूंकि Towards Eternity एक अलाभकारी संगठन है, हम यह वीडियो केवल आपके समर्थन से बना सकते हैं। यदि आप इस नेक काम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो Towards Eternity को दान करें और इस सुनहरे अवसर को न गँवाएँ। वो कौन सी वजह थी जिससे आपने इस्लाम अपनाने का फैसला लिया? किस चीज़ ने आपको यह सोचने पर मजबूर किया कि मुझे मुसलमान बन जाना चाहिए?
जैसा कि मैंने दो concepts की चर्चा की, आख़िरत का कॉन्सेप्ट और तौहीद वाक़ई में मेरी समझ में आता है। हालांकि इसके बाद भी मैं 600 से अधिक पन्नों में लिखे के क़ुरआन को खंगालता रहा। तो मैं सावधानीपूर्वक check करता कि क्या इसमें कोई खतरनाक या अजीब सीख तो नहीं दी गई है। मैं जितना पढ़ता गया उतना ही समझ में आता रहा कि ये तो मेरे लिए काफ़ी स्वाभाविक है। ये तो कुछ ऐसा है जिसमे हमें मानना चाहिए और अमल करना चाहिए। आख़िरकार मैंने महसूस किया कि ये क़ुरआन इंसान की तरफ़ से नहीं है। ये रचयिता या अल्लाह की तरफ़ से आया हुआ जान पड़ता है। तो इस तरह मेरा ये यक़ीन मज़बूत होता गया कि क़ुरआन ज़िंदगी बदलने वाली किताब है। और मुझे इसका पालन करना चाहिए। क्यूंकि मुझे लगता है कि इस्लाम केवल किताब यानी क़ुरान पढ़ने का नाम नहीं है बल्कि ये तो अमल और धार्मिक अनुभव हासिल करने की चीज़ है। तो मुझे ये जिज्ञासा हुई कि मुसलमान कैसा महसूस करते है और इस्लाम को अपनी निजी ज़िंदगी में कैसे मानते है। और ये कि मुझे इस तरह की अंदरूनी जानकारियाँ कैसे मिलेगी। कैसे?
बस एक ही रास्ता था कि मुझे ख़ुद मुसलमान बनना होगा। मुझे ख़ुद ही इस्लाम को experience करना होगा। वरना एक तीसरे इंसान के तौर पर, एक रिसर्चर के तौर पर अगर आप ऑब्जेक्टिविटी की ख़ातिर ख़ुद को दूर रखते है और बस रिसर्च करते है तो आपको इस्लाम का अंदरूनी पहलू समझ में नहीं आने वाला। ये रिसर्चर नहीं जान सकता। मैं उस इल्म को हासिल करना चाहता था। यही वजह थी कि शायद out of curioucity मैं मुसलमान बनना चाहता था। ये जानने के लिए कि असल में इस्लाम है क्या? वो बड़ी कठिनाइयों कौन सी थीं जिनका आपने इस्लाम अपनाने के बाद सामना किया? हाँ, तो पहला है हलाल खाना। ऐसी दिक्कत 28 साल पहले थी। अब तो हाल में अल्हमदुलिल्लाह हमारे पास हलाल के बहुत से विकल्प हैं। पर उन दिनों लगभग...
यहाँ तक कि मुसलमानों के लिए भी हलाल खाना मिलना मुश्किल होता था। तो ये सबसे पहली कठिनाई थी। दूसरी है इबादत के लिए जगह की दिक्कत। उन दिनों मुझे याद है, पूरे जापान में केवल 7 मस्जिदें थीं। आज यहाँ 151 है। 151 से ज़्यादा मस्जिदें। इसलिए इबादत कैसे की जाये ये भी एक कठिनाई थी। एक अन्य कठिनाई जापानी ग़ैर-मुस्लिमों में मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रह को लेकर रही है। तो बिल्कुल, लोगों में 'इस्लाम क्या है' को लेकर कुछ खास समझ नहीं पाई जाती। जैसे पिछले 20 सालों से मैंने अपने parents को इस्लाम समझाने की कोशिश की। हालांकि, मुझे लगता है कि ज़्यादातर मामलों में सितंबर 11, आतंकवाद इत्यादि के कारण वे इस्लाम के बारें में नहीं सुनना चाहते थे। बल्कि उनके ज़हनों में नकारात्मक छवि थी। पर मैं समझाना चाहता था। जब कभी हम मिलते, मैं इस्लाम का परिचय करवाता। पर वे वाक़ई में परवाह नहीं करते। लेकिन मैंने इसे जारी रखा...
मैं ज़िंद नहीं करता पर मैंने ये बताना जारी रखा कि किस तरह इस्लाम खूबसूरत और तार्किक है। हालांकि वे इसे नापसंद करने लगे। तो एक दिन जब वे हमारे hometown Gifu से चिबा आए मेरे पिता ने कहा - लो फिर से मेरा बेटा इस्लाम की बातें कर रहा है और बस वो आए, बस कुछ मिनटों के लिए और उसके बाद वे चले गए। क्यूंकि वे इस्लाम के बारें में कुछ भी नहीं सुनना चाहते थे। तो हमारे संबंध ख़राब हो गए। मैं सोचने लगा कि इसे कैसे सुलझाया जाए। मैं अलग-अलग रास्ते सोच रहा था। जैसे - मुझे उन्हें खुश करने के लिए कोई गिफ्ट भेजना होगा। मेरे पिता के लिए - उनको कॉफ़ी देकर, उन्हें ये पसंद था। और कुछ नमकीन कुछ मेवे, क्योंकि ये उन्हें पसंद था। तो मैं भेजता रहा। हाँ!
वो खुश हो गए और हमें फिर से अपने गाँव आने के लिए इजाज़त दे दी। तो हमने चिबा से अपने गाँव का दौरा किया। फिर मेरे पैरेंट्स ने बताया कि उन्हें घर को लेकर कुछ उलझनें है। इस पुरातन घर की देखभाल कौन करेगा जो हमें हमारे दादा से विरासत में मिला था। आमतौर पर जापान में पहला बेटा इसका ख्याल रखता है। जिसका अर्थ हुआ कि ये मुझे करना होगा। मैंने कहा आप फ़िक्र न करें मैं इस घर की देखभाल करूँगा। तो इस तरह मैंने उनकी उलझनें दूर कर दी। दूसरी उलझन या कहें परेशानी उनके स्वास्थ्य को लेकर थी। क्यूंकि तबतक वो 75 साल के हो चुके थे। तो अगर उनको अस्पताल में भर्ती होना पड़े, जैसे अगर उन्हें पैरालिसिस हो गया या ऐसा कुछ, जो कि सामान्य स्थिति नहीं है तब क्या किया जाए?
इसपर मैंने कहा कि आपलोग फ़िक्र न करें, हम आपका ख्याल रखने वाले है। और हमने उनकी एक और उलझन दूर कर दी। फिर मेरे पिता ने मुझे एक सवाल पूछा - तुमने दाढ़ी क्यों रखी है? दाढ़ी! समझे? तो ये एक दिलचस्प सवाल था और ये इस्लाम से संबंधित था। और ये एक ऐसा सवाल था जिसका शायद मुझे इंतज़ार था। मतलब ऐसा सवाल जिसका जवाब मैं सीधे सीधे न दूँ बल्कि ये कहकर दूँ कि आपका सवाल समझने और इसका सटीक जवाब देने के लिए मुझे आपको इस्लाम की बुनियादों की व्याख्या करने की ज़रूरत पड़ेगी। तो क्या आपके पास 10 मिनट हैं? इसपर मेरे पिता ने कहा - ठीक है। जिसका मतलब था कि मेरे पास मौक़ा था कि मैं इस्लाम के बारें में बात करूँ भले ही वो केवल 10 मिनिट्स ही हों। अल्हमदुलिल्लाह!
पहले तो उन्हें ये 1 लम्हे के लिए भी पसंद नहीं था और अब मेरे पास 10 मिनट है। अल्हमदुलिल्लाह! मुझे वो बातें करनी थी जो मुझे करनी चाहिए थी। तो जैसा कि आप जानते है, हमारे पास GORAP मेथड है - Existence of God, Oneness of God, revelation, और Prophethood. ये सभी ज़रूरी parts . मैं पहले से प्रशिक्षित था तो मैंने बस बात की। आसान जापानी भाषा में। फिर वे सुनते रहे, मेरी माँ भी सुन रही थीं। तो इन सब के बाद आखिरकार मेरे पिता ने मुझसे पूछा - तुम क्या चाहते हो? अन्ततः, वो बोले - तुम चाहते क्या हो? तब उस समय मेरी बीवी जो मेरे पास ही थी और सुन रही थी, उसने महसूस किया कि कुछ बात बनी है। तो वो बोली - मैं चाहती हूँ कि आप जन्नत में हमारे साथ आएँ। मेरी बीवी ने ऐसा ही कहा। तो वो बोले - कैसे? आख़िर कैसे?
तो इसी वजह से मैंने कहा कि क्या आप कलमा पढ़ेंगे? क्यूंकि GORAP मेथड का तो मकसद ही कलमा पढ़वाना है। ये समझाना कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं है और मुहम्मद (स.अ.व.) अल्लाह के नबी हैं। यही बात है। जिसे मैं पहले ही समझा चुका था और उन्हें जैसे भी हो ये बात समझ में आ गई थी। तो बस जो रह गया था वो था इसे स्वीकार करना या गवाही देना। इसी करण मैं क्या चाहता था? ये कि वो गवाही दें। जिसके बारें में मैंने अभी समझाया। तो मेरी माँ और मेरे पिता दोनों ने एक दूसरे को देखा और कहा - ठीक है। Wow!
ठीक है हम बोल देंगे हम कलमा पढ़ लेंगे। ये सच में सबसे ज़्यादा ख़ुशी का लम्हा था। फिर मेरी बीवी और मैंने तुरंत ही सजदा-ए-शुक्र अदा किया। हाँ, ये ये नतीजे चौकाने वाले थे, वाक़ई में। पर जो हुआ वो तो यही था, सुबहानअल्लाह! पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के बारे में वह कौन सी बात थी, जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरे लिए तो सबसे पहली बात यही थी कि वो क़ुरआन के पैगंबर है। तो यही बहुत अहम बात थी क्यूंकि मैं क़ुरआन से बहुत प्रभावित था। तो मैं सोचता था कि आख़िर उन्होंने ये संदेश यानि क़ुरआन कैसे पहुंचाया कि जिसमे 1400 सालों के बावजूद भी कोई बदलाव नहीं आया है। इसीलिए ये तो चमत्कारिक है। और फिर उनकी महान शख़्सियत जैसे जैसे मैंने उन्हें जाना, उनकी इज़्ज़त और अक़ीदत बढ़ती गई। ये कैसे मुमकिन हुआ कि 7वीं शताब्दी में जब कोई so called civilization नहीं थी या दावत देने के लिए कोई material support नहीं था। कोई रेल नहीं कोई कार नहीं। तब कोई भी कंप्यूटर या आईपैड नहीं हुआ करते थे। है ना? लेकिन केवल 23 सालों में, बस 23 सालों में वो दावत की ख़ातिर कैसे सफ़र किया करते थे?
मक्का से मदीना सफ़र किया करते, लगभग हर रोज़ दावत देते और अंत में फ़तह मक्का जिसने मक्का पर नियंत्रण दिया। ये सबकुछ बेहद शानदार था। इस्लाम अपनाने से पहले और बाद में आपने ख़ुद में कैसा फ़र्क़ महसूस किया? हाँ! तो जो फ़र्क़ आया, उसे अगर मैं एक शब्द में बताऊँ तो वो है - दिल और दिमाग़ का सुकून। अल्लाह जो भी तय करता है अच्छा होता है। हमें अंजाम का कुछ पता नहीं होता। क्यूंकि वो पूरी तस्वीर को देख सकता है जबकि इंसान तस्वीर का एक छोटा सा भाग ही देख पाता है। तो उस छोटे से भाग के perspective से देखें तो हो सकता है कि लगे कि कुछ बुरा हुआ है लेकिन जब हम 10 साल 15 साल बाद पलटकर देखें तो हमें सही मतलब पता चलेगा कि ऐसा क्यों हुआ?
अब इसे ऐसे देखें - ये ज़िंदगी, अभी चूँकि IT और तेज़ी से बदलता समाज और सबकुछ जो बदलता हो उनका तेज़ी से बदलना, वित्तीय बदलाव जैसे हमारे बिज़नेस में आने वाले उतार चढ़ाव। हमारी सेहत, जैसे COVID-19 के दौरान लोग अचानक से बीमार होते थे एवं मर जाते थे। और हमारे इंसानी समबन्धों में भी लोगों के अलग-अलग विचार है, शिकायतें है, अलग-अलग अहसास, अलग-अलग ओपिनियन है, अब तक अस्थिर है। अगर हम इन चीज़ो पर ध्यान दें तो क्या होता है?
हमारा दिल अस्थिर हो जाता है जबकि मुसलमान, हालांकि हम सब एक ऐसे माहौल में रहते है कि हम सब पांचों वक्त की नमाज़ अदा करते है। हम लगातार सर्वशक्तिमान ख़ुदा — सृष्टिकर्ता अल्लाह से जुड़ते रहते हैं, जो पुरसुकून हैं। यही वजह है कि हम दिल का सुकून हासिल कर सकते हैं। तो ये एक प्रकार का practical benefit या अगर मैं कहूँ अंदरूनी धार्मिक अनुभव है। मैं सुकून हासिल कर सकता हूँ खास तौर से अल्लाह की बनाई तक़दीर में मानकर समझे?
अल्लाह की बनाई तक़दीर, मुक़द्दर। तो ये वाक़ई में एक आरामदेह Factor है क्योंकि हमारी ज़िंदगी के दो पहलू है, अच्छा और बुरा। इंसानों के पर्सपेक्टिव में हो सकता है कुछ बुरा हो मगर मुमकिन है कि अल्लाह के लिए तो हर चीज़ अच्छी है। तो भला हम अल्लाह की तरफ़ से कुछ बुरे की उम्मीद क्यों करते है। नहीं, ये है एक असली affirmation और यक़ीन। तो आखिरकार जो हम पा सकते है वो है दिल का सुकून। कुछ भी हो, अच्छा या बुरा आप कहें - अल्हमदुलिल्लाह! तो यही सब है जो मैं सीख पाया और मुझे इस्लाम अपनाने से पहले और अभी में यही कुछ फ़र्क़ नज़र आता है।
क्या आप हमें अपने जीवन के बारें में संक्षेप में बता सकते है?
मेरा नाम क्योईचिरो सुगिमोटो है। सुगिमोटो मेरे परिवार का नाम है। ये सुगिमोटो क़बीले से संबंधित है। सुगिमोटो क़बीला दरअसल एक सामुराई क़बीला है। तो मैं सामुराई वंश से हूँ। और मैं Gifu prefecture के Seki City में जन्मा एवं पला बढ़ा। ये जापान एक मध्य भाग है। और बाद में जब मैं एक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट था। मैंने अलग-अलग cultures पर research करने के लिए cultural anthropology की पढ़ाई की। और जब मैं 19 साल का था तब मैं इस्लाम से रूबरू हुआ। और जब मैं 20 साल का था, मैंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया उसके बाद अब मैं बतौर इमाम और चिबा के चिबा इस्लामिक कल्चर सेंटर के चेयरपर्सन के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। ये tokyo के पास है। मुसलमान बनने से पहले आप किसमे आस्था रखते थे?
दरअसल मैं किसी भी धर्म में नहीं मानता था। बस नाम का बौद्ध था क्यूंकि मेरा परिवार बौद्ध था। मगर असल में कोई धर्म नहीं था बस सांस्कृतिक रूप से बौद्ध था, जैसे आम जापानी लोगों की तरह पूर्वजों का आदर करना। मैं किसी और धर्म में नहीं मानता था क्यूंकि मैं मानता था कि धर्म एक कारोबार की तरह है। यानी इसमें लोग बस अनुयायियों की संख्या को बढ़ाते है, ताकि उनसे पैसे हासिल हो सके। और इसके बाद वे ख़ुद अमीर बन जाते है। तो इस तरह से ये एक व्यवसाय की तरह है। पहले मैं ऐसे ही सोचता था। ज़्यादातर जापानी लोग सोचते है कि ये ज़िंदगी ही आखरी है। इसके बाद कुछ नहीं है। वैसे ये एक बदगुमानी है। अपने पहली बार इस्लाम के बारें में कैसे जाना?
हाँ, तो जब मैं एक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट था तो मैं एक बांग्लादेशी स्टूडेंट से मिला। वो पहला मुसलमान था जिनसे मैं मिला वो जापानी बहुत कम बोल पाता था और उसे ये बोली सीखनी थी। तो मैं उसका दोस्त बन गया क्यूंकि मैं उसके साथ अंग्रेज़ी का अभ्यास करना चाहता था। तो हम कभी साथ होते। आखिरकार हमारी अपनी ज़िंदगी के बारें में भी बातचीत अच्छी हो गई। फिर उसने मुझे गर्मी की छुट्टियों में बांग्लादेश आने की दावत दी। और मैं विभिन्न संस्कृति में रुचि रखता था। मेरे जीवन के पहले विदेशी दौरे पर मैं बांग्लादेश गया ये एक मुस्लिम मुल्क था। फिर मैंने एक बड़ा culture gap पाया क्योंकि बांग्लादेश एक बेहद गरीब मुल्क है। मैंने बहुत सी विभिन्नताएँ पाईं। रास्तों में बहुत से बच्चे मिलते थे जो गलियों में सो रहे होते थे। तो मैं बहुत हैरान था कि ये सब क्या है?
क्यूंकि सामान्यतः आपको जापान में ऐसे लोग नहीं मिलेंगे। जब मैं अपने दोस्त के घर पहुँचा, उनका परिवार, उनके parents, उनके भाइयों और बहनों ने मुझे welcome किया। और उनके यहाँ मेहनानवाज़ी और अपनापन खूब है। तो ये एक और culture shock था। क्यूंकि वे परिवार को वैल्यू देते और इज़्ज़त देते थे। उनके यहाँ extended family system है जिसे उन्हौने maintain कर रखा है। और बाद में मैं शहर से बाहरी, गांव में घूमा। वे लोग बड़े ऊर्जावान थे। मतलब बड़े ज़िंदादिल। ये कुछ ऐसा था जो जापान में नहीं मिल सकता था। क्यूंकि वहाँ सबकुछ नियंत्रित है। और वो शहरी जीवन। तो जब आप लोगों की आँखों में देखें तो जापान में बहुत से लोग मिलेंगे जिनकी आँखे मुरझाई हुई हैं। क्योंकि उनके पास ज़िंदगी का कोई मकसद नहीं है। उन्हें नहीं मालूम वे क्या कर रहे है। उन्हें कुछ नहीं पता कि ज़िंदगी का असल मक़सद क्या है। तो उन्हें नहीं मालूम कि वे काम करने के लिए जी रहे हैं या जीने के लिए काम कर रहे हैं। मुझे बांग्लादेश में अलग तरह के लोग मिले वे माली तौर पर गरीब लोग थे मगर मैं उनकी आँखें देखता था उसमे उनकी शख़्सियत का रौब दिखता था। जबकि उनमे से अक्सर लोग किसान थे और उनके लिए मैं पहला विदेशी था जिसे उन्हौने देखा था। पर उन्होंने मुझे चाय की दावत दी। वे उसे चाय कहते है। दूध की चाय और पेठा। पेठा यानि एक तरह की मिठाई। तो वे बुलाते कि आइए और खाइए। तो मैं हैरान था। जापान में ऐसा कभी नहीं हुआ। ऐसे कि आपने पहली बार किसी विदेशी को देखा और आप उन्हें अपने घर दावत दे दें। ऐसा कभी नहीं हुआ। पर मैंने ये बाग्लादेश में एक्सपीरियंस किया। तो आख़िर ऐसा क्यों है?
इस्लाम के बारें में सोचने के पीछे ये पहला नुक़्ता था। क्यूंकि मुझे पता था कि वे सब मुसलमान हैं। तो मुमकिन है कि उनका बर्ताव और उनका ढंग इस्लामी मूल्यों पर आधारित हो। बाद में जापान आकर मैंने इस्लाम के बारें में किताबें ढूँढनी शुरू कर दी। क्यूंकि ये 1996 का समय था जब इंटरनेट नहीं हुआ करता था। इसलिए कोई जानकारी लेनी हो तो मुझे लाइब्रेरी और bookstores में ही मिल सकती थी। तो मुझे जापानी भाषा का क़ुरआन मिला जो कि इस्लाम के बारें में जानकारी का मुख्य स्रोत है। तो मुझे वो मिला और मैं उसका जापानी अनुवाद पढ़ने लगा। तब मैंने कुछ unique concept समझा जैसे आख़िरत यानी मरने के बाद की ज़िन्दगी और तौहीद यानी ईश्वर का एक होना, एकेश्वरवाद ये कॉन्सेप्ट मेरे लिए बिल्कुल नए थे मैंने इसके बारें में कभी नहीं सोचा था। चूँकि जापान में लोग व्यस्त होते है तो उन्हें मरने के बाद की ज़िंदगी के बारें में सोचने का समय ही नहीं मिलता। वे तो अपने दैनिक जीवन में 1 सेकंड के लिए भी नहीं सोचते है। और ऐसा ही हाल खुदा के कॉन्सेप्ट का है। जापान में बहुदेववाद बहुत मशहूर है, polytheism। और जापान में खुदा की कोई परिभाषा नहीं है। कोई भी ये नहीं बताता कि खुदा कौन है। और ऐसे में मुझे क़ुरआन में खुदा की स्पष्ट रूप से वर्णित परिभाषा मिली। जैसे उदाहरण के लिए सुरह इख़्लास - أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ कह दो कि ख़ुदा एक है ये बिल्कुल सरल है मगर ये मेरे लिए हैरानीभरा है। ओ...
खुदा की एक परिभाषा होती है। तो इस तरह ये जानने को कि आख़िर और क्या कुछ लिखा है मैं क़ुरआन को पढ़ने में दिलचस्पी लेने लगा क्यूंकि ये लगभग 600 पन्ने की है। तो मुझे ये check करना था कि आख़िरकार सबका बनाने वाला अल्लाह हमसे क्या कहना चाहता है। इसीलिए मैंने इसे personally पढ़ा जैसे कि सबका बनाने वाला अल्लाह मुझसे personally बात कर रहा हो। एक 7वीं शताब्दी की किताब के तौर पर नहीं बल्कि आज के दौर में हमें ज़िंदगी के सबक़ सिखाने वाली किताब की तरह। मैं उत्सुक था कि शायद मैं इस किताब से कुछ सीख पाऊँ। तो इस तरह से आख़िरकार मैं आख़िरत और तौहीद के बुनियादी concept से सहमत हो गया। मैं आख़िरत के कॉन्सेप्ट से इसीलिए सहमत हुआ क्यूंकि जैसा कि मैंने पहले बताया मैं बांग्लादेश में एक cultural shock में था क्यूंकि वहाँ ग़रीबी है। सही?
तो उस वक्त मैं सोच रहा था, ये लोग गरीब क्यों है? महज इसीलिए क्यूंकि इनका जन्म एक गरीब मुल्क में हुआ इसीलिए वे गरीब हैं। मतलब, बस केवल इसीलिए कि कोई जापान में पैदा हुआ, उनकी सेहत और शिक्षा सुरक्षित है। और महज इसीलिए कि कुछ लोग बांग्लादेश में पैदा हुए, वे बेहद गरीब है। आख़िर ये सब तय करने का अधिकार किसको है?
हमारे पास ये तय करने का कोई अधिकार नहीं कि हम कहाँ जन्म लें। इसका मतलब है कि हम सबकी ज़िंदगी शुरू में एक जैसी नहीं रही है। आप इसका इनकार नहीं कर सकते। तो शुरू से ही हमारी ज़िंदगी में एक बड़ा फ़र्क़ है जिसे आप अपनी ज़िंदगी के छोटे से अरसे में एडजस्ट नहीं कर सकते। तो इसका मतलब है कि मुझे इसमें कोई इंसाफ़ नहीं दिखता। क्यूंकि बिल्कुल शुरुआत से ही कुछ चीज़ें तय है। हालांकि जब मैंने क़ुरआन पढ़ा तो मुझे आख़िरत का कॉन्सेप्ट मिला। उसके बाद ये समझ में आया। क्यूंकि हमें इस ज़िंदगी में जो कुछ मिला है वो महज एक आज़माइश है। चाहे आपको ज़्यादा मिला हो या कम इसका फाइनल result से कोई लेना देना नहीं है। जैसे मान लीजिए कि भले ही कोई बांग्लादेश में पैदा हुआ और उसकी कंडीशन बुरी थी फिर भी अगर वे अपनी ज़िंदगी में अच्छे काम कर रहे हैं तो उनकी ज़िंदगी आख़िरत में सुरक्षित रहेगी। जिसका मतलब है कि वे जन्नत जाएँगे जहाँ वे हमेशा ज़िंदा रहेंगे। और जब हम इस ज़िंदगी के बारें में सोचें तो ये ज़्यादा से ज़्यादा 100 साल होगी मगर हमेशा की ज़िंदगी बेइंतहा होगी, है ना?
जब हम 100 सालों की तुलना अनंत से करें तो ये तो कुछ भी नहीं है। एक सेकंड से भी कम। इसी वजह से आख़िरत का ये इंसाफ़ हमें इस ज़िंदगी में एक मकसद देता है। वो कौन सी वजह थी जिससे आपने इस्लाम अपनाने का फैसला लिया? किस चीज़ ने आपको यह सोचने पर मजबूर किया कि मुझे मुसलमान बन जाना चाहिए? क्या आपने ध्यान दिया? इस वीडियो को देखते समय आपको कोई विज्ञापन नहीं देखना पड़ा। चूंकि Towards Eternity एक अलाभकारी संगठन है, हम यह वीडियो केवल आपके समर्थन से बना सकते हैं। यदि आप इस नेक काम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो Towards Eternity को दान करें और इस सुनहरे अवसर को न गँवाएँ। वो कौन सी वजह थी जिससे आपने इस्लाम अपनाने का फैसला लिया? किस चीज़ ने आपको यह सोचने पर मजबूर किया कि मुझे मुसलमान बन जाना चाहिए?
जैसा कि मैंने दो concepts की चर्चा की, आख़िरत का कॉन्सेप्ट और तौहीद वाक़ई में मेरी समझ में आता है। हालांकि इसके बाद भी मैं 600 से अधिक पन्नों में लिखे के क़ुरआन को खंगालता रहा। तो मैं सावधानीपूर्वक check करता कि क्या इसमें कोई खतरनाक या अजीब सीख तो नहीं दी गई है। मैं जितना पढ़ता गया उतना ही समझ में आता रहा कि ये तो मेरे लिए काफ़ी स्वाभाविक है। ये तो कुछ ऐसा है जिसमे हमें मानना चाहिए और अमल करना चाहिए। आख़िरकार मैंने महसूस किया कि ये क़ुरआन इंसान की तरफ़ से नहीं है। ये रचयिता या अल्लाह की तरफ़ से आया हुआ जान पड़ता है। तो इस तरह मेरा ये यक़ीन मज़बूत होता गया कि क़ुरआन ज़िंदगी बदलने वाली किताब है। और मुझे इसका पालन करना चाहिए। क्यूंकि मुझे लगता है कि इस्लाम केवल किताब यानी क़ुरान पढ़ने का नाम नहीं है बल्कि ये तो अमल और धार्मिक अनुभव हासिल करने की चीज़ है। तो मुझे ये जिज्ञासा हुई कि मुसलमान कैसा महसूस करते है और इस्लाम को अपनी निजी ज़िंदगी में कैसे मानते है। और ये कि मुझे इस तरह की अंदरूनी जानकारियाँ कैसे मिलेगी। कैसे?
बस एक ही रास्ता था कि मुझे ख़ुद मुसलमान बनना होगा। मुझे ख़ुद ही इस्लाम को experience करना होगा। वरना एक तीसरे इंसान के तौर पर, एक रिसर्चर के तौर पर अगर आप ऑब्जेक्टिविटी की ख़ातिर ख़ुद को दूर रखते है और बस रिसर्च करते है तो आपको इस्लाम का अंदरूनी पहलू समझ में नहीं आने वाला। ये रिसर्चर नहीं जान सकता। मैं उस इल्म को हासिल करना चाहता था। यही वजह थी कि शायद out of curioucity मैं मुसलमान बनना चाहता था। ये जानने के लिए कि असल में इस्लाम है क्या? वो बड़ी कठिनाइयों कौन सी थीं जिनका आपने इस्लाम अपनाने के बाद सामना किया? हाँ, तो पहला है हलाल खाना। ऐसी दिक्कत 28 साल पहले थी। अब तो हाल में अल्हमदुलिल्लाह हमारे पास हलाल के बहुत से विकल्प हैं। पर उन दिनों लगभग...
यहाँ तक कि मुसलमानों के लिए भी हलाल खाना मिलना मुश्किल होता था। तो ये सबसे पहली कठिनाई थी। दूसरी है इबादत के लिए जगह की दिक्कत। उन दिनों मुझे याद है, पूरे जापान में केवल 7 मस्जिदें थीं। आज यहाँ 151 है। 151 से ज़्यादा मस्जिदें। इसलिए इबादत कैसे की जाये ये भी एक कठिनाई थी। एक अन्य कठिनाई जापानी ग़ैर-मुस्लिमों में मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रह को लेकर रही है। तो बिल्कुल, लोगों में 'इस्लाम क्या है' को लेकर कुछ खास समझ नहीं पाई जाती। जैसे पिछले 20 सालों से मैंने अपने parents को इस्लाम समझाने की कोशिश की। हालांकि, मुझे लगता है कि ज़्यादातर मामलों में सितंबर 11, आतंकवाद इत्यादि के कारण वे इस्लाम के बारें में नहीं सुनना चाहते थे। बल्कि उनके ज़हनों में नकारात्मक छवि थी। पर मैं समझाना चाहता था। जब कभी हम मिलते, मैं इस्लाम का परिचय करवाता। पर वे वाक़ई में परवाह नहीं करते। लेकिन मैंने इसे जारी रखा...
मैं ज़िंद नहीं करता पर मैंने ये बताना जारी रखा कि किस तरह इस्लाम खूबसूरत और तार्किक है। हालांकि वे इसे नापसंद करने लगे। तो एक दिन जब वे हमारे hometown Gifu से चिबा आए मेरे पिता ने कहा - लो फिर से मेरा बेटा इस्लाम की बातें कर रहा है और बस वो आए, बस कुछ मिनटों के लिए और उसके बाद वे चले गए। क्यूंकि वे इस्लाम के बारें में कुछ भी नहीं सुनना चाहते थे। तो हमारे संबंध ख़राब हो गए। मैं सोचने लगा कि इसे कैसे सुलझाया जाए। मैं अलग-अलग रास्ते सोच रहा था। जैसे - मुझे उन्हें खुश करने के लिए कोई गिफ्ट भेजना होगा। मेरे पिता के लिए - उनको कॉफ़ी देकर, उन्हें ये पसंद था। और कुछ नमकीन कुछ मेवे, क्योंकि ये उन्हें पसंद था। तो मैं भेजता रहा। हाँ!
वो खुश हो गए और हमें फिर से अपने गाँव आने के लिए इजाज़त दे दी। तो हमने चिबा से अपने गाँव का दौरा किया। फिर मेरे पैरेंट्स ने बताया कि उन्हें घर को लेकर कुछ उलझनें है। इस पुरातन घर की देखभाल कौन करेगा जो हमें हमारे दादा से विरासत में मिला था। आमतौर पर जापान में पहला बेटा इसका ख्याल रखता है। जिसका अर्थ हुआ कि ये मुझे करना होगा। मैंने कहा आप फ़िक्र न करें मैं इस घर की देखभाल करूँगा। तो इस तरह मैंने उनकी उलझनें दूर कर दी। दूसरी उलझन या कहें परेशानी उनके स्वास्थ्य को लेकर थी। क्यूंकि तबतक वो 75 साल के हो चुके थे। तो अगर उनको अस्पताल में भर्ती होना पड़े, जैसे अगर उन्हें पैरालिसिस हो गया या ऐसा कुछ, जो कि सामान्य स्थिति नहीं है तब क्या किया जाए?
इसपर मैंने कहा कि आपलोग फ़िक्र न करें, हम आपका ख्याल रखने वाले है। और हमने उनकी एक और उलझन दूर कर दी। फिर मेरे पिता ने मुझे एक सवाल पूछा - तुमने दाढ़ी क्यों रखी है? दाढ़ी! समझे? तो ये एक दिलचस्प सवाल था और ये इस्लाम से संबंधित था। और ये एक ऐसा सवाल था जिसका शायद मुझे इंतज़ार था। मतलब ऐसा सवाल जिसका जवाब मैं सीधे सीधे न दूँ बल्कि ये कहकर दूँ कि आपका सवाल समझने और इसका सटीक जवाब देने के लिए मुझे आपको इस्लाम की बुनियादों की व्याख्या करने की ज़रूरत पड़ेगी। तो क्या आपके पास 10 मिनट हैं? इसपर मेरे पिता ने कहा - ठीक है। जिसका मतलब था कि मेरे पास मौक़ा था कि मैं इस्लाम के बारें में बात करूँ भले ही वो केवल 10 मिनिट्स ही हों। अल्हमदुलिल्लाह!
पहले तो उन्हें ये 1 लम्हे के लिए भी पसंद नहीं था और अब मेरे पास 10 मिनट है। अल्हमदुलिल्लाह! मुझे वो बातें करनी थी जो मुझे करनी चाहिए थी। तो जैसा कि आप जानते है, हमारे पास GORAP मेथड है - Existence of God, Oneness of God, revelation, और Prophethood. ये सभी ज़रूरी parts . मैं पहले से प्रशिक्षित था तो मैंने बस बात की। आसान जापानी भाषा में। फिर वे सुनते रहे, मेरी माँ भी सुन रही थीं। तो इन सब के बाद आखिरकार मेरे पिता ने मुझसे पूछा - तुम क्या चाहते हो? अन्ततः, वो बोले - तुम चाहते क्या हो? तब उस समय मेरी बीवी जो मेरे पास ही थी और सुन रही थी, उसने महसूस किया कि कुछ बात बनी है। तो वो बोली - मैं चाहती हूँ कि आप जन्नत में हमारे साथ आएँ। मेरी बीवी ने ऐसा ही कहा। तो वो बोले - कैसे? आख़िर कैसे?
तो इसी वजह से मैंने कहा कि क्या आप कलमा पढ़ेंगे? क्यूंकि GORAP मेथड का तो मकसद ही कलमा पढ़वाना है। ये समझाना कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं है और मुहम्मद (स.अ.व.) अल्लाह के नबी हैं। यही बात है। जिसे मैं पहले ही समझा चुका था और उन्हें जैसे भी हो ये बात समझ में आ गई थी। तो बस जो रह गया था वो था इसे स्वीकार करना या गवाही देना। इसी करण मैं क्या चाहता था? ये कि वो गवाही दें। जिसके बारें में मैंने अभी समझाया। तो मेरी माँ और मेरे पिता दोनों ने एक दूसरे को देखा और कहा - ठीक है। Wow!
ठीक है हम बोल देंगे हम कलमा पढ़ लेंगे। ये सच में सबसे ज़्यादा ख़ुशी का लम्हा था। फिर मेरी बीवी और मैंने तुरंत ही सजदा-ए-शुक्र अदा किया। हाँ, ये ये नतीजे चौकाने वाले थे, वाक़ई में। पर जो हुआ वो तो यही था, सुबहानअल्लाह! पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के बारे में वह कौन सी बात थी, जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरे लिए तो सबसे पहली बात यही थी कि वो क़ुरआन के पैगंबर है। तो यही बहुत अहम बात थी क्यूंकि मैं क़ुरआन से बहुत प्रभावित था। तो मैं सोचता था कि आख़िर उन्होंने ये संदेश यानि क़ुरआन कैसे पहुंचाया कि जिसमे 1400 सालों के बावजूद भी कोई बदलाव नहीं आया है। इसीलिए ये तो चमत्कारिक है। और फिर उनकी महान शख़्सियत जैसे जैसे मैंने उन्हें जाना, उनकी इज़्ज़त और अक़ीदत बढ़ती गई। ये कैसे मुमकिन हुआ कि 7वीं शताब्दी में जब कोई so called civilization नहीं थी या दावत देने के लिए कोई material support नहीं था। कोई रेल नहीं कोई कार नहीं। तब कोई भी कंप्यूटर या आईपैड नहीं हुआ करते थे। है ना? लेकिन केवल 23 सालों में, बस 23 सालों में वो दावत की ख़ातिर कैसे सफ़र किया करते थे?
मक्का से मदीना सफ़र किया करते, लगभग हर रोज़ दावत देते और अंत में फ़तह मक्का जिसने मक्का पर नियंत्रण दिया। ये सबकुछ बेहद शानदार था। इस्लाम अपनाने से पहले और बाद में आपने ख़ुद में कैसा फ़र्क़ महसूस किया? हाँ! तो जो फ़र्क़ आया, उसे अगर मैं एक शब्द में बताऊँ तो वो है - दिल और दिमाग़ का सुकून। अल्लाह जो भी तय करता है अच्छा होता है। हमें अंजाम का कुछ पता नहीं होता। क्यूंकि वो पूरी तस्वीर को देख सकता है जबकि इंसान तस्वीर का एक छोटा सा भाग ही देख पाता है। तो उस छोटे से भाग के perspective से देखें तो हो सकता है कि लगे कि कुछ बुरा हुआ है लेकिन जब हम 10 साल 15 साल बाद पलटकर देखें तो हमें सही मतलब पता चलेगा कि ऐसा क्यों हुआ?
अब इसे ऐसे देखें - ये ज़िंदगी, अभी चूँकि IT और तेज़ी से बदलता समाज और सबकुछ जो बदलता हो उनका तेज़ी से बदलना, वित्तीय बदलाव जैसे हमारे बिज़नेस में आने वाले उतार चढ़ाव। हमारी सेहत, जैसे COVID-19 के दौरान लोग अचानक से बीमार होते थे एवं मर जाते थे। और हमारे इंसानी समबन्धों में भी लोगों के अलग-अलग विचार है, शिकायतें है, अलग-अलग अहसास, अलग-अलग ओपिनियन है, अब तक अस्थिर है। अगर हम इन चीज़ो पर ध्यान दें तो क्या होता है?
हमारा दिल अस्थिर हो जाता है जबकि मुसलमान, हालांकि हम सब एक ऐसे माहौल में रहते है कि हम सब पांचों वक्त की नमाज़ अदा करते है। हम लगातार सर्वशक्तिमान ख़ुदा — सृष्टिकर्ता अल्लाह से जुड़ते रहते हैं, जो पुरसुकून हैं। यही वजह है कि हम दिल का सुकून हासिल कर सकते हैं। तो ये एक प्रकार का practical benefit या अगर मैं कहूँ अंदरूनी धार्मिक अनुभव है। मैं सुकून हासिल कर सकता हूँ खास तौर से अल्लाह की बनाई तक़दीर में मानकर समझे?
अल्लाह की बनाई तक़दीर, मुक़द्दर। तो ये वाक़ई में एक आरामदेह Factor है क्योंकि हमारी ज़िंदगी के दो पहलू है, अच्छा और बुरा। इंसानों के पर्सपेक्टिव में हो सकता है कुछ बुरा हो मगर मुमकिन है कि अल्लाह के लिए तो हर चीज़ अच्छी है। तो भला हम अल्लाह की तरफ़ से कुछ बुरे की उम्मीद क्यों करते है। नहीं, ये है एक असली affirmation और यक़ीन। तो आखिरकार जो हम पा सकते है वो है दिल का सुकून। कुछ भी हो, अच्छा या बुरा आप कहें - अल्हमदुलिल्लाह! तो यही सब है जो मैं सीख पाया और मुझे इस्लाम अपनाने से पहले और अभी में यही कुछ फ़र्क़ नज़र आता है।