“मैं अवसादग्रस्त हो रहा था, इस्लाम ने मुझे बचाया”–@WAYOFLIFESQ के धर्म परिवर्तन की अविश्वसनीय कहानी
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उस औरत की याद...
जिसके बारे में मैं सोचते रहता था मैं उसे अपने दिमाग से निकाल ही नहीं पा रहा था , ब्रो। वो सच में हर वक्त 24/7 मेरे दिमाग में रहती थी मैं हाइवे पर गाड़ी चला रहा था, लगभग 75-80 मील प्रति घंटे की रफ्तार से। पैर मैंने ग्राउंड पर रख दिए हाथ यहीं स्टेयरिंग पर था। और मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। पाँच। चार। तीन। दो। एक। और उसी वक्त मुझे एहसास हुआ कि अब मुझे कुछ और गहराई और मायने रखने वाली चीज़ की तलाश करनी चाहिए। अब मैं किताबों को देखने और पढ़ने के बारे में सोचने लगा और अलग-अलग 'isms' की किताबों से मदद लेने का सोचा। तो मैंने बौद्ध धर्म को देखा, मैंने हिंदू धर्म को देखा, तौरात को देखा, इंजील को देखा, बाइबल को भी पढ़ा। लेकिन ये सब मेरी समझ में नहीं आया। फिर मैंने कुरान ऐप डाउनलोड किया। और मैंने बस उसे पढ़ना शुरू कर दिया। बीस मिनट बीत चुके है। और मैं सोचने लगा, रुको ज़रा, एक सेकंड। पिछले पच्चीस मिनटों में मैंने उस लड़की के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। ये तो हैरान कर देने वाली बात है। और फिर मेरे सामने यह आयत आई । इसे यह कैसे पता चला?
यह बात किसी भी तरह इसे पता नहीं हो सकती थी। इसे यह कैसे पता चला ? अस्सलामु अलैकुम, ब्रदर ऐस्क्यु। आपका हमारा निमंत्रण स्वीकार करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। शुक्रिया हमें आपके साथ होने की बहुत खुशी है। शुरुआत इससे करते है कि — ब्रदर ऐस्क्यु कौन हैं? थोड़ा संक्षेप में अपने बारे में बताए?
मैं बारे में ये है की मैं ब्रोंक्स का एक अनाथ बच्चा हूँ, एक बिल्कूल साधारण सा लड़का। मेरी जिंदगी की शुरुआत साधारण रही। जिंदगी में बहुत सी चीजों से गुजरा, अपने परिवार के साथ, अपने पिता के साथ। घरेलू हिंसा, अत्याचार। असल में मैं एक शरणार्थी हूँ। लोगों को यह बात ज़्यादा पता नहीं है, क्योंकि मेरे वालिद, सुभानअल्लाह, बहुत ज़्यादा अत्याचार करते थे मेरी माँ और हम पर — मुझ पर और मेरी बहनों पर। ये अत्याचार बस दिन ब दिन बढ़ता ही चला गया, और हमारी जान पर बन आई थी। एक दिन, जब वे सो रहे थे, तो हम वहां से भाग गए। आपको पता है, मैं न्यूयॉर्क में आया, न्यूयॉक में, मैं 10 सितंबर, 2001 को आया। 9/11 से कुछ घंटे पहले। और मुझे तो यह भी नहीं पता था कि 9/11 क्या है, मगर इस घटना ने मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी। देखिए, अगर आपकी त्वचा थोड़ी साँवली और आप दूसरों से थोड़े अलग दिखते, तो आपका मज़ाक उड़ाया जाता, तंग किया जाता, हर तरह की ज़िल्लत झेलनी पड़ती। जैसे मुझे याद है स्कूल का पहला दिन, हर कोई बस यही कह रहा था, "अरे, बिन लादेन कहाँ है?" सब लोग अनजान थे। आख़िरकार, वो सब बच्चे ही तो थे। उन्हें सिर्फ वही पता था जो उनके माता-पिता ने सुना था, या जो उन्हें ख़बरों से बताया जा रहा था। और उस समय इस्लामोफ़ोबिया बहुत ज़्यादा था। अगर आप सोचते हैं कि आज हालात बुरे हैं, तो उस वक़्त से आप बिल्कुल अंजान हैं । और फिर मैं भी इसे इस्लाम से जोड़ने लग गया। जैसे, ये जो चीज़ है जो मुझे इतनी परेशान कर रही है, जिससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। इस पूरे घटना का मुझसे कोई संबंध नहीं था। वो लोग मुझे उस चीज़ के लिए आरोपी ठहरा रहे थे जिससे मेरा कोई लेना-देना ही नहीं था, सही?
मैं उस चीज़ से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता था। तो इसीलिए मेरे लिए इस्लाम और आतंकवाद एक ही चीज़ थी। इस्लाम और आतंकवाद एक ही थे, मैं ऐसा ही मानता था। हाँ, मुस्लिम आतंकवादी होते हैं । हालांकि आप एक मुसलमान थे। हाँ, मैं यही मानता था। तो एक बच्चे के तौर पर, ये सब देखते हुए बड़े होना मैं इस्लाम से कोई ताल्लुक ही नहीं रखना चाहता था । लोग मुझसे पूछते कि मैं कहाँ से हूँ। मैं कहता कि मैं प्यूर्टो रिकन से हूँ। या फिर कहता कि मैं डोमिनिकन हूँ। यहाँ तक कि मैं कह देता कि मैं मैक्सिकन हूँ, मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन मैं कभी नहीं कहता कि मैं पाकिस्तानी हूँ। न्यूयॉर्क में हमारे स्कूल में मेटल डिटेक्टर्स लगे होते थे । मुझे पता है, ये थोड़ा अजीब लगता है। तो मैं ये पक्का करता था कि मेरे पास ऐसा कुछ भी न हो। क्यों?
क्योंकि अगर मशीन बज गई, तो मुझे सुनना पड़ता— "अरे, इसके पास बम है!" "अरे! ये तो आतंकवादी है!" यही मेरा nickname बन गया था। 'आतंकवादी' मेरा nickname था। अब ज़रा आप खुद को मेरी जगह एक 14 या 15 साल के बच्चे की जगह पर रखें। तो क्या आप मुसलमान बनना चाहेंगे?
बिलकुल नहीं। बिलकुल भी नहीं। मुसलमान होना ही वो सबसे बड़ी चीज़ थी जो मेरी ख़ुशी के रास्ते में रुकावट बन रही थी। मैं यही महसूस करता और मानता था। मुसलमान होना ही मेरी ख़ुशी के रास्ते में रुकावट था। मुझे इससे और दूर चला जाना चाहिए। मेरी नफ़्स जो चाहती थी, मैं वही किया। अगर मुझे कोई औरत चाहिए होती, तो मैं उसे पा लेता। अगर मुझे नशा करना होता, तो वो भी मिल जाता। देखा जाए तो, उस समय नफ़्स को सुकुन मिलता है, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसकी चाहत और बढ़ती जाती है। और यही वजह बनी, जिसने मुझे मेरी ज़िंदगी के एक गहरे डिप्रेशन के दौर में ला खड़ा किया। जिसकी वजह से मैं पूरी तरह टूट गया — वो था मेरा डिप्रेशन। और इसी वजह से मेरे दिमाग़ में आत्महत्या जैसे ख़याल आने लगे। और इसी वजहा से मैं इस्लाम से और भी ज़्यादा दूर होता चला गया। मेरी मां — सुब्हानअल्लाह — जब वो चल रही होतीं, और जब मैं उनके साथ होता, तो मैं उन्हें मुझसे आगे चलने देता, ताकि मैं उनके पास न दिखूं। ताकि लोगों को न लगे कि वो मेरी माँ हैं। ये बुरी हरकत थी ये बात कहते हुए मुझे गर्व नहीं है, लेकिन मैं सिर्फ सच बता रहा हूँ, यही वो हाल था जो मैं महसूस कर रहा था। आप जानते हैं, मेरी माँ को बहुत कुछ सहना पड़ा, मुझे याद है हम जिद्दि टीनेजरस हुआ करते थे यह चीज हममें थी और ये सारी बातें जो मैं कह रहा हूँ, जाहिलीयत और हराम है, जिनसे मेरी माँ को निपटना पड़ता था। वो मेरी माँ ही थीं जो रात भर जागती रहती थीं, जब मैं क्लबों में घूम रहा होता था। आपको पता है, जब आप घर नहीं आये हो तो लोगों को अहसास तक नहीं होता था, वल्लाही। अगर मैं जन्नत में गया, तो वो मेरी माँ की वजह से होगा। मेरी माँ ही थीं जो मेरे लिए दुआ करती थीं। वह मेरे लिए दुआ करती थी।। वो दुआ करती थीं — "या अल्लाह, इसे हिदायत दे।" और यह एक रात में नहीं हुआ। या फिर यह एक महीने में नहीं हुआ। इसमें सालों लगे। समय लगा। आपको पता है, जब वह यहाँ आई थी । उनके पास औपचारिक शिक्षा या कुछ भी नहीं था। वह गैस स्टेशन जैसे जगहों पर काम करती थी। देर रात की शिफ्टें। रात के समय, ब्रो । रात के समय। जब सबसे बुरे लोग वहाँ होते हैं। गैस स्टेशन पर एक महिला। वह वहाँ काम कर रही है, और उसका बेटा उनसे मजबूर कर रहा है कि जो भी पैसे उसे मिलते है, उससे मेरे लिए कुछ अच्छा खरीदे। आप मुझे ये क्या चीज़ दे रही हैं?
स्कूल में बच्चे मुझ पर हँसते हैं। ये कैसे स्नीकर्स है ? ओह, काश आप पढ़ी-लिखी होतीं। तुम ये कैसी माँ हो मेरी ? काश आपने थोड़ी पढ़ाई की होती। कुछ तो करतीं, ताकि हमारे लिए कुछ कमा पातीं। सोचें ज़रा। लोग मुझसे पूछते थे कि तुम्हारी माँ क्या करती हैं। मुझे अपनी माँ पर बहुत शर्म आती थी। मुझे उन पर शर्म आती थी। देखें ना, वो क्या कर रही हैं। हमारे सिर पर छत तक नहीं दे पा रहीं। नऊज़ुबिल्लाह! मैं कैसा बेटा था? उन दिनों आपकी सोच कैसी थी? क्या आप अपने अनुभव से कुछ बता सकते है? और क्या आप वाकई उस तरह की ज़िंदगी से खुश थे? आख़िरकार मुझे लगा कि मुझे वो औरत मिल गई है, जिसके साथ मैं रहना चाहता हूँ — बस यही है, सही?
लेकिन दिक्कत ये थी कि उसका पहले से ही एक बॉयफ्रेंड था। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह, उसके लिए। अल्लाह उसे सही रास्ता दिखाए और हर जगह उसकी भलाई करे। चाहे वो कोई भी हो या कहीं भी हो, क्योंकि उसी की वजह से मुझे इस्लाम अपनाने का मौका मिला। क्योंकि जब हम अलग हुए, तो मेरे दिल में उसके लिए बहुत फिलिंग्स उठने लगीं, अब मेरी फिलिंग्स उसके लिए इतनी गहरी हो गई कि, मैं सोचता, तुम इस लड़की से कब अलग हो रहे हो?
मेरा दिल इसमें बहुत ज्यादा उलझ गया था, ब्रो, और मैं सोचने लगा कि अब इसे खत्म करना ही होगा। बतोर टुवर्ड्स एटेर्निटी हमे आपका समर्थन चाहिए। हम एक चैरिटी संगठन हैं जिसका उद्देशय दस भाषाओं में इस्लाम का संदेश पूरी दुनिया तक पहुचाना है। आपके समर्थन से, आप लोगों को इस्लाम अपनाने, हराम को छोड़ने, नमाज़ पढ़ने, हिजाब पहनने, और कुरान पढ़ना सीखने जैसे कामो में। मदद कर सकते है, और इन सभी नेक कामों में भागीदार बन सकते है। इंशाअल्लाह, Towards Eternity को दान करें, और इस सुनहरे मौके को हाथ से न जाने दें। मेरा दिल इसमें बहुत ज्यादा उलझ गया था, ब्रो, और मैं सोचने लगा कि अब इसे खत्म करना ही होगा। तो मैंने इस रिश्ते को ख़त्म कर दिया, सही?
मैंने उसके साथ सब कुछ खत्म कर दिया। और मैं फिर अपने मालिक की तरफ़ लौट गया, दोबारा नशा करने के लिए। लोग ऐंटी-डिप्रेसेंट्स क्यों लेते हैं?
मैं आपको इसकी वजह बताता हूँ। क्योंकि इंसान के पास सब कुछ होता है। अगर आपके पास सब कुछ है सिवाय अल्लाह के। तो वास्तव में आपके पास कुछ भी नहीं है। आपको एह्सास होगा आपके पास कुछ भी नहीं है, क्योंकि आपके जीवन में अल्लाह नहीं हैं। मैं हाइवे पर गाड़ी चला रहा था लगभग 75 से 80 मील प्रति घंटे की रफ्तार से। पैर मैंने ग्राउंड पर रख दिए हाथ यहीं स्टेयरिंग पर था, और बस अपनी आँखें बंद कर लीं। पाँच, चार, तीन, दो, एक। मैं अभी भी जिंदा हूँ। मुझे लगा था कि गाड़ी टकरा जाएगी। । मैं चाहता था कि मेरे साथ कुछ हो जाए। क्योंकि मैं अंदर से टूट चुका था। मैं अब यह सब नहीं चाहता था। आप इस depression से बाहर कैसे निकले?
मुझे लगता है, मुझे तो यह नहीं पता था, कि मैं डिप्रेशन में था, जब तक मैं इससे बाहर नहीं निकला। तब मुझे एहसास हुआ कि मैं इतने समय से उसी से जूझ रहा था। मुझे याद है, मेरा सब्र उस वक़्त टूट गया जब यह सब कुछ मेरे लिए हद से ज़्यादा हो गया। मैं बस नाखुश था। मैं उठता... और मुझे यह पल बहुत अच्छे से याद है। मैं शावर ले रहा था। मैं बाथटब में था, शावर के नीचे। पानी चल रहा था और मैं बाथटब में बस रो रहा था। मैं रो रहा था। बाहर से देखने पर, आप समझ सकते हैं, मैंने आपको बताया था, पैसे बहुत अच्छी तरह आ रहे थे। लड़कियाँ भी भरपूर मिल रही थीं। नशा, शराब, पार्टियाँ, शोहरत—सब कुछ था। हर वो चीज़ जो मैंने सोची थी कि मुझे चाहिए, सही?
मैं मशहूर होना चाहता था, सब मुझे जानें ये चाहता था। मैं हर पार्टी की जान हुआ करता था। जब मैं आता, लोग कहते, "अरे, ये आ गया!" "दोस्तों, अब मस्ती शुरू करो!" उन्हें पता होता था कि मैं ही हूँ। वही इंसान अब अपने टॉयलेट में बैठकर रो रहा था। वही इंसान अब घर लौटते वक्त रो रहा था। और वही इंसान खुद को खत्म करना चाहता था। यही वो लोग होते हैं, जिनके बारे में जब कोई आत्महत्या करता है तो वही लोग कहते हैं "लेकिन मैंने तो अभी उससे बात की थी, वो तो बहुत खुश लग रहा था।" कोई भी इंसान आत्महत्या के विचारों को ज़ाहिर नहीं करता। ये चीज़ें ऐसे सामने नहीं आतीं। लेकिन शैतान आप पर काम कर रहा होता है क्योंकि उसके लिए यह बहुत ज़रूरी होता है कि आप खुद को खत्म कर लें। यह इसलिए बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि यह एक पर्फेक्ट , एक्सप्रेस, वीआईपी, फर्स्ट क्लास टिकट है जहन्नुम जाने का। तुम कर क्या रहे हो?
इस तरह शैतान जीत हासिल करता है। तो मैं अपने बाथटब में था और बस रो रहा था। मेरी हालत बुरी थी और मैं बस रोये जा रहा था । और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने मुझे प्रेरित किया कि मैं उससे दुआ करूँ। लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं दुआ कर रहा हूँ। मैंने बस इतना ही कहा, "अगर इस सबके आगे कुछ है, तो मुझे इस हालत से अभी निकाल दो।" जब ये सब खत्म हो जाए, मुझे जाने दो, इस जगह से निकाल कर सही रास्ता दिखा दो। ऐसे रास्ते पर जहाँ मुझे पता हो कि करना क्या है। कोई रहनुमाई, कुछ तो दे दो, ताकि मुझे ये सब दोबारा न झेलना पड़े। अगर नहीं, तो इसे अभी खत्म कर दो। अभी खत्म कर दो। मुझे इस सब से कुछ भी लेना-देना नहीं है। तो अल्हम्दुिल्लाह, उस शावर ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। मैं बाहर निकला और उसी वक़्त अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने मुझे हौसला दिया । लेकिन उस वक़्त मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था। अल्लाह ने मेरे दिल में ये बात डाली कि मैं पाकिस्तान एक सफर पर जाऊँ। मेरे परिवार वहाँ रहते हैं, तो मैंने सोचा क्यों न वहाँ चला जाऊँ?
ठीक है, बढ़िया। फिर मुझे पता चला कि मेरी माँ भी पाकिस्तान जा रही हैं। वो भी अकेले। मैंने कहा, " माँ, मुझे भी आपके साथ चलने दीजिए, प्लीज।" और उसी वक्त मुझे एहसास हुआ कि अब मुझे कुछ और गहराई और मायने रखने वाली चीज़ की तलाश करनी चाहिए। अब मैं किताबों को देखने और पढ़ने के बारे में सोचने लगा और अलग-अलग 'isms' की किताबों से मदद लेने का सोचा और यह सोचने लगा कि मैं इस तूफान से कैसे बाहर निकलूं जो मैं महसूस कर रहा हूँ। क्योंकि अब मैं समझने लगा था जो हो रहा है वो सामान्य नहीं है। ये कुछ और गहराई वाला मामला है। तो पहली किताब जिसे मैंने पढ़ना शुरू किया उसका नाम था "दि सेक्रेट"। उसमे मैनिफेस्टेशन ,पोजिटिव एनेर्जी सोच पोजिटिव रखो, सब कुछ अच्छा होगा — इस तरह के विचार थे। ऐ युनिवेर्स , मेरी मदद करो। युनिवेर्स को पुकारना, संकेतों की तलाश करना हवा चली, तो लगा — शायद कोई संकेत है। ये क्या बातें हो रही हैं?
मुझे समझ आया कि इसमें कुछ कमी है। क्योंकि मैं चाहे इसे पढ़ता रहा, मेरा depression कम नहीं हो रहा था। मैं चाहकर भी उस औरत के बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रहा था। बल्कि वे बार-बार लौट आते और उभरते रहते थे। और मुझे इससे बाहर निकलना था। तो एक दिन मैं किताबों की दुकान पर गया, और मुझे वहां बौद्ध धर्म की एक किताब मिली। जिसमें बताया गया था बौद्ध धर्म के सात सिद्धांतों के बारे में, खुशी के नियमों और इसी तरह की बातें। मैंने इन मेडिटेसन की तकनीकों को सचमुच में अपनाने की कोशिश की। लेकिन आप कैसे अपनी आँखें बंद करके इन सारी सोचो से छुटकारा पा सकते हैं, सांस पर ध्यान केंद्रित करके, सोचते हुए, इन सब चीज़ों पर ध्यान लगाकर?
लेकिन ये दूर नहीं हो रहा था, क्योंकि ये अभी भी आपके अंदर घुसता जा रहा था। आप सोचते हैं कि बस पोजिटिव सोच रखनी है। लेकिन ये काम नहीं कर रहा था।.
और इस दौरान मैंने बाइबल भी उठाई थी। फिर मैंने शुरुआत की जेनेसिस पढ़ने की, और अन्य किताबें भी पढ़ीं। तो मैं पढ़ तो रहा था, लेकिन मुझे इनमें भी कुछ कमियाँ नजर आ रही थीं। लेकिन साथ ही, यह मेरे दिल पर कोई असर नहीं कर रहा था। सच में नहीं कर रहा था। यह मुझे इस depression से बाहर नहीं निकाल पा रहा था। जो मैं महसूस कर रहा हूँ, उस औरत की यादें, जिस लड़की के बारे में मैं बार-बार सोचता रहता हूँ। जैसे मैं उसे अपने दिमाग से निकाल ही नहीं पा रहा था, ब्रो। वो सच में हर समय 24/7, हर पल मेरे दिमाग में छाई रहती थी। इस मोड़ पर आकर मैंने हार मान ली थी। मैंने सच में हार मान ली थी। मैंने कहा, ये सब बेमतलब की बातें हैं। ये सब कुछ, ये सारी बातें। बुद्धिजम — इसे भी किसी इंसान ने ही लिखा है। लोग बस दूसरों को कंट्रोल करना चाहते हैं, और धर्म तो सब झूठ है, बस यही सब है। अब मेरा दिमाग इसी तरफ जा रहा था। और उस दौरान, उस वक़्त मैं पाकिस्तान में था। और अचानक से, रमज़ान बस कुछ ही दिनों में शुरू होने वाला था। रोजे रखने का वक़्त आ गया था। फिर मेरी माँ मेरे पास आईं और उन्होंने कहा, "देखो, रमज़ान शुरू होने वाला है, और तुम रोजा रखने जा रहे हो। लेकिन कोशिश करो कि नमाज को भी शामिल करो, क्योंकि अल्लाह को सिर्फ़ तुम्हारा भूखा रहना नहीं चाहिए। उसे इसकी ज़रूरत नहीं है। कोशिश करो कि रोजे में नमाज भी शामिल करो और नमाज पढ़ो। क्योंकि अगर तुम सच में चाहते हो कि इसका असर हो, तो नमाज पढ़ो। अब मुझे पता नहीं था कि कैसे नमाज पढ़नी है। मेरी माँ ने ये बात मुझे बताई और ये बात मेरे दिल को छू गया। मैं आप की तरह नमाज पढ़ूंगा मैंने सोच लिया कि रोजे में नमाज पढ़ूंगा और ये रमज़ान का पहला दिन था। और मैंने अपने फोन में क़ुरआन की ऐप डाउनलोड कर ली। मैंने तो किताब तक नहीं ली, जैसे दूसरे लोग बुक स्टोर से ऐसी चीजें लेते हैं मैंने सोचा, "चलो ऐप ही डाउनलोड कर लेता हूँ।" और नमाज़ के बाद मैंने क़ुरान पढ़ना शुरू कर दिया। बस शुरुआत के तौर पर — जैसेसूरह अल-फातिहा। शुरू में तो मैं बस देख ही रहा था, स्रॉल कर रहा था — "अरे, यहाँ तो कितने सारे चैप्टर्स हैं। ख़ैर, कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी। तो मैंने अल-फातिहा से शुरू किया, और बस पढ़ना शुरू कर दिया। सिर्फ़ इंग्लिश में पढ़ रहा था, क्योंकि मुझे अरबी पढ़नी नहीं आती। बस पढ़ रहा था…
पढ़ता चला जा रहा था। फिर अगली सूरह पर गया। सूरह अल-बक़राह — मैं उसे पढ़ने लगा। मैं सोचने लगा, “ओह…
वाह।” बीस मिनट बीत चुके है। और मैं सोचने लगा, रुको ज़रा, एक सेकंड। पिछले पच्चीस मिनटों में मैंने उस लड़की के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। ये तो हैरान कर देने वाली बात है। ब्रदर , आप जरा समझे। यह मेरे लिए एक बड़ी बात थी। मैं ज़्यादा से ज़्यादा पाँच मिनट भी नहीं निकाल पाता था कि वो लड़की फिर से मेरे दिमाग में आ जाती है, और मैं जो कुछ भी कर रहा होता, उससे भटक जाता था। मैं सोचने लगा, रुको ज़रा, ये तो अच्छा लग रहा है। और वल्लाही, मैं कुरान का इस्तेमाल कर रहा था — नाउजुबिल्लाह — सिर्फ अपने फ़ायदे के लिए, ताकि उस लड़की को भुला सकूं, और उसके बारे में सोचना बंद कर सकूं। मैं इसका इस्तेमाल बस खुद को भटकाने के लिए कर रहा था, और सिर्फ़ इसीलिए क़ुरान का इस्तेमाल कर रहा था। कुरान मेरे लिए एक माध्यम बन गया था कि मैं उस लड़की के ख्यालों से खुद को दूर रख सकूं। अपनी एक्स के बारे में सोचने से खुद को रोकने के लिए। मैं इसका इस्तेमाल बस अपनी एक्स के बारे में न सोचने के लिए कर रहा था। तो मैं इसे पढ़ता था जैसे मुझे कोई रास्ता मिल गया हो मुझे मिल गया, हाँ मुझे रास्ता मिल गया। उसी दौरान अज़ान होती रहती थी। नमाज़ का वक्त होता था। मैं अपनी तरह से, जैसे सही समझता था, नमाज पढ़ लेता था। और मुझे बहुत उत्साह होने लगता। मैं कुरान पढ़ने लगता। मैं ऐसा क्यों होता था?
क्योंकि जब भी मैं कुरान पढ़ना बंद करता था, मेरा depression फिर वापस आ जाता था। मेरी एक्स फिर मेरे ज़हन में आ जाती थी। वो हर वक्त मेरे दिमाग में रहती थी, और मेरे अंदर फिर से वही पुराने जज़्बात लौटने लगे। तभी मैंने सोचा, नहीं, मुझे दोबारा कुरान पढ़ना शुरू करना चाहिए। ख़ैर, मैं बस चुपचाप बैठा होता था, लोग बातें कर रहे होते थे और सब कुछ चल रहा होता, लेकिन मैं तो उनकी बातों पर ध्यान भी नहीं देता था। मैं बस अपना कुरान पढ़ते रहता था। सिर्फ इसी मक़सद से पढ़ता था कि मैं उसके बारे में ना सोचूं। तर्जुमा, सही?
कुरान का तर्जुमा। मैं कुरान का तर्जुमा सिर्फ इसलिए पढ़ रहा था ताकि अपनी एक्स को भूल सकूं। तो मैं पढ़ता जा रहा था, पढ़ता जा रहा था। लेकिन जब मैं ये कर रहा था, तो अल्लाह (सुभानहू व तआला) धीरे-धीरे मेरा दिल खोल रहा था। क्योंकि मैं अब भी उसे पढ़ रहा था, सही? मैं अब भी एक इंसान था, जिसे अल्लाह ने अक़्ल और समझ दी है, जो थोड़ी-बहुत बातों को समझ सकता है, सही? और जो कुछ अल्लाह ने मेरे लिए चाहा है, उसे मैं तर्ज़ुमे से समझ सकूं, वो सब कुछ मैं उस अंग्रेज़ी कुरान के तर्ज़ुमे से पा रहा था। मैं खुद को कुरान की एक आयत पढ़ते हुए पाता, मैं उस आयत को बार-बार पढ़ता, और फिर मैं उसी पर सोचने लग जाता कि, "वाउ!
वो इस आयत में क्या फ़रमाना चाह रहे हैं?" "इस आयत का क्या मतलब है?" मैं उस सोच में खो जाता था, और बस अपने फोन को देखता रहता था। मेरा फोन बंद हो जाता था। वालपेपर, स्क्रीन भी बंद हो जाती थी। जैसे कि अगर आप फोन को लंबे समय तक बिना छूए छोड़ दें। और मुझे याद है कि यह 15 मिनट छोड़ने पर होता था। मैं अपनी ख्यालों में खोया रहता था, उस आयत के बारे में 15 मिनट तक विचार करता रहता था। जब मैं अपना फोन देखता, तब तक फोन का स्क्रीन काला हो चुका होता था। मुझे फोन चालू करना पड़ता, और पासवर्ड डालना पड़ता। मैं सोचता था, "वाह, ये तो बहुत ही असरदार बात है। इस वक्त मुझे एहसास हो रहा था कि अगर कोई किताब खुदा की तरफ से होती, तो वह यही होती। लेकिन मैं अभी पूरी तरह से यकीन नहीं कर पाया था। इसलिए मैं इसे आजमाना चाहता था नाउजुबिल्लाह, लेकिन मैं इसे आजमाना चाहता था मैं सोचता, "ठीक है, आज इसको आजमाता हूँ। मैं कुरान पढ़ने वाला नहीं हूँ। मैं नमाज भी नहीं पढ़ूंगा। मैं बस आराम करूंगा।" मैं रोजा रखूंगा, ज़ाहिर है, लेकिन मैं बस आराम करूंगा मैं कुछ भी नहीं करूँगा। भाई, मैं सच कह रहा हूँ, वल्लाहि, मैं मज़ाक नहीं कर रहा। उन दस मिनटों के भीतर जब मैं इस काम में पूरी तरह व्यस्त नहीं था, जैसे ही मैं शावर लेने गया। वे सारे ख़याल फिर से मेरे मन में लौटने लगे।। वह सारी उदासी की लहर, उस लड़की के बारे में सारी बातें, ये सब फिर से मेरे दिमाग में आने लगीं। मैंने शावर बंद किया, खुद को सुखाया, और मुझे यह किताब पढ़नी थी। यह किताब ही चाबी है। यही चाबी है। और मैं बस इसे पढ़ता रहा, और मैं पढ़ता रहा, और यह और भी विस्तार से समझ में आने लगा। और मैं सोच रहा था कि अल्लाह, सर्वशक्तिमान ईश्वर, किस तरह से इस किताब को नाजिल किया है। शायद उसने इसे बिजली की चमक से नाजिल किया, जिस तरह उसने मूसा (अलैहिस्सलाम) के समय किया था, और Ten Commandments दिए थे। मुझे नहीं पता कैसे, लेकिन पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर 'वही' नाजिल होने का विचार, मैं उस बात को समझ भी नहीं पाया था। मैं बस यही सोचता था कि अल्लाह के पास ये किताब है और वह हमसे बातें कह रहे हैं। और जब मैं इसे पढ़ता था, तो यह मुझ पर असर कर रहा होता था। फिर मेरी नज़र एक ऐसी आयत पर पड़ी, जिसने मेरे पूरे नजरिए को चुनौती दी...
और सोचने पर मजबूर किया कि मैं एक इंसान के तौर पर अपने आप को कैसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। और उस आयत में कहा गया था कि "बेशक, अल्लाह की याद में, दिलों को सुकून मिलता है।" उस वक़्त मुझे सच में ऐसा लगा कि... मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपना फोन बंद कर दिया। मैंने कहा, "मुझे इसे बंद करना होगा। मुझे नहीं पता ये क्या था। वह क्या था? वह कैसे जान गया? यह मेरे दिल में कैसे समा गया? वह कैसे जान गया कि यहीं मेरी दिल को सुकून मिलता है? आख़िर इसे कैसे पता चला?
उस पल मैंने एक फैसला कर लिया था। मुझे नहीं पता यह किताब कैसे नाज़िल हुई। मुझे इसके पीछे की प्रक्रिया का इल्म नहीं है। सच कहूं तो मुझे इसके बारे में ज़्यादा कुछ भी नहीं मालूम। लेकिन अब मुझे पूरा यकीन हो गया था — यह अल्लाह का ही कलाम है। अब रमज़ान का महीना अपने अंत की ओर बढ़ रहा था, और मेरी यात्रा भी खत्म होने वाली थी। अब मुझे न्यूयॉर्क वापस लौटकर , ज़िंदगी की सच्चाइयों का सामना करना था। अब कोई भागने की जगह नहीं थी, कोई भ्रम नहीं बचा था। कुरान से बहुत कुछ पढ़ चुका था, और अब मैं उन बातों को देख रहा था, जिनमें शराब जैसी चीज़ों का ज़िक्र था, हर तरह के नशे के बारे में बताया गया था, और ज़िना जैसी बुराइयों के बारे में चेतावनी दी गई थी। मैंने कहा , " एक सेकंड" रुको। आप समझ रहे हैं मैं डेढ़ महीने के लिए पाकिस्तान गया था। मेरे सारे दोस्त मुझसे मिलने को उत्साहित थे। जब मैं वहाँ उतरता हूँ, तो वे मुझे शराब पीने के लिए लेकर जाना चाहते हैं। वे मुझे वीड देने की कोशिश करते हैं। वे मुझे महिलाओं के पास ले जाना चाहते हैं, वे पार्टी करना चाहते हैं। और अब मैं सोच रहा हूँ मुझे अपने आप से कुछ वादे करने होंगे, ठीक है?
पहला वादा ये है कि जब मैं वापस जाऊंगा मैं इस नमाज को कभी नहीं छोड़ूंगा। मुझे तो पता नहीं कि ये नमाज क्या है, लेकिन इसमें कुछ खास ताकत है। अगला ये है कि मैं कुरान पढ़ना कभी नहीं छोड़ूंगा। उसका तर्जुमा भी मैं नहीं छोड़ूंगा। क्योंकि मैंने इन दोनों चीज़ों को जोड़ा है ताकि मैं उस लड़की को भूल सकूं और अपने depression से बाहर निकल सकूं। अल्लाह ,मेरी मदद करें। मुझे नहीं पता मैं क्या करूँगा। जब मैं वापस जाता हूँ, लोग मुझसे मिलने के लिए बहुत खुश होते हैं। वे मुझे बाहर ले जाना चाहते हैं। वो सब तरह की चीज़ें करना चाहते है। मैं उनके साथ होता हूँ, वे कहते हैं, "भाई, हम तुम्हें नशा कराएंगे।" मतलब धूम्रपान कराएंगे "चलो, आओ यहाँ।" वे कहते हैं, “ये लो, शॉट ले लो।" "वे मेरे लिए ड्रिंक भरते हैं, 1-2-3!" और मैं सोचता हूँ, "मैं ये नहीं कर सकता।" वे कहते हैं, "तुमने शॉट नहीं लिया। तुमने ड्रिंक को छुआ भी नहीं। "तू अपनी ड्रिंक को ही देखता रह रहा है। चलो यार।" "क्या तू अपनी ड्रिंक की रखवाली कर रहा है?
चल, पी ले।" मुझे नहीं पता था कि उन्हें कैसे बताऊँ। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं हार गया हूँ। मुझे बहुत बेकार महसूस हुआ। "दोस्तों, मैं अब शराब नहीं पीता।" तो मैंने नहीं पी। मैं बस ऐसा ही था, "मैं ठीक महसूस नहीं कर रहा हूँ। दोस्तों, नहीं, मेरा पेट..." ब्रो ,अभी फ्लाइट से उतरा हूँ । "मुझे नहीं पता क्या हो रहा है।" "ठीक है।" दूसरी बार जब मैं उनसे मिला, "अरे चलो स्मोक करते हैं, ये करते हैं..." चलो कुछ करते हैं, ठीक है? दोस्तों, अब भी मन नहीं कर रहा, समझो न...
और इस तरह की सभी चीज़ें। "ठीक है, कोई बात नहीं। तीसरी बार, उन्होंने मुझे बुलाना ही बंद कर दिया। उन्होंने बस मुझे बुलाना ही बंद कर दिया। मैं उन्हें बोरिंग लगने लगा। "ये तो बोरिंग है।" लेकिन मेरा एक और दोस्त था, जिससे मैंने सब कुछ साफ-साफ कह दिया। मुझे याद है, मैं कार में था। मैंने कहा, "भाई..." उसने मुझसे पूछा। बाकी किसी ने नहीं पूछा। उसने पूछा, वो बोला, "भाई, मैं नोटिस कर रहा हूँ तू अब पी नहीं रहा है। और लड़कियों के मामले में भी, तू अब वो नहीं कर रहा जो पहले किया करता था। सब कुछ ठीक है ना तेरे साथ?
सब कुछ सही चल रहा है?" मैं बोला, "भाई, मैं इस्लाम के बारे में जानने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं कुरान पढ़ रहा हूँ, और अब मुझे लगता है कि ये सब करना मेरे लिए ठीक नहीं है। "वो बोला, "सच में?" और मुझे लगा था कि ये बात बहुत शर्मिंदगी वाली होगी। लेकिन मैं यह देखकर हैरान रह गया कि वह तो इम्प्रेस्स हो गया था । लेकिन क्या पता था कि जब आप ये बात किसी से शेयर करते हैं, तो वो भी इसे लेकर सोचने लगते हैं। "आख़िर ये सब मुझे क्या दे रहा है?" तब मुझे एहसास हुआ कि ये सारे हराम काम बहुत पैसे खर्च कराते हैं। आप अल्लाह की नाराजगी मोल ले रहे हैं, उन्हें नाख़ुश करने के लिए आप पैसे खर्च कर रहे हैं। सिर्फ जहन्नुम नहीं कमा रहे, बल्कि शराब पर पैसे लगते हैं। औरतों पर पैसे लगते हैं, ड्रग्स पर पैसे लगते हैं। यहाँ तक कि वेप पर भी पैसे लगते हैं।.
लेकिन दुआ मुफ्त है। नमाज भी मुफ्त है, है ना? हज भी मुफ्त है, कुरान पढ़ना भी मुफ्त है। जिक्र भी मुफ्त है। चलो, चलो। हम हराम के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं। इन सारी चीज़ों के लिए हम पैसे दे रहे हैं, जबकि अल्लाह (सुभानहू व तआला) ने इनका हल बिल्कुल मुफ्त में दिया है। आप जानते हैं? वह अभी भी मेरा दोस्त है। वह कहता है, "देखो, हम अभी भी बाहर जा सकते हैं, तुम बस मेरा सहारा बनो। तुम बस हमारे ड्राइवर बनो और हम सब मज़े करेंगे। और हमें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि हमें पता है कि तुम सही हो और तुम अच्छे हो। मैंने कहा, ठीक है, बढ़िया। मैं घर बैठकर क्या करूंगा?
इसलिए अब मैं इन जगहों पर जाने लगा। अब मैं इन बारों और क्लबों में जाने लगा हूँ। लेकिन अब मैं नशे में नहीं रहता। इस बार मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा हूँ। मैं इन बारों में जाता हूँ, इन क्लबों में जाता हूँ। आउजुबिल्लाह, और इस बार मैं नशे में नहीं हूँ। बल्कि, मैं डेजिग्नेटेड ड्राइवर हूँ। और मैं इन सब लोगों को देख रहा था और वे सब बिखरे हुए लग रहे थे। वे सब hypnotized लग रहे थे। वे सब ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन्हें अपने वश में कर लिया हो। वे सब ऐसे लग रहे थे जैसे सब एक-दूसरे की नकल कर रहे हों। और सब एक ही दिशा में खिंचे चले आ रहे हों। और तब मुझे एहसास हुआ कि मैं यहाँ रहना ही नहीं चाहता। जैसे, ये सब बहुत ही बुरा है। और तब पता है, मैं वहाँ से बाहर निकल जाता हूँ। मैंने कहा, "भाई, तुम अपना करो, "मैं बस बाहर इंतज़ार कर लूंगा, मुझे बस नहीं चाहिए ये सब" अल्लाह ने मेरे दिल से वो चाह ही निकाल दी है कि अब मुझे वहाँ रहना भी नहीं अच्छा लगता। तो मैं बार के किनारे बैठा था। एक औरत आई और मेरे बगल में आकर बैठ गई। वो वहीं थी। और उसने मुझसे लंबी बातचीत शुरू कर दी। मुझसे बात करती रही, और मैं खुद को रोक नहीं पाया और उससे इस्लाम के बारे में बताने लगा। मैंने कहा, "मैं इस चीज़ के बारे में पढ़ रहा हूँ और ये क़यामत के दिन के बारे में है, और इसके बाद एक जन्नत है। और जब हम मरते हैं, तो हम जन्नत में जा सकते हैं, और आपको पता है कि आप इन सब चीज़ों से बाहर निकल सकते हैं। और ये एक बहुत ही खूबसूरत चीज़ है। और एक पैदा करने वाला है, और वही अकेला है। और आखिरकार तुम्हें उसी के पास वापस लौटना है, वो इस दुनिया में तुम्हें बरकतें देता है और तुम्हारी आज़माइश करता है। और ये सारी चीज़ें, और ये सब हमें हमारी असली पहचान और और मक़सद से भटका रही हैं, यह हमारी फ्रीक्वेंसी कम कर रही है। यह हमें ऐसा बनने से रोक रही है जो हम अपने बेहतर रूप में हो सकते हैं। और फिर वह रोने लगती है। बार के बाहर, वह औरत बार के पास। वह रोने लगती है। वह कहती है, "यह बहुत खूबसूरत है।" मैंने कहा, "हां ना?" उसने कहा, "मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ। मैं पूरे समय यही बात कर रहा था पूरे समय इस्लाम के बारे में बात कर रहा था। "मुझे तुमसे एक बात पूछनी है।" मैंने कहा, "पूछो।" वह बोली, "क्या तुम इसमें यकीन रखते हो?
सच में?" मैंने कहा, "हाँ।" वह बोली, "तो तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" आप जानते हो, मैंने क्या कहा?
मुझे नहीं पता। मैंने कहा, "मुझे नहीं पता।" वह बोली, "तुम यहाँ belong नहीं करते।" तुम यहाँ के नहीं हो। और यह आखिरी बार था जब मैं bar गया। और मुझे एहसास हुआ कि अल्लाह ने मेरे दिल में ये बात डाली थी कि ये जगह तुम्हारे लिए नहीं है। मैं बस घर जाकर कुरान पढ़ना चाहता था। मैं बस यही करना चाहता था। मैं कुरान का तर्जुमा पढ़ता रहा, और फिर उस औरत से दूर हो गया। जब ये बातें मेरे साथ होने लगीं, तो मुझे समझ आया कि, मेरी ज़िंदगी एक अलग तरह का बदलाव चाहती है। अगर मैं इस रास्ते पर चलना चाहता हूँ, तो मुझे ऐसे लोगों के साथ रहना होगा जो मेरे जैसे सोचते हैं और इस रास्ते पर चलना चाहते हैं। मुझे पता नहीं था कि ऐसी कोई जगह भी है जब तक मैं मस्जिद जाना शुरू नहीं किया और ऐसे लोगों से मिलना शुरू नहीं किया जो मेरी तरह सोचते थे, और जो इन बातों पर यकीन करते थे। मैंने सोचा, वाह, यह तो बढ़िया है। ऐसे ही लोग मेरे साथ होने चाहिए। सीधे-साधे शब्दों में कहूँ तो, यही मेरी कहानी है कि कैसे, अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह ने इस्लाम को मेरे दिल और ज़िन्दगी में लाया, और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने मुझे इस सब से निकाला। और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) से दुआ है कि वो मुझे सीधी राह पर कायम रखे, क्योंकि इन सब चीज़ों की तरफ़ लौटना बहुत आसान है फिर से शराब, सिगरेट और ग़लत रिश्तों की तरफ़। और अगर आप में से कोई ये सुन रहा है, तो ऐसे दोस्तों और माहौल से दूर रहिए, क्योंकि हमारे लिए जाहिलियत वाली ज़िंदगी जीना ऐसा है जैसे बाईक चलाना। हम बहुत जल्दी उसमें वापस लौट सकते हैं। इसलिए हमें अपना माहौल बदलना होगा, और ऐसे लोगों से दूरी रखनी होगी। जैसे उस शख्स की कहानी है जिसने 99 लोगों को कत्ल कर दिया था, है न?
फिर उसने 100वां कत्ल भी कर डाला, और फिर वो एक आलिम के पास सलाह लेने गया। उस आलिम ने कहा, "अल्लाह तुझे माफ कर देगा, लेकिन तुम्हें हिजरत करनी होगी।" इस माहौल से दूर हो जाओ। एक नई ज़िंदगी शुरू करो। ऐसी जगह से शुरुआत करो जहाँ लोग तुम्हारा अतीत न जानते हों, जो बार-बार उसे तुम्हारे सामने न लाएं। क्या हो गया तुझे? तूने पीना क्यों छोड़ दिया? तूने सिगरेट क्यों छोड़ दी?
नहीं-नहीं, एक बार और चल न भाई। बस - बस एक शॉट मेरे लिए भाई अरे एक सिगरेट मेरे लिए आपको इस ज़िंदगी से दूर रहना होगा। बस यही एक तरीका है कि आप इससे पूरी तरह निकल पाएंगे। नई शुरुआत करें। अपनी नीयत को बदलें । अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) से लगाव बनाएँ । अपने आप से कुछ वादे करे, और अल्लाह की तरफ लौट आएँ । वल्लाही, ये मुश्किल होगा, लेकिन इंशा'अल्लाह, अल्लाह इसे आसान बना देगा। इंशा'अल्लाह तो फिर आपकी ज़िंदगी का उद्देश्य क्या बन गया? क्या फिर आपने बाकायदा इस्लाम की दावत देना शुरू किया? क्या आप उन दिनों के बारे में भी हमें कुछ बता सकते हैं? देखिए ऐसा होता है कि आपके पास कोई ऐसी चीज़ होती है जिससे आप प्यार करते हैं और आप उसके बारे में बात करना बंद नहीं कर सकते, है ना?
यह स्वाभाविक है कि जब हम किसी चीज़ से प्यार करते हैं, तो हम उसके बारे में खोज करते हैं। यह हमारी फितरत में होता है कि जब हम किसी चीज़ की परवाह करते हैं, तो हम उसके बारे में सीखते हैं। हम उसकी गहराइयों और विस्तारों को सीखते हैं, उसके हर पहलू को समझते हैं क्योंकि हम उससे प्यार करते हैं। जब मैंने इस्लाम के बारे में सीखना शुरू किया, तो मैं बस...
अल्हम्दुलिल्लाह। अल्हम्दुलिल्लाह। माशाअल्लाह। अल्लाह के इजाजत से, उसने मेरे दिल में यह मुहब्बत डाल दी। मैं प्यार करने लगा क्योंकि मुझे पता था कि यह कितना व्यवहारिक और असरदार है क्योंकि व्यक्तिगत रूप से इस्लाम ने मुझे डिप्रेसन से बाहर निकाला। इसने मुझे बाहर निकाला। कुरान का तर्जुमा पढ़ना, कुरान पढ़ना। इसने मेरे depression को दूर किया। मैं जानता हूँ कि यह कितनी ताकतवर चीज़ है, अपने अनुभव से। और मैं जानता हूँ कि कितने लोग गुप्त रूप से depressed रहते हैं, बिना जाने, जिन्हें इस दवा की जरूरत है। उन्हें इस इलाज की जरूरत है। और अगर अल्लाह मुझे इस्तेमाल करे पूरी दुनिया तक यह पहुँचाने के लिए, भाई, क्या यही आपकी ज़िंदगी का मकसद नहीं है?
अगर ऐसा है, तो अल्लाह मुझे इस्तेमाल करे, अपनी नेमत जारी रखे मेरे ऊपर। और मुझे इस दीन को फैलाने के लिए इस्तेमाल करे, और इसे हर एक घर तक पहुँचाने दे। यहाँ तक पहुंचने में आपको कितने साल लगे?
मुझे लगता है कि अब तक 12 साल हो गए हैं। अल्हम्दुलिल्लाह। मैं अभी भी एक बच्चा हूँ। मैं अभी भी 12 साल का बच्चा हूँ, अभी थोड़ा बच्चा ही हूँ। हाँ, 12 साल हो गए। देखें, उतार-चढ़ाव तो होते रहते हैं। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह, हम दीन पर हैं, हम तौहीद पर हैं और यही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। आप अभी भी फिसलेंगे। आप अभी भी गलती करोगे। एक रात में सालों की जहालत छोड़ना आसान नहीं होता। आप फिसलेंगे, आपको आज़माइश से गुजरना होगा । लेकिन अल्लाह(सुब्हानहु व तआला) रहम करने वाला है। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) आपको माफ करेगा। तो जो भी इस जहालत के दौर से गुजर रहा है और उससे निकल रहा है, आप फिसल सकते हैं, लेकिन अल्लाह आपको माफ कर देगा। शैतान आपको यकीन दिलाएगा कि अल्लाह माफ नहीं करेगा। शैतान कहेगा, तुम्हारा खेल खत्म हो गया। भाई, तुम hypocrite हो, तुम मुनाफ़िक़ हो। लेकिन नहीं। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) उस गुनहगार से मुहब्बत करता है जो तौबा करता है। इसीलिए अल्लाह के पास लौट आओ। वह आपकी मदद करेगा। आपका दिल से शुक्रिया कि आपने अपनी कहानी हमारे साथ शेयर की। हमने आपसे बहुत कुछ सीखा। हम आपकी कहानी से बहुत प्रेरित हुए। अल्लाह आपको इन सभी कामों का अजर दे। जो आपने इस उम्मत के लिए किया है। बहुत-बहुत शुक्रिया। और देखने के लिए आप सभी का शुक्रिया। अल्लाह आप सभी को बरकत दे। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) आप सभी को तरक्की दे। और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) इस चैनल को इसका अज्र अता फरमाए। चैनल को सब्सक्राइब ज़रूर करे।
जिसके बारे में मैं सोचते रहता था मैं उसे अपने दिमाग से निकाल ही नहीं पा रहा था , ब्रो। वो सच में हर वक्त 24/7 मेरे दिमाग में रहती थी मैं हाइवे पर गाड़ी चला रहा था, लगभग 75-80 मील प्रति घंटे की रफ्तार से। पैर मैंने ग्राउंड पर रख दिए हाथ यहीं स्टेयरिंग पर था। और मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। पाँच। चार। तीन। दो। एक। और उसी वक्त मुझे एहसास हुआ कि अब मुझे कुछ और गहराई और मायने रखने वाली चीज़ की तलाश करनी चाहिए। अब मैं किताबों को देखने और पढ़ने के बारे में सोचने लगा और अलग-अलग 'isms' की किताबों से मदद लेने का सोचा। तो मैंने बौद्ध धर्म को देखा, मैंने हिंदू धर्म को देखा, तौरात को देखा, इंजील को देखा, बाइबल को भी पढ़ा। लेकिन ये सब मेरी समझ में नहीं आया। फिर मैंने कुरान ऐप डाउनलोड किया। और मैंने बस उसे पढ़ना शुरू कर दिया। बीस मिनट बीत चुके है। और मैं सोचने लगा, रुको ज़रा, एक सेकंड। पिछले पच्चीस मिनटों में मैंने उस लड़की के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। ये तो हैरान कर देने वाली बात है। और फिर मेरे सामने यह आयत आई । इसे यह कैसे पता चला?
यह बात किसी भी तरह इसे पता नहीं हो सकती थी। इसे यह कैसे पता चला ? अस्सलामु अलैकुम, ब्रदर ऐस्क्यु। आपका हमारा निमंत्रण स्वीकार करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। शुक्रिया हमें आपके साथ होने की बहुत खुशी है। शुरुआत इससे करते है कि — ब्रदर ऐस्क्यु कौन हैं? थोड़ा संक्षेप में अपने बारे में बताए?
मैं बारे में ये है की मैं ब्रोंक्स का एक अनाथ बच्चा हूँ, एक बिल्कूल साधारण सा लड़का। मेरी जिंदगी की शुरुआत साधारण रही। जिंदगी में बहुत सी चीजों से गुजरा, अपने परिवार के साथ, अपने पिता के साथ। घरेलू हिंसा, अत्याचार। असल में मैं एक शरणार्थी हूँ। लोगों को यह बात ज़्यादा पता नहीं है, क्योंकि मेरे वालिद, सुभानअल्लाह, बहुत ज़्यादा अत्याचार करते थे मेरी माँ और हम पर — मुझ पर और मेरी बहनों पर। ये अत्याचार बस दिन ब दिन बढ़ता ही चला गया, और हमारी जान पर बन आई थी। एक दिन, जब वे सो रहे थे, तो हम वहां से भाग गए। आपको पता है, मैं न्यूयॉर्क में आया, न्यूयॉक में, मैं 10 सितंबर, 2001 को आया। 9/11 से कुछ घंटे पहले। और मुझे तो यह भी नहीं पता था कि 9/11 क्या है, मगर इस घटना ने मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी। देखिए, अगर आपकी त्वचा थोड़ी साँवली और आप दूसरों से थोड़े अलग दिखते, तो आपका मज़ाक उड़ाया जाता, तंग किया जाता, हर तरह की ज़िल्लत झेलनी पड़ती। जैसे मुझे याद है स्कूल का पहला दिन, हर कोई बस यही कह रहा था, "अरे, बिन लादेन कहाँ है?" सब लोग अनजान थे। आख़िरकार, वो सब बच्चे ही तो थे। उन्हें सिर्फ वही पता था जो उनके माता-पिता ने सुना था, या जो उन्हें ख़बरों से बताया जा रहा था। और उस समय इस्लामोफ़ोबिया बहुत ज़्यादा था। अगर आप सोचते हैं कि आज हालात बुरे हैं, तो उस वक़्त से आप बिल्कुल अंजान हैं । और फिर मैं भी इसे इस्लाम से जोड़ने लग गया। जैसे, ये जो चीज़ है जो मुझे इतनी परेशान कर रही है, जिससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। इस पूरे घटना का मुझसे कोई संबंध नहीं था। वो लोग मुझे उस चीज़ के लिए आरोपी ठहरा रहे थे जिससे मेरा कोई लेना-देना ही नहीं था, सही?
मैं उस चीज़ से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता था। तो इसीलिए मेरे लिए इस्लाम और आतंकवाद एक ही चीज़ थी। इस्लाम और आतंकवाद एक ही थे, मैं ऐसा ही मानता था। हाँ, मुस्लिम आतंकवादी होते हैं । हालांकि आप एक मुसलमान थे। हाँ, मैं यही मानता था। तो एक बच्चे के तौर पर, ये सब देखते हुए बड़े होना मैं इस्लाम से कोई ताल्लुक ही नहीं रखना चाहता था । लोग मुझसे पूछते कि मैं कहाँ से हूँ। मैं कहता कि मैं प्यूर्टो रिकन से हूँ। या फिर कहता कि मैं डोमिनिकन हूँ। यहाँ तक कि मैं कह देता कि मैं मैक्सिकन हूँ, मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन मैं कभी नहीं कहता कि मैं पाकिस्तानी हूँ। न्यूयॉर्क में हमारे स्कूल में मेटल डिटेक्टर्स लगे होते थे । मुझे पता है, ये थोड़ा अजीब लगता है। तो मैं ये पक्का करता था कि मेरे पास ऐसा कुछ भी न हो। क्यों?
क्योंकि अगर मशीन बज गई, तो मुझे सुनना पड़ता— "अरे, इसके पास बम है!" "अरे! ये तो आतंकवादी है!" यही मेरा nickname बन गया था। 'आतंकवादी' मेरा nickname था। अब ज़रा आप खुद को मेरी जगह एक 14 या 15 साल के बच्चे की जगह पर रखें। तो क्या आप मुसलमान बनना चाहेंगे?
बिलकुल नहीं। बिलकुल भी नहीं। मुसलमान होना ही वो सबसे बड़ी चीज़ थी जो मेरी ख़ुशी के रास्ते में रुकावट बन रही थी। मैं यही महसूस करता और मानता था। मुसलमान होना ही मेरी ख़ुशी के रास्ते में रुकावट था। मुझे इससे और दूर चला जाना चाहिए। मेरी नफ़्स जो चाहती थी, मैं वही किया। अगर मुझे कोई औरत चाहिए होती, तो मैं उसे पा लेता। अगर मुझे नशा करना होता, तो वो भी मिल जाता। देखा जाए तो, उस समय नफ़्स को सुकुन मिलता है, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसकी चाहत और बढ़ती जाती है। और यही वजह बनी, जिसने मुझे मेरी ज़िंदगी के एक गहरे डिप्रेशन के दौर में ला खड़ा किया। जिसकी वजह से मैं पूरी तरह टूट गया — वो था मेरा डिप्रेशन। और इसी वजह से मेरे दिमाग़ में आत्महत्या जैसे ख़याल आने लगे। और इसी वजहा से मैं इस्लाम से और भी ज़्यादा दूर होता चला गया। मेरी मां — सुब्हानअल्लाह — जब वो चल रही होतीं, और जब मैं उनके साथ होता, तो मैं उन्हें मुझसे आगे चलने देता, ताकि मैं उनके पास न दिखूं। ताकि लोगों को न लगे कि वो मेरी माँ हैं। ये बुरी हरकत थी ये बात कहते हुए मुझे गर्व नहीं है, लेकिन मैं सिर्फ सच बता रहा हूँ, यही वो हाल था जो मैं महसूस कर रहा था। आप जानते हैं, मेरी माँ को बहुत कुछ सहना पड़ा, मुझे याद है हम जिद्दि टीनेजरस हुआ करते थे यह चीज हममें थी और ये सारी बातें जो मैं कह रहा हूँ, जाहिलीयत और हराम है, जिनसे मेरी माँ को निपटना पड़ता था। वो मेरी माँ ही थीं जो रात भर जागती रहती थीं, जब मैं क्लबों में घूम रहा होता था। आपको पता है, जब आप घर नहीं आये हो तो लोगों को अहसास तक नहीं होता था, वल्लाही। अगर मैं जन्नत में गया, तो वो मेरी माँ की वजह से होगा। मेरी माँ ही थीं जो मेरे लिए दुआ करती थीं। वह मेरे लिए दुआ करती थी।। वो दुआ करती थीं — "या अल्लाह, इसे हिदायत दे।" और यह एक रात में नहीं हुआ। या फिर यह एक महीने में नहीं हुआ। इसमें सालों लगे। समय लगा। आपको पता है, जब वह यहाँ आई थी । उनके पास औपचारिक शिक्षा या कुछ भी नहीं था। वह गैस स्टेशन जैसे जगहों पर काम करती थी। देर रात की शिफ्टें। रात के समय, ब्रो । रात के समय। जब सबसे बुरे लोग वहाँ होते हैं। गैस स्टेशन पर एक महिला। वह वहाँ काम कर रही है, और उसका बेटा उनसे मजबूर कर रहा है कि जो भी पैसे उसे मिलते है, उससे मेरे लिए कुछ अच्छा खरीदे। आप मुझे ये क्या चीज़ दे रही हैं?
स्कूल में बच्चे मुझ पर हँसते हैं। ये कैसे स्नीकर्स है ? ओह, काश आप पढ़ी-लिखी होतीं। तुम ये कैसी माँ हो मेरी ? काश आपने थोड़ी पढ़ाई की होती। कुछ तो करतीं, ताकि हमारे लिए कुछ कमा पातीं। सोचें ज़रा। लोग मुझसे पूछते थे कि तुम्हारी माँ क्या करती हैं। मुझे अपनी माँ पर बहुत शर्म आती थी। मुझे उन पर शर्म आती थी। देखें ना, वो क्या कर रही हैं। हमारे सिर पर छत तक नहीं दे पा रहीं। नऊज़ुबिल्लाह! मैं कैसा बेटा था? उन दिनों आपकी सोच कैसी थी? क्या आप अपने अनुभव से कुछ बता सकते है? और क्या आप वाकई उस तरह की ज़िंदगी से खुश थे? आख़िरकार मुझे लगा कि मुझे वो औरत मिल गई है, जिसके साथ मैं रहना चाहता हूँ — बस यही है, सही?
लेकिन दिक्कत ये थी कि उसका पहले से ही एक बॉयफ्रेंड था। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह, उसके लिए। अल्लाह उसे सही रास्ता दिखाए और हर जगह उसकी भलाई करे। चाहे वो कोई भी हो या कहीं भी हो, क्योंकि उसी की वजह से मुझे इस्लाम अपनाने का मौका मिला। क्योंकि जब हम अलग हुए, तो मेरे दिल में उसके लिए बहुत फिलिंग्स उठने लगीं, अब मेरी फिलिंग्स उसके लिए इतनी गहरी हो गई कि, मैं सोचता, तुम इस लड़की से कब अलग हो रहे हो?
मेरा दिल इसमें बहुत ज्यादा उलझ गया था, ब्रो, और मैं सोचने लगा कि अब इसे खत्म करना ही होगा। बतोर टुवर्ड्स एटेर्निटी हमे आपका समर्थन चाहिए। हम एक चैरिटी संगठन हैं जिसका उद्देशय दस भाषाओं में इस्लाम का संदेश पूरी दुनिया तक पहुचाना है। आपके समर्थन से, आप लोगों को इस्लाम अपनाने, हराम को छोड़ने, नमाज़ पढ़ने, हिजाब पहनने, और कुरान पढ़ना सीखने जैसे कामो में। मदद कर सकते है, और इन सभी नेक कामों में भागीदार बन सकते है। इंशाअल्लाह, Towards Eternity को दान करें, और इस सुनहरे मौके को हाथ से न जाने दें। मेरा दिल इसमें बहुत ज्यादा उलझ गया था, ब्रो, और मैं सोचने लगा कि अब इसे खत्म करना ही होगा। तो मैंने इस रिश्ते को ख़त्म कर दिया, सही?
मैंने उसके साथ सब कुछ खत्म कर दिया। और मैं फिर अपने मालिक की तरफ़ लौट गया, दोबारा नशा करने के लिए। लोग ऐंटी-डिप्रेसेंट्स क्यों लेते हैं?
मैं आपको इसकी वजह बताता हूँ। क्योंकि इंसान के पास सब कुछ होता है। अगर आपके पास सब कुछ है सिवाय अल्लाह के। तो वास्तव में आपके पास कुछ भी नहीं है। आपको एह्सास होगा आपके पास कुछ भी नहीं है, क्योंकि आपके जीवन में अल्लाह नहीं हैं। मैं हाइवे पर गाड़ी चला रहा था लगभग 75 से 80 मील प्रति घंटे की रफ्तार से। पैर मैंने ग्राउंड पर रख दिए हाथ यहीं स्टेयरिंग पर था, और बस अपनी आँखें बंद कर लीं। पाँच, चार, तीन, दो, एक। मैं अभी भी जिंदा हूँ। मुझे लगा था कि गाड़ी टकरा जाएगी। । मैं चाहता था कि मेरे साथ कुछ हो जाए। क्योंकि मैं अंदर से टूट चुका था। मैं अब यह सब नहीं चाहता था। आप इस depression से बाहर कैसे निकले?
मुझे लगता है, मुझे तो यह नहीं पता था, कि मैं डिप्रेशन में था, जब तक मैं इससे बाहर नहीं निकला। तब मुझे एहसास हुआ कि मैं इतने समय से उसी से जूझ रहा था। मुझे याद है, मेरा सब्र उस वक़्त टूट गया जब यह सब कुछ मेरे लिए हद से ज़्यादा हो गया। मैं बस नाखुश था। मैं उठता... और मुझे यह पल बहुत अच्छे से याद है। मैं शावर ले रहा था। मैं बाथटब में था, शावर के नीचे। पानी चल रहा था और मैं बाथटब में बस रो रहा था। मैं रो रहा था। बाहर से देखने पर, आप समझ सकते हैं, मैंने आपको बताया था, पैसे बहुत अच्छी तरह आ रहे थे। लड़कियाँ भी भरपूर मिल रही थीं। नशा, शराब, पार्टियाँ, शोहरत—सब कुछ था। हर वो चीज़ जो मैंने सोची थी कि मुझे चाहिए, सही?
मैं मशहूर होना चाहता था, सब मुझे जानें ये चाहता था। मैं हर पार्टी की जान हुआ करता था। जब मैं आता, लोग कहते, "अरे, ये आ गया!" "दोस्तों, अब मस्ती शुरू करो!" उन्हें पता होता था कि मैं ही हूँ। वही इंसान अब अपने टॉयलेट में बैठकर रो रहा था। वही इंसान अब घर लौटते वक्त रो रहा था। और वही इंसान खुद को खत्म करना चाहता था। यही वो लोग होते हैं, जिनके बारे में जब कोई आत्महत्या करता है तो वही लोग कहते हैं "लेकिन मैंने तो अभी उससे बात की थी, वो तो बहुत खुश लग रहा था।" कोई भी इंसान आत्महत्या के विचारों को ज़ाहिर नहीं करता। ये चीज़ें ऐसे सामने नहीं आतीं। लेकिन शैतान आप पर काम कर रहा होता है क्योंकि उसके लिए यह बहुत ज़रूरी होता है कि आप खुद को खत्म कर लें। यह इसलिए बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि यह एक पर्फेक्ट , एक्सप्रेस, वीआईपी, फर्स्ट क्लास टिकट है जहन्नुम जाने का। तुम कर क्या रहे हो?
इस तरह शैतान जीत हासिल करता है। तो मैं अपने बाथटब में था और बस रो रहा था। मेरी हालत बुरी थी और मैं बस रोये जा रहा था । और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने मुझे प्रेरित किया कि मैं उससे दुआ करूँ। लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं दुआ कर रहा हूँ। मैंने बस इतना ही कहा, "अगर इस सबके आगे कुछ है, तो मुझे इस हालत से अभी निकाल दो।" जब ये सब खत्म हो जाए, मुझे जाने दो, इस जगह से निकाल कर सही रास्ता दिखा दो। ऐसे रास्ते पर जहाँ मुझे पता हो कि करना क्या है। कोई रहनुमाई, कुछ तो दे दो, ताकि मुझे ये सब दोबारा न झेलना पड़े। अगर नहीं, तो इसे अभी खत्म कर दो। अभी खत्म कर दो। मुझे इस सब से कुछ भी लेना-देना नहीं है। तो अल्हम्दुिल्लाह, उस शावर ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। मैं बाहर निकला और उसी वक़्त अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने मुझे हौसला दिया । लेकिन उस वक़्त मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था। अल्लाह ने मेरे दिल में ये बात डाली कि मैं पाकिस्तान एक सफर पर जाऊँ। मेरे परिवार वहाँ रहते हैं, तो मैंने सोचा क्यों न वहाँ चला जाऊँ?
ठीक है, बढ़िया। फिर मुझे पता चला कि मेरी माँ भी पाकिस्तान जा रही हैं। वो भी अकेले। मैंने कहा, " माँ, मुझे भी आपके साथ चलने दीजिए, प्लीज।" और उसी वक्त मुझे एहसास हुआ कि अब मुझे कुछ और गहराई और मायने रखने वाली चीज़ की तलाश करनी चाहिए। अब मैं किताबों को देखने और पढ़ने के बारे में सोचने लगा और अलग-अलग 'isms' की किताबों से मदद लेने का सोचा और यह सोचने लगा कि मैं इस तूफान से कैसे बाहर निकलूं जो मैं महसूस कर रहा हूँ। क्योंकि अब मैं समझने लगा था जो हो रहा है वो सामान्य नहीं है। ये कुछ और गहराई वाला मामला है। तो पहली किताब जिसे मैंने पढ़ना शुरू किया उसका नाम था "दि सेक्रेट"। उसमे मैनिफेस्टेशन ,पोजिटिव एनेर्जी सोच पोजिटिव रखो, सब कुछ अच्छा होगा — इस तरह के विचार थे। ऐ युनिवेर्स , मेरी मदद करो। युनिवेर्स को पुकारना, संकेतों की तलाश करना हवा चली, तो लगा — शायद कोई संकेत है। ये क्या बातें हो रही हैं?
मुझे समझ आया कि इसमें कुछ कमी है। क्योंकि मैं चाहे इसे पढ़ता रहा, मेरा depression कम नहीं हो रहा था। मैं चाहकर भी उस औरत के बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रहा था। बल्कि वे बार-बार लौट आते और उभरते रहते थे। और मुझे इससे बाहर निकलना था। तो एक दिन मैं किताबों की दुकान पर गया, और मुझे वहां बौद्ध धर्म की एक किताब मिली। जिसमें बताया गया था बौद्ध धर्म के सात सिद्धांतों के बारे में, खुशी के नियमों और इसी तरह की बातें। मैंने इन मेडिटेसन की तकनीकों को सचमुच में अपनाने की कोशिश की। लेकिन आप कैसे अपनी आँखें बंद करके इन सारी सोचो से छुटकारा पा सकते हैं, सांस पर ध्यान केंद्रित करके, सोचते हुए, इन सब चीज़ों पर ध्यान लगाकर?
लेकिन ये दूर नहीं हो रहा था, क्योंकि ये अभी भी आपके अंदर घुसता जा रहा था। आप सोचते हैं कि बस पोजिटिव सोच रखनी है। लेकिन ये काम नहीं कर रहा था।.
और इस दौरान मैंने बाइबल भी उठाई थी। फिर मैंने शुरुआत की जेनेसिस पढ़ने की, और अन्य किताबें भी पढ़ीं। तो मैं पढ़ तो रहा था, लेकिन मुझे इनमें भी कुछ कमियाँ नजर आ रही थीं। लेकिन साथ ही, यह मेरे दिल पर कोई असर नहीं कर रहा था। सच में नहीं कर रहा था। यह मुझे इस depression से बाहर नहीं निकाल पा रहा था। जो मैं महसूस कर रहा हूँ, उस औरत की यादें, जिस लड़की के बारे में मैं बार-बार सोचता रहता हूँ। जैसे मैं उसे अपने दिमाग से निकाल ही नहीं पा रहा था, ब्रो। वो सच में हर समय 24/7, हर पल मेरे दिमाग में छाई रहती थी। इस मोड़ पर आकर मैंने हार मान ली थी। मैंने सच में हार मान ली थी। मैंने कहा, ये सब बेमतलब की बातें हैं। ये सब कुछ, ये सारी बातें। बुद्धिजम — इसे भी किसी इंसान ने ही लिखा है। लोग बस दूसरों को कंट्रोल करना चाहते हैं, और धर्म तो सब झूठ है, बस यही सब है। अब मेरा दिमाग इसी तरफ जा रहा था। और उस दौरान, उस वक़्त मैं पाकिस्तान में था। और अचानक से, रमज़ान बस कुछ ही दिनों में शुरू होने वाला था। रोजे रखने का वक़्त आ गया था। फिर मेरी माँ मेरे पास आईं और उन्होंने कहा, "देखो, रमज़ान शुरू होने वाला है, और तुम रोजा रखने जा रहे हो। लेकिन कोशिश करो कि नमाज को भी शामिल करो, क्योंकि अल्लाह को सिर्फ़ तुम्हारा भूखा रहना नहीं चाहिए। उसे इसकी ज़रूरत नहीं है। कोशिश करो कि रोजे में नमाज भी शामिल करो और नमाज पढ़ो। क्योंकि अगर तुम सच में चाहते हो कि इसका असर हो, तो नमाज पढ़ो। अब मुझे पता नहीं था कि कैसे नमाज पढ़नी है। मेरी माँ ने ये बात मुझे बताई और ये बात मेरे दिल को छू गया। मैं आप की तरह नमाज पढ़ूंगा मैंने सोच लिया कि रोजे में नमाज पढ़ूंगा और ये रमज़ान का पहला दिन था। और मैंने अपने फोन में क़ुरआन की ऐप डाउनलोड कर ली। मैंने तो किताब तक नहीं ली, जैसे दूसरे लोग बुक स्टोर से ऐसी चीजें लेते हैं मैंने सोचा, "चलो ऐप ही डाउनलोड कर लेता हूँ।" और नमाज़ के बाद मैंने क़ुरान पढ़ना शुरू कर दिया। बस शुरुआत के तौर पर — जैसेसूरह अल-फातिहा। शुरू में तो मैं बस देख ही रहा था, स्रॉल कर रहा था — "अरे, यहाँ तो कितने सारे चैप्टर्स हैं। ख़ैर, कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी। तो मैंने अल-फातिहा से शुरू किया, और बस पढ़ना शुरू कर दिया। सिर्फ़ इंग्लिश में पढ़ रहा था, क्योंकि मुझे अरबी पढ़नी नहीं आती। बस पढ़ रहा था…
पढ़ता चला जा रहा था। फिर अगली सूरह पर गया। सूरह अल-बक़राह — मैं उसे पढ़ने लगा। मैं सोचने लगा, “ओह…
वाह।” बीस मिनट बीत चुके है। और मैं सोचने लगा, रुको ज़रा, एक सेकंड। पिछले पच्चीस मिनटों में मैंने उस लड़की के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। ये तो हैरान कर देने वाली बात है। ब्रदर , आप जरा समझे। यह मेरे लिए एक बड़ी बात थी। मैं ज़्यादा से ज़्यादा पाँच मिनट भी नहीं निकाल पाता था कि वो लड़की फिर से मेरे दिमाग में आ जाती है, और मैं जो कुछ भी कर रहा होता, उससे भटक जाता था। मैं सोचने लगा, रुको ज़रा, ये तो अच्छा लग रहा है। और वल्लाही, मैं कुरान का इस्तेमाल कर रहा था — नाउजुबिल्लाह — सिर्फ अपने फ़ायदे के लिए, ताकि उस लड़की को भुला सकूं, और उसके बारे में सोचना बंद कर सकूं। मैं इसका इस्तेमाल बस खुद को भटकाने के लिए कर रहा था, और सिर्फ़ इसीलिए क़ुरान का इस्तेमाल कर रहा था। कुरान मेरे लिए एक माध्यम बन गया था कि मैं उस लड़की के ख्यालों से खुद को दूर रख सकूं। अपनी एक्स के बारे में सोचने से खुद को रोकने के लिए। मैं इसका इस्तेमाल बस अपनी एक्स के बारे में न सोचने के लिए कर रहा था। तो मैं इसे पढ़ता था जैसे मुझे कोई रास्ता मिल गया हो मुझे मिल गया, हाँ मुझे रास्ता मिल गया। उसी दौरान अज़ान होती रहती थी। नमाज़ का वक्त होता था। मैं अपनी तरह से, जैसे सही समझता था, नमाज पढ़ लेता था। और मुझे बहुत उत्साह होने लगता। मैं कुरान पढ़ने लगता। मैं ऐसा क्यों होता था?
क्योंकि जब भी मैं कुरान पढ़ना बंद करता था, मेरा depression फिर वापस आ जाता था। मेरी एक्स फिर मेरे ज़हन में आ जाती थी। वो हर वक्त मेरे दिमाग में रहती थी, और मेरे अंदर फिर से वही पुराने जज़्बात लौटने लगे। तभी मैंने सोचा, नहीं, मुझे दोबारा कुरान पढ़ना शुरू करना चाहिए। ख़ैर, मैं बस चुपचाप बैठा होता था, लोग बातें कर रहे होते थे और सब कुछ चल रहा होता, लेकिन मैं तो उनकी बातों पर ध्यान भी नहीं देता था। मैं बस अपना कुरान पढ़ते रहता था। सिर्फ इसी मक़सद से पढ़ता था कि मैं उसके बारे में ना सोचूं। तर्जुमा, सही?
कुरान का तर्जुमा। मैं कुरान का तर्जुमा सिर्फ इसलिए पढ़ रहा था ताकि अपनी एक्स को भूल सकूं। तो मैं पढ़ता जा रहा था, पढ़ता जा रहा था। लेकिन जब मैं ये कर रहा था, तो अल्लाह (सुभानहू व तआला) धीरे-धीरे मेरा दिल खोल रहा था। क्योंकि मैं अब भी उसे पढ़ रहा था, सही? मैं अब भी एक इंसान था, जिसे अल्लाह ने अक़्ल और समझ दी है, जो थोड़ी-बहुत बातों को समझ सकता है, सही? और जो कुछ अल्लाह ने मेरे लिए चाहा है, उसे मैं तर्ज़ुमे से समझ सकूं, वो सब कुछ मैं उस अंग्रेज़ी कुरान के तर्ज़ुमे से पा रहा था। मैं खुद को कुरान की एक आयत पढ़ते हुए पाता, मैं उस आयत को बार-बार पढ़ता, और फिर मैं उसी पर सोचने लग जाता कि, "वाउ!
वो इस आयत में क्या फ़रमाना चाह रहे हैं?" "इस आयत का क्या मतलब है?" मैं उस सोच में खो जाता था, और बस अपने फोन को देखता रहता था। मेरा फोन बंद हो जाता था। वालपेपर, स्क्रीन भी बंद हो जाती थी। जैसे कि अगर आप फोन को लंबे समय तक बिना छूए छोड़ दें। और मुझे याद है कि यह 15 मिनट छोड़ने पर होता था। मैं अपनी ख्यालों में खोया रहता था, उस आयत के बारे में 15 मिनट तक विचार करता रहता था। जब मैं अपना फोन देखता, तब तक फोन का स्क्रीन काला हो चुका होता था। मुझे फोन चालू करना पड़ता, और पासवर्ड डालना पड़ता। मैं सोचता था, "वाह, ये तो बहुत ही असरदार बात है। इस वक्त मुझे एहसास हो रहा था कि अगर कोई किताब खुदा की तरफ से होती, तो वह यही होती। लेकिन मैं अभी पूरी तरह से यकीन नहीं कर पाया था। इसलिए मैं इसे आजमाना चाहता था नाउजुबिल्लाह, लेकिन मैं इसे आजमाना चाहता था मैं सोचता, "ठीक है, आज इसको आजमाता हूँ। मैं कुरान पढ़ने वाला नहीं हूँ। मैं नमाज भी नहीं पढ़ूंगा। मैं बस आराम करूंगा।" मैं रोजा रखूंगा, ज़ाहिर है, लेकिन मैं बस आराम करूंगा मैं कुछ भी नहीं करूँगा। भाई, मैं सच कह रहा हूँ, वल्लाहि, मैं मज़ाक नहीं कर रहा। उन दस मिनटों के भीतर जब मैं इस काम में पूरी तरह व्यस्त नहीं था, जैसे ही मैं शावर लेने गया। वे सारे ख़याल फिर से मेरे मन में लौटने लगे।। वह सारी उदासी की लहर, उस लड़की के बारे में सारी बातें, ये सब फिर से मेरे दिमाग में आने लगीं। मैंने शावर बंद किया, खुद को सुखाया, और मुझे यह किताब पढ़नी थी। यह किताब ही चाबी है। यही चाबी है। और मैं बस इसे पढ़ता रहा, और मैं पढ़ता रहा, और यह और भी विस्तार से समझ में आने लगा। और मैं सोच रहा था कि अल्लाह, सर्वशक्तिमान ईश्वर, किस तरह से इस किताब को नाजिल किया है। शायद उसने इसे बिजली की चमक से नाजिल किया, जिस तरह उसने मूसा (अलैहिस्सलाम) के समय किया था, और Ten Commandments दिए थे। मुझे नहीं पता कैसे, लेकिन पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर 'वही' नाजिल होने का विचार, मैं उस बात को समझ भी नहीं पाया था। मैं बस यही सोचता था कि अल्लाह के पास ये किताब है और वह हमसे बातें कह रहे हैं। और जब मैं इसे पढ़ता था, तो यह मुझ पर असर कर रहा होता था। फिर मेरी नज़र एक ऐसी आयत पर पड़ी, जिसने मेरे पूरे नजरिए को चुनौती दी...
और सोचने पर मजबूर किया कि मैं एक इंसान के तौर पर अपने आप को कैसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। और उस आयत में कहा गया था कि "बेशक, अल्लाह की याद में, दिलों को सुकून मिलता है।" उस वक़्त मुझे सच में ऐसा लगा कि... मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपना फोन बंद कर दिया। मैंने कहा, "मुझे इसे बंद करना होगा। मुझे नहीं पता ये क्या था। वह क्या था? वह कैसे जान गया? यह मेरे दिल में कैसे समा गया? वह कैसे जान गया कि यहीं मेरी दिल को सुकून मिलता है? आख़िर इसे कैसे पता चला?
उस पल मैंने एक फैसला कर लिया था। मुझे नहीं पता यह किताब कैसे नाज़िल हुई। मुझे इसके पीछे की प्रक्रिया का इल्म नहीं है। सच कहूं तो मुझे इसके बारे में ज़्यादा कुछ भी नहीं मालूम। लेकिन अब मुझे पूरा यकीन हो गया था — यह अल्लाह का ही कलाम है। अब रमज़ान का महीना अपने अंत की ओर बढ़ रहा था, और मेरी यात्रा भी खत्म होने वाली थी। अब मुझे न्यूयॉर्क वापस लौटकर , ज़िंदगी की सच्चाइयों का सामना करना था। अब कोई भागने की जगह नहीं थी, कोई भ्रम नहीं बचा था। कुरान से बहुत कुछ पढ़ चुका था, और अब मैं उन बातों को देख रहा था, जिनमें शराब जैसी चीज़ों का ज़िक्र था, हर तरह के नशे के बारे में बताया गया था, और ज़िना जैसी बुराइयों के बारे में चेतावनी दी गई थी। मैंने कहा , " एक सेकंड" रुको। आप समझ रहे हैं मैं डेढ़ महीने के लिए पाकिस्तान गया था। मेरे सारे दोस्त मुझसे मिलने को उत्साहित थे। जब मैं वहाँ उतरता हूँ, तो वे मुझे शराब पीने के लिए लेकर जाना चाहते हैं। वे मुझे वीड देने की कोशिश करते हैं। वे मुझे महिलाओं के पास ले जाना चाहते हैं, वे पार्टी करना चाहते हैं। और अब मैं सोच रहा हूँ मुझे अपने आप से कुछ वादे करने होंगे, ठीक है?
पहला वादा ये है कि जब मैं वापस जाऊंगा मैं इस नमाज को कभी नहीं छोड़ूंगा। मुझे तो पता नहीं कि ये नमाज क्या है, लेकिन इसमें कुछ खास ताकत है। अगला ये है कि मैं कुरान पढ़ना कभी नहीं छोड़ूंगा। उसका तर्जुमा भी मैं नहीं छोड़ूंगा। क्योंकि मैंने इन दोनों चीज़ों को जोड़ा है ताकि मैं उस लड़की को भूल सकूं और अपने depression से बाहर निकल सकूं। अल्लाह ,मेरी मदद करें। मुझे नहीं पता मैं क्या करूँगा। जब मैं वापस जाता हूँ, लोग मुझसे मिलने के लिए बहुत खुश होते हैं। वे मुझे बाहर ले जाना चाहते हैं। वो सब तरह की चीज़ें करना चाहते है। मैं उनके साथ होता हूँ, वे कहते हैं, "भाई, हम तुम्हें नशा कराएंगे।" मतलब धूम्रपान कराएंगे "चलो, आओ यहाँ।" वे कहते हैं, “ये लो, शॉट ले लो।" "वे मेरे लिए ड्रिंक भरते हैं, 1-2-3!" और मैं सोचता हूँ, "मैं ये नहीं कर सकता।" वे कहते हैं, "तुमने शॉट नहीं लिया। तुमने ड्रिंक को छुआ भी नहीं। "तू अपनी ड्रिंक को ही देखता रह रहा है। चलो यार।" "क्या तू अपनी ड्रिंक की रखवाली कर रहा है?
चल, पी ले।" मुझे नहीं पता था कि उन्हें कैसे बताऊँ। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं हार गया हूँ। मुझे बहुत बेकार महसूस हुआ। "दोस्तों, मैं अब शराब नहीं पीता।" तो मैंने नहीं पी। मैं बस ऐसा ही था, "मैं ठीक महसूस नहीं कर रहा हूँ। दोस्तों, नहीं, मेरा पेट..." ब्रो ,अभी फ्लाइट से उतरा हूँ । "मुझे नहीं पता क्या हो रहा है।" "ठीक है।" दूसरी बार जब मैं उनसे मिला, "अरे चलो स्मोक करते हैं, ये करते हैं..." चलो कुछ करते हैं, ठीक है? दोस्तों, अब भी मन नहीं कर रहा, समझो न...
और इस तरह की सभी चीज़ें। "ठीक है, कोई बात नहीं। तीसरी बार, उन्होंने मुझे बुलाना ही बंद कर दिया। उन्होंने बस मुझे बुलाना ही बंद कर दिया। मैं उन्हें बोरिंग लगने लगा। "ये तो बोरिंग है।" लेकिन मेरा एक और दोस्त था, जिससे मैंने सब कुछ साफ-साफ कह दिया। मुझे याद है, मैं कार में था। मैंने कहा, "भाई..." उसने मुझसे पूछा। बाकी किसी ने नहीं पूछा। उसने पूछा, वो बोला, "भाई, मैं नोटिस कर रहा हूँ तू अब पी नहीं रहा है। और लड़कियों के मामले में भी, तू अब वो नहीं कर रहा जो पहले किया करता था। सब कुछ ठीक है ना तेरे साथ?
सब कुछ सही चल रहा है?" मैं बोला, "भाई, मैं इस्लाम के बारे में जानने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं कुरान पढ़ रहा हूँ, और अब मुझे लगता है कि ये सब करना मेरे लिए ठीक नहीं है। "वो बोला, "सच में?" और मुझे लगा था कि ये बात बहुत शर्मिंदगी वाली होगी। लेकिन मैं यह देखकर हैरान रह गया कि वह तो इम्प्रेस्स हो गया था । लेकिन क्या पता था कि जब आप ये बात किसी से शेयर करते हैं, तो वो भी इसे लेकर सोचने लगते हैं। "आख़िर ये सब मुझे क्या दे रहा है?" तब मुझे एहसास हुआ कि ये सारे हराम काम बहुत पैसे खर्च कराते हैं। आप अल्लाह की नाराजगी मोल ले रहे हैं, उन्हें नाख़ुश करने के लिए आप पैसे खर्च कर रहे हैं। सिर्फ जहन्नुम नहीं कमा रहे, बल्कि शराब पर पैसे लगते हैं। औरतों पर पैसे लगते हैं, ड्रग्स पर पैसे लगते हैं। यहाँ तक कि वेप पर भी पैसे लगते हैं।.
लेकिन दुआ मुफ्त है। नमाज भी मुफ्त है, है ना? हज भी मुफ्त है, कुरान पढ़ना भी मुफ्त है। जिक्र भी मुफ्त है। चलो, चलो। हम हराम के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं। इन सारी चीज़ों के लिए हम पैसे दे रहे हैं, जबकि अल्लाह (सुभानहू व तआला) ने इनका हल बिल्कुल मुफ्त में दिया है। आप जानते हैं? वह अभी भी मेरा दोस्त है। वह कहता है, "देखो, हम अभी भी बाहर जा सकते हैं, तुम बस मेरा सहारा बनो। तुम बस हमारे ड्राइवर बनो और हम सब मज़े करेंगे। और हमें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि हमें पता है कि तुम सही हो और तुम अच्छे हो। मैंने कहा, ठीक है, बढ़िया। मैं घर बैठकर क्या करूंगा?
इसलिए अब मैं इन जगहों पर जाने लगा। अब मैं इन बारों और क्लबों में जाने लगा हूँ। लेकिन अब मैं नशे में नहीं रहता। इस बार मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा हूँ। मैं इन बारों में जाता हूँ, इन क्लबों में जाता हूँ। आउजुबिल्लाह, और इस बार मैं नशे में नहीं हूँ। बल्कि, मैं डेजिग्नेटेड ड्राइवर हूँ। और मैं इन सब लोगों को देख रहा था और वे सब बिखरे हुए लग रहे थे। वे सब hypnotized लग रहे थे। वे सब ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन्हें अपने वश में कर लिया हो। वे सब ऐसे लग रहे थे जैसे सब एक-दूसरे की नकल कर रहे हों। और सब एक ही दिशा में खिंचे चले आ रहे हों। और तब मुझे एहसास हुआ कि मैं यहाँ रहना ही नहीं चाहता। जैसे, ये सब बहुत ही बुरा है। और तब पता है, मैं वहाँ से बाहर निकल जाता हूँ। मैंने कहा, "भाई, तुम अपना करो, "मैं बस बाहर इंतज़ार कर लूंगा, मुझे बस नहीं चाहिए ये सब" अल्लाह ने मेरे दिल से वो चाह ही निकाल दी है कि अब मुझे वहाँ रहना भी नहीं अच्छा लगता। तो मैं बार के किनारे बैठा था। एक औरत आई और मेरे बगल में आकर बैठ गई। वो वहीं थी। और उसने मुझसे लंबी बातचीत शुरू कर दी। मुझसे बात करती रही, और मैं खुद को रोक नहीं पाया और उससे इस्लाम के बारे में बताने लगा। मैंने कहा, "मैं इस चीज़ के बारे में पढ़ रहा हूँ और ये क़यामत के दिन के बारे में है, और इसके बाद एक जन्नत है। और जब हम मरते हैं, तो हम जन्नत में जा सकते हैं, और आपको पता है कि आप इन सब चीज़ों से बाहर निकल सकते हैं। और ये एक बहुत ही खूबसूरत चीज़ है। और एक पैदा करने वाला है, और वही अकेला है। और आखिरकार तुम्हें उसी के पास वापस लौटना है, वो इस दुनिया में तुम्हें बरकतें देता है और तुम्हारी आज़माइश करता है। और ये सारी चीज़ें, और ये सब हमें हमारी असली पहचान और और मक़सद से भटका रही हैं, यह हमारी फ्रीक्वेंसी कम कर रही है। यह हमें ऐसा बनने से रोक रही है जो हम अपने बेहतर रूप में हो सकते हैं। और फिर वह रोने लगती है। बार के बाहर, वह औरत बार के पास। वह रोने लगती है। वह कहती है, "यह बहुत खूबसूरत है।" मैंने कहा, "हां ना?" उसने कहा, "मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ। मैं पूरे समय यही बात कर रहा था पूरे समय इस्लाम के बारे में बात कर रहा था। "मुझे तुमसे एक बात पूछनी है।" मैंने कहा, "पूछो।" वह बोली, "क्या तुम इसमें यकीन रखते हो?
सच में?" मैंने कहा, "हाँ।" वह बोली, "तो तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" आप जानते हो, मैंने क्या कहा?
मुझे नहीं पता। मैंने कहा, "मुझे नहीं पता।" वह बोली, "तुम यहाँ belong नहीं करते।" तुम यहाँ के नहीं हो। और यह आखिरी बार था जब मैं bar गया। और मुझे एहसास हुआ कि अल्लाह ने मेरे दिल में ये बात डाली थी कि ये जगह तुम्हारे लिए नहीं है। मैं बस घर जाकर कुरान पढ़ना चाहता था। मैं बस यही करना चाहता था। मैं कुरान का तर्जुमा पढ़ता रहा, और फिर उस औरत से दूर हो गया। जब ये बातें मेरे साथ होने लगीं, तो मुझे समझ आया कि, मेरी ज़िंदगी एक अलग तरह का बदलाव चाहती है। अगर मैं इस रास्ते पर चलना चाहता हूँ, तो मुझे ऐसे लोगों के साथ रहना होगा जो मेरे जैसे सोचते हैं और इस रास्ते पर चलना चाहते हैं। मुझे पता नहीं था कि ऐसी कोई जगह भी है जब तक मैं मस्जिद जाना शुरू नहीं किया और ऐसे लोगों से मिलना शुरू नहीं किया जो मेरी तरह सोचते थे, और जो इन बातों पर यकीन करते थे। मैंने सोचा, वाह, यह तो बढ़िया है। ऐसे ही लोग मेरे साथ होने चाहिए। सीधे-साधे शब्दों में कहूँ तो, यही मेरी कहानी है कि कैसे, अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह ने इस्लाम को मेरे दिल और ज़िन्दगी में लाया, और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने मुझे इस सब से निकाला। और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) से दुआ है कि वो मुझे सीधी राह पर कायम रखे, क्योंकि इन सब चीज़ों की तरफ़ लौटना बहुत आसान है फिर से शराब, सिगरेट और ग़लत रिश्तों की तरफ़। और अगर आप में से कोई ये सुन रहा है, तो ऐसे दोस्तों और माहौल से दूर रहिए, क्योंकि हमारे लिए जाहिलियत वाली ज़िंदगी जीना ऐसा है जैसे बाईक चलाना। हम बहुत जल्दी उसमें वापस लौट सकते हैं। इसलिए हमें अपना माहौल बदलना होगा, और ऐसे लोगों से दूरी रखनी होगी। जैसे उस शख्स की कहानी है जिसने 99 लोगों को कत्ल कर दिया था, है न?
फिर उसने 100वां कत्ल भी कर डाला, और फिर वो एक आलिम के पास सलाह लेने गया। उस आलिम ने कहा, "अल्लाह तुझे माफ कर देगा, लेकिन तुम्हें हिजरत करनी होगी।" इस माहौल से दूर हो जाओ। एक नई ज़िंदगी शुरू करो। ऐसी जगह से शुरुआत करो जहाँ लोग तुम्हारा अतीत न जानते हों, जो बार-बार उसे तुम्हारे सामने न लाएं। क्या हो गया तुझे? तूने पीना क्यों छोड़ दिया? तूने सिगरेट क्यों छोड़ दी?
नहीं-नहीं, एक बार और चल न भाई। बस - बस एक शॉट मेरे लिए भाई अरे एक सिगरेट मेरे लिए आपको इस ज़िंदगी से दूर रहना होगा। बस यही एक तरीका है कि आप इससे पूरी तरह निकल पाएंगे। नई शुरुआत करें। अपनी नीयत को बदलें । अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) से लगाव बनाएँ । अपने आप से कुछ वादे करे, और अल्लाह की तरफ लौट आएँ । वल्लाही, ये मुश्किल होगा, लेकिन इंशा'अल्लाह, अल्लाह इसे आसान बना देगा। इंशा'अल्लाह तो फिर आपकी ज़िंदगी का उद्देश्य क्या बन गया? क्या फिर आपने बाकायदा इस्लाम की दावत देना शुरू किया? क्या आप उन दिनों के बारे में भी हमें कुछ बता सकते हैं? देखिए ऐसा होता है कि आपके पास कोई ऐसी चीज़ होती है जिससे आप प्यार करते हैं और आप उसके बारे में बात करना बंद नहीं कर सकते, है ना?
यह स्वाभाविक है कि जब हम किसी चीज़ से प्यार करते हैं, तो हम उसके बारे में खोज करते हैं। यह हमारी फितरत में होता है कि जब हम किसी चीज़ की परवाह करते हैं, तो हम उसके बारे में सीखते हैं। हम उसकी गहराइयों और विस्तारों को सीखते हैं, उसके हर पहलू को समझते हैं क्योंकि हम उससे प्यार करते हैं। जब मैंने इस्लाम के बारे में सीखना शुरू किया, तो मैं बस...
अल्हम्दुलिल्लाह। अल्हम्दुलिल्लाह। माशाअल्लाह। अल्लाह के इजाजत से, उसने मेरे दिल में यह मुहब्बत डाल दी। मैं प्यार करने लगा क्योंकि मुझे पता था कि यह कितना व्यवहारिक और असरदार है क्योंकि व्यक्तिगत रूप से इस्लाम ने मुझे डिप्रेसन से बाहर निकाला। इसने मुझे बाहर निकाला। कुरान का तर्जुमा पढ़ना, कुरान पढ़ना। इसने मेरे depression को दूर किया। मैं जानता हूँ कि यह कितनी ताकतवर चीज़ है, अपने अनुभव से। और मैं जानता हूँ कि कितने लोग गुप्त रूप से depressed रहते हैं, बिना जाने, जिन्हें इस दवा की जरूरत है। उन्हें इस इलाज की जरूरत है। और अगर अल्लाह मुझे इस्तेमाल करे पूरी दुनिया तक यह पहुँचाने के लिए, भाई, क्या यही आपकी ज़िंदगी का मकसद नहीं है?
अगर ऐसा है, तो अल्लाह मुझे इस्तेमाल करे, अपनी नेमत जारी रखे मेरे ऊपर। और मुझे इस दीन को फैलाने के लिए इस्तेमाल करे, और इसे हर एक घर तक पहुँचाने दे। यहाँ तक पहुंचने में आपको कितने साल लगे?
मुझे लगता है कि अब तक 12 साल हो गए हैं। अल्हम्दुलिल्लाह। मैं अभी भी एक बच्चा हूँ। मैं अभी भी 12 साल का बच्चा हूँ, अभी थोड़ा बच्चा ही हूँ। हाँ, 12 साल हो गए। देखें, उतार-चढ़ाव तो होते रहते हैं। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह, हम दीन पर हैं, हम तौहीद पर हैं और यही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। आप अभी भी फिसलेंगे। आप अभी भी गलती करोगे। एक रात में सालों की जहालत छोड़ना आसान नहीं होता। आप फिसलेंगे, आपको आज़माइश से गुजरना होगा । लेकिन अल्लाह(सुब्हानहु व तआला) रहम करने वाला है। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) आपको माफ करेगा। तो जो भी इस जहालत के दौर से गुजर रहा है और उससे निकल रहा है, आप फिसल सकते हैं, लेकिन अल्लाह आपको माफ कर देगा। शैतान आपको यकीन दिलाएगा कि अल्लाह माफ नहीं करेगा। शैतान कहेगा, तुम्हारा खेल खत्म हो गया। भाई, तुम hypocrite हो, तुम मुनाफ़िक़ हो। लेकिन नहीं। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) उस गुनहगार से मुहब्बत करता है जो तौबा करता है। इसीलिए अल्लाह के पास लौट आओ। वह आपकी मदद करेगा। आपका दिल से शुक्रिया कि आपने अपनी कहानी हमारे साथ शेयर की। हमने आपसे बहुत कुछ सीखा। हम आपकी कहानी से बहुत प्रेरित हुए। अल्लाह आपको इन सभी कामों का अजर दे। जो आपने इस उम्मत के लिए किया है। बहुत-बहुत शुक्रिया। और देखने के लिए आप सभी का शुक्रिया। अल्लाह आप सभी को बरकत दे। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) आप सभी को तरक्की दे। और अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) इस चैनल को इसका अज्र अता फरमाए। चैनल को सब्सक्राइब ज़रूर करे।