मैं मुसलमानों से नफ़रत करता था… फिर इस्लाम ने मेरी ज़िंदगी बदल दी | एडुआर्डो
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मैं एक कैथोलिक-बौद्ध परिवार से हूँ। इस्लाम के बारे में मैंने पहली बार नाइन-इलेवन के वक़्त सुना। मुसलमान आतंकवादी थे। मुसलमान ख़तरनाक थे। मुहम्मद नाम का एक लड़का था, जो मेरे दिमाग़ पर थोड़ा-थोड़ा चढ़ने लगा था। 'ओए सुन, तू ग़लत आदमी से पंगा ले रहा है, और ऊपर से तू है भी मुसलमान। तो, चल, तुझे तेरी औक़ात दिखाता हूँ।' आख़िर में मैंने उसकी दोनों आँखें काली कर दीं, उसकी नाक तोड़ दी, और एक पसली भी तोड़ दी। उसकी पूरी क़मीज़ ख़ून से लथपथ थी। 'हम आपको अपने वलीमे पर बुला रहे हैं, यानी मोरक्को में हमारी शादी की दावत।' और ऊपर से वो अपने शौहर को भी साथ ले आई — सिमो मोहम्मद, जो लंबी दाढ़ी वाले एक दाई थे। और मैं वहाँ बैठा बस टीवी देखता और चैनल बदलता रहा। कोई तीन बजे रात को मैंने सुना कि वो भाई उठ रहे हैं। और फिर जैसे ही मैंने सुना 'अल्लाहु अकबर'...
मैं जम गया। मेरी जान निकल गई। क्योंकि हम सब जानते हैं कि 'अल्लाहु अकबर' के बाद क्या होता है — एक धमाका होता है। सिमो मोहम्मद का साया बड़ा होता जा रहा था, और बड़ा, और मुझे फ़र्श चरमराता सुनाई दे रहा था, और वो मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे। और मुझे याद है, उनका हाथ बहुत साफ़ और बड़ा दिखता हुआ मेरे सामने आ रहा था...
जब मैं मोरक्को से लौटा, तो इस्लाम को लेकर मेरा जोश दस गुना हो गया। कोई क़ुरआन के बारे में बकवास शुरू करता, तो मैं कहता — 'तूने आख़िरी बार किताब कब खोली थी?' 'कभी नहीं!' 'तो मुँह बंद रख।' फ़िल्म ख़त्म होते ही मैंने उसामा को फ़ोन लगाया और उससे कहा — 'उसामा, सुन भाई, मैं अब मुसलमान हूँ।' अस्सलामु अलैकुम भाई एडुआर्डो दोस आंजोस। टुवर्ड्स इटर्निटी पर हमारे साथ आने के लिए बहुत शुक्रिया। आप हमारे साथ हैं, ये हमारी ख़ुशी है। ये मेरे लिए इज़्ज़त की बात है। व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाह। शुक्रिया। ये मेरा सम्मान है। शुरू इससे करते हैं — एडुआर्डो दोस आंजोस कौन हैं?
अपनी ज़िंदगी के बारे में थोड़ा बताइए। तो मैं पैदा ब्राज़ील में हुआ, और दो साल की उम्र में कनाडा आ गया। मैं एक कैथोलिक-बौद्ध परिवार से हूँ, और मैं मुसलमानों से नफ़रत करते हुए बड़ा हुआ। और आख़िर में मुझे इस्लाम से मुहब्बत हो गई। ईमान के मामले में आपकी ज़िंदगी कैसी थी? आप किसमें यक़ीन रखते थे?
हाँ, तो मैं एक ब्राज़ीली कैथोलिक परिवार से हूँ। मेरे पिता की बात करें तो, वो थोड़े ज़्यादा ही प्रैक्टिसिंग कैथोलिक थे, पर उस क़िस्म के, जो इतवार को चर्च चले जाते हैं, और हफ़्ते भर भूल जाते हैं कि वो कैथोलिक हैं। माँ बौद्ध थीं, इसलिए हमारे घर में थोड़ा-सा बौद्ध रंग भी घुला हुआ रहता था। तो ईमान के मामले में पिता ने अपनी तरफ़ से कुछ रीमिक्स कर रखा था। उन्होंने अलग-अलग तरह के धार्मिक ख़यालों को मिला दिया था। आपसे सच कहूँ तो ईमान के मामले में मैं पूरी उलझन में ही बड़ा हुआ। मेरे लिए धर्म एक ऐसी चीज़ थी, जो बहुत उलझी हुई थी। दिलचस्प तो वो बहुत थी, पर ऐसा नहीं कि मैं उसे कुछ ज़्यादा गंभीरता से लेता। हालाँकि, ख़ुदा एक पूर्ण, सर्वशक्तिमान और महत्वपूर्ण शक्ति था, जिसे आप अपने सबसे कठिन समय में याद करते हैं, लेकिन बात इससे आगे नहीं गई। पर सच कहूँ तो, ईसाइयत को लेकर भी मुझे एक तरह की बेचैनी महसूस होती थी। चीज़ों को तार्किक रूप से समझने की जो मेरी बौद्धिक ज़रूरत थी, उस पर यह खरी नहीं उतरती थी। समझ रहे हैं ना?
तो मेरे लिए ख़ुदा के तीन होने वाली बात ही ग़लत थी। वो ऐसी चीज़ थी, जो अक़्ल में आती ही नहीं थी, बिल्कुल भी नहीं। और इस्लाम के बारे में आपने पहली बार कैसे सुना? कोई ग़लतफ़हमी थी?
तो मेरे इस्लाम क़बूल करने के क़िस्से की मज़ेदार बात ये है कि इस्लाम के बारे में मैंने पहली बार नाइन-इलेवन के वक़्त सुना। कम से कम तब पहली बार मैंने उसे गंभीरता से लेना शुरू किया। मुसलमान आतंकवादी थे। मुसलमान ख़तरनाक थे। ये लोग जंगली हैं, जिन्हें जेल में डाल देना चाहिए — या उससे भी बुरा कुछ। ज़्यादातर लोगों की तरह मैंने भी अक़्ल का शॉर्टकट ले लिया। और आख़िर में मैं एक पक्का इस्लामोफ़ोब बन गया। तो वो सब देखने के बाद, ज़ाहिर है, जब मैं स्कूल में था और इन मुसलमान लड़कों से मेरा वास्ता पड़ता था, तो मेरे अंदर उनके लिए ग़ुस्सा था, नफ़रत थी। और मुझे लगता था कि उन्हें उनकी औक़ात दिखानी ज़रूरी है। तो स्कूल में मुसलमानों को डराने-धमकाने और सताने के मामले में मैं सबसे आगे रहता था। ख़ास तौर पर मुझे याद है, एक बार मैं क्लास में बैठा था, और ठीक मेरे आगे एक लड़का बैठा था — अब्दुल, जिससे मुझे सख़्त घिन आती थी, सिर्फ़ इसलिए कि वो मुसलमान था। इसे इसकी औक़ात दिखाने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ?
क्यों न इसके बालों में आग लगा दी जाए? तो मैंने लाइटर उठाया और सच में उसके बालों में आग लगा दी। और हाँ, वो उस दिन चला गया, और स्कूल में फिर कभी दिखाई नहीं दिया। और मुझे याद है, बस में मैं ख़ुदकुश हमलावर होने का नाटक करता था, और बस... धड़ाम!
लोगों को हँसाने के लिए, और मुसलमानों को जताने के लिए कि — कि तुम लोग बेवक़ूफ़ हो। अपने धर्म के नाम पर ख़ुद को उड़ा लेते हो।' और, आप समझ रहे हैं, असल में वो उनका मज़ाक़ उड़ाने का एक मौक़ा भर था। मुहम्मद नाम का एक लड़का था, जो मेरे दिमाग़ पर थोड़ा-थोड़ा चढ़ने लगा था, और मैंने इसे मौक़े की तरह लिया, ताकि उसे अच्छी तरह समझा दूँ कि — 'ओए सुन, तू ग़लत आदमी से पंगा ले रहा है, और ऊपर से तू है भी मुसलमान। तो चल, तुझे तेरी औक़ात दिखाता हूँ।' आख़िर में मैंने उसकी दोनों आँखें काली कर दीं, उसकी नाक तोड़ दी, और उसकी एक पसली भी तोड़ दी। उसकी पूरी क़मीज़ ख़ून से लथपथ थी, और मुझे याद है कि एड्रेनालाईन मेरी नसों में दौड़ रहा था, और लगा जैसे ये सब एक पल में हो गया हो। पुलिस मुझे गिरफ़्तार करने स्कूल आई। अगले दिन वो मुझे मैथ की क्लास से उठा ले गए, और मैं सलाख़ों के पीछे पहुँच गया। पिता मुझे लेने आए, और इसके लिए मुझे बाल अदालत तक जाना पड़ा। मुझे समाज-सेवा करनी पड़ी और ग्रुप थेरेपी भी, ताकि शायद एक दिन मैं बिना हिंसा वाला इंसान बनकर बड़ा हो सकूँ। और उस वक़्त स्कूल ने असल में मेरा साथ दिया। उन्होंने मुझे वकील दिलवाया, और उन्होंने मेरा पक्ष लिया, उसका नहीं। अब सोचता हूँ तो ये बड़ी दुख की बात लगती है, क्योंकि मैं ख़ुद को हिंसक इंसान नहीं समझता था। पर प्रोपेगंडा आपके साथ यही करता है। मैं बिगड़ा हुआ बच्चा तो था, पर इतनी हद तक की हिंसा कभी भी मेरे मिज़ाज का हिस्सा नहीं थी। आपके मुसलमान बनने का क़िस्सा शुरू कैसे हुआ?
हाँ, तो आपसे बिल्कुल सच कहूँ — मेरा इस्लाम क़बूल करना एक चमत्कार ही है। मैं सचमुच ज़िंदगी के बहुत अँधेरे दौर में था। मेरे अंदर जीने की भूख ही मर गई थी। मैं ख़ुदकुशी नहीं चाहता था, पर मन में था कि अगर कोई गाड़ी मुझे टक्कर मार दे, तो बहुत सी मुसीबतें हल हो जाएँगी। पर मेरे अंदर एक हद थी, जिसके आगे मैं ऐसी कोई बेवक़ूफ़ी कर ही नहीं सकता था, क्योंकि वो हद ये थी कि 'मैं अपनी माँ को रुला नहीं सकता।' पर उन बेबसी के पलों में, जब अपने होने का एहसास तक सुन्न पड़ जाता था, मुझे याद है, मैं आसमान की तरफ़ देखता, चाँद को देखता, और ख़ुदा से सच माँगता था। सबसे पहले मैंने यही माँगा था। और मैंने उससे कहा कि वो किसी को भेजकर मुझे वो सच दे, जो मुझे किसी ऐसे क़बीले से मिलवाए, और उसी क़बीले में से मुझे कोई ऐसा साथी भी मिल जाए, जो पूरी ज़िंदगी मेरा साथ निभाए। तो उस वक़्त मैं कुछ ऐसा था। हर रोज़ मैं सड़कों पर रहता, स्केटबोर्ड वाले लड़कों के साथ, और बेवक़ूफ़ियाँ करता — ग्रैफ़िटी, सिगरेट, और शराब। और कुछ साल बाद, सेकंडरी फ़ाइव में, मेरी मुलाक़ात एक लड़के से हुई — उसामा। उसामा एकदम अलग, मज़ाक़िया, और दिलकश लड़का था, जो न जाने कहाँ से आ टपका था। इंटरनेशनल स्टूडेंट — ज़िंदगी में पहली बार, मैंने अपने हाई स्कूल में कोई इंटरनेशनल स्टूडेंट आते देखा। तो उसे देखकर मुझे याद है कि मैंने मन में सोचा, 'ये थोड़ा अजीब है, पर दिलचस्प है। मज़ाक़िया है।' और एक दिन, फ़ुटबॉल के मैच के बाद, पानी पीने के लिए लाइन लगी थी, और उसामा ठीक मेरे आगे था। और एक पल में, वो पानी पीने ही वाला था, कि आख़िरी वक़्त पर रुक गया। और मुझे बड़ी चिढ़ हुई, क्योंकि मुझे पीना था, मुझे ज़ोरों की प्यास लगी थी। और मैंने कहा, 'भाई, रास्ते से हट। मुझे पानी पीना है। तू यहाँ कर क्या रहा है?' और उसने कहा, 'हाँ, मेरा रोज़ा है। और पता है, हम मुसलमान असली मर्द होते हैं। हमारे अंदर सेल्फ कंट्रोल होता है। हम पूरे एक महीने न खाते हैं, न पीते हैं। तुम ईसाई कमज़ोर हो। तुम लोग जो मन आए, जब मन आए, वही कर लेते हो। और तुम सच्चे ईमान वाले होने का दिखावा करते हो; सच्चे तो हम हैं।' फिर मैंने उससे पूछा, 'तो तेरा कहना ये है कि अगर मैं सच में रोज़ा रखना चाहूँ, तो रख नहीं पाऊँगा?' उसने कहा, 'बिल्कुल।' तो वहीं, उसी वक़्त, मैंने ख़ुद से कहा कि मैं इस बंदे को साबित करके दिखाऊँगा कि जो वो करता है, वो मैं आसानी से कर सकता हूँ। और सिर्फ़ उसे दिखाने के लिए मैं लंच के वक़्त उसके साथ रहने लगा। मैं घर लौटा, और आख़िरकार खाने का वक़्त हुआ, और तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे बदल दिया। मुझे इतनी ज़ोर की भूख लगी थी कि जब मैं अपने कमरे में अकेला खा रहा था, मुझे याद है, खाना होने का मन में ऐसा शुक्र उठा कि मैं फूट-फूटकर रोने लगा। और रोते हुए जब मैं क़मीज़ से अपने आँसू पोंछ रहा था, तो मुझे याद है, उसे देखकर मैंने सोचा — 'मेरे पास यूनिफ़ॉर्म है, क्योंकि मैं प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था।' और फिर एक ख़याल से दूसरा ख़याल निकलता चला गया — मुझे इतनी अच्छी शिक्षा मिल रही है?
या ख़ुदा। रुको। मेरे सिर पर छत भी है?!' मैं छत की तरफ़ देख रहा था, और फिर मैं इस जज़्बाती झूले में और भी गहरा उतरता चला गया। और फिर मैंने ख़ुद से पूछा — 'ये सब आता कहाँ से है? मेरी माँ से। मेरे पास एक माँ है। आख़िरी बार माँ को गले कब लगाया था? आख़िरी बार कब...
मैंने माँ से अपना प्यार जताया था।’ तो मैं वहाँ से भागा, माँ के कमरे की तरफ़, अपना प्यार जताने। और मैंने उनसे कहा, 'माँ, मुझे माफ़ कर दो, मैं वादा करता हूँ कि अच्छा बेटा बनूँगा।' और मैं बस रो रहा था, बिलख रहा था, और उन्होंने मुझे देखा और पूछा — 'एडुआर्डो, तूने पी रखी है क्या?' और मैंने कहा, 'नहीं माँ, मैंने नहीं पी।' मुझे बस एहसास हुआ कि मैं बुरा बच्चा था, और मैं वादा करता हूँ कि सुधर जाऊँगा। तो मैं इसी झटके के साथ अपने कमरे में लौटा, और मेरे अंदर जिज्ञासा जागी कि इस बदल देने वाले धर्म से और क्या-क्या सीखा जा सकता है। मैंने बस इसे समझना शुरू किया था। इस धर्म को जानते हुए, मुझे एक ऐसी ताक़त महसूस हुई जिसने मेरे दिल को शुक्र से भर दिया, मेरे घाव भरे और माँ से मेरा रिश्ता भी सुधारा। और क्या है जो मुझे बेहतर बना सकता है?
और क्या है जो मुझे और बेहतर इंसान बना सकता है?
मैं उसे और क़रीब से जानने लगा, और जैसे-जैसे मैं उसका क़िस्सा जान रहा था और वो मुझे और दिलचस्प लग रहा था, वैसे-वैसे मेरे आसपास के सारे दोस्त उससे बुरी तरह चिढ़ते थे। और दोस्त मुझसे हमेशा यही कहते — 'ये बंदा बकवास है, इसके साथ मत घूम। तू कूल लड़कों में गिना जाता है, तेरी इज़्ज़त गिर जाएगी।' और मैं कहता, 'मुझे ये बंदा पसंद है। पता नहीं क्यों, पर पसंद है।’ तो एक दिन उसने मुझे फ़ोन किया और कहा — 'सुन भाई, मेरी बहन यहाँ मॉन्ट्रियल में अकेली है, फ़ॉरेन स्टूडेंट है, और वो बहुत उदास है क्योंकि उसका जन्मदिन है और मनाने वाला कोई नहीं। मैं सोच रहा था कि हम उसके लिए कुछ कर सकते हैं।' और मैंने कहा, 'हाँ, कोई बात नहीं। तू मेरा यार है, मैं देख लूँगा। पिता के मैक्सिकन-ब्राज़ीली रेस्टोरेंट में मैं उसे वीआईपी ट्रीटमेंट दूँगा। उसके लिए कुछ तैयार करवाएँगे और वो ख़ुश हो जाएगी।' फिर रेस्टोरेंट में जब उससे आमने-सामने मुलाक़ात हुई, तो मैंने देखा — उसने हिजाब पहना है। और इससे मुझे बेहद बेचैनी हुई। और ऊपर से वो अपने शौहर को भी साथ ले आई — सिमो मोहम्मद, जो लंबी दाढ़ी रखने वाले एक दाई थे — यानी जो पेशे से लोगों को इस्लाम की दावत देते हैं। और मुझे याद है, मुझे इससे सख़्त चिढ़ हुई, पर लगा कि झेलना पड़ेगा, क्योंकि उसामा — जैसा मैंने कहा — मेरा यार था, जो मुझे पसंद आने लगा था। वो उस वक़्त तक मेरा सबसे अच्छा दोस्त बन चुका था, और मुझे उसका लिहाज़ रखना था। मैंने सोचा कि इन्हें आख़िरी बार देख रहा हूँ। पर मुझे क्या पता था, उनके कुछ प्लांस थे। और ख़ुदा का भी एक प्लान था। और उन्होंने मुझसे कहा, 'एडुआर्डो, तुमने हमारी इतनी ख़ातिरदारी की, हमें इसका बदला चुकाना है। तो हम आपको शेरब्रुक बुला रहे हैं,' जो मॉन्ट्रियल से डेढ़ घंटे की दूरी पर एक शहर है। 'और ऊपर से, हम आपको अपने वलीमे पर बुला रहे हैं, यानी मोरक्को में हमारी शादी की दावत, ताकि आपकी ख़ातिरदारी का शुक्रिया अदा कर सकें।' और मैं उसामा की तरफ़ देख रहा था, और मैंने कहा, 'हाँ भई, चलो!' अब कुछ हफ़्ते आगे बढ़ते हैं — शेरब्रुक। मैं वहाँ पहली बार था — सोलह साल का नाबालिग़ लड़का। पहली बार घर से दूर, किसी और के घर रात बिताते हुए, और इस पूरे इंतज़ाम में बिल्कुल बेचैन-सा महसूस करते हुए। पर फिर वही, उसामा मेरा यार था, तो लिहाज़ रखना पड़ा। और उसामा के पिता मुझे एयरपोर्ट पर लेने आए, पर उन्होंने कभी नहीं बताया कि वो उसके पिता हैं। उन्होंने कहा, 'मैं आपकी ख़िदमत में हूँ। मैं आपका ऐसे ख़याल रखूँगा जैसे आप मेरे बेटे हों।' और वो सादे कपड़ों में थे। उनकी गाड़ी सादी थी। उनके तौर-तरीक़े लाजवाब थे। तो मैं वहाँ बस ये सब देखता रहा और पूरी तरह हैरान रह गया। और ये हैरानी और बढ़ी जब मैंने उसामा के पिता को घुटनों के बल बैठकर और माली के साथ मिलकर फूल लगाते देखा, और फिर रसोई में जाकर बावर्ची का हाथ बँटाते देखा, और उनके पास शादी की तैयारी करने वाली एक बहुत बड़ी टीम थी, क्योंकि शादी उन्हीं के घर पर हो रही थी। और फिर मैंने इस इंसान की वो सादगी देखी, यहाँ एक ऐसा शख़्स था, जो साफ़ तौर पर हैसियत वाला था, और इतनी सादगी से, नौकरों की तरह पेश आ रहा था। तो असली मर्द कैसा होना चाहिए — मेरा ये ख़याल चूर-चूर हो गया। कामयाबी का मेरा ख़याल चूर-चूर हो गया, और मुझे याद है, मैं पूरी तरह शक्की और सहमा हुआ था — जैसे, ये लोग, मैं इनकी चाल समझता हूँ। ये बस मेरा भरोसा जीतना चाहते हैं, ताकि जब मैं सो जाऊँ...
तो ये मेरा गला काट सकें। तो उस शक ने मुझे चैन से बैठने ही नहीं दिया। मैंने ख़ुद से कहा, बेवक़ूफ़ मत बन। थोड़ी खींचतान भी हुई, क्योंकि वो ज़िद कर रहे थे कि मैं सबसे बड़े कमरे में सोऊँ, क्योंकि मैं उनका ख़ास मेहमान था। आख़िर में मैं ये लड़ाई जीत गया — मैंने कह दिया कि मुझे नींद नहीं आती और मैं सोफ़े पर ही सो जाऊँगा, कोई दिक़्क़त नहीं। आख़िर में मैं वो लड़ाई जीत गया। और मैं वहाँ बैठा बस टीवी देखता और चैनल बदलता रहा। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि क्या वक़्त था, पर कहूँगा रात के कोई तीन बजे। मैंने सुना कि वो भाई उठ रहे हैं। और फिर जैसे ही मुझे उनके उठने की आहट सुनाई देने लगी, मेरा दिल धड़कने लगा। और जैसे ही मैंने सुना 'अल्लाहु अकबर'...
मैं जम गया। मेरी जान निकल गई। क्योंकि हम सब जानते हैं 'अल्लाहु अकबर' के बाद क्या होता है। टीवी पर चौबीसों घंटे यही दिखता है — एक धमाका होता है। तो मेरे मन में था कि ये बंदा अपनी रूहानी रस्में पूरी कर रहा है, ताकि आकर मेरा गला काटे और अपने ख़ुदा को चढ़ावा चढ़ाए, या जो कुछ भी उसका चक्कर हो। मुझे नहीं पता, पर बात अच्छी नहीं थी, क्योंकि 'अल्लाहु अकबर' का मेरे लिए बहुत बुरा मतलब था। मैं हिल तक नहीं सका। मैंने ख़ुद से पूछा — 'तू यहाँ आया ही क्यों, एडुआर्डो? तू कितना बड़ा बेवक़ूफ़ है!
तुझे पता है ये लोग ख़तरनाक हैं, और तू यहाँ फँसा बैठा है, और अब तू मारा जाने वाला है!' और मुझे याद है, मैंने ख़ास तौर पर ख़ुदा से माँगा कि इस नामुमकिन हालत से मुझे बचा ले। मैं दुआ कर रहा था, ख़ुदा से मदद माँग रहा था। सिमो मोहम्मद का साया बड़ा होता जा रहा था, और बड़ा, और मुझे फ़र्श चरमराता सुनाई दे रहा था, और वो मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे, और मुझे याद है, उनका हाथ बहुत साफ़ और बड़ा दिखता हुआ मेरे सामने आ रहा था, और उन्होंने वो कंबल उठाया, मुझे ओढ़ा दिया, बत्ती बुझाई, टीवी बंद किया, और वापस सो गए। उसी पल, वहीं, उसी वक़्त, मेरे दिल ने मान लिया — ये लोग बुरे इंसान हो ही नहीं सकते, ये नामुमकिन है। माँ हमेशा कहती थीं कि अगर सच में जानना हो कि तुम कैसे इंसान हो, तो ख़ुद को तब देखो जब कोई देख न रहा हो। वही तुम्हारी असल है। और यहाँ देखिए, ये भाई थे, जो आधी रात को, जब कोई देख नहीं रहा था। उठकर अपने रब से बात करते हैं, उससे बतियाते हैं। और वही बातचीत उन्हें उस मेहमान के साथ भलाई करने को प्रेरित करती है, जिसकी ख़ातिरदारी वो पहले ही हद से बढ़कर, ख़ास मेहमान की तरह कर चुके हैं। तो मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आ रही थी, क्योंकि मेरी परवरिश भेदभाव सिखाकर नहीं हुई थी। मेरी परवरिश नस्लभेद सिखाकर नहीं हुई थी। और मुझे पता था कि मैं इससे बेहतर हूँ। और मुझे लग रहा था कि मैं पूरी तरह...
शायद सही लफ़्ज़ यही होगा — शर्मिंदा। और वही पहला मौक़ा था जब अल्लाह ने मेरा दिल इस्लाम के लिए नरम किया, और मुसलमानों के लिए भी। तो अगले दिन सिमो मोहम्मद ने मुझसे कहा कि वो जुमे की नमाज़ पढ़ने जा रहे हैं, जो मर्दों पर जुमे के दिन फ़र्ज़ है। और उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके साथ चलना चाहूँगा। मैंने कहा, 'बिल्कुल, मैं आपके साथ चलूँगा।' और वो पहली बार था जब मैं मस्जिद गया, और मुझे याद है, मैं दंग रह गया — सबको इतने संजीदा और सादे माहौल में देखकर, जहाँ लोग अपना माथा, अपना चेहरा, यानी जिस्म का सबसे इज़्ज़तदार हिस्सा, अपने रब की इबादत में ज़मीन पर रख देते हैं। और ज़िंदगी में पहली बार मैंने नमाज़ पढ़ी, और मुझे याद है, मुझमें जैसे नई जान आ गई। मुझे नहीं पता था कि मैं कर क्या रहा हूँ, पर ख़ुदा मुझे उस माहौल में ला रहा था, जहाँ मुझे अपने अंदर सचमुच लगा कि मैं ज़िंदगी में लौट रहा हूँ। कोई तस्वीर नहीं। न वहाँ कुर्सियाँ थीं, न बेंच थे, वहाँ ऐसे माहौल के सिवा कुछ नहीं था, जो आपको ध्यान लगाने में मदद करे। किस पर ध्यान?
ख़ुदा पर ध्यान। पर फिर, उसामा के भाई ने इतनी समझदारी से बात की कि एक ईसाई होते हुए भी मुझे लगा कि उनकी नज़र में मैं इज़्ज़तदार इंसान हूँ, क्योंकि उन्होंने बताया कि ईसा का नाम क़ुरआन में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पच्चीस गुना ज़्यादा आया है। और उन्होंने मुझे ये भी बताया — 'हमारे यहाँ एक सूरह है जिसका नाम मरयम है, और, पता है, हम मुसलमान असल में ईसाइयों की इज़्ज़त करते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि बाइबल भी असल में वही का एक हिस्सा थी, पर अफ़सोस, इतिहास में उसे बिगाड़ा और बदला गया। पर हमें नहीं पता कि कौन सा हिस्सा बदला और कौन सा वैसा ही रहा, इसलिए हमें पूरी किताब की इज़्ज़त करनी है।' मुझे लगा — वाह, ये लोग हमारी इज़्ज़त करते हैं। ये हमें कोसते नहीं। दिन भर मुझे यही सुनने को मिलता था कि ईसाई मुसलमानों को कोसते हैं, और यहाँ ये मुसलमान ईसाइयों के बारे में इतनी इज़्ज़त से बोल रहे हैं। तो मैं वहीं इन लोगों से, और जीने के इस तरीक़े से, और गहरी मुहब्बत में पड़ चुका था — यहाँ तक कि जब मैं मोरक्को से लौटा, तो इस्लाम को लेकर मेरा जोश दस गुना हो गया। तो जब भी मेरे आसपास या मेरे माहौल में कोई मुसलमानों और इस्लाम की बुराई करता, मैं सीधे भिड़ जाता। कोई क़ुरआन के बारे में बकवास शुरू करता, तो मैं कहता — 'तूने आख़िरी बार किताब कब खोली थी?
कभी नहीं! तो मुँह बंद रख।' है न? मुसलमानों का पक्ष लेने का, वो बहुत ही आक्रामक और बेबाक तरीका था। कुछ लोगों ने तो पूछ लिया — 'एडुआर्डो, तू मुसलमान है क्या? तुझे हो क्या गया है?
तू बदल गया है।' और मैंने रोज़े रखने शुरू कर दिए। बता दूँ, मैं इस्लाम क़बूल करने से पहले ही रोज़े रख रहा था। मैंने दो बार रोज़े रखे थे। तो लोगों को कुछ-कुछ अंदाज़ा हो गया था, और लोग पहले से ही अंदाज़ा लगा रहे थे कि ऐसा होने वाला है। बस मुझे ही नहीं पता था। जिस आख़िरी घड़ी मैंने इस्लाम क़बूल करने का फ़ैसला किया, उससे पहले तक मुझे अंदाज़ा ही नहीं था कि ऐसा होगा। फिर मेरे सामने मैल्कम एक्स का क़िस्सा आया। और मैल्कम एक्स ने मुझे इस्लाम क़बूल करने की हिम्मत दी, क्योंकि इस आदमी का क़िस्सा एक बहुत ज़ोरदार और झकझोर देने वाली याद दिलाता है कि ज़िंदगी में आपका मक़सद सलामती ढूँढ़ना नहीं है, आराम ढूँढ़ना नहीं है — बल्कि सच ढूँढ़ना है। और उन्होंने पूरी ज़िंदगी ये काम इतनी बेख़ौफ़ी से किया कि वो मेरे लिए बहादुरी की मिसाल बन गए — कि आज के दौर में असली मर्दानगी होती क्या है। फ़िल्म ख़त्म होते ही मैंने उसामा को फ़ोन लगाया और उससे कहा — 'उसामा, सुन भाई, मैं अब मुसलमान हूँ।' और उसामा बोला, 'अल्लाहु अकबर, तकबीर!' वो इतना ख़ुश था कि चिल्ला रहा था, और वो मुझसे ऐसे बात कर रहा था जैसे मैं पहले से ही मुसलमान हूँ। तो वो कह रहा था, 'माशाअल्लाह।' मैंने उसे पहले कभी ये सब कहते नहीं सुना था, क्योंकि वो बहुत ध्यान रखता था कि किन लफ़्ज़ों में मुझसे बात करे। और उसने कहा, 'क्या तूने कलमा पढ़ लिया?
और, पता है, ये बड़ी ख़ुशी की बात है। और बता।' मैंने कहा, 'मैंने क्या? कलमा?' मुझे लगा वो कोई खाने की चीज़ है, जो मुझे खानी है — जैसे शवर्मा। और मैंने कहा, 'वो क्या होता है?
मैं अभी मुसलमान बना हूँ, तू किस बारे में बात कर रहा है?' उसने कहा, 'नहीं, पर कलमा तो पढ़ना पड़ेगा।' 'वो होता क्या है?' और उसने बताया, 'यानी तुझे ईमान की गवाही देनी होगी।' तो मैंने फ़ोन पर ही उसके साथ ईमान की गवाही दी। फिर उसामा ने कहा, 'मैं तुझे मस्जिद ले चलता हूँ।' और मैं उसके साथ मस्जिद में था — आईसीक्यू, इस्लामिक सेंटर ऑफ़ क्यूबेक, और मुझे याद है, जब मैं कलमा पढ़ रहा था, मैं ऐसे माहौल में था जहाँ मुझे बस बंगाली, पाकिस्तानी, हिंदुस्तानी, अरब दिख रहे थे, और मुझे ज़बरदस्त कल्चरल शॉक लगा। मुझे याद है, मैंने मन में सोचा — 'एडुआर्डो, तुझे सच में पता भी है कि तू किसमें फँस गया है?
ये तेरे जैसे लोग तो नहीं लगते। बड़ी-बड़ी दाढ़ियों और पगड़ियों वाले लोग, और उन्होंने कूफ़िया — अरबी रुमाल, षोब पहन रखे थे।' और मुझे लगा जैसे मैं ग़लत लोगों में आ गया हूँ। और बात तब और भी भारी हो गई, जब कलमा के बाद ये सारे मर्द आकर मुझे गले लगाने और चूमने लगे, और मुझे याद है, इससे मेरा दम ही घुट गया, क्योंकि मैंने पहले कभी किसी मर्द को गले नहीं लगाया था। समझे?
मैं तो अपने पिता को भी मुश्किल से गले लगाता था। और अब ये बड़े-बड़े दाढ़ी वाले मर्द आकर मुझे गले लगा रहे थे और मेरा माथा चूम रहे थे। तो मेरे लिए ये मेरी मर्दानगी पर हमले जैसा था। पर मुझे याद है, वो भाई इतने सच्चे, इतने भावुक और इतने ख़ुश थे, कि मुझे पता चल गया कि यहाँ कुछ ख़ास हो रहा है — कुछ ऐसा, जो उस पल मेरी समझ से बाहर था। जब मैंने कलमा पढ़ा, तो एक भाई मेरे पास आए और मेरी आँखों में देखकर बोले — 'भाई, मैं तुम्हें एक बहुत ज़रूरी नसीहत देने जा रहा हूँ, और तुमसे वादा चाहता हूँ कि इसे कभी नहीं भूलोगे — इस्लाम को देखना, मुसलमानों को मत देखना।' और पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि वो कोई बहुत बुनियादी बात कह रहे हैं, और मैंने वो नसीहत पकड़ ली, और उसने कई बार मेरा ईमान बचाया। और मेरे अपने मामले में, सबसे ज़ोरदार पल, मैं कहूँगा, वो था जब मेरी दुआ पूरी की पूरी क़बूल हो गई — वो दुआ जिसमें मैंने ख़ुदा से तीन चीज़ें माँगी थीं — मुझे सच देने के लिए कोई परदेसी भेज, ताकि मैं उस क़बीले का हिस्सा बन सकूँ जो सच पर है, और ताकि उसी क़बीले से मुझे ज़िंदगी भर का एक साथी भी मिल जाए। उसामा वही परदेसी था, जो वो पैग़ाम लेकर आया, है ना?
उसने मुझे इस्लाम के पैग़ाम के साथ उस क़बीले तक पहुँचाया, और आख़िर में मेरी शादी एक मोरक्कन से हुई। ऐसी बात गढ़ी नहीं जा सकती। इस्लामी तरीक़े से जीना कितना मुश्किल रहा — हराम से बचना, पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ना, वग़ैरह? असल बात ये है कि जब मैंने इस्लाम क़बूल किया, तो मैं फ़ौरन कोई परहेज़गार बंदा नहीं बन गया। अगले ही हफ़्ते मैं बीच पर था, और मेरे पास नमाज़ के वो काग़ज़ थे, जो प्लेन में चढ़ने से ठीक पहले प्रिंट कराए थे, जिनसे मैं बीच पर ही नमाज़ पढ़ना सीख रहा था — बिना शर्ट के, शॉर्ट्स में, कान में बालियाँ और सिर पर टोपी। समझ रहे हैं?
तो मैं सच में जूझ रहा था, पर जितना बन पड़ता था, कर रहा था। मुसलमान बनना — ख़ासकर तब, जब आपकी ज़िंदगी मेरे जैसी रही हो — सचमुच दोबारा जीना सीखने जैसा है। ये सीधे हाथ वाले का उल्टे हाथ से काम करना सीखना जैसा है। या इसका उल्टा। ये समझ के उलट है। पर मुझे तब सबसे ज़्यादा मदद मिली, जब मैंने सचमुच माहौल बदलना शुरू किया और अपनी यूनिवर्सिटी की मुस्लिम स्टूडेंट एसोसिएशन से जुड़ गया, और मेरे आसपास ऐसे लोग हो गए जो मेरे लिए रहनुमा का काम कर सकते थे। पर मुश्किल भी हुई, क्योंकि बहुत से मुसलमानों से मेरी पटती नहीं थी, और आपको समझना होगा कि ये नाइन-इलेवन के ठीक बाद का वक़्त था, तो बहुत से मुसलमान अपने ईमान को लेकर सफ़ाई देते फिरते थे, और मेरे लिए मुसलमानों से गहरा रिश्ता बना पाना बहुत मुश्किल था। और ग़लत मत समझिएगा, इस्लाम को लेकर मुझे कभी शक नहीं हुआ। मैं हमेशा से पक्का था। पर मुझे इस बात पर सख़्त शक था कि मुसलमान के तौर पर ये सफ़र चलाते रहने की ताक़त मुझमें है भी या नहीं, क्योंकि माहौल के लिहाज़ से ये इतना मुश्किल था — मैं हराम की धारा के ख़िलाफ़ तैर रहा था। फिर मुझे समझ आया कि इस धारा के ख़िलाफ़ तैरा नहीं जा सकता, लेन बदलनी पड़ती है। और मैंने यही किया, अलहम्दुलिल्लाह। आपके इस्लाम क़बूल करने के बाद, क्या आपके आसपास कोई और भी मुसलमान हुआ?
क्या आपके घर में से बाद में किसी ने इस्लाम क़बूल किया?
मेरा एक नया लातीनी मुसलमान दोस्त है, और मैं बहुत ख़ुश हूँ क्योंकि मैं उसके साथ घूमता हूँ और हम मज़े करते हैं। और एक दिन उसने अपने बेसमेंट में जन्मदिन की महफ़िल रखी, एक और लड़के के साथ, जो मेरे ही हाई स्कूल में था और उसका सबसे अच्छा दोस्त था, और हम वहाँ ऐसे माहौल में थे जो कुछ ख़ास हलाल नहीं था। वहाँ बहुत सी ग़लत चीज़ें चल रही थीं। तो फिर उसने फ़ातिहा पढ़ने के बाद ऐलान किया, वो कहने लगा कि वो अपने सबसे अच्छे क्यूबेकी दोस्त को — जो हम दोनों का साझा दोस्त था — वो तोहफ़ा देने जा रहा है जो कोई दोस्त अपने सबसे अच्छे दोस्त को दे सकता है। और मैं दूर से ये देख रहा था और सोच रहा था — 'ये क़ुरआन न हो, बस।' क्योंकि अगर उसने इस बंदे को क़ुरआन दे दिया, तो ये उसके पन्ने मोड़कर उनमें भरकर पिएगा, क्योंकि मैंने उस बंदे को ज़िंदगी में कभी होश में नहीं देखा। वो हमेशा नशे में रहता था या पिए हुए। तो मैंने उस पर फ़ैसला सुना दिया। तो हमारा क्यूबेकी दोस्त उसकी तरफ़ चला, तोहफ़ा लिया, और रास्ते में गिरते-गिरते बचा, क्योंकि वो पिए हुए था। और बोला, 'अरे, अरे, शुक्रिया, बड़ी मेहरबानी।' और फिर उसने उसे खोला, और वो क़ुरआन ही निकला। तो मेरे मन में आया — 'हाय, क़ुरआन का क्या बुरा इस्तेमाल हुआ।' कुछ महीने बाद, या शायद साल भर बाद, मैं खाने के बाद अपने ससुराल के पास वाली मस्जिद में था, और हमने अभी-अभी इशा की नमाज़ ख़त्म की थी कि किसी ने मेरी पीठ थपथपाई। और मैंने देखा। और वो वही बंदा था, जिसे मेरे पेरूवी दोस्त ने क़ुरआन दिया था। और उसने कहा, 'अस्सलामु अलैकुम, कैसे हो?' और मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है। और मुझे कुछ मिनट लगे ये समझने में कि जिस बंदे को मेरे पेरूवी दोस्त ने क़ुरआन दिया था, उसने इस्लाम क़बूल कर लिया। मुझे याद है, जब उसने मुझे अपनी नई हालत बताई, तो सबसे पहले मैंने उस भाई से यही कहा — 'माफ़ करना, मुझे तुमसे बिल्कुल सच कहना है। मैंने तुम पर फ़ैसला सुना दिया था, मुझे लगा था कि तुम उस क़ुरआन को बरबाद करोगे और उसके पन्नों में भरकर पिओगे।' और मैंने फ़ौरन माफ़ी माँगी, क्योंकि देखिए, एक बार फिर — आपको कभी पता नहीं कि अल्लाह किसे हिदायत दे दे। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की किस बात ने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?
हमारे प्यारे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मर्दानगी और किरदार की मिसाल थे। और मुझे बहुत वक़्त लगा ये सचमुच समझने में कि उनकी शख़्सियत का दुनिया पर क्या असर पड़ा, क्योंकि इस्लाम सीखने के इस सफ़र में आपसे अक्सर कहा जाता है कि आपको उनसे मुहब्बत करनी है। पर किसी को जानने में वक़्त लगता है। और हमारे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कई सीरतें पढ़ने के बाद, मुझे समझ आया कि वो हुज्जतुल-इस्लाम, वो इस्लाम की दलील हैं। वो ख़ुद अपने आप में एक चमत्कार हैं, क्योंकि उनके किरदार और उनकी ईमानदारी में कोई दोष नहीं, और साथ में वो सादगी... अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने उन्हें कितनी बार टोका?
और उन्होंने उसे कभी दिल पर नहीं लिया। फ़ौरन सुधार लिया। 'जब तक तू मुझसे राज़ी है, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मुझे माफ़ कर दे।' सोचिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस कमरे में आते हैं। आप सबसे पहले उनसे क्या कहना चाहेंगे? मुझे नहीं लगता कि मैं बोल भी पाऊँगा। मुझे नहीं पता कि मैं उनकी तरफ़ देख भी पाऊँगा या नहीं। मैं शायद उनके क़दम चूमना चाहूँगा। हम्म... हाँ। अल्लाह हमें जन्नत में उनसे मिलाए, इंशाअल्लाह। आमीन। अगर आपको दुनिया के सारे ग़ैर-मुस्लिमों से बात करने का मौक़ा मिले, ख़ासकर शायद ब्राज़ीली और कनाडाई लोगों से, तो चंद मिनटों में आप उनसे क्या कहना चाहेंगे?
मैं कहूँगा — इस्लाम को एक मौक़ा दीजिए। सच कहूँ तो इस्लामोफ़ोबिया गढ़ा हुआ है। ऐसा नहीं है कि ये दुनिया में यूँ ही हो गई। इस पूरे कारोबार के पीछे कुछ लोग हैं, जो दिन-रात लगे हुए हैं ताकि आम लोग उलझे रहें कि मुसलमान कौन हैं और हम खड़े किस बात पर हैं। और एक ऐसे समाज के तौर पर, जो अपने तर्कशील और समझदार होने पर फ़ख़्र करता है, मुझे लगता है हमारी कथनी और करनी एक होनी चाहिए, और इस सस्ते प्रोपेगैंडा का शिकार नहीं होना चाहिए। क्या आपने भी इस्लाम क़बूल किया है, पर समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें? या फिर आप पैदाइशी मुसलमान तो हैं, पर अब बिल्कुल नए सिरे से इस्लाम सीखना चाहते हैं?
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मैं जम गया। मेरी जान निकल गई। क्योंकि हम सब जानते हैं कि 'अल्लाहु अकबर' के बाद क्या होता है — एक धमाका होता है। सिमो मोहम्मद का साया बड़ा होता जा रहा था, और बड़ा, और मुझे फ़र्श चरमराता सुनाई दे रहा था, और वो मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे। और मुझे याद है, उनका हाथ बहुत साफ़ और बड़ा दिखता हुआ मेरे सामने आ रहा था...
जब मैं मोरक्को से लौटा, तो इस्लाम को लेकर मेरा जोश दस गुना हो गया। कोई क़ुरआन के बारे में बकवास शुरू करता, तो मैं कहता — 'तूने आख़िरी बार किताब कब खोली थी?' 'कभी नहीं!' 'तो मुँह बंद रख।' फ़िल्म ख़त्म होते ही मैंने उसामा को फ़ोन लगाया और उससे कहा — 'उसामा, सुन भाई, मैं अब मुसलमान हूँ।' अस्सलामु अलैकुम भाई एडुआर्डो दोस आंजोस। टुवर्ड्स इटर्निटी पर हमारे साथ आने के लिए बहुत शुक्रिया। आप हमारे साथ हैं, ये हमारी ख़ुशी है। ये मेरे लिए इज़्ज़त की बात है। व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाह। शुक्रिया। ये मेरा सम्मान है। शुरू इससे करते हैं — एडुआर्डो दोस आंजोस कौन हैं?
अपनी ज़िंदगी के बारे में थोड़ा बताइए। तो मैं पैदा ब्राज़ील में हुआ, और दो साल की उम्र में कनाडा आ गया। मैं एक कैथोलिक-बौद्ध परिवार से हूँ, और मैं मुसलमानों से नफ़रत करते हुए बड़ा हुआ। और आख़िर में मुझे इस्लाम से मुहब्बत हो गई। ईमान के मामले में आपकी ज़िंदगी कैसी थी? आप किसमें यक़ीन रखते थे?
हाँ, तो मैं एक ब्राज़ीली कैथोलिक परिवार से हूँ। मेरे पिता की बात करें तो, वो थोड़े ज़्यादा ही प्रैक्टिसिंग कैथोलिक थे, पर उस क़िस्म के, जो इतवार को चर्च चले जाते हैं, और हफ़्ते भर भूल जाते हैं कि वो कैथोलिक हैं। माँ बौद्ध थीं, इसलिए हमारे घर में थोड़ा-सा बौद्ध रंग भी घुला हुआ रहता था। तो ईमान के मामले में पिता ने अपनी तरफ़ से कुछ रीमिक्स कर रखा था। उन्होंने अलग-अलग तरह के धार्मिक ख़यालों को मिला दिया था। आपसे सच कहूँ तो ईमान के मामले में मैं पूरी उलझन में ही बड़ा हुआ। मेरे लिए धर्म एक ऐसी चीज़ थी, जो बहुत उलझी हुई थी। दिलचस्प तो वो बहुत थी, पर ऐसा नहीं कि मैं उसे कुछ ज़्यादा गंभीरता से लेता। हालाँकि, ख़ुदा एक पूर्ण, सर्वशक्तिमान और महत्वपूर्ण शक्ति था, जिसे आप अपने सबसे कठिन समय में याद करते हैं, लेकिन बात इससे आगे नहीं गई। पर सच कहूँ तो, ईसाइयत को लेकर भी मुझे एक तरह की बेचैनी महसूस होती थी। चीज़ों को तार्किक रूप से समझने की जो मेरी बौद्धिक ज़रूरत थी, उस पर यह खरी नहीं उतरती थी। समझ रहे हैं ना?
तो मेरे लिए ख़ुदा के तीन होने वाली बात ही ग़लत थी। वो ऐसी चीज़ थी, जो अक़्ल में आती ही नहीं थी, बिल्कुल भी नहीं। और इस्लाम के बारे में आपने पहली बार कैसे सुना? कोई ग़लतफ़हमी थी?
तो मेरे इस्लाम क़बूल करने के क़िस्से की मज़ेदार बात ये है कि इस्लाम के बारे में मैंने पहली बार नाइन-इलेवन के वक़्त सुना। कम से कम तब पहली बार मैंने उसे गंभीरता से लेना शुरू किया। मुसलमान आतंकवादी थे। मुसलमान ख़तरनाक थे। ये लोग जंगली हैं, जिन्हें जेल में डाल देना चाहिए — या उससे भी बुरा कुछ। ज़्यादातर लोगों की तरह मैंने भी अक़्ल का शॉर्टकट ले लिया। और आख़िर में मैं एक पक्का इस्लामोफ़ोब बन गया। तो वो सब देखने के बाद, ज़ाहिर है, जब मैं स्कूल में था और इन मुसलमान लड़कों से मेरा वास्ता पड़ता था, तो मेरे अंदर उनके लिए ग़ुस्सा था, नफ़रत थी। और मुझे लगता था कि उन्हें उनकी औक़ात दिखानी ज़रूरी है। तो स्कूल में मुसलमानों को डराने-धमकाने और सताने के मामले में मैं सबसे आगे रहता था। ख़ास तौर पर मुझे याद है, एक बार मैं क्लास में बैठा था, और ठीक मेरे आगे एक लड़का बैठा था — अब्दुल, जिससे मुझे सख़्त घिन आती थी, सिर्फ़ इसलिए कि वो मुसलमान था। इसे इसकी औक़ात दिखाने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ?
क्यों न इसके बालों में आग लगा दी जाए? तो मैंने लाइटर उठाया और सच में उसके बालों में आग लगा दी। और हाँ, वो उस दिन चला गया, और स्कूल में फिर कभी दिखाई नहीं दिया। और मुझे याद है, बस में मैं ख़ुदकुश हमलावर होने का नाटक करता था, और बस... धड़ाम!
लोगों को हँसाने के लिए, और मुसलमानों को जताने के लिए कि — कि तुम लोग बेवक़ूफ़ हो। अपने धर्म के नाम पर ख़ुद को उड़ा लेते हो।' और, आप समझ रहे हैं, असल में वो उनका मज़ाक़ उड़ाने का एक मौक़ा भर था। मुहम्मद नाम का एक लड़का था, जो मेरे दिमाग़ पर थोड़ा-थोड़ा चढ़ने लगा था, और मैंने इसे मौक़े की तरह लिया, ताकि उसे अच्छी तरह समझा दूँ कि — 'ओए सुन, तू ग़लत आदमी से पंगा ले रहा है, और ऊपर से तू है भी मुसलमान। तो चल, तुझे तेरी औक़ात दिखाता हूँ।' आख़िर में मैंने उसकी दोनों आँखें काली कर दीं, उसकी नाक तोड़ दी, और उसकी एक पसली भी तोड़ दी। उसकी पूरी क़मीज़ ख़ून से लथपथ थी, और मुझे याद है कि एड्रेनालाईन मेरी नसों में दौड़ रहा था, और लगा जैसे ये सब एक पल में हो गया हो। पुलिस मुझे गिरफ़्तार करने स्कूल आई। अगले दिन वो मुझे मैथ की क्लास से उठा ले गए, और मैं सलाख़ों के पीछे पहुँच गया। पिता मुझे लेने आए, और इसके लिए मुझे बाल अदालत तक जाना पड़ा। मुझे समाज-सेवा करनी पड़ी और ग्रुप थेरेपी भी, ताकि शायद एक दिन मैं बिना हिंसा वाला इंसान बनकर बड़ा हो सकूँ। और उस वक़्त स्कूल ने असल में मेरा साथ दिया। उन्होंने मुझे वकील दिलवाया, और उन्होंने मेरा पक्ष लिया, उसका नहीं। अब सोचता हूँ तो ये बड़ी दुख की बात लगती है, क्योंकि मैं ख़ुद को हिंसक इंसान नहीं समझता था। पर प्रोपेगंडा आपके साथ यही करता है। मैं बिगड़ा हुआ बच्चा तो था, पर इतनी हद तक की हिंसा कभी भी मेरे मिज़ाज का हिस्सा नहीं थी। आपके मुसलमान बनने का क़िस्सा शुरू कैसे हुआ?
हाँ, तो आपसे बिल्कुल सच कहूँ — मेरा इस्लाम क़बूल करना एक चमत्कार ही है। मैं सचमुच ज़िंदगी के बहुत अँधेरे दौर में था। मेरे अंदर जीने की भूख ही मर गई थी। मैं ख़ुदकुशी नहीं चाहता था, पर मन में था कि अगर कोई गाड़ी मुझे टक्कर मार दे, तो बहुत सी मुसीबतें हल हो जाएँगी। पर मेरे अंदर एक हद थी, जिसके आगे मैं ऐसी कोई बेवक़ूफ़ी कर ही नहीं सकता था, क्योंकि वो हद ये थी कि 'मैं अपनी माँ को रुला नहीं सकता।' पर उन बेबसी के पलों में, जब अपने होने का एहसास तक सुन्न पड़ जाता था, मुझे याद है, मैं आसमान की तरफ़ देखता, चाँद को देखता, और ख़ुदा से सच माँगता था। सबसे पहले मैंने यही माँगा था। और मैंने उससे कहा कि वो किसी को भेजकर मुझे वो सच दे, जो मुझे किसी ऐसे क़बीले से मिलवाए, और उसी क़बीले में से मुझे कोई ऐसा साथी भी मिल जाए, जो पूरी ज़िंदगी मेरा साथ निभाए। तो उस वक़्त मैं कुछ ऐसा था। हर रोज़ मैं सड़कों पर रहता, स्केटबोर्ड वाले लड़कों के साथ, और बेवक़ूफ़ियाँ करता — ग्रैफ़िटी, सिगरेट, और शराब। और कुछ साल बाद, सेकंडरी फ़ाइव में, मेरी मुलाक़ात एक लड़के से हुई — उसामा। उसामा एकदम अलग, मज़ाक़िया, और दिलकश लड़का था, जो न जाने कहाँ से आ टपका था। इंटरनेशनल स्टूडेंट — ज़िंदगी में पहली बार, मैंने अपने हाई स्कूल में कोई इंटरनेशनल स्टूडेंट आते देखा। तो उसे देखकर मुझे याद है कि मैंने मन में सोचा, 'ये थोड़ा अजीब है, पर दिलचस्प है। मज़ाक़िया है।' और एक दिन, फ़ुटबॉल के मैच के बाद, पानी पीने के लिए लाइन लगी थी, और उसामा ठीक मेरे आगे था। और एक पल में, वो पानी पीने ही वाला था, कि आख़िरी वक़्त पर रुक गया। और मुझे बड़ी चिढ़ हुई, क्योंकि मुझे पीना था, मुझे ज़ोरों की प्यास लगी थी। और मैंने कहा, 'भाई, रास्ते से हट। मुझे पानी पीना है। तू यहाँ कर क्या रहा है?' और उसने कहा, 'हाँ, मेरा रोज़ा है। और पता है, हम मुसलमान असली मर्द होते हैं। हमारे अंदर सेल्फ कंट्रोल होता है। हम पूरे एक महीने न खाते हैं, न पीते हैं। तुम ईसाई कमज़ोर हो। तुम लोग जो मन आए, जब मन आए, वही कर लेते हो। और तुम सच्चे ईमान वाले होने का दिखावा करते हो; सच्चे तो हम हैं।' फिर मैंने उससे पूछा, 'तो तेरा कहना ये है कि अगर मैं सच में रोज़ा रखना चाहूँ, तो रख नहीं पाऊँगा?' उसने कहा, 'बिल्कुल।' तो वहीं, उसी वक़्त, मैंने ख़ुद से कहा कि मैं इस बंदे को साबित करके दिखाऊँगा कि जो वो करता है, वो मैं आसानी से कर सकता हूँ। और सिर्फ़ उसे दिखाने के लिए मैं लंच के वक़्त उसके साथ रहने लगा। मैं घर लौटा, और आख़िरकार खाने का वक़्त हुआ, और तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे बदल दिया। मुझे इतनी ज़ोर की भूख लगी थी कि जब मैं अपने कमरे में अकेला खा रहा था, मुझे याद है, खाना होने का मन में ऐसा शुक्र उठा कि मैं फूट-फूटकर रोने लगा। और रोते हुए जब मैं क़मीज़ से अपने आँसू पोंछ रहा था, तो मुझे याद है, उसे देखकर मैंने सोचा — 'मेरे पास यूनिफ़ॉर्म है, क्योंकि मैं प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था।' और फिर एक ख़याल से दूसरा ख़याल निकलता चला गया — मुझे इतनी अच्छी शिक्षा मिल रही है?
या ख़ुदा। रुको। मेरे सिर पर छत भी है?!' मैं छत की तरफ़ देख रहा था, और फिर मैं इस जज़्बाती झूले में और भी गहरा उतरता चला गया। और फिर मैंने ख़ुद से पूछा — 'ये सब आता कहाँ से है? मेरी माँ से। मेरे पास एक माँ है। आख़िरी बार माँ को गले कब लगाया था? आख़िरी बार कब...
मैंने माँ से अपना प्यार जताया था।’ तो मैं वहाँ से भागा, माँ के कमरे की तरफ़, अपना प्यार जताने। और मैंने उनसे कहा, 'माँ, मुझे माफ़ कर दो, मैं वादा करता हूँ कि अच्छा बेटा बनूँगा।' और मैं बस रो रहा था, बिलख रहा था, और उन्होंने मुझे देखा और पूछा — 'एडुआर्डो, तूने पी रखी है क्या?' और मैंने कहा, 'नहीं माँ, मैंने नहीं पी।' मुझे बस एहसास हुआ कि मैं बुरा बच्चा था, और मैं वादा करता हूँ कि सुधर जाऊँगा। तो मैं इसी झटके के साथ अपने कमरे में लौटा, और मेरे अंदर जिज्ञासा जागी कि इस बदल देने वाले धर्म से और क्या-क्या सीखा जा सकता है। मैंने बस इसे समझना शुरू किया था। इस धर्म को जानते हुए, मुझे एक ऐसी ताक़त महसूस हुई जिसने मेरे दिल को शुक्र से भर दिया, मेरे घाव भरे और माँ से मेरा रिश्ता भी सुधारा। और क्या है जो मुझे बेहतर बना सकता है?
और क्या है जो मुझे और बेहतर इंसान बना सकता है?
मैं उसे और क़रीब से जानने लगा, और जैसे-जैसे मैं उसका क़िस्सा जान रहा था और वो मुझे और दिलचस्प लग रहा था, वैसे-वैसे मेरे आसपास के सारे दोस्त उससे बुरी तरह चिढ़ते थे। और दोस्त मुझसे हमेशा यही कहते — 'ये बंदा बकवास है, इसके साथ मत घूम। तू कूल लड़कों में गिना जाता है, तेरी इज़्ज़त गिर जाएगी।' और मैं कहता, 'मुझे ये बंदा पसंद है। पता नहीं क्यों, पर पसंद है।’ तो एक दिन उसने मुझे फ़ोन किया और कहा — 'सुन भाई, मेरी बहन यहाँ मॉन्ट्रियल में अकेली है, फ़ॉरेन स्टूडेंट है, और वो बहुत उदास है क्योंकि उसका जन्मदिन है और मनाने वाला कोई नहीं। मैं सोच रहा था कि हम उसके लिए कुछ कर सकते हैं।' और मैंने कहा, 'हाँ, कोई बात नहीं। तू मेरा यार है, मैं देख लूँगा। पिता के मैक्सिकन-ब्राज़ीली रेस्टोरेंट में मैं उसे वीआईपी ट्रीटमेंट दूँगा। उसके लिए कुछ तैयार करवाएँगे और वो ख़ुश हो जाएगी।' फिर रेस्टोरेंट में जब उससे आमने-सामने मुलाक़ात हुई, तो मैंने देखा — उसने हिजाब पहना है। और इससे मुझे बेहद बेचैनी हुई। और ऊपर से वो अपने शौहर को भी साथ ले आई — सिमो मोहम्मद, जो लंबी दाढ़ी रखने वाले एक दाई थे — यानी जो पेशे से लोगों को इस्लाम की दावत देते हैं। और मुझे याद है, मुझे इससे सख़्त चिढ़ हुई, पर लगा कि झेलना पड़ेगा, क्योंकि उसामा — जैसा मैंने कहा — मेरा यार था, जो मुझे पसंद आने लगा था। वो उस वक़्त तक मेरा सबसे अच्छा दोस्त बन चुका था, और मुझे उसका लिहाज़ रखना था। मैंने सोचा कि इन्हें आख़िरी बार देख रहा हूँ। पर मुझे क्या पता था, उनके कुछ प्लांस थे। और ख़ुदा का भी एक प्लान था। और उन्होंने मुझसे कहा, 'एडुआर्डो, तुमने हमारी इतनी ख़ातिरदारी की, हमें इसका बदला चुकाना है। तो हम आपको शेरब्रुक बुला रहे हैं,' जो मॉन्ट्रियल से डेढ़ घंटे की दूरी पर एक शहर है। 'और ऊपर से, हम आपको अपने वलीमे पर बुला रहे हैं, यानी मोरक्को में हमारी शादी की दावत, ताकि आपकी ख़ातिरदारी का शुक्रिया अदा कर सकें।' और मैं उसामा की तरफ़ देख रहा था, और मैंने कहा, 'हाँ भई, चलो!' अब कुछ हफ़्ते आगे बढ़ते हैं — शेरब्रुक। मैं वहाँ पहली बार था — सोलह साल का नाबालिग़ लड़का। पहली बार घर से दूर, किसी और के घर रात बिताते हुए, और इस पूरे इंतज़ाम में बिल्कुल बेचैन-सा महसूस करते हुए। पर फिर वही, उसामा मेरा यार था, तो लिहाज़ रखना पड़ा। और उसामा के पिता मुझे एयरपोर्ट पर लेने आए, पर उन्होंने कभी नहीं बताया कि वो उसके पिता हैं। उन्होंने कहा, 'मैं आपकी ख़िदमत में हूँ। मैं आपका ऐसे ख़याल रखूँगा जैसे आप मेरे बेटे हों।' और वो सादे कपड़ों में थे। उनकी गाड़ी सादी थी। उनके तौर-तरीक़े लाजवाब थे। तो मैं वहाँ बस ये सब देखता रहा और पूरी तरह हैरान रह गया। और ये हैरानी और बढ़ी जब मैंने उसामा के पिता को घुटनों के बल बैठकर और माली के साथ मिलकर फूल लगाते देखा, और फिर रसोई में जाकर बावर्ची का हाथ बँटाते देखा, और उनके पास शादी की तैयारी करने वाली एक बहुत बड़ी टीम थी, क्योंकि शादी उन्हीं के घर पर हो रही थी। और फिर मैंने इस इंसान की वो सादगी देखी, यहाँ एक ऐसा शख़्स था, जो साफ़ तौर पर हैसियत वाला था, और इतनी सादगी से, नौकरों की तरह पेश आ रहा था। तो असली मर्द कैसा होना चाहिए — मेरा ये ख़याल चूर-चूर हो गया। कामयाबी का मेरा ख़याल चूर-चूर हो गया, और मुझे याद है, मैं पूरी तरह शक्की और सहमा हुआ था — जैसे, ये लोग, मैं इनकी चाल समझता हूँ। ये बस मेरा भरोसा जीतना चाहते हैं, ताकि जब मैं सो जाऊँ...
तो ये मेरा गला काट सकें। तो उस शक ने मुझे चैन से बैठने ही नहीं दिया। मैंने ख़ुद से कहा, बेवक़ूफ़ मत बन। थोड़ी खींचतान भी हुई, क्योंकि वो ज़िद कर रहे थे कि मैं सबसे बड़े कमरे में सोऊँ, क्योंकि मैं उनका ख़ास मेहमान था। आख़िर में मैं ये लड़ाई जीत गया — मैंने कह दिया कि मुझे नींद नहीं आती और मैं सोफ़े पर ही सो जाऊँगा, कोई दिक़्क़त नहीं। आख़िर में मैं वो लड़ाई जीत गया। और मैं वहाँ बैठा बस टीवी देखता और चैनल बदलता रहा। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि क्या वक़्त था, पर कहूँगा रात के कोई तीन बजे। मैंने सुना कि वो भाई उठ रहे हैं। और फिर जैसे ही मुझे उनके उठने की आहट सुनाई देने लगी, मेरा दिल धड़कने लगा। और जैसे ही मैंने सुना 'अल्लाहु अकबर'...
मैं जम गया। मेरी जान निकल गई। क्योंकि हम सब जानते हैं 'अल्लाहु अकबर' के बाद क्या होता है। टीवी पर चौबीसों घंटे यही दिखता है — एक धमाका होता है। तो मेरे मन में था कि ये बंदा अपनी रूहानी रस्में पूरी कर रहा है, ताकि आकर मेरा गला काटे और अपने ख़ुदा को चढ़ावा चढ़ाए, या जो कुछ भी उसका चक्कर हो। मुझे नहीं पता, पर बात अच्छी नहीं थी, क्योंकि 'अल्लाहु अकबर' का मेरे लिए बहुत बुरा मतलब था। मैं हिल तक नहीं सका। मैंने ख़ुद से पूछा — 'तू यहाँ आया ही क्यों, एडुआर्डो? तू कितना बड़ा बेवक़ूफ़ है!
तुझे पता है ये लोग ख़तरनाक हैं, और तू यहाँ फँसा बैठा है, और अब तू मारा जाने वाला है!' और मुझे याद है, मैंने ख़ास तौर पर ख़ुदा से माँगा कि इस नामुमकिन हालत से मुझे बचा ले। मैं दुआ कर रहा था, ख़ुदा से मदद माँग रहा था। सिमो मोहम्मद का साया बड़ा होता जा रहा था, और बड़ा, और मुझे फ़र्श चरमराता सुनाई दे रहा था, और वो मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे, और मुझे याद है, उनका हाथ बहुत साफ़ और बड़ा दिखता हुआ मेरे सामने आ रहा था, और उन्होंने वो कंबल उठाया, मुझे ओढ़ा दिया, बत्ती बुझाई, टीवी बंद किया, और वापस सो गए। उसी पल, वहीं, उसी वक़्त, मेरे दिल ने मान लिया — ये लोग बुरे इंसान हो ही नहीं सकते, ये नामुमकिन है। माँ हमेशा कहती थीं कि अगर सच में जानना हो कि तुम कैसे इंसान हो, तो ख़ुद को तब देखो जब कोई देख न रहा हो। वही तुम्हारी असल है। और यहाँ देखिए, ये भाई थे, जो आधी रात को, जब कोई देख नहीं रहा था। उठकर अपने रब से बात करते हैं, उससे बतियाते हैं। और वही बातचीत उन्हें उस मेहमान के साथ भलाई करने को प्रेरित करती है, जिसकी ख़ातिरदारी वो पहले ही हद से बढ़कर, ख़ास मेहमान की तरह कर चुके हैं। तो मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आ रही थी, क्योंकि मेरी परवरिश भेदभाव सिखाकर नहीं हुई थी। मेरी परवरिश नस्लभेद सिखाकर नहीं हुई थी। और मुझे पता था कि मैं इससे बेहतर हूँ। और मुझे लग रहा था कि मैं पूरी तरह...
शायद सही लफ़्ज़ यही होगा — शर्मिंदा। और वही पहला मौक़ा था जब अल्लाह ने मेरा दिल इस्लाम के लिए नरम किया, और मुसलमानों के लिए भी। तो अगले दिन सिमो मोहम्मद ने मुझसे कहा कि वो जुमे की नमाज़ पढ़ने जा रहे हैं, जो मर्दों पर जुमे के दिन फ़र्ज़ है। और उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके साथ चलना चाहूँगा। मैंने कहा, 'बिल्कुल, मैं आपके साथ चलूँगा।' और वो पहली बार था जब मैं मस्जिद गया, और मुझे याद है, मैं दंग रह गया — सबको इतने संजीदा और सादे माहौल में देखकर, जहाँ लोग अपना माथा, अपना चेहरा, यानी जिस्म का सबसे इज़्ज़तदार हिस्सा, अपने रब की इबादत में ज़मीन पर रख देते हैं। और ज़िंदगी में पहली बार मैंने नमाज़ पढ़ी, और मुझे याद है, मुझमें जैसे नई जान आ गई। मुझे नहीं पता था कि मैं कर क्या रहा हूँ, पर ख़ुदा मुझे उस माहौल में ला रहा था, जहाँ मुझे अपने अंदर सचमुच लगा कि मैं ज़िंदगी में लौट रहा हूँ। कोई तस्वीर नहीं। न वहाँ कुर्सियाँ थीं, न बेंच थे, वहाँ ऐसे माहौल के सिवा कुछ नहीं था, जो आपको ध्यान लगाने में मदद करे। किस पर ध्यान?
ख़ुदा पर ध्यान। पर फिर, उसामा के भाई ने इतनी समझदारी से बात की कि एक ईसाई होते हुए भी मुझे लगा कि उनकी नज़र में मैं इज़्ज़तदार इंसान हूँ, क्योंकि उन्होंने बताया कि ईसा का नाम क़ुरआन में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पच्चीस गुना ज़्यादा आया है। और उन्होंने मुझे ये भी बताया — 'हमारे यहाँ एक सूरह है जिसका नाम मरयम है, और, पता है, हम मुसलमान असल में ईसाइयों की इज़्ज़त करते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि बाइबल भी असल में वही का एक हिस्सा थी, पर अफ़सोस, इतिहास में उसे बिगाड़ा और बदला गया। पर हमें नहीं पता कि कौन सा हिस्सा बदला और कौन सा वैसा ही रहा, इसलिए हमें पूरी किताब की इज़्ज़त करनी है।' मुझे लगा — वाह, ये लोग हमारी इज़्ज़त करते हैं। ये हमें कोसते नहीं। दिन भर मुझे यही सुनने को मिलता था कि ईसाई मुसलमानों को कोसते हैं, और यहाँ ये मुसलमान ईसाइयों के बारे में इतनी इज़्ज़त से बोल रहे हैं। तो मैं वहीं इन लोगों से, और जीने के इस तरीक़े से, और गहरी मुहब्बत में पड़ चुका था — यहाँ तक कि जब मैं मोरक्को से लौटा, तो इस्लाम को लेकर मेरा जोश दस गुना हो गया। तो जब भी मेरे आसपास या मेरे माहौल में कोई मुसलमानों और इस्लाम की बुराई करता, मैं सीधे भिड़ जाता। कोई क़ुरआन के बारे में बकवास शुरू करता, तो मैं कहता — 'तूने आख़िरी बार किताब कब खोली थी?
कभी नहीं! तो मुँह बंद रख।' है न? मुसलमानों का पक्ष लेने का, वो बहुत ही आक्रामक और बेबाक तरीका था। कुछ लोगों ने तो पूछ लिया — 'एडुआर्डो, तू मुसलमान है क्या? तुझे हो क्या गया है?
तू बदल गया है।' और मैंने रोज़े रखने शुरू कर दिए। बता दूँ, मैं इस्लाम क़बूल करने से पहले ही रोज़े रख रहा था। मैंने दो बार रोज़े रखे थे। तो लोगों को कुछ-कुछ अंदाज़ा हो गया था, और लोग पहले से ही अंदाज़ा लगा रहे थे कि ऐसा होने वाला है। बस मुझे ही नहीं पता था। जिस आख़िरी घड़ी मैंने इस्लाम क़बूल करने का फ़ैसला किया, उससे पहले तक मुझे अंदाज़ा ही नहीं था कि ऐसा होगा। फिर मेरे सामने मैल्कम एक्स का क़िस्सा आया। और मैल्कम एक्स ने मुझे इस्लाम क़बूल करने की हिम्मत दी, क्योंकि इस आदमी का क़िस्सा एक बहुत ज़ोरदार और झकझोर देने वाली याद दिलाता है कि ज़िंदगी में आपका मक़सद सलामती ढूँढ़ना नहीं है, आराम ढूँढ़ना नहीं है — बल्कि सच ढूँढ़ना है। और उन्होंने पूरी ज़िंदगी ये काम इतनी बेख़ौफ़ी से किया कि वो मेरे लिए बहादुरी की मिसाल बन गए — कि आज के दौर में असली मर्दानगी होती क्या है। फ़िल्म ख़त्म होते ही मैंने उसामा को फ़ोन लगाया और उससे कहा — 'उसामा, सुन भाई, मैं अब मुसलमान हूँ।' और उसामा बोला, 'अल्लाहु अकबर, तकबीर!' वो इतना ख़ुश था कि चिल्ला रहा था, और वो मुझसे ऐसे बात कर रहा था जैसे मैं पहले से ही मुसलमान हूँ। तो वो कह रहा था, 'माशाअल्लाह।' मैंने उसे पहले कभी ये सब कहते नहीं सुना था, क्योंकि वो बहुत ध्यान रखता था कि किन लफ़्ज़ों में मुझसे बात करे। और उसने कहा, 'क्या तूने कलमा पढ़ लिया?
और, पता है, ये बड़ी ख़ुशी की बात है। और बता।' मैंने कहा, 'मैंने क्या? कलमा?' मुझे लगा वो कोई खाने की चीज़ है, जो मुझे खानी है — जैसे शवर्मा। और मैंने कहा, 'वो क्या होता है?
मैं अभी मुसलमान बना हूँ, तू किस बारे में बात कर रहा है?' उसने कहा, 'नहीं, पर कलमा तो पढ़ना पड़ेगा।' 'वो होता क्या है?' और उसने बताया, 'यानी तुझे ईमान की गवाही देनी होगी।' तो मैंने फ़ोन पर ही उसके साथ ईमान की गवाही दी। फिर उसामा ने कहा, 'मैं तुझे मस्जिद ले चलता हूँ।' और मैं उसके साथ मस्जिद में था — आईसीक्यू, इस्लामिक सेंटर ऑफ़ क्यूबेक, और मुझे याद है, जब मैं कलमा पढ़ रहा था, मैं ऐसे माहौल में था जहाँ मुझे बस बंगाली, पाकिस्तानी, हिंदुस्तानी, अरब दिख रहे थे, और मुझे ज़बरदस्त कल्चरल शॉक लगा। मुझे याद है, मैंने मन में सोचा — 'एडुआर्डो, तुझे सच में पता भी है कि तू किसमें फँस गया है?
ये तेरे जैसे लोग तो नहीं लगते। बड़ी-बड़ी दाढ़ियों और पगड़ियों वाले लोग, और उन्होंने कूफ़िया — अरबी रुमाल, षोब पहन रखे थे।' और मुझे लगा जैसे मैं ग़लत लोगों में आ गया हूँ। और बात तब और भी भारी हो गई, जब कलमा के बाद ये सारे मर्द आकर मुझे गले लगाने और चूमने लगे, और मुझे याद है, इससे मेरा दम ही घुट गया, क्योंकि मैंने पहले कभी किसी मर्द को गले नहीं लगाया था। समझे?
मैं तो अपने पिता को भी मुश्किल से गले लगाता था। और अब ये बड़े-बड़े दाढ़ी वाले मर्द आकर मुझे गले लगा रहे थे और मेरा माथा चूम रहे थे। तो मेरे लिए ये मेरी मर्दानगी पर हमले जैसा था। पर मुझे याद है, वो भाई इतने सच्चे, इतने भावुक और इतने ख़ुश थे, कि मुझे पता चल गया कि यहाँ कुछ ख़ास हो रहा है — कुछ ऐसा, जो उस पल मेरी समझ से बाहर था। जब मैंने कलमा पढ़ा, तो एक भाई मेरे पास आए और मेरी आँखों में देखकर बोले — 'भाई, मैं तुम्हें एक बहुत ज़रूरी नसीहत देने जा रहा हूँ, और तुमसे वादा चाहता हूँ कि इसे कभी नहीं भूलोगे — इस्लाम को देखना, मुसलमानों को मत देखना।' और पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि वो कोई बहुत बुनियादी बात कह रहे हैं, और मैंने वो नसीहत पकड़ ली, और उसने कई बार मेरा ईमान बचाया। और मेरे अपने मामले में, सबसे ज़ोरदार पल, मैं कहूँगा, वो था जब मेरी दुआ पूरी की पूरी क़बूल हो गई — वो दुआ जिसमें मैंने ख़ुदा से तीन चीज़ें माँगी थीं — मुझे सच देने के लिए कोई परदेसी भेज, ताकि मैं उस क़बीले का हिस्सा बन सकूँ जो सच पर है, और ताकि उसी क़बीले से मुझे ज़िंदगी भर का एक साथी भी मिल जाए। उसामा वही परदेसी था, जो वो पैग़ाम लेकर आया, है ना?
उसने मुझे इस्लाम के पैग़ाम के साथ उस क़बीले तक पहुँचाया, और आख़िर में मेरी शादी एक मोरक्कन से हुई। ऐसी बात गढ़ी नहीं जा सकती। इस्लामी तरीक़े से जीना कितना मुश्किल रहा — हराम से बचना, पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ना, वग़ैरह? असल बात ये है कि जब मैंने इस्लाम क़बूल किया, तो मैं फ़ौरन कोई परहेज़गार बंदा नहीं बन गया। अगले ही हफ़्ते मैं बीच पर था, और मेरे पास नमाज़ के वो काग़ज़ थे, जो प्लेन में चढ़ने से ठीक पहले प्रिंट कराए थे, जिनसे मैं बीच पर ही नमाज़ पढ़ना सीख रहा था — बिना शर्ट के, शॉर्ट्स में, कान में बालियाँ और सिर पर टोपी। समझ रहे हैं?
तो मैं सच में जूझ रहा था, पर जितना बन पड़ता था, कर रहा था। मुसलमान बनना — ख़ासकर तब, जब आपकी ज़िंदगी मेरे जैसी रही हो — सचमुच दोबारा जीना सीखने जैसा है। ये सीधे हाथ वाले का उल्टे हाथ से काम करना सीखना जैसा है। या इसका उल्टा। ये समझ के उलट है। पर मुझे तब सबसे ज़्यादा मदद मिली, जब मैंने सचमुच माहौल बदलना शुरू किया और अपनी यूनिवर्सिटी की मुस्लिम स्टूडेंट एसोसिएशन से जुड़ गया, और मेरे आसपास ऐसे लोग हो गए जो मेरे लिए रहनुमा का काम कर सकते थे। पर मुश्किल भी हुई, क्योंकि बहुत से मुसलमानों से मेरी पटती नहीं थी, और आपको समझना होगा कि ये नाइन-इलेवन के ठीक बाद का वक़्त था, तो बहुत से मुसलमान अपने ईमान को लेकर सफ़ाई देते फिरते थे, और मेरे लिए मुसलमानों से गहरा रिश्ता बना पाना बहुत मुश्किल था। और ग़लत मत समझिएगा, इस्लाम को लेकर मुझे कभी शक नहीं हुआ। मैं हमेशा से पक्का था। पर मुझे इस बात पर सख़्त शक था कि मुसलमान के तौर पर ये सफ़र चलाते रहने की ताक़त मुझमें है भी या नहीं, क्योंकि माहौल के लिहाज़ से ये इतना मुश्किल था — मैं हराम की धारा के ख़िलाफ़ तैर रहा था। फिर मुझे समझ आया कि इस धारा के ख़िलाफ़ तैरा नहीं जा सकता, लेन बदलनी पड़ती है। और मैंने यही किया, अलहम्दुलिल्लाह। आपके इस्लाम क़बूल करने के बाद, क्या आपके आसपास कोई और भी मुसलमान हुआ?
क्या आपके घर में से बाद में किसी ने इस्लाम क़बूल किया?
मेरा एक नया लातीनी मुसलमान दोस्त है, और मैं बहुत ख़ुश हूँ क्योंकि मैं उसके साथ घूमता हूँ और हम मज़े करते हैं। और एक दिन उसने अपने बेसमेंट में जन्मदिन की महफ़िल रखी, एक और लड़के के साथ, जो मेरे ही हाई स्कूल में था और उसका सबसे अच्छा दोस्त था, और हम वहाँ ऐसे माहौल में थे जो कुछ ख़ास हलाल नहीं था। वहाँ बहुत सी ग़लत चीज़ें चल रही थीं। तो फिर उसने फ़ातिहा पढ़ने के बाद ऐलान किया, वो कहने लगा कि वो अपने सबसे अच्छे क्यूबेकी दोस्त को — जो हम दोनों का साझा दोस्त था — वो तोहफ़ा देने जा रहा है जो कोई दोस्त अपने सबसे अच्छे दोस्त को दे सकता है। और मैं दूर से ये देख रहा था और सोच रहा था — 'ये क़ुरआन न हो, बस।' क्योंकि अगर उसने इस बंदे को क़ुरआन दे दिया, तो ये उसके पन्ने मोड़कर उनमें भरकर पिएगा, क्योंकि मैंने उस बंदे को ज़िंदगी में कभी होश में नहीं देखा। वो हमेशा नशे में रहता था या पिए हुए। तो मैंने उस पर फ़ैसला सुना दिया। तो हमारा क्यूबेकी दोस्त उसकी तरफ़ चला, तोहफ़ा लिया, और रास्ते में गिरते-गिरते बचा, क्योंकि वो पिए हुए था। और बोला, 'अरे, अरे, शुक्रिया, बड़ी मेहरबानी।' और फिर उसने उसे खोला, और वो क़ुरआन ही निकला। तो मेरे मन में आया — 'हाय, क़ुरआन का क्या बुरा इस्तेमाल हुआ।' कुछ महीने बाद, या शायद साल भर बाद, मैं खाने के बाद अपने ससुराल के पास वाली मस्जिद में था, और हमने अभी-अभी इशा की नमाज़ ख़त्म की थी कि किसी ने मेरी पीठ थपथपाई। और मैंने देखा। और वो वही बंदा था, जिसे मेरे पेरूवी दोस्त ने क़ुरआन दिया था। और उसने कहा, 'अस्सलामु अलैकुम, कैसे हो?' और मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है। और मुझे कुछ मिनट लगे ये समझने में कि जिस बंदे को मेरे पेरूवी दोस्त ने क़ुरआन दिया था, उसने इस्लाम क़बूल कर लिया। मुझे याद है, जब उसने मुझे अपनी नई हालत बताई, तो सबसे पहले मैंने उस भाई से यही कहा — 'माफ़ करना, मुझे तुमसे बिल्कुल सच कहना है। मैंने तुम पर फ़ैसला सुना दिया था, मुझे लगा था कि तुम उस क़ुरआन को बरबाद करोगे और उसके पन्नों में भरकर पिओगे।' और मैंने फ़ौरन माफ़ी माँगी, क्योंकि देखिए, एक बार फिर — आपको कभी पता नहीं कि अल्लाह किसे हिदायत दे दे। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की किस बात ने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?
हमारे प्यारे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मर्दानगी और किरदार की मिसाल थे। और मुझे बहुत वक़्त लगा ये सचमुच समझने में कि उनकी शख़्सियत का दुनिया पर क्या असर पड़ा, क्योंकि इस्लाम सीखने के इस सफ़र में आपसे अक्सर कहा जाता है कि आपको उनसे मुहब्बत करनी है। पर किसी को जानने में वक़्त लगता है। और हमारे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कई सीरतें पढ़ने के बाद, मुझे समझ आया कि वो हुज्जतुल-इस्लाम, वो इस्लाम की दलील हैं। वो ख़ुद अपने आप में एक चमत्कार हैं, क्योंकि उनके किरदार और उनकी ईमानदारी में कोई दोष नहीं, और साथ में वो सादगी... अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने उन्हें कितनी बार टोका?
और उन्होंने उसे कभी दिल पर नहीं लिया। फ़ौरन सुधार लिया। 'जब तक तू मुझसे राज़ी है, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मुझे माफ़ कर दे।' सोचिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस कमरे में आते हैं। आप सबसे पहले उनसे क्या कहना चाहेंगे? मुझे नहीं लगता कि मैं बोल भी पाऊँगा। मुझे नहीं पता कि मैं उनकी तरफ़ देख भी पाऊँगा या नहीं। मैं शायद उनके क़दम चूमना चाहूँगा। हम्म... हाँ। अल्लाह हमें जन्नत में उनसे मिलाए, इंशाअल्लाह। आमीन। अगर आपको दुनिया के सारे ग़ैर-मुस्लिमों से बात करने का मौक़ा मिले, ख़ासकर शायद ब्राज़ीली और कनाडाई लोगों से, तो चंद मिनटों में आप उनसे क्या कहना चाहेंगे?
मैं कहूँगा — इस्लाम को एक मौक़ा दीजिए। सच कहूँ तो इस्लामोफ़ोबिया गढ़ा हुआ है। ऐसा नहीं है कि ये दुनिया में यूँ ही हो गई। इस पूरे कारोबार के पीछे कुछ लोग हैं, जो दिन-रात लगे हुए हैं ताकि आम लोग उलझे रहें कि मुसलमान कौन हैं और हम खड़े किस बात पर हैं। और एक ऐसे समाज के तौर पर, जो अपने तर्कशील और समझदार होने पर फ़ख़्र करता है, मुझे लगता है हमारी कथनी और करनी एक होनी चाहिए, और इस सस्ते प्रोपेगैंडा का शिकार नहीं होना चाहिए। क्या आपने भी इस्लाम क़बूल किया है, पर समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें? या फिर आप पैदाइशी मुसलमान तो हैं, पर अब बिल्कुल नए सिरे से इस्लाम सीखना चाहते हैं?
ठीक इसीलिए हमने बनाया है ये स्टेप इस्लाम ऐप। ये एकदम फ्री और बिना ऐड वाला ऐप है, जो आसान और सिलसिलेवार तरीक़े से आपको इस्लाम सिखाता है। इसमें आप आसानी से ईमान की बुनियादी बातें और क़ुरआन की ज़रूरी टर्म्स सीखेंगे, और अपने हिसाब से प्रैक्टिकल टास्क करके ऐसी आदतें अपनाएँगे, जो ज़िंदगी भर काम आएँगी। शैतान के बहकावे में आकर इसे मत टालें। नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें, स्टेप इस्लाम डाउनलोड करें, और हमेशा की ख़ुशियों की तरफ़ आज ही पहला क़दम बढ़ाएँ।