ब्रह्मांड: 6 दिन या 13.8 अरब साल? - साइंस कुरआन को सच साबित कर रही है!
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क्या विज्ञान और क़ुरआन में विरोधाभास हैं? छह दिन। क्या ब्रह्मांड की रचना के लिए क़ुरआन सचमुच इतना ही समय बताता है? और सात आसमानों वाली बात का क्या? क्या विज्ञान क़ुरआन की सात आसमानी परतों वाली बात सचमुच साबित कर सकता है? और क्या क़ुरआन सचमुच ये कहता है कि सूरज कीचड़ भरे झील में डूबता है? एक तरफ़ तो क़ुरआन में हर रोज़ नए-नए वैज्ञानिक चमत्कार खोजे जा रहे हैं। दूसरी तरफ़, कुछ आयतें आधुनिक विज्ञान से टकराती हुई लगती हैं। तो फिर सही कौन सा है?
इस वीडियो में हम ये सारी उलझनें दूर कर रहे हैं। हम कुछ सबसे ज़्यादा चर्चित आयतों को गहराई से जाँचेंगे। और आज मेरा एक स्पष्ट लक्ष्य है। इस पूरी यात्रा के अंत तक आपके पास कुछ बुनियादी नियम होंगे। आपके पास मास्टर चाबियाँ होंगी जिससे आप आगे आने वाले लगभग सभी सवालों को स्पष्ट रूप से समझ पायेंगे। इससे क़ुरआन को देखने का आपका दृष्टिकोण बदल जाएगा, और आप सीखेंगे कि अपने ही नियमों से आपत्तियों का जवाब कैसे दिया जाए। इतिहास बताता है कि यूरोप में चर्च ने विज्ञान से कैसे लड़ाई लड़ी। इससे धर्म के प्रति एक स्थायी गुस्सा पैदा हुआ, और उसी पैमाने पर इस्लाम को भी अन्यायपूर्ण ढंग से तौला गया। अब वक़्त आ गया है कि इस ग़लतफ़हमी को मिटा दिया जाए। जिन्हें कुछ लोग ग़लतियाँ कहते हैं, शायद वो असल में छिपे हुए चमत्कार हों। और हो सकता है क़ुरआन और विज्ञान बस एक ही बात कह रहे हों मगर, दो अलग-अलग भाषाओं में। सबसे पहले हमें एक बात स्पष्ट करनी होगी। क्या क़ुरआन अल्लाह की किताब है?
इस आधार के बिना, ब्यौरों की जाँच-पड़ताल करना बेकार है। अगर क़ुरआन वास्तव में सच है, तो ये मुश्किल बातें बस ऐसे सवाल हैं, जिन पर हमें खोज करनी है। आज जवाब न पता होने का मतलब ये नहीं कि किताब ग़लत है। इसका मतलब बस इतना है कि हम अभी भी सीख रहे हैं। पर अगर आपने अपने मन में ये आधार पक्का नहीं किया, तो कोई जवाब आपको सचमुच संतुष्ट नहीं करेगा। इसीलिए इस्लाम के प्रमाण देखना — जिन्हें आप हमारे दूसरे वीडियो में खोज सकते हैं — पूरी तस्वीर को समझने की असल कुंजी है। और यही हमारा पहला गोल्डन रूल है। तो चलिए, सबसे मशहूर दावे से शुरू करते हैं। सूरह क़ाफ़ की अड़तीसवीं आयत में कहा गया है — 'बेशक हमने आसमानों और ज़मीन को, उनके बीच की हर चीज़ को छह दिनों में बनाया, और हमें ज़रा सी भी थकान नहीं छू सकी।' विज्ञान हमें बताता है कि ब्रह्मांड को बनने में अरबों साल लगे, जबकि क़ुरआन कहता है, छह दिन। क्या ये विरोधाभास नहीं है?
सबसे पहले हमें एक महत्वपूर्ण सवाल पूछना होगा। क़ुरआन में 'दिन' का असल मतलब क्या है? जब हम 'दिन' कहते हैं, तो अपने आप हमारे मन में चौबीस घंटे आते हैं। पर उस वक़्त जब ज़मीन और सूरज थे ही नहीं, तब चौबीस घंटे का पैमाना लगाना कितना तार्किक है? क्या क़ुरआन का मतलब सचमुच यही है कि ज़मीन के बनने से भी पहले, ज़मीन अपनी धुरी पर छह बार घूम चुकी थी?
बिल्कुल नहीं। इसे समझने के लिए हमें उस मूल अरबी शब्द को देखना होगा, जो क़ुरआन ने इस्तेमाल किया — यौम। अपने असली भाषाई संदर्भ में, 'यौम' का मतलब सिर्फ़ चौबीस घंटे नहीं होता। ये एक ऐसे दौर, चरण या युग की ओर इशारा करता है, जिसका आरंभ भी हो और अंत भी। इस लिहाज़ से देखें तो वो छह दिन असल में रचना के छह बड़े चरण हैं। ब्रह्मांड के रचयिता के लिए, समय को सिर्फ़ हमारे चौबीस घंटे के चक्र से नहीं नापा जा सकता। उसके विशाल राज में, बृहस्पति पर एक दिन बस दस घंटे का होता है, जबकि शुक्र पर एक अकेला दिन पूरे एक साल से भी लंबा होता है। और वो ख़ुद क़ुरआन में हमें बताता है — 'फ़रिश्ते और जिब्राईल उसकी तरफ़ ऐसे दिन में चढ़ेंगे, जिसकी मिक़दार पचास हज़ार साल है।' या फिर एक और आयत में — '...ऐसा दिन, जिसकी मिक़दार तुम्हारी गिनती से एक हज़ार साल है।' क़ुरआन ख़ुद ही समझा देता है कि दिन का पैमाना बदलता रहता है। तो फिर क़ुरआन में ऐसी आयत आख़िर क्यों है?
क़ुरआन ने इन छह दौरों का ज़िक्र क्यों किया?
बात ये नहीं कि इसमें कितना समय लगा। बात ये है कि इसे कैसे बनाया गया। अगर आपको पता चले कि तेरह नहीं, बल्कि पंद्रह अरब अस्सी करोड़ साल लगे, तो इससे आपकी ज़िंदगी नहीं बदलेगी। पर ये जानना कि ये सब चरण-दर-चरण हुआ था, हमें दिखाता है कि रचना एक नियंत्रित व निर्धारित प्रक्रिया थी। जो अव्यवस्था जैसा दिखता है, वो भी असल में नियंत्रण में है। हर चीज़ एक प्रक्रिया से चलती है। हर चीज़ नापी हुई है, और हर चीज़ का एक उद्देश्य है। अब ये पता लगाना वैज्ञानिकों का काम है कि वो छह चरण आख़िर कौन-कौन से हैं। और जब हम उनकी खोजों पर नज़र डालते हैं, तो ये मेल नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हम देखते हैं कि ये एक ऐसी यात्रा है, जो ठीक छह चरणों में बैठ जाती है। ये एक ही बिंदु से शुरू होती है, और उस जीवन पर ख़त्म होती है, जो आज हम देखते हैं। जैसा हमने शुरू में कहा था, क़ुरआन और विज्ञान दो अलग-अलग भाषाओं में एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। अल्लाह सिर्फ़ मुट्ठी भर विशेषज्ञों से बात नहीं करता। वो ऐसी भाषा बोलता है, जो हर दौर और हर शिक्षा से परे जाकर हर दिल तक पहुँचती है। और यहीं से हम अपने दूसरे गोल्डन रूल पर पहुँचते हैं। क़ुरआन विज्ञान की पाठ्यपुस्तक नहीं है। ये जीवन की मार्गदर्शिका है। ये कला की बात सिर्फ़ कला के लिए नहीं, बल्कि कलाकार से परिचय करवाने के लिए करता है, हमारे रचयिता से परिचय के लिए करता है। चाहे आप वैज्ञानिक हों या चरवाहे, क़ुरआन आपको देखने का सही ढंग सिखाता है। इसीलिए वो डायनासोर या तकनीकी बातों में नहीं पड़ता, बल्कि ऊँट और मक्खी जैसे सीधे उदाहरणों पर फोकस करता है। अब हमें एक और गहरे रहस्य का सामना करना होगा। आधुनिक विज्ञान ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स की बात करता है। पर क़ुरआन एक अलग शब्द इस्तेमाल करता है — सब्अ समावात (सात आसमान)। सूरह अल-मुल्क में अल्लाह कहता है — 'वही है जिसने सात आसमान बनाए, एक के ऊपर एक। उस रहमान की रचना में तुम्हें कहीं कोई कमी नज़र नहीं आएगी। तो दोबारा नज़र डालो — क्या तुम्हें कोई बिगाड़ दिखता है?' पहली नज़र में हमें बस एक विशाल, अनंत अंतरिक्ष दिखता है। तो इन सात परतों का असल मतलब आख़िर क्या है?
क्या ये कोई ऐसा वैज्ञानिक तथ्य है, जो हमने अभी तक खोजा नहीं? या फिर हम इसे ग़लत ढंग से देख रहे हैं? चलिए, इस रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं, और देखते हैं कि ये ब्रह्मांड की हमारी आधुनिक जानकारी में कैसे बैठता है। कल्पना कीजिए, आप हाथ में कॉफ़ी का प्याला लिए तेज़ रफ़्तार ट्रेन में बैठे हैं। आपके लिए वो कॉफ़ी बिल्कुल स्थिर है। पर प्लेटफ़ॉर्म पर बाहर खड़े किसी इंसान के लिए, वही कॉफ़ी दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से जा रही है। सही कौन है? आप भी, और वो भी। संदर्भ बिंदु के बिना रफ़्तार और गति का कोई मतलब नहीं होता। कोई चीज़ कैसे चलती है, ये तय करने के लिए आपको पहले पूछना होगा — किसके मुक़ाबले?
ब्रह्मांड में कोई भी चीज़ अपने आप नहीं चलती। वो हमेशा किसी बड़े दायरे के अंदर चलती है। और हर आसमान अपने अंदर की हर चीज़ को एक तय बिंदु देता है। आपकी गाड़ी ज़मीन के मुक़ाबले चलती है। ज़मीन सूरज के मुक़ाबले चलती है। तो पहला आसमान ज़मीन का दायरा हुआ, और दूसरा आसमान हमारा सौरमंडल हुआ। और हमारा सूरज भी स्थिर नहीं है। वो उन्नीस किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से एक दिशा में बढ़ रहा है। पास के तारों को अपना संदर्भ बनाकर ही हम इस गति को समझ पाते हैं। तो तीसरा आसमान तारों का अपना पड़ोस हुआ। और वो तारे आकाशगंगा नाम की गैलेक्सी के केंद्र के चारों ओर घूमते हैं। तो यही चौथा आसमान हुआ। पाँचवाँ आसमान लोकल ग्रुप है — क़रीब पचास गैलेक्सियों का एक गुच्छ, जिसमें एंड्रोमेडा भी शामिल है। यहाँ हम नापते हैं कि पूरी गैलेक्सियाँ एक-दूसरे के मुक़ाबले कैसे चलती हैं। छठा आसमान सुपरक्लस्टरों का पूरा क्षेत्र है। इस विशाल पैमाने पर, हज़ारों गैलेक्सी-समूह गुरुत्वाकर्षण की चमकती नदियों की तरह साथ-साथ बहते हैं। और सातवाँ आसमान ख़ुद वो Observable universe (दृश्य ब्रह्मांड) है। सबसे बड़ा दायरा। यहाँ ख़ुद अंतरिक्ष का फैलाव ही संदर्भ बन जाता है। इसमें सब कुछ समाया हुआ है। ये एक ऐसा परतदार क्रम है, जिसमें नीचे वाली व्यवस्था हमेशा अपना मतलब ऊपर वाली में ही पाती है। दूसरी तरफ़, अल्लामा बदीउज़्ज़मान इस पर एक अलग दृष्टिकोण सामने रखते हैं। ग्रहों की गति हवा से गुज़रते किसी हवाई जहाज़ जैसी कम है, और पानी में तैरती किसी मछली जैसी ज़्यादा है। अंतरिक्ष तारों के चारों ओर मुड़ता है और अनदेखी लहरें बनाता है — क़रीब-क़रीब किसी विशाल ब्रह्मांडीय समुद्र जैसा। आधुनिक खगोल-वैज्ञानिक अक्सर ब्रह्मांड को एक विशाल बहते तरल की तरह देखते हैं। और क्या आप जानते हैं कि सदियों पहले क़ुरआन ने इस तरल जैसी प्रकृति की ओर इशारा किया था?
सूरह यासीन सूरज और चाँद का बयान एक बेहद ख़ास शब्द से करती है। उसमें कहा गया है ; सब अपनी अपनी कक्षा में तैर रहे हैं ये एक बिल्कुल सटीक भौतिक परिभाषा है। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस भी अंतरिक्ष को 'मौज मकफ़ूफ़' कहती है, यानी रोकी हुई लहर। क़ुरआन में इस तरल जैसी बनावट पर बार-बार ज़ोर दिया गया है। अंतरिक्ष जिस द्रव्यमान से मिलता है, उसी के हिसाब से अपना स्वभाव बदल लेता है। हमारे सौरमंडल में सूरज इसे मोड़कर एक गहरा गुरुत्व-कुआँ बना देता है। पर गैलेक्सी के पैमाने पर, अरबों तारों के सामूहिक बोझ के नीचे अंतरिक्ष मुड़ जाता है, और उन्हें एक विशाल घूमती हुई तश्तरी में ढाल देता है। ये अलग-अलग तरह की अंतर्क्रियाएँ ही ब्रह्मांड को पदार्थ के बेतरतीब ढेर से बदलकर क्रमबद्ध परतों में ले आती हैं। और हर परत अपने ही नियमों वाले एक अलग माहौल की तरह काम करती है। तो अगर इसके रचयिता ने इस उलझी हुई बनावट को सात हिस्सों में बाँटा है, तो फिर सात ही सही। पर एक सवाल पूछें — जो लोग कहते हैं कि ब्रह्मांड की सात परतें हो ही नहीं सकतीं, क्या वो इसके पीछे का गहरा संदेश चूक तो नहीं रहे?
क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ़ 'आसमान' कह देने के बजाय क़ुरआन 'सात आसमानों' पर ज़ोर क्यों देता है?
ये पूरे-के-पूरे नियंत्रण का संदेश है। किसी व्यवस्था की ठीक-ठीक हदें बता देना साबित करता है कि आप ही उसके रचनाकार हैं। या कम से कम ये कि आप उसे अंदर तक जानते हैं। अल्लाह सात अलग-अलग परतों को सात अलग-अलग नियमों से चलाता है। फिर भी ये सब एक ही जुड़ा हुआ काम है। वो ठीक एक ही वक़्त में पहली परत में उड़ती एक चिड़िया की उड़ान और चौथी परत में एक गैलेक्सी की चाल, दोनों सँभालता है। उसके लिए सूक्ष्म और विराट, दोनों एक ही बिल्कुल सुव्यवस्थित तंत्र हैं। और यही हमारा तीसरा गोल्डन रूल है। सिर्फ़ शब्दों को मत देखिए, उनके पीछे के मतलब को समझने का प्रयास कीजिए। सूरह अल-इसरा की चौवालीसवीं आयत अल्लाह के बारे में कहती है — 'सातों आसमान, ज़मीन, और जो कुछ उनमें है — सब उसकी तसबीह करते हैं...' तराज़ू के एक पलड़े में सातों आसमान, और दूसरे में अकेली ज़मीन। ब्रह्मांड में ज़मीन भले ही रेत के एक कण जैसी क्यों न हो, पर मतलब का केंद्र वही है। वो अल्लाह की कला की प्रदर्शनी है। यही वो खेत है, जिसमें आख़िरत की फ़सल के बीज बोए जाते हैं। और यही इंसानियत को राह दिखाने वालों का घर है — हमारे प्यारे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जैसे हज़ारों नबियों का। किसी चीज़ की क़ीमत उसके भौतिक आकार से, उसकी रफ़्तार से, या उसमें छिपे खनिजों से नहीं आँकी जाती। तो यही हमारा चौथा गोल्डन रूल है। क़ुरआन चीज़ों को उनके पदार्थ से नहीं, बल्कि उनके मतलब से क़ीमत देता है। इसीलिए ये सवाल, 'इतने विशाल ब्रह्मांड में क्या अल्लाह को सचमुच हमारी परवाह होगी?' आपके मन में कभी आना ही नहीं चाहिए। हमारे उलमा ने और भी कई तरह की व्याख्याएँ पेश की हैं। मिसाल के तौर पर, कुछ ने कहा कि पूरा ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स, यानी जो कुछ हमें दिखता है, वो असल में बस पहला आसमान है। उसके आगे छह और परतें ऐसी हैं, जो हमारी पकड़ और नज़र से पूरी तरह बाहर रह जाती हैं। जैसे-जैसे और विचार सामने आते हैं, हमें एक कॉमन ट्रैप से बचना होगा। हम अक्सर मान लेते हैं कि इनमें से सिर्फ़ एक ही राय सही हो सकती है। क्योंकि अपने सीमित दिमाग़ से, हम आम तौर पर अपने शब्दों से एक ही बात कहते हैं। पर अल्लाह का ज्ञान शाश्वत है। उसका कलाम एक ही साथ सच की हर परत को अपने अंदर समेट सकता है। और यहीं से हम अपने पाँचवें गोल्डन रूल पर पहुँचते हैं। क़ुरआन का एक अकेला शब्द अपने अंदर सिर्फ़ एक ही मतलब नहीं रखता। वो एक ही साथ कई अजूबों की चाबी बन जाता है। और यही तर्क ब्रह्मांड की उस रचना पर भी पूरी तरह लागू होता है, जो छह दिनों में हुई। जैसे सात आसमानों को समझने के कई सही तरीक़े मौजूद हैं, वैसे ही इन छह दिनों की भी छह अलग, सही व्याख्याएँ हो सकती हैं। वो सब सच हो सकती हैं, और अल्लाह ने एक ही साथ वो सब मुराद ली हो सकती है। पर उन व्याख्याओं का क्या, जो ग़लत हैं?
यहीं पर बहुत से लोग तर्क के एक और जाल में गिर जाते हैं। मिसाल के तौर पर, एक मशहूर राय ये थी कि सात आसमानों से मुराद हमारे सौरमंडल के वही सात दिखाई देने वाले ग्रह हैं। अपने दौर के हिसाब से ये तार्किक अंदाज़ा था। पर जैसे-जैसे विज्ञान ने और ग्रह खोजे, ये सिद्धांत ढह गया। फिर कुछ आलोचकों ने दावा किया कि क़ुरआन ग़लत साबित हो गया। पर उन्होंने तो बस एक इंसान का सिद्धांत ग़लत साबित किया था। पढ़ने वाले की ग़लतफ़हमी के लिए आप लिखने वाले को दोष नहीं दे सकते। एक सिद्धांत को ग़लत साबित कर देने का मतलब ये नहीं कि आपने सच को मिटा दिया। आपने तो बस बाक़ी छह के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। तो अगर कभी आप सुनें कि विज्ञान क़ुरआन से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता, तो ये याद रखिए आप शायद किसी ऐसी इंसानी व्याख्या को देख रहे हैं, जो निशाने से चूक गई। इस पूरे वीडियो में हमने क़ुरआन के चमत्कारों को उभारा है। इस्लाम के इतने सारे प्रमाणों की रोशनी में, ये टकराव हल का इंतज़ार करती पहेलियाँ रह जाते हैं। आज जवाब न पता होने का मतलब बस इतना है कि हम अभी सीख रहे हैं। अब चलिए, इन नियमों को अपनी आख़िरी ग़लत समझी गई आयत पर लगाते हैं। एक ताक़तवर शासक, ज़ुल-क़रनैन की यात्रा। पश्चिम की उनकी मशहूर मुहिम का बयान करते हुए आयत कहती है — 'फिर जब वो सूरज के डूबने की जगह पहुँचा, तो उसने उसे एक कीचड़ भरे चश्मे में डूबते हुए पाया...' पहली नज़र में ये चपटी ज़मीन वाली कोई पुरानी ग़लतफ़हमी लग सकती है। और काफिर आलोचक पूछते हैं, 'ज़मीन से भी बड़ा एक विशाल तारा भला कीचड़ के गड्ढे में सचमुच कैसे जा गिरेगा?!' जवाब असल में उसी आयत के अंदर छिपा है, जिस पर वो हमला कर रहे हैं। क़ुरआन ये नहीं कहता कि सूरज सचमुच किसी कीचड़ भरे गड्ढे में डूब गया। ठीक-ठीक लफ़्ज़ ये हैं — 'उसने उसे डूबते हुए पाया।' यहाँ मुसाफ़िर को जो दिखा, उसे बताने के लिए क़ुरआन रोज़मर्रा की इंसानी भाषा इस्तेमाल करता है। वो असल में क्षितिज का ठीक नज़ारा क़ैद करते हुए एक कैमरे की तरह काम करता है। आयत से हमें बस इतना पता चलता है कि वो पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। वो कहाँ से चला और कहाँ जाकर रुका, ये हमें नहीं पता। और फिर भी, बस एक ही लाइन में, क़ुरआन उस ठीक-ठीक जगह का इतना शानदार बयान कर देता है, जहाँ सदियों पहले ये पूरी घटना घटी थी। वो ऐसी जगह खड़ा था, जहाँ एक विशाल समुद्र बिल्कुल किसी उबलते कीचड़ भरे चश्मे जैसा दिखता था। पश्चिम की उसकी यात्रा उसे महाद्वीप के बिल्कुल किनारे तक ले गई — ठीक एक विशाल समुद्र के सामने। वो शायद अटलांटिक रहा होगा। और वो गर्मियों का बीच का वक़्त था। तेज़ ताप तट के किनारे फैले दलदलों और दलदली इलाक़ों को तपा रहा था। इससे भारी मात्रा में भाप उठ रही थी। ज़ुल-क़रनैन स्पष्ट क्षितिज नहीं देख रहा था। वो उठती हुई धुंध और कोहरे की एक मोटी चादर के पार देख रहा था। और इसी तरह उसने किनारे से सूरज को डूबते देखा। पर बात इतनी ही नहीं। याद कीजिए, हमने कहा था कि क़ुरआन की एक ही बात अपने अंदर मतलब की कई परतें रख सकती है। ये असल में एक शानदार तर्ज़ है, जो हमें पूरे क़ुरआन में दिखती है। वो कभी इस विशाल ग्रह ज़मीन को एक सुरक्षित पालना बता देता है। धधकते सूरज को एक साधारण चराग़, और चाँद को एक सादा लालटेन। अल्लाह के इस असीम साम्राज्य में, हमारे ग्रह के सबसे बड़े समुद्र का बयान कैसे किया जाए?
सबसे विशाल समुद्र भी एक नन्हे गरम चश्मे से ज़्यादा कुछ नहीं। तो हमारा रब ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है, जिससे वो इंसान की समझ और अपनी अपार महिमा के बीच एक साझा धरातल बना देता है। आज भी हम कहते हैं — 'सूरज डूब रहा है।' और कोई ये कहकर हमें नहीं टोकता कि 'असल में तो ज़मीन घूम रही है।' बात का संदर्भ हर कोई समझ जाता है। पर अफ़सोस की बात ये है कि आज के ज़्यादातर आलोचक मतलब के बजाय लड़ाई ढूँढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने भाषा या संदर्भ को समझने में एक घंटा भी नहीं लगाया, वही सबसे पहले कहते हैं कि ये वैज्ञानिक रूप से ग़लत है। ज़रा सोचिए। आप किसी मैकेनिकल इंजीनियर से दिल का ऑपरेशन करने को नहीं कहेंगे, है ना? आप सर्जन के पास ही जाएँगे। तो फिर क़ुरआन के साथ हम अलग बरताव क्यों करते हैं?
अगर कोई अपना वक़्त क़ुरआन पर हमले करने में लगाता है, या इस्लाम की बुराई पर अपना मंच खड़ा करता है, तो उससे निष्पक्ष विश्लेषण की उम्मीद मत रखिए। अगर आपको सच चाहिए, तो विशेषज्ञों के पास जाइए। विशेषज्ञ का किया हुआ एक गहरा विश्लेषण इंटरनेट वाली सौ खोखली आलोचनाओं से कहीं बेहतर है। वो समझते हैं कि उन्हें बड़ी भारी ग़लती मिल गई। ऐसी ग़लती, जो सदियों तक मुस्लिम वैज्ञानिक पूरी तरह चूकते रहे। क्या वो सचमुच मानते हैं कि विज्ञान के इतिहास के सबसे बड़े दिमाग़ों ने क़ुरआन कभी पढ़ा ही नहीं?
इस्लाम का इतिहास सैकड़ों शानदार वैज्ञानिकों, खगोलशास्त्रियों और गणितज्ञों से भरा पड़ा है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी विज्ञान और क़ुरआन, दोनों को पढ़ने में लगा दी। हम उस सभ्यता की बात कर रहे हैं, जिसने विज्ञान की नींव रखी। आज हम जिस आधुनिक दुनिया को जानते हैं, वो उन्हीं की मेहनत पर खड़ी है। मिसाल के लिए इब्न अल-हैसम को लीजिए। आधुनिक प्रकाशिकी के जनक। उनके साथ अल-ख़्वारिज़्मी जैसे वैज्ञानिक भी थे। वो उन एल्गोरिदम के पीछे का दिमाग़ हैं, जिनसे आप अभी ये वीडियो देख रहे हैं। जाबिर बिन हय्यान ने आधुनिक रसायन विज्ञान की नींव रखी, और आठवीं सदी में दुनिया की पहली प्रयोगशाला बनाई। इब्न सीना को देखिए, जिनका चिकित्सा-कोश यूरोप के विश्वविद्यालयों में पूरे पाँच सौ साल तक अंतिम प्रमाण मानी जाती रही। अल-जज़री को देखिए — रोबोटिक्स और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के जनक। इब्न ख़ल्दून को देखिए — समाजशास्त्र और इतिहास-लेखन के जनक। इन सबने क़ुरआन को गहरी विश्लेषण-बुद्धि के साथ पढ़ा, फिर भी उन्हें उसकी आयतों में पूरा तालमेल ही मिला। फ़ातिमा अल-फ़िहरी को देखिए — वो दूरदर्शी महिला, जिन्होंने दुनिया का सबसे पुराना और लगातार चलता विश्वविद्यालय बनाया। मरियम अल-इजलिया को ही लीजिए। उस दौर में पश्चिम में, अगर कोई औरत विज्ञान को छू लेती, तो उसे यातना और मौत की सज़ा मिलती। पर इस्लामी दुनिया में मरियम अल-इजलिया ऐसा गणित और इंजीनियरिंग कर रही थीं, जिसका सपना यूरोप सदियों तक नहीं देख सका। उन्होंने एक बेहद जटिल खगोलीय यंत्र बनाया जिसे बाद में एस्ट्रोलैब कहा गया। इब्न अल-बैतार, अल-जाहिज़, अल-ज़हरावी, अल-बीरूनी, अल-बत्तानी। ये सूची चलती ही जाती है। इसीलिए एक मुस्लिम प्रोफ़ेसर, फ़ुआत सेज़गिन ने एक बार कहा था — 'पश्चिमी सभ्यता तो इस्लाम की ही संतान है।' तो अब से, जब कोई आपसे ये कहे कि उसे क़ुरआन में कोई ग़लती मिल गई है, तो आप बस मुस्कुरा सकते हैं। क्योंकि अब मास्टर चाबियाँ आपके पास हैं। उस दावे को इन्हीं से जाँच लीजिए। एक — पहले इस्लाम के प्रमाणों पर ध्यान दीजिए। ताकि कोई एक अकेला सवाल आपका पूरा आधार न हिला दे। दो — कहीं वो क़ुरआन को जीवन की मार्गदर्शिका के बजाय भौतिकी की पाठ्यपुस्तक तो नहीं समझ रहे?
क़ुरआन ब्रह्मांड का बयान हमें रसायन या खगोल सिखाने के लिए नहीं, बल्कि उस कलाकार का परिचय करवाने के लिए करता है। तीन — सिर्फ़ शब्दों को मत देखिए। उनके पीछे के मतलब को समझने का प्रयास कीजिए। हो सकता है वो उस गहरे मतलब को चूक रहे हों, जो कलाकार दिखाना चाहता है। चार — हो सकता है अल्लाह हमारी नज़र कहीं और मोड़ रहा हो, और हमसे कह रहा हो कि बिल्कुल किसी दूसरे दृष्टिकोण से देखो? जब क़ुरआन किसी रचना का ज़िक्र करता है, तो शायद उसका ध्यान उसके रोज़मर्रा के भौतिक काम पर नहीं होता। पाँच — कहीं आप पढ़ने वाले की ग़लती के लिए लिखने वाले को दोष तो नहीं दे रहे?
किसी इंसानी विद्वान के ग़लत अंदाज़े को अल्लाह के दोषरहित कलाम के साथ कभी मत मिलाइए। छह — अपने आप से पूछिए — 'क्या मैं रचयिता के ठीक-ठीक शब्द पढ़ रहा हूँ, या बस किसी अनुवादक की सीमित शब्दावली?' आप अल्लाह के उस भव्य कलाम को तर्जुमे के किसी एक सादे शब्द में नहीं ठूँस सकते। ये तो पूरे समुद्र को नन्हे प्याले में उड़ेलने जैसा है। सात — क्या आप सच की तलाश विशेषज्ञों से कर रहे हैं, या उनसे, जो सिर्फ़ लड़ाई ढूँढ़ रहे हैं?
अगर आप सचमुच इस किताब को समझना चाहते हैं, तो आपको उन उलमा के पास बैठना होगा, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी इसी पर लगा दी। उन मुनकिरों के पास नहीं, जो इस पर हमला करके कमाते हैं। आठ — इस्लाम दूसरे धर्मों जैसा नहीं है, इसलिए उसे वैसा मानकर मत चलिए। क्योंकि सौ धर्मों में से सिर्फ़ एक ही सच्चा हो सकता है। तो तर्क के हिसाब से उनमें से निन्यानवे ग़लत होने ही चाहिए। और ज़ाहिर है, उनमें विज्ञान या तर्क से विरोधाभास होगा ही। और अगर आप सच्चे धर्म को उन निन्यानवे ख़राब धर्मों के साथ बाँध देंगे, तो आप निष्पक्ष नहीं हो रहे। आप बस आलस कर रहे हैं। आप एक धर्म को ऐसे इतिहास से तौल रहे हैं, जो उसका है ही नहीं। जहाँ इंसान के बनाए विचारों पर धूल जम जाती है, वहीं क़ुरआन हमेशा जीवंत बना रहता है। वो पुराना नहीं पड़ता। हर दौर के साथ वो और नवीन होता जाता है। जब-जब विज्ञान एक क़दम आगे बढ़ता है, तब-तब वो इस किताब से दूर नहीं जाता। बल्कि उसमें और गहरा उतरता जाता है। याद रखिए, इतिहास में घमंडी आलोचक नए नहीं हैं — जो अपने दौर के अधूरे विचारों पर क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते रहे। आज वो अधूरे सिद्धांत भुला दिए गए हैं। और वो आलोचक अपने पछतावों के साथ अपनी क़ब्रों में अकेले पड़े हैं। आख़िर, विज्ञान भी तो बदलता रहता है। जिस बात से वो आज इनकार करता है, कल उसे मान भी सकता है। और अगर आप ये चाबियाँ लगाएँगे, तो विरोधाभास का भ्रम मिट जाएगा। ब्रह्मांड को रचयिता की लिखी हुई एक किताब समझिए। विज्ञान का ध्यान सिर्फ़ किताब के वज़न पर, अक्षरों के आकार पर, काग़ज़, स्याही और वाक्यों की बनावट पर रहता है। पर वो उस ख़त को कभी पढ़ नहीं पाता। क़ुरआन, दूसरी तरफ़, इसी ब्रह्मांड को पढ़ने की कुंजी है। वो सारी रचना के पीछे का मतलब खोल देता है, और हमें रचयिता के संदेश पढ़ने के क़ाबिल बना देता है। अगर आप क़ुरआन को विज्ञान से अलग कर देंगे, तो आप पूरी ज़िंदगी बस ब्रह्मांड की किताब के अक्षर ही गिनते रह जाएँगे। पर उसका संदेश आपको कभी सचमुच समझ नहीं आएगा। और चूँकि दोनों किताबें एक ही लिखने वाले ने लिखी हैं, इसलिए उनमें विरोधाभास तर्क की दृष्टि से नामुमकिन है। हमारे वीडियो का स्रोत जानना चाहते हैं?
हम आपको अपनी ही लाइब्रेरी में बुला रहे हैं, और वही स्रोत आपको सौंप रहे हैं — अपने 'माई रिसाले' तफ़सीर ऐप के ज़रिए। इसके ट्रैकिंग फ़ीचर्स के साथ आप क़ुरआन के मायने खोज सकते हैं, ईमान मज़बूत कर सकते हैं, और इस्लाम का सच साबित करना सीख सकते हैं। अल्लाह का वजूद, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नुबूवत, और ईमान की बाक़ी सारी बातों, पूरे यक़ीन और असरदार अंदाज़ में शैतान के बहकावे में आकर ये मोका मत टालें। नीचे लिंक पर क्लिक करें, फ्री ऐप डाउनलोड करें, और आज ही हमारे साथ अपना सफ़र शुरू करें.
इस वीडियो में हम ये सारी उलझनें दूर कर रहे हैं। हम कुछ सबसे ज़्यादा चर्चित आयतों को गहराई से जाँचेंगे। और आज मेरा एक स्पष्ट लक्ष्य है। इस पूरी यात्रा के अंत तक आपके पास कुछ बुनियादी नियम होंगे। आपके पास मास्टर चाबियाँ होंगी जिससे आप आगे आने वाले लगभग सभी सवालों को स्पष्ट रूप से समझ पायेंगे। इससे क़ुरआन को देखने का आपका दृष्टिकोण बदल जाएगा, और आप सीखेंगे कि अपने ही नियमों से आपत्तियों का जवाब कैसे दिया जाए। इतिहास बताता है कि यूरोप में चर्च ने विज्ञान से कैसे लड़ाई लड़ी। इससे धर्म के प्रति एक स्थायी गुस्सा पैदा हुआ, और उसी पैमाने पर इस्लाम को भी अन्यायपूर्ण ढंग से तौला गया। अब वक़्त आ गया है कि इस ग़लतफ़हमी को मिटा दिया जाए। जिन्हें कुछ लोग ग़लतियाँ कहते हैं, शायद वो असल में छिपे हुए चमत्कार हों। और हो सकता है क़ुरआन और विज्ञान बस एक ही बात कह रहे हों मगर, दो अलग-अलग भाषाओं में। सबसे पहले हमें एक बात स्पष्ट करनी होगी। क्या क़ुरआन अल्लाह की किताब है?
इस आधार के बिना, ब्यौरों की जाँच-पड़ताल करना बेकार है। अगर क़ुरआन वास्तव में सच है, तो ये मुश्किल बातें बस ऐसे सवाल हैं, जिन पर हमें खोज करनी है। आज जवाब न पता होने का मतलब ये नहीं कि किताब ग़लत है। इसका मतलब बस इतना है कि हम अभी भी सीख रहे हैं। पर अगर आपने अपने मन में ये आधार पक्का नहीं किया, तो कोई जवाब आपको सचमुच संतुष्ट नहीं करेगा। इसीलिए इस्लाम के प्रमाण देखना — जिन्हें आप हमारे दूसरे वीडियो में खोज सकते हैं — पूरी तस्वीर को समझने की असल कुंजी है। और यही हमारा पहला गोल्डन रूल है। तो चलिए, सबसे मशहूर दावे से शुरू करते हैं। सूरह क़ाफ़ की अड़तीसवीं आयत में कहा गया है — 'बेशक हमने आसमानों और ज़मीन को, उनके बीच की हर चीज़ को छह दिनों में बनाया, और हमें ज़रा सी भी थकान नहीं छू सकी।' विज्ञान हमें बताता है कि ब्रह्मांड को बनने में अरबों साल लगे, जबकि क़ुरआन कहता है, छह दिन। क्या ये विरोधाभास नहीं है?
सबसे पहले हमें एक महत्वपूर्ण सवाल पूछना होगा। क़ुरआन में 'दिन' का असल मतलब क्या है? जब हम 'दिन' कहते हैं, तो अपने आप हमारे मन में चौबीस घंटे आते हैं। पर उस वक़्त जब ज़मीन और सूरज थे ही नहीं, तब चौबीस घंटे का पैमाना लगाना कितना तार्किक है? क्या क़ुरआन का मतलब सचमुच यही है कि ज़मीन के बनने से भी पहले, ज़मीन अपनी धुरी पर छह बार घूम चुकी थी?
बिल्कुल नहीं। इसे समझने के लिए हमें उस मूल अरबी शब्द को देखना होगा, जो क़ुरआन ने इस्तेमाल किया — यौम। अपने असली भाषाई संदर्भ में, 'यौम' का मतलब सिर्फ़ चौबीस घंटे नहीं होता। ये एक ऐसे दौर, चरण या युग की ओर इशारा करता है, जिसका आरंभ भी हो और अंत भी। इस लिहाज़ से देखें तो वो छह दिन असल में रचना के छह बड़े चरण हैं। ब्रह्मांड के रचयिता के लिए, समय को सिर्फ़ हमारे चौबीस घंटे के चक्र से नहीं नापा जा सकता। उसके विशाल राज में, बृहस्पति पर एक दिन बस दस घंटे का होता है, जबकि शुक्र पर एक अकेला दिन पूरे एक साल से भी लंबा होता है। और वो ख़ुद क़ुरआन में हमें बताता है — 'फ़रिश्ते और जिब्राईल उसकी तरफ़ ऐसे दिन में चढ़ेंगे, जिसकी मिक़दार पचास हज़ार साल है।' या फिर एक और आयत में — '...ऐसा दिन, जिसकी मिक़दार तुम्हारी गिनती से एक हज़ार साल है।' क़ुरआन ख़ुद ही समझा देता है कि दिन का पैमाना बदलता रहता है। तो फिर क़ुरआन में ऐसी आयत आख़िर क्यों है?
क़ुरआन ने इन छह दौरों का ज़िक्र क्यों किया?
बात ये नहीं कि इसमें कितना समय लगा। बात ये है कि इसे कैसे बनाया गया। अगर आपको पता चले कि तेरह नहीं, बल्कि पंद्रह अरब अस्सी करोड़ साल लगे, तो इससे आपकी ज़िंदगी नहीं बदलेगी। पर ये जानना कि ये सब चरण-दर-चरण हुआ था, हमें दिखाता है कि रचना एक नियंत्रित व निर्धारित प्रक्रिया थी। जो अव्यवस्था जैसा दिखता है, वो भी असल में नियंत्रण में है। हर चीज़ एक प्रक्रिया से चलती है। हर चीज़ नापी हुई है, और हर चीज़ का एक उद्देश्य है। अब ये पता लगाना वैज्ञानिकों का काम है कि वो छह चरण आख़िर कौन-कौन से हैं। और जब हम उनकी खोजों पर नज़र डालते हैं, तो ये मेल नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हम देखते हैं कि ये एक ऐसी यात्रा है, जो ठीक छह चरणों में बैठ जाती है। ये एक ही बिंदु से शुरू होती है, और उस जीवन पर ख़त्म होती है, जो आज हम देखते हैं। जैसा हमने शुरू में कहा था, क़ुरआन और विज्ञान दो अलग-अलग भाषाओं में एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। अल्लाह सिर्फ़ मुट्ठी भर विशेषज्ञों से बात नहीं करता। वो ऐसी भाषा बोलता है, जो हर दौर और हर शिक्षा से परे जाकर हर दिल तक पहुँचती है। और यहीं से हम अपने दूसरे गोल्डन रूल पर पहुँचते हैं। क़ुरआन विज्ञान की पाठ्यपुस्तक नहीं है। ये जीवन की मार्गदर्शिका है। ये कला की बात सिर्फ़ कला के लिए नहीं, बल्कि कलाकार से परिचय करवाने के लिए करता है, हमारे रचयिता से परिचय के लिए करता है। चाहे आप वैज्ञानिक हों या चरवाहे, क़ुरआन आपको देखने का सही ढंग सिखाता है। इसीलिए वो डायनासोर या तकनीकी बातों में नहीं पड़ता, बल्कि ऊँट और मक्खी जैसे सीधे उदाहरणों पर फोकस करता है। अब हमें एक और गहरे रहस्य का सामना करना होगा। आधुनिक विज्ञान ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स की बात करता है। पर क़ुरआन एक अलग शब्द इस्तेमाल करता है — सब्अ समावात (सात आसमान)। सूरह अल-मुल्क में अल्लाह कहता है — 'वही है जिसने सात आसमान बनाए, एक के ऊपर एक। उस रहमान की रचना में तुम्हें कहीं कोई कमी नज़र नहीं आएगी। तो दोबारा नज़र डालो — क्या तुम्हें कोई बिगाड़ दिखता है?' पहली नज़र में हमें बस एक विशाल, अनंत अंतरिक्ष दिखता है। तो इन सात परतों का असल मतलब आख़िर क्या है?
क्या ये कोई ऐसा वैज्ञानिक तथ्य है, जो हमने अभी तक खोजा नहीं? या फिर हम इसे ग़लत ढंग से देख रहे हैं? चलिए, इस रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं, और देखते हैं कि ये ब्रह्मांड की हमारी आधुनिक जानकारी में कैसे बैठता है। कल्पना कीजिए, आप हाथ में कॉफ़ी का प्याला लिए तेज़ रफ़्तार ट्रेन में बैठे हैं। आपके लिए वो कॉफ़ी बिल्कुल स्थिर है। पर प्लेटफ़ॉर्म पर बाहर खड़े किसी इंसान के लिए, वही कॉफ़ी दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से जा रही है। सही कौन है? आप भी, और वो भी। संदर्भ बिंदु के बिना रफ़्तार और गति का कोई मतलब नहीं होता। कोई चीज़ कैसे चलती है, ये तय करने के लिए आपको पहले पूछना होगा — किसके मुक़ाबले?
ब्रह्मांड में कोई भी चीज़ अपने आप नहीं चलती। वो हमेशा किसी बड़े दायरे के अंदर चलती है। और हर आसमान अपने अंदर की हर चीज़ को एक तय बिंदु देता है। आपकी गाड़ी ज़मीन के मुक़ाबले चलती है। ज़मीन सूरज के मुक़ाबले चलती है। तो पहला आसमान ज़मीन का दायरा हुआ, और दूसरा आसमान हमारा सौरमंडल हुआ। और हमारा सूरज भी स्थिर नहीं है। वो उन्नीस किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से एक दिशा में बढ़ रहा है। पास के तारों को अपना संदर्भ बनाकर ही हम इस गति को समझ पाते हैं। तो तीसरा आसमान तारों का अपना पड़ोस हुआ। और वो तारे आकाशगंगा नाम की गैलेक्सी के केंद्र के चारों ओर घूमते हैं। तो यही चौथा आसमान हुआ। पाँचवाँ आसमान लोकल ग्रुप है — क़रीब पचास गैलेक्सियों का एक गुच्छ, जिसमें एंड्रोमेडा भी शामिल है। यहाँ हम नापते हैं कि पूरी गैलेक्सियाँ एक-दूसरे के मुक़ाबले कैसे चलती हैं। छठा आसमान सुपरक्लस्टरों का पूरा क्षेत्र है। इस विशाल पैमाने पर, हज़ारों गैलेक्सी-समूह गुरुत्वाकर्षण की चमकती नदियों की तरह साथ-साथ बहते हैं। और सातवाँ आसमान ख़ुद वो Observable universe (दृश्य ब्रह्मांड) है। सबसे बड़ा दायरा। यहाँ ख़ुद अंतरिक्ष का फैलाव ही संदर्भ बन जाता है। इसमें सब कुछ समाया हुआ है। ये एक ऐसा परतदार क्रम है, जिसमें नीचे वाली व्यवस्था हमेशा अपना मतलब ऊपर वाली में ही पाती है। दूसरी तरफ़, अल्लामा बदीउज़्ज़मान इस पर एक अलग दृष्टिकोण सामने रखते हैं। ग्रहों की गति हवा से गुज़रते किसी हवाई जहाज़ जैसी कम है, और पानी में तैरती किसी मछली जैसी ज़्यादा है। अंतरिक्ष तारों के चारों ओर मुड़ता है और अनदेखी लहरें बनाता है — क़रीब-क़रीब किसी विशाल ब्रह्मांडीय समुद्र जैसा। आधुनिक खगोल-वैज्ञानिक अक्सर ब्रह्मांड को एक विशाल बहते तरल की तरह देखते हैं। और क्या आप जानते हैं कि सदियों पहले क़ुरआन ने इस तरल जैसी प्रकृति की ओर इशारा किया था?
सूरह यासीन सूरज और चाँद का बयान एक बेहद ख़ास शब्द से करती है। उसमें कहा गया है ; सब अपनी अपनी कक्षा में तैर रहे हैं ये एक बिल्कुल सटीक भौतिक परिभाषा है। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस भी अंतरिक्ष को 'मौज मकफ़ूफ़' कहती है, यानी रोकी हुई लहर। क़ुरआन में इस तरल जैसी बनावट पर बार-बार ज़ोर दिया गया है। अंतरिक्ष जिस द्रव्यमान से मिलता है, उसी के हिसाब से अपना स्वभाव बदल लेता है। हमारे सौरमंडल में सूरज इसे मोड़कर एक गहरा गुरुत्व-कुआँ बना देता है। पर गैलेक्सी के पैमाने पर, अरबों तारों के सामूहिक बोझ के नीचे अंतरिक्ष मुड़ जाता है, और उन्हें एक विशाल घूमती हुई तश्तरी में ढाल देता है। ये अलग-अलग तरह की अंतर्क्रियाएँ ही ब्रह्मांड को पदार्थ के बेतरतीब ढेर से बदलकर क्रमबद्ध परतों में ले आती हैं। और हर परत अपने ही नियमों वाले एक अलग माहौल की तरह काम करती है। तो अगर इसके रचयिता ने इस उलझी हुई बनावट को सात हिस्सों में बाँटा है, तो फिर सात ही सही। पर एक सवाल पूछें — जो लोग कहते हैं कि ब्रह्मांड की सात परतें हो ही नहीं सकतीं, क्या वो इसके पीछे का गहरा संदेश चूक तो नहीं रहे?
क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ़ 'आसमान' कह देने के बजाय क़ुरआन 'सात आसमानों' पर ज़ोर क्यों देता है?
ये पूरे-के-पूरे नियंत्रण का संदेश है। किसी व्यवस्था की ठीक-ठीक हदें बता देना साबित करता है कि आप ही उसके रचनाकार हैं। या कम से कम ये कि आप उसे अंदर तक जानते हैं। अल्लाह सात अलग-अलग परतों को सात अलग-अलग नियमों से चलाता है। फिर भी ये सब एक ही जुड़ा हुआ काम है। वो ठीक एक ही वक़्त में पहली परत में उड़ती एक चिड़िया की उड़ान और चौथी परत में एक गैलेक्सी की चाल, दोनों सँभालता है। उसके लिए सूक्ष्म और विराट, दोनों एक ही बिल्कुल सुव्यवस्थित तंत्र हैं। और यही हमारा तीसरा गोल्डन रूल है। सिर्फ़ शब्दों को मत देखिए, उनके पीछे के मतलब को समझने का प्रयास कीजिए। सूरह अल-इसरा की चौवालीसवीं आयत अल्लाह के बारे में कहती है — 'सातों आसमान, ज़मीन, और जो कुछ उनमें है — सब उसकी तसबीह करते हैं...' तराज़ू के एक पलड़े में सातों आसमान, और दूसरे में अकेली ज़मीन। ब्रह्मांड में ज़मीन भले ही रेत के एक कण जैसी क्यों न हो, पर मतलब का केंद्र वही है। वो अल्लाह की कला की प्रदर्शनी है। यही वो खेत है, जिसमें आख़िरत की फ़सल के बीज बोए जाते हैं। और यही इंसानियत को राह दिखाने वालों का घर है — हमारे प्यारे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जैसे हज़ारों नबियों का। किसी चीज़ की क़ीमत उसके भौतिक आकार से, उसकी रफ़्तार से, या उसमें छिपे खनिजों से नहीं आँकी जाती। तो यही हमारा चौथा गोल्डन रूल है। क़ुरआन चीज़ों को उनके पदार्थ से नहीं, बल्कि उनके मतलब से क़ीमत देता है। इसीलिए ये सवाल, 'इतने विशाल ब्रह्मांड में क्या अल्लाह को सचमुच हमारी परवाह होगी?' आपके मन में कभी आना ही नहीं चाहिए। हमारे उलमा ने और भी कई तरह की व्याख्याएँ पेश की हैं। मिसाल के तौर पर, कुछ ने कहा कि पूरा ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स, यानी जो कुछ हमें दिखता है, वो असल में बस पहला आसमान है। उसके आगे छह और परतें ऐसी हैं, जो हमारी पकड़ और नज़र से पूरी तरह बाहर रह जाती हैं। जैसे-जैसे और विचार सामने आते हैं, हमें एक कॉमन ट्रैप से बचना होगा। हम अक्सर मान लेते हैं कि इनमें से सिर्फ़ एक ही राय सही हो सकती है। क्योंकि अपने सीमित दिमाग़ से, हम आम तौर पर अपने शब्दों से एक ही बात कहते हैं। पर अल्लाह का ज्ञान शाश्वत है। उसका कलाम एक ही साथ सच की हर परत को अपने अंदर समेट सकता है। और यहीं से हम अपने पाँचवें गोल्डन रूल पर पहुँचते हैं। क़ुरआन का एक अकेला शब्द अपने अंदर सिर्फ़ एक ही मतलब नहीं रखता। वो एक ही साथ कई अजूबों की चाबी बन जाता है। और यही तर्क ब्रह्मांड की उस रचना पर भी पूरी तरह लागू होता है, जो छह दिनों में हुई। जैसे सात आसमानों को समझने के कई सही तरीक़े मौजूद हैं, वैसे ही इन छह दिनों की भी छह अलग, सही व्याख्याएँ हो सकती हैं। वो सब सच हो सकती हैं, और अल्लाह ने एक ही साथ वो सब मुराद ली हो सकती है। पर उन व्याख्याओं का क्या, जो ग़लत हैं?
यहीं पर बहुत से लोग तर्क के एक और जाल में गिर जाते हैं। मिसाल के तौर पर, एक मशहूर राय ये थी कि सात आसमानों से मुराद हमारे सौरमंडल के वही सात दिखाई देने वाले ग्रह हैं। अपने दौर के हिसाब से ये तार्किक अंदाज़ा था। पर जैसे-जैसे विज्ञान ने और ग्रह खोजे, ये सिद्धांत ढह गया। फिर कुछ आलोचकों ने दावा किया कि क़ुरआन ग़लत साबित हो गया। पर उन्होंने तो बस एक इंसान का सिद्धांत ग़लत साबित किया था। पढ़ने वाले की ग़लतफ़हमी के लिए आप लिखने वाले को दोष नहीं दे सकते। एक सिद्धांत को ग़लत साबित कर देने का मतलब ये नहीं कि आपने सच को मिटा दिया। आपने तो बस बाक़ी छह के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। तो अगर कभी आप सुनें कि विज्ञान क़ुरआन से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता, तो ये याद रखिए आप शायद किसी ऐसी इंसानी व्याख्या को देख रहे हैं, जो निशाने से चूक गई। इस पूरे वीडियो में हमने क़ुरआन के चमत्कारों को उभारा है। इस्लाम के इतने सारे प्रमाणों की रोशनी में, ये टकराव हल का इंतज़ार करती पहेलियाँ रह जाते हैं। आज जवाब न पता होने का मतलब बस इतना है कि हम अभी सीख रहे हैं। अब चलिए, इन नियमों को अपनी आख़िरी ग़लत समझी गई आयत पर लगाते हैं। एक ताक़तवर शासक, ज़ुल-क़रनैन की यात्रा। पश्चिम की उनकी मशहूर मुहिम का बयान करते हुए आयत कहती है — 'फिर जब वो सूरज के डूबने की जगह पहुँचा, तो उसने उसे एक कीचड़ भरे चश्मे में डूबते हुए पाया...' पहली नज़र में ये चपटी ज़मीन वाली कोई पुरानी ग़लतफ़हमी लग सकती है। और काफिर आलोचक पूछते हैं, 'ज़मीन से भी बड़ा एक विशाल तारा भला कीचड़ के गड्ढे में सचमुच कैसे जा गिरेगा?!' जवाब असल में उसी आयत के अंदर छिपा है, जिस पर वो हमला कर रहे हैं। क़ुरआन ये नहीं कहता कि सूरज सचमुच किसी कीचड़ भरे गड्ढे में डूब गया। ठीक-ठीक लफ़्ज़ ये हैं — 'उसने उसे डूबते हुए पाया।' यहाँ मुसाफ़िर को जो दिखा, उसे बताने के लिए क़ुरआन रोज़मर्रा की इंसानी भाषा इस्तेमाल करता है। वो असल में क्षितिज का ठीक नज़ारा क़ैद करते हुए एक कैमरे की तरह काम करता है। आयत से हमें बस इतना पता चलता है कि वो पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। वो कहाँ से चला और कहाँ जाकर रुका, ये हमें नहीं पता। और फिर भी, बस एक ही लाइन में, क़ुरआन उस ठीक-ठीक जगह का इतना शानदार बयान कर देता है, जहाँ सदियों पहले ये पूरी घटना घटी थी। वो ऐसी जगह खड़ा था, जहाँ एक विशाल समुद्र बिल्कुल किसी उबलते कीचड़ भरे चश्मे जैसा दिखता था। पश्चिम की उसकी यात्रा उसे महाद्वीप के बिल्कुल किनारे तक ले गई — ठीक एक विशाल समुद्र के सामने। वो शायद अटलांटिक रहा होगा। और वो गर्मियों का बीच का वक़्त था। तेज़ ताप तट के किनारे फैले दलदलों और दलदली इलाक़ों को तपा रहा था। इससे भारी मात्रा में भाप उठ रही थी। ज़ुल-क़रनैन स्पष्ट क्षितिज नहीं देख रहा था। वो उठती हुई धुंध और कोहरे की एक मोटी चादर के पार देख रहा था। और इसी तरह उसने किनारे से सूरज को डूबते देखा। पर बात इतनी ही नहीं। याद कीजिए, हमने कहा था कि क़ुरआन की एक ही बात अपने अंदर मतलब की कई परतें रख सकती है। ये असल में एक शानदार तर्ज़ है, जो हमें पूरे क़ुरआन में दिखती है। वो कभी इस विशाल ग्रह ज़मीन को एक सुरक्षित पालना बता देता है। धधकते सूरज को एक साधारण चराग़, और चाँद को एक सादा लालटेन। अल्लाह के इस असीम साम्राज्य में, हमारे ग्रह के सबसे बड़े समुद्र का बयान कैसे किया जाए?
सबसे विशाल समुद्र भी एक नन्हे गरम चश्मे से ज़्यादा कुछ नहीं। तो हमारा रब ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है, जिससे वो इंसान की समझ और अपनी अपार महिमा के बीच एक साझा धरातल बना देता है। आज भी हम कहते हैं — 'सूरज डूब रहा है।' और कोई ये कहकर हमें नहीं टोकता कि 'असल में तो ज़मीन घूम रही है।' बात का संदर्भ हर कोई समझ जाता है। पर अफ़सोस की बात ये है कि आज के ज़्यादातर आलोचक मतलब के बजाय लड़ाई ढूँढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने भाषा या संदर्भ को समझने में एक घंटा भी नहीं लगाया, वही सबसे पहले कहते हैं कि ये वैज्ञानिक रूप से ग़लत है। ज़रा सोचिए। आप किसी मैकेनिकल इंजीनियर से दिल का ऑपरेशन करने को नहीं कहेंगे, है ना? आप सर्जन के पास ही जाएँगे। तो फिर क़ुरआन के साथ हम अलग बरताव क्यों करते हैं?
अगर कोई अपना वक़्त क़ुरआन पर हमले करने में लगाता है, या इस्लाम की बुराई पर अपना मंच खड़ा करता है, तो उससे निष्पक्ष विश्लेषण की उम्मीद मत रखिए। अगर आपको सच चाहिए, तो विशेषज्ञों के पास जाइए। विशेषज्ञ का किया हुआ एक गहरा विश्लेषण इंटरनेट वाली सौ खोखली आलोचनाओं से कहीं बेहतर है। वो समझते हैं कि उन्हें बड़ी भारी ग़लती मिल गई। ऐसी ग़लती, जो सदियों तक मुस्लिम वैज्ञानिक पूरी तरह चूकते रहे। क्या वो सचमुच मानते हैं कि विज्ञान के इतिहास के सबसे बड़े दिमाग़ों ने क़ुरआन कभी पढ़ा ही नहीं?
इस्लाम का इतिहास सैकड़ों शानदार वैज्ञानिकों, खगोलशास्त्रियों और गणितज्ञों से भरा पड़ा है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी विज्ञान और क़ुरआन, दोनों को पढ़ने में लगा दी। हम उस सभ्यता की बात कर रहे हैं, जिसने विज्ञान की नींव रखी। आज हम जिस आधुनिक दुनिया को जानते हैं, वो उन्हीं की मेहनत पर खड़ी है। मिसाल के लिए इब्न अल-हैसम को लीजिए। आधुनिक प्रकाशिकी के जनक। उनके साथ अल-ख़्वारिज़्मी जैसे वैज्ञानिक भी थे। वो उन एल्गोरिदम के पीछे का दिमाग़ हैं, जिनसे आप अभी ये वीडियो देख रहे हैं। जाबिर बिन हय्यान ने आधुनिक रसायन विज्ञान की नींव रखी, और आठवीं सदी में दुनिया की पहली प्रयोगशाला बनाई। इब्न सीना को देखिए, जिनका चिकित्सा-कोश यूरोप के विश्वविद्यालयों में पूरे पाँच सौ साल तक अंतिम प्रमाण मानी जाती रही। अल-जज़री को देखिए — रोबोटिक्स और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के जनक। इब्न ख़ल्दून को देखिए — समाजशास्त्र और इतिहास-लेखन के जनक। इन सबने क़ुरआन को गहरी विश्लेषण-बुद्धि के साथ पढ़ा, फिर भी उन्हें उसकी आयतों में पूरा तालमेल ही मिला। फ़ातिमा अल-फ़िहरी को देखिए — वो दूरदर्शी महिला, जिन्होंने दुनिया का सबसे पुराना और लगातार चलता विश्वविद्यालय बनाया। मरियम अल-इजलिया को ही लीजिए। उस दौर में पश्चिम में, अगर कोई औरत विज्ञान को छू लेती, तो उसे यातना और मौत की सज़ा मिलती। पर इस्लामी दुनिया में मरियम अल-इजलिया ऐसा गणित और इंजीनियरिंग कर रही थीं, जिसका सपना यूरोप सदियों तक नहीं देख सका। उन्होंने एक बेहद जटिल खगोलीय यंत्र बनाया जिसे बाद में एस्ट्रोलैब कहा गया। इब्न अल-बैतार, अल-जाहिज़, अल-ज़हरावी, अल-बीरूनी, अल-बत्तानी। ये सूची चलती ही जाती है। इसीलिए एक मुस्लिम प्रोफ़ेसर, फ़ुआत सेज़गिन ने एक बार कहा था — 'पश्चिमी सभ्यता तो इस्लाम की ही संतान है।' तो अब से, जब कोई आपसे ये कहे कि उसे क़ुरआन में कोई ग़लती मिल गई है, तो आप बस मुस्कुरा सकते हैं। क्योंकि अब मास्टर चाबियाँ आपके पास हैं। उस दावे को इन्हीं से जाँच लीजिए। एक — पहले इस्लाम के प्रमाणों पर ध्यान दीजिए। ताकि कोई एक अकेला सवाल आपका पूरा आधार न हिला दे। दो — कहीं वो क़ुरआन को जीवन की मार्गदर्शिका के बजाय भौतिकी की पाठ्यपुस्तक तो नहीं समझ रहे?
क़ुरआन ब्रह्मांड का बयान हमें रसायन या खगोल सिखाने के लिए नहीं, बल्कि उस कलाकार का परिचय करवाने के लिए करता है। तीन — सिर्फ़ शब्दों को मत देखिए। उनके पीछे के मतलब को समझने का प्रयास कीजिए। हो सकता है वो उस गहरे मतलब को चूक रहे हों, जो कलाकार दिखाना चाहता है। चार — हो सकता है अल्लाह हमारी नज़र कहीं और मोड़ रहा हो, और हमसे कह रहा हो कि बिल्कुल किसी दूसरे दृष्टिकोण से देखो? जब क़ुरआन किसी रचना का ज़िक्र करता है, तो शायद उसका ध्यान उसके रोज़मर्रा के भौतिक काम पर नहीं होता। पाँच — कहीं आप पढ़ने वाले की ग़लती के लिए लिखने वाले को दोष तो नहीं दे रहे?
किसी इंसानी विद्वान के ग़लत अंदाज़े को अल्लाह के दोषरहित कलाम के साथ कभी मत मिलाइए। छह — अपने आप से पूछिए — 'क्या मैं रचयिता के ठीक-ठीक शब्द पढ़ रहा हूँ, या बस किसी अनुवादक की सीमित शब्दावली?' आप अल्लाह के उस भव्य कलाम को तर्जुमे के किसी एक सादे शब्द में नहीं ठूँस सकते। ये तो पूरे समुद्र को नन्हे प्याले में उड़ेलने जैसा है। सात — क्या आप सच की तलाश विशेषज्ञों से कर रहे हैं, या उनसे, जो सिर्फ़ लड़ाई ढूँढ़ रहे हैं?
अगर आप सचमुच इस किताब को समझना चाहते हैं, तो आपको उन उलमा के पास बैठना होगा, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी इसी पर लगा दी। उन मुनकिरों के पास नहीं, जो इस पर हमला करके कमाते हैं। आठ — इस्लाम दूसरे धर्मों जैसा नहीं है, इसलिए उसे वैसा मानकर मत चलिए। क्योंकि सौ धर्मों में से सिर्फ़ एक ही सच्चा हो सकता है। तो तर्क के हिसाब से उनमें से निन्यानवे ग़लत होने ही चाहिए। और ज़ाहिर है, उनमें विज्ञान या तर्क से विरोधाभास होगा ही। और अगर आप सच्चे धर्म को उन निन्यानवे ख़राब धर्मों के साथ बाँध देंगे, तो आप निष्पक्ष नहीं हो रहे। आप बस आलस कर रहे हैं। आप एक धर्म को ऐसे इतिहास से तौल रहे हैं, जो उसका है ही नहीं। जहाँ इंसान के बनाए विचारों पर धूल जम जाती है, वहीं क़ुरआन हमेशा जीवंत बना रहता है। वो पुराना नहीं पड़ता। हर दौर के साथ वो और नवीन होता जाता है। जब-जब विज्ञान एक क़दम आगे बढ़ता है, तब-तब वो इस किताब से दूर नहीं जाता। बल्कि उसमें और गहरा उतरता जाता है। याद रखिए, इतिहास में घमंडी आलोचक नए नहीं हैं — जो अपने दौर के अधूरे विचारों पर क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते रहे। आज वो अधूरे सिद्धांत भुला दिए गए हैं। और वो आलोचक अपने पछतावों के साथ अपनी क़ब्रों में अकेले पड़े हैं। आख़िर, विज्ञान भी तो बदलता रहता है। जिस बात से वो आज इनकार करता है, कल उसे मान भी सकता है। और अगर आप ये चाबियाँ लगाएँगे, तो विरोधाभास का भ्रम मिट जाएगा। ब्रह्मांड को रचयिता की लिखी हुई एक किताब समझिए। विज्ञान का ध्यान सिर्फ़ किताब के वज़न पर, अक्षरों के आकार पर, काग़ज़, स्याही और वाक्यों की बनावट पर रहता है। पर वो उस ख़त को कभी पढ़ नहीं पाता। क़ुरआन, दूसरी तरफ़, इसी ब्रह्मांड को पढ़ने की कुंजी है। वो सारी रचना के पीछे का मतलब खोल देता है, और हमें रचयिता के संदेश पढ़ने के क़ाबिल बना देता है। अगर आप क़ुरआन को विज्ञान से अलग कर देंगे, तो आप पूरी ज़िंदगी बस ब्रह्मांड की किताब के अक्षर ही गिनते रह जाएँगे। पर उसका संदेश आपको कभी सचमुच समझ नहीं आएगा। और चूँकि दोनों किताबें एक ही लिखने वाले ने लिखी हैं, इसलिए उनमें विरोधाभास तर्क की दृष्टि से नामुमकिन है। हमारे वीडियो का स्रोत जानना चाहते हैं?
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