Towards Eternity
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मेरी इस्लाम विरोधी पत्नी ने मुझे इस्लाम छोड़ने पर मजबूर किया" | ​​एक जापानी जोड़े की इस्लाम की या...

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मैं सच में बौद्ध धर्म में यकीन करता था। मैं मंदिर के युवा समूह का हिस्सा था। मैं मंदिर की गतिविधियों में बहुत शामिल था। मेरे पिता एक ऐसे कट्टर atheist philosopher थे, जिन्होंने सालों-साल मुझे यह सिखाने में बिताए कि आस्तिकों से बहस कैसे करनी है। पता है, मुझे स्कूल से भी निकाल दिया गया था। मुझे वाकई में मुश्किल वक्त से गुज़रना पड़ा। और उसी समय मुझे एहसास हुआ कि मेरा धर्म मुझे कोई दिशा नहीं दे रहा था। इस्लाम का नज़रिया बहुत स्पष्ट है। यह सभी समस्याओं का हल देता है। और यह सरल है। जब मेरी पत्नी ने महसूस किया कि मैं मुस्लिम हूँ, तो वह इस्लाम के खिलाफ हो गई। उसने इस्लाम का अध्ययन करना शुरू कर दिया ताकि मैं मुसलमान न रहूँ। उसे कोरोना हो गया। वह ठीक नहीं हो पा रही थी। उसका ऑक्सीजन लेवल अभी भी ठीक-ठाक था, इसीलिए मैं बहुत ज़्यादा परेशान नहीं था, लेकिन हाँ, चिंतित ज़रूर था। मैंने तरह-तरह की बुरी बातें सोचना शुरू कर दिया। मैं सोचने लगी कि कहीं मैं भी ऐसे ही न मर जाऊँ। फिर एक दिन अचानक, बिना किसी बात के, वो बोली - "अगर मैं मर जाऊँ, तो मैं आपसे और बच्चों से हटकर किसी दूसरी जगह नहीं जाना चाहती।" अस्सलामु अलैकुम, भाई शिगे और बहन लिसा। Towards Eternity के हमारे इंटरव्यू में आने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। हमें बहुत खुशी है कि आप हमारे साथ हैं। वालेकुमस्सलामव रहमतुल्लाही व बरकातुहु। शुक्रिया। तो भाई शिगे, क्या आप हमें अपने जीवन के बारे में संक्षेप में बता सकते हैं?

मैं चौथी पीढ़ी का जापानी अमेरिकी हूँ। मेरे पिता कट्टर atheist philosopher थे जिन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया। मेरी माँ जन्म से बौद्ध थीं और उनका परिवार चार पीढ़ियों से अमेरिका में एक जापानी बौद्ध मिशन का हिस्सा रहा है । मैंने बौद्ध के रूप में शुरुआत की और जापान में अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए पारंपरिक जापानी कला का अध्ययन किया। लेकिन इसके बजाय, मेरा संबंध इस्लाम से जुड़ गया। मैं जापान में पैदा हुई थी। मेरे माता-पिता, जापानी थे। असल में, मैं यीशु पर विश्वास करती थी। तो मैंने कहा - "आमीन" मैं सोचती मैंने ईसा से बात कर ली। लेकिन मुझे इस्लाम या उसके बारे में कुछ नहीं पता था। तो आस्था के संदर्भ में आपका जीवन कैसा था?

मुझे लगता है कि हमारे परिवार में बौद्ध धर्म को खास अहमियत हासिल थी। मुझे पता था कि समुदाय में मेरे दादा का बहुत सम्मान था। मुझे यह भी पता था कि मेरी माँ मंदिर में काम करती थीं, तो मैंने अपना ज्यादातर समय वहीं बिताया। मतलब, हम हर weekend वहां होते थे। मैं मंदिर के युवा समूह का हिस्सा था। मैं मंदिर की गतिविधियों में बहुत सक्रिय था। मैं हैरान थी क्योंकि किसी christian church में एक चीज़ होती है जिसे Sunday Service कहते है। लेकिन जापान में ऐसी कोई चीज़ नहीं होती। तो मैं हैरान थी कि उनके पास बुद्ध के बारे में एक गीत है जिसे वे गाते हैं। मैं हर रविवार को नहीं जाती थी। सिर्फ कुछ महीनों के लिए ही, शायद सिर्फ मेरे पिता ही हमे christian church ले जाना चाहते थे। किस चीज़ ने आपको अपनी आस्थाओं पर सवाल उठाने पर मजबूर किया?

दरअसल, मैं हमेशा ही अपनी आस्थाओं पर सवाल उठाता रहा। मैंने तो, मैं सच में बौद्ध धर्म में मानता था। लेकिन मैं जोदो शिन्शु में नहीं मानता था। यह जापानी बौद्ध धर्म का एक प्रकार है। असल में, शायद यह मुख्य जापानी बौद्ध धर्म है। जापान में, वहाँ, एक समय पर, बौद्ध धर्म बहुत राजनीतिक था। यह बहुत ही राजनीतिक था। और वास्तव में जापान में एक कानून पास हुआ था जिसमें कहा गया कि हर जापानी परिवार को अपना नाम किसी एक बौद्ध मंदिर में दर्ज कराना होगा। जैसे कि आपको किसी मंदिर से जुड़ा होना ही था। जब मैंने इतिहास का अध्ययन करना शुरू किया। तो मैंने यह नहीं सोचा कि कोई सच्चा धर्म किसी विशेष समय की राजनीति के आधार पर अपने धार्मिक फैसले ले सकता है। इसके अलावा भी बहुत सी चीज़ें थीं जो मुझे समझ नहीं आती थीं। और आपका इस्लाम की ओर सफर कैसे शुरू हुआ?

मैं हाई स्कूल में बहुत मुश्किल में फंस गया था। तो, मैं, मैं खुद को स्थापित करने या खुद को साबित करने की कोशिश में मुश्किल में पड़ा, शायद बहुत ज़्यादा, बहुत ज्यादा। मुझे स्कूल से निकाल दिया गया, मुझे वाकई मुश्किल वक्त से गुज़रना पड़ा, और उसी समय मुझे एहसास हुआ कि मेरा, मेरा धर्म मुझे कोई दिशा नहीं दे रहा था। यह मेरी ज़िंदगी में सही फैसले लेने में मेरी मदद नहीं कर रहा था। और तभी मैंने सच में फैसला किया कि मैं पूरी तरह जापानी संस्कृति सीखने में लग जाऊँ। क्योंकि मैंने सोचा, ठीक है, थोड़े समय के लिए मैं धर्म को पीछे रख दूँ। लेकिन अगर मैं सिर्फ किसी सकारात्मक चीज़ पर ध्यान दूँ और अपनी पूरी ऊर्जा वहीं लगा दूँ, तो मेरे पास वह ऊर्जा नहीं रहेगी कि मैं अन्य चीज़ें करूँ, जो शायद मुझे नहीं करनी चाहिए। तो इसी तरह सब शुरू हुआ। मैं 2006 में एक विदेशी एक्सचेंज स्टूडेंट के तौर पर जापान आया, यहीं मैं अपनी पत्नी से मिला। मेरे लिए यह बहुत ज़रूरी था कि मैं खुद को सच्चा और असली महसूस करूँ। और मुझे लगता है कि यही वजह थी कि मैंने पूरी मेहनत से खुद को बहुत पारंपरिक जापानी संस्कृति में डुबोने की कोशिश की। और थोड़े समय तक वही मेरे लिए मेरा धर्म बन गया। आइए सीधे 2012 पर आते है, और अब वह मेरा एक बहुत अच्छा दोस्त है, एक आदमी सीरिया से, जो सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान जापान आया। उसे राजनीतिक शरणार्थी के रूप में आना पड़ा। और हमने बस बात करना शुरू कर दिया। मैंने उनसे पूछा कि वह ईश्वर को कैसे समझता है। जैसे, ईश्वर क्या है?

क्या ईश्वर ब्रह्मांड है? क्या ईश्वर बादल में एक दाढ़ी वाला आदमी है? आपके हिसाब से ईश्वर क्या है? और मेरे लिए उनका जवाब था, असल में, उन्होंने कहा, "मैं आपको कुछ दिखाता हूँ।" और उन्होंने मुझे सुरह इख़लास दिखाया। उन्होंने कहा, हम यही मानते हैं। और मैंने कहा, ठीक है। तो वह एक आदमी नहीं है। वो बोला, नहीं, ज़ाहिर है, वह एक आदमी नहीं है। क्या वह ब्रह्मांड है?

नहीं, वह कुछ ऐसा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। कुछ भी उसके बराबर नहीं है। और ऐसा नहीं है कि इसका ईसाई आस्थाओं से कोई ताअल्लुक़ नहीं है। जैसे उसे किसी ने नहीं बनाया है। उसने किसी को जन्म नहीं दिया है। उसे किसी ने पैदा नहीं किया है। मैंने कहा, ओह, OK ठीक है। हाँ, यह समझ में आता है। जैसे, हाँ, ठीक है, मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। मैंने कहा, ठीक है। जब मैं इस सीरियाई आदमी से मिला, यह मेरे जीवन के उस समय हुआ, जब मैं यह सोच रहा था कि मैं कैसे जी रहा हूँ। और, आप जानते हैं, मुझे असल में एहसास हुआ कि मैं पहले से ही भगवान पर यकीन करता था। और अपने जीवन को पीछे देखते हुए, मुझे लगता है कि मुझे एहसास हुआ कि मैं पूरे जीवन भगवान में यकीन करता रहा। लेकिन यह कुछ ऐसा था जिसे मैं किसी न किसी कारण से दूर रख रहा था। शायद मैं इसे दूर रख रहा था क्योंकि मेरे पिता कट्टर नास्तिक दार्शनिक थे, जिन्होंने सालों-साल मुझे यह सिखाने में बिताए कि धर्मविश्वासियों के साथ बहस कैसे करनी है, और मुझे उन्हें कैसे जवाब देना चाहिए और मैं कैसे, उनके ईश्वर में विश्वास को कमतर समझा सकता हूँ, क्रिश्चियनों के खिलाफ कैसे लड़ना है जो कोशिश कर रहे हैं, मुझे यीशु का संदेश, उसका शब्द बताने के लिए। तो मुझे सच में बहुत छोटी उम्र लगभग 10 साल से ही, लगता था कि मुझे आस्तिक नहीं होना चाहिए, आस्तिकता अच्छी नहीं है। आपको इसमें विश्वास नहीं करना चाहिए। और जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ और मंदिर के प्रति और अधिक जुड़ाव महसूस किया, मुझे और ज्यादा ऐसा लगता था कि मैं ईश्वर में विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे इस मंदिर के जापानी समुदाय के प्रति प्रतिबद्ध होना है, और वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते। तो मेरी आध्यात्मिक यात्रा वास्तव में बहुत छोटी थी। असल में, वही आध्यात्मिक यात्रा थी। मैं उस शख़्स से मिला, उसने मुझे इस्लाम के बारे में बताया। और मुझे अपने जीवन की छोटी-छोटी बातें याद आने लगीं, और मैंने सोचा, हाँ, सच कहूँ तो, अगर मैं अपने आप से ईमानदार रहूँ, तो यही है जिसमें मैं विश्वास करता हूँ। यह इतना मुश्किल नहीं था। असल में, बहुत जल्दी हुआ। मुझे बहुत जल्दी पता चल गया कि मैं मुसलमान हूँ। इस्लाम का नज़रिया बहुत स्पष्ट है। मुझे लगता है कि जैसे ही कोई आपको बताए, और अगर आप ईमानदार हो, तो यह बहुत स्पष्ट है कि इसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता है। यह सभी समस्याओं को हल करता है, और यह सरल है। लेकिन वजह कि इसमें मुझे इतना समय इसीलिए लगा और मुझे रिसर्च और अध्ययन करना पड़ा। तथा हर पहलू पर गौर फ़िक़्र करनी पड़ी क्योंकि मेरे ज़हन में वो सभी लोग थे, जिन्हें बाद में मुझे यह सब समझाना था। मैं अपने दार्शनिक पिता से कैसे बात करूंगा?

मैं अपनी बौद्ध माँ से कैसे बात करूंगा, जो मंदिर में काम करती हैं? मैं अपने परिवार और उस समुदाय से कैसे बात करूंगा, जहाँ के मंदिर में, मैं बड़ा हुआ? जैसे के लोग मेरे दादा, मेरी माँ और मुझे जानते हैं। आपकी इस्लाम में वापसी पर आपके परिवार, आपकी पत्नी ने कैसी प्रतिक्रिया दी, जिस चीज़ से आप सबसे ज्यादा डरते थे? क्या आपने ध्यान दिया? इस वीडियो को देखते समय आपको कोई विज्ञापन नहीं देखना पड़ा। चूंकि Towards Eternity एक अलाभकारी संगठन है, हम यह वीडियो केवल आपके समर्थन से बना सकते हैं। यदि आप इस नेक काम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो Towards Eternity को दान दें और इस सुनहरे अवसर को न गँवाएँ। आपकी इस्लाम में वापसी पर आपके परिवार, आपकी पत्नी ने कैसी प्रतिक्रिया दी, जिस चीज़ से आप सबसे ज़्यादा डरते थे?

मेरे पढ़ाई करने के पीछे की असल वजह यही थी, क्योंकि मुझे पता था कि मैं किस चीज़ में पड़ने वाला हूँ। मुझे पता था कि सबसे पहले, मेरी पत्नी इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। उसका परिवार तो बिलकुल भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। मेरा परिवार भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। मेरे पिता, मेरी माँ भी इसे नहीं मानेंगी। मुझे पहले से ही पता था कि कोई भी खुश नहीं होने वाला है। तो एक survival technique के तौर पर मैं बस जितना हो सके, उसे छिपाने की कोशिश कर रहा था। मैं लोगों के सामने नमाज़ नहीं पढ़ता था। अगर मैं रोज़ा रखता था, तो लोगों को नहीं बताता था कि मैं रोज़ा रख रहा हूँ। मैं बस बहाने बना देता था जैसे, "इसके बाद मेरा डॉक्टर के साथ अपॉइंटमेंट है।" “मुझे ख़ाली पेट जाना होगा" या बस ऐसा दिखाता था कि कुछ पी रहा हूँ, पर असल में नहीं पीता था। काफ़ी लंबे समय तक, मुझे लगता है कि ये सब बहुत छिपा हुआ था। मैंने सोचा था कि अपनी पत्नी के साथ मैं बस कुछ छोटे-छोटे बदलाव करूँगा, और धीरे-धीरे अगर मैं एक बेहतर इंसान बन जाऊँ, या अगर वो देखे कि हमारा पारिवारिक जीवन बेहतर हो रहा है, तो शायद, वो मुझसे पूछे, “अरे, आप अब इतने अच्छे पति कैसे बन गए?” मतलब, क्या हुआ?

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तो हर छोटा-सा बदलाव मुझे बहुत सावधानी से लाना पड़ता था। जैसे कि, नमाज़ पढ़ना, फ़ज्र के लिए उठना। मैं कितना शांत रह सकता था? मतलब, अब भी ये थोड़ा मज़ेदार है, लोग हँसते हैं, जब मेरा अलार्म बजता है, तो मैं इतना ट्रेन हो चुका हूँ कि फटाफट उठ जाता हूँ, और पहला बीप ख़त्म होने से पहले ही अलार्म बंद कर देता हूँ। तो जैसे, अगर वो बजे... टी-टीट-टी मैं ऐसे कर सकता हूँ, टीट...

और मैं बंद कर सकता हूँ। जब मेरी पत्नी को समझ में आने लगा कि मैं मुस्लिम हूँ, और मैं इस्लाम की वजह से रोज़े रख रहा हूँ, और इस्लाम की वजह से शराब नहीं पी रहा हूँ, और मैंने उससे कहा कि अब Pork मत पकाना, इस्लाम की वजह से, तो वो बहुत इस्लाम विरोधी हो गई। उसने इस्लाम पढ़ना शुरू किया ताकि वो कुछ ढूंढ सके जिससे मैं मुस्लिम न रहूँ। और फिर सब थोड़ा ठीक चल रहा था, लेकिन फिर मैंने दाढ़ी बढ़ानी शुरू की। हाँ, बिलकुल। तो मेरी ज़िंदगी की कोई भी औरत, जब भी वो मेरा चेहरा देखती, वो मुझसे कहती, "तुम तो ओसामा बिन लादेन जैसे लगते हो। अगर तुम्हें ISIS में शामिल होना है, तो फिर तुम जापान में क्यों हो?" जैसे, अपना चेहरा शेव कर लो, तुम गंदे लग रहे हो, जैसे तुम्हें अभी जाकर शेव करनी चाहिए। जैसे, क्या मैं तुम्हारे लिए रेज़र खरीद दूँ?" मतलब, जब मैं मिलता था हर बार – माफ़ करना। कोई बात नहीं ठीक है। हमेशा ऐसा ही होता था। तो फिर आपकी पत्नी मुसलमान कैसे बनी?

तो, हालात बहुत खराब चल रहे थे। ये उस मुकाम तक पहुँच गया था, जहाँ हम अलगाव की बात कर रहे थे। बेशक, मैं नहीं चाहता था। और वो बोली, "हमें अलग होने की ज़रूरत नहीं बस आप किसी और जगह जाकर रहिए।" मतलब आप किसी दूसरे कमरे में रह सकते है, या कोई दूसरा अपार्टमेंट ले सकते है, और वहाँ आप एक मुस्लिम बनकर रहें। मुझे फर्क नहीं पड़ता, आधिकारिक तौर पर, कानूनी रूप से हम शादीशुदा रह सकते हैं। आप weekends पर बच्चों से मिलने आ सकते हैं, लेकिन बस, बस कहीं और जाकर मुस्लिम बनिये। हमे इसमें ना घसीटिए। आप हमारी ज़िंदगी को मुश्किल बना रहे हैं। हालत बिगड़ रहे थे। हम हर वक्त झगड़ते रहते थे। मुझे याद है एक रात मैं घर लौटा। हम दूसरी मंज़िल पर रहते थे। मैं सीढ़ियों के नीचे पहुँचा, जो हमारे अपार्टमेंट के बाहर थीं, और मुझमें इतनी भी ऊर्जा नहीं बची थी कि पहली सीधी भी चढ़ सकूँ। मैं सीढ़ियों के सामने खड़ा हो गया और मैं बस बहुत थक चुका था। मैं बहुत थक गया था झगड़ों से मैं थक गया था अपनी आस्था का बचाव करते करते। मैं थक गया था लोगों से दाढ़ी मुड़वाने की बातें सुनकर। मैं थक गया था, बहुत सी चीज़ों से। और मैं वहीं खड़ा रहा, और पहली बार अल्लाह को पुकारा। मैंने कहा, ये सब मैं अब और नहीं सह सकता। तो प्लीज़, मेरे लिए जो भी ठीक हो, अगर वो मेरी बीवी के साथ है, इसे ठीक कर दीजिए। अगर नहीं, तो मुझे इससे बेहतर अता कीजिए। लेकिन मैं अब और नहीं सह सकता। मैं बहुत थक चुका हूँ। वो दौरान, कोरोना के बहुत शुरुआती दिन थे। मतलब लगभग पांचवें दिन के बाद, जिन दिनों जब लोगों ठीक हुए तो हुए और न हुए तो बस हालत और भी ख़राब हो जाती थी। और ये सब खबरों में था और जब मैं ये सब देखता कि कितने लोग है जो इससे मर रहे हैं। और बड़े से बड़ा अस्पताल भरे पड़े हैं। ये जैसे सबसे अधिक डरावना समय था। सब लोगों में कोरोना का भय था। और बहुत जल्दी ही, मुझे कोरोना हो गया। तो ये उस समय की बात थी जब अगर आपको कोरोना होता, अस्पताल आपको भर्ती नहीं करता, और एम्बुलेंस आपको लेने नहीं आती। मतलब, आप किसी को ये नहीं बताना चाहते कि आपको कोरोना है, क्योंकि अब भी इसके बारे में एक तरह का Stigma था, जैसे आपको कोई black plague या ऐसा ही कुछ हो गया हो। तो, मैं एक कमरे में बंद था। मुझे कुछ समय के लिए खुद को कमरे में बंद करना पड़ा। और, हमें पता नहीं था कि क्या चल रहा है। लेकिन मैं धीरे-धीरे ठीक होने लगा। लेकिन जैसे ही मैं ठीक होने लगा, मेरी पत्नी बीमार हो गई। मेरा बुखार उत्तर नहीं रहा था, मैं लगातार खाँस रही थी, स्वाद और सूंघने में भी समस्या थी और चूँकि मेरे आसपास के लोग बहुत डरे हुए थे तो मुझे एकांत में रहना पढ़ा। मुझे लगा कि मैं किसी अजीब और अनबूझ रोग की शिकार हो गईं हूँ। इसीलिए मैंने सोचा - "अगर ऐसा ही रहा तो हो सकता है कि मैं मर जाऊँ और मैं शिंगे और अपने बेटे को दुबारा देख न पाऊँ।" और इनकी तबियत सुधर नहीं रही। ठीक है, अब दो हफ्ते हो गए हैं, और इनकी तबियत और बिगड़ रही है। और इनकी खांसी और बढ़ रही है, और अब तीन हफ्ते हो गए हैं। और ये सोचने पर मजबूर करता है, कि ये जो हो रहा है यह ठीक नहीं है। और मेरी तरफ़ से देखा जाए तो, मैं चिंतित था। 8 उनका ऑक्सीजन लेवल अभी भी ठीक-ठाक था, तो मैं बहुत ज़्यादा परेशान नहीं था, लेकिन हाँ, चिंता थी। हालांकि मेरे शौहर ठीक हो गए थे मैं बिल्कुल भी ठीक नहीं हो पा रही थी और इसपर मुझे और भी अधिक चिंता होने लगी और क्योंकि मैं एक कमरे में isolated थी मैं किसी को नहीं देख पा रही थी। इस दौरान अचानक से मुझे बहुत समय मिल गया। क्यूंकि मैं फ़ितरत से एक लड़ाकू हूँ, मैं बुरी चीज़ों के बारें में सोचती रही और कल्पना करती रहीं, जैसे - "क्या पता मैं ऐसे ही मरने वाली हूँ" फिर एक दिन अचानक, बिना किसी बात के, ये मुझसे कहती है, "सुनो, कलमा पढ़ने के लिए दो लोगों की ज़रूरत होती है, है ना?" मैंने कहा, रुको, क्या?

मैंने पूछा, आप ये सवाल किसी दोस्त के लिए पूछ रही हैं? तो वो बोली, "नहीं, अपने लिए।" मैं फिर बोला, क्या? क्या कहा? कलमा? दो लोग? ये बोली हाँ! मैंने कहा - क्या? आप मुसलमान बनना चाहती हैं?

अगर मैं सच में मरने वाली थी जबकि मैं हमेशा कहती रही कि मैं मुसलमान नहीं बनना चाहती और मैं कलमा नहीं पढ़ना चाहती लेकिन मेरे पास इस खेल के लिए समय नहीं बचा था इसीलिए मैंने कलमा पढ़ाने के लिए कहा। वो मेरी तरफ देखती है और कहती है, "हाँ, मतलब "अगर मैं मर जाऊँ, तो मैं आपसे और बच्चों से हटकर किसी दूसरी जगह नहीं जाना चाहती।" अगर मैं मरूँ, तो मैं उसी जगह जाना चाहती हूँ जहाँ आपलोग होंगे।" तो मैंने अपने बेटे को बुलाया और कहा, "यूकी, बेटे इधर आ जाओ" जल्दी आओ, जल्दी, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।" वो अभी बच्चा ही था, तो शायद उसकी गवाही क़ुबूल न हो, पर वो कोरोना का समय था, लॉकडाउन चल रहा था — मैं इतना ही कर सकता था। मैंने कहा, "बेटे, मैं चाहता हूँ कि आप मेरे साथ गवाह बनो" और फिर हम वहीं खड़े हुए, और उसने अपने क्वारंटीन वाले कमरे से कलमा पढ़ा — और बस!

मैंने राहत महसूस की - जैसे कोई खतरा टल गया हो। जैसे कि अगर मैं मर भी जाऊँ तो कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं मरी तो नहीं और शायद ये इतना भी जानलेवा नहीं था पर अंदर ही अंदर एक राहत की एक शानदार फीलिंग थी, और मुझे याद है कि मैं इतनी खुश थी कि कि अब मैं अपने दिल को अल्लाह की और मोड़ सकती थी। कुछ हफ्तों बाद मुझे एहसास हुआ कि, रुको ज़रा, मैंने तो हार मान ली थी — और सिर्फ दो हफ्ते लगे। मतलब, मुझे तो आठ साल पहले ही हार मान लेनी चाहिए थी। मतलब, मैं इतने सालों तक क्या करता रहा?

कितने घंटे मैंने बर्बाद कर दिए। आप बहुत सारी नेकियाँ जमा कर रहे थे। पूरे उस समय, पूरे समय। अगर कुछ सबक है जो कोई इस बात से ले सकता है, इसीलिए जब लोग मुझसे मेरी मुसलमान बनने की कहानी पूछते हैं, तो मैं हमेशा कहता हूँ — मेरी कहानी उतनी अहम नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण कहानी मेरी पत्नी की है। क्योंकि मैं रिश्तों में मौजूद कठिनाइयों के साथ आठ साल तक कुछ भी नहीं कर सका और मैं मजबूरन हार मानता और कहता "या अल्लाह प्लीज़ मुझे इससे राहत दे दे। मैं अब सह नहीं सकता।" और पता है दो हफ्तों बाद - मेरे हिसाब से तो ये इतना अचानक था कि और मुझे ये मानने में बहुत समय लगा कि वो मुसलमान हो गई है। और जब मैं फ़ज़र के लिए उठता तो मुझे समझ नहीं आता था कि मैं उन्हें जगाऊँ या नहीं। मैं सोचता, क्या मुझे...

क्या मुझे उसे सोने देना चाहिए? मेरे जगाने पर वह नाराज़ तो नहीं होगी? क्या वो सच में मुस्लिम है? मतलब, सच में? लेकिन फिर मैं धीरे से, यूँ ही ऐसे देखता, और ये अपनी आँखें खोलती और कहती, "फज्र?" मैं कहता, "हाँ।" और फिर हम नमाज़ पढ़ते। आप सालों तक एक ख़ास संस्कृति का हिस्सा थे, आपके रिश्तेदार और अपने भी वही थे। आप मुस्लिम समुदाय के लिए एक अजनबी थे। क्या आपके लिए सबकुछ छोड़ना मुश्किल नहीं था?

हाँ, बहुत मुश्किल था। मैंने सब कुछ कुर्बान कर दिया था। चाहे वो मेरा पैसा हो, मेरा वक्त हो, मेरी मेहनत, या फिर लोगों से मेरे रिश्ते। लेकिन जब मैंने वो दुनिया छोड़ी, तो उसके बाद मैंने कुछ और नहीं किया। मतलब, मुझे नहीं पता था कि कोई और काम कैसे करूँ। मुझे कोई और काम करना नहीं आता था। मेरे पास किसी ऐसे काम या बिज़नेस डिग्री भी नहीं थी या किसी और चीज़ का खास ज्ञान भी नहीं था। ये सब बहुत मुश्किल था। और मैं बस यही कह रहा था — मेरे पास सिर्फ एक ही चीज़ थी, कि अल्लाह कहता हैं, अगर आप उसकी खातिर कुछ छोड़ते है, तो वो उसे किसी बेहतर चीज़ से बदल देता है। तो मेरे दाएँ हाथ में ये बात थी, और बाएँ हाथ में वो सब था जो मैंने अबतक हासिल किया था। और मुझे वो सब छोड़ देना था और इस भरोसे पर जीना था कि सब ठीक होगा। अल्हमदुलिल्लाह, मुझे सच में यकीन है कि अल्लाह ने ही ये ईमान, ये यक़ीन मेरे दिल में डाला और बस। मुझे लगता है कि मुसलमान बनने के बाद मैं और भी open हो गई और शायद आज़ाद भी। चूँकि हम नया मुस्लिम परिवार थे ऐसा महसूस हुआ कि हमें कम्युनिटी join करनी होगी, दोस्त बनाने होंगे और ये सब बच्चों की ख़ातिर भी करना होगा। मुझे पता था कि अब भी मुझमें कुछ बदगुमानियाँ थी और आप जापान में बदगुमानियों के साथ नहीं जी सकते तो मैंने सोचा कि मुझे किसी भी तरह से इससे उबरना होगा। जब ये मुस्लिम बनी, तो इनका पहला रमज़ान मेरे मेरे साथ ही था। मेरा रमज़ान हमेशा बहुत ही अकेला और उदास…

ये एक बहुत ही उदास, अकेला अनुभव होता था। ये मुश्किल और कठिन होता है, आप पूरी तरह अकेले हों, आप अकेले-अकेले रोज़ा रखें और खोलें। और ये अच्छा नहीं लगता था। दूसरी तरफ़, ये instagram पर थी, और वह सारे पोस्ट देख रही थी जहाँ लोग वास्तव में शानदार तरीके से इफ़्तार की पार्टियों का मज़ा ले रहे थे। और, लोग रमज़ान को एक तरह का त्योहार मानकर वास्तव में मज़े कर रहे होते थे। और फिर, ये मुझसे बहुत गुस्सा थी। ये कहती, "नहीं, मैं रमज़ान ऐसे नहीं चाहती।" मतलब, ये रमज़ान तो बहुत खराब है। हाहा और तो, उस समय से, ये असल में JDC के साथ काम कर रही है। हमने इसमें हिस्सा लिया, और अभी हम यहाँ हैं, हम जापान मुस्लिम एसोसिएशन, JMA में हैं। हम यहीं है। हम यहाँ JDC के साथ योकोहामा की स्थानीय मस्जिद के साथ मिलकर टोक्यो में होने वाले इवेंट्स में मदद करते हैं। आपको एक दूसरे की कौन सी बात सबसे अधिक पसंद है?

मुझे इनके बारें में क्या पसंद है? बहुत कुछ! तो जब से हम मिले हैं, बहुत सारी चीज़ें ये ख़ुद ही करती रही है जो एक मुस्लिम के तौर पर आपको भी करनी चाहिए। मैं एक तरह के क्रांतिकारी अमेरिकी बैकग्राउंड से हूँ। जहाँ अगर कोई मुझे बताता है कि मुझे क्या करना है, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया बस ये होती है कि, अच्छा!

चलो निकलो, चले जाओ। और ये मायने नहीं रखता कि ये मेरे माता-पिता हैं या कोई और। अस्तग़फ़िरुल्लाह। लेकिन, इनके साथ, पता है, ये हमेशा से मुझे नहीं पता कि इन्होंने कभी महसूस किया या नहीं, कि जन्नत उसकी माँ के क़दमों के नीचे है। लेकिन इन्होंने हमेशा वैसे ही व्यवहार किया। और मैं इनकी इस बात की बहुत इज़्ज़त करता हूँ। ये हमेशा बहुत family centric रही है। ये हमेशा हमारे बच्चों का ख्याल रखती रही है, उनकी ज़िंदगी में बहुत शामिल रही है। मैं उसकी इस बात की इज़्ज़त करता हूँ। इनकी हमेशा की रहमदिली - जबकि मैं ज़रूर दिक़्क़त करती रही होंगी पर ये मुझसे निराश नहीं हुए। मुसलमान होने से पहले भी मैं हमेशा ही इसके लिए शुक्रगुज़ार रही। मैं मानती हूँ कि मुझे ये पसंद थे, मुसलमान बनने के बाद तो और भी अधिक। ये ऐसा था कि इनकी personality बदल गई। इन्होंने अपने परिवार को अधिक से अधिक value देना शुरू कर दिया था। बिना मेरे याद दिलाए अपने parents को ख़ुद ही कॉल करना। ऐसी चीज़ों में बहुत बेहतरी आई। जब मैं कहती कि मुझे अपनी family से मिलना है वो कहते - "फिर हमें चलकर उनसे मिलना चाहिए" ये एक शानदार बदलाव था। जिस तरह से उन्होंने परिवार को वैल्यू दिया इसने चीज़े बहुत बेहतर कर दीं। हालांकि मुझे नहीं लगता कि मैं इसे अच्छे से बता पा रही हूँ....

हाहा तो… असल में कुछ खास नहीं। ये कह रही है कि मैं एक अच्छा इंसान हूँ। ये काफ़ी दयालु है। क्या उन्होंने बस इतना ही कहा? हाँ, बेसिकली। आपको पैग़ंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की कौन सी बात सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है?

जब वो ये कहते हैं कि उन्होंने अपनी दुआ को हमारी ख़ातिर आख़िरी दिन के लिए संभाल कर रखी है, जब हम अल्लाह के सामने खड़े होंगे, उन्होंने अपनी वो दुआ बचा कर रखी है, वो एक दुआ जो ज़रूर क़ुबूल होगी। उन्होंने वो हमारे लिए संभाल कर रखी है। अब जब, जब, जब मैं ऐसी बातें सुनता हूँ, तो मुझे सच में लगता है कि ये हम ही हैं, वो सच में, जब उन्होंने वक्त के पार देखा होगा, शायद वो मुझे ही देख रहे थे। शायद वो आपको देख रहे थे। वो इस पीढ़ी को देख रहे थे। तो हाँ, मेरे लिए शायद उनकी वक्त के पार देखने की क्षमता और उन लोगों के लिए दया, जिनसे वो कभी नहीं मिले यही सबसे प्रभावशाली बात है। भाई शिगे, बहन लीसा, आप दोनों का बहुत शुक्रिया कि आपने अपनी कहानी ईमानदारी से हमारे साथ साझा की। अल्लाह आपको बदला दे, और इंशा अल्लाह, आपको इस रास्ते पर, सीधे रास्ते पर इंशा अल्लाह आपकी आखरी सांस तक मज़बूती से क़ायम रखे, और आख़िरत में आप दोनों को फिर से मिलाए, इंशा अल्लाह, जन्नत में। जज़ाकल्लाहु ख़ैरन बहुत-बहुत शुक्रिया।