"मैंने हिंदू भगवानों पर सवाल उठाए" - सिर्फ़ एक सूरह ने उन्हें इस्लाम तक पहुंचाया
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मेरी परवरिश एक हिंदू के तौर पर हुई। ईश्वर तक पहुँचने के लिए इन्हीं मूर्तियों का सहारा लेना पड़ता है। ये मूर्तियाँ बहुत विशाल होती हैं। बहुत रंग-बिरंगी, चटख़ छवियाँ। पर मुझे सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब मैं उस घर पहुँचा, जहाँ वो बैठी थी। वो मुझसे कह रहे थे कि ये तुम्हारी भगवान हैं। वो यही कोई आठ-नौ साल की रही होगी। मुझसे भी छोटी थी। साईं बाबा नाम के एक शख़्स जब उनके भक्त सामने होते, तो वो यूँ उँगलियाँ मलते, और उनके हाथों से जादुई ढंग से अपने आप राख निकलने लगती। वो मुँह से सोने के अंडे निकालते थे। मेरी बहन ने मुझसे कहा: मेरी सहेलियों ने मुझे एक प्रोग्राम में बुलाया है। ये इस्लाम के बारे में है। वहाँ पहुँचकर मैं दंग रह गया। मेरी रगों में जैसे सिहरन दौड़ गई। मैंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं सुना था। और फिर ज़ाहिर है मैं कुरआन तक पहुँचा, और जब वो चार आयतें पढ़ीं, तो मेरे मन में जैसे एक रौशनी जल उठी। और मैं बस हक्का-बक्का रह गया। तो ज़ाहिर है, इसका असर मेरे माता-पिता पर भी पड़ा। पर, आप अपने बच्चे को दुश्मन यानी मुसलमान कैसे बनने दे सकते हैं?
इसके बारे में सोचकर ही मैं भावुक हो जाता हूँ। अस्सलामु अलैकुम, भाई सलाहुद्दीन पटेल, हमारे साथ जुड़ने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। हम आपको अपने पास पाकर खुश हैं। मैं शुरुआत इससे करता हूँ कि सलाहुद्दीन पटेल कौन हैं? क्या आप संक्षेप में अपनी ज़िंदगी के बारे में बता सकते हैं?
अलहम्दुलिल्लाह। अस्सलामु अलैकुम, मेरा नाम सलाहुद्दीन पटेल है, और मैं लंदन, यूके से हूँ। मैं लंदन में ही पला-बढ़ा। मैं असल में एक हिंदू परिवार से हूँ। मेरे माता-पिता मूल रूप से भारत से हैं, और मेरी माँ युगांडा में पली-बढ़ीं। मैं अस्सी के दशक में बड़ा हुआ। बहुत दिलचस्प दौर था। फिर धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि कुछ बातें ग़ैर तार्किक हैं, और यूनिवर्सिटी के दिनों में ही मैंने इस्लाम अपना लिया। आस्था के मामले में आपकी ज़िंदगी कैसी थी? आप किसमें आस्था रखते थे?
मैं एक हिंदू परिवार में पला-बढ़ा, और ज़्यादातर लोगों की तरह आप अपने परिवार की परंपरा निभाते हैं, सवाल नहीं उठाते। आप उसे सच मान लेते हैं। मेरे पिता हम सबको मंदिर ले जाते थे। ये मूर्तियाँ बहुत विशाल होती हैं। कोई दस-बारह फ़ुट ऊँची, तो आपको ऊपर देखना पड़ता है। बहुत रंग-बिरंगी, चटख़ छवियाँ। सोचिए, एक बच्चे के लिए सच कहूँ तो मुझे बहुत डर लगता था। आप इन मूर्तियों को देखते हैं, बहुत चमकीली होती हैं। बहुत सी नीली होती थीं, और लोग मानते थे कि ये मूर्ति साक्षात रूप ले सकती है। ईश्वर तक पहुँचने के लिए इन्हीं मूर्तियों का सहारा लेना पड़ता है। आप इस पर सवाल नहीं उठाते। बस यही कहते कि ये हमारे पुरखों की, हमारे बुज़ुर्गों की रीत है। किस बात से आपने अपनी आस्था पर सवाल उठाने शुरू किए?
शायद मैं हाई स्कूल में था, टीवी पर महाभारत देख रहा था। तभी मन में इन बातों को लेकर सवाल उठने लगे। ये बातें तर्क में बैठती ही नहीं थीं। क्योंकि तर्क से, बुद्धि से देखें तो कुछ चीज़ें मेल ही नहीं खातीं। जैसे कोई भगवान इंसान हो, जिसकी अपनी सीमाएँ हों। कोई भगवान, जो सब कुछ न जानता हो। कोई भगवान, जिसे प्रकट होने के लिए दूसरे भगवान की मदद चाहिए। ये विचार कि ईश्वर को दुनिया में आना पड़े, कि ईश्वर दुनिया के भीतर भी हो और बाहर भी। एक दिन मैं घर पर था, अपने भाई के साथ, तभी मेरे माता-पिता आए और बोले "देखो, हम एक महात्मा के दर्शन करने जा रहे हैं।" पर मुझे सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब मैं उस घर पहुँचा एक आम सा घर था, और वहाँ हर तरफ़ तस्वीरें लगी थीं एक छोटी लड़की की सफ़ेद कपड़ों में, बैठी हुई। सोचिए, एक लड़की की इतनी बड़ी-बड़ी तस्वीरें,बैठी हुईं। पूरे घर में। फिर हमें घर के अंदर एक ख़ास कमरे में ले जाया गया, जहाँ वो बैठी थी। मुझे याद है, वो मुझसे कह रहे थे कि ये तुम्हारी भगवान हैं। वो रही होगी कोई आठ-नौ साल की। मुझसे भी छोटी थी। उस छोटी लड़की के बारे में वो बोले "देखो, हमें इनसे आशीर्वाद लेना है, इनकी पूजा करनी है।" और मेरे माता-पिता इसे बहुत गंभीरता से ले रहे थे। पर मैं तो सोच रहा था ये आख़िर हो क्या रहा है?
मैं इस छोटी लड़की की पूजा क्यों कर रहा हूँ?
पर आप सवाल नहीं उठाते, क्योंकि ये आपके माता-पिता हैं। वो जो कहते हैं, आप मान लेते हैं, और उसे सच समझते हैं। एक छोटी लड़की, जो मुझसे भी छोटी है, मेरी ही तरह एक इंसान है, और मुझसे कहा जा रहा है कि यही तुम्हारी रचयिता हैं, हमें इनसे आशीर्वाद माँगना है, इनकी पूजा करनी है, इनके आगे माथा टेकना है। और मैं सोच रहा था ये तो ग़लत है। एक और मिसाल शायद कुछ लोग जानते हों, साईं बाबा नाम के एक शख़्स। वो एक भारतीय गुरु थे, जो बहुत मशहूर हो गए भारत में करोड़ों लोग उन्हें मानते थे। हमारे घर में उनकी तस्वीर हुआ करती थी। धार्मिक पोशाक में उनकी एक तस्वीर, गले में फूलों की माला पहने हुए, वो तस्वीर हमारे घर में थी, उनकी मूर्ति भी, और उनकी तस्वीर भी। मेरे माता-पिता उनकी पूजा करते थे। वो एक काम ये करते थे जब उनके भक्त सामने होते, तो वो उँगलियाँ यूँ मलते, और जादुई ढंग से उनके हाथों से अपने आप राख निकलने लगती। और लोग समझते कि ये आशीर्वाद है। एक और काम ये था कि वो मुँह से सोने के अंडे निकालते थे। सोचिए, सामने एक धातु की थाली रखी है, फिर वो कुछ मंत्र जैसा उच्चारण करते, और सामने बैठे लोग देखते रहते, फिर वो उबकाई का नाटक करते, और अचानक एक सोने का अंडा निकल आता। अब राख वाली बात वो राख की छोटी-छोटी गोलियाँ उँगलियों में छुपाकर रखते थे। फिर यूँ करते, और उन्हें मसल देते। वो अंडे वाला खेल भी पता नहीं आस्तीन में छुपा होता था या यहाँ कहीं, पर जब वो उबकाई का नाटक करते, तो लगता जैसे मुँह से निकल रहा हो, ये सब हाथ की सफ़ाई थी। तो हिंदू धर्म में आपको ऐसा देखने को मिलता है। बहुत सी ऐसी बातें, जहाँ लोग इस तरह के करतबों से जनता को बहकाते हैं। मुझे बस यही समझ आया कि ये सब बातें तर्क में नहीं बैठतीं, पर कुछ न कुछ तो ज़रूर है। तो मेरी अपनी पूजा जब मैं ईश्वर को पुकारने की बात करता हूँ, तो वो हमेशा मेरा अपनी ज़ुबान में, अंग्रेज़ी में ईश्वर से बात करना होता था। मैं बस ईश्वर से कहता मुझे इसमें मदद चाहिए, या मुझे इस बात के लिए माफ़ कर दीजिए। मेरा मानना है कि ये हमारे भीतर जन्म से ही होता है, हम सबके अंदर। और मैं बस उसी से जुड़ रहा था। इस्लाम की तरफ़ आपका सफ़र कैसे शुरू हुआ?
मुसलमान बनने से पहले भी मैं अपने दोस्तों के साथ जुमे की नमाज़ के लिए मस्जिद जाता था। मुझे याद है, मस्जिद में जाकर लोगों की बहुत सी कतारें देखता और मुझे ये तरीक़ा हिंदू धर्म से बिल्कुल अलग लगा, ख़ासकर जब आप सजदे में जाते हैं अपने हाथ ज़मीन पर रखते हैं, चेहरा ज़मीन पर होता है, और ये पूरी तरह समर्पण की निशानी है। ऐसा मैंने ज़िंदगी में पहले कभी नहीं किया था। क्योंकि मैं चर्च भी गया था, मंदिर भी गया था, बौद्ध मंदिर भी देखे थे, और वहाँ हमेशा कोई न कोई तस्वीर या मूर्ति दिखती थी, और यहाँ मस्जिद में आइए कुछ भी नहीं दिखता। सब कुछ बहुत सादा है, सामने मिंबर होता है, जहाँ इमाम साहब खड़े होते हैं। बहुत साफ़-सुथरा, सीधा-साधा, और वहाँ आप ख़ुदा की इबादत करते हैं। तो हाँ, कोई मूर्ति न देखना अजीब लगा, पर साथ ही ये उसी बात का प्रमाण था, जो मैं मानता था। एक सुकून था, कोई पैसे नहीं माँग रहा था। कोई नहीं कह रहा था कि इन देवताओं को कुछ चढ़ाना पड़ेगा, इबादत क़बूल होने के लिए कोई प्रसाद चढ़ाने की ज़रूरत नहीं। यही बात सबसे ख़ूबसूरत थी। फिर मैंने इस धर्म को समझना शुरू किया। पहले मुझे लगता था कि ये पाकिस्तानियों का धर्म है। फिर मैंने अलग-अलग जगहों के लोग देखे। अरब, अफ़्रीकी, पूर्वी एशियाई, तुर्क लोग। बचपन में मेरे तुर्क दोस्त भी थे। याद है, मुसलमान बहुत मिलनसार थे, बहुत दरियादिल, बहुत साफ़-सुथरे, मुझे उनसे एक अपनापन महसूस हुआ। और तब समझ आता है ये तो ऐसा ही होना चाहिए। इस्लाम में एक ही ख़ुदा की बात है पूरी तरह एक, जो सृष्टि का हिस्सा नहीं, जो हमेशा से है। और हिंदू धर्म में अनगिनत भगवान हैं। ईश्वर का दुनिया में अवतार लेना ये इस्लाम के बिल्कुल उलट है। फिर ईसाइयत है, जिसमें ट्रिनिटी का विचार है, जिसे वो एकेश्वरवाद कहते हैं पर ये मैं पहले भी देख चुका था। जैसा मैंने कहा, हिंदू धर्म में त्रिमूर्ति है उनकी अपनी ट्रिनिटी। और वही बात कहते हैं कि ये सब एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं। और हैरानी की बात ये कि जब मैंने प्राचीन यूनानी कथाएँ देखीं, फ़ारसी, बेबीलोनी सबमें यही ट्रिनिटी का विचार मिला। जैसे कोई चीज़ सदियों से घूम-फिरकर दोहराई जा रही हो। तो मुझे लगा, लोग चाहे जो भी मानने का दावा करें, कोई एक सार्वभौमिक सच तो होगा। फिर मेरे सामने इस्लाम की बुनियादी बातें आईं, और मैं दंग रह गया। ये समझ कि एक ख़ुदा है जो यकता है, जो सृष्टि का हिस्सा नहीं एक सर्वशक्तिमान हस्ती। मेरे सामने ज़िंदगी में पहली बार ऐसा धर्म आया, जो उसी बात से मेल खाता था, जिसे मैं सच मानता आया था। और फिर मैं कुरआन तक पहुँचा, और सूरह अल-इख़लास यानी शुद्धता तक। जब मैंने वो चार आयतें पढ़ीं, तो मेरे मन में जैसे एक रौशनी जल उठी। लिखा था, "कह दीजिए, वो ख़ुदा है, एक है।" मैंने कहा हाँ, मैं एक ही ख़ुदा को मानता हूँ। "हमेशा से है, पूर्ण है, किसी पर निर्भर नहीं।" ज़ाहिर है, अगर ख़ुदा है, तो ऐसा ही होगा वो कोई बनाई हुई हस्ती नहीं हो सकती, स्वाधीन। "न उसकी कोई संतान है, न वो किसी की संतान।" यानी न उसके माता-पिता हैं, न कोई औलाद। और मैं उस परंपरा से आता हूँ, जहाँ भगवान हैं, देवता हैं, भगवानों के बेटे, भगवानों की बेटियाँ जिन्हें मैं ठुकरा चुका था। यहाँ ख़ुदा रचयिता है न उसके माता-पिता, न कोई औलाद। हाँ। पर आख़िरी बात "और कोई उसके जैसा नहीं।" यानी ख़ुदा के बारे में आप जो कुछ भी सोच सकते हैं, वो ख़ुदा नहीं, क्योंकि ख़ुदा सृष्टि से बाहर है, सृष्टि के भीतर नहीं। हमारी सारी कल्पनाएँ तो उसी से बनी हैं, जो हमने अपने आस-पास देखा है। और मैं बस हक्का-बक्का रह गया। और वहीं से शुरुआत हुई कि ये तो पूरी तरह तर्क में बैठता है। फिर मैंने धर्मशास्त्र की किताबें पढ़नी शुरू कीं, पूरा कुरआन पढ़ा। और दिलचस्प बात ये कि ये सब साथ-साथ चल रहा था मैं क़रीब आता जा रहा था, वो मुझे इस्लाम के बारे में और भी अधिक बताते जा रहे थे, मैं उनका अमल देख रहा था, कि वो इबादत कैसे करते हैं, देखता कि वो एक साथ, एक ही सफ़ में खड़े होकर ख़ुदा की इबादत करते हैं यहाँ तक कि ग्रेजुएशन के वक़्त मुझे एक फ़ैसला लेना ही था कि अब मैं क्या करूँ। एक मोड़ पर आकर मुझे लगा नहीं, अगर मैंने ये नहीं किया, तो मेरी पूरी ज़िंदगी एक झूठ होगी। और ये मुझसे नहीं होगा। मुझे ये फ़ैसला लेना ही है। तो मैंने फ़ैसला किया, और दोस्तों को बताया, और जब मैंने बताया, तो वो दंग रह गए। मुझे कुछ अंदाज़ा नहीं था कि इसमें क्या-क्या शामिल है न अमल का, न बुनियादी अक़ीदे का। बस इतना जानता था कि ये सच है। मुझे ये क़दम उठाना ही है। यही ख़ुदा है, यही ख़ुदा का दीन है, यही सच है, यही रास्ता है। कलमा पढ़ते वक़्त आपको कैसा महसूस हुआ?
क्या आप हमें उस दिन में ले चल सकते हैं? वो दिन याद करता हूँ, तो याद आता है कि मैं बहुत घबराया हुआ था। और याद है, मैंने कलमा पढ़ा, और बहुत से लोग यही कहते हैं जैसे कंधों से कोई भारी बोझ उतर गया हो। आप हल्का महसूस करते हैं। मैंने कलमा पढ़ा, और सारे दोस्तों ने मुझे गले लगा लिया बहुत भावुक लम्हा था। आप ख़ुद को पाक महसूस करते हैं, हल्का, जुड़ा हुआ, और एक सुकून में। और आपके इस्लाम अपनाने पर माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया थी?
जब मैंने इस्लाम अपनाया, तो ज़ाहिर है, ये बात मुझे पहले से सोचनी पड़ी थी, पर फिर मुझे लगा कि मैं मिथ्या में नहीं जी सकता। तो अगली बात ये समझ आई कि अब माता-पिता को बताना ही होगा। जब बताया, तो वो ख़ुश नहीं हुए। उन्हें बहुत निराशा हुई। मेरी माँ तो बहुत ग़ुस्से में थीं, और मेरे पिता उनकी समझ में ये बात आई ही नहीं। क्योंकि अब आपको परिवार पर एक कलंक समझा जाने लगता है। और फिर बात फैलती है ख़ासकर हिंदू समाज जैसे छोटे समुदाय में। तो ज़ाहिर है, इसका असर मेरे माता-पिता पर भी पड़ा। पर, आप अपने बच्चे को दुश्मन यानी मुसलमान कैसे बनने दे सकते हैं?
तो मैं बस अपने रास्ते पर चलता रहा, और मुझे समझ आया कि कई सालों तक कलमा पढ़ लेने के बाद भी, और अच्छा महसूस करने के बाद भी, ये जानने के बाद भी कि यही सच है कुछ अब भी अधूरा था। मैं पाँचों वक़्त की नमाज़ नहीं पढ़ता था। और फिर...
अल्लाह ने मुझे एक निशानी भेजी। वो कमाल था। इसके बारे में सोचकर ही मैं भावुक हो जाता हूँ। क्योंकि नए मुसलमान के तौर पर आप अकेले होते हैं। माफ़ कीजिए, मैं रोना नहीं चाहता। तो उन्हीं दिनों 2008-2009 के आस-पास मैंने और वीडियो देखने शुरू किए, और ज़्यादा जानने लगा, तभी अल्लाह ने ये कमाल की निशानी भेजी। मेरी बहन मुझसे दस साल छोटी है। वो पक्की हिंदू थी। फिर एक दिन उसने मुझसे कहा, मेरी सहेलियों ने मुझे एक प्रोग्राम में बुलाया है। ये इस्लाम के बारे में है। तो मैंने कहा, चलो, देख आते हैं। उनका तरीक़ा ये था कि शुक्रवार को एक मुफ़्त झलक दिखाते हैं, और पूरा प्रोग्राम वीकेंड पर चलता है शनिवार, रविवार। आम तौर पर किसी बड़े होटल में। वहाँ पहुँचकर मैं दंग रह गया। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। और मुझे याद है, वो शेख़ साहब वो सामने ही आयतें पढ़ रहे थे। और मैं कहूँगा कि मेरी रगों में जैसे सिहरन दौड़ गई। मैंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं सुना था। और मैंने सोचा देखो...
असल धर्म तो यही है। तो शुक्रवार बीता, और मैंने सोचा वाह, ये तो बहुत ख़ूबसूरत है। सैकड़ों लोग कमाल का माहौल था। मैं ऐसे किसी कोर्स में पहले कभी नहीं गया था, तो ज़ाहिर है, मैंने नाम नहीं लिखवाया था, पर उसने लिखवा लिया था। तो मैंने बहन से कहा "देखो," और मुझे पूरा भरोसा था, मैंने कहा, "कोई सवाल हो, तो शेख़ साहब से पूछ लेना, हाँ, अगर कुछ हो तो फ़िक्र मत करो, सब ठीक रहेगा, तुम्हारी सहेली तो साथ होगी ही।" क्योंकि उसकी सोमाली सहेली वहाँ वॉलंटियर थी। उसी ने उसे कोर्स में बुलाया था। वो शनिवार का दिन मुझे साफ़-साफ़ याद है। मैं अपने दोस्तों के साथ वही रोज़ वाले काम कर रहा था, आवारागर्दी जैसा लोग शनिवार को करते हैं। और शाम को मेरी बहन ने मुझे मैसेज भेजा, उसने लिखा "बस बताना चाहती थी कि मैं प्रोग्राम में सवाल पूछ रही थी, और मैंने फ़ैसला कर लिया मैंने कलमा पढ़ लिया।" अप्रत्याशित रूप से!
वो शेख़ साहब...
जैसा मैंने कहा, वो ये क़िस्सा सुनाते हैं। उन्होंने बताया कि वो शुक्रवार को आए और मैं बाद में उनसे मिला भी। उन्होंने सामने इतने सारे लोग देखे आगे पुरुष, पीछे महिलाएं और वो बोलने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनकी नज़र महिलाओं वाले हिस्से पर पड़ी, जहाँ एक बहन बिना हिजाब के बैठी थी। फिर सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ। उनकी नज़र उसी बहन पर गई, जिसने सिर नहीं ढका था, और वो सवाल पूछने लगी। उन्हें साफ़ समझ आ गया कि ये एक ग़ैर-मुस्लिम बहन है। तो वो दावत के अंदाज़ में आ गए, क्योंकि वो दाई हैं। और उन्होंने उससे सवाल पूछने शुरू किए। और हुआ ये कि क्योंकि वो बड़े सलीक़े से बात करते हैं बात यहाँ तक पहुँची कि उन्होंने मेरी बहन से कहा "अगर ये सब आपको समझ आ रहा है और कोई सवाल बाक़ी नहीं, तो आप इस्लाम अपनाने के बारे में क्यों नहीं सोचतीं?" कुछ इसी तरह। और उसने कहा कि उसके पास कोई जवाब नहीं था। तो उन सारी बहनों के सामने उसने कलमा पढ़ लिया। और जिस बात ने मुझे और भी हैरान किया। याद रखिए, वो टीचर है, ट्रेनिंग पर थी। इस्लाम अपनाते ही उसने पूरा हिजाब और अबाया पहन लिया। मुझे याद है, उसने बताया कि वो स्कूल गई, और सारे बच्चे उससे पूछने लगे, "मिस, मिस, आपको क्या हुआ?" क्योंकि वो बिल्कुल बदल गई थी...
"क्या किसी ने आपको ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया?" उसने कहा "नहीं, नहीं, मैंने ख़ुद मुसलमान बनने का फ़ैसला किया।" और ज़ाहिर है, वहाँ मुसलमान भी थे, और उसकी साथी टीचर इतनी ख़ुश भी थी, और इतनी हैरान भी। और मेरे लिए तो यही जवाब था। मैंने अल्लाह से माँगा था, और वो जवाब मेरी बहन थी। और वो चट्टान की तरह डटी रही। जैसा मैंने कहा, वही थी जैसा मैंने कहा, बहनें भाइयों से बेहतर होती हैं, उसने फ़ौरन अमल शुरू कर दिया, दीन को अपना लिया। तो ज़ाहिर है, इससे मुझे भी मदद मिली। और वो मुझसे कहती है कि जब मैंने कलमा पढ़ा और मुसलमान हुआ, तो उस पर बहुत गहरा असर पड़ा था। मुझे अंदाज़ा ही नहीं था, वो तो पहले से ही इस पर सोच रही थी। और हिदायत देने वाला तो अल्लाह ही है। उस दिसंबर में मेरी बहन मेरे पास आई, क्योंकि छुट्टियाँ थीं, और बोली "मुझे एक प्रोग्राम में बुलाया गया है। ये नए मुसलमानों के लिए है, जहाँ बुनियादी बातें सिखाते हैं। क्या ख़याल है, चलें?" "क्यों नहीं, चलो देख आते हैं, वैसे भी कोई काम तो है नहीं, इसमें हमारा जाता ही क्या है।" और हम उस नए मुसलमानों के प्रोग्राम में गए, वहाँ मैं और भी नए मुसलमानों से मिला, जो उसी सफ़र से गुज़र रहे थे, एक भाई से जो पहले सिख थे, एक भाई जो पहले ईसाई थे, और कुछ भाई जो चीनी, बौद्ध पृष्ठभूमि से थे। जैसे अल्लाह ने मुझे राह दिखाई हो और ज़ाहिर है, उससे बेहतर योजना कोई नहीं बनाता। और उस वक़्त मुझे ठीक इसी की ज़रूरत थी, और फिर मैंने आयरा [IERA] के साथ इस काम में हिस्सा लेना शुरू किया। अगर आपको किसी एक के लिए दुआ माँगने का मौक़ा मिले, और वो क़बूल भी हो जाए, तो आप किसके लिए और क्या माँगेंगे?
मैं बिना किसी शक के कहूँगा, और शायद हर नया मुसलमान यही जवाब देगा। और वो जवाब है अपने माता-पिता। नए मुसलमानों के लिए यही सबसे मुश्किल बात है... ये सोचना कि जिन माता-पिता ने आपको पाला-पोसा, उन्हें हिदायत नहीं मिली। तो... नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कौन सी बात ने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, लोग भूल जाते हैं कि वो ऐसे समाज में पले-बढ़े, जो मूर्तियों से भरा हुआ था। काबे में 360 मूर्तियाँ थीं। और वो उसे पाक करने आए। जिस पैग़ाम के लिए उन्हें चुना गया था, एक ख़ुदा की ख़ालिस बंदगी, उस समाज में, जो कई देवताओं को मानने लगा था जबकि पहले वो एक ही ख़ुदा को मानता था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो किया, उससे मेरा गहरा रिश्ता है। उन्होंने उस पूरे इलाक़े को पाक किया, मूर्तिपूजा हटाई और मुझे ये बात बहुत भाती है, क्योंकि मैं इस क़िस्से को अपने से जोड़ पाता हूँ। तो हिंदू धर्म की बुनियादी मान्यता क्या है?
हाँ, तो हिंदू धर्म की बुनियादी मान्यताएँ अलग हैं। ये बहुदेववादी धर्म है। मतलब ये कि वो कई देवताओं को मानते हैं। फिर आपको समझ आने लगता है कि कुछ बातें उलझा देती हैं। क्योंकि आख़िर मैं किस भगवान की पूजा करूँ?
और अगर इतने सारे भगवान हैं, तो वो आपस में तालमेल कैसे बिठाते हैं, सब कुछ कैसे चलता है। जीवन और मृत्यु की बात करें, तो हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है। यानी आप दुनिया में लौटकर आते हैं, और आपका जन्म इस बात पर तय होता है कि आपने पिछली ज़िंदगी किस तरह जी। अगर आपने अच्छे कर्म किए, तो ऊँची योनि में जन्म मिलेगा। मान लीजिए आप एक चूहे हैं, और आप अच्छे चूहे रहे, तो शायद अगला जन्म भालू का मिल जाए। और इसी तरह इंसान भी अगर आपने बुरी ज़िंदगी जी, अपराध किए, दूसरों के साथ बुरा किया, तो अगला जन्म नीची योनि में मिलेगा। जैसे कोई तिलचट्टा, मिसाल के तौर पर सोचकर देखें, तो ज़्यादा लुभावना नहीं लगता। तो हिंदू धर्म में जीवन-मरण का यही पूरा चक्र है। और ये बात इंसानों पर भी लागू होती है। जैसे, अगर आप किसी ऐसे इंसान को देखें, जो जन्म से ही दिव्यांग है, जिसमें कोई कमी या शारीरिक विकार है, तो अफ़सोस कि लोग उसके साथ बुरा बरताव करते हैं। क्योंकि उनकी धार्मिक समझ ये है कि ये इंसान अपने पिछले जन्म में बुरा रहा होगा। और इससे ज़ुल्म पैदा होता है, नाइंसाफ़ी उसे समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता, वो हाशिये पर धकेल दिया जाता है, और हम जानते हैं कि ये सच नहीं है, क्योंकि ये लोग तो बेक़सूर हैं, इनके सामने पहले से ही एक चुनौती खड़ी है। और जैसा मैंने कहा, जाति व्यवस्था में एक वर्ग होता है, जिसे अछूत कहते हैं, और उन्हें सचमुच इस तरह अलग-थलग कर दिया जाता है कि समाज उनसे मेल-जोल नहीं रखता, उन्हें वो हक़ नहीं मिलते, और सोचिए, आपका जन्म ही इसमें हुआ हो, आप कभी इससे निकल ही नहीं सकते। और एक बात और अवतारवाद का विचार, जो कि, यानी जब आप इन मूर्तियों को देखते हैं, तो सबसे बड़ी बात ये है कि वो शक्ल-सूरत से इंसान जैसी हैं। और ये विचार ये कहता है कि ईश्वर किसी इंसान या किसी जानवर के रूप में धरती पर अवतार लेता है ताकि कोई न्याय कर सके। इसकी एक मिसाल है गणेश। वो ऐसे भगवान हैं, जिनका शरीर इंसान का है, पर सिर हाथी का। और इसके पीछे एक कथा है। कथा ये है कि एक दिन दो भगवानों ने आपस में विवाह किया, और उनमें से एक यानी पिता को कुछ समय के लिए एकांतवास में जाना पड़ा। और उन्हें पता ही नहीं था कि उनकी पत्नी गर्भवती हैं। तो कई साल बाद क़रीब एक दशक बाद वो घर लौटे, और घर में घुसने लगे, पर उनका बेटा, जिसे वो जानते ही नहीं थे, पहरा दे रहा था, और उसने भी इन्हें नहीं पहचाना, जो उसके पिता थे, और घर में घुसने की कोशिश कर रहे थे। तो ज़ाहिर है, झड़प हुई, और फिर हुआ ये कि उस भगवान ने उस बालक का सिर काट दिया। फिर हुआ ये कि माँ बाहर दौड़ी आईं "ये क्या कर दिया, ये तो हमारा बेटा है।" तो उस भगवान ने अपने बेटे को बचाने के लिए सबसे पास जो जानवर मिला और वो इत्तिफ़ाक़ से हाथी था उसका सिर लगाकर अपने बेटे को जिला दिया। तो मेरे लिए यही एक बड़ी दिक्कत थी। और जैसे 'अवतार' फ़िल्म में जेक होता है वो एक सूट पहन लेता है और फिर वो वो नीले अवतारों से बात करने लगता है लगभग वैसे ही, जैसे ईश्वर इंसानी रूप में, अवतार बनकर धरती पर उतरता है, ताकि न्याय कर सके। तो बड़े होते-होते मैं इन्हीं विचारों से जूझने लगा। तो हिंदू धर्म की बुनियाद बनाने वाले ये सारे विचार, मेरे लिए, वक़्त के साथ तार्किक लगने बंद हो गए, मन को जँचे ही नहीं। जैसे कई भगवानों का विचार तो फिर मुखिया कौन है, मुख्य भगवान कौन है?
कोई एक भगवान दूसरे से ज़्यादा शक्तिशाली या ज्ञानी किस वजह से है? दूसरी बात ईश्वर का मानव रूप और अवतार, यानी ईश्वर का इंसान होना। और ये विचार भी कि ईश्वर सृष्टि के भीतर ही है। फिर जब मैंने इस पर सोचना शुरू किया, तो लगा जैसे कोई बढ़ई फ़र्नीचर बनाता है, कोई मेज़ वो उसका डिज़ाइनर है, वो उसे बनाता है, जोड़ता है पर वो कभी मेज़ नहीं बन सकता। क्योंकि बढ़ई की जो प्रकृति है, वो मेज़ या कुर्सी की प्रकृति से अलग है। तो वो कभी फ़र्नीचर का हिस्सा नहीं बन सकता। और इसी तरह जब आप ख़ुदा को देखें ख़ुदा रचयिता है, जो सृष्टि से बाहर है, उसने सब कुछ बनाया, पर वो सृष्टि का हिस्सा नहीं बनता। हिंदू ग्रंथों और कुरआन की तुलना करें, तो आपको फ़र्क़ कहाँ दिखता है?
पहली बात, कुरआन की जो बात है, उसमे जो पैग़ाम है, वो बहुत स्पष्ट है। पैग़ाम बहुत सीधा और बहुत साफ़ है। और वो ये कि एक ही ख़ुदा है, जो सृष्टि का हिस्सा नहीं, और वही सबका रचयिता है, सबका पालनहार। उसने पूरे इतिहास में इंसानों से बात की है पैग़ंबरों और वही के ज़रिए। ताकि हमें राह दिखाए, सच दिखाए, कि ये ज़िंदगी एक इम्तिहान है, कि हम अपने रचयिता से फिर जुड़ें, जिसके पास हमें लौटना है, और एक अच्छी ज़िंदगी जिएँ। क्योंकि जैसे कोई मोबाइल फ़ोन बनाता है, तो उसे सही तरीक़े से इस्तेमाल करने के लिए आपको एक गाइड चाहिए होती है। उसी तरह इंसानों को भी एक मार्गदर्शिका चाहिए, जो हमारे रचयिता की तरफ़ से आए, ताकि हम समझ सकें। तो कुरआन को मैं ऐसे ही देखता हूँ, वो सुसंगत है, साफ़ है, पूरी तरह तर्क में बैठता है। पर उसके आगे, जब आप हिंदू ग्रंथों को देखते हैं। तो उनमें भी बहुत सी अच्छी शिक्षाएँ हैं, बहुत से अच्छे मूल्य हैं, पर कुरआन के बारे में हम जानते हैं कि वो एक तय दौर से आया, जो प्यारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर उतरा। और हम जानते हैं कि तेईस साल तक वही (प्रकाशना) उतरती रही, और हम जानते हैं कि वो सुरक्षित रहा। क्योंकि उसे सँभालकर रखने की परंपरा मुख्य रूप से लिखे हुए पन्नों में नहीं, बल्कि मौखिक परंपरा में है, जो आज तक चली आ रही है। हमारे पास लाखों लोग हैं, जिन्हें पूरा कुरआन ज़ुबानी याद है, और आप ये अपनी आँखों से देख सकते हैं। यानी वो सुरक्षित रहा, और ख़ुदा ने कुरआन में ख़ुद ये कहा है कि हम इसकी हिफ़ाज़त करेंगे, हम ही इसे बचाएँगे। वेदों और उपनिषदों के मामले में हमें ऐसा नहीं दिखता। पहली बात, मैं एक भी ऐसे इंसान को नहीं जानता, जिसे वो ग्रंथ ज़ुबानी याद हो। किसी और ग्रंथ की तो बात ही छोड़िए। ये एक चमत्कार है। ये निशानियाँ हैं। और जैसा आपने कहा, जब आप कुरआन की कुछ बातों को देखते हैं, जब आप गहराई में उतरते हैं जैसा हमज़ा जॉर्जिस कहते हैं, उसके कई परतों वाले, कई पहलुओं वाले मायने और निशानियाँ, और फिर हर चीज़ अपने आप में एक निशानी है। जब लोग कहते हैं कि मैं ख़ुदा को ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ तो अल्लाह ने हमारे चारों तरफ़ निशानियाँ बिखेर रखी हैं, बस देखने की देर है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जब आप इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाने निकलें, तो सबसे अच्छा काम यही है कि किसी को कुरआन की एक प्रति दे दें। अगर वो इंसान सच्चा है, तो वो समझ जाएगा कि ये ख़ुदा का कलाम है। क्या ये सच है कि वो गाय की पूजा करते हैं और माँस नहीं खाते, और ऐसा क्यों है?
हाँ, तो हिंदू धर्म में गाय को एक धार्मिक प्रतीक माना जाता है। और इसकी वजह ये है कि वो गाय को पवित्र मानते हैं, क्योंकि वो जीवन देती है, दूध देती है। वो गाय को नहीं खाते, क्योंकि वो पवित्र मानी जाती है, इसलिए गोमांस नहीं खाते। और वो गाय की और भी चीज़ें काम में लाते हैं, जैसे गोबर, जिसे वो घर लीपने में और जलाने के काम में भी लाते हैं। तो उन्हें गाय के कई सारे उपयोग दिखते हैं, और इसीलिए उसका दर्जा ऊँचा हो गया यहाँ तक कि उनकी धार्मिक मान्यता में वो गौमाता को मानते हैं, और आप समझ सकते हैं कि माँ का दर्जा तो बहुत ऊँचा माना जाता है। और कुछ अतिवादी सोच वाले तो ये मानते हैं कि गाय ईश्वर का ही एक रूप है। और ये आपको दिखता भी है। तो वो गायों के आगे धार्मिक रस्में करते हैं। और अगर आपने गाय के ख़िलाफ़ कुछ भी किया, तो वो उसे अपने और अपने समुदाय के ख़िलाफ़ एक भड़काने वाली बात मानते हैं। ज़्यादातर हिंदू शाकाहारी हैं। अगर आप हिंदू धर्म की सख़्त शिक्षाओं को देखें, तो उनमें से ज़्यादातर शाकाहारी होंगे। पर कुछ लोग मुर्ग़ा खा लेते हैं, बकरे का माँस खा लेते हैं, तो हाँ, मैं गोमांस न खाते हुए बड़ा हुआ। मेरी माँ हमें मुर्ग़ा दिला देती थीं, बकरे का माँस भी, पर एक वक़्त ऐसा आया, जब उन्होंने थोड़ा और धार्मिक होने का फ़ैसला किया, और तब से हमें कोई माँस खाने की इजाज़त नहीं थी। पर मुझे याद है, बचपन में मैं बग़ावत कर देता था हम चीज़बर्गर खाने चले जाते थे, और घर पर बताते नहीं थे...
मैं खा लेता था, हाँ भले ही वो हमारी परंपरा के ख़िलाफ़ था। घर पर तो मैं ऐसा कभी न करता, बहुत बुरा माना जाता, घर में गोमांस तो होता ही नहीं, पर जब आप पूरी बात देखें, तो ये तर्क में बैठता ही नहीं, क्योंकि आख़िर में गाय भी बाक़ी जानवरों जैसी एक जानवर है, यानी ख़ुदा की ही बनाई हुई। हाँ, ये सच है कि वो बहुत पोषण देती है, पर इसका मतलब ये नहीं कि वो किसी भी तरह पवित्र या दैवीय हो जाए। गंगा नदी को पवित्र माना जाता है इसका कोई मतलब है, या आप इस पर कुछ कहना चाहेंगे?
गंगा के बारे में वो कहते हैं कि ये भारत की एक पवित्र नदी है, जहाँ लोग आकर पुण्य पाने के लिए धार्मिक रस्में करते हैं। मुझे पता है, मेरे माता-पिता और घर के लोग गंगा की बात करते थे, वो वहाँ जाकर स्नान करते थे जैसे नदी में नहाकर आत्मा शुद्ध हो जाती है। और वो अपने मृतकों की अस्थियाँ भी वहीं ले जाते हैं। तो हिंदू धर्म में, जब किसी की मृत्यु होती है ज़ाहिर है, मैंने पुनर्जन्म का ज़िक्र किया पर जहाँ हम मुर्दों को दफ़नाते हैं, वहाँ वो दाह संस्कार करते हैं, यानी शरीर को जलाया जाता है। और शरीर को तब तक जलाते हैं, जब तक वो राख न बन जाए, फिर वो राख एक कलश में रखते हैं, और उसे गंगा नदी में प्रवाहित कर देते हैं क्योंकि वो मानते हैं कि इस तरह आप फिर से सृष्टि का हिस्सा बन जाते हैं। ये हिंदुओं के लिए रोज़ का काम है, या हफ़्ते का?
ज़्यादातर हिंदू अपने धर्म पर अमल करने के लिए जो करते हैं, वो ये है वो घर में ही पूजा की एक जगह रखते हैं, जिसे पूजा घर कहते हैं, जहाँ मूर्तियाँ सजी होती हैं, और रोज़ का ये नियम होता है कि देवताओं की पूजा की जाए शायद सुबह के वक़्त, कुछ भोग चढ़ाकर, ताकि भोजन पवित्र हो जाए। जैसे इस्लाम में हम इस तरह दुआ करते हैं, वैसे ही आपने हिंदुओं में ये चिह्न देखा होगा, जो सम्मान की निशानी है, और पूजा की भी, तो वो मूर्तियों के सामने हाथ जोड़ते हैं, कुछ माँगते हुए। तो हाँ, वो मानते हैं कि ये मूर्तियाँ ईश्वर का ही रूप या प्रतीक हैं, और कुछ लोग तो मानते हैं कि मूर्तियों में ख़ुद शक्ति है। और ये बात दिलचस्प है, क्योंकि इस्लाम में देखिए अल्लाह के नाम हैं, उसकी सिफ़तें हैं, पर ये सब एक ही ख़ुदा के नाम और सिफ़तें हैं। लगभग ऐसा लगता है कि उन्होंने इन्हीं सिफ़तों को लेकर हर एक के लिए अलग मूर्ति बना ली। अगर कोई कहे कि मुझे तो हिंदू धर्म में ही आध्यात्मिक सुकून मिलता है, तो मुझे दूसरे धर्म की क्या ज़रूरत आप उससे क्या कहेंगे?
मान लीजिए हम दोस्त हैं, मैं और आप, और आप सब जो देख रहे हैं। हम बहुत अच्छे दोस्त बन गए। और मान लीजिए मैं कोई बहुत बड़ा अरबपति हूँ। और मैं आपकी मदद करना चाहता हूँ। मैं आपको तोहफ़े में मान लीजिए एक करोड़ पाउंड देना चाहता हूँ। तो जब मैं आपको वो एक करोड़ पाउंड तोहफ़े में दूँ, तो आप क्या करेंगे?
बात ये है कि आप शुक्रिया कहेंगे। जब भी कोई आपको कुछ देता है। तो अपने वजूद की बात करें हमें जो नेमतें मिली हैं, देखने की ताक़त, बोलने की ताक़त, हर पल को जीने की ताक़त हमने ख़ुद को तो बनाया नहीं। हमने अपनी चमड़ी का रंग नहीं चुना, अपना लिंग नहीं चुना, ये सब हमें तोहफ़े में मिला है। और आध्यात्मिकता भी उसी का हिस्सा है। अब उसी मिसाल पर लौटें, मान लीजिए मैंने आपको वो एक करोड़ पाउंड दिए। पर आपने मेरा शुक्रिया करने के बजाय लियोनेल मेसी का शुक्रिया किया। हाँ, वो बहुत बड़े फ़ुटबॉलर हैं। हाँ, पर आपको वो एक करोड़ पाउंड देने से उनका कोई लेना-देना नहीं। और धर्म को मैं कुछ ऐसा ही देखता हूँ। कि ये इतने सारे धर्म हैं, इतने सारे आध्यात्मिक रास्ते हैं, हम सब इसी आध्यात्मिक ज़रूरत को पूरा करने की कोशिश में हैं, पर हम उसका रुख़ ग़लत तरफ़ मोड़ रहे हैं। जब हम जाँच-परख करते हैं और धार्मिक नज़रिए से चीज़ों को देखते हैं, तो समझ आता है कि कोई एक सार्वभौमिक सच ज़रूर होगा। और जब आप उस असली सच से जुड़ जाते हैं, यानी रचयिता से, उस एक सच्चे ख़ुदा से, तभी आपके अंदर का वो आध्यात्मिक ख़ालीपन सच में भरता है। अगर आपको दुनिया के सारे हिंदुओं से बात करने का मौक़ा मिले, तो चंद लम्हों में आप उनसे क्या कहेंगे?
हम सब इंसान हैं, और मेरी ही तरह आप भी अपने परिवार की परंपरा निभाते हैं, क्योंकि आप सवाल नहीं उठाते। पर अगर हम थोड़ी गहराई से सोचें, तो हमें ये समझना ही होगा कि दुनिया भर में इतनी सारी परंपराएँ हैं, दुनिया की अलग-अलग जगहों पर। इन धर्मों की मान्यताओं को देखें, जो अच्छी बातें सिखाते हैं। तो ये सब एक साथ सच नहीं हो सकतीं। कई ईश्वर भी हों और एक ही ईश्वर भी ये दोनों एक साथ सच नहीं हो सकते। एक ऐसा ख़ुदा, जो सृष्टि से बाहर है और हमेशा से है, और दूसरा वो, जो सृष्टि के भीतर भी है और बाहर भी, ये दोनों साथ नहीं चल सकते। देखिए, मैं यहाँ आपकी आस्था को चुनौती देने नहीं आया। मैं यहाँ आपको सोचने पर मजबूर करने आया हूँ, और इस समझ तक लाने, कि कोई एक सार्वभौमिक सच ज़रूर होगा। और अपनी समझ से मैं आपसे कहता हूँ कि मेरा मानना है, इस्लाम सच है। कि इस्लाम उस एक सच्चे ख़ुदा को मानना है, जो हमेशा से है, जिसके न माता-पिता हैं, न कोई औलाद, जो किसी पर निर्भर नहीं, जो सृष्टि के भीतर सीमित नहीं है, बल्कि उससे बाहर है, और वही सहारा है, जो हमारी हर कल्पना से परे है, जो इंसान नहीं, यही सच्चा धर्म है। कुरआन पढ़िए, देखिए कि उसमें क्या लिखा है, इस्लाम की बुनियादी बातें देखिए, किसी मुसलमान से बात कीजिए। और मानिए कि ये सच है फिर ख़ुदा आपको सच तक पहुँचा देगा। क्या आपने भी नया-नया इस्लाम कुबूल किया है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें?
या शायद आप पैदाइशी मुसलमान तो हैं, पर अब बिल्कुल नए शिरे से इस्लाम सीखना चाहते हैं। ठीक इसीलिए हमने बनाया है ये 'स्टेप इस्लाम' ऐप। यह एकदम फ्री और बिना ऐड वाला ऐप है, जो आसान और सिलसिलेवार तरीक़े से आपको इस्लाम सिखाता है। इसमें आप आसानी से ईमान की बुनियादी बातें और कुरआन की जरूरी टोन सीखेंगे। और अपने हिसाब से प्रैक्टिकल टास्क करके ऐसी आदतें अपनायेंगे जो आपके ज़िंदगीभर कम आयेंगी। शैतान के बहकावे में आकर इसे मत टाले। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें, 'स्टेप इस्लाम' डाउनलोड करें, और हमेशा की खुशियों की तरफ़ आज ही पहला कदम बढ़ाएँ।
इसके बारे में सोचकर ही मैं भावुक हो जाता हूँ। अस्सलामु अलैकुम, भाई सलाहुद्दीन पटेल, हमारे साथ जुड़ने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। हम आपको अपने पास पाकर खुश हैं। मैं शुरुआत इससे करता हूँ कि सलाहुद्दीन पटेल कौन हैं? क्या आप संक्षेप में अपनी ज़िंदगी के बारे में बता सकते हैं?
अलहम्दुलिल्लाह। अस्सलामु अलैकुम, मेरा नाम सलाहुद्दीन पटेल है, और मैं लंदन, यूके से हूँ। मैं लंदन में ही पला-बढ़ा। मैं असल में एक हिंदू परिवार से हूँ। मेरे माता-पिता मूल रूप से भारत से हैं, और मेरी माँ युगांडा में पली-बढ़ीं। मैं अस्सी के दशक में बड़ा हुआ। बहुत दिलचस्प दौर था। फिर धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि कुछ बातें ग़ैर तार्किक हैं, और यूनिवर्सिटी के दिनों में ही मैंने इस्लाम अपना लिया। आस्था के मामले में आपकी ज़िंदगी कैसी थी? आप किसमें आस्था रखते थे?
मैं एक हिंदू परिवार में पला-बढ़ा, और ज़्यादातर लोगों की तरह आप अपने परिवार की परंपरा निभाते हैं, सवाल नहीं उठाते। आप उसे सच मान लेते हैं। मेरे पिता हम सबको मंदिर ले जाते थे। ये मूर्तियाँ बहुत विशाल होती हैं। कोई दस-बारह फ़ुट ऊँची, तो आपको ऊपर देखना पड़ता है। बहुत रंग-बिरंगी, चटख़ छवियाँ। सोचिए, एक बच्चे के लिए सच कहूँ तो मुझे बहुत डर लगता था। आप इन मूर्तियों को देखते हैं, बहुत चमकीली होती हैं। बहुत सी नीली होती थीं, और लोग मानते थे कि ये मूर्ति साक्षात रूप ले सकती है। ईश्वर तक पहुँचने के लिए इन्हीं मूर्तियों का सहारा लेना पड़ता है। आप इस पर सवाल नहीं उठाते। बस यही कहते कि ये हमारे पुरखों की, हमारे बुज़ुर्गों की रीत है। किस बात से आपने अपनी आस्था पर सवाल उठाने शुरू किए?
शायद मैं हाई स्कूल में था, टीवी पर महाभारत देख रहा था। तभी मन में इन बातों को लेकर सवाल उठने लगे। ये बातें तर्क में बैठती ही नहीं थीं। क्योंकि तर्क से, बुद्धि से देखें तो कुछ चीज़ें मेल ही नहीं खातीं। जैसे कोई भगवान इंसान हो, जिसकी अपनी सीमाएँ हों। कोई भगवान, जो सब कुछ न जानता हो। कोई भगवान, जिसे प्रकट होने के लिए दूसरे भगवान की मदद चाहिए। ये विचार कि ईश्वर को दुनिया में आना पड़े, कि ईश्वर दुनिया के भीतर भी हो और बाहर भी। एक दिन मैं घर पर था, अपने भाई के साथ, तभी मेरे माता-पिता आए और बोले "देखो, हम एक महात्मा के दर्शन करने जा रहे हैं।" पर मुझे सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब मैं उस घर पहुँचा एक आम सा घर था, और वहाँ हर तरफ़ तस्वीरें लगी थीं एक छोटी लड़की की सफ़ेद कपड़ों में, बैठी हुई। सोचिए, एक लड़की की इतनी बड़ी-बड़ी तस्वीरें,बैठी हुईं। पूरे घर में। फिर हमें घर के अंदर एक ख़ास कमरे में ले जाया गया, जहाँ वो बैठी थी। मुझे याद है, वो मुझसे कह रहे थे कि ये तुम्हारी भगवान हैं। वो रही होगी कोई आठ-नौ साल की। मुझसे भी छोटी थी। उस छोटी लड़की के बारे में वो बोले "देखो, हमें इनसे आशीर्वाद लेना है, इनकी पूजा करनी है।" और मेरे माता-पिता इसे बहुत गंभीरता से ले रहे थे। पर मैं तो सोच रहा था ये आख़िर हो क्या रहा है?
मैं इस छोटी लड़की की पूजा क्यों कर रहा हूँ?
पर आप सवाल नहीं उठाते, क्योंकि ये आपके माता-पिता हैं। वो जो कहते हैं, आप मान लेते हैं, और उसे सच समझते हैं। एक छोटी लड़की, जो मुझसे भी छोटी है, मेरी ही तरह एक इंसान है, और मुझसे कहा जा रहा है कि यही तुम्हारी रचयिता हैं, हमें इनसे आशीर्वाद माँगना है, इनकी पूजा करनी है, इनके आगे माथा टेकना है। और मैं सोच रहा था ये तो ग़लत है। एक और मिसाल शायद कुछ लोग जानते हों, साईं बाबा नाम के एक शख़्स। वो एक भारतीय गुरु थे, जो बहुत मशहूर हो गए भारत में करोड़ों लोग उन्हें मानते थे। हमारे घर में उनकी तस्वीर हुआ करती थी। धार्मिक पोशाक में उनकी एक तस्वीर, गले में फूलों की माला पहने हुए, वो तस्वीर हमारे घर में थी, उनकी मूर्ति भी, और उनकी तस्वीर भी। मेरे माता-पिता उनकी पूजा करते थे। वो एक काम ये करते थे जब उनके भक्त सामने होते, तो वो उँगलियाँ यूँ मलते, और जादुई ढंग से उनके हाथों से अपने आप राख निकलने लगती। और लोग समझते कि ये आशीर्वाद है। एक और काम ये था कि वो मुँह से सोने के अंडे निकालते थे। सोचिए, सामने एक धातु की थाली रखी है, फिर वो कुछ मंत्र जैसा उच्चारण करते, और सामने बैठे लोग देखते रहते, फिर वो उबकाई का नाटक करते, और अचानक एक सोने का अंडा निकल आता। अब राख वाली बात वो राख की छोटी-छोटी गोलियाँ उँगलियों में छुपाकर रखते थे। फिर यूँ करते, और उन्हें मसल देते। वो अंडे वाला खेल भी पता नहीं आस्तीन में छुपा होता था या यहाँ कहीं, पर जब वो उबकाई का नाटक करते, तो लगता जैसे मुँह से निकल रहा हो, ये सब हाथ की सफ़ाई थी। तो हिंदू धर्म में आपको ऐसा देखने को मिलता है। बहुत सी ऐसी बातें, जहाँ लोग इस तरह के करतबों से जनता को बहकाते हैं। मुझे बस यही समझ आया कि ये सब बातें तर्क में नहीं बैठतीं, पर कुछ न कुछ तो ज़रूर है। तो मेरी अपनी पूजा जब मैं ईश्वर को पुकारने की बात करता हूँ, तो वो हमेशा मेरा अपनी ज़ुबान में, अंग्रेज़ी में ईश्वर से बात करना होता था। मैं बस ईश्वर से कहता मुझे इसमें मदद चाहिए, या मुझे इस बात के लिए माफ़ कर दीजिए। मेरा मानना है कि ये हमारे भीतर जन्म से ही होता है, हम सबके अंदर। और मैं बस उसी से जुड़ रहा था। इस्लाम की तरफ़ आपका सफ़र कैसे शुरू हुआ?
मुसलमान बनने से पहले भी मैं अपने दोस्तों के साथ जुमे की नमाज़ के लिए मस्जिद जाता था। मुझे याद है, मस्जिद में जाकर लोगों की बहुत सी कतारें देखता और मुझे ये तरीक़ा हिंदू धर्म से बिल्कुल अलग लगा, ख़ासकर जब आप सजदे में जाते हैं अपने हाथ ज़मीन पर रखते हैं, चेहरा ज़मीन पर होता है, और ये पूरी तरह समर्पण की निशानी है। ऐसा मैंने ज़िंदगी में पहले कभी नहीं किया था। क्योंकि मैं चर्च भी गया था, मंदिर भी गया था, बौद्ध मंदिर भी देखे थे, और वहाँ हमेशा कोई न कोई तस्वीर या मूर्ति दिखती थी, और यहाँ मस्जिद में आइए कुछ भी नहीं दिखता। सब कुछ बहुत सादा है, सामने मिंबर होता है, जहाँ इमाम साहब खड़े होते हैं। बहुत साफ़-सुथरा, सीधा-साधा, और वहाँ आप ख़ुदा की इबादत करते हैं। तो हाँ, कोई मूर्ति न देखना अजीब लगा, पर साथ ही ये उसी बात का प्रमाण था, जो मैं मानता था। एक सुकून था, कोई पैसे नहीं माँग रहा था। कोई नहीं कह रहा था कि इन देवताओं को कुछ चढ़ाना पड़ेगा, इबादत क़बूल होने के लिए कोई प्रसाद चढ़ाने की ज़रूरत नहीं। यही बात सबसे ख़ूबसूरत थी। फिर मैंने इस धर्म को समझना शुरू किया। पहले मुझे लगता था कि ये पाकिस्तानियों का धर्म है। फिर मैंने अलग-अलग जगहों के लोग देखे। अरब, अफ़्रीकी, पूर्वी एशियाई, तुर्क लोग। बचपन में मेरे तुर्क दोस्त भी थे। याद है, मुसलमान बहुत मिलनसार थे, बहुत दरियादिल, बहुत साफ़-सुथरे, मुझे उनसे एक अपनापन महसूस हुआ। और तब समझ आता है ये तो ऐसा ही होना चाहिए। इस्लाम में एक ही ख़ुदा की बात है पूरी तरह एक, जो सृष्टि का हिस्सा नहीं, जो हमेशा से है। और हिंदू धर्म में अनगिनत भगवान हैं। ईश्वर का दुनिया में अवतार लेना ये इस्लाम के बिल्कुल उलट है। फिर ईसाइयत है, जिसमें ट्रिनिटी का विचार है, जिसे वो एकेश्वरवाद कहते हैं पर ये मैं पहले भी देख चुका था। जैसा मैंने कहा, हिंदू धर्म में त्रिमूर्ति है उनकी अपनी ट्रिनिटी। और वही बात कहते हैं कि ये सब एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं। और हैरानी की बात ये कि जब मैंने प्राचीन यूनानी कथाएँ देखीं, फ़ारसी, बेबीलोनी सबमें यही ट्रिनिटी का विचार मिला। जैसे कोई चीज़ सदियों से घूम-फिरकर दोहराई जा रही हो। तो मुझे लगा, लोग चाहे जो भी मानने का दावा करें, कोई एक सार्वभौमिक सच तो होगा। फिर मेरे सामने इस्लाम की बुनियादी बातें आईं, और मैं दंग रह गया। ये समझ कि एक ख़ुदा है जो यकता है, जो सृष्टि का हिस्सा नहीं एक सर्वशक्तिमान हस्ती। मेरे सामने ज़िंदगी में पहली बार ऐसा धर्म आया, जो उसी बात से मेल खाता था, जिसे मैं सच मानता आया था। और फिर मैं कुरआन तक पहुँचा, और सूरह अल-इख़लास यानी शुद्धता तक। जब मैंने वो चार आयतें पढ़ीं, तो मेरे मन में जैसे एक रौशनी जल उठी। लिखा था, "कह दीजिए, वो ख़ुदा है, एक है।" मैंने कहा हाँ, मैं एक ही ख़ुदा को मानता हूँ। "हमेशा से है, पूर्ण है, किसी पर निर्भर नहीं।" ज़ाहिर है, अगर ख़ुदा है, तो ऐसा ही होगा वो कोई बनाई हुई हस्ती नहीं हो सकती, स्वाधीन। "न उसकी कोई संतान है, न वो किसी की संतान।" यानी न उसके माता-पिता हैं, न कोई औलाद। और मैं उस परंपरा से आता हूँ, जहाँ भगवान हैं, देवता हैं, भगवानों के बेटे, भगवानों की बेटियाँ जिन्हें मैं ठुकरा चुका था। यहाँ ख़ुदा रचयिता है न उसके माता-पिता, न कोई औलाद। हाँ। पर आख़िरी बात "और कोई उसके जैसा नहीं।" यानी ख़ुदा के बारे में आप जो कुछ भी सोच सकते हैं, वो ख़ुदा नहीं, क्योंकि ख़ुदा सृष्टि से बाहर है, सृष्टि के भीतर नहीं। हमारी सारी कल्पनाएँ तो उसी से बनी हैं, जो हमने अपने आस-पास देखा है। और मैं बस हक्का-बक्का रह गया। और वहीं से शुरुआत हुई कि ये तो पूरी तरह तर्क में बैठता है। फिर मैंने धर्मशास्त्र की किताबें पढ़नी शुरू कीं, पूरा कुरआन पढ़ा। और दिलचस्प बात ये कि ये सब साथ-साथ चल रहा था मैं क़रीब आता जा रहा था, वो मुझे इस्लाम के बारे में और भी अधिक बताते जा रहे थे, मैं उनका अमल देख रहा था, कि वो इबादत कैसे करते हैं, देखता कि वो एक साथ, एक ही सफ़ में खड़े होकर ख़ुदा की इबादत करते हैं यहाँ तक कि ग्रेजुएशन के वक़्त मुझे एक फ़ैसला लेना ही था कि अब मैं क्या करूँ। एक मोड़ पर आकर मुझे लगा नहीं, अगर मैंने ये नहीं किया, तो मेरी पूरी ज़िंदगी एक झूठ होगी। और ये मुझसे नहीं होगा। मुझे ये फ़ैसला लेना ही है। तो मैंने फ़ैसला किया, और दोस्तों को बताया, और जब मैंने बताया, तो वो दंग रह गए। मुझे कुछ अंदाज़ा नहीं था कि इसमें क्या-क्या शामिल है न अमल का, न बुनियादी अक़ीदे का। बस इतना जानता था कि ये सच है। मुझे ये क़दम उठाना ही है। यही ख़ुदा है, यही ख़ुदा का दीन है, यही सच है, यही रास्ता है। कलमा पढ़ते वक़्त आपको कैसा महसूस हुआ?
क्या आप हमें उस दिन में ले चल सकते हैं? वो दिन याद करता हूँ, तो याद आता है कि मैं बहुत घबराया हुआ था। और याद है, मैंने कलमा पढ़ा, और बहुत से लोग यही कहते हैं जैसे कंधों से कोई भारी बोझ उतर गया हो। आप हल्का महसूस करते हैं। मैंने कलमा पढ़ा, और सारे दोस्तों ने मुझे गले लगा लिया बहुत भावुक लम्हा था। आप ख़ुद को पाक महसूस करते हैं, हल्का, जुड़ा हुआ, और एक सुकून में। और आपके इस्लाम अपनाने पर माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया थी?
जब मैंने इस्लाम अपनाया, तो ज़ाहिर है, ये बात मुझे पहले से सोचनी पड़ी थी, पर फिर मुझे लगा कि मैं मिथ्या में नहीं जी सकता। तो अगली बात ये समझ आई कि अब माता-पिता को बताना ही होगा। जब बताया, तो वो ख़ुश नहीं हुए। उन्हें बहुत निराशा हुई। मेरी माँ तो बहुत ग़ुस्से में थीं, और मेरे पिता उनकी समझ में ये बात आई ही नहीं। क्योंकि अब आपको परिवार पर एक कलंक समझा जाने लगता है। और फिर बात फैलती है ख़ासकर हिंदू समाज जैसे छोटे समुदाय में। तो ज़ाहिर है, इसका असर मेरे माता-पिता पर भी पड़ा। पर, आप अपने बच्चे को दुश्मन यानी मुसलमान कैसे बनने दे सकते हैं?
तो मैं बस अपने रास्ते पर चलता रहा, और मुझे समझ आया कि कई सालों तक कलमा पढ़ लेने के बाद भी, और अच्छा महसूस करने के बाद भी, ये जानने के बाद भी कि यही सच है कुछ अब भी अधूरा था। मैं पाँचों वक़्त की नमाज़ नहीं पढ़ता था। और फिर...
अल्लाह ने मुझे एक निशानी भेजी। वो कमाल था। इसके बारे में सोचकर ही मैं भावुक हो जाता हूँ। क्योंकि नए मुसलमान के तौर पर आप अकेले होते हैं। माफ़ कीजिए, मैं रोना नहीं चाहता। तो उन्हीं दिनों 2008-2009 के आस-पास मैंने और वीडियो देखने शुरू किए, और ज़्यादा जानने लगा, तभी अल्लाह ने ये कमाल की निशानी भेजी। मेरी बहन मुझसे दस साल छोटी है। वो पक्की हिंदू थी। फिर एक दिन उसने मुझसे कहा, मेरी सहेलियों ने मुझे एक प्रोग्राम में बुलाया है। ये इस्लाम के बारे में है। तो मैंने कहा, चलो, देख आते हैं। उनका तरीक़ा ये था कि शुक्रवार को एक मुफ़्त झलक दिखाते हैं, और पूरा प्रोग्राम वीकेंड पर चलता है शनिवार, रविवार। आम तौर पर किसी बड़े होटल में। वहाँ पहुँचकर मैं दंग रह गया। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। और मुझे याद है, वो शेख़ साहब वो सामने ही आयतें पढ़ रहे थे। और मैं कहूँगा कि मेरी रगों में जैसे सिहरन दौड़ गई। मैंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं सुना था। और मैंने सोचा देखो...
असल धर्म तो यही है। तो शुक्रवार बीता, और मैंने सोचा वाह, ये तो बहुत ख़ूबसूरत है। सैकड़ों लोग कमाल का माहौल था। मैं ऐसे किसी कोर्स में पहले कभी नहीं गया था, तो ज़ाहिर है, मैंने नाम नहीं लिखवाया था, पर उसने लिखवा लिया था। तो मैंने बहन से कहा "देखो," और मुझे पूरा भरोसा था, मैंने कहा, "कोई सवाल हो, तो शेख़ साहब से पूछ लेना, हाँ, अगर कुछ हो तो फ़िक्र मत करो, सब ठीक रहेगा, तुम्हारी सहेली तो साथ होगी ही।" क्योंकि उसकी सोमाली सहेली वहाँ वॉलंटियर थी। उसी ने उसे कोर्स में बुलाया था। वो शनिवार का दिन मुझे साफ़-साफ़ याद है। मैं अपने दोस्तों के साथ वही रोज़ वाले काम कर रहा था, आवारागर्दी जैसा लोग शनिवार को करते हैं। और शाम को मेरी बहन ने मुझे मैसेज भेजा, उसने लिखा "बस बताना चाहती थी कि मैं प्रोग्राम में सवाल पूछ रही थी, और मैंने फ़ैसला कर लिया मैंने कलमा पढ़ लिया।" अप्रत्याशित रूप से!
वो शेख़ साहब...
जैसा मैंने कहा, वो ये क़िस्सा सुनाते हैं। उन्होंने बताया कि वो शुक्रवार को आए और मैं बाद में उनसे मिला भी। उन्होंने सामने इतने सारे लोग देखे आगे पुरुष, पीछे महिलाएं और वो बोलने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनकी नज़र महिलाओं वाले हिस्से पर पड़ी, जहाँ एक बहन बिना हिजाब के बैठी थी। फिर सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ। उनकी नज़र उसी बहन पर गई, जिसने सिर नहीं ढका था, और वो सवाल पूछने लगी। उन्हें साफ़ समझ आ गया कि ये एक ग़ैर-मुस्लिम बहन है। तो वो दावत के अंदाज़ में आ गए, क्योंकि वो दाई हैं। और उन्होंने उससे सवाल पूछने शुरू किए। और हुआ ये कि क्योंकि वो बड़े सलीक़े से बात करते हैं बात यहाँ तक पहुँची कि उन्होंने मेरी बहन से कहा "अगर ये सब आपको समझ आ रहा है और कोई सवाल बाक़ी नहीं, तो आप इस्लाम अपनाने के बारे में क्यों नहीं सोचतीं?" कुछ इसी तरह। और उसने कहा कि उसके पास कोई जवाब नहीं था। तो उन सारी बहनों के सामने उसने कलमा पढ़ लिया। और जिस बात ने मुझे और भी हैरान किया। याद रखिए, वो टीचर है, ट्रेनिंग पर थी। इस्लाम अपनाते ही उसने पूरा हिजाब और अबाया पहन लिया। मुझे याद है, उसने बताया कि वो स्कूल गई, और सारे बच्चे उससे पूछने लगे, "मिस, मिस, आपको क्या हुआ?" क्योंकि वो बिल्कुल बदल गई थी...
"क्या किसी ने आपको ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया?" उसने कहा "नहीं, नहीं, मैंने ख़ुद मुसलमान बनने का फ़ैसला किया।" और ज़ाहिर है, वहाँ मुसलमान भी थे, और उसकी साथी टीचर इतनी ख़ुश भी थी, और इतनी हैरान भी। और मेरे लिए तो यही जवाब था। मैंने अल्लाह से माँगा था, और वो जवाब मेरी बहन थी। और वो चट्टान की तरह डटी रही। जैसा मैंने कहा, वही थी जैसा मैंने कहा, बहनें भाइयों से बेहतर होती हैं, उसने फ़ौरन अमल शुरू कर दिया, दीन को अपना लिया। तो ज़ाहिर है, इससे मुझे भी मदद मिली। और वो मुझसे कहती है कि जब मैंने कलमा पढ़ा और मुसलमान हुआ, तो उस पर बहुत गहरा असर पड़ा था। मुझे अंदाज़ा ही नहीं था, वो तो पहले से ही इस पर सोच रही थी। और हिदायत देने वाला तो अल्लाह ही है। उस दिसंबर में मेरी बहन मेरे पास आई, क्योंकि छुट्टियाँ थीं, और बोली "मुझे एक प्रोग्राम में बुलाया गया है। ये नए मुसलमानों के लिए है, जहाँ बुनियादी बातें सिखाते हैं। क्या ख़याल है, चलें?" "क्यों नहीं, चलो देख आते हैं, वैसे भी कोई काम तो है नहीं, इसमें हमारा जाता ही क्या है।" और हम उस नए मुसलमानों के प्रोग्राम में गए, वहाँ मैं और भी नए मुसलमानों से मिला, जो उसी सफ़र से गुज़र रहे थे, एक भाई से जो पहले सिख थे, एक भाई जो पहले ईसाई थे, और कुछ भाई जो चीनी, बौद्ध पृष्ठभूमि से थे। जैसे अल्लाह ने मुझे राह दिखाई हो और ज़ाहिर है, उससे बेहतर योजना कोई नहीं बनाता। और उस वक़्त मुझे ठीक इसी की ज़रूरत थी, और फिर मैंने आयरा [IERA] के साथ इस काम में हिस्सा लेना शुरू किया। अगर आपको किसी एक के लिए दुआ माँगने का मौक़ा मिले, और वो क़बूल भी हो जाए, तो आप किसके लिए और क्या माँगेंगे?
मैं बिना किसी शक के कहूँगा, और शायद हर नया मुसलमान यही जवाब देगा। और वो जवाब है अपने माता-पिता। नए मुसलमानों के लिए यही सबसे मुश्किल बात है... ये सोचना कि जिन माता-पिता ने आपको पाला-पोसा, उन्हें हिदायत नहीं मिली। तो... नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कौन सी बात ने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, लोग भूल जाते हैं कि वो ऐसे समाज में पले-बढ़े, जो मूर्तियों से भरा हुआ था। काबे में 360 मूर्तियाँ थीं। और वो उसे पाक करने आए। जिस पैग़ाम के लिए उन्हें चुना गया था, एक ख़ुदा की ख़ालिस बंदगी, उस समाज में, जो कई देवताओं को मानने लगा था जबकि पहले वो एक ही ख़ुदा को मानता था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो किया, उससे मेरा गहरा रिश्ता है। उन्होंने उस पूरे इलाक़े को पाक किया, मूर्तिपूजा हटाई और मुझे ये बात बहुत भाती है, क्योंकि मैं इस क़िस्से को अपने से जोड़ पाता हूँ। तो हिंदू धर्म की बुनियादी मान्यता क्या है?
हाँ, तो हिंदू धर्म की बुनियादी मान्यताएँ अलग हैं। ये बहुदेववादी धर्म है। मतलब ये कि वो कई देवताओं को मानते हैं। फिर आपको समझ आने लगता है कि कुछ बातें उलझा देती हैं। क्योंकि आख़िर मैं किस भगवान की पूजा करूँ?
और अगर इतने सारे भगवान हैं, तो वो आपस में तालमेल कैसे बिठाते हैं, सब कुछ कैसे चलता है। जीवन और मृत्यु की बात करें, तो हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है। यानी आप दुनिया में लौटकर आते हैं, और आपका जन्म इस बात पर तय होता है कि आपने पिछली ज़िंदगी किस तरह जी। अगर आपने अच्छे कर्म किए, तो ऊँची योनि में जन्म मिलेगा। मान लीजिए आप एक चूहे हैं, और आप अच्छे चूहे रहे, तो शायद अगला जन्म भालू का मिल जाए। और इसी तरह इंसान भी अगर आपने बुरी ज़िंदगी जी, अपराध किए, दूसरों के साथ बुरा किया, तो अगला जन्म नीची योनि में मिलेगा। जैसे कोई तिलचट्टा, मिसाल के तौर पर सोचकर देखें, तो ज़्यादा लुभावना नहीं लगता। तो हिंदू धर्म में जीवन-मरण का यही पूरा चक्र है। और ये बात इंसानों पर भी लागू होती है। जैसे, अगर आप किसी ऐसे इंसान को देखें, जो जन्म से ही दिव्यांग है, जिसमें कोई कमी या शारीरिक विकार है, तो अफ़सोस कि लोग उसके साथ बुरा बरताव करते हैं। क्योंकि उनकी धार्मिक समझ ये है कि ये इंसान अपने पिछले जन्म में बुरा रहा होगा। और इससे ज़ुल्म पैदा होता है, नाइंसाफ़ी उसे समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता, वो हाशिये पर धकेल दिया जाता है, और हम जानते हैं कि ये सच नहीं है, क्योंकि ये लोग तो बेक़सूर हैं, इनके सामने पहले से ही एक चुनौती खड़ी है। और जैसा मैंने कहा, जाति व्यवस्था में एक वर्ग होता है, जिसे अछूत कहते हैं, और उन्हें सचमुच इस तरह अलग-थलग कर दिया जाता है कि समाज उनसे मेल-जोल नहीं रखता, उन्हें वो हक़ नहीं मिलते, और सोचिए, आपका जन्म ही इसमें हुआ हो, आप कभी इससे निकल ही नहीं सकते। और एक बात और अवतारवाद का विचार, जो कि, यानी जब आप इन मूर्तियों को देखते हैं, तो सबसे बड़ी बात ये है कि वो शक्ल-सूरत से इंसान जैसी हैं। और ये विचार ये कहता है कि ईश्वर किसी इंसान या किसी जानवर के रूप में धरती पर अवतार लेता है ताकि कोई न्याय कर सके। इसकी एक मिसाल है गणेश। वो ऐसे भगवान हैं, जिनका शरीर इंसान का है, पर सिर हाथी का। और इसके पीछे एक कथा है। कथा ये है कि एक दिन दो भगवानों ने आपस में विवाह किया, और उनमें से एक यानी पिता को कुछ समय के लिए एकांतवास में जाना पड़ा। और उन्हें पता ही नहीं था कि उनकी पत्नी गर्भवती हैं। तो कई साल बाद क़रीब एक दशक बाद वो घर लौटे, और घर में घुसने लगे, पर उनका बेटा, जिसे वो जानते ही नहीं थे, पहरा दे रहा था, और उसने भी इन्हें नहीं पहचाना, जो उसके पिता थे, और घर में घुसने की कोशिश कर रहे थे। तो ज़ाहिर है, झड़प हुई, और फिर हुआ ये कि उस भगवान ने उस बालक का सिर काट दिया। फिर हुआ ये कि माँ बाहर दौड़ी आईं "ये क्या कर दिया, ये तो हमारा बेटा है।" तो उस भगवान ने अपने बेटे को बचाने के लिए सबसे पास जो जानवर मिला और वो इत्तिफ़ाक़ से हाथी था उसका सिर लगाकर अपने बेटे को जिला दिया। तो मेरे लिए यही एक बड़ी दिक्कत थी। और जैसे 'अवतार' फ़िल्म में जेक होता है वो एक सूट पहन लेता है और फिर वो वो नीले अवतारों से बात करने लगता है लगभग वैसे ही, जैसे ईश्वर इंसानी रूप में, अवतार बनकर धरती पर उतरता है, ताकि न्याय कर सके। तो बड़े होते-होते मैं इन्हीं विचारों से जूझने लगा। तो हिंदू धर्म की बुनियाद बनाने वाले ये सारे विचार, मेरे लिए, वक़्त के साथ तार्किक लगने बंद हो गए, मन को जँचे ही नहीं। जैसे कई भगवानों का विचार तो फिर मुखिया कौन है, मुख्य भगवान कौन है?
कोई एक भगवान दूसरे से ज़्यादा शक्तिशाली या ज्ञानी किस वजह से है? दूसरी बात ईश्वर का मानव रूप और अवतार, यानी ईश्वर का इंसान होना। और ये विचार भी कि ईश्वर सृष्टि के भीतर ही है। फिर जब मैंने इस पर सोचना शुरू किया, तो लगा जैसे कोई बढ़ई फ़र्नीचर बनाता है, कोई मेज़ वो उसका डिज़ाइनर है, वो उसे बनाता है, जोड़ता है पर वो कभी मेज़ नहीं बन सकता। क्योंकि बढ़ई की जो प्रकृति है, वो मेज़ या कुर्सी की प्रकृति से अलग है। तो वो कभी फ़र्नीचर का हिस्सा नहीं बन सकता। और इसी तरह जब आप ख़ुदा को देखें ख़ुदा रचयिता है, जो सृष्टि से बाहर है, उसने सब कुछ बनाया, पर वो सृष्टि का हिस्सा नहीं बनता। हिंदू ग्रंथों और कुरआन की तुलना करें, तो आपको फ़र्क़ कहाँ दिखता है?
पहली बात, कुरआन की जो बात है, उसमे जो पैग़ाम है, वो बहुत स्पष्ट है। पैग़ाम बहुत सीधा और बहुत साफ़ है। और वो ये कि एक ही ख़ुदा है, जो सृष्टि का हिस्सा नहीं, और वही सबका रचयिता है, सबका पालनहार। उसने पूरे इतिहास में इंसानों से बात की है पैग़ंबरों और वही के ज़रिए। ताकि हमें राह दिखाए, सच दिखाए, कि ये ज़िंदगी एक इम्तिहान है, कि हम अपने रचयिता से फिर जुड़ें, जिसके पास हमें लौटना है, और एक अच्छी ज़िंदगी जिएँ। क्योंकि जैसे कोई मोबाइल फ़ोन बनाता है, तो उसे सही तरीक़े से इस्तेमाल करने के लिए आपको एक गाइड चाहिए होती है। उसी तरह इंसानों को भी एक मार्गदर्शिका चाहिए, जो हमारे रचयिता की तरफ़ से आए, ताकि हम समझ सकें। तो कुरआन को मैं ऐसे ही देखता हूँ, वो सुसंगत है, साफ़ है, पूरी तरह तर्क में बैठता है। पर उसके आगे, जब आप हिंदू ग्रंथों को देखते हैं। तो उनमें भी बहुत सी अच्छी शिक्षाएँ हैं, बहुत से अच्छे मूल्य हैं, पर कुरआन के बारे में हम जानते हैं कि वो एक तय दौर से आया, जो प्यारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर उतरा। और हम जानते हैं कि तेईस साल तक वही (प्रकाशना) उतरती रही, और हम जानते हैं कि वो सुरक्षित रहा। क्योंकि उसे सँभालकर रखने की परंपरा मुख्य रूप से लिखे हुए पन्नों में नहीं, बल्कि मौखिक परंपरा में है, जो आज तक चली आ रही है। हमारे पास लाखों लोग हैं, जिन्हें पूरा कुरआन ज़ुबानी याद है, और आप ये अपनी आँखों से देख सकते हैं। यानी वो सुरक्षित रहा, और ख़ुदा ने कुरआन में ख़ुद ये कहा है कि हम इसकी हिफ़ाज़त करेंगे, हम ही इसे बचाएँगे। वेदों और उपनिषदों के मामले में हमें ऐसा नहीं दिखता। पहली बात, मैं एक भी ऐसे इंसान को नहीं जानता, जिसे वो ग्रंथ ज़ुबानी याद हो। किसी और ग्रंथ की तो बात ही छोड़िए। ये एक चमत्कार है। ये निशानियाँ हैं। और जैसा आपने कहा, जब आप कुरआन की कुछ बातों को देखते हैं, जब आप गहराई में उतरते हैं जैसा हमज़ा जॉर्जिस कहते हैं, उसके कई परतों वाले, कई पहलुओं वाले मायने और निशानियाँ, और फिर हर चीज़ अपने आप में एक निशानी है। जब लोग कहते हैं कि मैं ख़ुदा को ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ तो अल्लाह ने हमारे चारों तरफ़ निशानियाँ बिखेर रखी हैं, बस देखने की देर है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जब आप इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाने निकलें, तो सबसे अच्छा काम यही है कि किसी को कुरआन की एक प्रति दे दें। अगर वो इंसान सच्चा है, तो वो समझ जाएगा कि ये ख़ुदा का कलाम है। क्या ये सच है कि वो गाय की पूजा करते हैं और माँस नहीं खाते, और ऐसा क्यों है?
हाँ, तो हिंदू धर्म में गाय को एक धार्मिक प्रतीक माना जाता है। और इसकी वजह ये है कि वो गाय को पवित्र मानते हैं, क्योंकि वो जीवन देती है, दूध देती है। वो गाय को नहीं खाते, क्योंकि वो पवित्र मानी जाती है, इसलिए गोमांस नहीं खाते। और वो गाय की और भी चीज़ें काम में लाते हैं, जैसे गोबर, जिसे वो घर लीपने में और जलाने के काम में भी लाते हैं। तो उन्हें गाय के कई सारे उपयोग दिखते हैं, और इसीलिए उसका दर्जा ऊँचा हो गया यहाँ तक कि उनकी धार्मिक मान्यता में वो गौमाता को मानते हैं, और आप समझ सकते हैं कि माँ का दर्जा तो बहुत ऊँचा माना जाता है। और कुछ अतिवादी सोच वाले तो ये मानते हैं कि गाय ईश्वर का ही एक रूप है। और ये आपको दिखता भी है। तो वो गायों के आगे धार्मिक रस्में करते हैं। और अगर आपने गाय के ख़िलाफ़ कुछ भी किया, तो वो उसे अपने और अपने समुदाय के ख़िलाफ़ एक भड़काने वाली बात मानते हैं। ज़्यादातर हिंदू शाकाहारी हैं। अगर आप हिंदू धर्म की सख़्त शिक्षाओं को देखें, तो उनमें से ज़्यादातर शाकाहारी होंगे। पर कुछ लोग मुर्ग़ा खा लेते हैं, बकरे का माँस खा लेते हैं, तो हाँ, मैं गोमांस न खाते हुए बड़ा हुआ। मेरी माँ हमें मुर्ग़ा दिला देती थीं, बकरे का माँस भी, पर एक वक़्त ऐसा आया, जब उन्होंने थोड़ा और धार्मिक होने का फ़ैसला किया, और तब से हमें कोई माँस खाने की इजाज़त नहीं थी। पर मुझे याद है, बचपन में मैं बग़ावत कर देता था हम चीज़बर्गर खाने चले जाते थे, और घर पर बताते नहीं थे...
मैं खा लेता था, हाँ भले ही वो हमारी परंपरा के ख़िलाफ़ था। घर पर तो मैं ऐसा कभी न करता, बहुत बुरा माना जाता, घर में गोमांस तो होता ही नहीं, पर जब आप पूरी बात देखें, तो ये तर्क में बैठता ही नहीं, क्योंकि आख़िर में गाय भी बाक़ी जानवरों जैसी एक जानवर है, यानी ख़ुदा की ही बनाई हुई। हाँ, ये सच है कि वो बहुत पोषण देती है, पर इसका मतलब ये नहीं कि वो किसी भी तरह पवित्र या दैवीय हो जाए। गंगा नदी को पवित्र माना जाता है इसका कोई मतलब है, या आप इस पर कुछ कहना चाहेंगे?
गंगा के बारे में वो कहते हैं कि ये भारत की एक पवित्र नदी है, जहाँ लोग आकर पुण्य पाने के लिए धार्मिक रस्में करते हैं। मुझे पता है, मेरे माता-पिता और घर के लोग गंगा की बात करते थे, वो वहाँ जाकर स्नान करते थे जैसे नदी में नहाकर आत्मा शुद्ध हो जाती है। और वो अपने मृतकों की अस्थियाँ भी वहीं ले जाते हैं। तो हिंदू धर्म में, जब किसी की मृत्यु होती है ज़ाहिर है, मैंने पुनर्जन्म का ज़िक्र किया पर जहाँ हम मुर्दों को दफ़नाते हैं, वहाँ वो दाह संस्कार करते हैं, यानी शरीर को जलाया जाता है। और शरीर को तब तक जलाते हैं, जब तक वो राख न बन जाए, फिर वो राख एक कलश में रखते हैं, और उसे गंगा नदी में प्रवाहित कर देते हैं क्योंकि वो मानते हैं कि इस तरह आप फिर से सृष्टि का हिस्सा बन जाते हैं। ये हिंदुओं के लिए रोज़ का काम है, या हफ़्ते का?
ज़्यादातर हिंदू अपने धर्म पर अमल करने के लिए जो करते हैं, वो ये है वो घर में ही पूजा की एक जगह रखते हैं, जिसे पूजा घर कहते हैं, जहाँ मूर्तियाँ सजी होती हैं, और रोज़ का ये नियम होता है कि देवताओं की पूजा की जाए शायद सुबह के वक़्त, कुछ भोग चढ़ाकर, ताकि भोजन पवित्र हो जाए। जैसे इस्लाम में हम इस तरह दुआ करते हैं, वैसे ही आपने हिंदुओं में ये चिह्न देखा होगा, जो सम्मान की निशानी है, और पूजा की भी, तो वो मूर्तियों के सामने हाथ जोड़ते हैं, कुछ माँगते हुए। तो हाँ, वो मानते हैं कि ये मूर्तियाँ ईश्वर का ही रूप या प्रतीक हैं, और कुछ लोग तो मानते हैं कि मूर्तियों में ख़ुद शक्ति है। और ये बात दिलचस्प है, क्योंकि इस्लाम में देखिए अल्लाह के नाम हैं, उसकी सिफ़तें हैं, पर ये सब एक ही ख़ुदा के नाम और सिफ़तें हैं। लगभग ऐसा लगता है कि उन्होंने इन्हीं सिफ़तों को लेकर हर एक के लिए अलग मूर्ति बना ली। अगर कोई कहे कि मुझे तो हिंदू धर्म में ही आध्यात्मिक सुकून मिलता है, तो मुझे दूसरे धर्म की क्या ज़रूरत आप उससे क्या कहेंगे?
मान लीजिए हम दोस्त हैं, मैं और आप, और आप सब जो देख रहे हैं। हम बहुत अच्छे दोस्त बन गए। और मान लीजिए मैं कोई बहुत बड़ा अरबपति हूँ। और मैं आपकी मदद करना चाहता हूँ। मैं आपको तोहफ़े में मान लीजिए एक करोड़ पाउंड देना चाहता हूँ। तो जब मैं आपको वो एक करोड़ पाउंड तोहफ़े में दूँ, तो आप क्या करेंगे?
बात ये है कि आप शुक्रिया कहेंगे। जब भी कोई आपको कुछ देता है। तो अपने वजूद की बात करें हमें जो नेमतें मिली हैं, देखने की ताक़त, बोलने की ताक़त, हर पल को जीने की ताक़त हमने ख़ुद को तो बनाया नहीं। हमने अपनी चमड़ी का रंग नहीं चुना, अपना लिंग नहीं चुना, ये सब हमें तोहफ़े में मिला है। और आध्यात्मिकता भी उसी का हिस्सा है। अब उसी मिसाल पर लौटें, मान लीजिए मैंने आपको वो एक करोड़ पाउंड दिए। पर आपने मेरा शुक्रिया करने के बजाय लियोनेल मेसी का शुक्रिया किया। हाँ, वो बहुत बड़े फ़ुटबॉलर हैं। हाँ, पर आपको वो एक करोड़ पाउंड देने से उनका कोई लेना-देना नहीं। और धर्म को मैं कुछ ऐसा ही देखता हूँ। कि ये इतने सारे धर्म हैं, इतने सारे आध्यात्मिक रास्ते हैं, हम सब इसी आध्यात्मिक ज़रूरत को पूरा करने की कोशिश में हैं, पर हम उसका रुख़ ग़लत तरफ़ मोड़ रहे हैं। जब हम जाँच-परख करते हैं और धार्मिक नज़रिए से चीज़ों को देखते हैं, तो समझ आता है कि कोई एक सार्वभौमिक सच ज़रूर होगा। और जब आप उस असली सच से जुड़ जाते हैं, यानी रचयिता से, उस एक सच्चे ख़ुदा से, तभी आपके अंदर का वो आध्यात्मिक ख़ालीपन सच में भरता है। अगर आपको दुनिया के सारे हिंदुओं से बात करने का मौक़ा मिले, तो चंद लम्हों में आप उनसे क्या कहेंगे?
हम सब इंसान हैं, और मेरी ही तरह आप भी अपने परिवार की परंपरा निभाते हैं, क्योंकि आप सवाल नहीं उठाते। पर अगर हम थोड़ी गहराई से सोचें, तो हमें ये समझना ही होगा कि दुनिया भर में इतनी सारी परंपराएँ हैं, दुनिया की अलग-अलग जगहों पर। इन धर्मों की मान्यताओं को देखें, जो अच्छी बातें सिखाते हैं। तो ये सब एक साथ सच नहीं हो सकतीं। कई ईश्वर भी हों और एक ही ईश्वर भी ये दोनों एक साथ सच नहीं हो सकते। एक ऐसा ख़ुदा, जो सृष्टि से बाहर है और हमेशा से है, और दूसरा वो, जो सृष्टि के भीतर भी है और बाहर भी, ये दोनों साथ नहीं चल सकते। देखिए, मैं यहाँ आपकी आस्था को चुनौती देने नहीं आया। मैं यहाँ आपको सोचने पर मजबूर करने आया हूँ, और इस समझ तक लाने, कि कोई एक सार्वभौमिक सच ज़रूर होगा। और अपनी समझ से मैं आपसे कहता हूँ कि मेरा मानना है, इस्लाम सच है। कि इस्लाम उस एक सच्चे ख़ुदा को मानना है, जो हमेशा से है, जिसके न माता-पिता हैं, न कोई औलाद, जो किसी पर निर्भर नहीं, जो सृष्टि के भीतर सीमित नहीं है, बल्कि उससे बाहर है, और वही सहारा है, जो हमारी हर कल्पना से परे है, जो इंसान नहीं, यही सच्चा धर्म है। कुरआन पढ़िए, देखिए कि उसमें क्या लिखा है, इस्लाम की बुनियादी बातें देखिए, किसी मुसलमान से बात कीजिए। और मानिए कि ये सच है फिर ख़ुदा आपको सच तक पहुँचा देगा। क्या आपने भी नया-नया इस्लाम कुबूल किया है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें?
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