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इस्लाम बनाम ईसाइयत – हर बड़ा सवाल, एक दमदार वीडियो में आखिरकार जवाब दिया गया!

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इस्लाम ईसा का धर्म है। और ईसाई धर्म ईसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में है। मुहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)की मुलाकात कभी मरियम (अलैहिस्सलाम) से नहीं हुई। वह तो उनसे 600 साल पहले आ चुकी थीं। तो फिर कैसे हो सकता है कि वो क़ुरआन में नाम से जिक्र होने वाली अकेली महिला है । सिर्फ उनका नाम ही नहीं लिया गया है, बल्कि उन्हें अब तक की सबसे नेक महिला बताया गया है। मेरे पास 300 बाइबल हैं, जो अलग-अलग समय, भाषाओं और versions की हैं, हर एक बाइबल अलग-अलग है। इस्लाम में माना जाता है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) फिर से आएंगे। इसलिए कि ना ही उन्हें मारा गया था और ना ही उन्हें सूली पर चढ़ाया गया था। ईसा ,उन पर सलामती हो, वो एक ईश्वर को मानने वाले थे, कभी शराब नहीं पी, कभी सूअर का मांस नहीं खाया, और खून नहीं पिया। आप जानते हैं, खून पीना, क्योंकि वह एक प्रेक्टीशींग मुस्लिम थे, एक पैगंबर। अगर आप ईसा (अलैहिस्सलाम) से प्यार करते हैं, तो उनकी ही राह पर चलें। इस्लाम ईसा का धर्म है। अस्सलामु अलैकुम, डॉक्टर सबील अहमद। आज यहाँ आने और हमारे साथ होने के लिए धन्यवाद। हमने ईसाई धर्म के बारे में कुछ सवाल तैयार किए हैं, और हम आपसे पूछना चाहते हैं। वालेकुम अस्सलाम वरहमतुल्लाही वबरकातुह। जी हाँ, पूछिए। पहले सवाल से शुरू करते हैं — लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती है, जब आप इस्लाम में मरियम (अलैहिस्सलाम) के हैसियत के बारे में बात करते हैं ?

और अगर मैं आपसे पूछूँ कि इस्लाम और ईसाई धर्म में क्या समानताएँ और फर्क हैं, तो आप क्या कहेंगे? जहाँ तक मरियम की बात है, उन पर सलामती हो। मैं एक शब्द में जवाब देना चाहूँगा। और वो शब्द है — MARY। ठीक है, M. A. R. Y. M का मतलब है — कुरआन में Mention किया गया है कि वो अकेली महिला हैं जिनका नाम क़ुरआन में आया है। एक बार मैं शिकागो से ह्यूस्टन की फ्लाइट में था। मैं खिड़की वाली सीट पर था, और मेरे बगल में दो महिलाएँ बैठी थीं, जो कैथोलिक बेग्राउंड से थीं। हमारे बीच प्लेन में इस्लाम और ईसाई धर्म को लेकर एक छोटा सा क्विज़ हुआ । यानि एक दावत क्विज़ प्लेन में ही। मैंने उनसे पूछा — मेरी प्यारी बहनों, बताइए, क़ुरआन में किस एकमात्र महिला का नाम लेकर ज़िक्र किया गया है?

उन्होंने कहा — हाँ, हमें जवाब पता है। वो हैं मरियम, ईसा (अलैहिस्सलाम) की मां। मैंने कहा — बहुत बढ़िया। फिर मैंने उनसे पूछा, ठीक है, बताइए क़ुरआन में उनका नाम कितनी बार आया है? उन्होंने कहा — हमें नहीं पता। मैंने कहा — 34 बार। फिर मैंने अगला सवाल पूछा — अच्छा, बताइए, आपकी बाइबल में उनका नाम कितनी बार आया है? उन्होंने कहा — हमें इसका जवाब नहीं पता। मैंने कहा — उनका नाम 18 बार आया है। तो अगर आप तुलना करें, तो क़ुरआन में 34 बार और बाइबल में 18 बार ज़िक्र हुआ है। तो मैंने उनसे कहा — मुसलमान मरयम (अलैहिस्सलाम) से आपसे ज़्यादा मोहब्बत करते हैं, है न?

वो ज़ोर से हँस पड़ीं। तो M का मतलब है — क़ुरआन में नाम से Mention है, और वो एकमात्र महिला हैं। M का मतलब ये भी है कि क़ुरआन की एक सूरह उन्हीं के नाम पर Mention है, सूरह नंबर 19। सही है?

तो ये हुआ M का मतलब — Mary। अब A की बात करें — A का मतलब है Allah की इबादत, अल्लाह के लिए समर्पण। अल्लाह ही उनकी ज़िंदगी का मरकज़ (केंद्र) था। उनकी हया, पाकदामनी, और अल्लाह के लिए उनका समर्पण। क़ुरआन में ये बातें कई बार कही गई हैं। R का मतलब है — Respect जो अल्लाह ने मरियम को दी, उन पर सलामती हो। क़ुरआन में एक सूरह है — सूरह नंबर 3, आयत नंबर 42, जिसमें एक फ़रिश्ता मरियम (अलैहिस्सलाम) के पास आता है और कहता है, ऐ मरियम, अल्लाह ने तुम्हें चुना है, तुम्हें पाक किया है, और सारी औरतों में से तुम्हें सबसे ऊपर रखा है। देखिए अल्लाह ने मरियम (अलैहिस्सलाम) को कितनी इज़्ज़त और सम्मान दिया है। तो मैं अपने ईसाई दोस्तों से कहता हूँ मोहम्मद, उन पर सलामती हो, कभी मरियम से मुलाक़ात नहीं की। क्योंकि वो तो उनसे 600 साल पहले आई थीं। तो फिर ये कैसे हो सकता है कि वो क़ुरआन में नाम से जिक्र होने वाली एकमात्र महिला हो । क़ुरआन में सिर्फ उनका नाम ही नहीं लिया गया, बल्कि उन्हें सारी औरतों में सबसे ज़्यादा नेक बताया गया है। ये दर्जा न तो मोहम्मद ,उन पर सलामती हो, की मां को मिला, न उनकी बीवी को, और न ही उनकी बेटी को, बल्कि ये दर्जा quote unquote एक "यहूदी महिला" को मिला, जिनसे मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) ने कभी मुलाकात भी नहीं की। मैं ईसाई दोस्तों से कहता हूँ — ये बात दिखाती है कि क़ुरआन, मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) के मन की बात नहीं है, बल्कि ये इंसानियत के बनाने वाले की तरफ़ से है। तो M, A, R और Y , सही?

अब बचा Y। Y का मतलब है वो Young और कुंवारी थीं जब उन्होंने ने ईसा को जन्म दिया, तो इस तरह से इस्लाम में मरियम(अलैहिस्सलाम) का जिक्र है। तो, ईसाई धर्म के बारे में क्या? इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच क्या समानताएँ और अंतर हैं?

जब अंतर की बात आती है, तो मैं कहूंगा कि सबसे बड़ा अंतर यह है कि मरियम का जिक्र क़ुरआन में बहुत इज्ज़त, सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ हुआ है। लेकिन बाइबल में, उन्हें बस एक आम औरत के तौर पर बताया गया है, एक आम माँ के रूप में। कुछ खास नहीं। बस इधर-उधर कुछ जगहों पर उनका जिक्र आता है, जहाँ उनका जिक्र ईसा (अलैहिस्सलाम) और उनके साथियों के साथ कुछ बातचीत में होता है, लेकिन वो अहमियत नहीं दी गई जो इस्लाम में क़ुरआन ने उन्हें दी है। लेकिन जो बात दोनों में समान है वो उनका कुँवारी होना है। वो जवान थीं, अविवाहित और कुंवारी थीं, जब अल्लाह ने मरियम को मुअजिज़ा के तौर पर ईसा (अलैहिस्सलाम) अता किए। तो बाइबल में पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)का जिक्र कैसा है?

मुस्लिम विद्वानों के अनुसार, उनका नाम Old Testament और New Testament में मिलता है। असल में खुद क़ुरआन में कहा गया है, सूरह नंबर 7, आयत नंबर 157 में, कि पैगंबर मोहम्मद, उन पर सलामती हो, का जिक्र उनकी किताबों में भी मिलता है। यानि यहूदी और ईसाई धर्म की किताबों में। हमें Old Testament में, बुक book of Deuteronomy में यह मिलता है, अध्याय 18, आयत 18 में, पैगंबर मूसा, उन पर सलामती हो, अपनी क़ौम से यह कहते नज़र आ रहे हैं कि एक नबी मूसा के बाद आयेगा। और वो नबी मूसा जैसे होगा। और वह नबी अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा, जो कुछ वह सुनेगा, वही कहेगा। तो मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि मूसा (अलैहिस्सलाम) के बाद जो पैगंबर आए, और जो मूसा (अलैहि सलाम) से बहुत मिलते-जुलते थे, वो थे मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)। यह पहला निशानी था। दूसरा, book of Isaiah के अध्याय 29, आयत 12 में जिक्र है, जिसमें एक फ़रिश्ता उस व्यक्ति के पास आता है, और कहता है: पढ़ो। और वो व्यक्ति कहता है: मैं नहीं पढ़ सकता। और यही हुआ था पैग़ंबर मोहम्मद के साथ, उन पर सलामती हो जब फ़रिश्ता जिबरील (अलैहिस्सलाम )आए और उन्होंने पैग़ंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा: पढ़ो। Songs of Solomon की किताब, अध्याय 5, आयत 16 में, मोहम्मद शब्द मौजूद है, है ना?

वैसे मोहम्मद शब्द इब्रानी भाषा में मौजूद है। तो यह Old Testament की बात है। जब बात new Testament की आती है तो मुस्लिम विद्वान कहते है कि इसमें कई कई भविष्यवाणीय मौज़ूद है यहूदी लोग भी एक नबी के आने का इंतज़ार कर रहे थे। जैसे कि मूसा (अलैहिस्सलाम) ने कहा था कि मेरे बाद एक नबी आने वाले हैं। जो मेरी तरह होंगे। तो ईसा मसीह के ज़माने में, ईसाई अब भी उस नबी का इंतज़ार कर रहे थे। इसलिए उन्होंने यह्या (यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले) से पूछा,"क्या आप वही नबी हो?" याह्या ने कहा, नहीं। तो फिर उस नबी के बारे में, ईसा (अलैहिस्सलाम) ने Gospel of John, अध्याय 16, आयत 7 में कहा है, मेरे शिष्यों, तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है कि मैं चला जाऊँ। अगर मैं नहीं जाऊँगा, तो 'सांत्वनादाता' (Comforter) नहीं आएगा।"। लेकिन अगर मैं चला जाऊँ, तो वह भेजा जाएगा। फिर ईसा (अलैहिस्सलाम) ने कहा, मेरे पास तुम्हें बताने के लिए बहुत सी बातें हैं, लेकिन इस समय तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते। लेकिन जब वह आएगा, तो वह तुम्हें पूरी सच्चाई बताएगा। वह अपनी तरफ़ से कुछ नहीं कहेगा, बल्कि जो सुनेगा, वही कहेगा।" यहाँ "वह" शब्द का इस्तेमाल हुआ है, "वो चीज़" या "यह" जैसा नहीं, जैसा holy spirit के लिए होता है। "वह" शब्द इस्तेमाल हुआ है, और ईसा (अलैहिस्सलाम) कह रहे हैं, कि जब वह आएगा, तो पूरी सच्चाई बताएगा। वह धर्म को पूरा करेगा और सभी को सही रास्ता दिखाएगा। इसलिए मुसलमान मानते हैं कि यह सही रास्ता दिखाने वाला पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, जिन्हें अल्लाह ने भेजा। संक्षेप में कहें तो, ये कुछ भविष्यवाणियाँ हैं। जब आप ईसाई दोस्तों को ये उदाहरण बताते हैं, तो वे आपको क्या जवाब देते हैं?

वो लोग क्या कहते हैं या फिर कैसी प्रतिक्रियाएँ देते हैं? अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह, व अशहदु अन्ना मुहम्मदन रसूलुल्लाह। (कोई सच्चा पूज्य नहीं सिवाय अल्लाह के, और मुहम्मद उनके रसूल हैं।) जी सच में? –हां, कुछ लोग ऐसा ही करते हैं। लेकिन कुछ लोग इसका विरोध करते हैं। वो कहते हैं, जानते हो?

जो भविष्यवाणियाँ तुमने बताईं, खासतौर पर New Testament में, वो Holy Spirit या Holy Ghost से जुड़ी हैं। उनका आपके नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कोई संबंध नहीं है। तो हम उन्हें यह जवाब देते हैं: देखिए, ईसा कह रहे हैं कि उनके जाने के बाद ही वह हस्ती आएगी। लेकिन हम कहते हैं कि Holy Spirit तो पहले से ही ईसा के समय में मौजूद थी। तो फिर, यह बात समझ में नहीं आती। ईसा कह रहे हैं कि मेरे जाने के बाद ही वह आएगा। लेकिन अगर वह Holy Ghost है, तो वह पहले से मौजूद थी। तो यह Holy Spirit नहीं हो सकता। ईसाइयों को जवाब देने का दूसरा तरीका यह हो सकता है कि ईसा कह रहे हैं कि वह हस्ती तुम्हें पूरी सच्चाई बताएगी, यानी comprehensive guidance — और Holy Spirit या Holy Ghost ने ऐसा नहीं किया। तीसरी बात जो हम कह सकते हैं वो यह है कि इन आयतों में सात बार male pronoun "वह" का इस्तेमाल हुआ है। कि वह आएगा, वह मेरी तारीफ़ करेगा, वह तुम्हें पूरी सच्चाई बताएगा, है ना?

Holy Spirit को 'वह पुरुष' या 'वह महिला' नहीं कहा जा सकता, हम एक और बात कह सकते हैं कि ईसा इस हिस्से में कह रहे हैं कि वह अपनी तरफ़ से कुछ नहीं बोलेंगे, बल्कि जो सुनेंगे, वही बोलेंगे। ईसाइयों के अनुसार, Holy Spirit ईश्वर है। ईश्वर किसी और के कहने का इंतज़ार नहीं करेगा, है ना?

क्या कहना है क्या नहीं कहना है इसलिए वो Holy Spirit नहीं, कोई और होना चाहिए। और हम कहते हैं कि जो व्यक्ति इस में पूरी तरह फिट बैठता है, वो हैं पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम। ईसाई लोग इस्लाम को लेकर जिस बात को लेकर सबसे ज़्यादा curious होते हैं, उनमें से एक है — इस धर्म में ईसा मसीह का दर्जा। क्योंकि बहुत से ईसाई यह सुनकर हैरान हो जाते हैं कि मुसलमान भी ईसा(अलैहिस्सलाम) पर विश्वास रखते हैं। क्या आपको इसके बारे में कुछ याद है? क्या आप इस्लाम में ईसा(अलैहिस्सलाम) और ईसाई धर्म में ईसा की तुलना कर सकते हैं?

ठीक है, अल्हम्दुलिल्लाह (हर् तरह की तारीफ अल्लाह ही के लिए है)। एक बार हमने शिकागो हाइवे पर एक बिलबोर्ड लगाया था, जिस पर लिखा था: क़ुरआन में ईसा को खोजिए, और बाइबल में मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खोजिए। लोग हैरान हो गए – सच में? क़ुरआन में ईशा (अलैहिस्सलाम) का ज़िक्र किस तरह मिलता है? और मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बाइबल में कहाँ हैं? बहुत से लोगों ने सवाल पूछने के लिए कॉल किया कई लोगों ने डिबेट करने के लिए कॉल किया, लेकिन बहुत से लोगों ने क़ुरआन की कोपी मंगवाने के लिए भी कॉल किया। तो अगर कोई मुझसे पूछे कि — अच्छा, इस्लाम में ईसा (अलैहिस्सलाम) कौन हैं? तो मेरे पास उनके लिए एक आसान, एक शब्द का जवाब है। मैं उन्हें एक आसान सा जवाब देता हूँ — सिर्फ़ एक शब्द में। और वो है — JESUS J.

E. S. U. S.

और यीशु (Jesus) शब्द का हर एक अक्षर अब हमारे लिए चर्चा का एक बिंदु है जिसके ज़रिए हम ईसाइयों को बता सकते हैं कि इस्लाम में ईसा मसीह कौन हैं। J का मतलब है — ईशा Just एक पैग़ंबर थे। अब तो आसान हो गया। तो J का मतलब है कि वह Just एक पैग़ंबर थे। क़ुरआन के सूरह 5, आयत 75 में लिखा है— कि ईसा केवल(just) एक पैगंबर थे। उनसे पहले भी कई पैगंबर गुज़र चुके हैं। तो क़ुरआन के अनुसार, ईसा (अलैहिस्सलाम) केवल एक पैगंबर थे— जो पैग़म्बरी की कड़ी (श्रृंखला) में शामिल थे। हर पैगंबर का मकसद लोगों को एक सच्चे ईश्वर की इबादत की ओर बुलाना था। इसी तरह ईसा (अलैहिस्सलाम) भी एक पैगंबर थे। E का मतलब है कि ईसा मसीह को ईश्वर ने मुअजिज़ा करने के लिए empower किया था। और उन्होंने ईश्वर की मदद से मरे हुए लोगों को ज़िंदा किया, अंधों को रोशनी दी, बीमारों और कोढ़ियों को ठीक करना। तो उन्होंने कई मुअजिज़ें किए, क्योंकि उन्हें ईश्वर ने वो करने के लिए empower किया था। यह कहाँ लिखा है?

क़ुरआन की सूरह नंबर 3, आयत नंबर 49 में। लेकिन जो हैरान कर देने वाली बात हम अपने ईसाई मित्रों से साझा करना चाहते हैं, वो यह है कि ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के द्वारा जो भी मुअजिज़ा (चमत्कार) किया गया, वो सब करने के लिए ईश्वर ने उन्हें empower किया था। इसका मतलब कि ताकत खुद ईसा(अलैहिस्सलाम) से नहीं, बल्कि ईश्वर से आ रही थी। तो इसका मतलब है E, J E । S का मतलब है कि Jesus का sole mission यह था कि वो इंसानियत को बुलाएँ एक ईश्वर की इबादत की ओर। क़ुरआन में, सूरह 3, आयत 51 में कहा गया है, इनल्लाहा रब्बी व रब्बुकुम फअ’बुदूहू हाज़ा सिरातुम मुस्तकीम अल्लाह क़ुरआन में ईसा(अलैहिस्सलाम) के शब्दों को बयान कर रहे हैं, जहां ईसा (अलैहिस्सलाम)कहते हैं, बेशक अल्लाह मेरे भी रब हैं और तुम्हारे भी । सिर्फ उसी की इबादत करो, यही सीधा रास्ता है। S का मतलब है — Jesus का sole mission। तो J E S U । दिलचस्प है ना?

आप क्या सोचते हो, U किसके लिए है? U का मतलब है — Allah के द्वारा uplift किए गए। ना उन्हें मारा गया, ना सूली पर चढ़ाया गया, अल्लाह ने उन्हें ऊपर(uplift) उठा लिया। वो बिना सूली पर चढ़े ऊपर(uplift) उठा लिए गए। ठीक है? J E S U. और आख़िरी S का मतलब है — दूसरी बार आगमन (Second Coming)। ईसाई हैरान रह जाएंगे, सच में? क्या आप लोग भी Second Coming पर यक़ीन रखते हैं?

तो मैं इस्लाम को ऐसे समझाता हूँ कि याद रखना आसान हो, सब कुछ एक सिलसिले में आता है, और यह "second coming" पर खत्म होता है। और यही है इस्लाम में ईसा का मक़ाम। उन्हें सूली पर नहीं चढ़ाया गया, उन्हें मारा नहीं गया। उन्हें आसमानों की ओर उठा लिया गया। हाँ, कुरआन के अनुसार, सूरह नंबर 4, सूरह अन-निसा (औरत), आयत नंबर 157 । अल्लाह फरमाते हैं — सिर्फ अनुवाद बताता हूँ — कि वो कहते हैं, वो घमंड से कहते हैं कि हमने ईसा को मारा, मरियम के बेटे को, जो मसीह हैं। न उन्होंने उसे मारा, और न ही उसे सूली पर चढ़ाया। बल्कि उन्हें ऐसा सिर्फ़ दिखाई दिया। और फिर अल्लाह कहते हैं कि ईसा को अल्लाह ने अपनी तरफ उठा लिया। ना उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, और ना ही मारा गया। तो यही एक अंतर है, लेकिन अल्लाह ने ईसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में यही कहा है। तो फिर उन्हें क्यों नहीं मारा गया, बल्कि आसमान की ओर उठा लिया गया?

क्या वो इसलिए दोबारा आने वाले हैं? हाँ, इस्लाम के अनुसार ईसा दोबारा आएंगे। इसलिए ना तो उन्हें मारा गया और ना ही सूली पर चढ़ाया गया क्योंकि ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार, ईसा की क्रूस पर मौत ईसाइयों के लिए छुटकारा का ज़रिया मानी जाती है। चूंकि हम ये नहीं मानते कि किसी इंसान की मौत या ज़िंदा रहना छुटकारे का रास्ता हो सकता है, तो अल्लाह सुब्हानहु व तआला फरमाते हैं — अच्छा, सुनो... वह मरे नहीं और अगर बहस के लिए मान भी लें कि वो मरे, तो भी यह छुटकारे का रास्ता नहीं है। लेकिन हुआ यूं कि अल्लाह ने ईसा (अलैहिस्स्सलम) को अपनी ओर उठा लिया। उन्हें दोबारा ज़मीन पर भेजा जाएगा, और फिर एक सिलसिलेवार घटनाएं होंगी, जब वो अपनी दूसरी आमद में वापस आएंगे। तो इस बात पर — जब वो वापस आएंगे तो क्या होगा?

क्या वो एक पैग़ंबर बनकर आएंगे?

तो जब ईसा ( अलैहिस्स्सलम ) वापस आएंगे, तो जाहिर है किसी को नहीं पता कि कब, किस दिन, किस साल वो आने वाले हैं। लेकिन इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम की किताबों में कई सही हदीसें हैं। ये हदीसें पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातें हैं, जो पुराने जमाने के मुसलमानों ने जमा की थीं। ऐसी करीब 14 सही हदीसें हैं जो पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद बताई हैं, जो ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के दोबारा आने के बारे में बताती हैं। कहा गया है कि वे दमश्क के शहर में आएंगे। यह सुबह की नमाज का समय होगा। मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं, यह पहली नमाज होती है। उसी समय ईसा (अलैहिस्सलाम) आसमान से उतरेंगे। वो दमिश्क की पूर्वी हिस्से की एक सफेद मस्ज़िद की मीनार पर उतरेंगे वह नीचे आएंगे और यह मुसलमानों की नमाज का समय होगा। मुसलमान हैरान रह जाएंगे, वे कहेंगे, ईसा (अलैहिस्सलाम) आपका स्वागत है, हम आपका इंतज़ार कर रहे थे। और वे उनसे कहेंगे, ईसा (अलैहिस्सलाम), आप ही नमाज क्यों नहीं पढ़ाते?" और ईसा (अलैहिस्सलाम) कहेंगे कि, आपके जो इमाम हैं, वही नमाज पढ़ाएंगे। इसका मतलब यह है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) किसी नबी या नए नबी के रूप में नहीं आएंगे। वो दोबारा पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत के मानने वाले के तौर पर उतरेंगे, सही?

और फिर आगे बताया गया है कि क्या-क्या होगा। ईसा मसीह (अलैहिस्सलाम) एक पूरी सेना के साथ आएंगे जो दज्जाल से लड़ेगी। अल्लाह की मदद से दज्जाल को हराया जाएगा। इसके बाद ईसा(अलैहिस्सलाम) कुछ सालों तक पूरी दुनिया पर राज करेंगे। उस समय हर कोई मुसलमान होगा। मुसलमान यानी वह जो creator के सामने झुकता है। ईसा शादी करेंगे। वह मक्का जाकर हज भी करेंगे। फिर उनकी मौत कुदरती तरीके से होगी। इस्लाम में मौत के बाद की ज़िंदगी का विश्वास ईसाई धर्म से कैसे अलग है?

जन्नत ,जहन्नुम ,क़यामत का दिन आदि । ठीक है, बहुत अच्छा सवाल। निजात और आख़िरत का जो अवधारणा है, इन दोनों में कई समानताएं हैं, लेकिन बहुत सारे अंतर भी हैं। एक समानता यह है: ईसाई धर्म के अनुसार, एक दिन ऐसा आएगा जब सब लोगों को दोबारा ज़िंदा किया जाएगा। और एक न्याय का दिन होगा। लेकिन उस दिन इंसानों का न्याय खुदा नहीं करेगा, बल्कि ईसा मसीह लोगों का फैसला करेंगे। लेकिन इस्लाम के अनुसार, अल्लाह ही सब कुछ जानने वाले हैं, वह सब कुछ देखने वाला है, वह बेहद बुद्धिमान है, और उसे हर चीज़ का ज्ञान है। इसलिए इंसानों का न्याय करने का हक़ सिर्फ अल्लाह को है, न कि ईसा (अलैहिस्सलाम)को। क्योंकि ईसा (अलैहिस्सलाम) को सब ज्ञान नहीं था, वह एक नबी थे, इंसान थे। वह सब कुछ जानने वाले नहीं थे। यह एक बड़ा अंतर है। दूसरा बड़ा अंतर यह है कि जन्नत को अलग-अलग तरह से बताया गया है। जैसा कि क़ुरआन में है, बाइबल की तुलना में। बाइबल में जन्नत को विस्तार से नहीं बताया गया है, जबकि क़ुरआन में किया गया है। क़ुरआन में महलों, पेड़ों, कपड़ों के बारे में बताया गया है, लोगों के खाने, बातचीत और आपसी व्यवहार के बारे में भी। सही?

इसमें जन्नत में मिलने वाले सभी सुंदर इनामों, जीवनसाथियों और परिवारों का जिक्र किया गया है। जबकि बाइबल बस इतना कहती है कि जन्नत में लोगों का ख़ुदा से सीधा रिश्ता होगा। लेकिन इससे तो हमारे मन में कई सवाल उठते हैं। हमेशा की ज़िंदगी का मतलब क्या होगा? क्या आप बस वहाँ बैठेंगे और ऊपर सिर्फ खुदा होंगे? फिर आप क्या करेंगे?

क़ुरआन इस सवाल का पूरा जवाब देता है कि वहां क्या होगा, और किस तरह के इनाम मिलेंगे। तो यह एक बड़ा अंतर है। दूसरा अंतर है — जहन्नुम का। कुछ ईसाई जहन्नुम को सचमुच की जगह मानते हैं, जहां सज़ा और तकलीफ होगी। लेकिन ज़्यादातर ईसाई कहते हैं कि जहन्नुम एक ऐसी जगह होगी जहां ख़ुदा और इंसानों के बीच दूरी होगी। और वही दूरी लोगों को मायूसी, ग़म और दुख देगी। जबकि इस्लाम के अनुसार जहन्नुम एक सज़ा की जगह है उन लोगों के लिए जिन्होंने अल्लाह को नकारा। जबकि उन्हें बहुत से संकेत और चेतावनियां मिल चुकी थीं, फिर भी उन्होंने अल्लाह को नहीं माना, गलत काम किए, और शिर्क किया (अल्लाह के साथ किसी और को जोड़ा),सही?

उन्होंने अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा की, या अल्लाह के साथ किसी और को भी पूज्य माना। तो जहन्नम एक जगह है जिसका ज़िक्र क़ुरआन में आया है। अल्लाह हम सबको जहन्नम से बचाए और हमें हमेशा की जन्नत में दाखिल करें।. तो क्या ईसाई मानते हैं कि मुसलमान जहन्नम में जाएंगे?

ईसाई मानते हैं, जैसे मुसलमानों के छह ईमान के हिस्से हैं और पाँच अरकान, और अन्य फ़र्ज़ होते हैं, अगर कोई व्यक्ति इन इस्लामी विश्वास को नहीं मानता और अमल नहीं करता, तो उसे सज़ा मिल सकती है। या कोई इंसान जो इस्लाम को नहीं मानता, चेतावनियों और ज्ञान के बावजूद, तो हम कहते हैं कि देखो, ऐसा इंसान जहन्नम में जाने का हकदार बन जाता है। ईसाई मानते हैं कि अगर कोई यह नहीं मानता कि ईसा मसीह खुदा हैं, या खुदा के बेटे हैं, या ट्रिनिटी का हिस्सा हैं, या उन्होंने इंसानों के मुक्ति के लिए जान दी, तो अगर कोई इन बातों पर विश्वास नहीं करता, तो वह जहन्नम में जाएगा। इसलिए वे मानते हैं कि मुसलमान अगर ईसा और उनके मिशन पर विश्वास नहीं करते, तो वे भी जहन्नम में जाएंगे। हाँ। तो हाँ, वे कहते हैं कि अगर मुसलमान ईसा को ईश्वर और बचाने वाला नहीं मानते, तो वे जहन्नम में जाएंगे। लेकिन हम बाइबल से खुद उन्हें बता सकते हैं कि जो वे कह रहे हैं, वह उस के अनुसार नहीं है जो ईसा मसीह ने मुक्ति (salvation) के बारे में कहा था। मुझे लगता है यह सबसे अहम बातों में से एक है। कि ईशा (अलैहिस्सलाम) के अनुसार, मुक्ति का रास्ता यह है कि इंसान का विश्वास सही हो और वह अच्छे कर्म करें। यही बात इस्लाम भी कहता है। कुरआन की सूरह बकराह, आयत 25 में अल्लाह कहते हैं — और इसका अनुवाद है: अगर किसी का विश्वास सही हो और वह अच्छे काम करें, तो अल्लाह उस इंसान को जन्नत की गारंटी देते हैं। एक व्यक्ति ईसा मसीह के पास आया — ये बाइबल के अनुसार है, वह आया और उसने एक बहुत अहम सवाल पूछा। यह New Testament में लिखा है, पहले गोश्पल में, गोश्पल ओफ मेथ्यू , अध्याय 19, आयत 16 और आगे की बात है। एक व्यक्ति ने ईसा से पूछा, "हे अच्छे गुरु मुझे क्या करना चाहिए ताकि मैं जन्नत में जा सकूं?

देखिए, सीधा सवाल था। ईसा ने जवाब दिया, तुम मुझे अच्छा क्यों कहते हो?

कोई भी अच्छा नहीं है, सिवाय एक के — जो खुदा है। तो इस हिस्से के अनुसार ईसा मसीह खुदा नहीं हो सकते, क्योंकि खुदा — ईसा मसीह कह रहे हैं कि कोई और हस्ती है, जो पूरी तरह भलाई (अच्छाई) से भरपूर है, जबकि मैं पूरी तरह भला नहीं हूँ। फिर उन्होंने असल जवाब दिया। ईसा ने कहा, अगर तुम हमेशा की ज़िंदगी चाहते हो अगर जन्नत में जाना चाहते हो, तो commandments का पालन करो। देखिए, वह यह भी कह सकते थे कि, बस कुछ दिन, कुछ हफ्ते या कुछ महीने इंतज़ार करो, मैं मरूंगा, सूली पर चढ़ाया जाऊंगा, फिर जी उठूंगा — और यही जन्नत का रास्ता है।" लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा। यह विचार बाद में बनाए गए। ईसा ने सिर्फ इतना कहा कि अगर तुम जन्नत चाहते हो, तो commandments का पालन करो। उस व्यक्ति ने पूछा, कौन से commandments?

ईसा ने कहा, पुराने की commandments — यानी ओल्ड टेस्टामेंट। वह Ten Commandments की तरफ इशारा कर रहे थे। Old Testament की book of Exodus में Ten Commandments में लिखा है अध्याय 20, आयत 3 — सिर्फ एक खुदा की इबादत और उस पर विश्वास करो। बाकी नौ commandments अच्छे कर्मों के बारे में बताते हैं। जैसे कि – खुदा के नाम का अपमान मत करो, माता-पिता का सम्मान करो, पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार करो, झूठ मत बोलो, धोखा मत दो, हत्या मत करो — ये सब अच्छे कर्म हैं। तो जब हम Ten Commandments को देखते हैं, तो पहला commandment है — सिर्फ एक खुदा पर विश्वास रखो। और बाकी commandments अच्छे कर्मों के बारे में बताते हैं। तो ईसा अलैहिस्सलाम के अनुसार, बाइबल से भी यही पता चलता है, कि जन्नत पाने के लिए सही विश्वास के साथ अच्छे कर्म जरूरी हैं। ईसाई धर्म के अनुसार, ईसा मसीह ने मानवता की मुक्ति (salvation) और पापों की माफी के लिए स्वयं को कुर्बान कर दिया। तो यह मान्यता(belief) गलत क्यों है?

तो फिर सिर्फ़ ईसा मसीह को अपना मुक्तिदाता (savior) मान लेना किसी की मुक्ति (salvation) के लिए काफ़ी क्यों नहीं होना चाहिए? देखिए, यह सोच कई स्तरों पर गलत है। तर्क के अनुसार भी यह गलत है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) की मौत कैसे पूरी मानवता के लिये मुक्ति का कारण बन सकती है? मान लीजिए मैं घर से यहां गाड़ी चला कर आया।. अगर मैंने स्पीड लिमिट पार की हो, तो पुलिस को मुझे पकड़ना चाहिए, और सज़ा भी मुझे ही मिलनी चाहिए न कि मेरी पत्नी, पड़ोसी या माता-पिता को। तो तर्क के अनुसार, अगर कोई मरे तो उसकी मौत में विश्वास करना किसी और के लिए मुक्ति का कारण कैसे बन सकता है?

इस्लाम और तर्क के अनुसार, इस्लाम कहता है कि जो तुम करोगे, वही तुम्हें भुगतना होगा। यानि अगर तुम अच्छा करोगे, तो इनाम तुम्हारे लिए होगा। अगर बुरा करते हैं, तो या तो तौबा से माफी मिलेगी, या फिर उसके नतीजे भुगतने होंगे इस्लाम में मुक्ति की बात समझदारी और तर्क पर आधारित है। दुनिया की हर अदालत प्रणाली में, इस्लाम की self-accountability की सोच को अपनाया जाता है। अगर कोई अपराध करता है, तो सज़ा उसी को मिलती है, किसी और को नहीं। तो तर्क के नजरिये से देखें तो ईसाइयों का मुक्ति का concept तर्क के अनुसार सही नहीं बैठता। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भी, जैसा मैंने पहले बताया, ईसा मसीह ने कहा कि मुक्ति और जन्नत पाने का रास्ता सही विश्वास रखने और अच्छे कर्म करने से है। जो मैथ्यू, अध्याय 19, आयत 16 में बताया गया है। तो हम जिस भी नजरिये से देखें, यहां तक कि ओल्ड टेस्टामेंट से भी, ओल्ड टेस्टामेंट में भी लिखा है — जो तुम करोगे, वही तुम्हें भुगतना होगा। book of Ezekiel में । तो ओल्ड टेस्टामेंट, ईसा मसीह, क़ुरआन और तर्क — सभी यही कहते हैं, हर न्याय प्रणाली यही कहती है कि जिसने गलत किया है, सज़ा उसी को मिलनी चाहिए, और जिसने सही काम किया है, इनाम उसी को मिलना चाहिए। तो क्या आपको लगता है कि original sin की अवधारणा कोई मायने नहीं रखती?

original sin के अनुसार, आदम और हव्वा ने गुनाह किया था और उन्होंने ईश्वर की बात नहीं मानी और सेब खा लिया या उस पेड़ के पास चले गए। और उनकी सज़ा ये है कि उनके हर संतान ,हर बच्चा उस original sin को विरासत में पाएगा। लेकिन तर्क के अनुसार सोचें, तो मुझे क्यों सज़ा मिले मेरे माता-पिता के गुनाहों के लिए? कोई भी न्याय प्रणाली इसको सही नहीं मानती । कि बच्चों को उनके पिता के गुनाह की सज़ा मिले। इस्लाम original sin की बात नहीं करता है। इस्लाम original goodness की बात करता है। हर बच्चा, हर नवजात, हर इंसान एक साफ़ दिल के साथ पैदा होता है। बिना किसी दाग के, सही?

बिलकुल साफ, मासूम और बिना किसी गलती के। जब तक आप बालिग नहीं होते, और अगर आप सही काम करते हैं, तो आपको इनाम मिलेगा, और अगर आप गलत करेंगे तो उसका अंजाम भी होगा। तो इस्लामी सोच के अनुसार, जब आदम और हव्वा ने गलती की, जब उन्होंने गलती की, तो दोनों ने अल्लाह से तौबा की, या अल्लाह, हमें माफ कर दो। और अल्लाह ने उन्हें माफ कर दिया। बात खत्म। और हर बच्चा original goodness(अच्छाई) साथ पैदा होता है। मैंने यह जवाब कई बार दिया है, हर बार मस्जिद के ओपन हाउस में जब ईसाई लोग यह सवाल पूछते हैं, हर बार वे कहते हैं, जानते हो सबील, इस्लाम में मुक्ति की जो धारणा आपने बताई, वो logical है, इसका sense बनता है।" फिर ईसाई पूछते हैं — तो फिर खुदा ने बाइबल की हिफाजत क्यों नहीं की?

तो अल्लाह ने ईसा (अलैहिस्सलाम) को दी गई इंजील की हिफाजत क्यों नहीं की? दाऊद (अलैहिस्सलाम) को ज़बूर दी गई, और मूसा (अलैहिस्सलाम) को तौरेत दी गई , और इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को सहीफ़े दिए गए? अल्लाह चाहते तो उनकी हिफाजत कर सकते थे और हमारे पास उनके originals होते, है ना? अल्लाह तो कर सकते थे, वे हर चीज़ पर क़ादिर हैं। उसके पास यह करने की ताक़त है। लेकिन उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि वे किताबें सिर्फ उन लोगों और उस समय के लिए थीं। उन्हें बस थोड़ी सी ही जानकारी मिली थी। उनके पास बस थोड़े से शरीअत के नियम थे। वह शरीअत हर समय और हर व्यक्ति के लिए लागू नहीं हो सकती थी। शरीअत का मतलब है guidance, ठीक है?

एक आसान उदाहरण देता हूँ। मान लीजिए आपके पास नॉर्वे का संविधान है। ये संविधान सिर्फ नॉर्वे के लोगों, यानी उन 50 लाख लोगों के लिए लिखा गया है। वह उनके भूगोल, संस्कृति और उनके माहौल के हिसाब से बना है। नॉर्वे का संविधान पूरी तरह से लागू नहीं हो सकता अमेरिका, भारत या अफ्रीका के लोगों पर। इसी तरह, अमेरिका का संविधान दूसरे देशों पर लागू नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक खास संदर्भ (context) में लिखा गया है। लेकिन सोचिए अगर कोई ऐसा संविधान हो जो पूरी दुनिया के लिए हो, हर संस्कृति, हर नस्ल और हर युग के लिए लागू हो। यह क़ुरआन की तुलना है नॉर्वे और अमेरिका के संविधान से, जो बाइबल — Old और New Testament — के समान माने जा सकते हैं। यहाँ तक कि अगर अल्लाह ने ईसा (अलैहि सलाम) को दी गई इंजील (गॉस्पेल) को महफ़ूज़ भी रखा होता, या वह वही (प्रकाशन) जो ईसा मसीह को दी गई थी, तो भी वह आज के दौर के लिए काफ़ी नहीं होती, हम जिन समस्याओं से गुजरते हैं, उन सभी का हल उसमें नहीं मिलता। तो यह केवल उन लोगों और उस समय तक ही सीमित था। इसी कारण से, अल्लाह ने अपनी हिकमत (ज्ञान) से यह फैसला किया कि वह इंजील को महफ़ूज़ रखने की ज़िम्मेदारी नहीं लेंगे। लेकिन क़ुरआन पूरी मानवता, हर समय और हर समस्या के लिए है। कोई भी समस्या, किसी भी संस्कृति, किसी भी नस्ल के लिए। और यह आखिरी वही है, इसलिए अल्लाह ने इसे हिफाजत करने का वादा किया है।.

मुसलमान मानते हैं कि क़ुरआन संरक्षित है, लेकिन बाइबलों में बदलाव हुए। तो इसका कारण क्या है? क्या आप साबित कर सकते हो? यह बहुत बड़ा दावा है। यह बहुत बड़ा दावा है, और बड़े दावे के लिए बड़ी सबूत होनी चाहिए, सही है ना?

तो चलिए, अब क़ुरआन की तरफ देखते हैं। देखो, अल्लाह ने क़ुरआन में एक भविष्यवाणी की है — सूरह हिज्र, आयत नंबर 9 में, कि अल्लाह ही है जिसने यह ज़िक्र (यादगार, संदेश) नाज़िल किया है, और वही इसका हिफाजत करेगा, इस " वही" का । इसलिए वह इसे दो तरीकों से सुरक्षित रख रहा है। एक तरीका है — लोगों के दिलों और याददाश्त में। देखिए, जब पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर "वही" आई, तो वे क़ुरआन को याद करने वाले पहले इंसान बने। उनके मानने वालों ने क़ुरआन को याद किया, और वे अगली पीढ़ियों को सिखाया, यह सिलसिला आज तक चला आ रहा है। क़ुरआन को याद करने वालों की multiple chains रही है, 1400 साल से बिना कोई गैप के। हर दौर में लाखों लोगों ने क़ुरआन को याद किया। हमारी पीढ़ी में, यानी 2021 में, लोग चौंक जाएंगे यह जानकर कि लगभग 1.5 करोड़ हाफ़िज़ हैं पूरी दुनिया में जो क़ुरआन को याद किए हुए हैं। लेकिन बाइबिल के कितने?

Original language ? Zero मैं original language का बात कर रहा हूँ, सही? aramaic language में या फिर पुराने हिब्रू में, जैसा ओल्ड टेस्टामेंट था। बाइबल का कोई हाफ़िज़ नहीं, लेकिन क़ुरआन के 1.5 करोड़ हाफ़िज़ हैं। तो यह एक तरीका है जिससे क़ुरआन हिफाजत में है। और हम इसका experiment कर सकते हैं। कोई ईसाई जो क़ुरआन पढ़ना जानता हो, वह क़ुरआन खोलकर रखे और मेरा बेटा जो क़ुरआन हाफ़िज़ है — माशा’अल्लाह वह लगभग पूरा क़ुरआन याद कर चुका है। तो वह दूसरी तरफ देखकर, बिना फोन, बिना किसी डिवाइस के, सिर्फ याददाश्त से क़ुरआन पढ़ना शुरू कर सकता है। और वह ईसाई जो अरबी पढ़ने जानता हो, वह क़ुरआन को देखकर जांच सकता है वह देखेगा कि जो मेरा बेटा यूसुफ़ पढ़ रहा है, वह बिल्कुल वैसा ही है। सीधा सा experiment है, ठीक है?

दूसरा तरीका जिससे क़ुरआन को हिफ़ाज़त किया गया शुरुआत से ही, पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें पढ़ना-लिखना नहीं आता था। जब भी कोई "वही" आती थी, तो वे 55 से 77 scribes को बुलाते। वे उनके पास आते, और उन्हें कहते — इस आयत को लिखो। इस सूरह को मेरे सामने लिखो। वे लिखते और फिर वे उन्हें कहते जो लिखा है, वह मुझे पढ़कर सुनाओ। ताकि यह तय हो सके कि उन्होंने वही लिखा है जो कहा गया। इस तरह पूरा क़ुरआन लिखा गया, और पूरा क़ुरआन याद भी किया गया। अगर scribes कोई गलती करता, क्योंकि उस समय प्रिंटिंग प्रेस नहीं थी, लोग हाथ से लिखते थे और इंसानी गलती हो सकती थी। अगर किसी लिखे हुए क़ुरआन में गलती हो जाए, तो क़ुरआन हिफ्ज करने वाले लोग उसे पकड़ लेते और ठीक कर देते थे। तो वो क़ुरआन की कॉपी बिल्कुल असली जैसी हो जाती थी। इस तरह क़ुरआन में दो तरीके से चेक और बैलेंस होता है, जो किसी और किताब में नहीं है। तो यही इस बात का सबूत है कि क़ुरआन को हिफ़ाज़त किया गया है। और हमारे पास क़ुरआन की वो कॉपियाँ भी हैं जो सीधे तौर पर नबी मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने की हैं। उनमें से एक है बर्मिंघम की क़ुरआन, वैसे। जो बर्मिंघम की एक लाइब्रेरी में खोजी गई थी। तो इस तरह हम बता सकते हैं कि क़ुरआन को हिफ़ाज़त किया गया है। यह सिर्फ अंध विश्वास नहीं है — इसके पीछे सबूत हैं। तो बाइबल के बारे में क्या?

लोग सोच सकते हैं। आप मुसलमान कहते हैं कि बाइबल को बदला गया है। तो फिर सबूत क्या है? किसने बदला? कब बदला? और वो बदलाव कहाँ हैं?

ईसा अलैहिस्सलाम जब guidance की बात कर रहे थे, एक ईश्वर, और मुक्ति की बात — तब किसी ने उसे लिखा नहीं। कोई भी बाइबल का इतिहासकार नहीं कहता कि, ईसा के शब्द उन्हीं के समय में लिखे गए। ईसा के जाने के कई दशक बाद, लोगों ने याद करके लिखना शुरू किया। तो ईसा के जाने के बाद लगभग 30 से 60 साल का अंतर था। और ईसाइयों के अनुसार, जिन्होंने लिखा, चारों गॉस्पेल लिखने वाले असली चश्मदीद नहीं थे। वे अनजान लेखक हैं। और जब उन्होंने लिखा, तो ईसा की भाषा में नहीं लिखा। देखिए, एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, ईसा अरामाई भाषा बोलते थे। लेकिन न्यू टेस्टामेंट की असली लिखाई यूनानी भाषा में है। मुसलमानों के लिए क़ुरआन अरबी में लिखी गई, अरबी में याद की गई, अरबी में ही नाज़िल हुई, और नमाज में भी अरबी में पढ़ी जाती है। लेकिन उनके पास ऐसा कुछ नहीं है। इसलिए न्यू टेस्टामेंट यूनानी में लिखी गई, जबकि ईसा की भाषा अरामाई थी, है ना?

तो देखिए, उनके पास कितने बड़े अंतर हैं। न ईसा के समय में लिखा गया, न उनकी भाषा में। लिखा भी ऐसे लोगों ने जो उनके शिष्य या गवाह नहीं थे, और फिर उसमें बहुत से बदलाव भी हुए। और इतने सारे बदलाव होने का कारण यह है: जरा सोचिये..

आपके पास बाइबल की सिर्फ एक manuscript(हस्तलिखित) की कॉपी है, और फिर किसी व्यक्ति को इसे लिखना पड़ता है यानी scribe को इसे copy करना है। क्योंकि बाइबल को हिफ़्ज़ (याद) करने वाले लोग नहीं हैं, तो यह व्यक्ति कॉपी करते समय गलती कर सकता है। क्योंकि याददाश्त गड़बड़ा सकती है, या वह थका हुआ हो सकता है। या रोशनी कम हो सकती है। वह जो कॉपी बनाएगा वह असली किताब जैसी नहीं होगी क्योंकि इसमें अब एक गलती जुड़ गई है। अब कोई इससे कॉपी बनाएगा, तो वो गलती इसमें आ जाएगी और और भी गलती जुड़ सकती है। जितनी ज़्यादा कॉपियाँ बनती जाएंगी, उतनी ही गलतियाँ बढ़ती जाएंगी। अब हम यह भी देख सकते हैं कि बाइबल में बदलाव हुआ है — क्योंकि मैं खुद बाइबलों का जमा करने वाला हूँ। मेरे पास 300 बाइबल है। कभी मेरी लाइब्रेरी में आइए। इतिहास के अलग-अलग कालों से, अलग भाषाओं में, अलग versions में इनमें से हर एक एक-दूसरे से अलग है। एक उदाहरण दीजिए?

आपके पास King James version है जो 1611 में छपी थी, जो इंग्लैंड के King James के देख-रेख में बनी थी। उस बाइबल को 1881 से 1885 के बीच संशोधन किया गया क्योंकि उसमें गलतियाँ थीं और वह पुराने manuscripts से नहीं ली गई थी। इसलिए इंग्लैंड में 1881 में संशोधन किया गया। इसमें भी गलतियाँ थीं, इसलिए 1901 में फिर से संशोधन किया गया, जिसे 'American Standard Version' कहा गया। इसमें भी गलतियाँ थीं क्योंकि लोग खोजने लगे, new new manuscripts और वो new manuscripts इस बाइबल से अलग थीं, इसलिए उन्हें बार-बार बाइबल में बदलाव करना पड़ा। मैं कुछ उदाहरण देता हूँ, ठीक है?

1901 में जो बाइबल छपी, जिसे American Standard Version कहा जाता है। उसमें भी गलतियाँ थीं, इसलिए 1952 में फिर बदलाव हुआ। उसमें भी गलतियाँ थीं, तो 1971 में फिर से बदलाव किया गया (NASB)। इसमें भी गलतियाँ थीं, तो 1989 में, फिर 2020 में बदलाव किया गया और फिर 2021 में भी। तो आप सोच रहे होंगे, भाई सबील, ये क्या हो रहा है? बात ये है — ठीक है, मान लीजिए आपके पास एक बाइबल है, लेकिन अगर new manuscripts मिलती हैं, तो उन्हें बाइबल को अपडेट करना पड़ता है। सिर्फ अनुवाद नहीं, बल्कि उसके कंटेंट को। तो कुछ असली उदाहरण क्या हो सकते हैं, जो बाइबिल में बदली गई आयतों के?

अगर आप King James version को देखें, न्यू टेस्टामेंट में, second book, जो है Gospel of Mark, अध्याय 16 में — मैं काफी बातें बता रहा हूँ, उम्मीद है आप समझ रहे हैं। New Testament की second gospel, अध्याय 16 में इसमें 20 आयतें हैं। यह एक बाइबल का उदाहरण है। मेरे पास जो बाइबल है — 1952 की version, gospel of Mark के 16वें अध्याय में इसमें 20 आयतें हैं, और इसमें सिर्फ 8 आयतें हैं। वाह! लोग सोच सकते हैं, जानते हैं क्या? मुसलमान शायद "अनुवाद" और "versions" में कंफ्यूज हो रहे होंगे। नहीं, हम अनुवाद का मतलब जानते हैं। अनुवाद का मतलब होता है, जैसे अंग्रेज़ी से तुर्की भाषा में अनुवाद करना — है ना?

यही होता है अनुवाद। Version का मतलब है असली शब्दों में बदलाव किया गया है, असली वाक्यों में बदलाव किया गया है। एक version में ज़्यादा आयतें हैं, दूसरे में कम। तो यह एक आसान उदाहरण था। सही?

एक और उदाहरण हो सकता है Gospel of John में, जो चौथी गोस्पेल है, सातवाँ अध्याय, आयत 53, यह एक वेश्या के बारे में बात करता है। और कैसे लोग उसे पत्थर मारने के लिए उसके चारों तरफ इकट्ठा हो गए। फिर ईसा वहाँ आते हैं और कहते हैं, जो बिना गुनाह के हो, वही पहला पत्थर मारे। आपने यह कहानी सुनी होगी। यह कहानी पुराने manuscripts में नहीं पाई जाती। King James version में यह मौजूद है। RSV version में लिखा है कि यह कहानी बाद में जोड़ी गई है, यह पुराने manuscripts में नहीं है। तो किसी ने यह कहानी बाद में डाली। एक और छोटा उदाहरण। epistle of John के पहले पत्र में, अध्याय 5, आयत 7 में, King James version में लिखा है कि जन्नत में तीन गवाही देने वाले हैं — पिता, पुत्र और Holy Spirit। यह King James version में लिखा है। नए वर्जंस ने इसे हटा दिया, क्योंकि यह समझा गया कि किसी ने यह जोड़ा था। तो मैं कह रहा हूँ कि सदियों से यूनानी manuscripts में लोगों ने चीजें जोड़ी हैं और हटाई भी हैं। इसीलिए हम कहते हैं कि बाइबल में बदलाव हुआ है। अब ईसाइयों के लिए एक समस्या है। उनके पास असली बाइबिल नहीं है, बाइबल के कोई हाफ़िज़ ,याद करने वाले, नहीं हैं, उनके पास सिर्फ ये manuscripts हैं, और हर एक दूसरी से अलग है। तो वे अपने अनुसार, बहुमत के आधार पर तय करते हैं कौन सी आयत कहाँ होनी चाहिए। इसी तरह वे बाइबल बनाते हैं। तो जब मुसलमान यह कहते हैं कि बाइबल बदली गई है, और क़ुरआन हिफाजत में है — तो हमारे पास इसके सबूत हैं। तो क्या ये केवल चार बाइबल थीं जो लिखी गई थीं, या ईसा के समय और भी बाइबलें मौजूद थीं?

हुआ यूँ कि जब ईसा को ऊपर उठा लिया गया, लगभग 33 वर्ष में, तो किसी ने उनके उपदेशों को नहीं लिखा। कई दशक बाद लोगों ने बहुत सी इंजील लिखनी शुरू कीं। गॉस्पेल (इंजील) की परिभाषा यह है कि यह पैग़म्बर ईसा की जीवनी है। उन पर सलामती हो। तो बहुत से लोगों ने पैग़म्बर ईशा की जीवनी लिखी। सिर्फ मेथ्यु ,मार्क, ल्युक और जोन ही नहीं, बल्कि बहुत सी और भी इंजीलें लिखी गई थीं। कुछ लोग कहते हैं 77, कुछ कहते हैं 100, कुछ 200। तो जब ईसा मसीह के असली शिष्य और उनके बाद के लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सिखाने के लिए गए, वह एक ईश्वर में विश्वास रखने वाला धर्म जो ईसा मसीह ने सिखाया था। तो ये ईसाई या ये असल शिष्य, जब वे रोमन साम्राज्य, फारस मिस्र आदि देशों में गए, और भारत या चीन जैसे जगहों में, उन जगहों और संस्कृति में, ट्रिनिटी और उसके कई रूपों का ज़माने में खूब चलन था। तो अफ़सोस की बात है कि ईसा मसीह को मानने वाले जो एक ही ईश्वर में विश्वास रखते थे, उन्होंने एकेश्वरवाद(monotheism) की बात को बदल दिया और उसमें ट्रिनिटी को जोड़ दिया। तो रोमन साम्राज्य में जो होता था वह था: अब दो प्रकार के ईसाई थे — Trinitarian ईसाई, और दूसरे एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले ईसाई। इन्हें यूनिटेरियन ईसाई भी कहा जाता है। सही?

एक तरफ Trinitarians हैं, और दूसरी तरफ Unitarians हैं। इनमें अक्सर विवाद और टकराव होता था। रोम का सम्राट कॉन्स्टेंटाइन, वह असल में मूर्तियों को पूजने वाला राजा था। उसने कहा — शांति होनी चाहिए, सबमें मेल होना चाहिए, — चलो इन्हें एक साथ लाएँ। तो उसने सभी बिशप जमा किए। उनकी एक पूरी council बुलाई, जिसे Council of Nicaea कहा जाता है। इसमें तय हुआ कि ईसा ईश्वर के समान हैं। पहले ऐसा नहीं था। सही?

अब इसे ऑर्थोडॉक्स मान्यता मिल गई। जब से इसमें फेरबदल होने लगा तब मौजूद कई इंजीलों को, ईसाइयों ने तय नहीं कर पाया कि कौन सही है, और कौन गलत। लेकिन ट्रिनिटी की orthodoxy फिर orthodoxy बन गई। जब 367 में तय हुआ कि बाइबल क्या होगी, सोचिए — यह सब कितने वर्षों बाद हुआ था। वर्ष 367 में Trinitarian beliefs को शामिल किया और केवल वही इंजील चुना गया जो ईशाईयों के Trinitarian belief से मेल खाती थीं। वर्ष 367, यानी ईसा के 300 साल बाद। जो इंजील ट्रिनिटी से मेल खाते थे, उन्हें बाइबल में रखा गया। जो इससे मिलते नहीं थे, उन्हें बाहर कर दिया। इसलिए कई अन्य इंजीलें थीं, जैसे थॉमस की इंजील, या बरनबास की, आदि, जो सिर्फ ईसा को पैग़म्बर बताते हैं, केवल एक ईश्वर है, ईसा मरें नहीं, सही?

मुक्ति की जो धारणा इस्लाम पेश करता है। सारी ऐसी इंजीलें हटा दी गईं, ब्लैकलिस्ट की गईं, बैन कर दिया गया। और केवल ट्रिनिटी से मेल खाने वाली को रखा गया। तो ट्रिनिटी का विचार कैसे आया? क्या यह पहले मौजूद अन्य धर्मों से आया था जिनसे ईसाई धर्म से पहले लोग जुड़े थे? तो Trinity की धारणा वास्तव में अलग-अलग संस्कृतियों में काफ़ी प्रचलित थी। सिर्फ ट्रिनिटी ही नहीं, सही?

क्योंकि कुछ संस्कृतियों ने ईश्वर की धारणा को इस हद तक बिगाड़ दिया था, जिससे मूर्तिपूजा, मानव, पशु पूजा हुई — ट्रिनिटी जैसा विचार। जैसे हिंदू धर्म में अभी भी ट्रिनिटी की पूजा होती है। ब्रह्मा , विष्णु, और शिव — रक्षा करने वाला और संहारक मिस्री संस्कृति में भी ऐसी ट्रिनिटी मौजूद थी, रोमन, फारस आदि में भी। इस प्रकार एकेश्वरवाद को बिगाड़ा दी गई थी। जैसे भारत में भी, मैं भारत से हूँ। मैं भारत में ही पैदा हुआ और बड़ा हुआ। मैंने देखा कि कुछ लोग कब्रों के आसपास चक्कर लगाते हैं। यह मुस्लिम होते हैं। और सजदा करते हैं, सही?

ये मरे हुए लोगों के सामने झुकते हैं, और कहते हैं कि वे मुस्लिम हैं — वजह जानकारी कि कमी। ये बिदअत कर रहे हैं। उसी तरह शुरु के ईसाई धर्म को मानने वालो ने, जब वे अन्य संस्कृतियों से मिले, तो वे उनकी संस्कृति और रहन-सहन की ओर आकर्षित हो गए, उनके धार्मिक सिद्धांतों से प्रभावित होकर, और वे एकेश्वरवाद को बिगाड़ दिए, और ट्रिनिटेरियन सिद्धांतों को अपनाया। शुरु में कुछ पुराने संस्कृतियों में — यहूदी संस्कृति में भी, वे नेक लोगों को 'ईश्वर का बेटा' कहते थे, नेक लोगों को 'ईश्वर का बेटा' कहा जाता था। सीधे-साधे (शाब्दिक) तौर पर नहीं, बल्कि रूपक (प्रतीकात्मक) अंदाज़ में। लेकिन जब ईसाई के मानने वाले आए, उन्होंने कहा, देखा जाए तो अन्य संस्कृतियों में भी ईश्वर का बेटा कहा गया है। तो उन्होंने कहा— शायद ईसा भी 'ईश्वर का बेटे' हैं। तो उन्होंने उस बात का शाब्दिक अर्थ ले लिया, जबकि उसका मतलब रूपक (प्रतीकात्मक) होना चाहिए था। तो जब उन्होंने इसका शाब्दिक मतलब ले लिया कि **ईश्वर का एक बेटा है**, तो बेटे के पास भी ईश्वर जैसे गुण होने चाहिए। यानी बेटा भी ईश्वर होगा। फिर उन्होंने एक और अस्तित्व जोड़ दिया जिसे उन्होंने Holy Spirit कहा। देखिए, "Spirit of God" एक रूपक (प्रतीकात्मक) अंदाज़ में कही गई बात है, यह आत्मा स्वयं ईश्वर है। लेकिन उन्होंने Spirit of God को अलग व्यक्ति घोषित किया, और उसमें डिवाइन गुण जोड़े। तो अब उन्होंने कहा— यदि पिता ईश्वर है, बेटा ईश्वर का गुणों वाला है, और Holy Spirit भी, तो उसके पास भी ईश्वर के गुण है। शायद उन संस्कृतियों की तरह ईश्वर तीन व्यक्तियों में है। तो इसी तरह, ईशा के जाने के कई सदियों बाद Trinity की धारणा ईसाई धर्म का एक पारंपरिक (ऑर्थोडॉक्स) हिस्सा बन गई। ये सब लोजिकल बातें हैं, लेकिन कई ईसाई कहते हैं— मुझे ईसाई धर्म में आध्यात्मिक अनुभव होता है, मुझे ईश्वर से जुड़ाव महसूस होता है।" तो मुझे अपना धर्म से क्यों बदलना चाहिए?

मेरे अनुसार तीन कारण हैं: किसी को अपना धर्म ईसाइयत से इस्लाम बदलना चाहिए, सही? तीन आसान कारण, संक्षेप में: पहला—किसी को यह महसूस होना कि एक धर्म में उन्हें अच्छा या आध्यात्मिक महसूस होता है, वह किसी धर्म के सच्चे होने का सबूत नहीं है। जैसे एक हिन्दू मंदिर जाकर कहे — मुझे आध्यात्मिक अनुभव होता है। मुझे लगता है, यह सही धर्म है। जैसा लोग कहते हैं — भावनाएँ हक़ीक़त नहीं होतीं। एक बौद्ध या यहूदी भी ऐसा ही कह सकते हैं, सही? मुसलमान भी ऐसा ही कह सकते हैं। केवल इसलिए कि हम कुछ कहते हैं, वह सही नहीं हो जाता। भावनाएँ होती हैं— हम सभी के पास होती हैं। इसे सब्जेक्टिव तर्क कहते हैं। subjective, सही?

तो भावनाओं से नहीं, तथ्यों से चलना चाहिए। अब तथ्यों की बात करते हैं — दो चीजें। पहला तरीका यह है कि सही धर्म की पहचान के लिए उस धर्म में ईश्वर की सही धारणा होनी चाहिए। अगर ईश्वर की धारणा सही है, तो सब कुछ ठीक हो जाता है। अगर ईश्वर की धारणा गलत है, तो कुछ भी मायने नहीं रखता। तो इस्लाम जो ईश्वर की धारणा देता है, वह सिर्फ एक ईश्वर पर विश्वास करना है। केवल एक ही ख़ालिक़ है, सबसे बेहतरीन सिफ़ात वाला, जिसका कोई शरीक नहीं। कोई ट्रिनिटी नहीं — बिल्कुल एक है। यही अवधारणा हर नबी और रसूल ने सिखाई है। यहां तक कि बाइबल में भी। मैं अपने ईसाई और यहूदी दोस्तों से कहता हूँ— अगर आप इब्राहीम अलेहिस्सलाम को देखें old testament- वे भी एक ईश्वर को मानने वाले थे, वो ट्रिनिटी को नहीं मानते थे। मूसा भी ट्रिनिटीको नहीं मानते थे। उन्होंने भी एकेश्वरवाद की दावत दी। बाकी सभी नबियों ने, यहां तक कि ईसा ने भी, एकेश्वरवाद की दावत दी। ईसा ट्रिनिटी को नहीं मानते थे। यह दूसरा कारण है कि ईसाई को इस्लाम पर विचार करना चाहिए, क्योंकि इस्लाम ने फिर से ईसा और सभी नबियों द्वारा सिखाए गए एकेश्वरवाद की धारणा को जीवित किया तीसरा कारण — अगर मैं एक सेक्युलर नजरिये से देखता हूँ, मेरे सामने इस्लाम, ईसाइयत, यहूदी धर्म, हिंदू धर्म हैं, अब अगर मुझे कोई धर्म चुनना हो, तो एक महत्वपूर्ण बात ये होगी — मानवता इस समय कई समस्याओं से जूझ रही है। नस्ल भेद, परिवार का टूटना, और नैतिकता की कमी , हत्या, आत्महत्या, जुआ जैसी बहुत सी समस्याएं हैं। तो इनका हल क्या है?

इसलिए, किसी सही धर्म की एक पहचान यह होनी चाहिए कि अगर वह ईश्वर की तरफ से है, तो वह हर समस्या का व्यावहारिक, लागू करने लायक और फायदेमंद हल जरूर देगा। अगर आप न्यू टेस्टामेंट देखें, तो उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि आर्थिक प्रणाली को लेकर व्यापक हल क्या हैं, राजनीतिक व्यवस्था, न्याय प्रणाली के लिए क्या हल हैं, या पारिवारिक और वैवाहिक सिस्टम को कैसे चलाया जाए। हमें इसकी ज़रूरत है — न्यू टेस्टामेंट में ये नहीं हैं। ओल्ड टेस्टामेंट में कुछ हद तक है, लेकिन सिर्फ यहूदियों के लिए है। वो सीमित हैं — समय, स्थान और लोगों के अनुसार। हमे चाहिए, लेकिन उसमे नहीं है। हिंदू वेदों में भी नहीं है। बौद्ध ग्रंथों में भी नहीं है। सही?

8 अरब लोगों की मानवता को समाधान चाहिए, हमें मार्गदर्शन चाहिए। तर्क की नजरीये से देखें तो उनमें समाधान नहीं हैं। Practical solutions, सही? सिर्फ़ ये कहना नहीं कि "अपने पड़ोसी से प्यार करो" — ठीक है, लेकिन असल में प्यार करने का मतलब क्या है?

इसका विस्तार से समाधान होना चाहिए। इस्लाम के पास वे समाधान हैं। क़ुरआन में — जो पूरी मानवता के लिए अल्लाह का कलाम है, सुन्नत के तौर-तरीकों में, यानी पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मिसाल में। मानवता को इन समाधानों की ज़रूरत है, लेकिन अन्य धर्म उसके पास नहीं; इस्लाम उसे प्रदान करता है। इन तीन कारणों से, logical और rational नजरिये से, इस्लाम ही सही धर्म है। आपने कहा कि पिछले नबी— आपने कहा कि ओल्ड टेस्ट्मेंट के नबियों ने एक ही ईश्वर का दावत दिया और उसी पर विश्वास किया। और आपने कहा कि ईसा ने भी यही बात कही। तो ईसाइयों के अनुसार, उन नबियों का क्या होगा? क्योंकि उन्होंने ईसा पर विश्वास नहीं किया। ईसा उनके बाद आया। तो उन नबियों का क्या होगा?

ईसा, उन पर सलामत हो, से पहले के लोग— उनकी मुक्ति का रास्ता क्या था?

उनका मुक्ति का रास्ता बिल्कुल वैसा ही मुक्ति का रास्ता था, सही विश्वास और अच्छे कर्म करने का। अगर आप से गलती हो जाएं, तो अल्लाह से माफी मांगें। और यह बिलकुल सही लगता है क्योंकि, मूसा, उन पर सलामती हो, की समय के लोग, मूसा के अनुयायी, उन्हें हम मुसलमान कहते हैं। वे अल्लाह के आदेशों का पालन करते थे। तो अरबी में, जो शब्द हम उनके लिए इस्तेमाल करते हैं, वो है "मुस्लिम"। जो कोई मूसा को नबी के तौर पर मानता था, और जो अल्लाह द्वारा दी गई तौरात का पालन करता, और पूरी कोशिश करता है सही रास्ते पर चलने की, और अल्लाह से माफ़ी मांगता है अपनी कमियों के लिए, तो हम कहते हैं कि अल्लाह की रहमत से वह जन्नत पाएगा। मूसा, इब्राहीम, सुलेमान, दाऊद, इस्माइल, इशाक आदि के समय के लोग— सभी नबी। अब, बहुत अहम बात, ईसा के समय में भी, जो कोई ईसा को नबी मानता था, और एक ही ईश्वर की इबादत करता था, और जिसने इंजील का पालन किया, जो वही अल्लाह ने ईसा और उनके शिष्यों को दिया, हम उसे मुसलमान कहते हैं। वे मसीह के अनुयायी, और मुक्ति का तरीका है ईश्वर में आस्था हो, ईसा को नबी मानें, और तौरत या इंजील का पालन करें। बाइबल में एक अद्भुत बात है, सही?

मैं इसे अद्भुत क्यों कहता हूँ? ठीक है, तो एक व्यक्ति को मुसलमान बनने के लिए जैसे कि कोई मस्जिद जाकर कहें— मैंने क़ुरआन पढ़ा है, मैं मुसलमान बनना चाहता हूँ। उसे शहादा पढ़नी होगी आशहदू अल्लाह इलाहा इल्लल्लाह वा अशहदूअन्ना मुहम्मदन रसूलुल्लाह कि मैं गवाही देता हूँ: अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। ईसा के समय, क्या आपको नहीं लगता ये बयान बिल्कुल वैसा ही था? कि ईसा अल्लाह के रसूल हैं, है ना?

कोई ईश्वर नहीं सिवाए अल्लाह का, और ईसा उसके रसूल हैं। आप इसे बाइबल में पाएंगे। तो ईसा कहते हैं, अगर तुम अनंत जीवन चाहते हो, अगर आप जन्नत जाना चाहते हैं, तो जान लो कि सिर्फ वही एक सच्चा ईश्वर है वे ईश्वर की ओर इशारा करते हैं। और ईसा अल्लाह द्वारा भेजा गया रसूल है। वाह! यह शहादा बाइबल में ही मौजूद है और ईसा कह रहे हैं कि यही जन्नत का रास्ता है। इसे जान कर और शहादा बोल कर। क्या पैगंबर मुहम्मद, उन पर सलामती हो Old और New Testament से क़ुरआन की नकल करके लिख नहीं सकते थे?

ठीक है, सवाल ये है कि कई लोगों का आरोप है कि क़ुरआन बाइबल से कॉपी किया गया था। हम कई तरीकों से इसे खारिज कर सकते हैं या इस आरोप को गलत साबित कर सकते हैं। एक बात हम कह सकते हैं: क़ुरआन बाइबल से नहीं ली गई क्योंकि पैगंबर मुहम्मद, उन पर सलामती हो उन्हें पढ़ना-लिखना नहीं आता था। अगर वह लिखना भी चाहते, तो वह बाइबल पढ़ भी नहीं सकते थे, न ही उसकी नकल कर सकते थे। इसलिए क़ुरआन, अध्याय 7, आयत 157 में कहता है— कि वह 'उम्मी' नबी थे, उन्हें पढ़ना-लिखना नहीं आता था। दूसरी बात यह है कि उस समय पूरा बाइबल मौजूद नहीं था जिसका अरबी अनुवाद होता जिस से वह पढ़ कर कॉपी कर सकते। Old Testament का पहला अरबी अनुवाद, करीब वर्ष 900 ईस्वी में पूरा हुआ यह यहूदी विद्वान सदीय्या गाउन ने अनुवाद किया था। तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समय 7वीं सदी में, यहूदी बाइबल का अरबी अनुवाद तक नहीं हुआ था। New Testament का भी 1600s तक अनुवाद नहीं हुआ था। तो पूरा बाइबल अरबी में मौजूद ही नहीं था जिसका नकल करना संभव होता, सही?

इस लिए अरबी में अनुवादित रूप मौजूद ही नहीं था। तीसरी बात यह है कि बाइबल में कुछ हिस्से हैं जो क़ुरआन में नहीं हैं, और क़ुरआन में कुछ ऐसे हैं जो बाइबल में नहीं। मैं इसका क्या मतलब कहना चाहता हूँ?

क़ुरआन में फ़िरौन की कहानी का ज़िक्र है। बाइबल में, फिरौन की कहानी बताई गई है, लेकिन क़ुरआन इस कहानी को पूरी करता है। उदाहरण के तौर पर, बाइबल में book of Exodus, अध्याय 3 में, फिरौन और उसकी फौज मूसा का पीछा कर रहे थे, और फिर वे डूब गए। क़ुरआन में भी यही कहानी है, लेकिन क़ुरआन कहता है कि फिरौन के डूबने के बाद, उसका शरीर लोगों के लिए एक निशानी के रूप में संरक्षित किया जाएगा। और अब हमें फिरौन का शरीर मिल गया है, और लोगों ने उसका पोस्टमार्टम किया और कहा, यह वही फिरौन है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) के समय में था। तो क़ुरआन में ज्यादा जानकारी मौजूद है। अगर पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बाइबल से नकल कर रहे होते, तो वह ज्यादा और सही जानकारी उन्हें किसने दी?

जिसे आज के विद्वानों ने हाल में खोजा है। दूसरा बात: क़ुरआन और किस बारे में बात करता है?

नूह नूह(अलैहिस्सलाम) और बाढ़। बाइबल बाढ़ की बात करता है। क़ुरआन बाढ़ की बात करता है। बाइबल के अनुसार, यह पूरी दुनिया में आई बाढ़ थी। book of Genesis में अध्याय 7, आयत 21 में कहा गया है, पूरी दुनिया पानी में डूब गई थी। केवल नाव में मौजूद लोग ही बचे थे, बाकी सब डूब गए। यह बात Old Testament की book of Genesis में लिखी है, अध्याय 7, आयत 21। क़ुरआन भी बाढ़ की बात करता है, लेकिन वह इसे एक किसी एक जगह पर आने वाली बाढ़ कहता है। केवल वे लोग जो नूह अलैहिस्सलाम का विरोध कर रहे थे, उनकी बातों का मजाक उड़ाते थे और अल्लाह से दूर हो गए थे, उन्हें ही अल्लाह ने सज़ा दी। यह एक सीमित जगह में आई बाढ़ थी। अब आपके पास बाइबल और क़ुरआन दोनों की कहानी है। अब आर्किलोजिस्ट क़ुरआन की कहानी को सही मानते हैं। विज्ञान भी क़ुरआन की बात को सपोर्ट करता है, सही?

तीसरा सवाल: वह ज्यादा जानकारी पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को किसने दी? तीसरी बात यह है कि क़ुरआन में वैज्ञानिक तथ्य है। 500 से भी ज़्यादा वैज्ञानिक तथ्य हैं, और कोई गलती नहीं। बाइबल में यह नहीं हैं, लेकिन क़ुरआन में हैं। तो अगर क़ुरआन ने बाइबल से नकल की होती, तो क़ुरआन में जो ज्यादा वैज्ञानिक तथ्य हैं, वो किसने दिए? तो यह एक और कारण है, सही? अब एक आसान उदाहरण लेते हैं — मान लीजिए दो छात्र हैं। एक है डेविड जिसे D ग्रेड मिला, दूसरा है बिल जिसे B ग्रेड मिला। आसान है, सही? मान लीजिए अंतिम परीक्षा में डेविड, बिल के बगल में बैठा है और वह बिल के सारे जवाबों की नकल कर रहा है। बिल को B ग्रेड मिलता है, यानी 80% अंक। आपको क्या लगता है डेविड को क्या मिलेगा?

वह सारे जवाब बिल्कुल वैसे ही नकल कर रहा है। तो उसे भी B ग्रेड ही मिलेगा, सही? क्योंकि डेविड सिर्फ़ सही जवाब ही नहीं, बल्कि बिल की गलतियाँ भी नकल कर रहा है। तो अगर क़ुरआन ने बाइबल की नकल की होती, तो क़ुरआन में भी बाइबल की ग़लतियाँ होतीं, बाइबल की ग़लतियाँ और एक-दूसरे से टकराने वाली बातें भी होते, लेकिन ऐसा नहीं है क़ुरआन में कोई गलती नहीं है, जबकि बाइबल में बहुत सी हैं। तो फिर सही बातें किसने लीं? सही जानकारी किसने जोड़ी? अब विज्ञान भी इसे साबित कर चुका है। इसलिए हम कहते हैं कि वैज्ञानिक, आर्किलोजिस्ट, धार्मिक, और ऐतिहासिक नजरिये से, क़ुरआन स्वतंत्र रूप से आया है, यह बाइबल की नकल नहीं है, सही? लेकिन कुछ लोग कह सकते हैं, पता है क्या?

क़ुरआन और बाइबल में कुछ समानताएँ हैं। इसलिए लोग कहते हैं कि यह नकल है। मैं उन्हें यह कहता हूँ — बाइबल और क़ुरआन दोनों एक ही तरफ से आए हैं — अल्लाह की तरफ से । लेकिन बाइबल में बदलाव किए गए हैं, कुछ असली बातें अभी भी बची हुई हैं। फिर अल्लाह ने अंतिम वही भेजी। और उसमें कुछ बातें बाइबल जैसी भी हैं। इसका मतलब ये नहीं कि एक किताब ने दूसरी की नकल की, बल्कि दोनों का स्रोत एक ही है। आइए, इसे एक logical conclusion तक ले चलते हैं, सही? अगर लोग कहते हैं कि क़ुरआन ने बाइबल की नकल की है तो फिर कहा जा सकता है कि न्यु टेस्ट्मेंट भी ओल्ड टेस्ट्मेंट से मिलता है, तो क्या ईसाई मानते हैं कि ईसाई लेखकों ने यहूदी लेखकों से नकल की? क्या उन्होंने यहूदियों की किताब चुरा ली? हम वहीं क्यों रुक जाएं?

ओल्ड टेस्ट्मेंट हिंदू वेदों से भी मिलता है। तो क्या हम कहें कि ओल्ड टेस्ट्मेंट के लेखकों ने हिंदूओं से नकल की? वहीं क्यों रुकें? हिंदू वेद भी Babylonian scriptures से मिलते हैं। तो आप देख रहे हैं, ये सिलसिला कहाँ रुकेगा? हम बस इतना कह सकते हैं कि क़ुरआन अलग से, उसी स्रोत — अल्लाह की तरफ से आया है, और बाइबल में जो कुछ सही बातें हैं, वो भी अल्लाह की तरफ ही से आई हैं क्योंकि स्रोत एक ही है, इसलिए समानताएँ दिखती हैं। ना कि इसलिए कि एक व्यक्ति ने दूसरे से नकल की। सदियों से यहूदी, मसीहा के आने का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन जब ईसा (अलै.) आए, तो उन्होंने इनकार कर दिया।.

और उनकी किताबों में भी पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने की बात लिखी है लेकिन जब ईसाई मुहम्मद(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नहीं मानते, तो क्या वे भी यहूदियों की तरह व्यवहार नहीं कर रहे? हाँ, कुछ समानताएँ ज़रूर हैं। ईसाई क्यों मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का क्यों इंकार कर रहे हैं, और यहूदियों ने सिर्फ ईसा (अलैहिस्सलाम) को ही नहीं बल्कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भी नहीं माना। आप जानते हैं, यहूदी विद्वान मसीहा के लिए कुछ विशेष गुण ढूंढते हैं। मसीहा राजा दाऊद की तरह होगा। मसीहा एक फौजी नेता जैसा होगा। मसीहा सेना के साथ राज करेगा, सही?

एक बहुत बड़े साम्राज्य के साथ। तो जब उन्होंने ईसा (अलैहिस्सलाम) को देखा, जो दिखने में कमज़ोर थे, लोगों ने उनका मजाक उड़ाया, उन्हें ठुकरा दिया, उनके पास कोई सेना नहीं थी। तो उनके दिमाग में यह था कि ये मसीहा नहीं हो सकते क्योंकि उनकी किताबों में लिखा है कि मसीहा में ये गुण होने चाहिए। इसलिए उन्होंने ईसा अलैहिस्सलाम को नहीं माना। अब वे यहूदी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भी नहीं मानते, क्योंकि कभी-कभी घमंड की वजह से। वे शायद सोच रहे हैं, सारे नबी इसहाक (अलैहिस्सलाम) की वंशज से थे, और वे सोचते थे कि वे चुनी हुई क़ौम हैं। उन्हें किताबें दी गईं, नबियों का सिलसिला दिया गया, वे लोगों में सबसे बेहतर थे। लेकिन जब उन्होंने मोहम्मद को देखा, उन पर सलामती हो, वह इस्माइल (अलैहि सलाम) की वंशज से थे, अरबी वंश से इस्माइल (अलैहि सलाम) की वंशज से। तो उनके घमंड के कारण, अफसोस, उन्होंने इनकार कर दिया। हालाँकि उन्होंने अपनी ही किताबों में निशानी देखे थे। वैसे कुछ यहूदी क़ुबूल किए थे, लेकिन आम तौर पर उन्होंने नकार दिया। जैसे उन्होंने ईसा को नकारा था, उन पर सलामती हो। अब, ईसाई मोहम्मद को नकारते हैं, उन पर सलामती हो, क्योंकि उनके अनुसार, बाइबल पूरा हो चुका है, यह कहानी खत्म है। उनके हिसाब से मुक्ति पहले से ही मिल चुका है। ईसा आए, मरे, और यही कहानी का अंत है। कोई नया व्यक्ति या नया राह दिखाने वाला नहीं आना चाहिए, बाइबल के मार्गदर्शन में कुछ जोड़ने के लिए। इसलिए वे कहते हैं बाइबल ही काफी है, ईसा ही काफी हैं। मार्गदर्शन काफी है, तो किसी नए रसूल की जरूरत नहीं। या किसी नए नबी की। इसीलिए वे पैगंबर मोहम्मद सलल्लाहु अलैहि वसल्लम को नहीं मानते। लेकिन जैसा कि हमने पहले कहा, कई निशानियाँ हैं, ओल्ड और न्यु टेस्ट्मेंट में बहुत सी निशानियाँ मौजूद हैं पैगंबर मोहम्मद सलल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में भविष्यवाणियाँ। तो अगर कोई सच्चा यहूदी या सच्चा ईसाई इन भविष्यवाणियों को देखे, उन्हें शानदार निशानियाँ मिलेंगे मोहम्मद सलल्लाहु अलैहि वसल्लम की शख्सियत में, और वह राह जो अल्लाह ने उन्हें दिया तौहीद में जो अल्लाह ने उन्हें दी। इनशाल्लाह अगर वे सच्चे और ईमानदार हैं, तो वे उन्हें भी एक नबी के रूप में मान लेंगे। और इस्लाम धर्म को अपनाएंगे जो अल्लाह ने दिया। आखिर में, हो सकता है कोई ईसाई देख रहा हो और कहे, इस्लाम समझ आता है, लेकिन मैं ईसा को नहीं छोड़ना चाहता। मैं ईसा से मुहब्बत रखता हूँ, लेकिन मैं ईसा को नहीं छोड़ना चाहता। अगर मैं मुस्लिम बन जाऊं, तो मेरा ईसा से जुड़ाव और रिश्ता क्या होगा?

अगर कोई ईसाई कहता है, जानते हैं क्या? इस्लाम अच्छा है, ठीक लगता है, लेकिन क्या मुझे ईसा को छोड़ना पड़ेगा? मैं ईसा से प्यार करता हूँ। मैं कहूँगा कि अपने साथ ईसा को लाओ और उसमें और अच्छाई जोड़ो। तो आपको ईसा को छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। अब आप ईसा को वैसे ले रहे हो जैसे वो सच में थे। वो एक महान नबी थे। बाइबल में कई बार लिखा है कि वो एक महान नबी थे, सही? मैथ्यू 13:57, जोन 4:44, मार्क 6:4, ल्युक 13:33 । अगर आप ईसा से प्यार करते हैं, तो वही करें जो उन्होंने कहा। वो एक ईश्वर को मानने वाले थे, आप भी यही साथ लाएंगे, सही?

और आप ये भी साथ लाएंगे कि ईसा एक नबी थे, क़ुरआन भी यही कहती है, और आप ईसा का पहनावा भी साथ लाएंगे। वो दाढ़ी रखते थे और सादा कपड़े पहनते थे। आप साथ लाएंगे वो तरीका जिसमें ईसा अपने शिष्यों से "आप पर सलामती हो" कहते थे। मुसलमान भी यही कहते हैं, आप इसे साथ लाएंगे। आप ये भी लाएंगे कि ईसा ने 40 दिन और 40 रात रोजे रखे थे, जैसे मुसलमान रोजे रखते हैं, आप यह भी साथ ला सकते हैं। और सबसे अच्छा जो आप ला सकते वो ईसा जिस तरह इबादत करते थे, वो सजदा करते थे और ईश्वर से दुआ करते थे। वो हमेशा ईश्वर पर निर्भर रहते थे। आप वो भी साथ लाएँ, क्योंकि मुसलमान भी वही कर रहे हैं। तो आप ईसा को खो नहीं रहे, बल्कि और कुछ बेहतर जोड़ रहे हैं, कुछ और बेहतर, कुछ जो creator ने दिया है। ईसा अलैहि सलाम ने कभी शराब नहीं पी, कभी सूअर का मांस नहीं खाया, कभी खून नहीं पिया, न ही उसका सेवन किया, क्योंकि वो ईश्वर के आदेश को मानने वाले थे, क्या कहें, एक मुसलमान, एक नबी, वो आदेशों का माना करते थे जो दिए गए थे, जो राह ईश्वर ने मूसा (अलेहिसलाम) को दिखाया था Old Testament में लिखा है की सुअर का मांस मत खाओ book of Leviticus में, ओल्ड टेस्ट्मेंट में, खून मत खाओ, और भी कई आदेश वहाँ दिए हैं। और ईसा ने ईश्वर के पैग़म्बर के रूप में कहा, उन्होंने New Testament में, first gospel में कहा, Gospel of Matthew, अध्याय 5, आयत 17 और आगे, मैं कानून या नबियों को मिटाने नहीं आया, बल्कि उन्हें पूरा करने आया हूँ। जो कोई ओल्ड टेस्ट्मेंट के कानून का कोई भी हिस्सा हटाएगा, ऐसा व्यक्ति जन्नत में सबसे नीचे दर्जे में होगा। लेकिन जो कोई इन नियमों को निभाता है, वह जन्नत में सबसे ऊपर होगा। और उनमें से एक नियम है “ सुअर का मांस मत खाओ ” ख़ून मत पिओ, सही?

और जो शरीयत के नियम है जो हम पालन करते है। ‘हलाल क़ानून’ अगर आप ईशा से प्यार करते है, तो आप उन चीज़ों को छोड़ देंगे। क्यूंकि मुसलमानों ने भी उन्हें छोड़ दिया है। अगर आप ईशा से प्यार करते है, तो उनके अध्यन का पालन कीजिय। ईशा का धर्म इस्लाम था। और हम आपको इस्लाम में स्वागत करते है, जो आप और पूरी मानवता के लिय भेजा गया है। उसी में है मुक्ति,और उसी में है आपके लिए भलाई। जज़कलल्लाहू ख़ैर आपके जवाबों के लिए धन्यवाद। भाई साबिर अहमद तो इस्लाम में औरतों के बारे मैं, शरीयत, ज़िहाद वग़ैहरा हमारे पास और भी बहुत से सवाल है, जो ईसाई अक्सर इस्लाम के बारे मैं पूछते हैं और ये सब अगले वीडियो में होंगे, इंशाल्लाह देखते है क्या डॉ साबिर अहमद दोबारा इतने अच्छे से जवाब दे पाएंगे। तो तब तक हमारे साथ बने रहिए। और सब्सक्राइब करना ना भूलिए। अस्सालवालैकुम