Towards Eternity
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दोस्त का चाकू, मौत का मंज़र और इस्लाम का रास्ता: भाई ऐमन की कहानी

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मैं काम से लौटा रहा था, तभी में एक दोस्त से मिला। पर कुछ ही मिनटों बाद, जब मैं आगे बढ़ा, उसने मेरी पीठ में चाकू मार दिया। वो चाकू मेरे पेट के आर-पार हो गया। मैं उससे लड़ने के लिए पीछे पलटा, पर मुझमें जान नहीं बची थी, क्योंकि खून बहुत बह गया था। जब मैं अस्पताल पहुँचा, तो डॉक्टर ने कहा कि, "हम तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन तुम नहीं बच पा रहे हो। हम मशीन से झटके दे रहे हैं। जान बच नहीं रही।" फिर डॉक्टर ने घड़ी देखी और कहा, "मौत का वक्त।" वल्लाही, उसने मेरे चेहरे पर चादर डाल दी थी। उसके कमरे से निकने से ठीक पहले, मशीन फिर चल पड़ी। बीप, बीप, बीप। मुझे याद है जब मैं जेल में था। माँ मुझसे मिलने आई थीं। और मैंने अपनी माँ से कहा, "अब आप मुझसे कभी दोबारा मिलने मत आना।" "ये क्या कह रहे हो ऐमन?

मैं तुम्हारी माँ हूँ। मुझे यहाँ आने से मत रोको!" मुझे याद है उस दिन मेरी बहन का फोन आया था। उसने कहा - ऐमन, माँ की हालत ठीक नहीं है! मुझे मेरे भाई के फोन आ रहे थे। "ऐमन, मैं ये बात सिर्फ एक बार कहूँगा और आखिरी बार..." और कुछ ही पलों में, मैं खुद पर काबू नहीं रख पाया! अस्सलामु अलैकुम भाई ऐमन। -व अलैकुम अस्सलाम। टुवर्ड्स इटरनिटी में हमारे साथ आने का बहुत शुक्रिया। आपको यहाँ पकड़ बहुत खुश है। तो शुरू करे ऐमन भाई कौन हैं, अपनी ज़िंदगी के बारे में बताए?

मैं इराक से हूँ, और 9/11 हादसे बाद से ज़िंदगी मुश्किल थी। उसके बाद जुर्म की राह चुनी, जेल गया, बाहर आया, चाकू लगा, पर फिर भी मेरे लिए एक उम्मीद बची थी। फिर मैंने अपना रास्ता बदला और अल्लाह की तरफ लौट आया। और अब, मैं बस नौजवानों को बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करना चाहता हूँ। मैं अपने parents के प्रति बहुत अच्छा था। मैं हमेशा पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ता था, कोई मुश्किल नहीं थी। मैं अपने पैरेंट्स की इज़्ज़त करता था। वे मुझसे प्यार करते थे, और उम्मीद है अब भी करते हैं। पर गली-मोहल्लों की बातों से आपको खुद ही निपटना पड़ता है। और ये लंदन की गलियाँ थीं। अंग्रेजी न बोलने की वजह से तंग किया जाता था, 9/11 की वजह से मुझ पर हमले होते थे। और फिर इन सब के बीच, मैं चौदह या पंद्रह साल का था, जब मुसीबतें शुरू हुईं। और ये बहुत बड़ी मुसीबतें थीं, कोई छोटे-मोटे जुर्म नहीं थे। हर वक्त बस लड़ाई-झगड़े। और वक्त के साथ हम इन हालात में फंसते चले गए, आपको पता ही है कि ग्यारह सितंबर को क्या हुआ था। तो मैं और मेरा भाई कभी किसी गैंग का हिस्सा नहीं रहे। हम उन लोगों में से नहीं थे जो बाहर जाकर नाम कमाने या मशहूर होने की कोशिश करते। और मैं ऐसे इलाके से आता हूँ जहाँ हर गली और हर इमारत में कोई न कोई गैंग वाला मिल जाता था, और हम उनके बीच में थे। हम पर वो भी हमला करने आते थे जिनसे हमारी कोई दुश्मनी नहीं थी। बस एक के बाद एक जंग चलती। हर दिन एक नयी लड़ाई थी। कभी तो पता भी नहीं चलता था कि दुश्मन कहाँ से आ जाएंगे। तो हम अपना बचाव करते थे। इसी चक्कर में पुलिस हमें पकड़ लेती, हम जेल जाते और फिर इससे सीखते। वो लम्हे कैसे थे, जब आपने सोचा हो, “रुको, मैं ये क्या कर रहे हो?” या वो दिन जब आपकी ज़िंदगी में बदलाव शुरू हुआ?

मुझे याद है जब मैं दो साल से ज्यादा वक्त तक जेल में रहा, उसी दौरान एक दिन मैंने अपनी माँ को जेल में आते देखा। तब मुझे जेल में एक साल हो चुका था। तब तक मैंने माँ को देखा नहीं था, बस फोन पर बात होती थी। तो मेरी माँ जेल में आईं, और मुझे याद है उन्होंने हिजाब और अबाया पहना था, एक इबादतगुज़ार औरत, अल्लाह से डरने वाली औरत की तरह। वे वहां ऐसे खड़ी थीं... और उनकी तलाशी ली जा रही थी। पुलिस वाले उनकी जाँच कर रहे थे। उस पल जब मैंने अपनी माँ को देखा और फिर जब वो मुझसे मिलने आईं, मैं न गले लगा सका, न चूम सका, क्योंकि बीच में शीशे की दीवार थी। मैं अपनी माँ की खुशबू तक महसूस नहीं कर पाया। और मुझे अपनी माँ को रोते हुए देखना याद है। वो पल...

वो बदलाव, वो मेरे लिए बदलाव का पल था जब मैंने खुद से कहा कि, "जब मैं जेल से बाहर आऊँगा, तो अपने parents का सिर फख्र से ऊँचा करूँगा। कोई काम ढूँढूँगा। अच्छा बेटा बनूँगा। ताकि उन्हें फ़ख़्र हो। मैं नौकरी करूँगा, मेहनत करूँगा, उन्हें पैसे दूँगा, और अपनी इस्लामिक स्टडीज़ को गंभीरता से लूँगा।" मैंने अपनी माँ से कहा, "अब आप दोबारा कभी मुझसे मिलने मत आना। मैं आपको यहाँ इस हाल में नहीं देख सकता। मुझसे नहीं होगा।" मुझे आज भी उनका चेहरा याद है, माँ मुझसे कह रही थीं, "तुम...

ये क्या कह रहे हो ऐमन?" "मैं तुम्हारी माँ हूँ। मुझे यहाँ आने से मत रोको। मैं आऊंगी, मैं तो आऊंगी।" मैंने कहा, "नहीं माँ।" जितनी बार वे कोशिश करतीं, मैं मुलाक़ात रद्द कर देता। जब वो चली गईं, तो मैं वापस अपनी कोठरी में गया, और अल्लाह के सामने रोने लगा। "ए मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे। मैं माफी चाहता हूँ। मैंने अपने parents को दुख दिया। मैं शर्मिंदा हूँ। तेरी नाफरमानी करने के लिए माफी माँगता हूँ, चीजों को अपने हाथ में लेने के लिए। मुझे माफ़ करे बदले की भावना के लिए मैं शर्मिंदा हूँ, अपनी चाहतों के पीछे चलने के लिए ।" मैं एक बेटा हूँ, मुझे अपनी माँ की याद आ रही थी। मुझे उनका गले लगाना, उनका खाना, उनकी दुआएं... सब याद आ रही थी। जब वे मेरे कमरे के पास से गुज़रती, कहती "ऐमन, गुड नाईट।" आप समझ रहे हैं न?

मैं उस कोठरी में था। मैंने फिर से वुज़ू किया, दो रकात नमाज़ पढ़ी, और कहा, "तौबा ए मेरे रब, माफ़ कर। उन लोगों के लिए माफ़ी माँगता हूँ जिन्हें मैंने चोट पहुँचाई। और बड़ी माफ़ी अपने parents का दिल दुखाने के लिए। उनका मुझसे जेल में मिलने आना ठीक नहीं है। उन्होंने एक अच्छे बेटे की परवरिश की, जो मैं हूँ। पर बस मुझे 'ना' कहना नहीं आता था।" कभी-कभी जब आप अल्लाह से बात करते हैं ना, तो कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वो ही खामोश दुआ जो आप अल्लाह से करते हैं, वही सबसे ऊँची हो जाती है। उस वक्त हालात कुछ ऐसे थे, वो खामोश दुआ जो सिर्फ आपके और अल्लाह के बीच होती है, वही सबसे ज्यादा सुनी जाती है। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती। अल्लाह सब जानता है। जिस दिन हम आख़िरकार मिले, मुझे याद है मैं अपने, अपने बड़े भाई के साथ था जो मुझे लेने आए थे। मेरे बड़े भाई जब मुझे लेने आए, तो माँ को पता नहीं था, मेरे parents को खबर तक नहीं थी। मैं जेल से निकला और अपना साइन करने के लिए सीधे प्रोबैशन गया। वहां से हम सीधा घर पहुँचे। वे जुमे की नमाज़ पढ़कर घर लौटे थे। जुमा की नमाज़ पूरी हो चुकी थी। जब वे घर आए, तो मैंने उन्हें सरप्राइज दिया!

फिर मेरे माँ-बाप रोने लगे, हम सब गले मिले, माँ ने खाना बनाया और वो, बस सब कुछ कमाल का था। मुझे याद है मैंने बामिया और डोलमा खाया था। वो मेरी ज़िंदगी का बेहतरीन खाना था। आप उस दिन के बारे में बता सकते हैं जब आप पर हमला हुआ?

शायद आपको चाकू मारा गया। तो मुझे दो अलग-अलग मौकों पर चाकू मारे गए थे। पहली बात थी, कोई दो मई दो हज़ार चौदह की। जब मैं जेल से बाहर आया था और डॉक्टर के पास जा रहा था, तभी मेरी मुलाक़ात एक ऐसे शख्स से हुई जिससे मेरी अनबन थी। वो एक गैंग में था। और जब वहाँ ट्रेन आई और वो स्टेशन से जाने लगा, चूँकि ट्रेन से निकल रहा था। उसने किसी और को चाकू दिया, वो मेरे पास आया और मेरे पैर में चाकू मार दिया। वो पहला जख्म था। दूसरी बार, कुछ महीने बाद अगस्त में, एक दोस्त ने ही चाकू मारा। मैं काम से घर आ रहा था, तभी एक दोस्त दिखा। मैं उसके पास गया, हम आमने-सामने थे। जैसे ही हम मिले, हम बातें करने लगे। पर कुछ मिनटों बाद, जैसे ही मैं पलटा, उसने मेरी पीठ पर चाकू मार दिया। और वो चाकू मेरे पेट से पार निकल गया। वो एक बड़ा चाकू था। उसने वार किया और फिर मैं उसका मुकाबला करने के लिए पलटा, पर मैं कमज़ोर पड़ गया था क्योंकि मेरा बहुत खून बह गया था। वो चाकू बहुत बड़ा था और उसमें छोटे-छोटे बहुत सारे नुकीले कांटे थे। तो जब वो अंदर जाता है, तो आसानी से चला जाता है, पर जब वो बाहर खिंचता है, तो उन कांटों की वजह से, वो आपके जिस्म के अंदरूनी हिस्सों को चीरकर बाहर लाता है। फिर वो भाग गया, और मैं एक दुकान में गया और कहा, "मेरी मदद करो, मुझे चाकू लगा है," और मैं फर्श पर गिर गया। जब मैं अस्पताल पहुँचा, तो डॉक्टर ने मेरा ऑपरेशन करने से पहले, कहा कि, "जब हमें लग रहा था कि तुम ठीक हो जाओगे," तभी अचानक, "तुम्हारे दिल की धड़कन रुक गई थी। हम तुम्हें फौरन ऑपरेशन थिएटर में ले गए। तुम्हें बचाने की पूरी कोशिश कर रहे थे। साँसें नहीं लौट रही थीं। मशीन से झटके दिए। लेकिन जान बच नहीं पा रही थी।" फिर डॉक्टर ने वक्त देखा और कहा, "मौत का समय।" वल्लाही, उन्होंने मेरे चेहरे पर चादर डाल दी थी। और वो कमरे से बाहर जाने ही वाले थे ताकि मेरे घर वालों को बता सके, मेरे माँ-पिता, भाई और दोस्तों को खबर दे सके कि ऐमन गुज़र गया है, वो मर गया है। उनके बाहर कदम रखने से पहले ही, मशीन में हरकत हुई। बीप, बीप, बीप। ये अल्लाह सुबहानहु व तआला की रहमत है। ये साबित करती है कि इस दुनिया की कोई भी मशीन, इंसान को दोबारा ज़िंदा नहीं कर सकती। वो सिर्फ अल्लाह है जो ज़िंदगी देता है। और वो डॉक्टर न मुसलमान था, न ईसाई, वो खुदा को नहीं मानते थे। लेकिन इस हादसे ने उनकी आँखें खोल दीं। जी हाँ!

उन्होंने कहा, "मैंने अपने चालीस साल की डॉक्टरी में ऐसा चमत्कार नहीं देखा।" वे मेरी माँ और छोटी बहन को लेकर अस्पताल पहुँचे। अठारह घंटों के लंबे ऑपरेशन के बाद, मैं नौ दिनों तक मशीन के सहारे मौत और ज़िंदगी के बीच रहा। जब मुझे होश आया, तो मैं घबरा गया। मुझे याद है जागते ही मैंने नर्स से कहा, "डॉक्टर को जल्दी बुलाओ, वे मेरे पेट पर कुछ भूल गए हैं!

ये क्या लगा रखा है?" तब उन्होंने मुझसे कहा, "ऐमन, फिलहाल तुम्हें कुछ वक्त इसी के साथ जीना होगा, और फिर हम देखेंगे कि हम इसे ठीक कर सकते हैं या नहीं।" तो अभी मैं अपने पेट पर एक थैला लेकर जीता हूँ। यहीं पर, मेरे पेट पर एक बैग लगा है, जिसका मतलब है कि मैं टॉयलेट जाकर शौच नहीं कर सकता। और मुझे बहुत दर्द होता है। मैं हर पल दर्द में रहता हूँ। चौबीसों घंटे। अभी भी मुझे दर्द हो रहा है। पर अब मेरे शरीर को इसकी आदत हो गई है, इसलिए मैं लोगों को अपना हाल दिखाए बिना इसे बर्दाश्त करना सीख गया हूँ। मैं बहुत मज़ाक करता हूँ, हँसता हूँ, हंसी-मज़ाक करता हूँ। ये सब बस अपना दर्द भुलाने के लिए है। और उस हमले के कुछ समय बाद, मेरा अपहरण कर लिया गया। कुछ दुश्मनों ने मेरा अपहरण कर लिया था। और उन्होंने मुझे जो तकलीफें दीं, मुझ पर जो ज़ुल्म किए, उसकी वजह से मेरे पेट का बड़ा हिस्सा निकालना पड़ा, मेरी आंतें भी निकालनी पड़ीं। और इसी वजह से डॉक्टर ने कहा, "अब ये तुम्हारे साथ हमेशा के लिए है।" तभी डॉक्टर ने ये भी बताया, गहरी चोट की वजह से मैं अब कभी पिता नहीं बन सकूंगा, वो मेरा इम्तिहान ले रहा था। मैंने उन्हें छोड़ दिया। उन्हें छोड़ दिया। हालांकि मैं उन्हें अच्छी तरह जानता था। मुझे पता था उन तक कैसे पहुँचना है। मुझे उनके घर पता थे। मुझे पता था वे कहाँ घूमते-फिरते हैं, मुझे तो ये भी पता था कि उनकी माँ कौन सी गाड़ी चलाती है!

मैंने सब अल्लाह पर छोड़ दिया। हम दोस्त थे। एक ही स्कूल में पढ़ते थे। और सच है, उससे जितनी नफरत है, जितना मैं उसे चोट पहुँचाना चाहता हूँ पर इस्लाम में बदला लेना सही नहीं है.. लेकिन मिसाल के तौर पर, अगर अल्लाह उसे इस्लाम की राह पर ले आए, तो मैं उसे गले लगा लूँगा। बिल्कुल अपने भाई की तरह, क्योंकि इस्लाम कहता है, अपने आपसी झगड़े खत्म कर दो। मेरे कुछ दुश्मन थे, पर अब वे मेरे दोस्त हैं। वे मेरे भाई हैं। क्यों?

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह। दीन आपको आगे करता है। हमें आपके खून या रंग से कोई मतलब नहीं है। चाहे आप काले हों, गोरे हों, नीले हों या हरे। हम मुसलमान हैं, और इस्लाम हमें जोड़ता है। मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूँ जिससे मेरी दुश्मनी थी, हम जानी दुश्मन थे। पर जैसे ही वो मुसलमान हुआ, उसने मुझसे बात की। वल्लाहिल अज़ीम उसने मुझसे बात की, "अस्सलामु अलैकुम ऐमन, तुम्हें ये बताना था कि मैं मुसलमान हो गया हूँ। तुमसे मिलकर खुशी होगी।" मैं मन सोचा, "ये आदमी झूठा है। जिसने मुझे पहली बार चाकू मारा था, उसने भी यही कहा था कि वो मुसलमान है। पता नहीं! पर आज हम बहुत अच्छे दोस्त हैं। क्या आप अपनी माँ के आखिरी दिनों और उनके इंतकाल के बारे में बता सकते हैं, अगर ये कोई निजी बात न हो तो?

मुझे याद है वो साल दो हज़ार बाईस था। मेरी माँ और मेरे दो भाई, वे पहले मदीना गए और फिर मक्का। मुझे याद है उस दिन मेरी बहन का फोन आया था। कह रही थी, "ऐमन, माँ की तबीयत ठीक नहीं है। दुआ करना।" मैंने कहा "देखो, मैं अभी एक तक़रीर करने मस्जिद जा रहा हूँ, मैं तुमसे बाद में बात करूँगा। पर मैं दुआ ज़रूर करूँगा।" तो जब मैं खुतबा दे रहा था, तब मुझे अपने पापा के फोन आने लगे। फिर मेरी बीवी का फोन आने लगा। फिर मेरी बहन का। फिर मेरी बड़ी बहन का फोन आया। सब मुझे कॉल कर रहे थे। मेरा दिमाग़ समझ रहा था, पर मेरा दिल ये मानने को तैयार नहीं था। वे मुझे खबर देने के लिए फोन कर रहे थे। मेरी माँ मक्का गई थीं, वो उमराह कर रही थीं, और उमराह के दौरानउनकी मौत हो गई। फिर मुझे याद है मैंने अपने भाई का फोन उठाया जो उनके साथ वहां मौजूद था। इस उम्मीद में कि कुछ अच्छी खबर होगी। अल्हम्दुलिल्लाह। मेरे भाई ने वीडियो कॉल किया। वीडियो कॉल क्यों!

शायद माँ को दिखाने के लिए, है न? मुझे अपने भाई का चेहरा याद है। उसने कहा, "ऐमन, मैं ये बात सिर्फ एक बार कहूँगा और आखिरी बार... हमारी माँ... अल्लाह के पास लौट गई हैं।" और फिर उसने फोन काट दिया। ये सब खुतबे के दौरान हुआ, जिसकी रिकॉर्डिंग हो रही थी... और मुझे याद है, मैंने सोचा, मैं खुश हूँ कि वो पूरा वीडियो बाहर नहीं आया क्योंकि कुछ ही seconds बाद मैं... कैसे कहूँ...... मैं खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था। अल्हम्दुलिल्लाह, लेकिन वो एक बहुत अच्छी ख़ातून थीं। पहली बार मक्का गई थीं। पहली बार उमराह कर रही थीं। पहली बार। वो जितने दिन मक्का और मदीना में रहीं, मेरी उनसे बात नहीं हो पाई थी। उससे एक दिन पहले...

उनके वापस आने से एक दिन पहले, से एक दिन पहले, उन्होंने मुझे एक वॉइस नोट भेजा। "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातुहू ऐमन..." उन्होंने कहा, "ऐमन, मैं जल्दी वापस आ रही हूँ, मुझे इसके लिए नाप बता दो, ताकि मैं तुम्हारे लिए वो साथ ला सकूँ।" ये उनकी मुझसे आखिरी बात थी। या रब। अल्हम्दुलिल्लाह। उनकी मौत के आठ-नौ महीने बाद, मुझे याद है वो मेरे सपने में आईं, बोलीं, "ऐमन, क्या तुम मुझे भूल गए हो?" मैं उनके जितना करीब जाता, वो मुझसे और दूर होती जाती। मैं उनका चेहरा नहीं देख पा रहा था। चेहरे पर बस रोशनी थी। मैं कुछ नहीं देख पा रहा था। पर मैं उनकी तरफ भागने की कोशिश कर रहा था, और वे बस पीछे हटती जा रही थीं। आपको पता है मुझे किस बात का एहसास हुआ?

मैं कभी-कभी उनके लिए दुआ करना भूल जाता हूँ। इसीलिए वे मेरे सपने में आईं, "ऐमन, क्या तुम मुझे भूल गए?" -सुबहानअल्लाह। वल्लाही एक वक्त ऐसा आएगा जब आप तरसेंगे कि काश आपके माँ या पिता का एक फोन आ जाए, बस ये कहने के लिए, "जी माँ। जी पापा, आपको क्या चाहिए? जहाँ कहेंगे, वहां चला जाऊँगा। आपको क्या लाकर देना है? माँ, किस दुकान पर जाना है? बस मुझे बता दीजिए। मैं अभी जाकर ले आऊंगा।" पर, मुझे अब कोई फोन नहीं आएगा। माँ गईं। आदर करो, अपने parents का आदर करो। क़ुरआन में लिखा है कि तुम अपने parents को 'उफ़' भी नहीं कह सकते। मैंने सुना है कि आपकी शादी काफी कम उम्र में हो गई थी। आपकी अपनी पत्नी से मुलाक़ात कैसे हुई, और वो सब कैसा रहा? पत्नी का साथ होना और उस पुरानी सोच से बाहर निकलना, जहाँ हम रहते हैं...

हम कुर्दिश इराकी लोग हैं। वे चाहते हैं कि आप अपनों में ही शादी करें। लेकिन मैंने अपने से बिलकुल अलग इंसान से शादी की। तो क्या मेरे माँ-पिता इससे खुश थे, हाँ, उनमे से एक खुश थे। क्योंकि वे बस मेरी खुशी चाहते थे। दूसरे ने इसे कुबूल नहीं किया, पर ये उनके लिए नहीं था। मैं जो भी कर रहा हूँ वो इस्लाम के हिसाब से सही है। आप मुझे मना नहीं कर सकते। आपको इस्लाम के मुताबिक बताना होगा कि मैं इस इंसान से शादी क्यों नहीं कर सकता। अल्हम्दुलिल्लाह मेरी शादी हो गई। मैंने उसे एक ऐसे मौके की तरह लिया कि इंशाअल्लाह, एक ऐसे बच्चे की परवरिश करना जो मेरा नहीं है, मेरे लिए सदका होगा। मुझे बताया गया था कि मैं कभी पिता नहीं बन सकता, और अल्लाह ने एक ऐसी औरत के ज़रिए रास्ता खोल दिया जिसका पहले से एक बच्चा है...

अल्लाह, तूने ये मेरे लिए चुना है। तूने ये मेरे लिए चुना है, तो मैं इसे कुबूल करता हूँ। बस यही है। मुझे एक परिवार की ज़रूरत थी। और अल्लाह ने मुझे वो दे दिया। सच कहूँ तो शुरुआत में सौतेला पिता बनना बहुत मुश्किल था। और मुझे "सौतेला पिता" शब्द पसंद नहीं है। बल्कि मुझे ये कहना अच्छा लगता है, "मैं वो पिता हूँ जो उस बच्चे के लिए आगे बढ़ा।" ये सौतेलापन नहीं है, आप समझ रहे हैं न? मैंने वो किया जो दूसरा आदमी नहीं कर सका, और मैं इसके लिए शुक्रगुज़ार हूँ, खुश हूँ। भाई ऐमन का अबत क सबसे बुरा फैसला? जेल जाना। इस बात का मुझे अफ़सोस है। और सबसे अच्छा फैसला? सबसे अच्छा शादी। हाँ शादी करना। अल्हम्दुलिल्लाह। भाई ऐमन को मिली अब तक की सबसे अच्छी और बुरी कमेंट?

मुझे याद है एक आदमी मुझसे एक कैफे में मिला। उसने आकर मुझे गले लगाया और कहा, "भाई, आपको बताना चाहता हूँ कि मेरी बारह साल की बेटी ने आपकी वजह से हिजाब पहनना शुरू कर दिया है।" इस बात ने मुझे खुशी दी। वो बोले, "पर मैं सिर्फ इसलिए ये नहीं बता रहा।" मतलब ये तो सबसे छोटी बात है। उन्होंने कहा, "बेटी को देखकर मेरी बीवी ने भी हिजाब पहनना शुरू कर दिया।"! सुबहानअल्लाह हिदायत देना मेरा काम है हिदायत तो बस अल्लाह देता है। मैं कहूँगा "इस्लाम की बुनियादी बातों पर अमल करो, बाकी सब अल्लाह पर छोड़ दो।" भाई ऐमन को सबसे ज्यादा क्या करना पसंद है? फुटबॉल खेलना। हाँ! फुटबॉल, फुटबॉल, नहीं, नहीं, फुटबॉल, वे उसे सॉकर कहते हैं, पर हम उसे फुटबॉल कहते हैं। फुटबॉल, बस यही। अच्छा, आपकी लास्ट गूगल पर सर्च की थी?

आख़िरी चीज़, मैं आपको बताता हूँ। हाँ, ज़रूर। आपको, आपको ये पसंद आएगा। क्या, ट्रैबज़ोन? तुर्की। -तुर्की। बस यही आख़िरी चीज़ थी जो मैंने देखी थी। "कितनी ख़ूबसूरत जगह है।" बस यही आख़िरी चीज़, मैंने गूगल पर सर्च करी, मैंने आज ही सर्च कड़ी थी। तो आप वहाँ जाने वाले हैं, इंशाअल्लाह। मुझे, मुझे कुदरत से बहुत प्यार है। हरियाली बहुत पसंद है। तो जब मैं तुर्की की इस जगह को देख रहा था, तो मैंने सोचा, "ओह, ये कितनी ख़ूबसूरत जगह है। मुझे वहाँ जाना चाहिए, हाँ।” कोई ऐसा मज़ाकिया पल जब आपशर्मिंदा हुए हो, या ऐसा पल जो आप भूल नहीं सकते?

अच्छे तरीके से। एक वक़्त था जब मुझे याद है, मैं, मैं टीवी पर था, बीबीसी पर, सालों पहले, हाँ। मैं अस्पताल के अंदर एक डॉक्युमेंट्री कर रहा था। और मैं सबके सामने इस तरह से हाथ बढ़ा रहा था, और किसी ने मुझसे हाथ नहीं मिलाया। अब वो मेरे लिए बहुत, बहुत शर्मिंदगी का पल था, इतनी हद तक कि कैमरामैन ने मुझे बचाने के लिए कैमरा ही घुमा दिया... पर वो मुझे दिखाना नहीं चाहता था। वो दुनिया को ये नहीं दिखाना चाहता था। तो मैं बस वहाँ ऐसे खड़ा था, और कैमरामैन मुझे देख रहा था, और... तो वो सबसे शर्मिंदगी भरा पल था। ऐसे कई लोग हैं जिनकी ज़िंदगी आपके ज़रिए पूरी तरह से बदल गई है। उनमें से किसने आपको भावनात्मक रूप से सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?

मुझे याद है मैं कुछ समय पहले मक्का में था। मैं शायद 30-40 लोगों के ग्रुप के साथ था। और मुझे याद है जब मैं काबा जाने के लिए होटल से बाहर आ रहा था, तो एक भाई ने कहा, "ऐमन, ऐमन, वो आपको बुला रहे हैं।" तो एक भाई आया, "अस्सलामु अलैकुम।" "व अलैकुम अस्सलाम।" वो सबके सामने बोला, "ऐमन, आपकी वजह से, मैंने ड्रग्स बेचना छोड़ दिया।" और उस पल, मेरे दिल के साथ-साथ मेरी आँखों से आँसू छलक आए, और मैं बस रोने लगा। मतलब, मैं ये नहीं कहूँगा कि हिदायत मेरी तरफ़ से आती है। पर जब कोई मुझसे ये कहता है कि, "क्योंकि मैंने आपकी कहानी देखी और मैंने देखा कि आपने अपनी ज़िंदगी के बारे में कैसे बात की और कैसे तौबा की, उससे मैंने वो सब छोड़ दिया, और आज मैं यहाँ हूँ।" उसने कहा, "मैंने एक नौकरी की ताकि मैं हलाल का पैसा कमा सकूँ और इस सफर का ख़र्च उठा सकूँ।" ये मनगढ़ंत नहीं है। अल्हम्दुलिल्लाह। अल्लाह हमें समझ दे। अल्लाहुम्मा आमीन। मैं चाहूँगा कि आप ईमानदार और खुले रहें। अगर आप अभी मर जाएं, तो ख़ुद को जहन्नुम या जन्नत के पास पाते हैं?

जहन्नुम। वल्लाही! क्योंकि मुझे नहीं पता कि मैं जो कर रहा हूँ, क्या वो अल्लाह के यहाँ क़ुबूल हो रहा है या नहीं! और मैं इस बारे में सोचता हूँ। कि मेरी नीयत कैसी है, क्या मेरी नीयत सही है? क्या मैं ये सबकुछ लोगों के लिए कर रहा हूँ, या अल्लाह के लिए? मतलब, मैं डरता हूँ। हमारे अंदर ही एक जंग चल रही है। और मुझे नहीं पता मैं कहाँ जा रहा हूँ। पर कम से कम मैं कुछ ऐसा छोड़ जाऊँगा जिससे लोग मुझे अच्छाई के लिए याद रखेंगे, और वे मेरे लिए दुआ कर सकेंगे। बाकी अल्लाह पर छोड़ता हूँ, क्योंकि सिर्फ़ अल्लाह की रहमत से ही मैं जन्नत में जा सकूंगा। पर मुझे डर लगता है, मुझे नहीं पता। मैं जानता हूँ ये चुनना नामुमकिन है, पर वो कौन सी एक आयत है जो आपके दिल को करीब है?

قَالَ إِنَّمَا أَشْكُو بَثِّي وَحُزْنِي إِلَى اللَّهِ मेरी पसंदीदा आयत। "मैं अपनी परेशानी और अपना ग़म सिर्फ़ अल्लाह से बयान करता हूँ।" अपनी पत्नी से नहीं, अपनी माँ से नहीं, अपने पिता से नहीं, अपने बच्चों से नहीं, किसी से नहीं, सिर्फ़ अल्लाह से। और ये सूरह यूसुफ़ से है। ये याकूब अलैहिसलाम ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिसलाम को खोने के बाद कहा था जब उनके भाइयों ने उन्हें मारने की कोशिश की और कहा कि वो मर गए हैं। तब उन्होंने क्या कहा था?

إِنَّمَا أَشْكُو بَثِّي وَحُزْنِي إِلَى اللَّهِ और अगर हम सब इस आयत को अपनी ज़िंदगी में उतार लें, तो सब कुछ बदल जाएगा। लोगों को अपनी परेशानियां मत बताओ। उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वे आपकी परेशानियों से ख़ुश हैं, पर बताएँगे नहीं। सिवाय एक सच्चे इंसान के, जो वाक़ई अल्लाह पर यकीन करता है आपका भला चाहता है, सही सलाह देगा। बाकी लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उन्हें अच्छा लगता है कि आप दुखी हैं। वो ख़ुश होंगे अगर आप मुसीबतों से घिरे हैं। जन्नत में जाकर भाई ऐमन का पहला काम क्या होगा? भले ही मैंने अपनी माँ को खो दिया हो, कुछ साल पहले उनका मक्का में इंतकाल हो गया, अल्लाह उन पर रहम करे। और भले ही मुझे उनकी बहुत याद आती हो, और मैं उनसे मिलना चाहता हूँ...

पर मैं सबसे पहले पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से मिलना चाहूँगा। ज़ाहिर है, अल्लाह के अलावा। मैं पैगंबर से मिलना चाहता हूँ, उन्हें शुक्रिया कहना चाहता हूँ, उन्हें गले लगाना चाहता हूँ, उनके हाथ चूमना चाहता हूँ, मैं शुक्रगुज़ार हूँ, उन्हीं की वजह से आज मैं मुसलमान हूँ। क्योंकि अगर वो हार मान लेते, तो आज हम सब कहाँ होते?

पर उन्होंने हार नहीं मानी। "आपने हार नहीं मानी। उनकी वजह से मैं मुसलमान हूँ। आपकी वजह से मैंने क़ुरान को जाना, क़ुरान आप पर ही नाज़िल हुई। मुझे सुन्नत के बारे में पता चला की अपनी पत्नी अपने माँ-बाप के साथ कैसा सुलूक करना है, उन पड़ोसियों के साथ जो मुसलमान नहीं हैं, मुझे मालूम है लोगों के लिए अपने दिल में रहम कैसे रखना है, आपकी वजह से, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम।" मुझे माफ़ कीजिए, मैं उम्मत के लिए कुछ ज़्यादा नहीं कर पाया। आपको निराश करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ। अगर कोई इंसान आपको लिफ़्ट में मिलता है। वो आपको पहचान लेता है और पूछता है, "मेरे पास वो सब है जिसकी मुझे ज़रूरत है, मैं मज़हब को मानकर ख़ुद पर पाबंदियां क्यों लगाऊँ?" आपका एक मिनट में क्या जवाब होगा?

अगर आपकी ज़िंदगी में अल्लाह नहीं है, तो आपके पास कुछ नहीं है। अल्लाह आपको इस दुनिया में उलझा देता है। आप सोचते हैं कि आपके पास सब कुछ है। पर वो किसी काम का नहीं है, अगर आपके पास अल्लाह ही नहीं है? अल्लाह आपको मज़े करने देगा। पर जब दिल में ईमान ही नहीं, तो अल्लाह आपको ख़ुद को भुलाने पर मजबूर कर देगा। जैसा कि क़ुरान की आयत में है: وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ نَسُوا اللَّهَ فَأَنسَاهُمْ أَنفُسَهُمْ "उन जैसे न हो जाओ जो ख़ुदा को भुला बैठे ख़ुदा ने उन्हें ऐसा कर दिया कि ख़ुद को भूल गए...” वो किस तरह आपको ख़ुद को भुलवाता है?

आपको दुनिया के कामों में उलझा कर। "मैंने ये लाखों पाउंड्स कमाए, मैंने ये गाड़ी ली, मैंने ये घर लिया, मेरा ये परिवार है।" ये अल्लाह ने नहीं किया, मैंने किया है। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, अल्लाह तुमसे ये कहलवाता है। क्योंकि तुम उसे भूल गए। तो अल्लाह तुम्हें ज़रूर ख़ुद को भुलवा देता है। कई नौजवान कहते हैं "मैं गुनाहों में डूबा हुआ हूँ, मैं इससे बाहर कैसे निकल सकता हूँ?" आप उन लोगों से क्या कहना चाहेंगे?

भले ही आप अल्लाह से कितने भी कदम दूर चले गए हों, बस एक कदम बढ़ाकर ये कहिए, "या रब, मुझे माफ़ कर दे। या रब, मुझे माफ़ कर दे।" सच्चे दिल से कहिए, अल्लाह आपको माफ़ कर देगा। अल्लाह आपको तुरंत माफ़ कर देगा। अगर आप सच्चे हैं। और वो सब कुछ माफ़ कर देगा। शैतान तो कहेगा कि आपने इतने गुनाह किए हैं कि आपको अल्लाह माफ़ नहीं करेगा। पर अल्लाह आपसे कहता है, "अगर तुम्हारे गुनाह आसमान तक भी पहुँच जाएँ, और तुम तौबा करो, तो मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा। जब तक तुम्हारी रूह तुम्हारे शरीर में है।" पर कभी भी किसी गुनाह को "अपना सफ़र" कहकर सही मत ठहराओ। शराब पीना "अपना सफ़र" कैसे हो सकता। लेकिन फिर मुझे मेरे फितने के साथ भी रहने दो। अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने औरतों को इज़्ज़त बख़्शी है, और उनका मक़ाम ऊँचा किया है। अगर किसी समाज को बर्बाद करना चाहते हैं, तो उनकी औरतों को बेपर्दा छोड़ दे। और आज यही हो रहा है। हया ही समाज को वापस सही राह पर लाती है। और अल्लाह से डरने वाले मर्द, अपनी निगाहें नीची रखेंगे और अल्लाह को याद रखेंगे। मैंने हमेशा यही कहा: वो औरतें, जो अल्लाह से डरती हैं, हमारी उम्मत उन औरतों के बिना बहुत पहले ही बर्बाद हो चुकी होती। ये उन माओं की दुआएं ही हैं, जो हमें आज मज़बूत बना रही हैं।