मज़हब क्या है? हर कठिन सवाल का जवाब एक ही वीडियो में!
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मज़हब क्या है और मज़हब क्यों होते हैं? पहली गलती जो कोई व्यक्ति करता है, वह यह कल्पना करना है कि एक मज़हब किसी एक व्यक्ति के शब्द हैं, जो बहुत पहले जीता था। ऐसा नहीं है। मज़हब हमारे लिए जीवन को आसान बनाने के लिए हैं। वास्तव में बिदअत की अवधारणा क्या है? रग़ाइब, मिराज, बराअत, मौलिद क्या ये भी बिदअत हैं?
किसी एक मुद्दे पर दो बयान हो सकते हैं। आज हर मुसलमान के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने ईमान की जांच करें। और विचारों की दुनिया हमारे सामने हमारे मोबाइल फोन के माध्यम से आ रही है। अस्सलामु अलैकुम,डॉक्टर शदी अल-मसरी। हमारे साथ होने के लिए आपका बहुत धन्यवाद। टुवर्ड्स इटर्निटी में आपका स्वागत करना हमारे लिए सम्मान की बात है। welcome वा अलैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाह। मुझे यहाँ आकर खुशी हो रही है। आपका चैनल बहुत अच्छा है। मैं अभी आपके चैनल को देख रहा था। मैं वास्तव में, वास्तव में प्रभावित हुआ, माशाल्लाह। okay जज़ाकल्लाहु ख़ैरन, बहुत शुक्रिया। मैं इसकी कद्र करता हूँ। कई प्रश्नों में तो हमारा मुख्य विषय 'मज़हबों' के बारे में है। तो 'मज़हब' क्या है और हमारे पास 'मज़ाहिब' क्यों हैं?
ठीक है। अच्छा सवाल है। तो किसी भी चीज़ में जो अस्पष्ट या 'Zanni'है, उसके कई संभावित अर्थ हो सकते हैं। और कई लोग यह नहीं समझते कि एक मुद्दे पर दो बयान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, जो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय में हुआ, उनकी उपस्थिति में, खंदक की लड़ाई के बाद। तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सभी के लिए एक घोषणा की। कोई भी 'अस्र' की नमाज़ नहीं पढ़े सिवाय बनी कुरैज़ा में। वो उस क़बीले का नाम है, बनी कुरैज़ा। तो सब लोग तैयार हो गए अपने अपने हिसाब से। कुछ लोग जल्दी तैयार हो गए तो कुछ ने थोड़ा समय लिया। इसलिए कुछ लोग मग़रिब से पहले बनी कुरैज़ा के इलाके में पहुंच गए, जबकि कुछ लोग देर से पहुँचे। जबतक कि वे घर पहुँचे अपना घोड़ा लिया, अपनी तलवार ली, तो जब वो रास्ते में थे, तब मग़रिब का वक़्त हो गया। तो एक समूह बाहर था और उन्होंने कहा, 'रुको, पैगंबर ने कहा था कि कोई भी अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ेगा सिवाय बनी कुरैज़ा में।' और फिर कुछ ने कहा, 'ठीक है, उन्होंने इसे एक expression के रूप में कहा था, मतलब जल्दी करो और सूरज ढलने से पहले वहाँ पहुँचो।' लेकिन उनका मतलब यह नहीं था कि अस्र समय पर न पढ़ो।' और कुछ ने कहा, 'मैं सटीक शब्दों के साथ जाऊंगा। यहाँ बात एक पैगंबर की हैं। वो कोई और नहीं है। वो एक पैगंबर हैं, इसलिए हम अस्र नहीं पढ़ेंगे। ' तो उन्होंने अस्र नहीं पढ़ी, और वे चलते रहे, चलते रहे। वे नहीं रुके, और उन्होंने सूरज ढलने के बाद अस्र पढ़ी। और जब दोनों...
जब ये मसला पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास लाया गया, तो उन्होंने दोनों की analysis को स्वीकार कर लिया। यह क्या साबित करता है? यह हमें साबित करता है कि पैगंबर ﷺ इस तरह से बोल सकते हैं जिसे हमारे दिमाग द्वारा filter किया जा सकता है और दो अलग-अलग नतीजे निकल सकते है। और वो यह भी पुष्टि करते हैं कि दोनों स्वीकार्य हैं। और यही कारण है कि मज़हब मौजूद हैं, क्योंकि अल्लाह और उनके पैगंबर की बातों को संभवतः filter किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि filtering कौन करता है?
तो आपके पास अरबी भाषा में कुछ दक्षताएँ होनी चाहिए ताकि आप 'Mujtahid' कहलाने के योग्य हो सकें, जो इसे filter करेगा, process करेगा और एक result produce करेगा। कुरान हमसे दो प्रकार के आदेशों में बात करता है। एक आदेश जिसे केवल एक ही तरीके से समझा जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि बतौर मुसलमान हमें यह जानने के लिए, for example, jurisprudence की आवश्यकता नहीं है कि मुझे दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़नी है। आपको, दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़नी है। हमें शराब से बचना है। इसके लिए हमें jurisprudence की आवश्यकता नहीं है। हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि यह well known है। लेकिन फिर 'अल्लाह त'आला हमसे बात करता हैं और कुरान में equivocal language जिसे 'zanni या अद दलाला' कहते है, और इसमें ऐसी बातें शामिल होती हैं जिन्हें कई तरीकों से समझा जा सकता है। तो मैं इस पर, मैं इसपर अमल कैसे करूं?
तो ये एक वजह, कारण है कि मज़हब अस्तित्व में आए। एक समय ऐसा आया जब अबू हनीफा, उनका दौर, जो सहाबा के बाद का दौर था, जिसमें उन्होंने बैठकर हमारे शरीर के सभी नियमों को codify और list out किया हमारे शरीर को इबादत एवं एक-दूसरे के साथ में क्या करना है? और वे बहुत से प्रश्नों पर आए जो 'नज़र' या सोचने और जांचने की आवश्यकता रखते हैं। इस शब्द का क्या मतलब है? सहाबा ने क्या किया? यही फिकह है। और प्रत्येक इमाम का अपना method है। मज़हब हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए हैं। अल्लाह ने इस तरह से बात क्यों किया ?
पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्यों की इस तरह से तक़रीर कि जो, जैसे जब एक रौशनी क्रिस्टल में प्रवेश करती है और कई सुंदर रंगों में बँट जाती है। और ये हमारी आसानी के लिए है। वो आपके लिए कठिनाई नहीं चाहते, सही वो आपके लिए यूस्र चाहता है। वो आपके लिए आसानी चाहता है। क्योंकि मानव जीवन बहुत अलग है, इंसानी पृष्ठभूमियाँ बहुत अलग हैं, इसलिए इस धर्म को थोड़ी flexibility चाहिए, और अल्लाह ने इसमें ये भी रखी है। तो वो flexibility हमें allow करता है, अगर मैं अभी एक विशेष स्थिति में रह रहा हूँ जहाँ, बस चीजों को लेकर मेरी समझ ही इतनी कठिनाइयाँ पैदा कर रही है, कि जीवन अब मेरे लिए सामान्य नहीं रहा। यह बहुत कठिन होता जा रहा है। मैं देखता हूँ और उन्हीं texts की एक और understanding मिलती है, और मुझे लगता है कि यह मेरी कठिनाई को कम करता है। मज़हब हमारे लिए आसानी और इस्लाम को practical बनाने के लिए exist करते हैं। वे हमें tribes, sub-tribes में बाँटने के लिए नहीं हैं। वे इसलिए भी नहीं हैं कि उनकी सेवा की जाए, है ना?
वे exist करते है हमारे जीवन को एक मुसलमान के रूप में आसान बनाने के लिए। क्या मज़हबों के इमामों के ज्ञान के स्रोत आज की तरह समृद्ध थे? और शायद उन्होंने कुछ इज्तिहाद इसलिए किए क्योंकि उनके पास सही जानकारी तक पहुंच नहीं थी। हम कैसे सुनिश्चित कर सकते है कि इनके पास सही जानकारी की पहुँच थी। खैर, यह एक अच्छा सवाल है। खैर, अगर आप उन इमामों के शिक्षकों को देखें, तो एक व्यक्ति आश्वस्त हो सकता है कि उन्होंने इस्लाम को अच्छी तरह से समझा, उन्होंने सुन्नत और अरबी भाषा को अच्छी तरह से समझा, क्योंकि उनके शिक्षक सहाबा की औलादें और पोते थे यही कारण है कि ये इमाम इतने पहले थे। अब,ध्यान में रखें, उस समय बहुत सारे इमाम थे लेकिन उनके कुछ छात्रों ने उनके विचारों को आगे नहीं बढ़ाया, और यह... अंततः, हम मानते हैं...
हम मानते हैं कि यह अल्लाह की इच्छा है, कि उन्होंने इन चार को चुना जो आज तक बचे हुए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी, जांचना और दोबारा जांचना और तीन बार जांचना और सुनिश्चित करना। तो पहली गलती जो कोई व्यक्ति करता है वह यह कल्पना करना है कि एक मज़हब किसी एक व्यक्ति के शब्द हैं, जो बहुत पहले के समय में जीवित था। ऐसा नहीं है। एक मज़हब एक जीवित विचारधारा है। मतलब उस इमाम के समय से लेकर अब तक, हर पीढ़ी में विद्वान रहे हैं जिन्होंने उस method of thinking को अपनाया, और उन्होंने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया और ये सुनिश्चित किया कि उन्होंने जाँचा और दोबारा जाँचा और तीन बार जाँचा। और कभी-कभी, हाँ, कभी-कभी उन्होंने... उन्होंने महसूस किया कि मूल संस्थापक का निष्कर्ष वास्तव में सबसे अच्छा उत्तर नहीं है,सही?
उनकी विधि सही थी। उनके काम का अधिकांश हिस्सा सही है। लेकिन इस मामले में, हम उनसे अलग होंगे। ये वास्तव में प्रमाण है कि ये cult following नहीं बल्कि ज्ञान के विश्वसनीय स्रोत है। याद रखें, यह सब judgment का मामला है। और जब आपके पास judgment का मामला होता है, तो आपको बहुत सारे विचारकों की आवश्यकता होती है, बहुत सारे लोगों की जो कहें, "हाँ, यह सही उत्तर था।" यही कारण है कि हमें इन मज़हबों पर इतना विश्वास है, क्योंकि इनमें कितने दिमाग लगे हैं। और ये फिर से इस विचार को खारिज करता है कि यहाँ सिर्फ एक इमाम है और हम सभी तब से उसे ही मानते आ रहे हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। फिक़्ही स्कूलों के अलावा, मातुरीदी और अश'अरी स्कूल भी हैं, वास्तव में वे हमें क्या बताते हैं?
और इन दो स्कूलों का इतना कड़ा विरोध क्यों है?
ठीक है, तो उस दौर के आख़िर में, जब अहकामों का documentation हो रहा था, जब फ़िक्ह का documentation किया जा रहा था। उस time period के आख़िर में theological disputations उत्पन्न हुए। और इन errors के लिए इस theological disputation का अंत मूल रूप से दो approaches के साथ हुआ। पहला approach हम्बली approach था, जिसे أثري approach के तौर पर भी जाना जाता है। ये, ये जो methodology है, इसे हम इसे أثري कह सकते हैं और जो school of thought इसे प्रस्तुत करती थी वह हम्बली स्कूल थी, जिसने मूल रूप से कहा, कि मुताज़िला के विचारकों के सभी errors को reject कर दिया गया है। उन्होंने उन पर पूर्ण विराम लगा दिया। text को follow करें और बस इतना ही। किताब और बस इतना ही। अब, उसके बाद कलामी स्कूल आए, और दो कलामी स्कूल हैं। कलाम का मतलब है dialectical theology, और कलाम का मतलब है dialectical। dialectical theology का मतलब है कि हम वास्तव में आपको प्रश्न दर प्रश्न उत्तर देने वाले हैं। हाँ, हम أثري की rulings से सहमत हैं जो आप कह रहे हैं, "हाँ, ये गलत है," ठीक, और हमें text के अनुसार चलना है, लेकिन हम आपको जवाब देंगे और बताएंगे कि ये क्यों गलत है। और हम आपके साथ बहस करेंगे और यहाँ तक कि हम आपके साथ argue करेंगे, आपके ही अपने methodology से यानी हम rational approach, एक philosophical approach अपनाएंगे और आपको दिखाएंगे कि आप क्यों गलत हैं और मुसलमानों को दिखाएंगे कि उन्हें इन पक्की आस्थाओं पर क्यों ईमान रखना चाहिए। मोटे तौर पर इसे ही कलामी approach के तौर पर जाना जाता है। तो वे...
तो वो दोनों ही सुन्नत की रक्षा करने और सुन्नत को स्थापित करने के approaches हैं। أثري तरीका sources का उपयोग करता है, कुरान और सुन्नत, और वहीं रुक जाता है। कलामी तरीका इन विचारों को व्यवस्थित करने और भटके हुए लोगों व नास्तिकों को जवाब देने की कोशिश करता है। और इमाम नववी कहते है कि उम्मत की अनिवार्य बिदअतों में से एक, वो सूचीबद्ध करते हैं, और इब्न हजर बाद में follow करते हैं, वो बताते है "philosophers को जवाब देने में सक्षम होना, नास्तिकों को जवाब देने में सक्षम होना, विधर्मियों को जवाब देने में सक्षम होना।" ठीक है?
और अब अगर कोई व्यक्ति philosopher है, तो आप उसे ये नहीं कह सकते कि अल्लाह इसीलिए अस्तित्व में है, अल्लाह का अस्तित्व है क्योंकि ऐसा कुरान कहता है। क्योंकि सबसे पहले तो वो कुरान को मानता ही नहीं। इसलिए आपको उनके अविश्वासों का खंडन उस basis पर करना होगा जिस पर वे सहमत हों। और फिर आपको अपने विश्वासों को भी उस basis पर प्रस्तुत करना होगा जिसे वे भी पहचान सकें। दूसरे शब्दों में, एक rational basis। मोटे तौर पर यही कलाम की अवधारणा और कलाम का कानूनी निर्णय है, जैसा कि नववी कहते हैं कि अगर यही लक्ष्य है तो यह आलिमों पर एक फर्ज़े किफ़ाया है। मुझे लगता है कि हर मुसलमान के लिए आज सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जिसकी उन्हें जांच करनी चाहिए वह है उनका ईमान। अर्थात उनका ईमान, अल्लाह और उनके रसूल में उनका विश्वास, और कुरान और हदीस को स्रोत के रूप में मानना, और naturalism, scientism, evolution और secular morality के प्रति उनकी प्रतिक्रियाएं, यह आज के समय में लगभग एक 'फर्ज़े ऐन' के level पर हैं। ठीक वैसे ही जैसे आपके पूर्वजों के लिए, तलवार और तीर चलाना और घुड़सवारी करना और एक तरफ मंगोलों से और दूसरी तरफ क्रूसेडरों से लड़ना फ़र्ज़ था क्योंकि मैंने एर्तुगरुल का पहला सीजन देखा है, इसलिए मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं कि क्या चल रहा था। ऐसे लड़के के लिए, क्या यह फर्ज 'ऐन नहीं है?
यह एक... फर्ज़े ऐन है, मैं इसका अनुवाद 'individual obligation' करूँगा, क्योंकि उस दौर में मंगोल या क्रूसेडर का सामना करने की संभावना शायद 85 प्रतिशत थी। आपको सीखना होगा कि मैदान में कैसे टिकें... एक आदमी ऐसा लड़का कैसे पाल सकता है जो तलवार पकड़ना या घुड़सवारी करना या तीर फेंकना या ढाल पकड़ना नहीं जानता? तो आज की दुनिया में, हम शायद...
ये शायद शारीरिक लड़ाई का सामना नहीं करेंगे। यह कल्पना करना कठिन है कि कोई भी व्यक्ति जिसके पास दिमाग और एक सेल फोन है, वह वैचारिक खतरे का सामना नहीं करेगा, एक वैचारिक मोड़, सिर्फ इसलिए कि हम इतने लोगों के साथ मिलते हैं और विचारों की दुनिया हमारे सेल फोन के माध्यम से हमारे सामने आ रही है। तो मुझे ऐसा लगता है कि हम इसे लगभग एक व्यक्तिगत दायित्व के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं कि हम दृढ़ता से और गहराई से जांचें कि हम मुसलमान क्यों हैं। अब मेरे पास मज़हबों के अलावा अलग-अलग मुद्दों पर सवाल होंगे। और जब हम सूफीवाद को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि इतिहास में इसे लोगों ने बहुत बड़ी संख्या में अपनाया है। और कई लोगों ने अपनी आख़िरत को बचाने के लिए इससे फ़ायदा हासिल किया है। और इसके ख़िलाफ़ इतना विरोध क्यों है?
खैर,उनके ख़िलाफ़ विरोध हो सकता है अगर वे जो करें उसमे कुछ खामियां हो और हमने बात की थी कि अगर हम फिकह को देखें, तो ये मुमकिन है कि एक मुफ्ती ऐसा हो जिनसे गलतियाँ हो जाए, एक मुफ्ती हो सकता है जिसका रिकॉर्ड बहुत खराब हो। उनके सभी फतवे गलत होते हों। तो इसका मतलब ये नहीं है कि फिकह को ही रद्द कर दिया जाए। तो तज़कियतुन नफ़्स कुछ ऐसा है जो हमारे धर्म में हर किसी के लिए आवश्यक है, वो चाहे कोई भी हो। और इसी तरह theology, याद रखें कि कलामी schools of theology का उद्देश्य rational proofs के ज़रिए कुरआनो-सुन्नत और अहलुस्सुन्नत-वल-जमाअत के अक़ीदों को बचाना है। इसे समझाने और defend करने के लिए, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हर मुतकल्लिम या कलाम theologian सटीक होगा, उससे गलती हो सकती है, इसी तरह दूसरी तरफ भी, जिन्होंने أثري methodology अपनाई, Hanbali methodology अपनाई उनसे भी गलतियाँ हो सकती है। मुझे यकीन है कि उनकी रैंक के भीतर, उनके पास ऐसे लोग थे जिन्होंने गलतियाँ कीं, जैसा कि इब्न अल-जौज़ी ने कहा है। इसी तरह, अब तीसरे क्षेत्र में, जहाँ हमने कहा, "इस्लाम, ईमान, इहसान।" वह है- नियम, फिक़्ह और अकीदा। और अब हम इहसान पर आते हैं, जो कि तसव्वुफ़ है। तो तसव्वुफ, तज़कियतुन नफ़्स एक field और branch of knowledge है, जिस पर सहमति है। कोई दो मुसलमान यह नहीं कहेंगे कि, "नहीं, यह कोई subject matter नहीं है।" पुराने समय में, इसे अर-रिक़ाक कहते थे, है ना?
दिलों को नरम करना। और बाद में उन्होंने इसे different subjects, different नामों से पुकारा, जब तक कि उन्होंने इसे तसव्वुफ़ नहीं कहा, ऊन पहनना, क्योंकि वे- वे इसे ऐसा कुछ नहीं कहना चाहते थे जो verifiable न हो,जैसे कि आप ऐसे व्यक्ति को क्या कहेंगे जो हमेशा तज़कियतुन नफ़्स करने की कोशिश करता है, या अपने दिल को शुद्ध करता है? क्या आप उसे शुद्ध व्यक्ति कहेंगे? सही?
आप ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि number one, मैं इसे verify नहीं कर सकता। Number two, आप ख़ुद की तारीफ़ नहीं कर सकते। अगर आप कुरान के क़ारी हैं और आपको क़िराअत पता हैं, तो आप इसे objectively verify कर सकते हैं। आप हम सबके सामने पढ़ सकते हैं। यदि आप एक मुहद्दिस और हदीस scholar हैं, तो आप अपनी हदीस सुना सकते हैं और हम जान सकते हैं कि आप एक हदीस scholar हैं। लेकिन आप अल्लाह की दिन-रात इबादत करके खुद को शुद्ध नहीं कह सकते। नहीं ये। ये नहीं चलने वाला। Number one, यह verifiable नहीं है। Number two, आप खुद की तारीफ़ कर रहे हैं। तो ultimately, वे बस उन्हें कहते है, ऊन पहनने वाले लोग। और यहीं से सूफी शब्द आया। सूफी वह व्यक्ति है जो आत्म-शुद्धि के उस मार्ग पर जा रहा है और वह उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है और इबादत पर, और दुनिया व सभी सुंदर चीज़ों से कट जाना चाहता है, जिससे वो व्यक्ति अल्लाह के करीब हो सके। उसे theology और इबादत, फिकह, न्यायशास्त्र का सही पालन करना होगा। अगर वह इससे बाहर निकलता है, तो वह निंदा के योग्य है। और अगर नहीं, तो वह प्रशंसा के योग्य है। बिदअत का सही मायने में क्या अर्थ है?
क्या इस्लाम में बाद में आने वाली हर चीज़ बिदअत है और इसलिए गलत है? इज़ बिन अबुन सलाम शाफ़ई स्कूल में और अल-क़राफी मालिकी स्कूल में मानते थे कि बिदअत को actions से जोड़कर देखा जाना चाहिए, इसे पाँच categories में बाँटा जाना चाहिए। ताकि बिदअत actions के attribute हों। लेकिन इसकी legal category इस बात पर आधारित है कि हम इसे शरिया के समक्ष कैसे मापते हैं। और वह यह है कि यह फ़र्ज़ हो सकता है, ये मन्दूब, जायज़, मकरूह, और हराम हो सकता है। और ये ज़रूरी बिदआत हैं। ये ऐसी बिदआत है जो फ़र्ज़ है। वो- वो रावियों की छानफटक, हदीसों के रावियों की। इसलिए हमने कभी सहाबा को यह कहते हुए नहीं देखा, "आइए हम इस रजुल की जाँच करें। क्या ये एक फ़क़ीह है? क्या वह मुनकर है?
क्या वह मतलूक है?" और फिर उसे लेबल करना, कि यह रावी صدوق है, यह रावी ثقة है, आदि। अध्ययन के इन सभी क्षेत्रों, और ज्ञान के categorization and organization को भी माना जा सकता है कि ये कुछ ऐसा है जिसे ज़रूरी बिदअत कहा जाए, कुछ ऐसा जो पैगंबर और सहाबा के समय में मौजूद नहीं था। इसके अलावा, शायद सफ़र में जमात से नमाज़ पढ़ना और कुरान को एक मुसहफ़ के रूप में, पुस्तक के रूप में लाना। वे सभी उस समय के बिदआत थे। निश्चित रूप से, वे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय में मौजूद नहीं थे। लेकिन सवाल यह है कि इसका हुक्म क्या है? क्या यह... ठीक है, मान लीजिए हम सहमत हैं कि, Group में ज़िक्र करने जैसा काम एक बिदअत है। ठीक है। क्या यह, क्या ये बिदअत मुझे इस्लाम से बाहर कर देता है?
उसूलन, बिदआत को legal categories में categorize करना होगा। हम Group में ज़िक्र करने को क्या मान रहे है? हम इसे कैसे define करते हैं?
अल्लाह को याद करने के लिए मुसलमानों की किसी भी प्रकार की gathering, सहाबा ने इसे किया था। ख़ुद पैगंबर मुसलमानों के साथ इकट्ठा हुए। और इसलिए एकमात्र प्रश्न जो विवादित विषय के रूप में आता है, वह यह है कि इन सभाओं का आयोजन किस प्रकार से हो सकता है। और क्या तसबीह एक साथ तस्बीह, सभी को एक साथ ज़िक्र करने की अनुमति है या नहीं। यही एकमात्र सवाल है। तो बुलंद आवाज़ में पढ़ना, कोई समस्या नहीं। अज़कार को ऊँची आवाज़ में कहना कोई समस्या नहीं। लेकिन इसे एक साथ सामूहिक रूप से एक आवाज़ में कहना। सिर्फ़ इस बात को लेकर फुक़हा के बीच difference of opinion पाया जाता है। यहां तक कि हम्बली स्कूल में, अल-बुहूती कहते हैं कि कुरान को एक आवाज में ज़ोर से पढ़ने की इजाज़त है। तो हम्बली स्कूल खुद ये कहता है। सभी चार स्कूल इस पर सहमत हैं...
कि इसकी इजाज़त है। इससे हमें ये पता चलता है कि सभी चार मज़हबों में, इसकी इजाज़त होगी कि हम एक ज़िक्र की gathering करें जिसमें हम कुरान और ज़िक्र को एक साथ मिलकर पढ़ें। हर साल जब रमज़ान करीब आता है, जैसे, आप जानते हैं, तीन महीने करीब आते हैं, तीन पाक महीने, कुछ खास रातें चर्चा में आती हैं, लोगों का ध्यान खींचती हैं। जैसे रग़ाइब, मेराज, बराअत, मव्लिद। और क्या ये भी बिदआत हैं, और क्या इनका हमारे पैगंबर, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में कोई आधार है?
ठीक है। तो यह एक अच्छा सवाल है। तो ये विशेष रातें, जिनमे से कुछ के बारे में रिवायतें और हदीस आई हैं। और हदीस कमज़ोर हो सकती है, लेकिन फिर भी, कोई यह दावा नहीं कर रहा है कि इन रातों का पालन करना एक फ़र्ज़ है। और कमज़ोर हदीस का उपयोग regular अच्छे आमाल के लिए किया जा सकता है जो कि...
जब तक कोई इसे फ़र्ज़ नहीं कहता। क्योंकि कमज़ोर हदीस का उपयोग फ़र्ज़ या हराम तय करने के लिए नहीं किया जा सकता। हाँ। लेकिन उन पर अमल किया जा सकता है। तो शुरुआती फुकहा, और मैं एक क़ौल सुनाऊँगा, आपको इमाम मालिक का एक उदाहरण दूंगा, वो मानते थे कि उन्हें पसंद नहीं था कि इन रातों को खुलेआम और सार्वजनिक रूप से बड़े gatherings में मनाया जाए ताकि लोग उन्हें फ़र्ज़ न समझें। इसलिए उन्होंने इस सार्वजनिक रूप से इकट्ठा होने को discourage किया। इसको मूलतः नहीं, बल्कि इसलिए कि वह नहीं चाहते थे कि लोग इसे एक फ़र्ज़ समझें। मलिक ने शव्वाल के छह दिनों के रोज़े के बारे में भी यही बात कही। वो नहीं चाहते थे कि लोग इसे एक फ़र्ज़ समझें। अब, बाद में, उलेमा में मतभेद हुआ। क्यों?
क्योंकि उन्होंने देखा कि इसमें एक बड़ी समस्या थी। मामला ये नहीं है कि लोग सोचेंगे कि यह एक फ़र्ज़ है। लोग अब काफी हद तक जानते हैं कि क्या फ़र्ज़ है और क्या नहीं। और, यहाँ एक general awareness की कमी है। एक गफलत, एक लापरवाही है जो उम्मत पर छा गई है। इसलिए, वे अल्लाह के क़ौल का उपयोग करते हैं, "वा ता'आवनू अलल-बिर्री वत्तक़वा" अच्छे कामों में एक-दूसरे का साथ दें। तो अगर हमें कोई काम मिलता है जो एक कमज़ोर हदीस में भी है, या एक सामान्य सिद्धांत में जैसे कि रबी' उल-अव्वल में पैगंबर की याद, जो मूल रूप से मौव्लिद है, तो उन्होंने इसे उसका हिस्सा माना। वा ता'आवनू अलल-बिर्री वत्तक़वा। अच्छे कामों और परहेज़गारी में एक-दूसरे का साथ दें। और हम देखते हैं कि उम्मत गफलत में है, एक बड़ी गफलत, इसलिए, जिस भी चीज़ का कोई आधार है। लोगों को इकट्ठा करना एक अच्छी बात है। और यह अब इसे priority दी जाती है। क्योंकि लोग तो अपने फ़राइज़ भी नहीं निभाते इसे एक फ़र्ज़ समझें इसकी तो उम्मीद ही मत कीजिए। यह, मुझे लगता है, शैतान की तहरीज है, वह तर्क जो शैतान उम्मत के सामने लाता है। क्या आपको लगता है कि इन मुद्दों पर विभाजन उम्मत को नुकसान पहुंचाता है?
मुझे वास्तव में बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना पसंद नहीं है, कि हमारे पास एक उम्मत है जो जंग में है। और... लेकिन एक चीज जो मैं कर सकता हूं, और योगदान दे सकता हूं, वह यह दिखाना है कि कुछ चीजें इब्लीस के छलावे हैं जो लोगों को बहस के कीचड़ में घसीट रही हैं। अगर अल्लाह ने कुछ विशाल बनाया है, तो इसे अपनी राय से छोटा करना आपके ऊपर नहीं है। और ऐसे ही मुद्दे है जहाँ नमाज़ पढ़ने वाले मुसलमानों और इस, practicing Muslims के बीच, इब्लीस की तहरीज होती है, एक group कहता है, "यह ऐसा ही होना चाहिए।" दूसरा group कहता है, "नहीं, यह वैसा ही होना चाहिए।" और यही disunity की ओर ले जाएगा। और यह कोई 'coincidence' नहीं है कि disunity उस समय उभरती है जब मुसलमान जंग में होते हैं, है ना?
जब मुसलमानों पर जंग थोपा जा रहा होता है, तो disunity की कई परतें हमें प्रभावित करती हैं। तो उम्मत की शक्ति पहले ही टूट चुकी है। metaphorically कहें तो, यह सब इब्लीस की ओर से है, एक छलावा जो आपको उस हक़ीक़ी लड़ाई से बहुत दूर रखने के लिए है जिसमें वो ये सुनिश्चित करना चाहता है कि आप उसमे हिस्सा न लें और अंत में, अगर आपको सभी युवा मुस्लिम उम्मत से बात करने का मौका मिले, तो आप कुछ पलों में क्या कहना चाहेंगे? मैं बस इतना कहूंगा कि अगर हम अल्लाह सुब्हानहु वा त'आला की ओर लौटें, तो अल्लाह त'आला भी हमारी ओर लौटेगा। "इन तन्सुरुल्लाही यनसुरकुम।" ठीक? अल्लाह को नुसरत दो, अल्लाह हमें नुसरत अता करेगा। यह इस ज़िंदगी में भी संभव है। यह कैसे संभव है? खैर, इतिहास में, अल्लाह ने अन्य चीजें कैसे बनाई?
दाऊद ने Goliath को कैसे हराया? अरबों ने एक साथ Byzantine और फारसियों को कैसे हराया? मेरा मतलब है कि यह इतिहास में भी नहीं है, वे कहते हैं कि पहली बात यह है कि सेनाएं क्यों हारती हैं क्योंकि उन्हें दो मोर्चे के युद्ध का सामना करना पड़ता है। सहाबा की एक सेना के बारे में क्या जो अरब के थे और जिनके पास कुछ नहीं था, फिर भी उन्होंने जानबूझकर दो मोर्चे के युद्ध में हिस्सा लिया और दोनों में जीत हासिल की! यह कुछ ऐसा था जो उमर की जिंदगी में हुआ था। अगर आप उन्हें उस वक्त जब वो दस साल के थे, कहते कि 'आप अपनी नेतृत्व में इन दोनों सेनाओं को हरा देंगे", तो यह हंसी का विषय होता, है ना?
और ये हो सकता है अगर हम,"इन तनसुरुल्लाही यन्सुरकुम।" अगर हम, अगर हम एक उम्मत के रूप में इसका पालन करें, तो हमें नहीं पता कि क्या होगा। बहुत सारी महान चीजें होंगी। और मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि हालांकि क्षितिज पर अंधकार है, मैं मानता हूं कि इस जीवनकाल में बहुत सारी महान चीजें होंगी। जज़ाकल्लाह खैर, Sheikh और हमारे साथ होने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद डॉक्टर शदी अल-मसरी। ये हमारे लिए एक अत्यंत सम्मान की बात थी। व-इयाकुम, इंशा'अल्लाह हम आपके साथ आगे भी चर्चा,करना चाहेंगे। इंशा'अल्लाह भविष्य की परियोजनाओं में भी आपके साथ, काम करना चाहेंगे। और अल्लाह इसमें बरकत दे और आपके सभी कामो के लिए आपको इनाम दे। जज़ाक़ल्लाहु ख़ैरन और आपके चैनल ने शानदार काम किया है। आप 3 मिलियन सब्सक्राइबर्स के करीब हैं, जो एक अद्भुत उपलब्धि है। अल्लाह-आपको तौफीक दे।
किसी एक मुद्दे पर दो बयान हो सकते हैं। आज हर मुसलमान के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने ईमान की जांच करें। और विचारों की दुनिया हमारे सामने हमारे मोबाइल फोन के माध्यम से आ रही है। अस्सलामु अलैकुम,डॉक्टर शदी अल-मसरी। हमारे साथ होने के लिए आपका बहुत धन्यवाद। टुवर्ड्स इटर्निटी में आपका स्वागत करना हमारे लिए सम्मान की बात है। welcome वा अलैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाह। मुझे यहाँ आकर खुशी हो रही है। आपका चैनल बहुत अच्छा है। मैं अभी आपके चैनल को देख रहा था। मैं वास्तव में, वास्तव में प्रभावित हुआ, माशाल्लाह। okay जज़ाकल्लाहु ख़ैरन, बहुत शुक्रिया। मैं इसकी कद्र करता हूँ। कई प्रश्नों में तो हमारा मुख्य विषय 'मज़हबों' के बारे में है। तो 'मज़हब' क्या है और हमारे पास 'मज़ाहिब' क्यों हैं?
ठीक है। अच्छा सवाल है। तो किसी भी चीज़ में जो अस्पष्ट या 'Zanni'है, उसके कई संभावित अर्थ हो सकते हैं। और कई लोग यह नहीं समझते कि एक मुद्दे पर दो बयान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, जो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय में हुआ, उनकी उपस्थिति में, खंदक की लड़ाई के बाद। तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सभी के लिए एक घोषणा की। कोई भी 'अस्र' की नमाज़ नहीं पढ़े सिवाय बनी कुरैज़ा में। वो उस क़बीले का नाम है, बनी कुरैज़ा। तो सब लोग तैयार हो गए अपने अपने हिसाब से। कुछ लोग जल्दी तैयार हो गए तो कुछ ने थोड़ा समय लिया। इसलिए कुछ लोग मग़रिब से पहले बनी कुरैज़ा के इलाके में पहुंच गए, जबकि कुछ लोग देर से पहुँचे। जबतक कि वे घर पहुँचे अपना घोड़ा लिया, अपनी तलवार ली, तो जब वो रास्ते में थे, तब मग़रिब का वक़्त हो गया। तो एक समूह बाहर था और उन्होंने कहा, 'रुको, पैगंबर ने कहा था कि कोई भी अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ेगा सिवाय बनी कुरैज़ा में।' और फिर कुछ ने कहा, 'ठीक है, उन्होंने इसे एक expression के रूप में कहा था, मतलब जल्दी करो और सूरज ढलने से पहले वहाँ पहुँचो।' लेकिन उनका मतलब यह नहीं था कि अस्र समय पर न पढ़ो।' और कुछ ने कहा, 'मैं सटीक शब्दों के साथ जाऊंगा। यहाँ बात एक पैगंबर की हैं। वो कोई और नहीं है। वो एक पैगंबर हैं, इसलिए हम अस्र नहीं पढ़ेंगे। ' तो उन्होंने अस्र नहीं पढ़ी, और वे चलते रहे, चलते रहे। वे नहीं रुके, और उन्होंने सूरज ढलने के बाद अस्र पढ़ी। और जब दोनों...
जब ये मसला पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास लाया गया, तो उन्होंने दोनों की analysis को स्वीकार कर लिया। यह क्या साबित करता है? यह हमें साबित करता है कि पैगंबर ﷺ इस तरह से बोल सकते हैं जिसे हमारे दिमाग द्वारा filter किया जा सकता है और दो अलग-अलग नतीजे निकल सकते है। और वो यह भी पुष्टि करते हैं कि दोनों स्वीकार्य हैं। और यही कारण है कि मज़हब मौजूद हैं, क्योंकि अल्लाह और उनके पैगंबर की बातों को संभवतः filter किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि filtering कौन करता है?
तो आपके पास अरबी भाषा में कुछ दक्षताएँ होनी चाहिए ताकि आप 'Mujtahid' कहलाने के योग्य हो सकें, जो इसे filter करेगा, process करेगा और एक result produce करेगा। कुरान हमसे दो प्रकार के आदेशों में बात करता है। एक आदेश जिसे केवल एक ही तरीके से समझा जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि बतौर मुसलमान हमें यह जानने के लिए, for example, jurisprudence की आवश्यकता नहीं है कि मुझे दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़नी है। आपको, दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़नी है। हमें शराब से बचना है। इसके लिए हमें jurisprudence की आवश्यकता नहीं है। हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि यह well known है। लेकिन फिर 'अल्लाह त'आला हमसे बात करता हैं और कुरान में equivocal language जिसे 'zanni या अद दलाला' कहते है, और इसमें ऐसी बातें शामिल होती हैं जिन्हें कई तरीकों से समझा जा सकता है। तो मैं इस पर, मैं इसपर अमल कैसे करूं?
तो ये एक वजह, कारण है कि मज़हब अस्तित्व में आए। एक समय ऐसा आया जब अबू हनीफा, उनका दौर, जो सहाबा के बाद का दौर था, जिसमें उन्होंने बैठकर हमारे शरीर के सभी नियमों को codify और list out किया हमारे शरीर को इबादत एवं एक-दूसरे के साथ में क्या करना है? और वे बहुत से प्रश्नों पर आए जो 'नज़र' या सोचने और जांचने की आवश्यकता रखते हैं। इस शब्द का क्या मतलब है? सहाबा ने क्या किया? यही फिकह है। और प्रत्येक इमाम का अपना method है। मज़हब हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए हैं। अल्लाह ने इस तरह से बात क्यों किया ?
पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्यों की इस तरह से तक़रीर कि जो, जैसे जब एक रौशनी क्रिस्टल में प्रवेश करती है और कई सुंदर रंगों में बँट जाती है। और ये हमारी आसानी के लिए है। वो आपके लिए कठिनाई नहीं चाहते, सही वो आपके लिए यूस्र चाहता है। वो आपके लिए आसानी चाहता है। क्योंकि मानव जीवन बहुत अलग है, इंसानी पृष्ठभूमियाँ बहुत अलग हैं, इसलिए इस धर्म को थोड़ी flexibility चाहिए, और अल्लाह ने इसमें ये भी रखी है। तो वो flexibility हमें allow करता है, अगर मैं अभी एक विशेष स्थिति में रह रहा हूँ जहाँ, बस चीजों को लेकर मेरी समझ ही इतनी कठिनाइयाँ पैदा कर रही है, कि जीवन अब मेरे लिए सामान्य नहीं रहा। यह बहुत कठिन होता जा रहा है। मैं देखता हूँ और उन्हीं texts की एक और understanding मिलती है, और मुझे लगता है कि यह मेरी कठिनाई को कम करता है। मज़हब हमारे लिए आसानी और इस्लाम को practical बनाने के लिए exist करते हैं। वे हमें tribes, sub-tribes में बाँटने के लिए नहीं हैं। वे इसलिए भी नहीं हैं कि उनकी सेवा की जाए, है ना?
वे exist करते है हमारे जीवन को एक मुसलमान के रूप में आसान बनाने के लिए। क्या मज़हबों के इमामों के ज्ञान के स्रोत आज की तरह समृद्ध थे? और शायद उन्होंने कुछ इज्तिहाद इसलिए किए क्योंकि उनके पास सही जानकारी तक पहुंच नहीं थी। हम कैसे सुनिश्चित कर सकते है कि इनके पास सही जानकारी की पहुँच थी। खैर, यह एक अच्छा सवाल है। खैर, अगर आप उन इमामों के शिक्षकों को देखें, तो एक व्यक्ति आश्वस्त हो सकता है कि उन्होंने इस्लाम को अच्छी तरह से समझा, उन्होंने सुन्नत और अरबी भाषा को अच्छी तरह से समझा, क्योंकि उनके शिक्षक सहाबा की औलादें और पोते थे यही कारण है कि ये इमाम इतने पहले थे। अब,ध्यान में रखें, उस समय बहुत सारे इमाम थे लेकिन उनके कुछ छात्रों ने उनके विचारों को आगे नहीं बढ़ाया, और यह... अंततः, हम मानते हैं...
हम मानते हैं कि यह अल्लाह की इच्छा है, कि उन्होंने इन चार को चुना जो आज तक बचे हुए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी, जांचना और दोबारा जांचना और तीन बार जांचना और सुनिश्चित करना। तो पहली गलती जो कोई व्यक्ति करता है वह यह कल्पना करना है कि एक मज़हब किसी एक व्यक्ति के शब्द हैं, जो बहुत पहले के समय में जीवित था। ऐसा नहीं है। एक मज़हब एक जीवित विचारधारा है। मतलब उस इमाम के समय से लेकर अब तक, हर पीढ़ी में विद्वान रहे हैं जिन्होंने उस method of thinking को अपनाया, और उन्होंने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया और ये सुनिश्चित किया कि उन्होंने जाँचा और दोबारा जाँचा और तीन बार जाँचा। और कभी-कभी, हाँ, कभी-कभी उन्होंने... उन्होंने महसूस किया कि मूल संस्थापक का निष्कर्ष वास्तव में सबसे अच्छा उत्तर नहीं है,सही?
उनकी विधि सही थी। उनके काम का अधिकांश हिस्सा सही है। लेकिन इस मामले में, हम उनसे अलग होंगे। ये वास्तव में प्रमाण है कि ये cult following नहीं बल्कि ज्ञान के विश्वसनीय स्रोत है। याद रखें, यह सब judgment का मामला है। और जब आपके पास judgment का मामला होता है, तो आपको बहुत सारे विचारकों की आवश्यकता होती है, बहुत सारे लोगों की जो कहें, "हाँ, यह सही उत्तर था।" यही कारण है कि हमें इन मज़हबों पर इतना विश्वास है, क्योंकि इनमें कितने दिमाग लगे हैं। और ये फिर से इस विचार को खारिज करता है कि यहाँ सिर्फ एक इमाम है और हम सभी तब से उसे ही मानते आ रहे हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। फिक़्ही स्कूलों के अलावा, मातुरीदी और अश'अरी स्कूल भी हैं, वास्तव में वे हमें क्या बताते हैं?
और इन दो स्कूलों का इतना कड़ा विरोध क्यों है?
ठीक है, तो उस दौर के आख़िर में, जब अहकामों का documentation हो रहा था, जब फ़िक्ह का documentation किया जा रहा था। उस time period के आख़िर में theological disputations उत्पन्न हुए। और इन errors के लिए इस theological disputation का अंत मूल रूप से दो approaches के साथ हुआ। पहला approach हम्बली approach था, जिसे أثري approach के तौर पर भी जाना जाता है। ये, ये जो methodology है, इसे हम इसे أثري कह सकते हैं और जो school of thought इसे प्रस्तुत करती थी वह हम्बली स्कूल थी, जिसने मूल रूप से कहा, कि मुताज़िला के विचारकों के सभी errors को reject कर दिया गया है। उन्होंने उन पर पूर्ण विराम लगा दिया। text को follow करें और बस इतना ही। किताब और बस इतना ही। अब, उसके बाद कलामी स्कूल आए, और दो कलामी स्कूल हैं। कलाम का मतलब है dialectical theology, और कलाम का मतलब है dialectical। dialectical theology का मतलब है कि हम वास्तव में आपको प्रश्न दर प्रश्न उत्तर देने वाले हैं। हाँ, हम أثري की rulings से सहमत हैं जो आप कह रहे हैं, "हाँ, ये गलत है," ठीक, और हमें text के अनुसार चलना है, लेकिन हम आपको जवाब देंगे और बताएंगे कि ये क्यों गलत है। और हम आपके साथ बहस करेंगे और यहाँ तक कि हम आपके साथ argue करेंगे, आपके ही अपने methodology से यानी हम rational approach, एक philosophical approach अपनाएंगे और आपको दिखाएंगे कि आप क्यों गलत हैं और मुसलमानों को दिखाएंगे कि उन्हें इन पक्की आस्थाओं पर क्यों ईमान रखना चाहिए। मोटे तौर पर इसे ही कलामी approach के तौर पर जाना जाता है। तो वे...
तो वो दोनों ही सुन्नत की रक्षा करने और सुन्नत को स्थापित करने के approaches हैं। أثري तरीका sources का उपयोग करता है, कुरान और सुन्नत, और वहीं रुक जाता है। कलामी तरीका इन विचारों को व्यवस्थित करने और भटके हुए लोगों व नास्तिकों को जवाब देने की कोशिश करता है। और इमाम नववी कहते है कि उम्मत की अनिवार्य बिदअतों में से एक, वो सूचीबद्ध करते हैं, और इब्न हजर बाद में follow करते हैं, वो बताते है "philosophers को जवाब देने में सक्षम होना, नास्तिकों को जवाब देने में सक्षम होना, विधर्मियों को जवाब देने में सक्षम होना।" ठीक है?
और अब अगर कोई व्यक्ति philosopher है, तो आप उसे ये नहीं कह सकते कि अल्लाह इसीलिए अस्तित्व में है, अल्लाह का अस्तित्व है क्योंकि ऐसा कुरान कहता है। क्योंकि सबसे पहले तो वो कुरान को मानता ही नहीं। इसलिए आपको उनके अविश्वासों का खंडन उस basis पर करना होगा जिस पर वे सहमत हों। और फिर आपको अपने विश्वासों को भी उस basis पर प्रस्तुत करना होगा जिसे वे भी पहचान सकें। दूसरे शब्दों में, एक rational basis। मोटे तौर पर यही कलाम की अवधारणा और कलाम का कानूनी निर्णय है, जैसा कि नववी कहते हैं कि अगर यही लक्ष्य है तो यह आलिमों पर एक फर्ज़े किफ़ाया है। मुझे लगता है कि हर मुसलमान के लिए आज सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जिसकी उन्हें जांच करनी चाहिए वह है उनका ईमान। अर्थात उनका ईमान, अल्लाह और उनके रसूल में उनका विश्वास, और कुरान और हदीस को स्रोत के रूप में मानना, और naturalism, scientism, evolution और secular morality के प्रति उनकी प्रतिक्रियाएं, यह आज के समय में लगभग एक 'फर्ज़े ऐन' के level पर हैं। ठीक वैसे ही जैसे आपके पूर्वजों के लिए, तलवार और तीर चलाना और घुड़सवारी करना और एक तरफ मंगोलों से और दूसरी तरफ क्रूसेडरों से लड़ना फ़र्ज़ था क्योंकि मैंने एर्तुगरुल का पहला सीजन देखा है, इसलिए मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं कि क्या चल रहा था। ऐसे लड़के के लिए, क्या यह फर्ज 'ऐन नहीं है?
यह एक... फर्ज़े ऐन है, मैं इसका अनुवाद 'individual obligation' करूँगा, क्योंकि उस दौर में मंगोल या क्रूसेडर का सामना करने की संभावना शायद 85 प्रतिशत थी। आपको सीखना होगा कि मैदान में कैसे टिकें... एक आदमी ऐसा लड़का कैसे पाल सकता है जो तलवार पकड़ना या घुड़सवारी करना या तीर फेंकना या ढाल पकड़ना नहीं जानता? तो आज की दुनिया में, हम शायद...
ये शायद शारीरिक लड़ाई का सामना नहीं करेंगे। यह कल्पना करना कठिन है कि कोई भी व्यक्ति जिसके पास दिमाग और एक सेल फोन है, वह वैचारिक खतरे का सामना नहीं करेगा, एक वैचारिक मोड़, सिर्फ इसलिए कि हम इतने लोगों के साथ मिलते हैं और विचारों की दुनिया हमारे सेल फोन के माध्यम से हमारे सामने आ रही है। तो मुझे ऐसा लगता है कि हम इसे लगभग एक व्यक्तिगत दायित्व के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं कि हम दृढ़ता से और गहराई से जांचें कि हम मुसलमान क्यों हैं। अब मेरे पास मज़हबों के अलावा अलग-अलग मुद्दों पर सवाल होंगे। और जब हम सूफीवाद को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि इतिहास में इसे लोगों ने बहुत बड़ी संख्या में अपनाया है। और कई लोगों ने अपनी आख़िरत को बचाने के लिए इससे फ़ायदा हासिल किया है। और इसके ख़िलाफ़ इतना विरोध क्यों है?
खैर,उनके ख़िलाफ़ विरोध हो सकता है अगर वे जो करें उसमे कुछ खामियां हो और हमने बात की थी कि अगर हम फिकह को देखें, तो ये मुमकिन है कि एक मुफ्ती ऐसा हो जिनसे गलतियाँ हो जाए, एक मुफ्ती हो सकता है जिसका रिकॉर्ड बहुत खराब हो। उनके सभी फतवे गलत होते हों। तो इसका मतलब ये नहीं है कि फिकह को ही रद्द कर दिया जाए। तो तज़कियतुन नफ़्स कुछ ऐसा है जो हमारे धर्म में हर किसी के लिए आवश्यक है, वो चाहे कोई भी हो। और इसी तरह theology, याद रखें कि कलामी schools of theology का उद्देश्य rational proofs के ज़रिए कुरआनो-सुन्नत और अहलुस्सुन्नत-वल-जमाअत के अक़ीदों को बचाना है। इसे समझाने और defend करने के लिए, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हर मुतकल्लिम या कलाम theologian सटीक होगा, उससे गलती हो सकती है, इसी तरह दूसरी तरफ भी, जिन्होंने أثري methodology अपनाई, Hanbali methodology अपनाई उनसे भी गलतियाँ हो सकती है। मुझे यकीन है कि उनकी रैंक के भीतर, उनके पास ऐसे लोग थे जिन्होंने गलतियाँ कीं, जैसा कि इब्न अल-जौज़ी ने कहा है। इसी तरह, अब तीसरे क्षेत्र में, जहाँ हमने कहा, "इस्लाम, ईमान, इहसान।" वह है- नियम, फिक़्ह और अकीदा। और अब हम इहसान पर आते हैं, जो कि तसव्वुफ़ है। तो तसव्वुफ, तज़कियतुन नफ़्स एक field और branch of knowledge है, जिस पर सहमति है। कोई दो मुसलमान यह नहीं कहेंगे कि, "नहीं, यह कोई subject matter नहीं है।" पुराने समय में, इसे अर-रिक़ाक कहते थे, है ना?
दिलों को नरम करना। और बाद में उन्होंने इसे different subjects, different नामों से पुकारा, जब तक कि उन्होंने इसे तसव्वुफ़ नहीं कहा, ऊन पहनना, क्योंकि वे- वे इसे ऐसा कुछ नहीं कहना चाहते थे जो verifiable न हो,जैसे कि आप ऐसे व्यक्ति को क्या कहेंगे जो हमेशा तज़कियतुन नफ़्स करने की कोशिश करता है, या अपने दिल को शुद्ध करता है? क्या आप उसे शुद्ध व्यक्ति कहेंगे? सही?
आप ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि number one, मैं इसे verify नहीं कर सकता। Number two, आप ख़ुद की तारीफ़ नहीं कर सकते। अगर आप कुरान के क़ारी हैं और आपको क़िराअत पता हैं, तो आप इसे objectively verify कर सकते हैं। आप हम सबके सामने पढ़ सकते हैं। यदि आप एक मुहद्दिस और हदीस scholar हैं, तो आप अपनी हदीस सुना सकते हैं और हम जान सकते हैं कि आप एक हदीस scholar हैं। लेकिन आप अल्लाह की दिन-रात इबादत करके खुद को शुद्ध नहीं कह सकते। नहीं ये। ये नहीं चलने वाला। Number one, यह verifiable नहीं है। Number two, आप खुद की तारीफ़ कर रहे हैं। तो ultimately, वे बस उन्हें कहते है, ऊन पहनने वाले लोग। और यहीं से सूफी शब्द आया। सूफी वह व्यक्ति है जो आत्म-शुद्धि के उस मार्ग पर जा रहा है और वह उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है और इबादत पर, और दुनिया व सभी सुंदर चीज़ों से कट जाना चाहता है, जिससे वो व्यक्ति अल्लाह के करीब हो सके। उसे theology और इबादत, फिकह, न्यायशास्त्र का सही पालन करना होगा। अगर वह इससे बाहर निकलता है, तो वह निंदा के योग्य है। और अगर नहीं, तो वह प्रशंसा के योग्य है। बिदअत का सही मायने में क्या अर्थ है?
क्या इस्लाम में बाद में आने वाली हर चीज़ बिदअत है और इसलिए गलत है? इज़ बिन अबुन सलाम शाफ़ई स्कूल में और अल-क़राफी मालिकी स्कूल में मानते थे कि बिदअत को actions से जोड़कर देखा जाना चाहिए, इसे पाँच categories में बाँटा जाना चाहिए। ताकि बिदअत actions के attribute हों। लेकिन इसकी legal category इस बात पर आधारित है कि हम इसे शरिया के समक्ष कैसे मापते हैं। और वह यह है कि यह फ़र्ज़ हो सकता है, ये मन्दूब, जायज़, मकरूह, और हराम हो सकता है। और ये ज़रूरी बिदआत हैं। ये ऐसी बिदआत है जो फ़र्ज़ है। वो- वो रावियों की छानफटक, हदीसों के रावियों की। इसलिए हमने कभी सहाबा को यह कहते हुए नहीं देखा, "आइए हम इस रजुल की जाँच करें। क्या ये एक फ़क़ीह है? क्या वह मुनकर है?
क्या वह मतलूक है?" और फिर उसे लेबल करना, कि यह रावी صدوق है, यह रावी ثقة है, आदि। अध्ययन के इन सभी क्षेत्रों, और ज्ञान के categorization and organization को भी माना जा सकता है कि ये कुछ ऐसा है जिसे ज़रूरी बिदअत कहा जाए, कुछ ऐसा जो पैगंबर और सहाबा के समय में मौजूद नहीं था। इसके अलावा, शायद सफ़र में जमात से नमाज़ पढ़ना और कुरान को एक मुसहफ़ के रूप में, पुस्तक के रूप में लाना। वे सभी उस समय के बिदआत थे। निश्चित रूप से, वे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय में मौजूद नहीं थे। लेकिन सवाल यह है कि इसका हुक्म क्या है? क्या यह... ठीक है, मान लीजिए हम सहमत हैं कि, Group में ज़िक्र करने जैसा काम एक बिदअत है। ठीक है। क्या यह, क्या ये बिदअत मुझे इस्लाम से बाहर कर देता है?
उसूलन, बिदआत को legal categories में categorize करना होगा। हम Group में ज़िक्र करने को क्या मान रहे है? हम इसे कैसे define करते हैं?
अल्लाह को याद करने के लिए मुसलमानों की किसी भी प्रकार की gathering, सहाबा ने इसे किया था। ख़ुद पैगंबर मुसलमानों के साथ इकट्ठा हुए। और इसलिए एकमात्र प्रश्न जो विवादित विषय के रूप में आता है, वह यह है कि इन सभाओं का आयोजन किस प्रकार से हो सकता है। और क्या तसबीह एक साथ तस्बीह, सभी को एक साथ ज़िक्र करने की अनुमति है या नहीं। यही एकमात्र सवाल है। तो बुलंद आवाज़ में पढ़ना, कोई समस्या नहीं। अज़कार को ऊँची आवाज़ में कहना कोई समस्या नहीं। लेकिन इसे एक साथ सामूहिक रूप से एक आवाज़ में कहना। सिर्फ़ इस बात को लेकर फुक़हा के बीच difference of opinion पाया जाता है। यहां तक कि हम्बली स्कूल में, अल-बुहूती कहते हैं कि कुरान को एक आवाज में ज़ोर से पढ़ने की इजाज़त है। तो हम्बली स्कूल खुद ये कहता है। सभी चार स्कूल इस पर सहमत हैं...
कि इसकी इजाज़त है। इससे हमें ये पता चलता है कि सभी चार मज़हबों में, इसकी इजाज़त होगी कि हम एक ज़िक्र की gathering करें जिसमें हम कुरान और ज़िक्र को एक साथ मिलकर पढ़ें। हर साल जब रमज़ान करीब आता है, जैसे, आप जानते हैं, तीन महीने करीब आते हैं, तीन पाक महीने, कुछ खास रातें चर्चा में आती हैं, लोगों का ध्यान खींचती हैं। जैसे रग़ाइब, मेराज, बराअत, मव्लिद। और क्या ये भी बिदआत हैं, और क्या इनका हमारे पैगंबर, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में कोई आधार है?
ठीक है। तो यह एक अच्छा सवाल है। तो ये विशेष रातें, जिनमे से कुछ के बारे में रिवायतें और हदीस आई हैं। और हदीस कमज़ोर हो सकती है, लेकिन फिर भी, कोई यह दावा नहीं कर रहा है कि इन रातों का पालन करना एक फ़र्ज़ है। और कमज़ोर हदीस का उपयोग regular अच्छे आमाल के लिए किया जा सकता है जो कि...
जब तक कोई इसे फ़र्ज़ नहीं कहता। क्योंकि कमज़ोर हदीस का उपयोग फ़र्ज़ या हराम तय करने के लिए नहीं किया जा सकता। हाँ। लेकिन उन पर अमल किया जा सकता है। तो शुरुआती फुकहा, और मैं एक क़ौल सुनाऊँगा, आपको इमाम मालिक का एक उदाहरण दूंगा, वो मानते थे कि उन्हें पसंद नहीं था कि इन रातों को खुलेआम और सार्वजनिक रूप से बड़े gatherings में मनाया जाए ताकि लोग उन्हें फ़र्ज़ न समझें। इसलिए उन्होंने इस सार्वजनिक रूप से इकट्ठा होने को discourage किया। इसको मूलतः नहीं, बल्कि इसलिए कि वह नहीं चाहते थे कि लोग इसे एक फ़र्ज़ समझें। मलिक ने शव्वाल के छह दिनों के रोज़े के बारे में भी यही बात कही। वो नहीं चाहते थे कि लोग इसे एक फ़र्ज़ समझें। अब, बाद में, उलेमा में मतभेद हुआ। क्यों?
क्योंकि उन्होंने देखा कि इसमें एक बड़ी समस्या थी। मामला ये नहीं है कि लोग सोचेंगे कि यह एक फ़र्ज़ है। लोग अब काफी हद तक जानते हैं कि क्या फ़र्ज़ है और क्या नहीं। और, यहाँ एक general awareness की कमी है। एक गफलत, एक लापरवाही है जो उम्मत पर छा गई है। इसलिए, वे अल्लाह के क़ौल का उपयोग करते हैं, "वा ता'आवनू अलल-बिर्री वत्तक़वा" अच्छे कामों में एक-दूसरे का साथ दें। तो अगर हमें कोई काम मिलता है जो एक कमज़ोर हदीस में भी है, या एक सामान्य सिद्धांत में जैसे कि रबी' उल-अव्वल में पैगंबर की याद, जो मूल रूप से मौव्लिद है, तो उन्होंने इसे उसका हिस्सा माना। वा ता'आवनू अलल-बिर्री वत्तक़वा। अच्छे कामों और परहेज़गारी में एक-दूसरे का साथ दें। और हम देखते हैं कि उम्मत गफलत में है, एक बड़ी गफलत, इसलिए, जिस भी चीज़ का कोई आधार है। लोगों को इकट्ठा करना एक अच्छी बात है। और यह अब इसे priority दी जाती है। क्योंकि लोग तो अपने फ़राइज़ भी नहीं निभाते इसे एक फ़र्ज़ समझें इसकी तो उम्मीद ही मत कीजिए। यह, मुझे लगता है, शैतान की तहरीज है, वह तर्क जो शैतान उम्मत के सामने लाता है। क्या आपको लगता है कि इन मुद्दों पर विभाजन उम्मत को नुकसान पहुंचाता है?
मुझे वास्तव में बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना पसंद नहीं है, कि हमारे पास एक उम्मत है जो जंग में है। और... लेकिन एक चीज जो मैं कर सकता हूं, और योगदान दे सकता हूं, वह यह दिखाना है कि कुछ चीजें इब्लीस के छलावे हैं जो लोगों को बहस के कीचड़ में घसीट रही हैं। अगर अल्लाह ने कुछ विशाल बनाया है, तो इसे अपनी राय से छोटा करना आपके ऊपर नहीं है। और ऐसे ही मुद्दे है जहाँ नमाज़ पढ़ने वाले मुसलमानों और इस, practicing Muslims के बीच, इब्लीस की तहरीज होती है, एक group कहता है, "यह ऐसा ही होना चाहिए।" दूसरा group कहता है, "नहीं, यह वैसा ही होना चाहिए।" और यही disunity की ओर ले जाएगा। और यह कोई 'coincidence' नहीं है कि disunity उस समय उभरती है जब मुसलमान जंग में होते हैं, है ना?
जब मुसलमानों पर जंग थोपा जा रहा होता है, तो disunity की कई परतें हमें प्रभावित करती हैं। तो उम्मत की शक्ति पहले ही टूट चुकी है। metaphorically कहें तो, यह सब इब्लीस की ओर से है, एक छलावा जो आपको उस हक़ीक़ी लड़ाई से बहुत दूर रखने के लिए है जिसमें वो ये सुनिश्चित करना चाहता है कि आप उसमे हिस्सा न लें और अंत में, अगर आपको सभी युवा मुस्लिम उम्मत से बात करने का मौका मिले, तो आप कुछ पलों में क्या कहना चाहेंगे? मैं बस इतना कहूंगा कि अगर हम अल्लाह सुब्हानहु वा त'आला की ओर लौटें, तो अल्लाह त'आला भी हमारी ओर लौटेगा। "इन तन्सुरुल्लाही यनसुरकुम।" ठीक? अल्लाह को नुसरत दो, अल्लाह हमें नुसरत अता करेगा। यह इस ज़िंदगी में भी संभव है। यह कैसे संभव है? खैर, इतिहास में, अल्लाह ने अन्य चीजें कैसे बनाई?
दाऊद ने Goliath को कैसे हराया? अरबों ने एक साथ Byzantine और फारसियों को कैसे हराया? मेरा मतलब है कि यह इतिहास में भी नहीं है, वे कहते हैं कि पहली बात यह है कि सेनाएं क्यों हारती हैं क्योंकि उन्हें दो मोर्चे के युद्ध का सामना करना पड़ता है। सहाबा की एक सेना के बारे में क्या जो अरब के थे और जिनके पास कुछ नहीं था, फिर भी उन्होंने जानबूझकर दो मोर्चे के युद्ध में हिस्सा लिया और दोनों में जीत हासिल की! यह कुछ ऐसा था जो उमर की जिंदगी में हुआ था। अगर आप उन्हें उस वक्त जब वो दस साल के थे, कहते कि 'आप अपनी नेतृत्व में इन दोनों सेनाओं को हरा देंगे", तो यह हंसी का विषय होता, है ना?
और ये हो सकता है अगर हम,"इन तनसुरुल्लाही यन्सुरकुम।" अगर हम, अगर हम एक उम्मत के रूप में इसका पालन करें, तो हमें नहीं पता कि क्या होगा। बहुत सारी महान चीजें होंगी। और मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि हालांकि क्षितिज पर अंधकार है, मैं मानता हूं कि इस जीवनकाल में बहुत सारी महान चीजें होंगी। जज़ाकल्लाह खैर, Sheikh और हमारे साथ होने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद डॉक्टर शदी अल-मसरी। ये हमारे लिए एक अत्यंत सम्मान की बात थी। व-इयाकुम, इंशा'अल्लाह हम आपके साथ आगे भी चर्चा,करना चाहेंगे। इंशा'अल्लाह भविष्य की परियोजनाओं में भी आपके साथ, काम करना चाहेंगे। और अल्लाह इसमें बरकत दे और आपके सभी कामो के लिए आपको इनाम दे। जज़ाक़ल्लाहु ख़ैरन और आपके चैनल ने शानदार काम किया है। आप 3 मिलियन सब्सक्राइबर्स के करीब हैं, जो एक अद्भुत उपलब्धि है। अल्लाह-आपको तौफीक दे।