Towards Eternity
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केवल पढ़ें नहीं, अल्लाह से जुड़ें: सुरह फ़ातिहा का रहस्य | अपनी नमाज़ बदलें - एपिसोड 1

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हम रोज़ाना क़रीब 40 बार सूरह अल-फातिहा पढ़ते हैं, लेकिन अगर मैं पूछूँ, "क्या आपको सूरह अल-फातिहा का मतलब पता है?" तो हममें से ज़्यादातर शायद नज़रें चुराने लगेंगे, है ना? या अगर हम इस बारे में सड़क पर इंटरव्यू करें तो? तो अफ़सोस, ज़्यादातर मुसलमानों को सूरह अल-फातिहा का मतलब ही नहीं पता होगा। क्या ये अजीब नहीं लगता? कैसे कोई इंसान रोज़ 40 बार कुछ बोले, और उसे ये भी न पता हो कि इसका मतलब क्या है?

या फिर शायद हमें बस ऊपर-ऊपर से पता हो, उसका असली मतलब नहीं। कल्पना कीजिए, आप किसी ख़ज़ाने का नक्शा बार-बार दोहराते हैं, लेकिन कभी उस ख़ज़ाने को पाने की कोशिश ही नहीं करते। यही होता है जब हम मतलब को नज़रअंदाज़ करते हैं, कुछ सवाल ऐसे हैं जो हमें खुद से ज़रूर पूछने चाहिए। भाइयों - बहनों, ज़रा अपनी आज की आख़िरी नमाज़ को याद कीजिए। नमाज़ के दौरान आप क्या सोच रहे थे? आपके दिल और दिमाग़ में क्या चल रहा था? आपके दिल में कौन-सा अर्थ आया?

सच कहें तो शायद ज़्यादा कुछ नहीं हुआ होगा। थोड़ा ठहरिए और कल्पना कीजिए, कि आप बादशाहों के बादशाह के सामने खड़े हैं। आपके होंठ तो चलते हैं, लेकिन आपका दिल खामोश होता है। हम यहाँ उसी दूरी को कम करने के लिए हैं, इंशा'अल्लाह। जो अर्थ हम अब समझने जा रहे हैं, वे बेहद गहरे और दिल को छू लेने वाले हैं। हम इससे बहुत फ़ायदा उठाने वाले हैं, और आज हम वाक़ई में खुश होंगे। ये एक वीडियो सीरीज़ होने वाली है। सूरह अल-फातिहा, सूरह अन-नास, सूरह अल-फ़लक और “सुबहानका अल्लाहुम्मा” यानी नमाज़ की शुरुआती दुआ। हम इन सभी बुनियादी सूरह और दुआओं के गहरे मतलब को समझने वाले हैं, जो हम नमाज़ में पढ़ते हैं। और हम इसे एक वीडियो सीरीज़ बनाएंगे। ये एहसास सिर्फ lesson के अंदर तक सीमित नहीं रहेंगे। हम इन्हें अपनी नमाज़ में भी लेकर जाएंगे। इंशाअल्लाह, हम अपनी नमाज़ों में बदलाव लाएंगे। जब हम नमाज़ शुरू करेंगे और कहेंगे, “अलहमदुलिल्लाह” तब ये Lesson हमारे दिमाग में रहेगा और हमारे तफ़क्कुर, यानी गहरे चिंतन का हिस्सा बनेगा। वीडियो देखने के बाद, इंशा'अल्लाह, आप पहले जैसी नमाज़ नहीं पढ़ेंगे। आपकी नमाज़ का अनुभव बदल जाएगा। आपका दिल हर शब्द को नए तरीक़े से महसूस करेगा। हर रुकू (झुकना) अब और भी प्यारा लगेगा, और हर सज्दा ऐसा लगेगा जैसे आप घर लौट आए हों, इंशा'अल्लाह। चलिए शुरू करते हैं। सूरह अल-फातिहा। इसका दुसरा नाम उम्मुल क़ुरआन है। इसका मतलब क्या है?

इसका मतलब है "क़ुरआन की माँ" यानी इसका मूल, इसका सार(essence)। इसमें केवल सात आयतें हैं, लेकिन यह पूरे क़ुरआन का संदेश समेटे हुए है। सहीह अल-बुख़ारी में एक हदीस है। एक दिन, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने एक साथी से कहा कि "मैं आपको सबसे बड़ी सूरह सिखाऊँगा।" वो सूरह जो"अलहम्दुलिल्लाह रब्बिल आलमिन" से शुरू होती है और यह क़ुरआन में सबसे बड़ी सूरह है। "सबसे बड़ा" का मतलब यहाँ कुछ अलग है, blessings के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि इसमें पूरे क़ुरआन का मूल, उसका सार मौजूद है। एक और हदीस में चार मौक़ों का जिक्र है, जब शैतान चीखा और कष्ट से काँप उठा। उन चार मौकों में से एक सूरह अल-फातिहा का नाज़िल होना था। आप सोचिए, ऐसा क्यों हुआ? यह कुछ गंभीर बात है, है ना?

इसके बारे में सोचिए। अगर केवल सात आयतों वाली एक सूरह शैतान को इतनी गहराई से हिला सकती है, तो हमें वाक़ई उस सच्चाई पर ध्यान देना चाहिए। जो इसमें निहित है। ये वाकई सोचने योग्य बात है। सूरह अल-फातिहा में एक तरह की दुआ है। यह सिर्फ किसी घटना के बारे में नहीं बता रही है। यह अल्लाह के नामों और उसके गुणों के बारे में बताती है। और यह blessings से भरी हुई है और इसमें कई खास गुण हैं। बिस्मिल्लाह के बाद पहला वाक्य क्या है? الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ इसका मतलब: “सारी तारीफ़, हम्द अल्लाह के लिए है, जो पूरी दुनिया का मालिक है।” तो हम्द का मतलब क्या है? कभी-कभी जब आपके साथ कुछ अच्छा होता है, तो आप आभारी महसूस करते हैं, और आप, जिसने यह किया, उसकी तारीफ़ करना चाहते हैं, है ना?

उस एहसास को हम्द कहते हैं। और उस आयत में, हम्द किसकी कही गई है?? अल्लाह की, जो दुनिया का मालिक है। मान लीजिए आप एक बच्चे हैं जो बहुत ग़रीब परिवार से है। आपके पास खाने के लिए खाना भी नहीं है। फिर कोई आता है, आपकी देखभाल करता है, खाना-पानी देता है, कपड़े खरीदकर देता है। इससे आपको कैसा महसूस होगा। आप शायद आभारी महसूस करेंगे, है ना?

जैसे कि आप अंदर ही अंदर उनका कोई एहसान मानते हैं। और वो देना जारी रखता है। “देखो, ये कार और सुंदर घर अब तुम्हारा है।” नए-नए फोन, हर चीज़ जो आप चाहते थे, सच हो रही है। उस पल, आपके दिल में अंदर से "धन्यवाद" कहने की बहुत तेज़ इच्छा होती है। भले ही वह कहे, “आपको धन्यवाद कहने की ज़रूरत नहीं है,” फिर भी आपके दिल में यह एहसास रहेगा। आप बस चुप नहीं रह सकते। नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमेशा “अलहम्दुलिल्लाह” कहा करते थे, और वो हमेशा अल्लाह के आभारी रहते थे। वो रात में उठकर तहज्जुद पढ़ते थे। वह इतनी देर तक खड़े रहते कि उनके पैरों के तलवों में सूजन आ जाती। हमारी माँ आयशा ने एक बार उनसे पूछा कि वह इतनी ज़्यादा इबादत क्यों करते हैं। ये एक बिल्कुल उचित सवाल है, है ना?

नबी को जन्नत की गारंटी थी, तो उन्हें इतना करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। हाँ, तहज्जुद उनके लिए अनिवार्य था, लेकिन उन्हें इतना पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी कि उनके पैर सूज जाएं। यहाँ तक कि दो रक़अत भी तहज्जुद में गिनी जाएंगी, है ना? तो फिर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस सवाल के जवाब में क्या कहा, “वह इतनी इबादत क्यों करते हैं?” उन्होंने कहा, “क्या मैं आभारी बन्दा नहीं बनूँ?” मैं इस जवाब को कई सालों तक समझ नहीं पाया। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इतनी इबादत क्यों करते थे, भले ही उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं थी?

बाद में मुझे समझ आया। उनके अंदर, कृतज्ञता (gratitude) की एक, मजबूत भावना थी एक ऐसी gratitude जिसे वह रोक नहीं सकते थे। इस भावना को शांत करने के लिए, वह नमाज़ के जरिए "धन्यवाद" कहना चाहते थे। यह हम्द है। तो, जब आप अपनी नमाज़ में "अल्हम्दुलिल्लाही रब्बिल आलमीन" कहें, तो इस मतलब को याद रखें। खुद से पूछें, क्या हम अपनी नमाज़ में ऐसे ही हैं? आपने नमाज़ पढ़ना कब शुरू किया? शायद 20 साल हो गए। आप सालों से “अलहम्दुलिल्लाही रब्बिल आलमिन”, कहते आ रहे हैं लेकिन आपने कितनी बार सच में ऐसा आभार महसूस किया है, अल्लाह के साथ एक असली भावनात्मक जुड़ाव का अनुभव किया है?

कभी-कभी जब सब कुछ बहुत अच्छा होता है या आप किसी मुश्किल से बाहर निकलते हैं, तो उस तरह का एहसास पैदा होता है। आप कहते हैं, “या अल्लाह, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ! या अल्लाह, मैं आपकी तारीफ़ करता हूँ!” लेकिन जब जीवन फिर सामान्य हो जाता है, जब सब कुछ फिर से रोज़मर्रा जैसा बन जाता है, हम अपने आस-पास की blessings पर ध्यान देना बंद कर देते हैं, और शुक्र भूल जाते हैं। इस्लाम के शुरुआती दिनों के बारे में सोचिए। सहाबा और रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी मुश्किल थी, लेकिन उसमें हम्द बहुत ज़्यादा थी। एक बार जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़ पढ़ रहे थे, तो उन्होंने उनके कंधों पर जानवर की आँतें फेंक दीं। क्या आप यक़ीन कर सकते हैं?

इसे बताना भी मुश्किल है। ज़रा उस बदबू के बारे में सोचिए। बदबू इतनी तेज़ और गंदी थी कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया था। अपने जीवन में, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लगातार कठिन परीक्षाएँ झेली, उनके जीवन में बहुत दर्द था। और फिर भी, उन्होंने हमसे लाखों गुना ज़्यादा अल्लाह की तारीफ़ की। और हम "अलहम्दुलिल्लाह" कहने का कारण भी नहीं ढूँढ़ पाते। हम इसे नहीं देखते। तो शायद असली समस्या हमारी सोच में है। अगर हमारी सोच, हमारा दिल क़ुरआन पर आधारित हो, अगर हम ऐसे कामों में लगे रहें, तो भले ही जीवन मुश्किल हो जाए, तब भी हम खुश महसूस कर सकते हैं और "अल्हम्दुलिल्लाह" कह सकते हैं। यही वह रहस्य है, जो इस दुनिया में और आख़िरत दोनों में सच्ची खुशी लाता है। अब ज़रा खुद से पूछिए, क्या हमारे पास सच में आभारी होने की वजहें हैं, या हम बस बातों को बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं?

जीभ पर लगभग 8,000 टेस्ट रिसेप्टर्स होते हैं। हर देश का अपना खाना होता है, है ना? और हर एक में अनगिनत तरह के फ्लेवर होते हैं। जीभ उन सभी का स्वाद ले सकती है। इसमें उन सभी फ्लेवर का स्वाद लेने की क्षमता है, और फिर भी यह मांस का एक छोटा सा टुकड़ा है। क्या आप इसके लिए आभारी नहीं होंगे?

या अपनी आँखें बंद कर लें। पूरा दिन ऐसे ही बिताने की कोशिश करें। तब आपको समझ आएगा कि आपकी आँखें कितनी बड़ी blessing हैं। यहाँ तक कि उन्हें झपकाना भी एक बहुत बड़ी blessing है। यह आपकी आँखों को धूल, कीटाणुओं और सूखेपन से बचाता है। हर पलक झपकाने से आपकी रेटिना पर तस्वीर रिफ्रेस होती है, जिससे आपका दिमाग बिना किसी हिलावट या रुकावट के साफ़ और स्थिर तस्वीर देखता है। हमें इसकी इतनी ज़रूरत है कि अल्लाह ने इसे हमारे नियंत्रण से बाहर बना दिया। आपकी आँखें अपने आप उतनी बार झपकती हैं, जितनी ज़रूरत होती है, भले ही आपको इसका एहसास न हो। यहाँ एक और उदाहरण है, इसे स्थिरता (stabilization) कहा जाता है। क्या मैं आपसे कुछ कह सकता हूँ, रमज़ान?

ज़रा कैमरा उठाइए और जितनी तेज़ी से हो सके आगे बढ़िए। अब वापस जाइए। अब देखिए, तस्वीर आपकी आँखों जैसी स्थिर नहीं रहती, है ना? यह आपकी आँखों जैसी नहीं है, क्यों नहीं ? क्योंकि अल्लाह ने आपकी आँखों को यह अद्भुत क्षमता दी है। कैमरा Stabilization कैसे काम करता है, यह जानने से पहले हमें एहसास भी नहीं था कि यह कितनी बड़ी नेअमत है। आप चल रहे होते हैं, दौड़ रहे होते हैं, लेकिन जिस चीज़ को आप देख रहे होते हैं, वह स्थिर रहती है। हमारे रब ने हमारे दिमाग में ऐसा सिस्टम बनाया है कि आप उस चीज़ को लगातार स्थिर ही देखते रहते हैं। आइए आगे बढ़ते हैं। माँ एक blessing है। आप मुसलमान हैं, इससे बड़ी blessing और क्या हो सकती है?

अल्लाह ने इतनी सारी नेअमतें (blessings) पैदा की हैं कि कुछ लोग तो उन्हीं नेअमतों की इबादत करने लगे हैं। वे गाय की पूजा क्यों करते हैं? वे सूरज की पूजा क्यों करते हैं?

उन्हें इससे बहुत फायदा होता है, और वे इसमें इतनी नेअमते देखते हैं कि आखिर में वे इसी की इबादत करने लगते हैं, क्योंकि उन्हें इससे बहुत लाभ मिलता है। मतलब, भले ही उन्होंने पूरे मामले को गलत समझ लिया हो, मैं यह इसलिए कह रहा हूँ ताकि हम समझ सकें कि लोग उस रास्ते पर क्यों चले गए। एक आयत है जो मुझे बहुत पसंद है, सूरह इब्राहिम आयत नंबर 32 से 34 तक। “अल्लाह ही है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, जिसने आसमान से पानी बरसाया, और उसी से तुम्हारे रिज़्क के लिए फ़सलें पैदा कीं। तुम्हारे लिए कश्तियां तुम्हारे बस में कर दी- ताकि उसके हुक्म से दरिया में चलें , और नदियों को भी तुम्हारे खिदमत में लगा दिया उसने सूरज और चाँद तुम्हारे लिए उपयोगी बनाए, जो अपने रास्तों पर स्थिर हैं। उसने रात और दिन तुम्हारे लिए उपयोगी बनाए, और उसने तुम्हें वह सब कुछ दिया जो तुमने उससे माँगा। यदि तुम अल्लाह की नेमतों को गिनना चाहो, तो उन्हें गिन नहीं सकोगे। मनुष्य बड़ा ही बेइंसाफ और बड़ा नाशुक्रा है। सुबहानअल्लाह पहला वाक्य क्या था?

الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ सारी तारीफ़ (हम्द) अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है। तो जब हम कहते हैं “रब्बुल आलमीन”, हमें क्या सोचना चाहिए? जब आप “रब” शब्द सुनते हैं तो आपके दिमाग में क्या आता है? वही जो पालता है, संभालता है, और सही रास्ता दिखाता है। यही “रब” का मतलब है। जब भी आप “रब” सुनें, यही बात याद आनी चाहिए। वही है जो अपनी रचना को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदल देता है। उदाहरण के लिए, एक सेब के बीज के बारे में सोचिए। अल्लाह उस बीज को किसमें बदल देता है? एक पेड़ में। रब (मालिक) उसे पालता-पोसता है। और क्या? उस पेड़ से एक फल उगता है, लेकिन वह अभी लाल नहीं हुआ है। यह धीरे-धीरे लाल हो जाता है। अल्लाह उसे पाल रहा है। एक और उदाहरण, आप पहले शुक्राणु थे, है ना?

फिर आप क्या बने? एक बच्चा। उसके बाद क्या हुआ?

आप खड़े हुए, चलना शुरू किया, और किशोर बने। आपका शरीर बदलने लगा। आपका रब आपको एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदल रहा है। आप बड़े हुए, बूढ़े हुए, और फिर मर गए। आपने अपनी यात्रा हमेशा की ज़िंदगी यानी आख़िरत की ओर शुरू की। अल्लाह आपका पालन-पोषण जारी रखता है। अब ज़रा पूरे सूक्ष्म और विशाल ब्रह्मांड के बारे में परमाणुओं से लेकर आकाशगंगाओं तक सोचिए। उसके भीतर की हर चीज़ के बारे में सोचिए। उस असीम अंतरिक्ष के बारे में सोचिए, और अल्लाह के बारे में सोचिए — जो हर चीज़ का रब है, जो अपनी हर रचना को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलते रहता है। आइए थोड़ी देर के लिए अंतरिक्ष, मिल्की वे आकाशगंगा के बारे में सोचते हैं। यह अंतरिक्ष की कई आकाशगंगाओं में से बस एक है। कल्पना कीजिए कि हम अंतरिक्ष में 300,000 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से यात्रा कर रहे हैं। प्रकाश की गति 300,000 किलोमीटर प्रति सेकंड है, है ना?

तो हमारे पास एक वाहन है जो इतनी तेज़ी से चल रहा है। कल्पना कीजिए, और हम कहते हैं, "मैं मिल्की वे आकाशगंगा के किनारे पहुँचने वाला हूँ।" ध्यान दीजिए, पूरा ब्रह्मांड नहीं, सिर्फ मिल्की वे का किनारा। और आखिरकार हम वहाँ 100,000 साल बाद पहुँचते हैं। जब हम 'ब्रह्मांड' या 'पूरी दुनिया' कहते हैं, तो अंतरिक्ष खुद उनमें से सिर्फ एक है। और उसके भीतर हज़ारों नहीं, बल्कि लाखों और भी दुनिया है। और अल्लाह उन सबका रब है रब्बुल आलमीन (सारे जहानों का मालिक)। जब आप "पूरी दुनिया" के बारे में सोचें, तो अपने विचारों को सीमित न करें। मछलियों की दुनिया, जानवरों की दुनिया, पौधों की दुनिया, इंसानों की दुनिया की कल्पना कीजिए। हर एक की अपनी एक अलग दुनिया है। आप तो हर एक इंसान की भी उसकी अपनी एक दुनिया मान सकते हैं। अंतरिक्ष में हज़ारों या लाखों दुनिया मौजूद हैं। एक ऐसा रब जो उन सबको अपने नियंत्रण में रखता है, और हर एक दुनिया और उसमें मौजूद हर चीज़ की परवरिश करता है। और हम एक रब के सामने खड़े होते हैं जिसके पास उस तरह की असीम शक्ति है, और हम सूरह अल-फ़ातिहा की तिलावत करते हैं। मेरे अंदर एक खुशी महसूस होती है कि मैं ऐसे ख़ुदा का शुक्र अदा कर सकता हूँ। अब, उस आयत में एक शब्द है: "belongs" सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, जो पूरी दुनिया का रब है। तो, कौन-सा अरबी शब्द इस्तेमाल हुआ?

इस शब्द के लिए “Belongs” ये शब्द है "लि", और ये "लि" बहुत महत्वपूर्ण है। वह हम्द किसका है? हमारे आस-पास के किसी ताकतवर व्यक्ति का? बॉस का? नहीं, यह अल्लाह का है। क्यों? क्योंकि हमारे आस-पास ऐसी कोई चीज़ नहीं है जो अल्लाह ने न बनाई हो। तो फिर हम किसी और की "हम्द" कैसे कर सकते हैं? क्योंकि अल्लाह ने सब कुछ बनाया, जो दिखता है और जो नहीं दिखता है। और जो कुछ भी हम देख सकते हैं, सारी तारीफें, सारे शुक्र केवल उसी के लिए हैं। आप उसका कोई भी हिस्सा किसी और को नहीं दे सकते। क्योंकि उसी ने हर चीज़ को अस्तित्वहीनता से अस्तित्व में लाया। तो अब हमने "अलहम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन" को पूरा समझ लिया। सारी तारीफ़, हम्द, सिर्फ अल्लाह के लिए है, जो पूरी दुनिया का रब है, रब्बुल आलमीन। तो अगली आयत क्या है?

الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ सबसे दयालु, सबसे ज़्यादा रहम करने वाला। अब हम इसे पिछली आयत से कैसे जोड़ें? हमने अभी कहा, "रब्बुल आलमीन"। अल्लाह कह रहा है, "मैं ही तुम्हें पालता और बढ़ाता हूँ।" दूसरे शब्दों में, "मैं ही हूँ जो तुम्हें एक अवस्था से दूसरे अवस्था में बदलता है, और मैं तुम्हें बदलता रहूँगा।" लेकिन क्या होगा अगर वह बदलाव कुछ ऐसा बन जाए जो हमें पसंद न हो? उदाहरण के लिए, आपको परिपक्व होने में मदद करने के लिए आप पर कोई मुसीबत आ सकती है। उसके तुरंत बाद, वह कहते हैं, "अर-रहमान निर-रहीम"। डरो मत। वह पूरी तरह दयालु हैं। उसकी रहमत सिर्फ माँ की ममता से लाखों गुना नहीं है, यह उससे कहीं ज्यादा है। यह अनंत है। तो यहाँ क्या हुआ?

"रब्बुल आलमीन" ने हमें थोड़ा हिला दिया। इससे यह एहसास हुआ, "क्या मेरे साथ कुछ होने वाला है, रब्बुल आलमीन?" लेकिन फिर कहा गया, "डरो मत।" जो आपको एक अवस्था से दूसरे अवस्था में बदलता है, वही आपके प्रति पूरी तरह दयालु है। वह आपसे बहुत प्यार करता है। वह आप पर पूरी तरह दयालु और करुणामय हैं। तो अगर आपके साथ कुछ ऐसा होता है जो आपको पसंद नहीं है, उसके पीछे भी रहमत है। आपको उसी रहमत की ओर ले जाया जा रहा है। यह वह हिस्सा है जिसके बारे में ज़्यादातर लोग सोचते हैं। "ठीक है, मैं समझ गया। लेकिन असल में अर-रहमान और अर-रहीम में क्या फर्क है?" क्या ये दोनों एक ही हैं?" तफ़सीर के विद्वान आमतौर पर इसे इस तरह समझाते हैं: अर-रहमान-अल्लाह की रहमत पूरी दुनिया के लिए है, हर चीज़ चाहे वह ज़िंदा हो या न हो। इस दुनिया में वह ग़ैर-मुसलमानों को भी जो नेअमतें देता है, वह भी उसकी रहमत में आती हैं। अर-रहीम, खास तौर पर मुसलमानों के लिए उसकी खास रहमत है। यह उस रहमत से जुड़ी है जो जन्नत की ओर ले जाती है। उदाहरण के लिए, जब बारिश होती है, क्या यह सिर्फ मुसलमानों पर ही होती है?

नहीं, ग़ैर-मुसलमान भी इससे फ़ायदा उठाते हैं। सूरज उनपर भी निकलता है। यह नाम अर-रहमान का reflection है। लेकिन अल्लाह सिर्फ़ मुसलमानों को ही जन्नत में जाने देगा, और यह अर-रहीम के नाम का तफक्कुर (विचार), reflection है। ठीक है, अब हम अगले आयत की तरफ बढ़ते हैं। सारी आयतें आपस में जुड़ी हुई हैं। مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ जिसका मतलब है, "वह न्याय के दिन का मालिक है।" यौमिद्दीन से हम यह समझ सकते हैं कि यह हिसाब और सज़ा का दिन हो सकता है। तो, इसके ठीक पहले वाली आयत क्या थी?

यहाँ एक मज़बूत जुड़ाव है। "अर्रहमान निर्रहीम" सबसे ज़्यादा दयालु, सबसे ज़्यादा रहम करने वाला। अल्लाह की रहमत के बारे में कई हदीसें हैं। जब हम उन हदीसों को पढ़ते हैं, तो दिल के अंदर गहरी शांति महसूस होती है। ऐसे विचार आते हैं कि, "ठीक है, हम निश्चित रूप से जन्नत जा रहे हैं। ऐसे विचार हमारे मन में आने लगते हैं, है ना? हमें सुकून महसूस होता है। कुछ लोग तो कहते हैं, "हम नमाज़ नहीं पढ़ते, लेकिन अल्लाह बहुत दयालु हैं।" उसकी रहमत अनंत है," और वे इस सोच से खुद को आराम देते हैं। वे सोचते हैं, "अल्लाह वैसे भी हमें माफ कर देगा।" हम बाद में तौबा करेंगे, और शायद हमें जहन्नम में नहीं जाना पड़ेगा।" तो "अर्रहमान निर्रहीम" के बाद क्या आता है? "मालिकी यौमिद-दिन"- कयामत के दिन का मालिक, अब क्या होता है?

अल्लाह मुझे मेरी लापरवाही से जगा देता है। मैं अभी थोड़ी राहत महसूस कर रहा था -"अर्रहमान निर्रहीम"। और अचानक "मालिकी यौमिद-दिन" आ जाता है, क़यामत के दिन, नतीजों के दिन का मालिक। जैसे वह कह रहा हो, "जागो।" वह मुझे डर और उम्मीद के बीच रख देता है। डर और उम्मीद, दोनों के बीच। और यही हमारे धर्म (दीन) में भी है, हमें डर और उम्मीद के बीच जीना चाहिए। यही हमारा नज़रिया होना चाहिए। क्या मैं जन्नत में जाऊँगा? इंशा अल्लाह, मुझे उम्मीद है। क्या मैं जहन्नम में भी जा सकता हूँ?

हाँ, जा सकता हूँ, इसलिए मुझे सावधान रहना चाहिए। हमें हमेशा डर और उम्मीद के बीच रहना चाहिए। उदाहरण के लिए, "मैं तो ज़रूर जहन्नम में जाऊँगा, मैं खत्म हो गया हूँ, मेरी ज़िंदगी बर्बाद है। देखो, मैंने कितने गुनाह किए हैं, मैं खत्म हो गया।" हमें इस तरह की निराश सोच में नहीं रहना चाहिए। या, "क्या मैं जन्नत में जाऊँगा?

बेशक जाऊँगा।" यह भी ठीक नहीं है। यह एक झूठा आत्मविश्वास है। भाई और बहनों, सावधान रहें। हमसे हर किए गए काम का हिसाब लिया जाएगा। अब यह आयत "मालिकी यौमिद-दिन" मुझे वापस संतुलन में लाती है। देखो, हमारा deen कितनी बुद्धिमानी से भरा है। यह आपको लापरवाही में नहीं पड़ने देता, और न ही निराशा में डालता है। अब इसके बारे में सोचिए। दुनिया में अत्याचारी लोग हैं। कल्पना करें उन लोगों की जो फ़िलिस्तीन पर अत्याचार कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों बच्चों को मार डाला। हाल ही में मैंने "द वाशिंगटन पोस्ट" में एक खबर देखी। इसमें गाजा में मारे गए 18,500 बच्चों के नाम एक-एक करके लिखे गए थे, और उनकी कहानियाँ साझा की गईं। जैसे ही आप स्क्रॉल करते हो, पेज अंतहीन लगता है। हजारों बच्चे, उनकी उम्र लिखी है: 3 साल, 4 साल, 5 साल, और इसी तरह। कुछ लोगों के लिए, यह बस इतना कहता है, "पहले जन्मदिन से पहले ही मार दिया गया।" जो 60,000 लोग मारे गए, उनमें से 31% बच्चे थे। पश्चिम के उन लोगों के बारे में सोचिए जिनके पास सत्ता है। ऐसा लगता है कि यहाँ वे ही ज़िम्मेदार हैं। वे शासन करते हैं। जो चाहें पाते हैं। जब वे कहते हैं, "ऐसा करो। उन मिसाइलों को चलाओ," तो सच में होता है। लेकिन आयत कहती है कि कयामत के दिन का सिर्फ एक ही सच्चा मालिक है, एक। उस दिन, सभी आँखें डर से खुल जाएंगी। अत्याचारी देखेंगे कि असली शासक कौन है। مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ अभी दुनिया में वे गर्व से चलते हैं, लेकिन जल्द ही उन्हें झुकना पड़ेगा। अत्याचारी जो सोचते हैं कि वे सबसे बड़े हैं, वे भी भीख माँगेंगे। वे उन्हीं लोगों से भीख माँगेंगे जिन्हें उन्होंने चोट पहुँचाई। उनका धन और हथियार उनकी मदद नहीं करेंगे। यह दुनिया एक परीक्षा का स्थान है, इसलिए अल्लाह हर मामले में तुरंत दखल नहीं देता। लेकिन क़यामत के दिन, हर एक इंसान समझ जाएगा कि "मालिकी यौमिद्दीन" कौन है। मैंने फ़िलिस्तीन के कुछ वीडियो देखे। एक बच्चा अपनी माँ की लाश को देख रहा था। वह बहुत ही बुरी हालत में थी। और जैसे ही बच्चा उसकी तरफ़ देखने लगा, मैं खुद को सोचने से रोक नहीं पाया कि उसके दिमाग में क्या चल रहा होगा। क्या वह उम्मीद कर रहा था, "शायद मेरी माँ फिर से ज़िंदा हो जाएगी"?

एक और वीडियो में, एक आदमी मलबे से कंक्रीट के टुकड़े हटा रहा था। वीडियो बनाने वाले शख्स ने उससे पूछा, "आप क्या कर रहे हैं? और उसने जवाब दिया, "मेरे दो या तीन बच्चे थे।" मैं उनके शरीर ढूँढ रहा हूँ। "वह रोता रहा और पुकारता रहा, "सफ़िया, सफ़िया, सफ़िया," मलबे के अंदर से आवाज़ लगा रहा था। और जो लोग ये कर रहे हैं, जो लोग इसे होने दे रहे हैं, जो चुप रहते हैं, जो इसे मंज़ूरी देते हैं, क्या आपको लगता है कि आप बहुत ताक़तवर है? सब पर हावी हैं? कोई आपको ना नहीं कह सकता?

लेकिन क़यामत के दिन का असली मालिक केवल अल्लाह है। और उस दिन, जिन पर आपने ज़ुल्म किया है, उन पर आपका कोई कंट्रोल नहीं होगा, ज़रा सा भी नहीं। सिर्फ आपके बड़े अपराध ही नहीं, यहाँ तक कि आपकी सबसे छोटी गलतियाँ भी सामने लाई जाएंगी। हम इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। जिस दिन ज़ुल्म सहने वालों को इंसाफ़ मिलेगा, वह दिन ज़ुल्म के दिन से कहीं ज़्यादा भयानक होगा। वह दिन ही कयामत का दिन है, और वह दिन सिर्फ एक ही का है। तो अगली आयत क्या है? إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ "हम सिर्फ तेरी ही इबादत करते हैं, और सिर्फ तुझसे ही मदद मांगते हैं।" अब, क्या आपने पहली तीन आयतों के बाद कुछ नोटिस किया?

हमने "तू" कहना शुरू कर दिया। पहले हम अल्लाह के नाम और attributes जान रहे थे: "अल्हम्दुलिल्लाही रब्बिल आलमीन"। हमने जाना कि सारी तारीफें उस रब के लिए हैं, जो पूरी दुनिया को पालता और सँभालता है। फिर, "अर्रहमान निर्रहीम"। वह अनंत रहम और दया से भरा है। इसके बाद, "मालिकी यौमिद-दिन"। वह कयामत के दिन के मालिक हैं। अब तक हम "वह" कह रहे थे, लेकिन अब सीधे बात करते हैं, 'तू' से। "हम सिर्फ तेरी ही इबादत करते हैं। हम केवल तुझी से मदद मांगते हैं।" यह क़रीब होने और सच्चे मन से बात करने का तरीक़ा है। “नस्तईन” का क्या मतलब है?

इसका मतलब है हम मदद माँगते हैं, मदद चाहते हैं। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि हमें कहीं नहीं जाना चाहिए या हमें काम नहीं करना चाहिए या स्कूल नहीं जाना चाहिए। अपनी नौकरी पर जाएं, अपने स्कूल जाएं। रोज़गार के दरवाज़े खटखटायें, लेकिन यह याद रखें: जो आपको वह रोज़ी देता है, वह दरवाज़े के पीछे वाला इंसान नहीं है; वह अल्लाह है। हाँ, आपको वेतन आपके बॉस से प्राप्त होता है, लेकिन आपको यह यक़ीन रखना चाहिए कि "अल्लाह ही मुझे रोज़ी देता है। मैं सिर्फ उसी से मदद माँगता हूँ।” अब, हम कहते हैं कि हम अल्लाह से मदद मांगते हैं, लेकिन किस चीज़ के लिए मदद?

उदाहरण के लिए, जब इबादत की बात आती है, तो हम कहते हैं, "या अल्लाह, मैं तुझसे मदद मांगता हूँ ताकि मैं अपनी इबादत पूरी कर सकूँ, क्योंकि मेरा नफ़्स, मेरा शैतान, और मेरे आस-पास के बहुत सारी चीज़ें मुझे तुझसे दूर करने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि मैं तुझसे मदद माँगता हूँ।” या उन लोगों को देखिए जो यह कहते हैं, “भाई, आज के समय में आप बिना ब्याज के जी नहीं सकते।” वे अपने पैसे को ब्याज में लगाते हैं और उसके बढ़ने का इंतज़ार करते हैं। लेकिन नहीं, हम तो सिर्फ अल्लाह की इबादत करते हैं, पैसे की नहीं, और मदद भी उसी से माँगते हैं। लेकिन आप पैसे से जुड़ गए हो। आपने उसे अल्लाह से आगे रख दिया है। और क्या है, जिसके लिए हम केवल उसी से मदद मांगते हैं?

वो परीक्षाएँ, और कठिनाइयाँ जो हमारे जीवन में हैं। ऐसी घटनाएँ होती हैं जो हम नहीं चाहते। हम ऐसी परीक्षाओं का सामना करते हैं जो हमारे दिल को जलाती हैं, है ना? और हम उन्हें संभाल नहीं पाते। हम कहते हैं, "या अल्लाह, मेरा दिल दुख में है। मेरी छाती भारी महसूस हो रही है। मैं इस उदासी से, इस संघर्ष से बाहर निकलना चाहता हूँ। या अल्लाह, हम केवल तुझसे ही मदद माँगते हैं।" वास्तव में हम यही बात सुरह अल-फ़ातिहा में कहते हैं - "इय्याका न'बुदु व इय्याका नस्तईन" क्या आपने कभी हर्फ़ नून के बारें में मशहूर मुफ़स्सिर बदीउज्जमान के विचारों को सुना है?

मेरा मतलब अरबी अक्षर नून से है। एक दिन, नमाज़ पढ़ते समय, बदीउज़्ज़मान 'इय्याका न'बुदु व इय्याका नस्तईन' आयत में'नून' अक्षर में एक हिक़मत देखते हैं। वह पूछते हैं, "हम 'मैं' की जगह 'हम' क्यों कहते हैं?" फिर अल्लाह उनके दिल में एक सुंदर प्रेरणा डालता है, और सोचने का दरवाज़ा, एक Tafakkur खुल जाता है। वह मस्जिद में दूसरे लोगों को देखते हैं, और पाते हैं कि सभी लोग वही शब्द कह रहे हैं: "या अल्लाह, हम केवल तेरी ही इबादत करते हैं, और हम केवल तुझसे ही मदद माँगते हैं।" सिर्फ वहाँ मौजूद होकर उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे उसकी दुआ पर आमीन कह रहे हैं, फिर उनकी सोच और गहरी हो जाती है। वह पूरे शहर की कल्पना करते हैं, सभी लोग एक ही समय में, एक ही तरीक़े से इस आयत को पढ़ रहे हैं। फिर वह दायरा और बड़ा हो जाता है। वो काबा के चारों ओर लोगों की गोलाकार कतारों के बारे में सोचते हैं, कतारें एक के बाद एक फैलती जा रही हैं। और पूरी दुनिया में, काबा को केंद्र में रखते हुए, पूरी उम्मत एक ही सच्चाई को नमाज़ में कह रही है: "इय्याका ना'बुदु वा इय्याका नस्तईन"। इसीलिए हम "मैं" की जगह "हम" कहते हैं। वह एक अक्षर, नून, सोचने का दरवाज़ा खोलता है। यह व्यक्तिगत इबादत से शुरू होकर पूरी उम्मत की साझा दुआ तक ले जाता है। फिर वो अपने शरीर के हिस्सों के बारे में सोचने लगते हैं। वो सोचते हैं कि वे कितने सही तरीक़े से बनाए गए हैं , और यह दिखाते हैं कि अल्लाह कौन है। वो सोचते है कि वे जैसे हैं, वैसे ही अल्लाह की कला की तारीफ़ करते हैं। अब हम कहते हैं, "इय्याका न'बुदु व इय्याका नस्तईन" ऐसा वो अपने शरीर के सभी अणुओं को अपने चारों ओर इकट्ठा करते हुए कहते है। हर अणु कहता है, "इय्याका न'बुदु व इय्याका नस्तईन"। फिर वह सोचते हैं कि कैसे पूरा ब्रह्मांड अल्लाह के नाम और गुणों को इतनी खूबसूरती से दर्शाता है। इस सोच से, वो खुद को इसके अंदर महसूस करते हैं और कहते हैं, إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ यह कितना गहरा और शक्तिशाली अर्थ है, है ना?

यह हमें याद दिलाता है कि "हम" सिर्फ व्याकरण नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक पुल है जो हर believer को जोड़ता है। हर उस अणु से जो अल्लाह की तारीफ़ करता है। भाइयों और बहनों, जब आप इस आयत को नमाज़ में पढ़ते हैं, तो जान लीजिए कि आपकी आवाज़ आभार के एक वैश्विक और सार्वभौमिक स्वर में शामिल है। और अब हम अगली आयत पर आते हैं, اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ जिसका मतलब है "हमें सीधे रास्ते पर चला।" जब आप यह सुनते हैं, तो आपके मन में क्या आता है? बस चारों ओर देखिए। क्या आप देखते हैं कि वहाँ कितनी तरह की अलग-अलग मान्यताएँ हैं?

एक बार भारत से आए व्यक्ति ने मुझे कुछ अजीब बताया। वहाँ चलते समय, वह एक भीड़ से मिला। करीब 100 या 200 लोग एक ही दिशा में साथ चल रहे थे। और बीच में, एक आदमी पूरी तरह नग्न था, और सभी लोग उसकी ओर बढ़ रहे थे। क्यों?

क्योंकि वह उनके लिए पवित्र आदमी था, कोई चुना हुआ, कोई विशेष। ऐसी बहुत सारी मान्यताएं हैं, हज़ारों मान्यताएं हैं। कुछ लोग तो सूरज की भी पूजा करते हैं। बहुत सारे अलग-अलग विचार और विश्वास प्रणाली हैं। इन सभी अलग-अलग रास्तों के बीच, एक इंसान ऐसा महसूस किए बिना नहीं रह सकता कि, "या अल्लाह, इतने सारे विचारों के बीच, इतने सारे रास्तों के बीच, कृपया, कृपया मुझे सीधे रास्ते पर मार्गदर्शन दें।" और यह सिर्फ धर्म के लिए नहीं है। यह जीवन के हर हिस्से पर लागू होता है। हमारे जीवन में बहुत सारे मोड़ आते हैं, है ना? मुझे यह चुनना चाहिए या वह? मुझे अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए यह या कुछ और चुनना चाहिए?

जीवन विकल्पों और निर्णयों से भरा है। हम एक साल में शायद हज़ारों निर्णय लेते हैं, लेकिन हमें कभी सच में पता नहीं होता कि ये निर्णय हमें सही रास्ते पर या किसी बंद गली में ले जाएगा। इसीलिए अगली आयत में हम कहते हैं, "इहदिनस-सिरातल-मुस्तकीम"। ऐ अल्लाह, मुझे सीधे रास्ते पर चला। सीधा रास्ता क्या है? यह बाएँ या दाएँ नहीं मुड़ता,सिर्फ सीधे चलता है। एक रास्ता बंद हो सकता है, तो दूसरा मंज़िल तक पहुँच सकता है, लेकिन वह आपको लंबे रास्ते से ले जाता है। लेकिन एक ही सीधा रास्ता है, और वही हम मांग रहे हैं। कितनी खूबसूरत दुआ है, है ना?

सूरह की शुरुआत में, हमने जाना कि अल्लाह कौन हैं और उसकी क्या खूबियां हैं। हमने यह भी सीखा कि हमें किससे दुआ करनी चाहिए, और फिर हमने एक खूबसूरत दुआ की। आप बस इसे बार-बार दोहराना चाहते हैं। अल्लाह हमें यह दुआ रोज़ 40 बार सूरह अल-फातिहा के माध्यम से पढ़ने का मौक़ा देता है, अल्हम्दुलिल्लाह। तो अगली आयत क्या है? صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ जिसका मतलब है "उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने रहमत की, ना कि उन लोगों का, जिन पर तेरा ग़ज़ब (क्रोध) हुआ।" और न ही उन लोगों का जो भटक गए।" पिछली आयत में हमने क्या कहा था? "हमें सीधे रास्ते पर चला।" तो, सीधा रास्ता क्या है?

अगली आयत हमें इसका उत्तर देती है: "उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने रहमत की।" और यह क्या नहीं है? "न उन लोगों का रास्ता जिन पर तेरा ग़ज़ब हुआ, और न ही उन लोगों का जो भटक गए।" यह अगली आयत हमें साफ़ तौर पर बताती है, सिर्फ यह नहीं कि हम क्या माँगते हैं, बल्कि यह भी कि किन चीज़ों से दूर रहना चाहिए। हर दिन जब हम सूरह अल-फातिहा पढ़ते हैं, हम वास्तव में अपने लिए दुआ कर रहे होते हैं। "या अल्लाह, हमें उन लोगों के रास्ते पर चला जिनपर तूने रहमत की है।" तो आख़िर कौन है ये blessed people?

इसका विवरण सूरह अन-निसा, आयत संख्या 69 में दिया गया है। अल्लाह कहता है, "और जो कोई अल्लाह और रसूल की बात मानेगा वह उन लोगों के साथ होगा जिन पर अल्लाह ने इनाम फ़रमाया है: यानी नबी, सिद्दीक़, शहीद और नेक लोग। और क्या ही अच्छी सोहबत है!" तो जब हम इन नेक लोगों के रास्ते पर चलते हैं, तो इसका मतलब है कि हम वास्तव में सीधे रास्ते पर चल रहे हैं। अब, चलिए धीरे-धीरे इसका अनुवाद फिर से पढ़ते हैं। इस बार अर्थ और भी गहरा महसूस होगा, इंशाअल्लाह। तो बस मेरे दिए हुए अर्थों को याद रखने की कोशिश करें। बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम। सोचिए, अल्हम्दुलिल्लाही रब्बिल आलमीन। मैं अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहता हूँ। तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, जो सारे जहानों का मालिक है। सबसे ज़्यादा दयालु, सबसे ज़्यादा रहम करने वाला। क़यामत के दिन का मालिक हम सिर्फ तेरी ही इबादत करते हैं और सिर्फ तुझसे ही मदद मांगते हैं हमें सीधे रास्ते पर चला। उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने रहमत की, उन लोगों का रास्ता पर नहीं जिन पर तेरा ग़ज़ब (क्रोध)हुआ, और जो भटक गए। आमीन सूरह अल-फातिहा अब पूरी हुई। इंशाअल्लाह, हम इस सीरीज़ को आगे जारी रखेंगे। हर पाठ के साथ, हमारी समझ बढ़ेगी, इंशाअल्लाह। हम अपनी नमाज़ को और भी गहरे और ज़्यादा सोचने वाले स्तर पर ले जाएंगे। हम उन सूरहों के बारे में बात करते रहेंगे जो हम रोज़ अपनी नमाज़ में पढ़ते हैं, जब तक उनके मतलब हमारे दिलों तक न पहुँच जाए। हमें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से पता चलता है कि इल्म के साथ की गई इबादत, बिना इल्म की इबादत से कहीं ज़्यादा क़ीमती होती है। सूरह अल-फ़ातिहा तो बस शुरुआत थी। अब हम सूरह अल-फ़लक और सूरह अन-नास पढ़ेंगे, विशेष रूप से जो अपनी हिफ़ाज़ती अर्थों के लिए जाने जाते हैं। उसके बाद, हम शुरूआती दुआ पर चर्चा करेंगे, जो है सुबहानका अल्लाहुम्मा” इन दुआओं में बहुत खूबसूरत और गहरा मतलब है। इंशाअल्लाह, जब हम यह पूरी सीरीज़ खत्म करेंगे, तो अल्लाह हम सभी को यह ताकत दें कि हम बहुत गहरे एहसासों के साथ नमाज़ पढ़ सकें।