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पैगंबर मुहम्मद ﷺ का जीवन - दुनिया की पहली AI-विजुअलाइज़्ड सीरत सीरीज़! - ऐ पैग़म्बर | एपिसोड 1

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हम मानव इतिहास के उस निर्णायक मोड़ पर वापस जा रहे हैं। क़ुर्बान 1400 साल पहले के अरब प्रायद्वीप में। 11 हिस्सों की इस सीरीज़ में, हम पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन को ऐसे अंदाज़ में जानेंगे जैसा आपने पहले कभी नहीं सुना होगा। कभी हम खुद को वही (ईश्वरवाणी) के शुरुआती दिनों में पाएंगे। दारुल अर्क़म (अर्क़म का घर) में मुसलमानों की उन गुप्त सभाओं के बीच। तो कभी रोमांच अपने चरम पर होगा, जब हम उमर रज़ियल्लाहु अन्हु को मक्का के मुशरिकीन की ओर निडर होकर लपकते हुए देखेंगे। जो कोई भी मुहम्मद को मारेगा, मैं उसे सौ लाल और काले ऊँटों का इनाम दूँगा। मुहम्मद की बात मानने वालों का यही हश्र होता है। इसे एक चेतावनी समझो। ऐसे भी पल आएंगे जब हम उदास होंगे और हमारी आँखें नम होंगी। कभी हम डर महसूस करेंगे, तो कभी मुस्कुराए बिना नहीं रह पाएंगे। लेकिन ज़्यादातर समय, हमारा दिल सुकून से भरा होगा। उस पैगंबर की कहानी से, जिन्होंने हमें सिखाया कि सबसे निराशाजनक परिस्थिति में भी रास्ता कैसे निकालें, हम सीखेंगे कि अपनी ज़िंदगी के बंद रास्तों से कैसे पार पाएँ। हम सिर्फ़ घटनाओं को देखकर आगे नहीं बढ़ेंगे। बल्कि हम उनके पीछे छिपे गहरे अर्थों को समझने की कोशिश करेंगे। यह सफ़र आपको एक नई राह पर ले जाएगा और आपको खुद की असली पहचान कराएगा। यह कहानी है अल्लाह के सबसे प्रिय बंदे की। एक ऐसा इंसान, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी उम्मत के लिए क़ुर्बान कर दी, जिन्हें मुनाफ़िक़ीन ने बार-बार धोखा दिया और बदनाम करने की कोशिश की। ऐसा वक्त भी आया, जब वो महीनों तक भूखे रहे, और ऐसा वक्त भी, जब उन्होंने अपने प्यारों को खोया और अपने ही हाथों से उन्हें दफ़नाया। वो हमेशा लोगों को रोशनी और हिदायत की तरफ बुलाते रहे, लेकिन बदले में, उन पर पत्थर बरसाए गए। मैंने आज तक किसी को अपने ही परिवार के लिए इतनी बुराई और आफत लाते नहीं देखा, जितनी तुम लाए हो। उन्होंने अनगिनत जानलेवा हमलों का सामना किया, लेकिन वो एक पल के लिए भी अपने मिशन से पीछे नहीं हटे और आखिर में, अल्लाह ने अपने वफादार बंदे से किया अपना वादा पूरा किया। अब हम 23 साल के एक बेमिसाल सफ़र पर निकल रहे हैं। हम एक असाधारण इंसान की कहानी देखेंगे जिसने अकेले इस मिशन की शुरुआत की, पूरी दुनिया के सामने खड़ा हुआ, और आज उसके पीछे 2 अरब से ज़्यादा मानने वाले हैं। अगर आप तैयार हैं, तो चलिए शुरू करते हैं। सल्लि अला मुहम्मद (उनपर दुरूद और सलाम हो) यह वीडियो सीरीज़ विश्वसनीय इस्लामी स्रोतों के सैकड़ों संदर्भों पर आधारित है। सभी AI विज़ुअल्स योग्य मुस्लिम विद्वानों की सलाह से तैयार किए गए हैं और इस्लामी नियमों के अनुरूप हैं। उस रात, जब मक्का की तपिश कुछ कम हुई थी। वो साल 571 का सोमवार का दिन था। मक्का की वो ख़ामोश गलियाँ मानव इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक की गवाह बनने वाली थीं। अब्दुल मुत्तलिब लंबे समय से इस पल का इंतज़ार कर रहे थे। और आखिरकार, उन्हें वो खुशखबरी मिल गई। आमिना ने एक बेटे को जन्म दिया है। उनका दिल खुशी और उत्साह से धड़क रहा था। जब से उनके बेटे अब्दुल्लाह का इंतकाल हुआ था, अपनी बहू आमिना की कोख में पल रहे उस बच्चे के लिए उनकी मुहब्बत और परवाह और भी बढ़ गई थी। ज़रा उस रात की कल्पना कीजिए। अब्दुल मुत्तलिब घर की तरफ दौड़ते हैं, अपने नन्हे पोते को गोद में लेते हैं, और उसे लेकर काबा की तरफ चल देते हैं। वो अपने रब का शुक्र अदा करते हैं, दुआ करते हैं, और उस बच्चे का नाम रखते हैं - मुहम्मद। आपने यही नाम क्यों चुना?

क्योंकि मैं चाहता हूँ कि अल्लाह और लोग उसकी तारीफ करें। यह नाम आमिना को एक ख्वाब में बताया गया था। और जब उन्होंने यह बात अब्दुल मुत्तलिब को बताई, तो उन्होंने यही नाम रखने का फैसला किया। अपने शौहर अब्दुल्लाह की छोड़ी हुई इस अमानत को सही-सलामत जन्म देने के बाद, आमिना को बहुत सुकून और तसल्ली मिली। उस ज़माने के मक्का में, बच्चों को दाई माँ के पास भेजने का एक आम रिवाज़ था। ऐसी महिलाएँ जो उन्हें अपना दूध पिलातीं और उनकी देखभाल करती थीं। ताकि बच्चे कुछ समय के लिए मक्का के कठिन वातावरण से दूर रह सकें। ज़ाहिर है, अपने नवजात बच्चे से अलग होना एक माँ के लिए बहुत मुश्किल था। लेकिन इसके पीछे दो अहम वजहें थीं। पहली वजह बच्चे की सेहत थी। जैसा कि हमने कहा, मक्का का मौसम नवजात बच्चों के लिए ठीक नहीं था। और दूसरी वजह थी बच्चे की भाषा और बोलने के कौशल को निखारना। उस दौर में, अरबी समाज में बेहतरीन अंदाज़ में बात करना बहुत मायने रखता था। बच्चों को 'बनू साद' के इलाके में भेजा जाता था जहाँ वो रेगिस्तान और खुले मैदानों में आज़ादी से पल सकें और अरबी भाषा को उसके शुद्ध और सबसे खूबसूरत रूप में सीख सकें। उस इलाके की दाइयाँ आमतौर पर अमीर और ऊँचें घरानों के बच्चे ढूँढती थीं। क्योंकि इस रिश्ते के ज़रिए, उनका बच्चे के परिवार के साथ एक रिश्ता बन जाता था, और जब तक पिता ज़िंदा रहते, वो उनसे मदद और सहारा लेती रहती थीं। पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम भी एक ऊँचे घराने से थे। उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब मक्का के सरदार थे। लेकिन वो बूढ़े थे। और पैगंबर अलैहिस्सलाम के पिता का इंतकाल उनके पैदा होने से पहले ही हो गया था। और चूँकि वो एक यतीम (अनाथ) थे, इसलिए कोई भी दाई माँ आमिना के बच्चे को लेने के लिए तैयार नहीं थी। तो अब क्या होगा?

क्या उन्हें कोई नहीं ले जाएगा? क्या उन्हें इसी सख्त मौसम वाले शहर में बड़ा होना पड़ेगा?

आमिना बेबस खड़ी होकर देख रही थीं, कि दाइयाँ कैसे एक-एक करके बच्चों को लेकर मक्का से बाहर जा रही हैं। तभी, हलीमा और हारिस नाम का एक जोड़ा बाकी लोगों से देर से मक्का पहुँचा। क्योंकि उनकी सवारी कमज़ोर और बूढ़ी थी, उन्हें बारी-बारी से उस पर बैठना पड़ता था। इसलिए वो समय पर नहीं पहुँच पाए। हलीमा ने बहुत ढूँढा, पर उन्हें मक्का में कोई ऐसा नहीं मिला जो उन्हें अपना बच्चा दे। इतनी दिक्कतों से मक्का पहुँचने के बाद, अब उन्हें खाली हाथ वापस लौटना पड़ रहा था। उनके इलाके में अकाल भी पड़ा हुआ था। और उनके लिए खुद का पेट भरना भी मुश्किल हो रहा था। इन सभी परेशानियों ने उन्हें बहुत उदास कर दिया था। जब वो इन ख्यालों में डूबी थीं, अचानक उनका सामना किसी से हुआ। वो अब्दुल मुत्तलिब थे। कुछ देर बात करने के बाद, उन्हें उनके पोते के बारे में पता चला। उन्होंने अपने पति हारिस से उनकी राय पूछी। मुझे पालने के लिए कोई बच्चा नहीं मिला। और मैं दूसरों के सामने खाली हाथ वापस नहीं लौटना चाहती। उसे ले जाने में कोई बुराई नहीं है। शायद अल्लाह उसकी वजह से हमें बरकत और भलाई अता फरमाए। जब उन्हें उम्मीद नहीं थी, तब उनके सामने सबसे बड़ी बरकत आ गई थी। लेकिन हलीमा को अब भी अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें कितना अनमोल खज़ाना मिल गया है। दूसरी तरफ, आमिना की हालत के बारे में सोचिए। वो पहले ही अपने प्यारे शौहर को खो चुकी थीं। और वो अपने बच्चे को एक बार भी उनकी गोद में नहीं दे सकीं। और अब, इन सबके ऊपर, वो अपने बच्चे से भी दूर होने वाली थीं। पर उनके पास और कोई चारा नहीं था। आँखों में आँसू लिए, उन्होंने अब्दुल्लाह की अमानत यानी अपने मुहम्मद को हलीमा को सौंप दिया। वो अपने बेटे से बहुत लंबे समय तक दूर रहने वाली थीं। वो न तो उसकी खुशबू ले पाएँगी और न ही उसे अपनी गोद में ले पाएँगी। वो उसके पहले कदम और उसके पहले शब्द सुनने के लिए पास नहीं होंगी। एक माँ के लिए, अपने बच्चे से महज़ एक घंटे की जुदाई भी बहुत दर्दनाक होती है। लेकिन अपने बच्चे के भविष्य के लिए, उन्होंने इतनी लंबी जुदाई को मंज़ूर किया। उनका दिल टुकड़ों में बँटा हुआ था। वहीं हलीमा और उनके परिवार के लिए, एक नई ज़िंदगी शुरू होने वाली थी। पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के आने के साथ, उनका घर बरकत और खुशहाली से भर गया। ऐसी चीज़ें हुईं जिन पर किसी को यक़ीन नहीं हो रहा था। उनकी बूढ़ी और कमज़ोर सवारी अचानक से ताक़तवर और तेज़ हो गई। हलीमा के पास दूध बहुत कम हुआ करता था। लेकिन जैसे ही उन्होंने पैगंबर ﷺ को दूध पिलाना शुरू किया, उनका दूध बहुत ज़्यादा आने लगा। उनका अपना नवजात बेटा अब्दुल्लाह अक्सर बेचैन रहता और रोता रहता था। लेकिन जब उसने पैगंबर ﷺ के साथ दूध पीना शुरू किया, तो वो भी शांत हो गया। अकाल और सूखे की वजह से जो जानवर भूखे लौटते थे, वो अब भरपेट खाना ढूँढ लेते और खूब दूध देते थे। उनके घर में बरकत ही बरकत थी, जबकि आसपास के इलाके अब भी अकाल की मार झेल रहे थे। इस दौरान, पैगंबर अलैहिस्सलाम बहुत अच्छी तरह से बड़े हुए। शारीरिक, मानसिक और रूहानी तौर पर भी। आखिरकार, चार मुबारक साल गुज़र गए। अब समय आ गया था। उन्हें पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम को उनकी माँ को वापस करना था। हलीमा अपने आँसू नहीं रोक पा रही थीं। वो उनसे जुदा नहीं होना चाहती थीं। वो उन्हें गले लगातीं और बार-बार चूमतीं। पर उनके पास और कोई रास्ता नहीं था। एक लंबी जुदाई के बाद, आमिना और उनका बेटा आखिरकार फिर साथ थे। अब वो जब चाहे उनका हाथ पकड़ सकती थीं, वो उनके ठीक बगल में थे। उन्होंने एक-दूसरे को कसकर गले लगाया, जैसे वो जुदाई के हर एक दिन की कमी पूरी करना चाहते हों। वो फिर कभी जुदा नहीं होना चाहते थे। इस मिलन ने उन मुश्किल सालों के दर्द को कम कर दिया। डेढ़ साल साथ बिताने के बाद, वो अपने रिश्तेदारों और पिता की कब्र पर जाने के लिए मदीना गए। जब वो कब्र पर पहुँचे, तो आमिना की आँखों में गहरा दुख साफ़ दिख रहा था। उनका मन और दिल अपने शौहर के साथ बिताए उन दिनों की यादों से भर गया। जैसे उन्होंने अभी-अभी उन्हें खोया हो, वो फूट-फूट कर रोने लगीं। अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम यतीम (अनाथ) पैदा हुए थे। उन्होंने बिना पिता के इस दुनिया में अपनी आँखें खोली थीं। उन्हें कभी उनके प्यार और परवाह की गर्माहट नसीब नहीं हुई। अपने नन्हे हाथों से, वो हमेशा अपने पिता का हाथ थामना चाहते थे। पर वो वहाँ नहीं थे। और उस पल, उन्हें एक बार फिर अपने पिता की कमी महसूस हुई। साथ ही, वो अपनी माँ को इतने दर्द में नहीं देख सकते थे। और इसलिए, वो दोनों साथ में रोने लगे। कम से कम उनकी माँ उनके साथ थी। यही बात उन्हें सुकून दे रही थी। लेकिन आमिना के लिए भी, इस दुनिया को छोड़ने का समय नज़दीक आ रहा था। वो जल्द ही अपने शौहर के पास पहुँचने वाली थीं। अपने बेटे के साथ उनका साथ ज़्यादा नहीं रहा। मक्का वापस जाते समय वो बीमार पड़ गईं। अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम सिर्फ़ छह साल के थे। जब वो अबवा नाम की जगह पर पहुँचे, तो उनकी बीमारी और बढ़ गई। वो बहुत दर्द में थीं। पर दो बातें उन्हें और ज़्यादा तकलीफ दे रही थीं। अपने बच्चे को अकेला छोड़ने का ख्याल, और यह कि इतनी कम उम्र में, उसे अब माँ और बाप दोनों के बिना अपनी ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ेगी। जब उनका आखिरी वक्त क़ुर्बान आया, उन्होंने अपने बेटे को देखा। उनके चेहरे के भाव शब्दों से कहीं ज़्यादा कुछ कह रहे थे। अपनी आखिरी साँस से ठीक पहले, उन्होंने अपने बेटे से ये शब्द कहे। हर जानदार को मौत आनी है। हर नई चीज़ पुरानी हो जाती है। और जो बूढ़ा होता है, वो एक दिन मर जाता है। इस दुनिया की हर चीज़ फानी है और एक दिन खत्म हो जाएगी। हाँ, मैं भी मर जाऊँगी। लेकिन मेरा नाम हमेशा याद रखा जाएगा। क्योंकि मैंने एक पाक और नेक बच्चे को जन्म दिया है, जो मुझे हमेशा अच्छी यादों में ज़िंदा रखेगा। कुछ ही पलों बाद, उनकी आवाज़ धीमी हो गई, और उनका शरीर शांत हो गया। अब जो बाक़ी रह गई, वो थी पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के रोने की आवाज़। उनका मासूम दिल एक अकथनीय पीड़ा से जल रहा था। एक सफ़र जो पिता की कब्र पर जाने के लिए शुरू हुआ था, वो अपनी माँ को दफ़नाने पर खत्म हुआ। पिता को पहले ही खो देने के बाद, अब माँ को भी खो देना। कौन जानता है कि कितने सालों तक वो शब्द उनके कानों में गूँजते रहे होंगे। जब भी दूसरे बच्चे "माँ" कहकर पुकारते, तो उनकी आँखें ज़मीन की तरफ झुक जातीं। अपनी नम आँखों से, वो हमेशा अपनी सबसे प्यारी माँ के उन आखिरी पलों को याद करते। उन पलों में, उनकी देखभाल करने वाली उम्मे अयमन उनके साथ थीं। उन्होंने नन्हे मुहम्मद को संभालने और उनके आँसू पोंछने की कोशिश की। उस दिन के बाद से, वो हमेशा उन्हें प्यार देने और परवाह करने के लिए उनके साथ रहीं, और उन्होंने वो हर मुमकिन कोशिश की जिससे माँ की कमी पूरी हो सके। वो उनके साथ रहीं और 25 साल की उम्र में उनके निकाह होने तक उनकी सेवा करती रही। इस्लाम आने के बाद भी, उन्होंने इस धर्म के लिए बड़ी क़ुर्बानियाँ देने में कभी हिचक महसूस नहीं की। पैगंबर ﷺ की ज़िंदगी में उनका मुकाम इतना खास था, और वो उन्हें माँ जैसा प्यार देती थीं कि पैगंबर ने बाद में उनके बारे में कहा: "वो मेरी माँ के बाद मेरी दूसरी माँ हैं।" जब वो मक्का वापस लौटे, तो उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने उन्हें अपनी पनाह में ले लिया। वो उन्हें हमेशा अपने क़रीब रखते थे। वो तब तक खाना खाने नहीं बैठते थे जब तक उनका पोता उनके साथ न हो। चूँकि अब्दुल मुत्तलिब अपने क़बीले के नेता थे, उनका मसनद (आसन) काबा के ठीक सामने रखा जाता था। यहाँ तक कि उनके अपने बेटों को भी उस पर बैठने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन उनके छह साल के पोते मुहम्मद वहाँ बैठते थे। उन्होंने उनके सिवा किसी और को वहाँ बैठने नहीं दिया। जब दूसरे उन्हें रोकने की कोशिश करते, तो वो कहते: छोड़ दो मेरे बेटे को। अल्लाह की कसम, एक दिन इसका नाम और इज़्ज़त बहुत बुलंद होगी। कम उम्र में ही, उन्होंने देखा कि उनके दादा मक्का का शासन कैसे चलाते थे। वहाँ उन्होंने जो चीज़ें देखीं, वो उन्हें एक भविष्य के नेता के रूप में तैयार कर रही थीं। समय-समय पर अब्दुल मुत्तलिब उन्हें कुछ ज़िम्मेदारियाँ और काम भी सौंपते थे। पोते के मन में दादा के लिए बहुत इज़्ज़त थी, और दादा के दिल में पोते के लिए बहुत ममता थी। वो दोनों एक-दूसरे के बहुत क़रीब थे। मगर, यह साथ भी ज़्यादा समय तक नहीं रहा। सिर्फ़ दो साल बाद, उन्होंने अपने दादा को भी खो दिया। वो जिससे भी दिल लगाते, अल्लाह एक-एक करके उन्हें दूर कर देता। जैसे उन्हें यह पैगाम दिया जा रहा हो कि: "मैं ही तुम्हारा एकमात्र सहारा हूँ।" अपनी पूरी ज़िंदगी में, वो अपने कई साथियों को भी खोने वाले थे। उनके ज़िंदा रहते ही, उनके सात में से छह बच्चों का इंतकाल होने वाला था। जैसा कि आप इस सीरीज़ के हर एपिसोड में देखेंगे, वो बेहिसाब मुश्किलों और दर्द से गुज़रते हैं। और चूँकि वो हर तरह के दर्द और संघर्ष से गुज़रे, इसलिए वो अपनी उम्मत की हर परेशानी को बेहतर समझ सकते थे। यही वजह है कि वो हमारे लिए सबसे बेहतरीन नेता और रहनुमा बने। अगर उन्होंने एक आसान ज़िंदगी जी होती और अल्लाह ने उन्हें कोई मुश्किल न दी होती, तो वो पूरी इंसानियत के लिए मिसाल कैसे बन पाते?

बचपन में उन्हें अपने आसपास के लोगों से जो प्यार और ममता मिली थी, वो अलग-अलग आइनों में सूरज की किरणों के प्रतिबिंब की तरह थे। पर उस ममता का असली मालिक, अल्लाह, उन आइनों को हटा रहा था। यानी, वो एक-एक करके उनके प्यारों को उनसे दूर कर रहा था। ऐसा करके अल्लाह उन्हें तमाम मोहब्बतों का असली ज़रिया दिखा रहा था, उन्हें सिखा रहा था कि हर नेअमत केवल उसी की तरफ से आती है। कि हकीकत में सिर्फ़ वही है जो हमेशा रहने वाला है, और अगर वो चाहे, तो वो इंसानों को भी हमेशा की ज़िंदगी अता कर सकता है। अगर उसकी मर्ज़ी हो, तो वो तमाम लोग जो जुदा हो गए हैं, वो एक शाश्वत दुनिया (eternal world) यानी जन्नत में फिर से मिल सकते हैं। इस तरह, अल्लाह 'आख़िरत' (परलोक) पर यक़ीन की बुनियाद डाल रहा था, जिसका ज़िक्र वो बाद में वही (प्रकाशना) में करने वाला था। अगर आप सोचें कि हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम इतनी कम उम्र में किन चीज़ों से गुज़रे, तो आप खुद को और भी गहरे चिंतन में पायेंगे। उनकी ज़िंदगी का हर एक पहलू अल्लाह की तरफ से तय था। हर मुश्किल और आज़माइश जो अल्लाह ने उन्हें दी, उसने उन्हें और ज़्यादा mature होने में मदद की। क्योंकि भविष्य में, उन्हें एक बहुत भारी ज़िम्मेदारी सौंपी जाने वाली थी। पैदा होने के बाद से ही, उनकी परवरिश शहर में नहीं बल्कि खुले मैदानों में हुई थी। यही वजह थी कि उनके पास एक आज़ाद रूह थी। वो शारीरिक रूप से ताकतवर थे और उनकी वाणी प्रभावशाली थी। उस घर को मिलाकर जिसमें वो अब रहने वाले थे, बड़े होने तक वो पाँच अलग-अलग घरों में रह चुके थे। इन अनुभवों के ज़रिए उन्होंने सीखा कि अलग- अलग तरह के लोगों के साथ कैसे रहा जाता है। और जब वो अपने दादा के साथ रह रहे थे, तो उन्होंने देखा कि शहर का शासन कैसे चलाया जाता है। उनके माता-पिता नहीं थे, पर उनकी परवरिश तीन अलग-अलग माँओं और तीन अलग-अलग पिता समान हस्तियों ने की थी, जिनमें से हर किसी का अपना अनोखा चरित्र और व्यक्तित्व था। अपनी माँ के अलावा, उनकी दाई माँ हलीमा थीं, और पिता के रूप में, उनके पति हारिस। उनकी देखभाल करने वाली उम्मे अयमन ने अपने तरीके से माँ जैसा प्यार दिया, जबकि उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब एक अलग तरीके से उनके पिता बने। और आखिर में, उनके चाचा अबू तालिब ने पिता के स्नेह के साथ उन्हें अपनी शरण में लिया। और उनकी पत्नी फातिमा बिंत असद ने उन्हें वही ध्यान और ममता दी जो उन्होंने अपने बच्चों को दी थी, उन्होंने कभी उनके बीच कोई फ़र्क़ नहीं किया। उन्हें इतना प्यार और देखभाल मिली कि ज़िंदगी के बाद के पड़ाव में, वो इन तीनों महिलाओं को "अपनी माँ के बाद मेरी दूसरी माँ" कहा करते थे। बतौर 'टुवर्ड्स ईटेर्निटी', हम इस AI विज़ुअलाइज़्ड सीरीज़ को आप तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। और अब, हम महान पैगंबरों और ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन (महान खलीफाओं) की नई सीरीज़ तैयार करना चाहते हैं। चूँकि हम एक गैर-लाभकारी संस्था हैं, इसलिए हम ये वीडियो केवल आपके सहयोग से ही बना सकते हैं। जैसा कि आपने देखा होगा, इस सीरीज़ में कोई विज्ञापन नहीं है। यदि आप इन नेक कामों का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो 'टुवर्ड्स ईटरनिटी' को दान दें और इस सुनहरे अवसर को हाथ से न जाने दें। उनकी ज़िंदगी में कुछ भी महज़ संयोग नहीं था। 40 साल की उम्र तक उनका हर अनुभव, उन्हें पैगंबरी (नुबुव्वत) की भारी ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करने के लिए था। क्योंकि उनके आगे की ज़िंदगी कठिनाइयों से भरी होने वाली थी। वही (प्रकाशना) का भारी बोझ। सामाजिक बहिष्कार के वो साल, जहाँ उन्हें भूखा छोड़ दिया गया ताकि वो अपने मिशन को छोड़ दें। मक्का में कुरैश के ज़ुल्म। अगर मैं उन्हें ऐसा करते देख लूँ, तो मैं उनकी गर्दन कुचल दूँगा या उनका चेहरा धूल से भर दूँगा। मदीना के मुनाफ़िक़ीन। ताइफ़ की वो बेरहम भीड़। और खंदक का वो दिन जब लगभग पूरा अरब उनके खिलाफ खड़ा था। वो जंगें जो उन्हें लड़नी पड़ीं। और अनगिनत लोग जो उन्हें मारना चाहते थे। यह सब संभालने के लिए उन्हें एक बहुत मज़बूत आधार और अटूट धैर्य की आवश्यकता थी। यही कारण है कि नबूवत से पहले उनके जीवन के हर हिस्से को सटीकता के साथ डिज़ाइन किया गया था। अब वह आठ साल के थे। और उस घर में चले गए थे जहाँ वह अपने पूरे जीवन में सबसे अधिक प्यार और देखभाल महसूस करने वाले थे। उनके चाचा अबू तालिब का घर। लेकिन भले ही वह उनके अपने चाचा का घर था, लेकिन यह आपके अपने माता-पिता के घर जैसा कभी नहीं होता। आप अपने चाचा और चाची से उतनी आज़ादी से चीज़ें नहीं माँग सकते जितनी आप अपनी माँ या पिता से माँगते। और साथ ही, आपको चिंता हो सकती है कि आपके चचेरे भाई आपसे ईर्ष्या करेंगे। अकेले यही बात आपको कुछ निश्चित काम करने से रोक सकती है। और इसके अलावा, यह कोई अमीर घर नहीं था। कई बार वे भरपेट खाए बिना दस्तरख्वान से उठ जाते थे। इसलिए, कम उम्र से ही उन्होंने गरीबी का भी अनुभव किया। लेकिन इन सबके बावजूद, उनके चाचा और चाची ने उन्हें घर जैसा महसूस कराया और उनके साथ अपने बच्चे जैसा व्यवहार किया। और कभी-कभी तो उन्हें अपने बच्चों पर प्राथमिकता भी देते थे। अबू तालिब उनके बिना कहीं नहीं जाते थे। वह हमेशा उन्हें साथ ले जाते थे, कभी भी उन्हें अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देते थे। कभी-कभी वह उनसे एक दोस्त की तरह बातें करते थे। और अगर वह दस्तरख्वान पर नहीं दिखते, तो वह पूछते, "मेरा मुहम्मद कहाँ है?

जाओ उसे बुलाओ।" पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम किसी भी अन्य बच्चे से अलग थे। वह अपने बड़ों से पहले कभी खाना शुरू नहीं करते थे। वह बहुत आभारी और विचारशील थे। जब उन्होंने देखा कि उनके चाचा को परिवार का भरण-पोषण करने में कठिनाई हो रही है, तो वह बस बैठकर देख नहीं सकते थे। अन्य बच्चों की तरह अपना दिन बिताने के बजाय, वह काम करना और घर पर मदद करना चाहते थे। इसलिए, वह अपने चाचा के पास गए और उनकी भेड़ों और बकरियों के लिए चरवाहे का काम करने की अनुमति चाही। इस तरह, अबू तालिब को उस काम के लिए किसी को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होती। उनकी उम्र के किसी बच्चे के लिए यह आश्चर्यजनक रूप से परिपक्व अनुरोध था। उनके चाचा और चाची ने उन्हें कभी बोझ के रूप में नहीं देखा, और वे नहीं चाहते थे कि वह लंबे समय तक अरब की चिलचिलाती धूप में बाहर रहें। लेकिन पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने किसी तरह उन्हें मना लिया। और उन्होंने जानवरों की देखभाल करना शुरू कर दिया। चरवाहे के काम के लिए बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है। इसके माध्यम से, उन्होंने धैर्य रखना, ज़िम्मेदारी लेना और उन्हें सौंपी गई किसी चीज़ की देखभाल करना सीखा। उन्होंने इसे शहर से दूर रहने और अपनी रातें अकेले बिताने, आसमान में तारों और ज़मीन पर सृष्टि के चमत्कारों पर विचार करने के अवसर के रूप में भी देखा। जब वह 12 वर्ष के हुए, तो अबू तालिब को वित्तीय कठिनाई के कारण एक व्यापारिक क़ाफ़िले में शामिल होना पड़ा। कुरैश इसका आयोजन कर रहे थे और जाना दमिश्क था। लेकिन जब पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने इसके बारे में सुना, तो वे गहरे दुखी हुए। वह एक और अलगाव से नहीं गुज़रना चाहते थे। उनके चाचा, जो हमेशा उनके साथ रहे थे, महीनों तक दूर हो सकते थे। वह उनके प्यार, सुरक्षा और आराम के बिना रह जाते। वह वास्तव में उनके साथ जाना चाहते थे। लेकिन उस उम्र में इतनी लंबी यात्रा में शामिल होना खतरनाक था। क्या होगा यदि पैगंबर को कुछ हो जाए?

क्या होगा यदि अबू तालिब उस अमानत की रक्षा न कर पाएँ जो उनके भाई ने छोड़ी थी? हर कोई सहमत था कि उन्हें नहीं जाना चाहिए। लेकिन चाहे उन्होंने कुछ भी कहा हो, उनके चाचा के लिए उनका प्यार किसी भी डर से अधिक मजबूत था। कुछ दिनों की उदासी के बाद, वह और अधिक सहन नहीं कर सके। वह अबू तालिब के पास गए, और एक कोमल, भावनात्मक आवाज के साथ, उन्होंने कहा: "चाचा, आप मुझे कहाँ छोड़ रहे हैं? किसके साथ?

यहाँ न मेरी माँ है और न पिता।" दिल से निकले इन शब्दों ने वह सब व्यक्त कर दिया जो वह महसूस कर रहे थे और वह सारा दर्द जो उन्होंने अपने अंदर रखा हुआ था। अबू तालिब का दिल इसे सहन नहीं कर सका। इसलिए उन्होंने अपना विचार बदल दिया। तैयारियाँ पूरी हो गईं और अब क़ाफ़िले के रवाना होने का समय था। उन्होंने अपनी चाची और चचेरे भाइयों को अलविदा कहा। इसी यात्रा से उसके व्यापारिक जीवन की शुरुआत हुई। इस यात्रा में उन्होंने जो कुछ सीखा, उसने उन्हें ऐसे कौशल और अनुभव दिए जो आने वाले वर्षों में उनकी बहुत मदद करेंगे। वह अब धीरे-धीरे अपनी युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे। दुर्भाग्य से, उनके आसपास बुरी नैतिकता और बुरे व्यवहार के कई उदाहरण थे। इस एपिसोड के अगले हिस्से में, हम विस्तार से बात करेंगे कि उस दौर की रस्में कितनी भ्रष्ट और भद्दी थीं। वह दौर जिसे हम जाहिलियत यानी अज्ञानता का दौर कहते हैं। यह सब चीज़ें मन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न को जन्म देती है। ऐसे वातावरण में उनकी रक्षा कैसे की गई?

दूसरे शब्दों में, पैगंबर बनने से पहले क्या वह कभी गुनाहों में पड़े?

ऐसी कई घटनाएँ हैं जो हमें इसे समझने में मदद करती हैं। लेकिन मैं उनमें से दो साझा करूँगा। एक बार, मक्का में एक सभा हुई थी जहाँ कई युवा मौज-मस्ती करने की योजना बना रहे थे। उनके दोस्तों ने पैगंबर अलाहिस्सलाम को भी आमंत्रित किया। और वह भी उनके साथ शामिल होना चाहते थे। लेकिन अगर वह ऐसा करते, तो यह गुनाहों में पड़ सकते थे। उस समय, वह एक चरवाहे के रूप में काम कर रहे थे। इसलिए उन्होंने एक मित्र से अपने झुंड की देखभाल करने के लिए कहा और मक्का की ओर चल दिया। वह बैठ गए और चारों ओर देखने लगे। जल्द ही, वह अपने चेहरे पर सुबह के सूरज की गर्मी से जाग गए। वह सो गए थे। कुछ समय बाद, फिर से वही बात हुई। वह वहाँ गए, बैठे, ये देखने के लिए कि आसपास क्या है, लेकिन एक बार फिर सो गए। यदि वह उस महफ़िल में शामिल होते, तो वह शायद ऐसी चीज़ों के गवाह बनते या उनमें खींच लिए जाते जो बाद में एक पैगंबर के रूप में उनकी भूमिका के विपरीत होतीं। लेकिन अल्लाह ने उनकी रक्षा की। इसके अलावा, उनके समाज के अधिकांश लोगों के विपरीत, उन्होंने कभी किसी मूर्ति की पूजा नहीं की या उनके प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया। वह 25 वर्ष की आयु के क़ुर्बान पहुँच रहे थे। और उस समय तक, वह व्यापार में अपनी ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हो गए थे। मक्का के लोग उनके अच्छे चरित्र की प्रशंसा करते थे और उन्हें एक उपनाम दिया - मुहम्मद अल-अमीन, जिसका अर्थ है "भरोसेमंद मुहम्मद।" कई लोग यक़ीन के साथ अपनी कीमती चीज़ें उन्हें सौंप देते थे। "ऐ मुहम्मद, क्या आप मेरे पैसे और मेरे ऊंट की देखभाल करेंगे?" यहाँ तक कि अपनी नबूवत की घोषणा करने के बाद भी, उनका विरोध करने वालों ने भी वह वापस नहीं लिया जो उन्होंने उन्हें सौंपा था। क्योंकि उन्हें अभी भी उन पर भरोसा था। यह बस इतना था कि उन्होंने जिसकी दावत दी वह उनके हितों के अनुरूप नहीं था। उस समय के आसपास, एक बड़ा व्यापारिक काफिला लंबी यात्रा के लिए रवाना होने वाला था। यह खुवैलिद की बेटी ख़दीजा का था। ख़दीजा न केवल एक बहुत ही सफल व्यापारी होने के लिए बल्कि अपनी पवित्रता और नेक चरित्र के लिए भी पूरे मक्का में जानी जाती थीं। उनकी दो बार शादी हुई थी, लेकिन उनके दोनों पतियों का निधन हो गया था। चूँकि व्यापारियों में पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की अत्यधिक प्रशंसा की जाती थी, इसलिए उन्होंने उनसे अपने क़ाफ़िले का नेतृत्व करने के लिए कहा। मक्का में उनके जैसा कोई और नहीं था। और पैगंबर ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। ख़दीजा ने अपने सेवक मैसरा को उनके साथ जाने के लिए भेजा। उनके साथ सहायता करने और चुपचाप उनके व्यवहार और तौर-तरीकों का निरीक्षण करने और उन्हें वापस खबर करने के लिए। जिस क्षण से वे निकले, मैसरा ने सावधानीपूर्वक उस जिम्मेदारी को निभाया। इस नौजवान में उसने जो कुछ भी देखा, उसने केवल उसकी प्रशंसा ही बढ़ाई। पूरी यात्रा के दौरान, पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने खास ख़याल रखा कि किसी के साथ अन्याय न हो। उनका चरित्र उत्कृष्ट था। वह ईमानदार, सच्चे थे और गरिमा के साथ रहते थे। उन्होंने यात्रा के दौरान स्वच्छता पर भी बहुत ध्यान दिया। ऐसी चीज़ जिसकी लालसा तो थी लेकिन उस समाज में शायद ही कभी मिला करती थी। अब मैसरा के लिए वापस लौटने और ख़दीजा के साथ वह सब साझा करने का समय आ गया था जिसका वह गवाह बना था। "मैंने उनके जैसा महान आदमी कभी नहीं देखा। हम जहाँ भी गए, लोगों ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन पर भरोसा किया।" जब मैसरा ने ख़दीजा को पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के सभी सुंदर गुणों के बारे में बताया, तो ख़दीजा के मन में उनके लिए भावनायें जागनी शुरू हो गईं। उस वक़्त तक, उन्होंने दोबारा शादी करने के बारे में कभी नहीं सोचा था। लेकिन अब, उन्होंने अपना मन बदल लिया। आम तौर पर, शादी का प्रस्ताव आदमी की ओर से आता था। लेकिन पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के लिए उनकी प्रशंसा इतनी गहरी थी कि उन्होंने खुद प्रस्ताव भेजने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। हालाँकि, यहाँ पर उम्र का अंतर था। पैगंबर 25 वर्ष के थे और ख़दीजा 40 वर्ष की थीं। क्या वह उन्हें स्वीकार करेंगे?

वह क्या करने वाली थीं?

उनकी एक करीबी और वफादार सहेली थी जिसका नाम नफीसा बिंत मुन्या था। ख़दीजा ने अपनी भावनाओं को उनके साथ साझा करने का फैसला किया। नफीसा को जो करना था वह स्पष्ट था। वह पैगंबर के पास जाएँगी और पता लगाएँगी कि क्या उनके मन में भी ख़दीजा के लिए भावनाएँ हैं। ख़दीजा को अत-ताहिरा, "शुद्ध महिला" के रूप में जाना जाता था। वह पूरे कुरैश में सबसे सम्मानित और अमीर महिलाओं में से एक थीं। उनके कबीले के कई पुरुषों ने उनसे शादी के लिए प्रस्ताव भेजा था। लेकिन उन्होंने उन सभी को मना कर दिया था। वास्तव में, अबू जहल द्वारा बाद में पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के प्रति इतनी नफरत रखने का एक कारण यह भी था कि उसके प्रस्ताव को भी उन्होंने रिजेक्ट कर दिया था। बेशक, अत-ताहिरा के रूप में जानी जाने वाली महिला कभी भी ऐसे भ्रष्ट और अहंकारी दिल वाले व्यक्ति को स्वीकार नहीं करने वाली थी। उन्हें अब सबसे अच्छा संभव जोड़ मिल गया था। नफीसा पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के पास गईं और पूछा: "मुहम्मद, आप शादी क्यों नहीं कर लेते?" उन्होंने कहा, "मेरे पास शादी करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है।" "क्या हो अगर उसका ध्यान रखा जाए और आपको धन, सुंदरता, गरिमा और एक उपयुक्त जोड़ी की पेशकश की जाए?

क्या आप स्वीकार करेंगे?" पैगंबर ने पूछा, "वह कौन है?" "ख़दीजा, खुवैलिद की बेटी।" उन्होंने पूछा, "लेकिन यह कैसे संभव है?" "वो मुझपर छोड़ दें।" और पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने कहा, "अगर ये बात है तो मुझे स्वीकार है।" नफीसा लौटीं और ख़दीजा के साथ यह बातचीत साझा की। उनका दिल ख़ुशी से भर गया। पैगंबर से शादी करने के लिए चुना जाना कितनी बड़ी नेअमत थी। जल्द ही, दोनों मिले और इस मुद्दे पर बात की। ख़दीजा ने उनसे कहा: "मेरे चाचा अम्र इब्न असद के पास जाइए और उनसे मुझसे शादी करने की अनुमति माँगिए।" अबू तालिब, जो हमेशा पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के लिए एक पिता की तरह रहे थे, एक बार फिर उनकी सपोर्ट के लिए आगे आए। इस बार, उनकी शादी की व्यवस्था करने के लिए। और उस खुशी के दिन बरकतों भरी शादी 20 ऊंटों के महर (दहेज) के साथ संपन्न हुई। मक्का में एक सुंदर और आदर्श घर बसने जा रहा था। दो हृदय गहराई से जुड़े हुए थे और प्रत्येक दिन, उनका बंधन और एक-दूसरे के प्रति प्रेम केवल मजबूत होता गया। मक्का में अन्य कोई घर भी उनके जैसा सुखी और अनुकरणीय नहीं था। समय के साथ, अल्लाह ने इस घर को बच्चों से नवाज़ा। पहले आए क़ासिम, फिर ज़ैनब, उसके बाद रुकय्या, उम्मे कुलसूम और फातिमा। नबूवत मिलने के बाद, अब्दुल्ला का जन्म हुआ। लेकिन कासिम का दो साल की उम्र में निधन हो गया। और अब्दुल्ला का केवल तीन महीने की उम्र में, दोनों ही बीमारी के कारण। ये किसी भी दंपति के लिए बड़ी असहनीय, अवर्णनीय पीड़ा है। और उससे दो बार गुजरना। वे हर भावना का एक साथ अनुभव कर रहे थे। खुशी के सबसे सुंदर क्षणों से लेकर दर्द के सबसे दिल दहला देने वाले क्षणों तक। लेकिन हर कठिनाई में, वे एक-दूसरे को थामे रहे। और उसके माध्यम से, उन्होंने शक्ति, शांति और धैर्य पाया। उन्होंने एक बार उनके बारे में कहा था: "अल्लाह ने मुझे उनसे बेहतर कभी कोई नहीं दिया। जब लोगों ने मेरा इंकार किया, वो मुझपे ईमान लाए। जब लोगों ने मुझे झुटलाया, तो उन्होंने मेरी सच्चे की गवाही दी। जब लोगों ने मुझे कुछ नहीं दिया, तो उन्होंने अपनी दौलत से मेरी मदद की। और अल्लाह ने मुझे उनसे औलाद अता की। यहाँ तक कि वही (प्रकाशना) के फरिश्ते, जिब्रील अलैहिस्सलाम भी उनके समर्पण और बलिदान से प्रभावित हुए। उन्होंने पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम से कहा: "जब ख़दीजा आपके पास आएँ, तो उन्हें उनके रब की ओर से और मेरी ओर से सलाम कहें।" ऐसी थीं 'ख़दीजा रज़िअल्लाहु अन्हा'। आइए अपनी कहानी पर वापस लौटें। इस बिंदु तक, पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की जीवन यात्रा तीन अलग-अलग क्षेत्रों में आकार ले चुकी थी। उन्होंने अपना प्रारंभिक बचपन बनू साद की भूमि में बिताया जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ, और वहाँ उन्होंने रेगिस्तानी जीवन का अनुभव किया। बाद में उन्होंने अपनी माँ के साथ मदीना में अपने रिश्तेदारों का दौरा किया और कुछ समय के लिए अपने चाचाओं के साथ रहे। यह वही जगह थी जहाँ उन्होंने वास्तव में पहली बार एक शहरी जीवन का अनुभव किया। और अब, वह कई वर्षों से मक्का में रह रहे थे। जाहिलियत के रूप में जाने जाने वाले अराजकता के केंद्र में, इसके सबसे बुरे दौर में। वर्षों से, उन्होंने अन्याय और क्रूरता के अनगिनत कृत्यों को देखा था। 35 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपनी ज़िन्दगी और अपने दिल की अवस्था, दोनों में बड़े बदलावों का अनुभव करना शुरू किया। ये बदलाव एक शक्तिशाली नई शुरुआत के संकेत थे। नबूवत के आने के साथ, मक्का में सब कुछ अपनी जड़ों तक हिलने वाला था। और कुछ भी पहले जैसा नहीं रहने वाला था। एक छोटी बच्ची अपने पिता के साथ रेगिस्तान के बीच में थी। सभी से बहुत दूर। विचारों में खोया हुआ, उसका पिता एक गड्ढा खोद रहा था जबकि वह यह समझने की कोशिश कर रही थी कि वह ऐसा क्यों कर रहे है। उसे उनसे कभी कोई प्यार नहीं मिला था। लेकिन वह उस दिन खुश थी। क्योंकि पहली बार, वे कोई काम एक साथ कर रहे थे। बस वे दोनों। एक बार तो उसने अपने पिता को गढ़ा खोदने में मदद करने की भी कोशिश की। जैसे-जैसे यह गहरा और गहरा होता जा रहा था, उसकी जिज्ञासा भी बढ़ रही थी। क्या वे कोई खेल खेलने जा रहे थे?

यह कैसा होगा?

यह सोचते हुए कि क्या होने वाला है, उसने अचानक एक धक्का महसूस किया और खुद को गड्ढे के अंदर पाया। यह उसका पिता ही था जिसने उसे धक्का दिया था। फिर उसने जल्दी से अपनी बेटी के ऊपर धूल फेंकना शुरू कर दिया। छोटी बच्ची, जिसे यह भी नहीं पता था कि वह उस छेद में क्यों है, वास्तविक दुःस्वप्न में जी रहे थे। उसे उसी व्यक्ति द्वारा जीवित दफनाया जा रहा था जिससे उसने सबसे अधिक प्यार की उम्मीद की थी। उसके छोटे मासूम संघर्ष और हताश चीखें उसके पिता की सड़ी हुई अंतरात्मा को नहीं जगा सकीं। वह वहीं मरने वाली थी। बस इसी तरह। और वह जहाँ रहती थी वो उस जगह की क्रूरता और निर्दयता का प्रतिबिंब बन गई। ऐसी भयानक घटना, जिसकी कल्पना करना भी हमारे लिए लगभग असंभव है, इस्लाम से पहले जाहिलियत के दौरान अरब प्रायद्वीप में घटित हुई थी। उस समय, बेटियों को शर्म और दुर्भाग्य के स्रोत के रूप में देखा जाता था। कुछ पिता कहते थे: "एक दिन उसकी शादी हो जाएगी और वह हमारी विरासत अजनबियों को दे देगी।" इन विकृत मान्यताओं के कारण कुछ लड़कियों को अपनी जान गँवानी पड़ी। या सबसे अच्छे मामले में, वे अपना जीवन बिना अपने पिता के प्यार को महसूस किए बिताती थीं। लेकिन यह वहीं नहीं रुका। यहाँ तक कि जब एक लड़की बड़ी हो जाती और शादी कर लेती, तब भी उसे बेकार माना जाता था। यदि उसका पति मर जाता और वह अनाथ बच्चों के साथ रह जाती, तो कोई भी आदमी आकर उनके घर के स्वामित्व का दावा कर सकता था। और यह दया के कार्य के रूप में नहीं किया जाता था। वह आदमी घर की हर चीज़ ले लेता था। पैसा, संपत्ति, यहाँ तक कि परिवार भी। उन्हें विरासत का उचित हिस्सा न देने के अलावा, वे उनके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करते थे। उनके जीवन, सपने और भविष्य चुरा लिए जाते थे। उनकी क़द्र (value) खिलौनों से भी कम होती थी। लेकिन सबसे दिल दहला देने वाला हिस्सा यह था कि उन अनाथ बच्चों या उनकी विधवा माँ के लिए खड़े होने वाला कोई नहीं था। भला एक पिता अपने ही नवजात बच्चे की जान कैसे ले सकता है?

और यह केवल लड़कियाँ ही नहीं थीं। कुछ लोग अपने बच्चों को यह सोचकर मार देते थे कि उनका पालन-पोषण करना बहुत कठिन होगा। बस उस दौर में एक माँ होने की कल्पना करें। आपने अपने बच्चे के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की है। शायद आपके सपने थे। और अब उस बच्चे को उसकी हत्या करने के लिए आपकी बाँहों से लिया जा रहा है। उनके अपने ही पिता द्वारा। उनके दिल जल रहे थे। लेकिन वे पूरी तरह लाचार थे। वे इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते थे। आखिर, क्या किसी को इसकी परवाह भी थी कि उन्होंने क्या महसूस किया?

दूसरों की नज़रों में उनका कोई मूल्य नहीं था। और यह केवल वहीं तक सीमित नहीं था। कबीलों के बीच निरंतर रक्त प्रतिशोध चल रहा था। यदि किसी एक कबीले के किसी व्यक्ति को मार दिया जाता, तो उसके लिए कोई कानून या न्याय नहीं था। प्रतिद्वंद्वी कबीले का कोई भी व्यक्ति बड़े खतरे में होता। किसी भी समय, किसी भी स्थान पर, उन्हें बिना किसी चेतावनी के मारा जा सकता था। एक मासूम बच्चा जिसका आस-पास जो कुछ हो रहा था उससे कोई लेना-देना नहीं था, वह अपने पिता को खो सकता था। और उनके बिना बड़ा हो सकता था, नफरत और दूसरे कबीले के खिलाफ बदला लेने की इच्छा से भरा हुआ। और इसलिए हत्या का चक्र चलता रहा। कोई भी इसे रोकने में सक्षम नहीं था। न्याय नहीं था। हृदय पत्थर में बदल गए थे। लोग अपनी इच्छाओं के गुलाम बन गए थे। उनका एकमात्र लक्ष्य वह प्राप्त करना था जो वे चाहते थे। शराब पीना, जुआ, झूठ बोलना, चोरी करना, व्यभिचार, उत्पीड़न। अनैतिकता के हर रूप ने उस जगह पर शासन किया। यद्यपि सूर्य चमक रहा था, रूहानी माहौल घोर अंधकार में डूब रहा था। यह जितना गहरा होता जाता है, हम उतनी ही स्पष्ट रूप से समझते हैं कि रौशनी कितनी शानदार है। और इसलिए क़ुरआन सबसे पहले इन्हीं लोगों पर अपनी रौशनी चमकाने वाला था और उन्हें अज्ञानता के इस अंधकार से बाहर निकालने वाला था। नबूवत की श्रृंखला की अंतिम कड़ी इसी भूमि में उभरने वाली थी, और पूरी दुनिया को संबोधित करने वाली थी। मक्का का एक प्रमुख लाभ भी था। यह रणनीतिक रूप से अरब प्रायद्वीप के केंद्र में स्थित था जो इसे अन्य सभी क्षेत्रों से अलग बनाता था। वहाँ प्रमुख व्यापार मेले आयोजित किए गए। अरब के हर कोने से क़ाफ़िले और कबीले आए। यह एक विशाल नेटवर्क के केंद्र की तरह था। यहाँ से शुरू होने वाला कोई भी संदेश आस-पास के कबीलों में तेज़ी से फैल सकता था। केवल पाँच या छह महीनों के भीतर, यह आस-पास के साम्राज्यों तक भी पहुँच सकता था। क्षेत्र में किसी और जगह का प्रभाव इस स्तर नहीं था। ये बात अजीब लग सकती है मगर अरब प्रायद्वीप आस-पास के राज्यों और साम्राज्यों द्वारा आक्रमण के खतरे से सुरक्षित रहा। यहाँ आख़िरी पैगंबर के आने के लिए हर तौर से एक आदर्श स्थिति थी। और इसलिए अल्लाह ने मक्का को अपने रसूल के लिए इस दुनिया में आने के स्थान के रूप में चुना। वह शहर जहाँ सभी सड़कें आपस में मिलती थीं। इन सभी कारणों को छोड़कर, मक्का की लोकप्रियता के पीछे एक और कारण था। अरबों के लिए पूर्वज बहुत महत्व रखते थे। और यह शहर उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता था जिसे वे अपना पूर्वज मानते थे, इब्राहिम अलैहिस्सलाम। वह उन पैगंबरों में से एक थे जिन्होंने काबा का निर्माण किया था। उनके मन में अपने पूर्वज द्वारा बनाए गए इस इबादतगाह के प्रति गहरा सम्मान था। लेकिन अगर आप उनसे पूछते कि इब्राहिम अलैहिस्सलाम का वास्तव में उनके जीवन में क्या बचा है, तो जवाब होता 'कुछ भी नहीं'। केवल एक पवित्र अनुष्ठान बचा था जिसे हज्ज यानी तीर्थयात्रा के रूप में जाना जाता है। और वो भी एक सांस्कृतिक परम्परा तक सिमट कर रह गया था। एक-एक करके, जाहिलियत के लोगों के द्वारा इसके गहरे अर्थ बिगाड़ दिए गए। यहाँ तक ऐसे लोग भी थे, जो बिना कपड़ों के क़ाबा की परिक्रमा करते थे। कुछ लोग तो ताली बजाते और नाचते हुए ऐसा करते थे। उस पवित्र स्थान की भावना और अर्थ से पूरी तरह कट गए। इब्राहिम अलैहिस्सलाम एक ऐसे पैंगम्बर थे, जो मूर्ति पूजा के ख़िलाफ़ लड़े। और मज़बूती से खड़े रहे। लेकिन अब, जिस काबा को उन्होंने अपने हाथों से बनाया था वो 360 मूर्तियों से घिरा हुआ था। उनमे सबसे प्रसिद्ध लात, बनात, उज्जाह और हबल थे। भले ही वो अल्लाह में मानते थे, लेकिन उन्होंने केवल उनका नाम स्वीकार किया था। उनके अन्य सभी नाम, गुण, उनके कार्य पूरे ब्रमांड पर उनकी शक्ति इत्यादि को मूर्तियों से जोड़ दिया गया था। लेकिन, क्या उस शहर में हर कोई मूर्तियों की पूजा करता था?

क्या पैंगम्बर मुहम्मद अलैहिस्सलाम उनमें से एक थे?

बिल्कुल नहीं। इब्राहिम अलैहिस्सलाम के सदियों बाद भी, अभी भी कुछ लोग थे जिन्होंने हनीफ़ आस्था को थामे रखा था। जिसे वो छोड़कर गए थे। दुर्लभ लोग, जो केवल अल्लाह पर ईमान रखते थे। और जिन्होंने मूर्ति पूजा के सभी रूपों को ख़ारिज कर दिया था। ये मान एक आध्यात्मिक ढाल की तरह था, जिसने उन्हें वह्य के नाज़िल होने से पहले गुमराह होने से बचाया। और अल्लाह के रसूल उनमे से एक थे। उन्हें मूर्ति पूजा बिल्कुल पसंद नहीं थी। लेकिन उन्होंने दूसरों को ऐसा करने से रोकने के लिए हस्तक्षेप या प्रयास भी नहीं किया। वास्तव में उनका अतीत में ये रवैया रखना महत्वपूर्ण था। क्योंकि अन्यथा, जब इस्लाम आया, तो लोग कह सकते थे, “ मुहम्मद, हम आपको आपकी युवावस्था से जानते है।” “आप हमेशा हमे रोकने की कोशिश कर रहे थे।” लेकिन वे ऐसा नहीं कह सके। क्योंकि उन्होंने कभी उनकी आस्थाओं के बारे में कुछ नहीं कहा था। हालाँकि, जिस क्षण उनका नबवी मिशन शुरू हुआ, उन्होंने उन्हें पूर्ण स्पष्टता के साथ चेतावनी देना शुरू कर दिया: अल्लाह एक ऐसी रूह का मार्गदर्शन करने वाला था, जो बाकी सोए हुओं को जगाने के लिए काफ़ी थी। अब, हम उस जागृति की शुरुआत की ओर चलते हैं। 35 वर्षीय अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम की कहानी की ओर। एक दिन, काबा के चारों ओर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आई। हमें काबा पर काला पत्थर रखने का अधिकार है!

बनू अदी, बनू तमीम और बनू उमय्या जैसे कबीले यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं। बहस इतनी बढ़ गई कि कुछ परिवारों ने लड़ने, यहाँ तक कि एक-दूसरे को मारने की क़सम खानी शुरू कर दी। एक दूसरे को धमकियाँ दी जा रही थीं। लेकिन इस अराजकता की वजह क्या थी?

मुद्दा यह था कि हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) रखने का सम्मान किसे मिलेगा। आइए कुछ दिन पीछे चलते हैं। वर्षों से, काबा पुराना और जीर्ण हो गया था। हमें शर्म आनी चाहिए। ये पवित्र संरचना जो हमें हमारे पूर्वज इब्राहिम से विरासत में मिली इसकी हालत ऐसी हो गई है। मक्का के बुजुर्ग एक साथ आए और सहमत हुए कि कुछ किया जाना चाहिए। उस समय के आसपास, उन्होंने एक जहाज के बारे में सुना जो जेद्दा के पास शुआयबा बंदरगाह पर पहुँचा था। यह बिल्कुल वैसी ही निर्माण सामग्री ले जा रहा था जिसकी वे तलाश कर रहे थे। इसलिए उन्होंने उन सामग्रियों को खरीदने और काबा को नए सिरे से बनाने का फैसला किया। परियोजना को जल्दी से पूरा करने के लिए, उन्होंने एक साझा कोष बनाया और सभी ने काबा के लिए जितना हो सका योगदान दिया। लेकिन भले ही यह अज्ञानता का युग था, ब्याज के माध्यम से अर्जित एक भी सिक्का उस कोष में नहीं जोड़ा गया था। वे ईश्वरीय दंड से डरते थे। इस तरह के पवित्र कार्य के लिए, वे किसी भी ऐसे पैसे का उपयोग नहीं करना चाहते थे जिसमें गरीबों का दर्द और आँसू हों। आखिरकार आवश्यक कोष जमा हो गया। और साथ मिलकर, उन्होंने काबा का पुनर्निर्माण किया। केवल एक चीज बची थी। वह एक चीज़ जो सारा तनाव भड़काने वाली थी.

हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) को उसकी जगह पर वापस रखना। सदियों पहले, इसे पैगंबर इब्राहिम अलैहिस्सलाम द्वारा वहाँ रखा गया था। और तब से, यह अछूता रहा था। और अब, कोई भी कबीला इस सम्मान को दूसरे को देने को तैयार नहीं था। प्रत्येक ने ज़ोर देकर कहा कि वे सबसे योग्य हैं और अपनी श्रेष्ठता साबित करने की कोशिश की। यह सम्मान हमारा है! नहीं, यह सम्मान हमारा है! यहाँ तक कि कुछ ने एक-दूसरे से लड़ने की कसम भी खाई। मेरी लाश पर से गुज़रे बिना तुम यह सम्मान नहीं ले सकते!

चार से पाँच दिनों तक, कोई समाधान नहीं मिल सका। किसी काम के अच्छे इरादों के साथ शुरू होने और इस तरह के गंभीर विवाद में बदल जाने को देखना निराशाजनक था। तब उनमें से सबसे बुजुर्ग व्यक्ति खड़े हुए और कहा: ऐ कुरैश, चूंकि तुम इस मसले पर सहमत नहीं हो पा रहे, इसलिए काबा के उस द्वार से प्रवेश करने वाले पहले व्यक्ति को तुम अपना न्यायाधीश मान लो। उसी को इस मसले को सुलझाने दो। इस विचार पर सभी सहमत हुए और खामोशी से इंतज़ार करने लगे। उस द्वार से कौन प्रवेश करेगा?

थोड़ी देर बाद, आखिरकार, प्रवेश द्वार पर कोई दिखाई दिया। जिस पल उन्होंने उन्हें देखा, उन्होंने एक बड़ी राहत महसूस की। यह तो अल-अमीन है। यह मुहम्मद है। वह जो भी फैसला करेंगे, हम उसे स्वीकार करेंगे। जो व्यक्ति अंदर आया वह अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम थे। वे सभी उन पर भरोसा करते थे और निश्चिंत थे कि वह ऐसा निर्णय लेंगे जिससे हर कोई प्रसन्न होगा। फिर, उन्होंने उन्हें स्थिति समझाई। एक गंभीर असहमति हमें बाँट रही है, और हम समझ नहीं पा रहे कि क्या करें। इससे पहले कि यह हमारा नुक़सान करे, हम आपका मार्गदर्शन चाहते हैं। उत्साह और जिज्ञासा से भरे चेहरों के साथ, उन्होंने उनके निर्णय की प्रतीक्षा की। तो, वह इस समस्या को कैसे हल करेंगे?

उन्होंने कहा, "एक कपड़ा लाकर दीजिए।" उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि वह क्या करने की योजना बना रहे हैं। सबसे पहले, उन्होंने हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) को उसके बीच में रखा। फिर, प्रत्येक कबीले से, उन्होंने एक प्रतिनिधि को आगे आने और कपड़े का एक हिस्सा पकड़ने के लिए कहा। साथ मिलकर, उन्होंने पत्थर को काबा की ओर उठाया। और अंत में, पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने हज्र-ए-अस्वद को लिया और अपने हाथों से उसकी जगह पर वापस रख दिया। इस तरह, कई दिनों तक चलने वाले संघर्ष का अंत हो गया। और एक संभावित ख़ून-खराबा पूरी तरह से टल गया। इस घटना ने लोगों को अल्लाह के रसूल ﷺ का और भी अधिक सम्मान और प्रशंसा करने के लिए मजबूर किया। एक बार फिर, सभी ने देखा कि वह कितने भरोसेमंद थे। हमने पहले ही उनके इस गुण की चर्चा उनके जीवन के शुरुआती हिस्सों में की थी। जब भी कोई अल-अमीन (भरोसेमंद) कहता, तो लोगों को स्पष्ट था कि यहाँ किसकी बात हो रही है। यह केवल पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ही हो सकते थे। उनके पूरे जीवन में, यह गुण उनके चरित्र के हर हिस्से में देखा गया था। व्यापार में भरोसेमंद, परिवार में भरोसेमंद, अपने वादे में भरोसेमंद, और सभी के द्वारा भरोसेमंद, चाहे वे युवा हों या वृद्ध। इस गुण ने लोगों के दिलों पर एक अविस्मरणीय छाप छोड़ी। वास्तव में, उन्हें यह गुण प्रदान करना अल्लाह की महान योजना का हिस्सा था। क्योंकि जब उन्हें नबूवत देने का समय आया, तो लोग उन पर झूठ बोलने का आरोप नहीं लगा पाएंगे। और यदि उन्होंने प्रयास भी किया, तो ऐसा दावा पूरी तरह से निराधार लगेगा। अल्लाह के रसूल ﷺ पर जैसे-जैसे लोगो का यक़ीन बढ़ता रहा, उनके अंदर कुछ बदलाव आने शुरू हुए। दिन-ब-दिन वह अकेला रहना पसंद करने लगे। इसलिए, उन्होंने लोगों से खुद को दूर करना शुरू कर दिया। काबा, जिसे कभी इब्राहिम अलैहिस्सलाम के शुद्ध एकेश्वरवाद द्वारा आकार दिया गया था, अब मूर्तियों से घिरा हुआ था। अनैतिकता, अन्याय, क्रूरता और अमानवीय व्यवहार के सभी प्रकार शहर पर कब्जा कर रहे थे। उनका आंतरिक संसार मक्का में चल रही चीज़ों के साथ अधिक से अधिक संघर्ष में आ रहा था। वह इसे और सहन नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने एक क्रांतिकारी निर्णय लिया। वह कुछ हद तक समाज से हट गए और नियमित रूप से जबले नूर जाना शुरू कर दिया। लेकिन वह वहाँ क्या करते?

वह खामोशी की तलाश करते। उनकी आत्मा का दम घुट रहा था। एकांत को उनके लिए प्रिय बना दिया गया था। वह अकेला रहना चाहते थे। ब्रह्मांड और अपने विचारों के साथ। वह अपने रब की इबादत करते, उनसे दुआ माँगते और चुपचाप ब्रह्मांड पर विचार करते। और इन सबके लिए सबसे उपयुक्त स्थान था - ग़ारे हिरा। अल्लाह उन्हें आने वाले वही (प्रकाशना) के लिए तैयार कर रहा था। उस नूर के लिए जो अंततः नीचे भेजा जाने वाला था। जबले नूर के शीर्ष तक जाने वाला 621 मीटर का रास्ता खड़ा और कठिन था। इसने उनकी ताकत को चुनौती दी। लेकिन वह भी उन्हें चढ़ने से नहीं रोक सका। जिस चीज़ ने इस यात्रा को उनके लिए बहुत आसान बना दिया, वह थी उनकी प्यारी पत्नी ख़दीजा का प्यार और समर्थन। उन्होंने कभी उन्हें आंका नहीं। उन्होंने हमेशा उनका साथ दिया। यह शांत यात्रा तब तक जारी रही जब तक वह 40 वर्ष की आयु तक नहीं पहुँच गए। और वह गुफा उनकी सबसे करीबी साथी बन गई। इस बीच, ब्रह्मांड इंतजार कर रहा था। यह वर्षों से इंतजार कर रहा था। एक ऐसे नूर के लिए जो सभी अंधकार को चीर देगा। पृथ्वी पर, आकाश में, और हर नन्हे कण में, अर्थ छिपे हुए थे। लेकिन लोग अनजान थे। प्रत्येक रचना अल्लाह द्वारा लिखे गए एक पत्र की तरह थी। लेकिन केवल कुछ ही लोग जानते थे कि उन्हें पढ़ना कैसे है। लंबे समय से, उन पत्रों को समझाने के लिए कोई वही (प्रकाशना) नहीं आई थी। वे एक ऐसी आत्मा के लिए तरस रहे थे जो उनके संदेश को पढ़ सके। यह असहनीय हो गया था। और फिर, वह अनोखी रात आई। साल था 610, वह रमज़ान के महीने में एक सोमवार का दिन था। और रात?

लैलातुल क़द्र, शक्ति की रात। वह रात, जब आखिरकार सारा अंधकार मिटा दिया जाना था। पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम 40 वर्ष के थे। वह ग़ारे हीरा में थे, अपना समय गहरे चिंतन, दुआ और इबादत में गुज़ार रहे थे। एक गहरी खामोशी ने सब कुछ ढँक लिया था। रात पूरी तरह से अंधेरी थी सिवाय चाँदनी के जो दीपक की तरह चमक रही थी। उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि क्या होने वाला है। और फिर, उस महान मुलाक़ात का क्षण आ गया। एक नूर ने अचानक गुफा को भर दिया। यह इतना उज्ज्वल था कि उसने आँखों को चकाचौंध कर दिया। फिर, उस नूर के भीतर से एक शख्स नमूदार हुए। यह वही (प्रकाशना) के फरिश्ते, जिब्रील अलैहिस्सलाम (गैब्रियल) थे। उन्होंने एक आदमी का रूप लिया था और अल्लाह के आदेश के साथ आए थे। उस व्यक्ति के लिए जो अंतिम पैगंबर होगा। पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम, विस्मय से भरे हुए, यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या हो रहा है। फिर पहला आदेश आया। पहली खुशखबरी। जिब्रील ने कहा, "पढ़ो।" पैगंबर ने उत्तर दिया, "मैं ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ जो पढ़ सके।" फरिश्ते ने उन्हें गले लगाया और उन्हें कसकर भींचा। फिर उन्होंने छोड़ दिया और फिर से कहा, "पढ़ो।" लेकिन पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने वही उत्तर दिया। जिब्रील ने उन्हें फिर से भींचा और दोहराया, "पढ़ो।" लेकिन उनके हाथ में कुछ भी लिखा हुआ नहीं था। पैगंबर ﷺ ने एक बार फिर उत्तर दिया कि वह पढ़ नहीं सकते। फिर जिब्रील अलैहिस्सलाम ने उन्हें तीसरी बार गले लगाया। इतना कसकर कि पैगंबर अलैहिस्सलाम को लगा कि उनमें कोई ताकत नहीं बची है। और उस क्षण, पूरी तरह से लाचार होकर, उन्होंने कहा, "मैं क्या पढ़ूँ?" तब जिब्रील अलैहिस्सलाम ने तिलावत शुरू किया: इक़रा बिस्मि रब्बिकल लज़ी ख़लक़। पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया,) ख़लक़ल इंसाना मिन अलक़। (उसने इंसान को खून के लोथड़े से पैदा किया।) इक़रा व रब्बुकल अकरम। (पढ़ो, और तुम्हारा रब बड़ा करीम है।) अल्लज़ी 'अल्लमा बिल क़लम। (जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी,) अल्लमल इंसाना मा लम या'लम। (इंसान को वह सिखाया जो वह नहीं जानता था।) एकमात्र आवाज जिसने गुफा को भर दिया वह वही (प्रकाशना) की आवाज़ थी। "पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया। उसने इंसान को खून के लोथड़े से बनाया। पढ़ो, और तुम्हारा रब सबसे उदार है। जिसने क़लम से सिखाया, इंसान को वह सिखाया जो वह नहीं जानता था।" ये वही की पहली आयतें थीं जो हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के पास आईं। वह ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो पढ़ या लिख सकें। लेकिन उस क्षण से, वह पूरी दुनिया को दिखाने वाले थे कि वास्तव में पढ़ने का क्या मतलब है। अपने दिल में कुरान के लिए, वह ब्रह्मांड की पुस्तक के मुफ़स्सिर बन गए। प्रत्येक निर्मित कलाकृति से, वह कलाकार यानी अल्लाह की निशानी को प्रकट करने वाले थे। अब यह समझा जाएगा कि एक फूल की सुंदरता वास्तव में अल्लाह के नामों में से एक, अल-जमील, "सबसे सुंदर" का प्रतिबिंब थी। एक माँ की करुणा को उनके नाम अर रहमान सबसे दयालु के प्रतिबिंब के रूप में जाना जाएगा। जब माँ द्वारा खाया हुआ खाना, उसके बच्चे के लिए साफ़ पौष्टिक दूध में बदल जाता है। तो वो अल्लाह के नाम “अल रज़्ज़ाक़ ” रिज़्क देने वाला को प्रतिबिंबित करेगा। मनुष्य के बारे में कुछ भी जाने बिना मधुमक्खी फूल-फूल उड़ रही थी। और शहद का उत्पादन कर रही थी। जो इंसानी शरीर के लिए उपचार का साधन बन गया। इसे अब अश-शाफ़ी, "उपचारक" नाम के इज़हार (manifestation) के रूप में देखा जाएगा। लोग मानते थे कि ब्रह्मांड बे-मक़सद था, संयोगों और randomness से भरा हुआ। वे दुनिया को दुख और हानि के स्थान के रूप में देखते थे, और सोचते थे कि मरने वाले हमेशा के लिए चले गए हैं, कभी वापस नहीं लौटेंगे। लेकिन अब, अज्ञानता का वह अंधकार धीरे-धीरे मिटने लगा। ब्रह्मांड के रहस्य समझे जाने लगे। इसके बंद दरवाज़े एक-एक करके खुलने वाले थे। वह अब अल्लाह के रसूल थे। मुहम्मद। उन पर शांति और आशीर्वाद हो। उस लम्हे की कल्पना करने का प्रयास करें। वह डरे हुए थे। वह नहीं जानते थे कि क्या करना है। वह बस जितनी जल्दी हो सके घर वापस जाना चाहते थे। वह हिरा से बाहर निकले। उनका हृदय डर से धड़क रहा था। वह पहाड़ से नीचे भागे, सीधे उसी एक जगह की ओर जो सुरक्षित महसूस होती थी। ख़दीजा के पास। वह अकेली थीं जो वास्तव में उन्हें समझ सकती थीं। उन्हें उनके दिलासा देने वाले शब्दों की आवश्यकता थी। उन्हें उनके मुहब्बत भरे दिल की आवश्यकता थी। वह आखिरकार, घर पहुँच गए। वह पसीने से तरबतर थे और मुश्किल से ही बोल पा रहे थे। उनके होठों पर केवल एक ही बात थी। "मुझे ढँक दो। मुझे ढँक दो।" तो हमारी माँ ख़दीजा ने क्या किया?

उन्होंने ठीक वही किया जैसा उन्होंने कहा। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे अल्लाह के रसूल परेशान हों। उन्होंने उन्हें लेटने में मदद की, उन्हें ढँक दिया, और उनके साथ ही रहीं। तब पैगंबर अलैहिस्सलाम ने उन्हें बताना शुरू किया कि क्या हुआ था। "मुझे डर लग रहा है, ऐ ख़दीजा," वह बोले। "मुझे डर है कि मेरे साथ कुछ बुरा हो सकता है।" हमारी माँ ने घबराहट में जवाब नहीं दिया। उन्होंने उनकी चिंता नहीं बढ़ाई। उनके शब्द वही थे जिनकी आप अलैहिस्सलाम के दिल को आवश्यकता थी। "कभी नहीं। अल्लाह की कसम, अल्लाह आपको कभी नुकसान नहीं पहुँचाएगा।" यह सब कुछ शांत करने के लिए पर्याप्त था। फिर वह बोली - "आप अपने परिवार के साथ अच्छे संबंध रखते हैं। आप गरीबों और कमजोरों की मदद करते हैं। अपने मेहमानों से उदारता से पेश आते हैं, और आप मुश्किल में पड़े लोगों की मदद करते हैं।" उनके द्वारा कहे गए प्रत्येक शब्द ने उन्हें अधिक से अधिक सुकून पहुँचाया। इसीलिए सबसे सुरक्षित आश्रय जिसकी ओर वह मुड़ सकते थे, वह ख़दीजा थीं। तो, आगे क्या होने वाला था?

यह ख़दीजा पर छोड़ दिया गया था कि वह किसी से पूछें और जवाब मालूम करें। वह हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम को अपने चचेरे भाई वरक़ा के पास ले गईं। लेकिन वरक़ा कौन थे?

वरक़ा इब्न नौफ़ल एक धार्मिक विद्वान थे। उन्हें पिछली वही (प्रकाशना) के बारे में पता था। वह ईसाई धर्म, यहूदी धर्म और नबूवत के कॉन्सेप्ट को जानते थे। वह 80 वर्ष से अधिक आयु के एक ईसाई थे। वह उनकी मदद कर सकते थे। अंत में, वे वरक़ा के घर पहुँचे। उन्होंने उन्हें बताना शुरू किया कि क्या हुआ था। वरक़ा उत्साहित हो रहे थे। जैसे-जैसे वह सुनते गए, उनका विस्मय बढ़ता गया। ऐसा लग रहा था मानो वे उनके सामने जवान हो रहे हों। उन्होंने अल्लाह के नामों में से एक को दोहराते हुए ज़ोर से कहा, "कुद्दूस, कुद्दूस"। पूरी कहानी सुनने के बाद, उन्होंने बोलना शुरू किया। "आपने जिस फरिश्ते को देखा वह रूह-उल-क़ुदुस (पवित्र आत्मा) है, वही जिसे अल्लाह ने पैगंबर मूसा अलैहिस्सलाम के पास भेजा था। वह नामूस अल-अकबर है। और आप इस क़ौम के पैगंबर हैं।" उन्होंने जारी रखा, लेकिन इस बार, जो बात वह कहने वाले थे, वह अल्लाह के रसूल को हिला देने वाली थी। "ओह, काश तब तक मैं युवा और जीवित होता जब आपके लोग आपको आपकी ज़मीन से निकाल देंगे।" पैग़म्बर अलैहिस्सलाम ने उनसे हैरानी में पूछा, "मेरे लोग मुझे निकाल देंगे?" वह स्तब्ध थे। क्योंकि 40 वर्ष के होने तक उनकी किसी एक से भी दुश्मनी या लड़ाई नहीं हुई थी.

हर कोई उन्हें जानता और उन पर भरोसा करता था। वरक़ा ने कहा, "बिना अपने लोगों का विरोध झेले किसी ने भी आपके जैसा पैग़ाम नहीं लाया। और यदि मैं उस दिन को देखने के लिए जीवित रहा, तो मैं आपका साथ देने की पूरी कोशिश करूँगा।" वह रात इसी तरह गुज़री। सभी बातचीत के बाद, वे घर लौट आए। अगले दिन, जिब्रील अलैहिस्सलाम एक बार फिर अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम के पास नज़र आए। और उन्हें मक्का के बाहर एक घाटी में ले गए जिसे अबू दुब के नाम से जाना जाता था। वहाँ, उन्होंने अपनी एड़ी से ज़मीन पर प्रहार किया, और साफ़ पानी बहने लगा। और फिर उन्हें वुज़ू करना सिखाया। उसके बाद, उन्होंने उन्हें नमाज़ पढ़ना दिखाया। और अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम ने उस घाटी में पहली बार दो रकात नमाज़ पढ़ी। पहले दिन, ब्रह्मांड की सबसे बड़ी सच्चाई सिखाई गई - आस्था - यानी ईमान। और अगले दिन, दूसरी सबसे बड़ी सच्चाई सिखाई गई थी : नमाज़। हाँ, उसके बाद नमाज़ अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम के लिए मज़बूत सहारा बन जाएगी। उन कठिनाइयों के खिलाफ एक आध्यात्मिक ढाल जिनका वह सामना करने वाले थे। अब जब इबादत उनके जीवन का हिस्सा बन गई थी, तो वह नबूवत के भारी बोझ को और अधिक शक्ति के साथ उठाने वाले थे। जब वह घर लौटे, तो उन्होंने इबादत करने के हुक्म को सबसे पहले हमारी माँ ख़दीजा के साथ साझा किया। पैगंबर ने नमाज़ का नेतृत्व किया, और हमारी माँ ख़दीजा ने उनके पीछे जमात से नमाज़ पढ़ी। वह किसी और को वह पहला स्थान नहीं लेने देंगी। फिर उनके बच्चे उनके साथ जुड़ गए। साथ में वे अपने एक और एकमात्र रब के लिए उनके सामने झुकते और सजदा करते हुए इबादत में खड़े हुए, वे अपने दिल को ख़ुराक़ और अपनी रूह को ज़िन्दगी दे रहे थे। वे अल्लाह का उन अनगिनत नेअमतों के लिए शुक्र अदा कर रहे थे जो उसने उन्हें दिए थे। एक बार फिर, यह स्पष्ट था कि यह पूरे मक्का में सबसे सुंदर और शांतिपूर्ण घर था। जब वे इबादतें की जा रही थीं, तो एक बच्चा चुपचाप उन्हें पीछे से देख रहा था। वह केवल 10 वर्ष का था। और उसका नाम था - अली। वह पैगंबर अलैहिस्सलाम के चाचा अबू तालिब का बेटा था। उसने जो देखा वह अपरिचित लगा, लेकिन दिल को बहुत छू लेने वाला भी। इबादत ख़त्म होने के बाद, वह अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम के पास गए और पूछा, "यह क्या है?" तब पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने उन्हें इस्लाम की दावत दी। अली रज़िअल्लाहू अन्हु ने संदेश को तुरंत स्वीकार नहीं किया। वह पहले अपने पिता से बात करना चाहते थे। लेकिन इस पर विचार करने के बाद, उन्होंने कहा, "जब अल्लाह ने मुझे बनाया, तो उसने अबू तालिब से नहीं पूछा। तो मुझे अल्लाह की इबादत करने के बारे में उनसे क्यों पूछना चाहिए?" और इसके साथ, वह पैगंबर अलैहिस्सलाम के पास लौटे और अपने ईमान लाने की घोषणा की। इस तरह, अली रज़िअल्लाहू अन्हु इस्लाम अपनाने वाले पहले बच्चे बने। शुरुआती दिनों में, अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम ने अपनी नबूवत की खुलेआम घोषणा नहीं की थी। उन्होंने सभी को आमंत्रित नहीं किया। केवल कुछ ही लोगों को। उन्होंने इसे गुप्त रखा। लेकिन किसी तरह, खबर मौखिक रूप से फैल गई और कुरैश के नेताओं तक पहुँच गई। अब वो वक़्त आ गया था कि इल्लिय्यीन' वाले 'अस्फ़लुस्साफ़िलीन' वालों से अलग हो जाएं। यानी, सबसे ऊँचे रुतबे वाले लोग, सबसे गिरे हुए लोगों से जुदा हो जाएं।" अबू बक्र और अबू लहब के दिलों का हाल और उनकी असलियत जल्द ही सबके सामने आने वाली थी। उस समय, अबू बक्र यमन की एक व्यापारिक यात्रा से लौटे ही थे। वह कुरैश के सबसे सम्मानित लोगों में से एक थे। एक सफल व्यापारी और हनीफ़ों (एकेश्वरवादियों) में से एक। वह कई वर्षों से अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम के करीबी मित्र थे, और उनसे केवल दो वर्ष छोटे थे। अबू जहल और कुरैश के कुछ नेता उनसे मिलने आए। अबू बक्र ने पूछा: "जब मैं यहाँ नहीं था तब मक्का में क्या हुआ?

क्या कोई खास खबर है?" "एक बड़ा मसला है।” अबू तालिब के यतीम, मुहम्मद ने पैगंबर होने का दावा किया है। हमने सोचा कि आपके यमन से वापसी तक इंतज़ार किया जाए। अब, अपने दोस्त के पास जाइए और वह कीजिए जो किया जाना चाहिए।" उन्होंने सोचा कि वह पैगंबर ﷺ को अपने मिशन को छोड़ने के लिए मना लेंगे। लेकिन अबू बक्र के दिल में कुछ और ही था। हाल ही में, उन्होंने एक अलग मनोदशा में प्रवेश किया था। और जो उन्होंने सुना उसने पुष्टि की कि वह क्या सोच रहे थे। अब वह पूरी तरह से समझ गए थे कि मुअब्बिरों (Dream interpreters) ने उन्हें क्या बताया था। उनके सपने के मुताबिक, मक्का में एक नबी ज़ाहिर होंगे। और वह उनका अनुसरण करेंगे। अब, सब कुछ अपनी जगह पर आ गया। उन्होंने कुरैश के नेताओं की बात पर ग़ौर किया। वह कई वर्षों से अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम को जानते थे। वे करीबी दोस्त थे। वह उन पर पूरी तरह से भरोसा करते थे, और उन्हें यक़ीन था कि वह कभी झूठ नहीं बोलेंगे। उनके मुँह से कभी एक भी झूठा शब्द नहीं निकला था। इन सबसे ऊपर, वह बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि वह कभी भी, कभी भी अल्लाह के नाम पर झूठ नहीं बोल सकते। उनके दिल में उनके प्रति गहरा भय था। उनके पास एक स्वस्थ दिमाग भी था। और वह कभी भी कुछ भी नासमझी, अर्थहीन या हानिकारक नहीं करेंगे। अबू बक्र ने अपने पास आए लोगों के सामने अपनी भावनाएँ प्रकट नहीं कीं। लेकिन वह उत्साहित थे। जैसे ही वे चले गए, वह पैगंबर अलैहिस्सलाम के घर की ओर भागे। वह यह पता लगाने के लिए बहुत उत्सुक थे कि हो क्या रहा है। "ऐ अबुल कासिम, क्या यह सच है कि आप पैगंबर होने का दावा करते हैं?

कि आपने खुद को अपने लोगों से अलग कर लिया है और अपने पूर्वजों के धर्म की निंदा की है और उसे नकार दिया है?" पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम जानते थे कि उनका वफादार दोस्त सच्चाई से कभी नहीं भागेगा। इसलिए उन्होंने उन्हें इस्लाम की दावत दी। वर्षों बाद, पैगंबर अलैहिस्सलाम उस लम्हे का ज़िक्र इन शब्दों में करेंगे : "जिस किसी को भी मैंने ईमान लाने की दावत दी, उसे पहले कुछ हिचकिचाहट थी। लेकिन अबू बक्र ने बिना किसी हिचकिचाहट के ईमान लाया।" अबू बक्र शुरु में ही ईमान ले आए और वह इस्लाम अपनाने वाले पहले लोगों में से थे। बाक़ी ज़िंदगी भर, वे न तो पैगंबर अलैहिस्सलाम को कभी अकेला छोड़ने वाले थे और न ही इस मिशन से मुँह मोड़ने वाले थे। अबू बक्र के इस्लाम कुबूल करने का बहुत गहरा असर हुआ। मुसलमानों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ने लगी। क्योंकि वह चुपचाप बैठ नहीं पाए। अगले ही दिन से, उन्होंने अपने भरोसेमंद दोस्तों को इस्लाम के बारे में बताना शुरू कर दिया। इस्लामी इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखे गए कुछ नाम अबू बक्र की मेहनत से इस्लाम अपनाते हैं। उस्मान इब्न अफ़्फ़ान, तल्हा इब्न उबैदुल्लाह, ज़ुबैर इब्न अव्वाम, अब्दुर रहमान इब्न औफ़, साद इब्न अबी वक़्क़ास, उस्मान इब्न मज़ून और कई अन्य प्रसिद्ध साथी उनके माध्यम से ईमान लाते हैं। उसी समय, महिलाओं ने भी इस्लाम फैलाने के अपने प्रयास शुरू किए। पैगंबर अलैहिस्सलाम की पत्नी ख़दीजा, उनकी बेटियाँ ज़ैनब, रुकय्या, उम्मे कुलसूम और फातिमा, उनके चाचा अब्बास की पत्नी उम्मे फ़ज़्ल, उमर रज़िअल्लाहु अन्हु की बहन फातिमा, और अबू बक्र रज़िअल्लाहु अन्हु की बेटी अस्मा। उनमें से प्रत्येक ने अपनी रूह को जगाने वाली सच्चाई के लिए खुद को समर्पित कर दिया। महिलाएं सोच रही थीं कि ईमान का यह नुस्ख़ा दूसरी औरतों तक कैसे पहुँचाएँ, और मर्द दूसरे मर्दों तक। उन्हें अपने सभी रूहानी ज़ख़्मों का इलाज मिल चुका था: आस्था यानी ईमान। वे कैसे ठहर सकते थे?

वे स्वार्थी नहीं हो सकते थे। उनके आस-पास अनगिनत लोग थे जिन्हें इसकी आवश्यकता थी लेकिन उन्हें अभी तक इसका एहसास नहीं हुआ था। इस रौशनी को उनमें से हर एक तक पहुँचना ही था। लेकिन वे जिस मिशन में कदम रख रहे थे वह जितना दिखता था उतना आसान नहीं था। इसका मतलब था पूरे मक्का के खिलाफ जाना। और इसकी कीमत बिल्कुल भी सस्ती नहीं होगी। इस ईमान को स्वीकार करने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए। अपनी सभी भयानक आदतों के साथ, जाहिलियत के नेता इस बदलाव को बिल्कुल पसंद नहीं करेंगे, और इसका कड़ा विरोध करेंगे। मुसलमानों के लिए कठिन और दर्दनाक दिन आ रहे थे। यह दिखाने का समय आ गया था कि किसके पास हीरे जैसी और किसके पास कोयले जैसी रूह है। "मैं केवल यह चाहता हूँ कि तू मुहम्मद का इनकार कर दे और इस मूर्ति की पूजा कर।" "जो कोई मुहम्मद की बात मानता हैं उनका यही हाल होता है।" "इसे चेतावनी समझो।" "इसे चेतावनी समझो।" अगले एपिसोड में, आप देखेंगे कि मुसलमानों को किन कठिन परीक्षाओं से गुज़रना पड़ा और इस्लाम आज जहाँ है वहाँ कैसी मुश्किलों से पहुँचा है। हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की ज़िंदगी की कहानी मानव इतिहास का एक निर्णायक मोड़ थी। और आज भी, यह उन तमाम लोगों के लिए एक नई शुरुआत की प्रेरणा देती है जो इसे खुले दिल से सुनते हैं और इसकी सीख पर गौर करते हैं। इंशाअल्लाह, जब आप इस 11 एपिसोड्स की सीरीज़ को पूरा करेंगे, तो आप अपने पहले के व्यक्तित्व और बाद के व्यक्तित्व में एक स्पष्ट अन्तर महसूस करेंगे। आप खुद को नए सिरे से पहचानेंगे। और इस वीडियो को अपने दोस्तों के साथ साझा करना न भूलें। हर बार जब वे इसे देखेंगे, इंशाअल्लाह, आपको भी इस नेक काम का सवाब मिलेगा। मिलते हैं अगले एपिसोड में। ऐ पैग़म्बर