क्या इस्लाम में औरतों को वाक़ई इज़्ज़त दी गई है? हिजाब, पॉलीगामी और इससे भी आगे की बातें
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इस्लाम में औरतों की क्या अहमियत है? क्या इस्लाम उन्हें नीचा दिखाता है? क्या उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव किया जाता है? जब आप किसी गैर-मुस्लिम से इस्लाम की बात करते हैं, चाहे मर्द हो या औरत, पहला सवाल जो वे करते है, वो इस्लाम में औरतों के बारे में होता है। आपको क्यों लगता है कि ऐसा है?
क्योंकि मेनस्ट्रीम और सोशल मीडिया दोनों पर बड़े बड़े groups ने औरतों से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल इस्लाम के खिलाफ एक प्रोपेगेंडा टुल के रूप में करने में अपनी सारी ताक़त लगा रखी है। और वे अब भी इस्लाम को निशाना बना रहे हैं। लेकिन जो सच में हैरान करने वाला है, वो हैं हमारे पास मौजूद अन्य आंकड़े। अमेरिका में, हर पाँच में से चार लोग जो इस्लाम अपनाते हैं, वे औरतें होती हैं। इसके अलावा, यूके में हुए एक और रिसर्च में पाया गया कि लगभग 75% लोग जिन्होंने 2001 से 2011 के बीच इस्लाम अपनाया, वे औरतें थीं। अगर इस्लाम सच में औरतें के लिए ख़तरा होता, तो क्या ये आंकड़े इसके बिल्कुल उलट न होते?
या क्या ऐसा हो सकता है कि, आम धारणा के विपरीत, वो जिस अहमियत की तलाश कर रही थी वो उन्हें इस्लाम में मिली हो हमारे पास चर्चा के लिए बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। और हां, कुछ मशहूर सवालों के जवाब भी देने हैं। क्या एक मर्द की चार पत्नियाँ हो सकती हैं? क्या सिर और शरीर को ढकने वाला हिजाब सच में एक पाबंदी है? एक औरतें को मर्द के मुकाबले आधी विरासत क्यों मिलती है?
और कुरआन की एक प्रसिद्द आयत जिसपर कई objections उठाए गए है। अगर आप तैयार हैं, तो चलिए शुरू करते हैं। 1700 के दशक में एक अंग्रेज़ इतिहासकार और लेखिका इस्तांबुल पहुंचीं। लेडी एलिज़ाबेथ क्रेवेन। और इस इस्लामी शहर ने उन्हें हैरान कर दिया। उनके देश की औरतें जिन हालात में थीं और जो यहां हो रहा था, उनमें ज़मीन आसमान का अंतर था। यह जगह बिल्कुल अलग थी। और उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को ऐसे वर्णित किया, "ज़िंदा प्राणियों में सबसे सुखी" उन्होंने अपनी observations को इस प्रकार दर्ज किया : "मुझे लगता है कि मैंने कभी किसी ऐसे देश में नहीं गई जहां महिलाएँ इतनी आज़ादी का आनंद ले सकती हों। और सभी तानों, दोषों या आलोचनाओं से मुक्त हो सकती हों, जैसे कि तुर्की में उस समय का Ottoman साम्राज्य। तो ऐसा क्या था जिसने उन्हें इतना चकित कर दिया?
इंग्लैंड में उन्होंने क्या देखा जिसने उन्हें ये शब्द कहने पर मजबूर किया?
दुर्भाग्यवश, हमें इतिहास के बारे में उतना नहीं पता। मैं जिन समस्याओं का मैं उल्लेख करने जा रहा हूँ, उनमें से कोई भी समस्या उस इस्लामी शहर में नहीं थी जिसे उन्होंने देखा। उदाहरण के लिये , इंग्लैंड और अमेरिका में, जब कोई महिला शादी करती थी, तो अक्सर उसकी सारी निजी सम्पत्ती उसके पति के नियंत्रण में आ जाती थी। यहाँ तक कि अगर वह काम करती, तो उसकी कमाई क़ानूनी रूप से उसके पति की होती। और उसे उस पर कोई अधिकार नहीं होता। जब उसके पिता की मृत्यु होती, तो उसकी विरासत का हिस्सा सीधे उसके पति को चला जाता था, और उसे उस पर कोई अधिकार नहीं होता था। तलाक की मामले में, सारे बच्चे पिता को दे दिए जाते थे। मां को अपने उन बच्चों से अलग कर दिया जाता था, जिन्हें उन्होंने जन्म दिया था, पाला था और जिनके लिए हर तरह की कुर्बानियां दी थीं। और निश्चित रुप से, बच्चे भी अपनी माँ से छीन लिये जाते थे। बहुत ही कम मामलों को छोड़कर, महिलाओं को गुजाराभत्ता, यानी तलाक के बाद की आर्थिक सहायता भी नहीं दी जाती थी। इसके अलावा, ये केवल सामाजिक अन्याय ही नहीं थे, बल्कि ये क़ानूनी रूप से स्थापित नियम थे। और इसके ऊपर, महिलाओं को और भी बड़े नैतिक और भावनात्मक अन्यायों का सामना करना पड़ता था। इंग्लैंड में बीसवीं सदी तक अजीब प्रथाएँ जारी रही। और उनमें से एक थी — पत्नी की बिक्री। आखिर इसका क्या ही मतलब बनता है?
ये विश्वास करना कठिन है, लेकिन जब कोई आदमी अपनी पत्नी से बोर हो जाता था या उसपे रुचि खो देता था, तो वह उसे बाजार में ले जाकर किसी वस्तु की तरह बेच सकता था। वास्तव में, 1913 के एक रिकॉर्ड के अनुसार, एक अंग्रेज़ ने अपनी पत्नी को 1 पाउंड में बेचा था। इस बीच, मध्यकालीन यूरोप में जो हो रहा था, वह कही ज़्यादा भयानक था। 15वीं से 17वीं श्ताब्दी के बीच, कैथोलिक चर्च ने डायन होने के संदेह में लोगों को सताया। मासूम महिलाओं को बेबुनियाद आरोपों और मानहानी के आधार पर फांसी दी गई। रिकोर्ड्स के अनुसार, 40 हजार से 1 लाख के बीच महिलाओं को भयावह तरीके से फांसी दी गई, उन्हें ज़िंदा जला दिया गया। क्या आप सोच सकते हैं ?
अगर किसी व्यक्ति को एक महिला पसंद नहीं होती, तो वे कह सकते थे कि शायद वो चुड़ैल है । या अगर कोई महिला किसी पुरुष को ठुकरा दे, तो वो अब चुड़ैल है। उनकी ज़िंदगी खत्म हो जाती थी। यहाँ तक कि ये सब सोचना भी डरावना है। और उसी समाज में लोग बड़ी गंभीरता से इस तरह के सवाल पर चर्चा कर रहे थे, "क्या महिलाएँ वास्तव में इंसान हैं ? क्या उनमें आत्मा होती है?” लेडी क्रेवेन ने ये शब्द बिना कारण नहीं कहे थे। जो उन्होंने उस इस्लामी शहर में देखा, वह पश्चिम में हो रही घटनाओं के पूरी तरह विपरीत था। पश्चिम में महिलाएं जो अधिकार एक सदी बाद 1882 में प्राप्त कर सकीं, वे यहाँ सदियों से प्राप्त किए जा रहे थे। ये कैसे संभव था?
एक महिला मुकदमा कर सकती थी, समझौते करना, संपत्ति रखना वह विरासत पा सकती थी, और उससे भी ज़्यादा अधिकार रखती थी जितने ईंग्लेंड की महिलाओं के पास थे आप शायद अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय पश्चिम में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं दिया गया था। दूसरी ओर जब हम दुनिया के सबसे पुराने continuously operating यूनिवर्सिटी को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि इसे एक मुस्लिम महिला द्वारा स्थापित किया गया था। आप इसे गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में देख सकते हैं। मोरक्को के अल-करावियन विश्वविद्यालय की स्थापना फातिमा अल-फिहरी ने 859 में की थी। यह दिखाता है कि मुस्लिम भूभाग पर महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया गया था, और इसी कारन वह यह कर सकी। इसका यह भी अर्थ है कि महिलाओं को संपत्ति रखने का अधिकार प्राप्त था, वरना वे विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं कर सकती थी। साथ ही, यह भी दर्शाता है कि मुस्लिम महिलाएं समाज में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभा सकती थीं जिससे यह उपलब्धि संभव हुई। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका मतलब है कि वह एक मुस्लिम परिवार में आत्म-विश्वास के साथ पली बढ़ी , अपने लिंग व पहचान के महत्व समझते हुए, ना कि अपमान के साथ। अपनी आँखें बंद करें और इस दृश्य की कल्पना करें। एक लाख से अधिक लोग उत्साह और जिज्ञासा से इंतज़ार कर रहे हैं। उनके सामने खड़े हैं एक ऐसे नेता जिन्होंने इतिहास के धारे को बदल दिया। पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लाहु-अलैही वसल्लम) यह साल 632 है, और अपनी प्रसिद्ध विदाई उपदेश देते समय एक समय पर, उन्होंने ये शब्द कहे: "ऐ लोगों!
मैं आपको सलाह देता हूं कि आप महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करें, और इस संबंध में अल्लाह से डरें। आपने महिलाओं को अल्लाह से एक अमानत कि रूप में लिया है, और आपने अल्लाह के नाम पर वादा करके उनकी शालीनता को अपने लिए जायज़ बनाया है। जिस तरह महिलाओं पर आपका अधिकार है वैसे ही उनको भी आप पर अधिकार है। महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में, उन्होंने जिस क्षेत्र में वो रहते थे उसे गहराई से बदल दिया। अब आइए उस समाज में रहने वाली एक महिला के life cycle पर नजर डालते हैं। और इस्लाम से पहले और बाद के समय के बीच के अन्तर की तुलना करते हैं। इस्लाम से पहले, जब एक लड़की का जन्म होता था। तो उसके पिता अक्सर उसे शर्म का स्रोत मानते थे। और कई मामलों में उसे ज़िंदा दफना दिया जाता था। जब इस्लाम आया, तो उसने इस प्रथा को पूरी तरह से समाप्त कर दिया। यहाँ तक कि अगर वो बच भी जाती, तो उसे अपने पिता से वह प्रेम और सहानुभूति कभी नहीं मिलती, जिसकी उसे तालाश होती। वह उनकी नजरों में हमेशा बेकार रहती। लेकिन पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बाद में कहते, "अगर कोई तीन बेटियों की देखभाल करता है, उन्हें अनुशासित करता है, उनकी शादी करवाता है, और उनके साथ अच्छा व्यवहार करता है , तो वह जन्नत में जाएगा।" मान लीजिए कि वह बड़ी हुई और शादी की उम्र तक पहुंच गई। इस्लाम से पहले, उसे शादी के लिए मजबूर किया जाता। कोई यह नहीं पूछता था कि वह क्या सोचती या महसूस करती है। लेकिन इस्लाम आया और उसकी सहमति के बिना उसकी शादी करने से मना कर दिया। तब से, अगर कोई आदमी उससे शादी करना चाहता है, तो उससे पहले उसको propose करना होगा। कुछ मुलाकातों के बाद, अगर महिला सहमत होती है, और उसे लगता है कि वे compatible हैं, तो शादी का process शुरू होता है। शादी के contract के हिस्से के रूप में, दूल्हे को दुल्हन को एक मेहर देना होता है, जो एक राशि या एक valuable gift होती है। यह मूल रूप से सुरक्षा का एक रूप है। अगर उनका तलाक हो जाता है या पति की मृत्यु हो जाती है, तो महिला इस पैसे को उपयोग करके एक निश्चित अवधि के लिए खुद का आर्थिक रूप से समर्थन कर सकती है। बेशक, ये इसका एकमात्र उद्देश्य नहीं है। महिलाएं इस पैसे का उपयोग अपने जीवन में जैसे चाहें कर सकती हैं। वे एक व्यवसाय शुरू कर सकती हैं, लाभ उत्पन्न करने वाले निवेश कर सकती हैं या वे इसे रखने का विकल्प चुन सकती हैं। मेहर कि राशि महिला द्वारा निर्धारित की जाती है। पुरुष को इसे देना होता है, और वह इसे वापस नहीं ले सकता। लेकिन अगर महिला अपने पति की आर्थिक मदद करना चाहती है, तो वह एक अलग मामला है। शादी के बाद, महिला की आजीविका की ज़िम्मेदारी उसके पति की होती है। उसे नौकरी करने काम करने या घर के खर्चों में योगदान देने की कोई बाध्यता नहीं है, शादी से पहले, उसके जीवनयापन की जिम्मेदारी उसके पिता की थी, शादी के बाद यह जिम्मेदारी उसके पति पर आ जाती है हालांकि आज भी हम देखते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में ऐसा नहीं है। जब हमने शैखा फातिमा बरकतुल्लाह का इंटरव्यू किया, जो यूके में रहने वाली एक महिला इस्लामी विद्वान् हैं, तो उन्होंने हमें कुछ बहुत ही चौंकाने वाली बातें बताई। ये उन चीजों में से एक है जिससे गैर-मुस्लिम महिलाएं इस्लाम से सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, क्योंकि आमतौर पर, उन्होंने किसी और द्वारा भरण पोषण किए जाने का concept अपनी societies में नहीं देखा होता है। एक निश्चित उम्र के बाद, अविवाहित लड़कियां अक्सर अपने पिता के साथ एक किस्म के तलाक़ का अनुभव करती है। अपने पैरों पे खड़े होने के विचार के तहत, उन्हें ऐसी ज़िंदगी में धकेल दिया जाता है जिसकी वे आदी नहीं होती और जिसकी उन्हें आवश्यकता नहीं होती। परिणाम स्वरूप, लाखों बेटियां लंबे समय तक पीड़ित रहती हैं, और कई बार उन्हें बुरी नीयत वाले लोगों द्वारा परेशान किया जाता है। शादी से पहले और बाद में, वे अपना जीवन खुद को बचाने की कोशिश में बितातीं हैं। हालांकि इस्लाम में शादी से पहले उसके जीवन यापन की जिम्मेदारी उसके पिता पर होती है और शादी के बाद उसके पति पर। फिर जब शादी का समय आता है, तो उस आदमी को चुनना जो उसे लगता है कि वह उसकी देखभाल करेगा, पूरी तरह से उसका निर्णय होता है। चलिए जारी रखते हैं। इस्लाम से पहले, जब एक महिला शादी करती थी और मां बनती थी, तो उसे कोई मूल्य या सम्मान नहीं मिलता था। लेकिन देखिए, हमारे प्यारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने क्या कहा। सबसे कामिल ईमान वाले मोमिन वे है, जिनका व्यवहार सबसे अच्छा होता है, और तुम में सबसे अच्छे वे हैं जो अपनी पत्नियों के प्रति सबसे अच्छे हैं। माताओं के महत्व को समझाने के लिए, उन्होंने एक साथी से कहा, स्वर्ग तुम्हारी मां के पैरों के नीचे है। उन्होंने मां के अधिकारों का उल्लंघन करने और उन्हें दबाने को सबसे बड़े पापों में से एक माना। इस्लाम से पहले, अगर किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती थी तो उसे उससे कोई भी विरासत नहीं मिलती थी। इसके विपरीत वह और उसके बच्चे स्वयं विरासत का हिस्सा माने जाते थे। कोई भी अजनबी व्यक्ति उस परिवार पर अधिकार का दावा कर सकता था। और उस महिला से शादी कर सकता था। जब इस्लाम आया, तो इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया। और इसके बजाय, मृत व्यक्ति की पत्नी बच्चों और माता-पिता के बीच एक निश्चित माप के अनुसार विरासत का बँटवारा किया गया। आपने देखा होगा कि माता-पिता को भी विरासत में हिस्सा मिलता है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि आज कई देशों में, जिन्हें हम विकसित मानते हैं, माता-पिता को विरासत में कोई हिस्सा नहीं मिलता। हालांकि logically, एक मृत व्यक्ति के मा-बाप संभवतः मृत अवस्था में पहुंच चुके होते हैं उन्हें शायद देखभाल की आवश्यकता होती है। इस्लाम उनके देखभाल की ज़िम्मेदारी बेटे पर डालता है, और अगर वो मर जाता है, तो इस उद्वेश्य के लिए उन्हें उसकी विरासत में हिस्सा देता है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक महिला को तब भी नहीं छोड़ता जब वह मां बन जाती है। उसकी आजीविका उसके बच्चों की जिम्मेदारी बनी रहती है। एक तरह से इसे महिलाओं को कुछ उच्च उद्देश्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहन के रूप में देखा जा सकता है। अगर आपको काम नहीं करना है या आप बस नहीं करना चाहतीं , तो आपको आय अर्जित करने में अपना समय बर्बाद करने की आवश्यकता नहीं है, आप अपना समय किसी महान चीज़ के लिए समर्पित कर सकती है, जैसे शिक्षा। आखिरकार, क्या यही हर चीज़ का आधार नहीं है?
समाज का complete transformation और उसकी spiritual wellbeing आपके हाथों में है। लेकिन अगर एक महिला काम करने का चुनाव करती है तो इस्लामी इतिहास में भी powerful examples मौजूद हैं। पैगंबर (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) की बीवी खदीजा (रजि.) मक्का की सबसे सफल व्यापारियों में से एक थीं। वह एक outstanding businesswomen थीं। या फातिमा अल-फिहरी को याद करें, जिन्होंने पहली यूनिवर्सिटी स्थापित की। ये वास्तव में entrepreneurship का एक remarkable act था। जब तक हलाल और हराम के बीच संतुलन का सम्मान किया जाता है तब तक कोई समस्या नहीं है। आमतौर पर, किसी समाज को smoking जैसी आदत छोड़ने के लिए प्रेरित करना भी लगभग असंभव लगता है फिर भी पैगंबर मुहम्मद अलैहिसलाम अकेले खड़े हुए और बहुत ही कम समय में उस समाज को इन भयानक रिवाजों और परंपराओं को छोड़ने के लिए प्रेरित किया। और सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने उन्हें इतने सुन्दर और न्यायपूर्ण सिद्धांतो से replace कर दिया कि सदियों बाद भी मानवता उस लेवल तक नहीं पहुँच सकी। कई अन्य उदाहरण दिए जा सकते हैं यह पूरा transformation 23 वर्षों में हुआ। यह transformation कितना extraordinary था इसे highlight करने के लिए। महान इस्लामी विद्वान बदीउज्जमा सईद नुरसी ने कहा उन्हें 100 philosophers को इकठा करने दें उन्हें उस काल और स्थान पर भेजें और उन्हें 100 वर्षों तक काम करने दें। क्या वे उस महान व्यक्ति द्वारा जो कुछ केवल एक वर्ष में किया गया उसका एक प्रतिशत भी हासिल कर सकते हैं?
हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के निधन के 20 वर्ष भी नहीं बीते थे जब दुनिया ने इतिहासमें एक और उल्लेखनीय घटना देखी। उमर इब्न अल खत्ताब (रज़ि॰) जो दुनिया के सबसे powerful leaders में से एक थे वे इस्लाम के दूसरे खलीफा बन गये थे और अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे और अब हम देखेंगे कि इस्लाम ने महिलाओं को कितना आत्मविश्वास और वैल्यू दिया एक दिन, उमर (रज़ि॰) को शिकायतें मिली कि महिलाएं मेहर की उंची रक़म मांग रही हैं। ऐ उमर महिलाएं मेहर की बड़ी रकम माँग रही है। हाँ उसने सही कहा हमारे लिए शादी करना मुश्किल हो गया है, कृप्या कुछ कीजिए। आपको मेहर याद है, है न?
वो financial security, जो एक महिला को शादी के समय मांगने का अधिकार होता है समस्या को हल करने के लिए, उमर ने एक सार्वजनिक भाषण दिया और मेहर की राशि पर एक लिमिट लगाने का सुझाव दिया भला कौन ही उनके जैसे लीडर का विरोध कर सकता था? अखिरकार, वो वह व्यक्ति थे, जिन्होंने persian empire को हराया और रोमनों के खिलाफ बड़ी जीतें हासल किए वो इतने पाउरफुल थे, लेकिन उसी क्षण एक महिला उठी और अपत्ती की। महिला ने साहसपूर्वक कहा "क्या आपने नहीं सुना कि अल्लाह कुरआन में कहता है “उसके दहेज़ में से कुछ भी वापस मत लो। 'भले ही तुमने उसे बहुत सारा सोना दिया हो।” यह अभूतपूर्व था कि एक महिला सार्वजनिक रूप से एक शासक का विरोध करे तो उमर ने क्या प्रतिक्रिया दी?
उन्होंने विनम्रता से स्वीकार किया महिला ने सच कहा है और उमर ने गलती की है हर किसी के पास उमर से अधिक ज्ञान है। फिर वो एक ऊँचे स्थान पर गए और लोगों के सामने अपनी बात वापस ले ली जब आप इसके बारे में सोचते हैं, तो यह दिमाग को झकझोड़ देने वाला है असली मुददा ये है कि आज मुख्यधारा की मीडिया द्वारा इस्लाम को व्यापक रूप से बदनाम किया गया है आप में से कुछ को प्रसिद्ध Irish Singer याद होगी जिन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया था Sinead O'Connor वह बतौर एक feminist जानी जाती थी। और जब उन्होंने इस्लाम की ओर अपने सफर के बारे में बात की, तो उन्होंने कहा: "मैंने विभिन्न धर्मों के शास्त्रों का अध्ययन करना शुरू किया, ईश्वर के बारे में सच्चाई जानने कि कोशिश की। मैंने कभी सोचा नहीं था मै कोई धर्म स्वीकार करूंगी, लेकिन मैंने इस्लाम को अंत तक छोड़े रखा। क्योंकि मेरे मन में इस्लाम के बारे में बहुत से पूर्वाग्रह थे" वास्तव में, इस्लाम के बारे में विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में बहुत बड़ा propaganda हुआ है, लेकिन जब लोगों ने वास्तव में इसे देखना शुरू किया तो उन्होंने महसूस किया कि सच्चाई तो पूरी तरह से अलग थी। यही कारण है कि America मे मुसलमान बनने वाले हर 5 लोगों मे से 4 महिलाएं हैं। और यही कारण है कि UK में भी इस्लाम अपनाने वाले में से लगभग 75% महिलाएं ही है, अब मुझे आप से ये पूछने दीजिए, अगर इस्लाम वास्तव में महिलाओं को दबाने वाला एक system होता तो क्या महिलाएं सबसे पहले इससे दूर नहीं भागतीं?
लेकिन इसके बजाय, वे इसे सबसे अधिक अपनाती हैं। क्योंकि वे देखती है कि इस्लाम उन्हें वास्तविक मूल्य देता है और वे समझती हैं कि यही वो जगह है जहां से वे वास्तव में belong करती हैं। जब हम मानव इतिहास पर नज़र डालते हैं, तो हम एक पैटर्न देखते हैं। जब भी स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित नहीं की गईं, जब भी लोगों ने divine guidance की अनदेखी की, तो सबसे अधिक कष्ट महिलाओं ने ही झेला। उनके अधिकार छीन लिए गए। उनके साथ दुर्भव्यवहार और अत्याचार किया गया। आज भी आधुनिक दुनिया पूरी तरह से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाई है। ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें समान काम के लिए समान वेतन नहीं मिलता, उनके शरीरों का उपयोग विज्ञापन में marketing tools के रूप में किया जाता है। उन पर लगातार एक निश्चित beauty standard थोपा जाता है, जिससे उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उन्हें उसमें फिट होना है, नहीं तो उन्हें बेकार कहा जाता है। अनगिनत महिलाएं flirting के माध्यम से manipulate की जाती है, और कई ज़हरीले रिश्तों में emotional abuse का शिकार होती हैं। कुछ तो यौन हिंसा की भी शिकार होती हैं। दूसरी ओर, हज़ारों महिलाएं हैं जिन्हें बच्चे के जन्म के बाद उनके साथी ने उन्हें छोड़ दिया है। इंग्लैंड और वेल्स के 236 शहरों में, आधे से अधिक घरों का संचालन सिंगल मदर्स द्वारा किया जाता हैं। बस उन महिलाओं पर भारी बोझ और उनके बच्चों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में सोचें जो बिना male role model के बड़े हो रहे हैं। और जब आप कई लोगों को देखें जो अपराध करते हैं, तो आप अक्सर पाएंगे कि वे बिना पिता के बड़े हुए हैं। समस्याएं कभी खत्म होती नहीं दिखती, तो हमें वास्तव में क्या चाहिए?
हमें एक ऐसा system चाहिए जो पुरुषों और महिलाओं दोनो को सबसे संपूर्ण और सही तरीके से जानता और समझता हो और कोई भी इंसान ऐसा नहीं कर सकता। क्योंकि आखिरकार, हम सभी अपूर्ण और दोषपूर्ण हैं, हमसे mistakes होती हैं, हम ग़लत निर्णय लेते हैं, हम चीजों को समझने में गलती करते हैं। यही कारण है कि हमे एक ऐसे system की ज़रूरत है, जो मानव सीमाओं से परे हो, एक ऐसा सिस्टम जिससे पुरुष और महिलाएं दोनों संतुष्ट हों, और स्वेच्छा से उसका पालन करें, वह system जो हमारे creator द्वारा भेजी गई है, क्योंकि वहीं हमे सबसे अच्छी तरह जनता है, उससे भी बेहतर जितना हम कभी खुद को जान सकें। वह पुरुष और महिला दोनों की सभी विशेषताओं को सबसे finest details तक जानता है, उसके पास infinite knowledge है, और इसलिए केवल वही सबसे न्यायपूर्ण और perfect decisions ले सकता है। और चूंकि अल्लाह न तो पुरुष है और न ही महिला, इसलिए उसके फैसलों में पक्षपात की कोई गुंजाइश नही है। अन्य हर सिस्टम, चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न हो, उसमें खामियां होंगी और हम ऐसा देखते ही रहते हैं। संक्षेप में, हम जिन उत्तरों की खोज कर रहे थें जिन समाधानों को वर्षों से समझने की कोशिश कर रहे थें वे हमें 1400 साल पहले, इस्लाम के माध्यम से दिए गए थे। और जिन समस्याओं का हमने उल्लेख किया है, और कई अन्य समस्याओं के समाधान इस्लाम में पाए जा सकते हैं। जैसे-जैसे आप अधिक शोध और पढ़ाई करेंगे आप इसे खुद खोज सकते हैं। लेकिन यहाँ पर मन में कुछ प्रश्न आते हैं, अभी तक तो सब कुछ समझ में आ रहा है। हाँ, इस्लाम महिलाओं को एक यूनिक किस्म की वैल्यू देता है। हाँ, जिसने हमें बनाया है, केवल वही ये नियम बना सकते है। जिनकी वास्तव में हमे जरूरत है। लेकिन फिर भी, जैसा कि हमने शुरुआत में कहा था, इस्लाम में महिलाओं के बारे में कुछ विषय है जो लोगों को उलझन में डालते हैं। अब आइये, सबसे पहले हिजाब के बारें में बात करते हैं। लाखों लोग वहीं सवाल पूछते हैं। "क्या यह कोई बहुत बड़ी पाबंदी नहीं है?" हालांकि हिजाब को अक्सर उत्पीड़न या पाबंदी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, फिर भी यह उन चीजों में से एक है जो ग़ैर मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम के बारें में सबसे अधिक प्रभावित करती है, अजीब है, है ना?
तो ऐसा क्यों है? अगर आप मुझसे पूछें, तो एक नास्तिक भी हिजाब पहनने की आवश्यकता महसूस कर सकता है। एक नास्तिक? हाँ!
क्योंकि ढँकना कुछ प्राकृतिक है, कुछ ऐसा जो मानव प्राणियों की रचना में निहित है अपने प्रकृति से, एक महिला ऐसे पुरुष की तलाश करती है जिसके साथ वह सुकून, खुशी और सुरक्षित महसूस करें। उसी तरह एक पुरुष अपनी पत्नी पर विश्वास करना चाहता है, एक प्रेमपूर्ण बन्धन बनाना चाहता है, और उसके साथ ख़ुश रहना चाहता है। परिवार के शांति और खुशी की रक्षा के लिए इस बंधन को मज़बूत रहना चाहिए। यही कारण है कि पारिवारिक सलाहकार अक्सर एक आवश्यक सत्य पर ज़ोर देते हैं, एक healthy marriage के लिए, पति-पत्नी के बीच आपसी निष्ठा और विश्वास होना चाहिए। यहीं पर इस्लाम पुरूषों और महिलाओं दोनों के लिए हिजाब का समाधान लता है। सूरह अन-नूर में, अल्लाह कहता है, "ईमान वाले मर्दों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शारीरिक मर्यादा की रक्षा करे, यही उनके लिए अधिक पवित्र है। "निःसंदेह, अल्लाह उनके कार्यो से पूरी तरह अवगत है" अगली आयत में, महिलाओं को खुद को ढँकने का आदेश दिया गया है। तो अगर आपने ध्यान दिया हो, तो हिजाब का आदेश पहले पुरुषों को दिया गया है। "अपनी नज़रे नीची रखो।" एक तरह से, उनकी पलके उनका हिजाब हैं। यहाँ हम दो तरफा सावधानी देखते हैं, अल्लाह परिवारों की सुरक्षा और उनकी खुशी को बनाए रखने के लिए उपाय कर रहे हैं। लेकिन आज पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए हिजाब के इन रूपों पर लगातार हमला हो रहा है। तो क्या होता है अगर ये सुरक्षा परिवार से हटा दी जाए, वह विश्वास और निष्ठा जिसके बारे हमने बात की है समय के साथ क्षतिग्रस्त होने लगती है, हर महिला में सुंदर दिखने और तारीफ पाने की inherent desire होती है, और जब एक महिला इस natural tendency के साथ बिना हिजाब पहने बाहर जाती है, तो उसके पास दो विकल्प होते हैं, वह या तो अपने कपड़ो गहनों बालों और शरीर के माध्यम से बाहर के लोगों को आकर्षक और सुंदर दिखेगी, या वह लापरवाह और अनाकर्षक दिखाई देगी। इन दोनों में से कोई एक बात तो अवश्य होती है। कोई बीच का रास्ता नहीं है। लेकिन उसकी प्राकृति में वह सुंदर दिखना चाहती है, और इसके लिए तारीफ़ पाना चाहती है, इसलिए अनिवार्य रूप से जब वह बाहर जाती है, तो वह make sure करेगी कि वह सुंदर दिखे, और अपना पूरा दिन इसी तरह बिताए, बिना हिजाब के, यह unavoidable हो जाता है। तो आपको क्या लगता है, कितने प्रतिशत पुरुष कहेंगे: “यह किसी की पत्नी हो सकती है, मुझे नहीं देखना चाहिए?” एक social experiment हमें इसका उत्तर दे सकता है, कुछ साल पहले की बात है। शायद आपने भी इसे देखा हो। एक औरत न्यूयॉर्क सिटी में पांच घंटे तक कम कपड़े पहनकर घूमती है, और इस वजह से, उसे 108 बार verbally harassed किया गया। जिसका मतलब है, उसे अनुचित टिप्पणियां कही गईं। और इसके अलावा कई पुरुषों ने उसे बुरी नीयत से घूरा। लेकिन यहाँ सबसे दिलचस्प बात यह है। उसी महिला ने यह प्रयोग दोहराया इसबार हिजाब पहन कर, परिणाम?
किसी ने भी उसे पहले की तरह नहीं देखा चाहे पति-पत्नी इसे समझे या नहीं, यह स्थिति धीरे-धीरे उनके बीच के विश्वास को नुकसान पहुँचाती है। ईर्ष्या और विश्वास की समस्याएं उभरने लगती हैं, जो फिर रिश्ते की शांति को बाधित करती हैं। कोई भी आदमी यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि कोई उसकी पत्नी को गलत इरादों से देखे। वह ईर्ष्यालु और अधिकारपूर्ण हो जाता है। यह उसकी प्रकृति में है। इसी तरह, यह एक महिला की प्रकृति में है कि वह चाहती है कि उसका पति केवल उसमें ही रुचि रखे और अन्य महिलाओं की ओर न देखें। इन दोनो भावनाओं को शांति और सामंजस्य मिल सकता है जब दोनों पक्ष हिजाब के आदेशों का पालन करते हैं। अब विपरीत स्थिति की कल्पना करें मान लीजिये दोनो पक्ष अपने हिजाब के प्रति सावधान है। क्या अंतर होगा?
एक पति को अब इस बात की कोई शंका या चिंता नहीं होगी कि अन्य पुरुष उसकी पत्नी को देख रहे हैं या नहीं ठीक इसी तरह जब एक पुरुष अपनी नजर अपनी पलकों पर ध्यान दे तो वहाँ अपनी पत्नी के प्रति अपनी निष्ठा स्पष्ट रूप से दिखा पाएगा इससे उसकी पत्नी के मन में कोई शंका नहीं रहेगी। जैसे "क्या वह अन्य महिलाओं को देख रहा है?" क्या ऐसी औरतें है जिन्हें वो अधिक आकर्षक पाता हो?" वो ऐसे सवालों के बारे में सोचकर असहज महसूस नहीं करेगी हिजाब ही एक ऐसी चीज़ भी है जो महिला को आसानी से पहुंच में आने से बचाती है। यह उसकी कीमत बढ़ाता है और उसे अधिक मूल्यवान बनाता है बिना उसकी अनुमती के कोई भी उसके बालों की एक लट भी नहीं देख सकता उस सामाजिक प्रयोग के बारे में सोचें जो मैंने अभी आपके साथ साझा किया जब वह महिला खुली पोशाक में आई तो वह अनगिनत disgusting stares और verbal abuse का निशाना बन गई लेकिन जब उसने हिजाब पहना, तो उसने दिखाया कि उसके शरीर का असली मालिक कौन है। उसने ये संदेश दिया कि वह सिर्फ एक वस्तु नहीं है, बल्कि उसके विचार और व्यक्तित्व ही उसे वास्तव में मूल्यवान बनाते हैं साथ ही एक तरह से उसने उन लोगों को छाँट दिया जो उससे संपर्क कर सकते थे जब वह हिजाब पहनती है तो जो लोग केवल बाहरी रूप पर ध्यान देते हैं या जिनके moral standards low होते हैं वे उसे approach नहीं करते क्योंकि वह अब उनकी ध्यान आकर्षण का केंद्र नहीं रहती इस मामले में हिजाब पहनने का मतलब है उन लोगों के साथ बातचीत करना जो आपके असली व्यक्तित्व के लिए आपसे जुड़ते हैं ऐसे लोग जो आपकी बाहरी सुंदरता पर नहीं, बल्कि आपकी आत्मा पर ध्यान देते हैं, और जिनके Moral स्टैंडर्ड्स High होते हैं। याद रखें आप दूसरों द्वारा ये लेबल किये जाने से उपर हैं कि आप सुन्दर हैं या नहीं आपको दूसरों की desires और expectations के आधार पर सेट standard में फिट होने की ज़रूरत नहीं है आपको दूसरों की राय के अनुसार नहीं, बल्कि अल्लाह की अपेक्षाओं के अनुसार कपड़े पहनने चाहिए। जिसने ब्रह्मांड को शून्य से बनाया और धरती को आपके पैरों के नीचे रखा कुछ लोग आपकी सुंदरता के लिए आप से प्यार कर सकते हैं लेकिन अल्लाह ने आपको इसलिए बनाया क्योंकि वह आप से प्यार करता है उसने आपको एक अनोखी सुंदरता दी है जो उसने किसी और को नहीं दी याद है हमने कहा था कि दो अलग-अलग प्रकार के हिजाब होते हैं पुरुष का हिजाब और महिला का हिजाब इसके साथ ही पुरुष और महिला के बीच बातचीत की कुछ सीमाएं भी खींची जाती हैं उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के लिए यह मना है कि वह विपरीत लिंग के किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अंतरंग बातचीत करे या हंसे जो उनका परिवार या जीवन साथी नहीं है जब दोनों पक्ष इन नियमों का पालन करने में विफल होते हैं तो वे एक चुंबक के दो पक्षों की तरह एक दूसरे की ओर आकर्षित होने लगते हैं और दुनिया का क्रम धराशाई होने लगता है sexual inclinations, actions में बदलने लगती हैं। अवैध संबंध विकृतियाँ और अंततः अपराध। यहाँ पर दोनों पक्ष ज़िम्मेदार हैं और जब दोनों अपनी भूमिका निभाने में असफल होते हैं तो दोष दोनों पक्षों पर मढ़ा जाता है। CDC के एक अध्ययन के अनुसार, 2020 में अमेरिका में लगभग 5 लाख गर्भपात किए गए और इनमें से 86% बच्चे अवैध थे, केवल एक वर्ष में एक ही देश में 4 लाख अजन्मे बच्चों की जान अवैध संबंधों के कारण ली गई बिल्कुल यह एक महिला के लिए अत्यंत कठिन होता है और ज़्यादातर मामलों में जन्म दिया जाता है, उसी संगठन के एक अन्य अध्ययन के अनुसार 2021 में केवल अमेरिका में 14 लाख अवैध जन्म हुए और ज़्यादातर मामलो में माँ को ये बोझ अकेले उठाना पड़ता है वह सालों तक बच्चे की देखभाल करती है और उसे पालने की कोशिश करती है बिना कभी पिता का समर्थन पाए इस स्थिति में एक माँ की emotional और mental स्थिति के बारे में सोचें और बिना पिता के बड़े हो रहे बच्चे द्वारा सामना की गई चुनौतियों के बारे में सोचें और इसे रोकना फिर से क़ुरआन के उन दो आदेशों पर निर्भर करता है जिनका हमने पहले उल्लेख किया था मुझे लगता है कि bigger picture अब काफी स्पष्ट है लेकिन हमारे पास अभी भी कुछ अन्य प्रश्न है जिनका उत्तर दिया जाना बाकी है। एक आदमी को चार महिलाओं से शादी की अनुमति , बहनों को उनके भाइयों की तुलना में आधी विरासत मिलना, और सुरह अन निसा आयत 34 में अक्सर पूछे जाने वाले एवं debated issues इन सभी सवालों के जवाब हमारी सोच से भी अधिक आसान है । पार्ट 2 में हम इन सभी details को गहराई से जानेंगे, हमारे साथ बने रहिए।
क्योंकि मेनस्ट्रीम और सोशल मीडिया दोनों पर बड़े बड़े groups ने औरतों से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल इस्लाम के खिलाफ एक प्रोपेगेंडा टुल के रूप में करने में अपनी सारी ताक़त लगा रखी है। और वे अब भी इस्लाम को निशाना बना रहे हैं। लेकिन जो सच में हैरान करने वाला है, वो हैं हमारे पास मौजूद अन्य आंकड़े। अमेरिका में, हर पाँच में से चार लोग जो इस्लाम अपनाते हैं, वे औरतें होती हैं। इसके अलावा, यूके में हुए एक और रिसर्च में पाया गया कि लगभग 75% लोग जिन्होंने 2001 से 2011 के बीच इस्लाम अपनाया, वे औरतें थीं। अगर इस्लाम सच में औरतें के लिए ख़तरा होता, तो क्या ये आंकड़े इसके बिल्कुल उलट न होते?
या क्या ऐसा हो सकता है कि, आम धारणा के विपरीत, वो जिस अहमियत की तलाश कर रही थी वो उन्हें इस्लाम में मिली हो हमारे पास चर्चा के लिए बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। और हां, कुछ मशहूर सवालों के जवाब भी देने हैं। क्या एक मर्द की चार पत्नियाँ हो सकती हैं? क्या सिर और शरीर को ढकने वाला हिजाब सच में एक पाबंदी है? एक औरतें को मर्द के मुकाबले आधी विरासत क्यों मिलती है?
और कुरआन की एक प्रसिद्द आयत जिसपर कई objections उठाए गए है। अगर आप तैयार हैं, तो चलिए शुरू करते हैं। 1700 के दशक में एक अंग्रेज़ इतिहासकार और लेखिका इस्तांबुल पहुंचीं। लेडी एलिज़ाबेथ क्रेवेन। और इस इस्लामी शहर ने उन्हें हैरान कर दिया। उनके देश की औरतें जिन हालात में थीं और जो यहां हो रहा था, उनमें ज़मीन आसमान का अंतर था। यह जगह बिल्कुल अलग थी। और उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को ऐसे वर्णित किया, "ज़िंदा प्राणियों में सबसे सुखी" उन्होंने अपनी observations को इस प्रकार दर्ज किया : "मुझे लगता है कि मैंने कभी किसी ऐसे देश में नहीं गई जहां महिलाएँ इतनी आज़ादी का आनंद ले सकती हों। और सभी तानों, दोषों या आलोचनाओं से मुक्त हो सकती हों, जैसे कि तुर्की में उस समय का Ottoman साम्राज्य। तो ऐसा क्या था जिसने उन्हें इतना चकित कर दिया?
इंग्लैंड में उन्होंने क्या देखा जिसने उन्हें ये शब्द कहने पर मजबूर किया?
दुर्भाग्यवश, हमें इतिहास के बारे में उतना नहीं पता। मैं जिन समस्याओं का मैं उल्लेख करने जा रहा हूँ, उनमें से कोई भी समस्या उस इस्लामी शहर में नहीं थी जिसे उन्होंने देखा। उदाहरण के लिये , इंग्लैंड और अमेरिका में, जब कोई महिला शादी करती थी, तो अक्सर उसकी सारी निजी सम्पत्ती उसके पति के नियंत्रण में आ जाती थी। यहाँ तक कि अगर वह काम करती, तो उसकी कमाई क़ानूनी रूप से उसके पति की होती। और उसे उस पर कोई अधिकार नहीं होता। जब उसके पिता की मृत्यु होती, तो उसकी विरासत का हिस्सा सीधे उसके पति को चला जाता था, और उसे उस पर कोई अधिकार नहीं होता था। तलाक की मामले में, सारे बच्चे पिता को दे दिए जाते थे। मां को अपने उन बच्चों से अलग कर दिया जाता था, जिन्हें उन्होंने जन्म दिया था, पाला था और जिनके लिए हर तरह की कुर्बानियां दी थीं। और निश्चित रुप से, बच्चे भी अपनी माँ से छीन लिये जाते थे। बहुत ही कम मामलों को छोड़कर, महिलाओं को गुजाराभत्ता, यानी तलाक के बाद की आर्थिक सहायता भी नहीं दी जाती थी। इसके अलावा, ये केवल सामाजिक अन्याय ही नहीं थे, बल्कि ये क़ानूनी रूप से स्थापित नियम थे। और इसके ऊपर, महिलाओं को और भी बड़े नैतिक और भावनात्मक अन्यायों का सामना करना पड़ता था। इंग्लैंड में बीसवीं सदी तक अजीब प्रथाएँ जारी रही। और उनमें से एक थी — पत्नी की बिक्री। आखिर इसका क्या ही मतलब बनता है?
ये विश्वास करना कठिन है, लेकिन जब कोई आदमी अपनी पत्नी से बोर हो जाता था या उसपे रुचि खो देता था, तो वह उसे बाजार में ले जाकर किसी वस्तु की तरह बेच सकता था। वास्तव में, 1913 के एक रिकॉर्ड के अनुसार, एक अंग्रेज़ ने अपनी पत्नी को 1 पाउंड में बेचा था। इस बीच, मध्यकालीन यूरोप में जो हो रहा था, वह कही ज़्यादा भयानक था। 15वीं से 17वीं श्ताब्दी के बीच, कैथोलिक चर्च ने डायन होने के संदेह में लोगों को सताया। मासूम महिलाओं को बेबुनियाद आरोपों और मानहानी के आधार पर फांसी दी गई। रिकोर्ड्स के अनुसार, 40 हजार से 1 लाख के बीच महिलाओं को भयावह तरीके से फांसी दी गई, उन्हें ज़िंदा जला दिया गया। क्या आप सोच सकते हैं ?
अगर किसी व्यक्ति को एक महिला पसंद नहीं होती, तो वे कह सकते थे कि शायद वो चुड़ैल है । या अगर कोई महिला किसी पुरुष को ठुकरा दे, तो वो अब चुड़ैल है। उनकी ज़िंदगी खत्म हो जाती थी। यहाँ तक कि ये सब सोचना भी डरावना है। और उसी समाज में लोग बड़ी गंभीरता से इस तरह के सवाल पर चर्चा कर रहे थे, "क्या महिलाएँ वास्तव में इंसान हैं ? क्या उनमें आत्मा होती है?” लेडी क्रेवेन ने ये शब्द बिना कारण नहीं कहे थे। जो उन्होंने उस इस्लामी शहर में देखा, वह पश्चिम में हो रही घटनाओं के पूरी तरह विपरीत था। पश्चिम में महिलाएं जो अधिकार एक सदी बाद 1882 में प्राप्त कर सकीं, वे यहाँ सदियों से प्राप्त किए जा रहे थे। ये कैसे संभव था?
एक महिला मुकदमा कर सकती थी, समझौते करना, संपत्ति रखना वह विरासत पा सकती थी, और उससे भी ज़्यादा अधिकार रखती थी जितने ईंग्लेंड की महिलाओं के पास थे आप शायद अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय पश्चिम में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं दिया गया था। दूसरी ओर जब हम दुनिया के सबसे पुराने continuously operating यूनिवर्सिटी को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि इसे एक मुस्लिम महिला द्वारा स्थापित किया गया था। आप इसे गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में देख सकते हैं। मोरक्को के अल-करावियन विश्वविद्यालय की स्थापना फातिमा अल-फिहरी ने 859 में की थी। यह दिखाता है कि मुस्लिम भूभाग पर महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया गया था, और इसी कारन वह यह कर सकी। इसका यह भी अर्थ है कि महिलाओं को संपत्ति रखने का अधिकार प्राप्त था, वरना वे विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं कर सकती थी। साथ ही, यह भी दर्शाता है कि मुस्लिम महिलाएं समाज में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभा सकती थीं जिससे यह उपलब्धि संभव हुई। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका मतलब है कि वह एक मुस्लिम परिवार में आत्म-विश्वास के साथ पली बढ़ी , अपने लिंग व पहचान के महत्व समझते हुए, ना कि अपमान के साथ। अपनी आँखें बंद करें और इस दृश्य की कल्पना करें। एक लाख से अधिक लोग उत्साह और जिज्ञासा से इंतज़ार कर रहे हैं। उनके सामने खड़े हैं एक ऐसे नेता जिन्होंने इतिहास के धारे को बदल दिया। पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लाहु-अलैही वसल्लम) यह साल 632 है, और अपनी प्रसिद्ध विदाई उपदेश देते समय एक समय पर, उन्होंने ये शब्द कहे: "ऐ लोगों!
मैं आपको सलाह देता हूं कि आप महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करें, और इस संबंध में अल्लाह से डरें। आपने महिलाओं को अल्लाह से एक अमानत कि रूप में लिया है, और आपने अल्लाह के नाम पर वादा करके उनकी शालीनता को अपने लिए जायज़ बनाया है। जिस तरह महिलाओं पर आपका अधिकार है वैसे ही उनको भी आप पर अधिकार है। महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में, उन्होंने जिस क्षेत्र में वो रहते थे उसे गहराई से बदल दिया। अब आइए उस समाज में रहने वाली एक महिला के life cycle पर नजर डालते हैं। और इस्लाम से पहले और बाद के समय के बीच के अन्तर की तुलना करते हैं। इस्लाम से पहले, जब एक लड़की का जन्म होता था। तो उसके पिता अक्सर उसे शर्म का स्रोत मानते थे। और कई मामलों में उसे ज़िंदा दफना दिया जाता था। जब इस्लाम आया, तो उसने इस प्रथा को पूरी तरह से समाप्त कर दिया। यहाँ तक कि अगर वो बच भी जाती, तो उसे अपने पिता से वह प्रेम और सहानुभूति कभी नहीं मिलती, जिसकी उसे तालाश होती। वह उनकी नजरों में हमेशा बेकार रहती। लेकिन पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बाद में कहते, "अगर कोई तीन बेटियों की देखभाल करता है, उन्हें अनुशासित करता है, उनकी शादी करवाता है, और उनके साथ अच्छा व्यवहार करता है , तो वह जन्नत में जाएगा।" मान लीजिए कि वह बड़ी हुई और शादी की उम्र तक पहुंच गई। इस्लाम से पहले, उसे शादी के लिए मजबूर किया जाता। कोई यह नहीं पूछता था कि वह क्या सोचती या महसूस करती है। लेकिन इस्लाम आया और उसकी सहमति के बिना उसकी शादी करने से मना कर दिया। तब से, अगर कोई आदमी उससे शादी करना चाहता है, तो उससे पहले उसको propose करना होगा। कुछ मुलाकातों के बाद, अगर महिला सहमत होती है, और उसे लगता है कि वे compatible हैं, तो शादी का process शुरू होता है। शादी के contract के हिस्से के रूप में, दूल्हे को दुल्हन को एक मेहर देना होता है, जो एक राशि या एक valuable gift होती है। यह मूल रूप से सुरक्षा का एक रूप है। अगर उनका तलाक हो जाता है या पति की मृत्यु हो जाती है, तो महिला इस पैसे को उपयोग करके एक निश्चित अवधि के लिए खुद का आर्थिक रूप से समर्थन कर सकती है। बेशक, ये इसका एकमात्र उद्देश्य नहीं है। महिलाएं इस पैसे का उपयोग अपने जीवन में जैसे चाहें कर सकती हैं। वे एक व्यवसाय शुरू कर सकती हैं, लाभ उत्पन्न करने वाले निवेश कर सकती हैं या वे इसे रखने का विकल्प चुन सकती हैं। मेहर कि राशि महिला द्वारा निर्धारित की जाती है। पुरुष को इसे देना होता है, और वह इसे वापस नहीं ले सकता। लेकिन अगर महिला अपने पति की आर्थिक मदद करना चाहती है, तो वह एक अलग मामला है। शादी के बाद, महिला की आजीविका की ज़िम्मेदारी उसके पति की होती है। उसे नौकरी करने काम करने या घर के खर्चों में योगदान देने की कोई बाध्यता नहीं है, शादी से पहले, उसके जीवनयापन की जिम्मेदारी उसके पिता की थी, शादी के बाद यह जिम्मेदारी उसके पति पर आ जाती है हालांकि आज भी हम देखते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में ऐसा नहीं है। जब हमने शैखा फातिमा बरकतुल्लाह का इंटरव्यू किया, जो यूके में रहने वाली एक महिला इस्लामी विद्वान् हैं, तो उन्होंने हमें कुछ बहुत ही चौंकाने वाली बातें बताई। ये उन चीजों में से एक है जिससे गैर-मुस्लिम महिलाएं इस्लाम से सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, क्योंकि आमतौर पर, उन्होंने किसी और द्वारा भरण पोषण किए जाने का concept अपनी societies में नहीं देखा होता है। एक निश्चित उम्र के बाद, अविवाहित लड़कियां अक्सर अपने पिता के साथ एक किस्म के तलाक़ का अनुभव करती है। अपने पैरों पे खड़े होने के विचार के तहत, उन्हें ऐसी ज़िंदगी में धकेल दिया जाता है जिसकी वे आदी नहीं होती और जिसकी उन्हें आवश्यकता नहीं होती। परिणाम स्वरूप, लाखों बेटियां लंबे समय तक पीड़ित रहती हैं, और कई बार उन्हें बुरी नीयत वाले लोगों द्वारा परेशान किया जाता है। शादी से पहले और बाद में, वे अपना जीवन खुद को बचाने की कोशिश में बितातीं हैं। हालांकि इस्लाम में शादी से पहले उसके जीवन यापन की जिम्मेदारी उसके पिता पर होती है और शादी के बाद उसके पति पर। फिर जब शादी का समय आता है, तो उस आदमी को चुनना जो उसे लगता है कि वह उसकी देखभाल करेगा, पूरी तरह से उसका निर्णय होता है। चलिए जारी रखते हैं। इस्लाम से पहले, जब एक महिला शादी करती थी और मां बनती थी, तो उसे कोई मूल्य या सम्मान नहीं मिलता था। लेकिन देखिए, हमारे प्यारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने क्या कहा। सबसे कामिल ईमान वाले मोमिन वे है, जिनका व्यवहार सबसे अच्छा होता है, और तुम में सबसे अच्छे वे हैं जो अपनी पत्नियों के प्रति सबसे अच्छे हैं। माताओं के महत्व को समझाने के लिए, उन्होंने एक साथी से कहा, स्वर्ग तुम्हारी मां के पैरों के नीचे है। उन्होंने मां के अधिकारों का उल्लंघन करने और उन्हें दबाने को सबसे बड़े पापों में से एक माना। इस्लाम से पहले, अगर किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती थी तो उसे उससे कोई भी विरासत नहीं मिलती थी। इसके विपरीत वह और उसके बच्चे स्वयं विरासत का हिस्सा माने जाते थे। कोई भी अजनबी व्यक्ति उस परिवार पर अधिकार का दावा कर सकता था। और उस महिला से शादी कर सकता था। जब इस्लाम आया, तो इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया। और इसके बजाय, मृत व्यक्ति की पत्नी बच्चों और माता-पिता के बीच एक निश्चित माप के अनुसार विरासत का बँटवारा किया गया। आपने देखा होगा कि माता-पिता को भी विरासत में हिस्सा मिलता है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि आज कई देशों में, जिन्हें हम विकसित मानते हैं, माता-पिता को विरासत में कोई हिस्सा नहीं मिलता। हालांकि logically, एक मृत व्यक्ति के मा-बाप संभवतः मृत अवस्था में पहुंच चुके होते हैं उन्हें शायद देखभाल की आवश्यकता होती है। इस्लाम उनके देखभाल की ज़िम्मेदारी बेटे पर डालता है, और अगर वो मर जाता है, तो इस उद्वेश्य के लिए उन्हें उसकी विरासत में हिस्सा देता है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक महिला को तब भी नहीं छोड़ता जब वह मां बन जाती है। उसकी आजीविका उसके बच्चों की जिम्मेदारी बनी रहती है। एक तरह से इसे महिलाओं को कुछ उच्च उद्देश्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहन के रूप में देखा जा सकता है। अगर आपको काम नहीं करना है या आप बस नहीं करना चाहतीं , तो आपको आय अर्जित करने में अपना समय बर्बाद करने की आवश्यकता नहीं है, आप अपना समय किसी महान चीज़ के लिए समर्पित कर सकती है, जैसे शिक्षा। आखिरकार, क्या यही हर चीज़ का आधार नहीं है?
समाज का complete transformation और उसकी spiritual wellbeing आपके हाथों में है। लेकिन अगर एक महिला काम करने का चुनाव करती है तो इस्लामी इतिहास में भी powerful examples मौजूद हैं। पैगंबर (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) की बीवी खदीजा (रजि.) मक्का की सबसे सफल व्यापारियों में से एक थीं। वह एक outstanding businesswomen थीं। या फातिमा अल-फिहरी को याद करें, जिन्होंने पहली यूनिवर्सिटी स्थापित की। ये वास्तव में entrepreneurship का एक remarkable act था। जब तक हलाल और हराम के बीच संतुलन का सम्मान किया जाता है तब तक कोई समस्या नहीं है। आमतौर पर, किसी समाज को smoking जैसी आदत छोड़ने के लिए प्रेरित करना भी लगभग असंभव लगता है फिर भी पैगंबर मुहम्मद अलैहिसलाम अकेले खड़े हुए और बहुत ही कम समय में उस समाज को इन भयानक रिवाजों और परंपराओं को छोड़ने के लिए प्रेरित किया। और सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने उन्हें इतने सुन्दर और न्यायपूर्ण सिद्धांतो से replace कर दिया कि सदियों बाद भी मानवता उस लेवल तक नहीं पहुँच सकी। कई अन्य उदाहरण दिए जा सकते हैं यह पूरा transformation 23 वर्षों में हुआ। यह transformation कितना extraordinary था इसे highlight करने के लिए। महान इस्लामी विद्वान बदीउज्जमा सईद नुरसी ने कहा उन्हें 100 philosophers को इकठा करने दें उन्हें उस काल और स्थान पर भेजें और उन्हें 100 वर्षों तक काम करने दें। क्या वे उस महान व्यक्ति द्वारा जो कुछ केवल एक वर्ष में किया गया उसका एक प्रतिशत भी हासिल कर सकते हैं?
हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के निधन के 20 वर्ष भी नहीं बीते थे जब दुनिया ने इतिहासमें एक और उल्लेखनीय घटना देखी। उमर इब्न अल खत्ताब (रज़ि॰) जो दुनिया के सबसे powerful leaders में से एक थे वे इस्लाम के दूसरे खलीफा बन गये थे और अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे और अब हम देखेंगे कि इस्लाम ने महिलाओं को कितना आत्मविश्वास और वैल्यू दिया एक दिन, उमर (रज़ि॰) को शिकायतें मिली कि महिलाएं मेहर की उंची रक़म मांग रही हैं। ऐ उमर महिलाएं मेहर की बड़ी रकम माँग रही है। हाँ उसने सही कहा हमारे लिए शादी करना मुश्किल हो गया है, कृप्या कुछ कीजिए। आपको मेहर याद है, है न?
वो financial security, जो एक महिला को शादी के समय मांगने का अधिकार होता है समस्या को हल करने के लिए, उमर ने एक सार्वजनिक भाषण दिया और मेहर की राशि पर एक लिमिट लगाने का सुझाव दिया भला कौन ही उनके जैसे लीडर का विरोध कर सकता था? अखिरकार, वो वह व्यक्ति थे, जिन्होंने persian empire को हराया और रोमनों के खिलाफ बड़ी जीतें हासल किए वो इतने पाउरफुल थे, लेकिन उसी क्षण एक महिला उठी और अपत्ती की। महिला ने साहसपूर्वक कहा "क्या आपने नहीं सुना कि अल्लाह कुरआन में कहता है “उसके दहेज़ में से कुछ भी वापस मत लो। 'भले ही तुमने उसे बहुत सारा सोना दिया हो।” यह अभूतपूर्व था कि एक महिला सार्वजनिक रूप से एक शासक का विरोध करे तो उमर ने क्या प्रतिक्रिया दी?
उन्होंने विनम्रता से स्वीकार किया महिला ने सच कहा है और उमर ने गलती की है हर किसी के पास उमर से अधिक ज्ञान है। फिर वो एक ऊँचे स्थान पर गए और लोगों के सामने अपनी बात वापस ले ली जब आप इसके बारे में सोचते हैं, तो यह दिमाग को झकझोड़ देने वाला है असली मुददा ये है कि आज मुख्यधारा की मीडिया द्वारा इस्लाम को व्यापक रूप से बदनाम किया गया है आप में से कुछ को प्रसिद्ध Irish Singer याद होगी जिन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया था Sinead O'Connor वह बतौर एक feminist जानी जाती थी। और जब उन्होंने इस्लाम की ओर अपने सफर के बारे में बात की, तो उन्होंने कहा: "मैंने विभिन्न धर्मों के शास्त्रों का अध्ययन करना शुरू किया, ईश्वर के बारे में सच्चाई जानने कि कोशिश की। मैंने कभी सोचा नहीं था मै कोई धर्म स्वीकार करूंगी, लेकिन मैंने इस्लाम को अंत तक छोड़े रखा। क्योंकि मेरे मन में इस्लाम के बारे में बहुत से पूर्वाग्रह थे" वास्तव में, इस्लाम के बारे में विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में बहुत बड़ा propaganda हुआ है, लेकिन जब लोगों ने वास्तव में इसे देखना शुरू किया तो उन्होंने महसूस किया कि सच्चाई तो पूरी तरह से अलग थी। यही कारण है कि America मे मुसलमान बनने वाले हर 5 लोगों मे से 4 महिलाएं हैं। और यही कारण है कि UK में भी इस्लाम अपनाने वाले में से लगभग 75% महिलाएं ही है, अब मुझे आप से ये पूछने दीजिए, अगर इस्लाम वास्तव में महिलाओं को दबाने वाला एक system होता तो क्या महिलाएं सबसे पहले इससे दूर नहीं भागतीं?
लेकिन इसके बजाय, वे इसे सबसे अधिक अपनाती हैं। क्योंकि वे देखती है कि इस्लाम उन्हें वास्तविक मूल्य देता है और वे समझती हैं कि यही वो जगह है जहां से वे वास्तव में belong करती हैं। जब हम मानव इतिहास पर नज़र डालते हैं, तो हम एक पैटर्न देखते हैं। जब भी स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित नहीं की गईं, जब भी लोगों ने divine guidance की अनदेखी की, तो सबसे अधिक कष्ट महिलाओं ने ही झेला। उनके अधिकार छीन लिए गए। उनके साथ दुर्भव्यवहार और अत्याचार किया गया। आज भी आधुनिक दुनिया पूरी तरह से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाई है। ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें समान काम के लिए समान वेतन नहीं मिलता, उनके शरीरों का उपयोग विज्ञापन में marketing tools के रूप में किया जाता है। उन पर लगातार एक निश्चित beauty standard थोपा जाता है, जिससे उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उन्हें उसमें फिट होना है, नहीं तो उन्हें बेकार कहा जाता है। अनगिनत महिलाएं flirting के माध्यम से manipulate की जाती है, और कई ज़हरीले रिश्तों में emotional abuse का शिकार होती हैं। कुछ तो यौन हिंसा की भी शिकार होती हैं। दूसरी ओर, हज़ारों महिलाएं हैं जिन्हें बच्चे के जन्म के बाद उनके साथी ने उन्हें छोड़ दिया है। इंग्लैंड और वेल्स के 236 शहरों में, आधे से अधिक घरों का संचालन सिंगल मदर्स द्वारा किया जाता हैं। बस उन महिलाओं पर भारी बोझ और उनके बच्चों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में सोचें जो बिना male role model के बड़े हो रहे हैं। और जब आप कई लोगों को देखें जो अपराध करते हैं, तो आप अक्सर पाएंगे कि वे बिना पिता के बड़े हुए हैं। समस्याएं कभी खत्म होती नहीं दिखती, तो हमें वास्तव में क्या चाहिए?
हमें एक ऐसा system चाहिए जो पुरुषों और महिलाओं दोनो को सबसे संपूर्ण और सही तरीके से जानता और समझता हो और कोई भी इंसान ऐसा नहीं कर सकता। क्योंकि आखिरकार, हम सभी अपूर्ण और दोषपूर्ण हैं, हमसे mistakes होती हैं, हम ग़लत निर्णय लेते हैं, हम चीजों को समझने में गलती करते हैं। यही कारण है कि हमे एक ऐसे system की ज़रूरत है, जो मानव सीमाओं से परे हो, एक ऐसा सिस्टम जिससे पुरुष और महिलाएं दोनों संतुष्ट हों, और स्वेच्छा से उसका पालन करें, वह system जो हमारे creator द्वारा भेजी गई है, क्योंकि वहीं हमे सबसे अच्छी तरह जनता है, उससे भी बेहतर जितना हम कभी खुद को जान सकें। वह पुरुष और महिला दोनों की सभी विशेषताओं को सबसे finest details तक जानता है, उसके पास infinite knowledge है, और इसलिए केवल वही सबसे न्यायपूर्ण और perfect decisions ले सकता है। और चूंकि अल्लाह न तो पुरुष है और न ही महिला, इसलिए उसके फैसलों में पक्षपात की कोई गुंजाइश नही है। अन्य हर सिस्टम, चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न हो, उसमें खामियां होंगी और हम ऐसा देखते ही रहते हैं। संक्षेप में, हम जिन उत्तरों की खोज कर रहे थें जिन समाधानों को वर्षों से समझने की कोशिश कर रहे थें वे हमें 1400 साल पहले, इस्लाम के माध्यम से दिए गए थे। और जिन समस्याओं का हमने उल्लेख किया है, और कई अन्य समस्याओं के समाधान इस्लाम में पाए जा सकते हैं। जैसे-जैसे आप अधिक शोध और पढ़ाई करेंगे आप इसे खुद खोज सकते हैं। लेकिन यहाँ पर मन में कुछ प्रश्न आते हैं, अभी तक तो सब कुछ समझ में आ रहा है। हाँ, इस्लाम महिलाओं को एक यूनिक किस्म की वैल्यू देता है। हाँ, जिसने हमें बनाया है, केवल वही ये नियम बना सकते है। जिनकी वास्तव में हमे जरूरत है। लेकिन फिर भी, जैसा कि हमने शुरुआत में कहा था, इस्लाम में महिलाओं के बारे में कुछ विषय है जो लोगों को उलझन में डालते हैं। अब आइये, सबसे पहले हिजाब के बारें में बात करते हैं। लाखों लोग वहीं सवाल पूछते हैं। "क्या यह कोई बहुत बड़ी पाबंदी नहीं है?" हालांकि हिजाब को अक्सर उत्पीड़न या पाबंदी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, फिर भी यह उन चीजों में से एक है जो ग़ैर मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम के बारें में सबसे अधिक प्रभावित करती है, अजीब है, है ना?
तो ऐसा क्यों है? अगर आप मुझसे पूछें, तो एक नास्तिक भी हिजाब पहनने की आवश्यकता महसूस कर सकता है। एक नास्तिक? हाँ!
क्योंकि ढँकना कुछ प्राकृतिक है, कुछ ऐसा जो मानव प्राणियों की रचना में निहित है अपने प्रकृति से, एक महिला ऐसे पुरुष की तलाश करती है जिसके साथ वह सुकून, खुशी और सुरक्षित महसूस करें। उसी तरह एक पुरुष अपनी पत्नी पर विश्वास करना चाहता है, एक प्रेमपूर्ण बन्धन बनाना चाहता है, और उसके साथ ख़ुश रहना चाहता है। परिवार के शांति और खुशी की रक्षा के लिए इस बंधन को मज़बूत रहना चाहिए। यही कारण है कि पारिवारिक सलाहकार अक्सर एक आवश्यक सत्य पर ज़ोर देते हैं, एक healthy marriage के लिए, पति-पत्नी के बीच आपसी निष्ठा और विश्वास होना चाहिए। यहीं पर इस्लाम पुरूषों और महिलाओं दोनों के लिए हिजाब का समाधान लता है। सूरह अन-नूर में, अल्लाह कहता है, "ईमान वाले मर्दों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शारीरिक मर्यादा की रक्षा करे, यही उनके लिए अधिक पवित्र है। "निःसंदेह, अल्लाह उनके कार्यो से पूरी तरह अवगत है" अगली आयत में, महिलाओं को खुद को ढँकने का आदेश दिया गया है। तो अगर आपने ध्यान दिया हो, तो हिजाब का आदेश पहले पुरुषों को दिया गया है। "अपनी नज़रे नीची रखो।" एक तरह से, उनकी पलके उनका हिजाब हैं। यहाँ हम दो तरफा सावधानी देखते हैं, अल्लाह परिवारों की सुरक्षा और उनकी खुशी को बनाए रखने के लिए उपाय कर रहे हैं। लेकिन आज पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए हिजाब के इन रूपों पर लगातार हमला हो रहा है। तो क्या होता है अगर ये सुरक्षा परिवार से हटा दी जाए, वह विश्वास और निष्ठा जिसके बारे हमने बात की है समय के साथ क्षतिग्रस्त होने लगती है, हर महिला में सुंदर दिखने और तारीफ पाने की inherent desire होती है, और जब एक महिला इस natural tendency के साथ बिना हिजाब पहने बाहर जाती है, तो उसके पास दो विकल्प होते हैं, वह या तो अपने कपड़ो गहनों बालों और शरीर के माध्यम से बाहर के लोगों को आकर्षक और सुंदर दिखेगी, या वह लापरवाह और अनाकर्षक दिखाई देगी। इन दोनों में से कोई एक बात तो अवश्य होती है। कोई बीच का रास्ता नहीं है। लेकिन उसकी प्राकृति में वह सुंदर दिखना चाहती है, और इसके लिए तारीफ़ पाना चाहती है, इसलिए अनिवार्य रूप से जब वह बाहर जाती है, तो वह make sure करेगी कि वह सुंदर दिखे, और अपना पूरा दिन इसी तरह बिताए, बिना हिजाब के, यह unavoidable हो जाता है। तो आपको क्या लगता है, कितने प्रतिशत पुरुष कहेंगे: “यह किसी की पत्नी हो सकती है, मुझे नहीं देखना चाहिए?” एक social experiment हमें इसका उत्तर दे सकता है, कुछ साल पहले की बात है। शायद आपने भी इसे देखा हो। एक औरत न्यूयॉर्क सिटी में पांच घंटे तक कम कपड़े पहनकर घूमती है, और इस वजह से, उसे 108 बार verbally harassed किया गया। जिसका मतलब है, उसे अनुचित टिप्पणियां कही गईं। और इसके अलावा कई पुरुषों ने उसे बुरी नीयत से घूरा। लेकिन यहाँ सबसे दिलचस्प बात यह है। उसी महिला ने यह प्रयोग दोहराया इसबार हिजाब पहन कर, परिणाम?
किसी ने भी उसे पहले की तरह नहीं देखा चाहे पति-पत्नी इसे समझे या नहीं, यह स्थिति धीरे-धीरे उनके बीच के विश्वास को नुकसान पहुँचाती है। ईर्ष्या और विश्वास की समस्याएं उभरने लगती हैं, जो फिर रिश्ते की शांति को बाधित करती हैं। कोई भी आदमी यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि कोई उसकी पत्नी को गलत इरादों से देखे। वह ईर्ष्यालु और अधिकारपूर्ण हो जाता है। यह उसकी प्रकृति में है। इसी तरह, यह एक महिला की प्रकृति में है कि वह चाहती है कि उसका पति केवल उसमें ही रुचि रखे और अन्य महिलाओं की ओर न देखें। इन दोनो भावनाओं को शांति और सामंजस्य मिल सकता है जब दोनों पक्ष हिजाब के आदेशों का पालन करते हैं। अब विपरीत स्थिति की कल्पना करें मान लीजिये दोनो पक्ष अपने हिजाब के प्रति सावधान है। क्या अंतर होगा?
एक पति को अब इस बात की कोई शंका या चिंता नहीं होगी कि अन्य पुरुष उसकी पत्नी को देख रहे हैं या नहीं ठीक इसी तरह जब एक पुरुष अपनी नजर अपनी पलकों पर ध्यान दे तो वहाँ अपनी पत्नी के प्रति अपनी निष्ठा स्पष्ट रूप से दिखा पाएगा इससे उसकी पत्नी के मन में कोई शंका नहीं रहेगी। जैसे "क्या वह अन्य महिलाओं को देख रहा है?" क्या ऐसी औरतें है जिन्हें वो अधिक आकर्षक पाता हो?" वो ऐसे सवालों के बारे में सोचकर असहज महसूस नहीं करेगी हिजाब ही एक ऐसी चीज़ भी है जो महिला को आसानी से पहुंच में आने से बचाती है। यह उसकी कीमत बढ़ाता है और उसे अधिक मूल्यवान बनाता है बिना उसकी अनुमती के कोई भी उसके बालों की एक लट भी नहीं देख सकता उस सामाजिक प्रयोग के बारे में सोचें जो मैंने अभी आपके साथ साझा किया जब वह महिला खुली पोशाक में आई तो वह अनगिनत disgusting stares और verbal abuse का निशाना बन गई लेकिन जब उसने हिजाब पहना, तो उसने दिखाया कि उसके शरीर का असली मालिक कौन है। उसने ये संदेश दिया कि वह सिर्फ एक वस्तु नहीं है, बल्कि उसके विचार और व्यक्तित्व ही उसे वास्तव में मूल्यवान बनाते हैं साथ ही एक तरह से उसने उन लोगों को छाँट दिया जो उससे संपर्क कर सकते थे जब वह हिजाब पहनती है तो जो लोग केवल बाहरी रूप पर ध्यान देते हैं या जिनके moral standards low होते हैं वे उसे approach नहीं करते क्योंकि वह अब उनकी ध्यान आकर्षण का केंद्र नहीं रहती इस मामले में हिजाब पहनने का मतलब है उन लोगों के साथ बातचीत करना जो आपके असली व्यक्तित्व के लिए आपसे जुड़ते हैं ऐसे लोग जो आपकी बाहरी सुंदरता पर नहीं, बल्कि आपकी आत्मा पर ध्यान देते हैं, और जिनके Moral स्टैंडर्ड्स High होते हैं। याद रखें आप दूसरों द्वारा ये लेबल किये जाने से उपर हैं कि आप सुन्दर हैं या नहीं आपको दूसरों की desires और expectations के आधार पर सेट standard में फिट होने की ज़रूरत नहीं है आपको दूसरों की राय के अनुसार नहीं, बल्कि अल्लाह की अपेक्षाओं के अनुसार कपड़े पहनने चाहिए। जिसने ब्रह्मांड को शून्य से बनाया और धरती को आपके पैरों के नीचे रखा कुछ लोग आपकी सुंदरता के लिए आप से प्यार कर सकते हैं लेकिन अल्लाह ने आपको इसलिए बनाया क्योंकि वह आप से प्यार करता है उसने आपको एक अनोखी सुंदरता दी है जो उसने किसी और को नहीं दी याद है हमने कहा था कि दो अलग-अलग प्रकार के हिजाब होते हैं पुरुष का हिजाब और महिला का हिजाब इसके साथ ही पुरुष और महिला के बीच बातचीत की कुछ सीमाएं भी खींची जाती हैं उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के लिए यह मना है कि वह विपरीत लिंग के किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अंतरंग बातचीत करे या हंसे जो उनका परिवार या जीवन साथी नहीं है जब दोनों पक्ष इन नियमों का पालन करने में विफल होते हैं तो वे एक चुंबक के दो पक्षों की तरह एक दूसरे की ओर आकर्षित होने लगते हैं और दुनिया का क्रम धराशाई होने लगता है sexual inclinations, actions में बदलने लगती हैं। अवैध संबंध विकृतियाँ और अंततः अपराध। यहाँ पर दोनों पक्ष ज़िम्मेदार हैं और जब दोनों अपनी भूमिका निभाने में असफल होते हैं तो दोष दोनों पक्षों पर मढ़ा जाता है। CDC के एक अध्ययन के अनुसार, 2020 में अमेरिका में लगभग 5 लाख गर्भपात किए गए और इनमें से 86% बच्चे अवैध थे, केवल एक वर्ष में एक ही देश में 4 लाख अजन्मे बच्चों की जान अवैध संबंधों के कारण ली गई बिल्कुल यह एक महिला के लिए अत्यंत कठिन होता है और ज़्यादातर मामलों में जन्म दिया जाता है, उसी संगठन के एक अन्य अध्ययन के अनुसार 2021 में केवल अमेरिका में 14 लाख अवैध जन्म हुए और ज़्यादातर मामलो में माँ को ये बोझ अकेले उठाना पड़ता है वह सालों तक बच्चे की देखभाल करती है और उसे पालने की कोशिश करती है बिना कभी पिता का समर्थन पाए इस स्थिति में एक माँ की emotional और mental स्थिति के बारे में सोचें और बिना पिता के बड़े हो रहे बच्चे द्वारा सामना की गई चुनौतियों के बारे में सोचें और इसे रोकना फिर से क़ुरआन के उन दो आदेशों पर निर्भर करता है जिनका हमने पहले उल्लेख किया था मुझे लगता है कि bigger picture अब काफी स्पष्ट है लेकिन हमारे पास अभी भी कुछ अन्य प्रश्न है जिनका उत्तर दिया जाना बाकी है। एक आदमी को चार महिलाओं से शादी की अनुमति , बहनों को उनके भाइयों की तुलना में आधी विरासत मिलना, और सुरह अन निसा आयत 34 में अक्सर पूछे जाने वाले एवं debated issues इन सभी सवालों के जवाब हमारी सोच से भी अधिक आसान है । पार्ट 2 में हम इन सभी details को गहराई से जानेंगे, हमारे साथ बने रहिए।