इस्लाम में महिलाएँ: बहुपत्नी प्रथा, विरासत और ‘मारने’ वाली आयत की व्याख्या!
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सोशल मीडिया पर कई बार यह दावा किया जाता है, कि इस्लाम महिलाओं को नीचा दिखाता है। तो सच्चाई क्या है? पिछले एपिसोड में, हमने देखा कि इस्लाम महिलाओं को कितनी यूनिक वैल्यू देता है। यह साफ़ हो गया कि ग़ैरो के दावे वास्तव में कितने निराधार हैं। और अब तीन सामान्य प्रश्न हैं जिनका जवाब देना ज़रूरी है। इस्लाम में एक व्यक्ति भला चार पत्नियाँ कैसे रख सकता है? क्या यह महिलाओं की वेल्यू को कम नहीं करता? दूसरा प्रश्न यह है, कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधी विरासत क्यों मिलती है? और अंत में, क्या क़ुरआन सूरह अन-निसा, आयत 34 में महिलाओं को मारने को प्रोत्साहित करता है?
आइए चार पत्नियों से शादी करने के मुद्दे से शुरू करते हैं। सबसे बुनियादी बात जो हमें समझनी चाहिए वह यह है कि यह एक आदेश नहीं है, बल्कि वास्तव में एक restriction है। जिस समाज में इस्लाम उभरा, वहां polygamy अपने चरम पर थी, और यह कई समस्याओं का स्रोत थी। जब इस्लाम आया, तो इसने इसे एक से बढ़ाकर चार नहीं किया। बल्कि, इसे आठ या नौ से घटाकर चार कर दिया और इसके चारों ओर सीमाएँ निर्धारित कीं। चूंकि क़ुरआन universal है, इसे एक ऐसा system establish करना पड़ा जो सभी दौर और सभी समाजों पर लागू हो सके इसे हर युग में उत्पन्न होने वाली विभिन्न परिस्थितियों के लिए practical solutions प्रदान करने की आवश्यकता थी। उदाहरण के लिए, युद्ध के समय, जब भारी नुकसान होते हैं, तो पुरुष जनसंख्या घटती है, न कि महिला जनसंख्या। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, लाखों पुरुषों ने अपनी जान गवाई। और परिणामस्वरूप, लाखों विधवाएं और अनाथ बच्चे पीछे रह गए, जिन्हें care और support की ज़रूरत थी। ऐसी स्थितियों में, इन लोगों की सुरक्षा करना और ये सुनिश्चित करना आवश्यक हो जाता है कि देश की जनसंख्या बढ़ती रहे। यही कारण है कि ऐसी परिस्थितियों में, एक पुरुष के लिए एक से अधिक महिलाओं से विवाह करना आवश्यक हो जाता है। साथ ही, हमें एक और वास्तविकता पर विचार करना होगा। उन समाजों के बारे में सोचें जहां polygamy आम थी। अगर वे इस system को जीने के लिए बहुत कठिन मानते, तो वे इस्लाम स्वीकार करने में संकोच करते। लेकिन उनकी आख़िरत की ज़िंदगी इस पर निर्भर करती है। इसलिए निश्चित रूप से ऐसी अनुमति होनी चाहिए ताकि इन लोगों को इस्लाम से दूर न किया जाए। याद रखें, यह धर्म केवल इक्कीसवीं सदी के लिए नाज़िल नहीं हुआ था। इसे चौदह शताब्दियों के दौरान हर संस्कृति के लोगों के लिए भेजा गया था, और उन लोगों के लिए भी जो आख़िरी ज़माने तक आएंगे। इसके अलावा, दुनिया भर में polygamy आज भी मौजूद है। बस हम इसके बारे में पूरी तरह से जानते नहीं हैं। सन् दो हजार बाईस में, एक प्रसिद्ध अमेरिकी शोध परियोजना, जनरल सोशल सर्वे, जीएसएस, ने बेवफाई दरों पर एक अध्ययन किया। और परिणाम चौंकाने वाले हैं। अध्ययन के अनुसार, बीस प्रतिशत विवाहित पुरुषों को धोखा देते हुए पाया गया। दूसरे शब्दों में, बहुविवाह पहले से ही मौजूद है, लेकिन एक अवैध तरीके से। इसलिए गुप्त और बेईमान संबंधों के बजाय, इस्लाम एक परिवार बनाने का रास्ता प्रदान करता है, खुले तरीके से और कानून की सीमाओं के भीतर। यह गुप्त संबंधों के दरवाजे को बंद करता है, और समाज में बेवफाई के साथ आने वाले नैतिक पतन को रोकने में मदद करता है। बेशक, यह एक ऐसी अनुमति नहीं है जिसे हल्के में लिया जा सकता है। इसमें एक गंभीर नियम है। सभी पत्नियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार किया जाना चाहिए। Emotional care और ध्यान देने से लेकर उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने तक, पूरी तरह से न्याय होना चाहिए। और फिर भी, इस आयत के साथ, इस्लाम वास्तव में monogamy पर ज़ोर देता है। ‘लेकिन अगर आपको लगे कि आप न्याय नहीं कर पाएंगे, तो केवल एक से शादी करें।‘ एक अन्य आयत यह बताती है कि ऐसा कर पाना कितना कठिन है। और चाहे तुम कितना ही चाहो, तुममें इसकी सामर्थ्य नहीं हो सकती कि औरतों के बीच पूर्ण रूप से न्याय कर सको। इस बारे में एक हदीस में एक डरावनी चेतावनी भी है। पैगंबर मुहम्मद, अलैहिस्सलाम, ने कहा, “जब एक आदमी की दो पत्नियाँ होती हैं और वह उनमें से एक की ओर झुका होता है, तो वह हश्र के दिन एक तरफ लटकते हुए आएगा,” जिसका अर्थ है एक तरफ से लकवाग्रस्त। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कितनी गंभीर जिम्मेदारी है?
क्योंकि इसका मतलब है कि किसी अन्य इंसान के साथ अन्याय करने का वास्तविक खतरा है। यही कारण है कि यह एक बहुत ही नाजुक मामला है, एक बहुत पतली रेखा है, जिसे लापरवाही से पार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, एक महिला को विवाह अनुबंध में एक शर्त जोड़ने का अधिकार है। अगर वह कहती है, “आप मेरे अलावा किसी और से शादी नहीं करेंगे,” तो पुरुष दूसरी पत्नी से शादी नहीं कर सकता। यह इतना simple है। दूसरी ओर, एक महिला भी किसी की दूसरी या तीसरी पत्नी बनने के लिए आज़ाद है। कोई उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। और इस्लाम के अनुसार, उसे मजबूर करना मना है। तो अंत में, यह इस पर निर्भर करता है कि महिला इसे स्वीकार करती है या नहीं, और क्या पुरुष न्याय बनाए रखने में सक्षम है। जब सभी पक्ष सहमत होते हैं, तो किसी और को आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं होता। याद रखें, हमने इसे अनुमति कहा था। जैसे युद्ध के समय, कई ऐसे परिदृश्य होते हैं जो दुर्लभ या असाधारण हो सकते हैं लेकिन हो चुके हैं, और फिर से हो सकते हैं। हम अन्य उदाहरण भी दे सकते हैं। और उन सभी से ये सिद्ध होगा कि हमेशा एक विकल्प के रूप में इस प्रकार की अनुमति का होना क्यों महत्वपूर्ण है। जबकि यह विकल्प मौजूद होना चाहिए, हम वास्तविक जीवन में देखते हैं कि आज मुसलमानों के बीच यह प्रथा शायद ही देखी जाती है। इसके अलावा, यदि आप अन्य धर्मों को देखें, तो हम देख सकते हैं कि polygamy इस्लाम के लिए unique नहीं है। उदाहरण के लिए, ईसाई धर्म के लगभग दो दशमलव तीन अरब अनुयायी हैं, और आप Old या New Testament में एक भी ऐसा कथन नहीं पाएंगे जो polygamy का विरोध करता हो। वास्तव में, हम Old Testament के नबियों के बीच इसके उदाहरण आसानी से देख सकते हैं, जैसे नबी इब्राहीम, नबी मूसा, और नबी दाऊद। एक ईसाई जो इस्लाम की आलोचना करता है, उसे याद रखना चाहिए कि Old Testament के अनुसार, नबी सुलेमान की 700 पत्नियाँ थीं। इसी तरह, जब हम हिंदू धर्म को देखते हैं, जिसे एक अरब दस करोड़ लोग मानते हैं, तो हमें कोई नियम नहीं मिलता जो polygamy को मना करता हो। वास्तव में, इस धर्म में भी इसके कई उदाहरण हैं। हम यह भी देख सकते हैं कि यह कई अन्य समाजों और संस्कृतियों में आम था। इसलिए, निश्चित रूप से, एक प्रथा जिसे दुनिया की आधी से अधिक आबादी द्वारा स्वीकार किया गया है, उसका उपयोग इस्लाम की आलोचना या विरोध करने के लिए नहीं किया जा सकता। संक्षेप में, सिर्फ इसलिए कि कोई नियम हमारे जीवनशैली से अलग लगता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह गलत है। अब हम सबसे कठिन प्रश्न पर आते हैं। क्या क़ुरआन पुरुषों को महिलाओं को मारने का आदेश देता है?
Surah An-Nisa, verse 34. अब एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें जिसने कभी अपनी पत्नियों पर हाथ नहीं उठाया और कभी ऐसा शब्द नहीं कहा जो उनके दिलों को तोड़ दे। वह उनके साथ मजाक करते थे, हर मौके पर प्यार दिखाते थे, और पूरे विश्व के लिए एक आदर्श बन गए। और वह व्यक्ति, अर्थात् पैगंबर मुहम्मद, उन पर शांति हो, ने कहा, “तुम में से सबसे अच्छा वह है जो अपनी पत्नी के साथ सबसे अच्छा है।“ पिछले एपिसोड में, हमने स्पष्ट रूप से देखा कि इस्लाम महिलाओं को कितना महत्व देता है। तो क्या यह संभव हो सकता है कि कुरान, वही संदेश जो इस व्यक्ति ने दिया, वास्तव में पुरुषों को महिलाओं को पीटने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हो?
पैगंबर मुहम्मद, उन पर शांति हो, को चलती-फिरती कुरान के रूप में वर्णित किया गया है। और उन्होंने कभी ऐसा कार्य नहीं किया, एक बार भी नहीं। तो यहाँ पर कुछ सुक्चम विवरण हो सकते हैं जो छूट गए हैं। अब इस आयत को ध्यान से देखें। यह इस तरह शुरू होती है, "पुरुष महिलाओं के संरक्षक हैं।" रक्षक है देखिए, शुरुआत से ही पति की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित है, अपनी पत्नी की रक्षा करना। और परिभाषा के अनुसार, जो रक्षा करता है वह नुकसान नहीं पहुंचाता। इसके विपरीत, वह सुनिश्चित करता है कि दूसरे व्यक्ति को कोई नुकसान न पहुंचे। तो आयत की पहली पंक्ति से ही हम देख सकते हैं कि यह मुद्दा शायद थोड़ा अलग हो सकता है जितना हमने पहले सोचा था। यहां का नियम सभी महिलाओं पर लागू नहीं हो सकता। यह एक विशिष्ट संकीर्ण समूह का उल्लेख करता है यहाँ इस्तेमाल किया गया शब्द है “नुशूज़” यह अरबी में क्रिया का नाम है और इसलिए जो महिलाएं इस क्रिया को करती हैं उन्हें “नाशीज़ा” कहा जाता है तो इसका क्या मतलब है?
यहाँ इस शब्द का किस तरह से उपयोग किया गया था?
आयत में, दो विपरीत प्रकार की महिलाओं का उल्लेख किया गया है, सालेहा और नाशेज़ह। सालेहा महिला का वर्णन इस प्रकार किया गया है: तो नेक औरतें पूरी तरह फ़र्माबरदार होती हैं और अपने पतियों की अनुपस्थिति में उनके सम्मान की रक्षा करती हैं उस सुरक्षा के कारण जो अल्लाह ने उन्हें दी है। मतलब जब उनका पति आसपास नहीं होता, इस प्रकार की महिला अपनी इज़्ज़त की रक्षा करती है। तो यहाँ से, हम समझ सकते हैं कि नाशेज़ह महिलाएं इनसे विपरीत गुणों से संक्रमित होती है। दूसरे शब्दों में, हम यहाँ एक साधारण स्थिति की बात नहीं कर रहे हैं। परिवार की इज्जत खतरे में है। महिला अन्य पुरुषों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करती है, उनके सामने आकर्षक दिखने का प्रयास करती है। वह गैर-महरम पुरुषों से बात कर रही है, उन पुरुषों से जिनसे उसे इस्लामी सीमाओं के अनुसार बातचीत नहीं करनी चाहिए। वह उन पुरुषों से बात करती है जिनसे उसके पति को स्वीकार नहीं है। वह उन सीमाओं को पार करती है जो इज़्ज़त और privacy की रक्षा के लिए हैं, उन लोगों के साथ अनौपचारिक और लापरवाही से व्यवहार करती है जिनसे उसे दूरी बनाए रखनी चाहिए। और इससे, घर में तनाव होता है। वह अपने पति के प्रति बागी और disrespectful हो जाती है, जिससे शादी में लगातार लड़ाइयाँ होती है। तो जब आयत कहती है, “जिनसे तुम नुशूज़ का डर रखते हो,” यह एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जो धीरे-धीरे बिगड़ रही है। यह कोई single argument नहीं है, बल्कि संबंध में गहरी एवं लगातार जारी समस्याएं है। अब आइए एक पल के लिए इतिहास के किसी भी बिंदु पर वापस जाएं। अगर एक पति अपनी पत्नी को इस तरह व्यवहार करते देखता तो वह क्या करता?
वो उसे कठोरता से मार सकता था, और उसे कोई भी नहीं रोकता। क्या हम नहीं देखते कि आज भी इस तरह की स्थितियाँ कैसे हत्या तक का कारण बन जाती है?
लेकिन ये आयत एक अलग approach देती है। पहला step है शब्दों से चेतावनी देना। दूसरा है उसे बिस्तर में अकेला छोड़ देना। इन steps में कुछ खूबसूरत बारीकियाँ हैं जो हम पहली नजर में नहीं देख सकते, लेकिन पहले चलिए शब्द ‘मारना’ को और करीब से देखते हैं, जो अंतिम उपाय है। इसका मतलब उसे बुरी तरह से पीटना नहीं है। इसकी स्पष्ट सीमाएँ हैं। उदाहरण के लिए, चेहरे पर मारना सख्ती से मना है। वह इस तरह से भी नहीं मार सकता जिससे शरीर पर निशान पड़े या कोई चोट लगे। तो हम एक बहुत ही सीमित प्रकार की मार की बात कर रहे हैं। आप जानते हैं कि कभी-कभी आप किसी को कंधों से हिलाते हैं और कहते हैं, “होश में आओ,” बस उन्हें यह एहसास दिलाने के लिए कि वे क्या कर रहे हैं?
यह इसका एक उदाहरण हो सकता है, क्योंकि असली लक्ष्य यहाँ Family की unity की रक्षा करना है और जो स्पष्ट रूप से गलत है उसे अपनी गलती जारी रखने से रोकना है, और ऐसा किसी पर अत्याचार किए बिना करना है। इसलिए, इसे एक प्रतीकात्मक कार्य माना जा सकता है। यह शरीर नहीं है जिसे मारा जाता है, बल्कि आत्मा है। याद है चार पत्नियों से शादी करने का मुद्दा?
हमने कहा था कि कुरान ने संख्या को एक से बढ़ाकर चार नहीं किया, बल्कि इसे आठ या नौ से घटाकर चार कर दिया। यही विचार यहाँ भी लागू होता है। कुरान मारने को प्रोत्साहित या आदेशित नहीं करता। यह वास्तव में उस पति को सीमित करता है जो पहले से ही ऐसा करने वाला था। मेरा मतलब है, सोचिए। क्या आपको लगता है कि वो आदमी जिसने अपनी पत्नी को मारा, कहेगा, “मैं उसे न मारता लेकिन आयत ने मुझसे ऐसा करवाया”?
नहीं, बिल्कुल नहीं। ये तो उसने बस अचानक गुस्से में किया। उस समय उसके मन में धर्म या आस्था का ख्याल भी नहीं होगा। तो आयत जो करती है वह ये है कि वो एक पति पर सीमाएँ लगाती है। वरना वो बेहिसाब ढंग से हिंसा करता। आयत आती है, और एक तरह से उससे कहती है, “नहीं, तुम जब चाहो या जैसे चाहो वैसे नहीं मार सकते। तुम्हें पहले ये दो steps लेने होंगे।“ और वे steps क्या थे?
मौखिक चेतावनी और फिर बिस्तरों को अलग करना। मौखिक चेतावनी का कदम अनियंत्रित हिंसा को रोकने के लिए है, क्योंकि कुछ समय बाद आदमी की emotions शांत हो जाएँगी। उसका गुस्सा उतना तेज़ नहीं रहेगा जितना उस लम्हे में लगा था। अब आइए उन बारीकियों के बारे में बात करते हैं जो मैंने पहले बयान की थीं। कुरान में, पहले कदम के लिए चुना गया शब्द – मौखिक चेतावनी – बहुत दिलचस्प है: "فَعِظُوهُنَّ" इस verb का root “وَعَظ" है जिसका अर्थ है प् यार और compassion के साथ सलाह देना, ऐसी सलाह देना जो सच में सुनने वाले के दिल को छू जाए। तो यह चिल्लाना नहीं है। ये कड़े शब्द नहीं कह रहा, जैसे, “बस!
मैं अब और नहीं सह सकता। बस अब और नहीं!” यह दूसरे व्यक्ति को इस तरह से सुधारने की बात है जो उसे नरम करे और उसके दिल और दिमाग दोनों से बात करे। यह तोड़ने या चोट पहुँचाने के बारे में नहीं है; यह सुधारने और ठीक करने के बारे में है। मान लीजिए कि आदमी ने एक आदर्श तरीके से ऐसा काफी समय तक किया। मगर ये फिर भी काम न करे तब जाकर दूसरा step शुरू होता है, जो है बिस्तरों को अलग करना। अब मैं आपको दूसरा दिलचस्प पहलू बताता हूँ। आयत वास्तव में यह नहीं कहती कि अलग बिस्तरों में सोएं। यह कहती है, وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ, जिसका मतलब है उन्हें उनके बिस्तरों में अकेला छोड़ दो। दूसरे शब्दों में, जिसे सोफे पर जाना चाहिए वो है, आदमी। अपने actions से, basically वो अपनी पत्नी से कह रहा है, “मैं अभी तुम्हारे नज़दीक नहीं रहना चाहता। तुम्हारी हरकतों के कारण, मैं कहीं और सोना पसंद करूंगा। लेकिन मैं अब भी चाहता हूं कि तुम आराम से रहो। “तुम बेड पर रहो।“ सम्मान का एक और gesture देते हुए, वह फिर एक true gentleman की तरह कमरे से बाहर चला जाता है। By the way, याद रखें, हम उस नाशिज़ा महिला की बात कर रहे हैं जो स्पष्ट रूप से गलत है, न कि किसी भी महिला की। और आयत में बताए गए steps का उद्देश्य उसे उस व्यवहार को जारी रखने से धीरे-धीरे discourage करना है। तो अब क्या होने वाला है?
वास्तव में, यहीं से सब कुछ शुरू होता है। Single महिलाएं शायद इसका भार न समझ पाएं, लेकिन एक शादीशुदा महिला के लिए, , जिसका अपने पति के साथ emotional bond होता है यह बहुत भारी होता है। single बहनें जो ये देख रही हैं, वे अपने आसपास की शादीशुदा महिलाओं से यह पूछ सकती हैं। Please पूछें, अगर आपके पति ने आपसे कहा कि वह पाँच दिन अलग सोना चाहते हैं, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? आपको कैसा लगेगा?
दो या तीन दिन अलग रहना एक बात है, लेकिन जब यह चार या पाँच दिन हो जाता है, तो कोई भी इसे और नहीं सह सकती और समाधान ढूंढना चाहती है। क्योंकि उन रातों में, वो सो नहीं पाती जबतक कि एक घंटे न गुज़र जाएँ। उसके मन में अंतहीन विचारों एवं चिंताओं के साथ एक कश्मकश चल रही होती है। ध्यान न मिलना दर्द का कारण बनता है और self-blame की ओर ले जाता है। फिर वो अपनी गलतियों पर सवाल उठाने लगती है। केवल पत्नी ही नहीं बल्कि पति भी इस स्थिति का अनुभव करना पसंद नहीं करता। और निश्चित रूप से अगर वे रात में अलग-अलग सोते हैं, तो हम ये नहीं कह सकते कि उनका संबंध दिन के दौरान बहुत अच्छा है, क्या हम कह सकते हैं। आखिरकार, उन रातों में से एक रात, उनमें से एक चुप्पी तोड़ते है, साथी के पास जाते है और बात करना चाहते है। “क्या आप ये realize करते है कि छह सौ के दशक में नाज़िल होने के बावजूद, कुरान ने एक प्रकार की marital therapy प्रदान की है?” क्या यह अद्भुत नहीं है?
अब, मान लीजिए कि इससे भी महिला के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया और सब कुछ वैसे ही चलता रहा। तो क्या आपको नहीं लगता कि अब ये शादी बड़े खतरे में है? तो उस समय, कुरान एक last step, एक आखिरी उपाय की बात करता है। सबसे बढ़कर, जैसा कि हमने कहा, हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम, इस बात के सबसे बड़े उदाहरण है कि Quran को कैसे जिया जाये। उन्होंने कभी भी अपनी पत्नियों पर हाथ नहीं उठाया, और कई बार उन लोगों को चेतावनी दी जो अपनी पत्नियों को मारते थे। मुझे लगता है कि अब यह मुद्दा अच्छे से समझ लिया गया है। अब, अंतिम प्रश्न पर आते हैं। इस्लाम में, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में विरासत का आधा हिस्सा क्यों मिलता है? क्या ये अनुचित नहीं है?
चलिए पिछली वीडियो पर वापस चलते हैं। इस्लाम से पहले, महिलाओं के पास विरासत के अधिकार नहीं थे, लेकिन इस्लाम ने उन्हें इसका अधिकार दिया। सच में, यहां तक कि यूके और यूएस में भी, महिलाओं को ये अधिकार अठारह सौ के दशक तक नहीं मिला था। लेकिन इस्लाम में महिलाओं को विरासत के हिस्से का आधा हिस्सा क्यों मिलता है?
क्योंकि न्याय इसी तरह से किया जा सकता है। पहले, हमें ये समझने की ज़रूरत है: समानता और न्याय एक ही चीज़ नहीं हैं। सच्चा न्याय लोगों की जिम्मेदारियों के अनुसार हिस्से देना है। याद रखें, हमने पिछले एपिसोड में भी उल्लेख किया था कि परिवार का financial burden पति के कंधों पर होता है। पत्नी की ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं होती। यहां तक कि अगर एक महिला वयस्क हो जाती है, तो भी उसकी आजीविका के लिए उसके पिता जिम्मेदार होते हैं जब तक कि उसकी शादी नहीं हो जाती। एक बार जब उसकी शादी हो जाती है, तो वो जिम्मेदारी उसका पति ले लेता है, और उसे घरेलू खर्चों में contribute करने की कोई बाध्यता नहीं होती। और इसके अलावा, उसे निकाह के contract के हिस्से के रूप में एक मेहर, कुछ धनराशि मिलती है, और उसे इसे घर पर खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती। और जब वो बूढ़ी हो जाती है, तो उसके बेटे की जिम्मेदारी होती है कि वो उसकी देखभाल करे, और उसे उसके inheritance में भी हिस्सा पाने का अधिकार होता है। अब, सोचिए। शादी के दौरान, परिवार की देखभाल करने की जिम्मेदारी पति की होती है। ज्यादातर मामलों में, वो पत्नी ही है जिसे चीज़ें provide की जाती है। इतिहास में, यहाँ तक कि कुरान की इन आयतों के आने से पहले भी, Financial burden हमेशा पुरुषों पर रहा है। तो इस्लाम के अनुसार, विरासत का बटवारा इस प्रकार होना चाहिए। मान लीजिए कि एक पिता की मृत्यु हो जाती है, और उनका एक बेटा और एक बेटी है। यहाँ, बेटा बेटी की तुलना में दोगुना विरासत प्राप्त करता है, क्योंकि उसकी विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन लोगों पर खर्च होगा जिनकी उसे देखभाल करनी है। बेटी को जो मिलता है, उसकी तुलना में बाकी हिस्सा या तो समान हो सकता है या उससे भी कम। तो वास्तव में, महिला को आधा नहीं मिल रहा है, बल्कि पुरुष को उसकी जिम्मेदारियों के कारण दोगुना मिलता है। या इसे इस तरह देखें। वही बहन अपनी विरासत का हिस्सा प्राप्त करेगी, लेकिन उसे इसे घर पर खर्च करने की कोई बाध्यता नहीं है। यह जिम्मेदारी उसके पति की है। इसलिए, लंबे समय में, उसके पति की संपत्ति उसके लाभ के लिए खर्च की जाएगी। तो अगर आप उसकी विरासत को उसके पति द्वारा प्रदान की गई चीजों के साथ जोड़ते हैं, तो वह अपने भाई की तुलना में समान या उससे भी बेहतर स्थिति में होती है, क्योंकि वह अपनी संपत्ति घर पर खर्च करता है। इसके अलावा, अगर उसके पति को संपत्ति मिलती है, तो उसे भी उसका लाभ मिलेगा। तो जैसा कि हमने कहा, समानता का मतलब न्याय नहीं होता। न्याय का मतलब है कि हर किसी को उनकी जिम्मेदारियों के आधार पर उतना ही मिले जिसके वे हकदार हैं, और इस्लाम यही करता है। इस वीडियो में और विशेष रूप से पिछली वीडियो में हमने जो चर्चा की, उसे देखते हुए, हम समझ सकते हैं कि इस्लाम न तो किसी को महिलाओं से ऊपर उठाता है, न ही महिलाओं के मूल्य को कम करता है। यदि आपने पहली वीडियो देखी है, तो आप बेहतर समझ सकेंगे कि मैं क्या कहने जा रहा हूँ। याद है हमने पहले जो आंकड़े साझा किए थे, कि अमेरिका में इस्लाम अपनाने वाले पांच में से चार लोग महिलाएं हैं?
आज, हजारों महिलाएं Propaganda से परे जाकर और अपनी खुद की research करके सच्चाई को खोज रही हैं। वो एक ऐसे धर्म की ओर आ रही हैं जहाँ उन्हें शांति, सुरक्षा और न्याय मिलता है। क्योंकि उनके लिए इस्लाम सिर्फ एक धर्म नहीं है, यह एक घर है। जब वे इस्लाम अपनाते हैं, तो वे वैसा ही महसूस करते हैं जैसे प्रसिद्ध आयरिश धर्मांतरित सिनेएड ओ’कॉनर, ने कहा था, “मैं घर पर हूँ।“ हम इंसान हैं। हमारे पास बुद्धि है। हम सवाल करते हैं। हम तर्क करते हैं। तो चलिए बिना किसी पूर्वाग्रह और पक्षपात के सोचते हैं। पुरुषों और महिलाओं के बीच सबसे निष्पक्ष संतुलन कौन स्थापित कर सकता है? हम इंसान या वो जिसने हमें बनाया?
सैकड़ों वर्षों से आजमाए गए और हमेशा असफल रहने वाले सिस्टम या वे कानून जो eternal और perfect creator द्वारा स्थापित किए गए हैं?
आइए चार पत्नियों से शादी करने के मुद्दे से शुरू करते हैं। सबसे बुनियादी बात जो हमें समझनी चाहिए वह यह है कि यह एक आदेश नहीं है, बल्कि वास्तव में एक restriction है। जिस समाज में इस्लाम उभरा, वहां polygamy अपने चरम पर थी, और यह कई समस्याओं का स्रोत थी। जब इस्लाम आया, तो इसने इसे एक से बढ़ाकर चार नहीं किया। बल्कि, इसे आठ या नौ से घटाकर चार कर दिया और इसके चारों ओर सीमाएँ निर्धारित कीं। चूंकि क़ुरआन universal है, इसे एक ऐसा system establish करना पड़ा जो सभी दौर और सभी समाजों पर लागू हो सके इसे हर युग में उत्पन्न होने वाली विभिन्न परिस्थितियों के लिए practical solutions प्रदान करने की आवश्यकता थी। उदाहरण के लिए, युद्ध के समय, जब भारी नुकसान होते हैं, तो पुरुष जनसंख्या घटती है, न कि महिला जनसंख्या। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, लाखों पुरुषों ने अपनी जान गवाई। और परिणामस्वरूप, लाखों विधवाएं और अनाथ बच्चे पीछे रह गए, जिन्हें care और support की ज़रूरत थी। ऐसी स्थितियों में, इन लोगों की सुरक्षा करना और ये सुनिश्चित करना आवश्यक हो जाता है कि देश की जनसंख्या बढ़ती रहे। यही कारण है कि ऐसी परिस्थितियों में, एक पुरुष के लिए एक से अधिक महिलाओं से विवाह करना आवश्यक हो जाता है। साथ ही, हमें एक और वास्तविकता पर विचार करना होगा। उन समाजों के बारे में सोचें जहां polygamy आम थी। अगर वे इस system को जीने के लिए बहुत कठिन मानते, तो वे इस्लाम स्वीकार करने में संकोच करते। लेकिन उनकी आख़िरत की ज़िंदगी इस पर निर्भर करती है। इसलिए निश्चित रूप से ऐसी अनुमति होनी चाहिए ताकि इन लोगों को इस्लाम से दूर न किया जाए। याद रखें, यह धर्म केवल इक्कीसवीं सदी के लिए नाज़िल नहीं हुआ था। इसे चौदह शताब्दियों के दौरान हर संस्कृति के लोगों के लिए भेजा गया था, और उन लोगों के लिए भी जो आख़िरी ज़माने तक आएंगे। इसके अलावा, दुनिया भर में polygamy आज भी मौजूद है। बस हम इसके बारे में पूरी तरह से जानते नहीं हैं। सन् दो हजार बाईस में, एक प्रसिद्ध अमेरिकी शोध परियोजना, जनरल सोशल सर्वे, जीएसएस, ने बेवफाई दरों पर एक अध्ययन किया। और परिणाम चौंकाने वाले हैं। अध्ययन के अनुसार, बीस प्रतिशत विवाहित पुरुषों को धोखा देते हुए पाया गया। दूसरे शब्दों में, बहुविवाह पहले से ही मौजूद है, लेकिन एक अवैध तरीके से। इसलिए गुप्त और बेईमान संबंधों के बजाय, इस्लाम एक परिवार बनाने का रास्ता प्रदान करता है, खुले तरीके से और कानून की सीमाओं के भीतर। यह गुप्त संबंधों के दरवाजे को बंद करता है, और समाज में बेवफाई के साथ आने वाले नैतिक पतन को रोकने में मदद करता है। बेशक, यह एक ऐसी अनुमति नहीं है जिसे हल्के में लिया जा सकता है। इसमें एक गंभीर नियम है। सभी पत्नियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार किया जाना चाहिए। Emotional care और ध्यान देने से लेकर उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने तक, पूरी तरह से न्याय होना चाहिए। और फिर भी, इस आयत के साथ, इस्लाम वास्तव में monogamy पर ज़ोर देता है। ‘लेकिन अगर आपको लगे कि आप न्याय नहीं कर पाएंगे, तो केवल एक से शादी करें।‘ एक अन्य आयत यह बताती है कि ऐसा कर पाना कितना कठिन है। और चाहे तुम कितना ही चाहो, तुममें इसकी सामर्थ्य नहीं हो सकती कि औरतों के बीच पूर्ण रूप से न्याय कर सको। इस बारे में एक हदीस में एक डरावनी चेतावनी भी है। पैगंबर मुहम्मद, अलैहिस्सलाम, ने कहा, “जब एक आदमी की दो पत्नियाँ होती हैं और वह उनमें से एक की ओर झुका होता है, तो वह हश्र के दिन एक तरफ लटकते हुए आएगा,” जिसका अर्थ है एक तरफ से लकवाग्रस्त। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कितनी गंभीर जिम्मेदारी है?
क्योंकि इसका मतलब है कि किसी अन्य इंसान के साथ अन्याय करने का वास्तविक खतरा है। यही कारण है कि यह एक बहुत ही नाजुक मामला है, एक बहुत पतली रेखा है, जिसे लापरवाही से पार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, एक महिला को विवाह अनुबंध में एक शर्त जोड़ने का अधिकार है। अगर वह कहती है, “आप मेरे अलावा किसी और से शादी नहीं करेंगे,” तो पुरुष दूसरी पत्नी से शादी नहीं कर सकता। यह इतना simple है। दूसरी ओर, एक महिला भी किसी की दूसरी या तीसरी पत्नी बनने के लिए आज़ाद है। कोई उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। और इस्लाम के अनुसार, उसे मजबूर करना मना है। तो अंत में, यह इस पर निर्भर करता है कि महिला इसे स्वीकार करती है या नहीं, और क्या पुरुष न्याय बनाए रखने में सक्षम है। जब सभी पक्ष सहमत होते हैं, तो किसी और को आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं होता। याद रखें, हमने इसे अनुमति कहा था। जैसे युद्ध के समय, कई ऐसे परिदृश्य होते हैं जो दुर्लभ या असाधारण हो सकते हैं लेकिन हो चुके हैं, और फिर से हो सकते हैं। हम अन्य उदाहरण भी दे सकते हैं। और उन सभी से ये सिद्ध होगा कि हमेशा एक विकल्प के रूप में इस प्रकार की अनुमति का होना क्यों महत्वपूर्ण है। जबकि यह विकल्प मौजूद होना चाहिए, हम वास्तविक जीवन में देखते हैं कि आज मुसलमानों के बीच यह प्रथा शायद ही देखी जाती है। इसके अलावा, यदि आप अन्य धर्मों को देखें, तो हम देख सकते हैं कि polygamy इस्लाम के लिए unique नहीं है। उदाहरण के लिए, ईसाई धर्म के लगभग दो दशमलव तीन अरब अनुयायी हैं, और आप Old या New Testament में एक भी ऐसा कथन नहीं पाएंगे जो polygamy का विरोध करता हो। वास्तव में, हम Old Testament के नबियों के बीच इसके उदाहरण आसानी से देख सकते हैं, जैसे नबी इब्राहीम, नबी मूसा, और नबी दाऊद। एक ईसाई जो इस्लाम की आलोचना करता है, उसे याद रखना चाहिए कि Old Testament के अनुसार, नबी सुलेमान की 700 पत्नियाँ थीं। इसी तरह, जब हम हिंदू धर्म को देखते हैं, जिसे एक अरब दस करोड़ लोग मानते हैं, तो हमें कोई नियम नहीं मिलता जो polygamy को मना करता हो। वास्तव में, इस धर्म में भी इसके कई उदाहरण हैं। हम यह भी देख सकते हैं कि यह कई अन्य समाजों और संस्कृतियों में आम था। इसलिए, निश्चित रूप से, एक प्रथा जिसे दुनिया की आधी से अधिक आबादी द्वारा स्वीकार किया गया है, उसका उपयोग इस्लाम की आलोचना या विरोध करने के लिए नहीं किया जा सकता। संक्षेप में, सिर्फ इसलिए कि कोई नियम हमारे जीवनशैली से अलग लगता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह गलत है। अब हम सबसे कठिन प्रश्न पर आते हैं। क्या क़ुरआन पुरुषों को महिलाओं को मारने का आदेश देता है?
Surah An-Nisa, verse 34. अब एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें जिसने कभी अपनी पत्नियों पर हाथ नहीं उठाया और कभी ऐसा शब्द नहीं कहा जो उनके दिलों को तोड़ दे। वह उनके साथ मजाक करते थे, हर मौके पर प्यार दिखाते थे, और पूरे विश्व के लिए एक आदर्श बन गए। और वह व्यक्ति, अर्थात् पैगंबर मुहम्मद, उन पर शांति हो, ने कहा, “तुम में से सबसे अच्छा वह है जो अपनी पत्नी के साथ सबसे अच्छा है।“ पिछले एपिसोड में, हमने स्पष्ट रूप से देखा कि इस्लाम महिलाओं को कितना महत्व देता है। तो क्या यह संभव हो सकता है कि कुरान, वही संदेश जो इस व्यक्ति ने दिया, वास्तव में पुरुषों को महिलाओं को पीटने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हो?
पैगंबर मुहम्मद, उन पर शांति हो, को चलती-फिरती कुरान के रूप में वर्णित किया गया है। और उन्होंने कभी ऐसा कार्य नहीं किया, एक बार भी नहीं। तो यहाँ पर कुछ सुक्चम विवरण हो सकते हैं जो छूट गए हैं। अब इस आयत को ध्यान से देखें। यह इस तरह शुरू होती है, "पुरुष महिलाओं के संरक्षक हैं।" रक्षक है देखिए, शुरुआत से ही पति की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित है, अपनी पत्नी की रक्षा करना। और परिभाषा के अनुसार, जो रक्षा करता है वह नुकसान नहीं पहुंचाता। इसके विपरीत, वह सुनिश्चित करता है कि दूसरे व्यक्ति को कोई नुकसान न पहुंचे। तो आयत की पहली पंक्ति से ही हम देख सकते हैं कि यह मुद्दा शायद थोड़ा अलग हो सकता है जितना हमने पहले सोचा था। यहां का नियम सभी महिलाओं पर लागू नहीं हो सकता। यह एक विशिष्ट संकीर्ण समूह का उल्लेख करता है यहाँ इस्तेमाल किया गया शब्द है “नुशूज़” यह अरबी में क्रिया का नाम है और इसलिए जो महिलाएं इस क्रिया को करती हैं उन्हें “नाशीज़ा” कहा जाता है तो इसका क्या मतलब है?
यहाँ इस शब्द का किस तरह से उपयोग किया गया था?
आयत में, दो विपरीत प्रकार की महिलाओं का उल्लेख किया गया है, सालेहा और नाशेज़ह। सालेहा महिला का वर्णन इस प्रकार किया गया है: तो नेक औरतें पूरी तरह फ़र्माबरदार होती हैं और अपने पतियों की अनुपस्थिति में उनके सम्मान की रक्षा करती हैं उस सुरक्षा के कारण जो अल्लाह ने उन्हें दी है। मतलब जब उनका पति आसपास नहीं होता, इस प्रकार की महिला अपनी इज़्ज़त की रक्षा करती है। तो यहाँ से, हम समझ सकते हैं कि नाशेज़ह महिलाएं इनसे विपरीत गुणों से संक्रमित होती है। दूसरे शब्दों में, हम यहाँ एक साधारण स्थिति की बात नहीं कर रहे हैं। परिवार की इज्जत खतरे में है। महिला अन्य पुरुषों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करती है, उनके सामने आकर्षक दिखने का प्रयास करती है। वह गैर-महरम पुरुषों से बात कर रही है, उन पुरुषों से जिनसे उसे इस्लामी सीमाओं के अनुसार बातचीत नहीं करनी चाहिए। वह उन पुरुषों से बात करती है जिनसे उसके पति को स्वीकार नहीं है। वह उन सीमाओं को पार करती है जो इज़्ज़त और privacy की रक्षा के लिए हैं, उन लोगों के साथ अनौपचारिक और लापरवाही से व्यवहार करती है जिनसे उसे दूरी बनाए रखनी चाहिए। और इससे, घर में तनाव होता है। वह अपने पति के प्रति बागी और disrespectful हो जाती है, जिससे शादी में लगातार लड़ाइयाँ होती है। तो जब आयत कहती है, “जिनसे तुम नुशूज़ का डर रखते हो,” यह एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जो धीरे-धीरे बिगड़ रही है। यह कोई single argument नहीं है, बल्कि संबंध में गहरी एवं लगातार जारी समस्याएं है। अब आइए एक पल के लिए इतिहास के किसी भी बिंदु पर वापस जाएं। अगर एक पति अपनी पत्नी को इस तरह व्यवहार करते देखता तो वह क्या करता?
वो उसे कठोरता से मार सकता था, और उसे कोई भी नहीं रोकता। क्या हम नहीं देखते कि आज भी इस तरह की स्थितियाँ कैसे हत्या तक का कारण बन जाती है?
लेकिन ये आयत एक अलग approach देती है। पहला step है शब्दों से चेतावनी देना। दूसरा है उसे बिस्तर में अकेला छोड़ देना। इन steps में कुछ खूबसूरत बारीकियाँ हैं जो हम पहली नजर में नहीं देख सकते, लेकिन पहले चलिए शब्द ‘मारना’ को और करीब से देखते हैं, जो अंतिम उपाय है। इसका मतलब उसे बुरी तरह से पीटना नहीं है। इसकी स्पष्ट सीमाएँ हैं। उदाहरण के लिए, चेहरे पर मारना सख्ती से मना है। वह इस तरह से भी नहीं मार सकता जिससे शरीर पर निशान पड़े या कोई चोट लगे। तो हम एक बहुत ही सीमित प्रकार की मार की बात कर रहे हैं। आप जानते हैं कि कभी-कभी आप किसी को कंधों से हिलाते हैं और कहते हैं, “होश में आओ,” बस उन्हें यह एहसास दिलाने के लिए कि वे क्या कर रहे हैं?
यह इसका एक उदाहरण हो सकता है, क्योंकि असली लक्ष्य यहाँ Family की unity की रक्षा करना है और जो स्पष्ट रूप से गलत है उसे अपनी गलती जारी रखने से रोकना है, और ऐसा किसी पर अत्याचार किए बिना करना है। इसलिए, इसे एक प्रतीकात्मक कार्य माना जा सकता है। यह शरीर नहीं है जिसे मारा जाता है, बल्कि आत्मा है। याद है चार पत्नियों से शादी करने का मुद्दा?
हमने कहा था कि कुरान ने संख्या को एक से बढ़ाकर चार नहीं किया, बल्कि इसे आठ या नौ से घटाकर चार कर दिया। यही विचार यहाँ भी लागू होता है। कुरान मारने को प्रोत्साहित या आदेशित नहीं करता। यह वास्तव में उस पति को सीमित करता है जो पहले से ही ऐसा करने वाला था। मेरा मतलब है, सोचिए। क्या आपको लगता है कि वो आदमी जिसने अपनी पत्नी को मारा, कहेगा, “मैं उसे न मारता लेकिन आयत ने मुझसे ऐसा करवाया”?
नहीं, बिल्कुल नहीं। ये तो उसने बस अचानक गुस्से में किया। उस समय उसके मन में धर्म या आस्था का ख्याल भी नहीं होगा। तो आयत जो करती है वह ये है कि वो एक पति पर सीमाएँ लगाती है। वरना वो बेहिसाब ढंग से हिंसा करता। आयत आती है, और एक तरह से उससे कहती है, “नहीं, तुम जब चाहो या जैसे चाहो वैसे नहीं मार सकते। तुम्हें पहले ये दो steps लेने होंगे।“ और वे steps क्या थे?
मौखिक चेतावनी और फिर बिस्तरों को अलग करना। मौखिक चेतावनी का कदम अनियंत्रित हिंसा को रोकने के लिए है, क्योंकि कुछ समय बाद आदमी की emotions शांत हो जाएँगी। उसका गुस्सा उतना तेज़ नहीं रहेगा जितना उस लम्हे में लगा था। अब आइए उन बारीकियों के बारे में बात करते हैं जो मैंने पहले बयान की थीं। कुरान में, पहले कदम के लिए चुना गया शब्द – मौखिक चेतावनी – बहुत दिलचस्प है: "فَعِظُوهُنَّ" इस verb का root “وَعَظ" है जिसका अर्थ है प् यार और compassion के साथ सलाह देना, ऐसी सलाह देना जो सच में सुनने वाले के दिल को छू जाए। तो यह चिल्लाना नहीं है। ये कड़े शब्द नहीं कह रहा, जैसे, “बस!
मैं अब और नहीं सह सकता। बस अब और नहीं!” यह दूसरे व्यक्ति को इस तरह से सुधारने की बात है जो उसे नरम करे और उसके दिल और दिमाग दोनों से बात करे। यह तोड़ने या चोट पहुँचाने के बारे में नहीं है; यह सुधारने और ठीक करने के बारे में है। मान लीजिए कि आदमी ने एक आदर्श तरीके से ऐसा काफी समय तक किया। मगर ये फिर भी काम न करे तब जाकर दूसरा step शुरू होता है, जो है बिस्तरों को अलग करना। अब मैं आपको दूसरा दिलचस्प पहलू बताता हूँ। आयत वास्तव में यह नहीं कहती कि अलग बिस्तरों में सोएं। यह कहती है, وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ, जिसका मतलब है उन्हें उनके बिस्तरों में अकेला छोड़ दो। दूसरे शब्दों में, जिसे सोफे पर जाना चाहिए वो है, आदमी। अपने actions से, basically वो अपनी पत्नी से कह रहा है, “मैं अभी तुम्हारे नज़दीक नहीं रहना चाहता। तुम्हारी हरकतों के कारण, मैं कहीं और सोना पसंद करूंगा। लेकिन मैं अब भी चाहता हूं कि तुम आराम से रहो। “तुम बेड पर रहो।“ सम्मान का एक और gesture देते हुए, वह फिर एक true gentleman की तरह कमरे से बाहर चला जाता है। By the way, याद रखें, हम उस नाशिज़ा महिला की बात कर रहे हैं जो स्पष्ट रूप से गलत है, न कि किसी भी महिला की। और आयत में बताए गए steps का उद्देश्य उसे उस व्यवहार को जारी रखने से धीरे-धीरे discourage करना है। तो अब क्या होने वाला है?
वास्तव में, यहीं से सब कुछ शुरू होता है। Single महिलाएं शायद इसका भार न समझ पाएं, लेकिन एक शादीशुदा महिला के लिए, , जिसका अपने पति के साथ emotional bond होता है यह बहुत भारी होता है। single बहनें जो ये देख रही हैं, वे अपने आसपास की शादीशुदा महिलाओं से यह पूछ सकती हैं। Please पूछें, अगर आपके पति ने आपसे कहा कि वह पाँच दिन अलग सोना चाहते हैं, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? आपको कैसा लगेगा?
दो या तीन दिन अलग रहना एक बात है, लेकिन जब यह चार या पाँच दिन हो जाता है, तो कोई भी इसे और नहीं सह सकती और समाधान ढूंढना चाहती है। क्योंकि उन रातों में, वो सो नहीं पाती जबतक कि एक घंटे न गुज़र जाएँ। उसके मन में अंतहीन विचारों एवं चिंताओं के साथ एक कश्मकश चल रही होती है। ध्यान न मिलना दर्द का कारण बनता है और self-blame की ओर ले जाता है। फिर वो अपनी गलतियों पर सवाल उठाने लगती है। केवल पत्नी ही नहीं बल्कि पति भी इस स्थिति का अनुभव करना पसंद नहीं करता। और निश्चित रूप से अगर वे रात में अलग-अलग सोते हैं, तो हम ये नहीं कह सकते कि उनका संबंध दिन के दौरान बहुत अच्छा है, क्या हम कह सकते हैं। आखिरकार, उन रातों में से एक रात, उनमें से एक चुप्पी तोड़ते है, साथी के पास जाते है और बात करना चाहते है। “क्या आप ये realize करते है कि छह सौ के दशक में नाज़िल होने के बावजूद, कुरान ने एक प्रकार की marital therapy प्रदान की है?” क्या यह अद्भुत नहीं है?
अब, मान लीजिए कि इससे भी महिला के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया और सब कुछ वैसे ही चलता रहा। तो क्या आपको नहीं लगता कि अब ये शादी बड़े खतरे में है? तो उस समय, कुरान एक last step, एक आखिरी उपाय की बात करता है। सबसे बढ़कर, जैसा कि हमने कहा, हमारे पैगंबर अलैहिस्सलातु वस्सलाम, इस बात के सबसे बड़े उदाहरण है कि Quran को कैसे जिया जाये। उन्होंने कभी भी अपनी पत्नियों पर हाथ नहीं उठाया, और कई बार उन लोगों को चेतावनी दी जो अपनी पत्नियों को मारते थे। मुझे लगता है कि अब यह मुद्दा अच्छे से समझ लिया गया है। अब, अंतिम प्रश्न पर आते हैं। इस्लाम में, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में विरासत का आधा हिस्सा क्यों मिलता है? क्या ये अनुचित नहीं है?
चलिए पिछली वीडियो पर वापस चलते हैं। इस्लाम से पहले, महिलाओं के पास विरासत के अधिकार नहीं थे, लेकिन इस्लाम ने उन्हें इसका अधिकार दिया। सच में, यहां तक कि यूके और यूएस में भी, महिलाओं को ये अधिकार अठारह सौ के दशक तक नहीं मिला था। लेकिन इस्लाम में महिलाओं को विरासत के हिस्से का आधा हिस्सा क्यों मिलता है?
क्योंकि न्याय इसी तरह से किया जा सकता है। पहले, हमें ये समझने की ज़रूरत है: समानता और न्याय एक ही चीज़ नहीं हैं। सच्चा न्याय लोगों की जिम्मेदारियों के अनुसार हिस्से देना है। याद रखें, हमने पिछले एपिसोड में भी उल्लेख किया था कि परिवार का financial burden पति के कंधों पर होता है। पत्नी की ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं होती। यहां तक कि अगर एक महिला वयस्क हो जाती है, तो भी उसकी आजीविका के लिए उसके पिता जिम्मेदार होते हैं जब तक कि उसकी शादी नहीं हो जाती। एक बार जब उसकी शादी हो जाती है, तो वो जिम्मेदारी उसका पति ले लेता है, और उसे घरेलू खर्चों में contribute करने की कोई बाध्यता नहीं होती। और इसके अलावा, उसे निकाह के contract के हिस्से के रूप में एक मेहर, कुछ धनराशि मिलती है, और उसे इसे घर पर खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती। और जब वो बूढ़ी हो जाती है, तो उसके बेटे की जिम्मेदारी होती है कि वो उसकी देखभाल करे, और उसे उसके inheritance में भी हिस्सा पाने का अधिकार होता है। अब, सोचिए। शादी के दौरान, परिवार की देखभाल करने की जिम्मेदारी पति की होती है। ज्यादातर मामलों में, वो पत्नी ही है जिसे चीज़ें provide की जाती है। इतिहास में, यहाँ तक कि कुरान की इन आयतों के आने से पहले भी, Financial burden हमेशा पुरुषों पर रहा है। तो इस्लाम के अनुसार, विरासत का बटवारा इस प्रकार होना चाहिए। मान लीजिए कि एक पिता की मृत्यु हो जाती है, और उनका एक बेटा और एक बेटी है। यहाँ, बेटा बेटी की तुलना में दोगुना विरासत प्राप्त करता है, क्योंकि उसकी विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन लोगों पर खर्च होगा जिनकी उसे देखभाल करनी है। बेटी को जो मिलता है, उसकी तुलना में बाकी हिस्सा या तो समान हो सकता है या उससे भी कम। तो वास्तव में, महिला को आधा नहीं मिल रहा है, बल्कि पुरुष को उसकी जिम्मेदारियों के कारण दोगुना मिलता है। या इसे इस तरह देखें। वही बहन अपनी विरासत का हिस्सा प्राप्त करेगी, लेकिन उसे इसे घर पर खर्च करने की कोई बाध्यता नहीं है। यह जिम्मेदारी उसके पति की है। इसलिए, लंबे समय में, उसके पति की संपत्ति उसके लाभ के लिए खर्च की जाएगी। तो अगर आप उसकी विरासत को उसके पति द्वारा प्रदान की गई चीजों के साथ जोड़ते हैं, तो वह अपने भाई की तुलना में समान या उससे भी बेहतर स्थिति में होती है, क्योंकि वह अपनी संपत्ति घर पर खर्च करता है। इसके अलावा, अगर उसके पति को संपत्ति मिलती है, तो उसे भी उसका लाभ मिलेगा। तो जैसा कि हमने कहा, समानता का मतलब न्याय नहीं होता। न्याय का मतलब है कि हर किसी को उनकी जिम्मेदारियों के आधार पर उतना ही मिले जिसके वे हकदार हैं, और इस्लाम यही करता है। इस वीडियो में और विशेष रूप से पिछली वीडियो में हमने जो चर्चा की, उसे देखते हुए, हम समझ सकते हैं कि इस्लाम न तो किसी को महिलाओं से ऊपर उठाता है, न ही महिलाओं के मूल्य को कम करता है। यदि आपने पहली वीडियो देखी है, तो आप बेहतर समझ सकेंगे कि मैं क्या कहने जा रहा हूँ। याद है हमने पहले जो आंकड़े साझा किए थे, कि अमेरिका में इस्लाम अपनाने वाले पांच में से चार लोग महिलाएं हैं?
आज, हजारों महिलाएं Propaganda से परे जाकर और अपनी खुद की research करके सच्चाई को खोज रही हैं। वो एक ऐसे धर्म की ओर आ रही हैं जहाँ उन्हें शांति, सुरक्षा और न्याय मिलता है। क्योंकि उनके लिए इस्लाम सिर्फ एक धर्म नहीं है, यह एक घर है। जब वे इस्लाम अपनाते हैं, तो वे वैसा ही महसूस करते हैं जैसे प्रसिद्ध आयरिश धर्मांतरित सिनेएड ओ’कॉनर, ने कहा था, “मैं घर पर हूँ।“ हम इंसान हैं। हमारे पास बुद्धि है। हम सवाल करते हैं। हम तर्क करते हैं। तो चलिए बिना किसी पूर्वाग्रह और पक्षपात के सोचते हैं। पुरुषों और महिलाओं के बीच सबसे निष्पक्ष संतुलन कौन स्थापित कर सकता है? हम इंसान या वो जिसने हमें बनाया?
सैकड़ों वर्षों से आजमाए गए और हमेशा असफल रहने वाले सिस्टम या वे कानून जो eternal और perfect creator द्वारा स्थापित किए गए हैं?