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इस्लाम के सबसे मुश्किल दिन - AI-विजुअलाइज़्ड - ऐ पैग़म्बर | एपिसोड 2

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खब्बाब एक बहुत माहिर लोहार थे। उस दिन, वो हमेशा की तरह अपनी भट्टी पर थे, मगर कुछ बनाने के लिए नहीं। उनके हाथ और पैर कसकर बांध दिए गए थे, और भागने का कोई रास्ता नहीं था। वो पसीने में लथपथ थे, उन पर बार-बार ताने कसे जा रहे थे और उनकी बेइज्ज़ती की जा रही थी। "तुमने हमारा दीन छोड़ दिया और मुहम्मद की पैरवी करना चुन लिया!" जिस भट्टी में उन्होंने बरसों काम किया था, अब उसी भट्टी में लोहे का एक टुकड़ा तपाया जा रहा था। और ये बात साफ़ थी कि उन्हें वो क्यों दिखाया जा रहा था। जैसे-जैसे वो लोहा गरम हो रहा था, वो खौफनाक पल करीब आता जा रहा था। और फिर, वो लाल अंगारा बना हुआ लोहा आग से बाहर निकाला गया और खब्बाब की तरफ लाया गया। उन्हें तड़पाने के लिए वो जलता हुआ लोहा उनके जिस्म पर दागा जाने वाला था। उन्हें एक आखिरी मौक़ा दिया गया। उन्हें बस एक वाक्य कहना था। सिर्फ एक वाक्य, जो उन्हें मिलने वाली इस सज़ा से बचा सकता था। उन्हें अल्लाह के रसूल को झूठा कहना था, माज़ल्लाह। ये सारी दरिंदगी सिर्फ इसलिए हो रही थी क्योंकि उसने कह दिया था, "मेरा रब अल्लाह है। अल्लाह एक है। उसके सिवा कोई माबूद नहीं हैं।" मगर उनके ईमान की रोशनी उनके अस्तित्व में इतनी गहराई तक उतर चुकी थी कि उसने जलने के खौफ को भी हरा दिया। वो अपनी बात पर डटे रहे और जालिमों की सारी धमकियां उन्हीं के मुंह पर दे मारीं। वो बेरहम जालिम, जिनके दिल पत्थर के हो चुके थे और जिनकी अंतरात्मा पूरी तरह मर चुकी थी, वो गुस्से से पागल हो गए और वो दहकता हुआ लोहा खब्बाब के सर पर दागने लगे। यह वीडियो सीरीज़ विश्वसनीय इस्लामी स्रोतों के सैकड़ों संदर्भों पर आधारित है। सभी AI विज़ुअल्स योग्य मुस्लिम विद्वानों की सलाह से तैयार किए गए हैं और इस्लामी नियमों के अनुरूप हैं। वो नज़ारा बेहद खौफनाक था। ऐसी दर्दनाक यातना जिसके बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहेगा। एक दिल दहला देने वाली चीख हवा में गूंज उठी। कुछ देर बाद, खब्बाब दर्द की तीव्रता से बेहोश हो गए। एक तरफ वो शख्स था जो अपने ईमान की वजह से चट्टान की तरह मजबूत खड़ा था, और दूसरी तरफ, कुफ्र के दलदल में डूबा हुआ एक बेरहम मूर्ति-पूजक। उनका मकसद खब्बाब की जान लेना नहीं, बल्कि उन्हें अपना दीन छोड़ने पर मजबूर करना था। सालों बाद, जब वो उन दिनों की याद में अपनी कमीज़ उठाकर अपनी पीठ दिखाते, तो उनका हर ज़ख्म उनके ईमान की एक मुहर जैसा लगता था, हर निशान उस ज़ुल्म का जीता-जागता सबूत था जो उन्होंने सहा था। खब्बाब अपनी आपबीती इन शब्दों में बयान करते थे: "एक दिन, मूर्ति-पूजकों ने मुझे पकड़ लिया। 'चलते रहो!' उन्होंने आग जलाई और मुझे ज़बरदस्ती उस पर पीठ के बल लेटा दिया। फिर उनमें से एक ने मेरे सीने पर पैर रखा और मुझे तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि आग ठंडी नहीं हो गई।" क्या आप कल्पना कर सकते हैं?

ज़रा सोचिये, उन पलों को याद करते हुए उनके दिल और दिमाग पर क्या गुज़रती होगी! कुरैश को, ये नया दीन बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा था। वजह साफ़ थी—इस दीन की नज़र में, खब्बाब, जो उस वक्त एक दास थे, अपने उस मालिक से कहीं श्रेष्ठ थे, जो उन पर ज़ुल्म कर रहा था। क्योंकि उन्होंने ज़िंदगी का असली मकसद पा लिया था। यह दीन सोचने के सारे नज़रियों को बदल रहा था। भला यह कैसे संभव था? काला और गोरा, अमीर और गरीब, बड़े लोग और आम आदमी, दास और आज़ाद सब बराबर कैसे हो सकते हैं? इन सबको भाई कैसे कहा जा सकता है? क्या अली जैसा एक नौजवान और नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जैसे परिपक्व इंसान, अबू बक्र जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति, और खब्बाब जैसा दास—क्या ये सब एक साथ,एक ही महफ़िल में बैठ सकते हैं?

बेटियों को अहमियत देना, औरतों को एक जीता-जागता इंसान समझना, उन्हें बोलने का और अपनी राय ज़ाहिर करने का हक़ देना, यह कहना कि 'जन्नत माँ के कदमों के नीचे है'... ये सारे विचार उस समाज के लिए बिल्कुल अनोखे और अजीब थे। आखिर यह दीन आया कहां से था?

यह उनकी पूरी बनी-बनाई व्यवस्था के लिए खतरा बन रहा था और इन्साफ और रहम पर टिकी एक नई व्यवस्था पेश कर रहा था। कुरैश के लिए, इसे कुबूल करना नामुमकिन था। यूँ तो वे अल्लाह को मानते थे, मगर उनका सोचना था कि अल्लाह भी उनकी बनाई व्यवस्था में दखल नहीं दे सकता। लेकिन उन्हें इस दुनिया में सिर्फ जीने और मरने के लिए नहीं भेजा गया था। अपने बनाए कानूनों के दम पर, उन्हें लगता था कि वो जिस पर चाहें ज़ुल्म कर सकते हैं। मगर जब वो अपनी मनमर्जी चला रहे थे, तो भला अल्लाह अपना कानून कैसे ना भेजता? क्या उन्हें वाकई लगता था कि इस नाइंसाफी को रोकने के लिए वो कोई व्यवस्था नहीं उतारेगा? जब लोग इस दुनिया में जो चाहे बोल रहे थे, तो क्या उन्हें लगा की अल्लाह सच मैं खामोश रहता?

सहाबा का नज़रिया भी बिल्कुल ऐसा ही था। और चाहे ज़ुल्म कितना ही सख्त क्यों न हो, वे ईमान से कभी नहीं पलटे। इस्लाम क़ुबूल करना कोई आसान फैसला नहीं था। इसके लिए असली हिम्मत चाहिए थी। ये सिर्फ खब्बाब इब्न अल-अरत नहीं थे। कई और सहाबा भी अनगिनत कठिनाइयों से गुज़र रहे थे। कुछ को रेगिस्तान की जलती हुई धूप में ऐसे सताया गया जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। कुछ को उनके अपने ही पिता ने घरों में कैद कर दिया, भूखा रखा, और परिवार से पूरी तरह काट दिया। कुछ पर उनकी माओं ने ये कहकर दबाव डाला कि, "अगर तुमने अपना दीन नहीं छोड़ा, तो मैं भूख से अपनी जान दे दूंगी।" कुछ को बांधा गया और उनके रिश्तेदारों ने उन पर अत्याचार किया। कुछ को जलती हुई रेत पर लेटाकर बिना खाना पानी के छोड़ दिया गया और फिर भारी, तपते हुए पत्थरों के नीचे कुचल दिया गया। कुछ को इतना मारा गया कि वो बोल भी नहीं पाते थे, यहाँ तक कि वो बेहोश हो जाते। कुछ की तो असहनीय दर्द सहते-सहते आंखों की रोशनी ही चली गई। ऐसा कोई अत्याचार नहीं बचा था जो उन्होंने न किया हो, सिर्फ यह बुलवाने के लिए कि "मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम झूठे हैं," माज़ल्लाह। मगर इन सबके बावजूद, उन मुसलमानों की संख्या कम नहीं हुई। बल्कि, वो बढ़ते ही चले गए। ऐसा पक्का समर्पण देखकर, लोग खुद से ये सवाल पूछने पर मजबूर हो गए, "क्या वो अक़ीदा जिसने इन लोगों को इतना अटल, इतना मज़बूत, और इतना निडर बना दिया, झूठा हो सकता है?" और ये सिर्फ कुछ लोगों की बात नहीं थी। जल्द ही, हज़ारों सहाबा कुर्बानी के अनगिनत उदाहरण पेश करने वाले थे। वो सब के सब इतना अद्भुत समर्पण कैसे दिखा सकते थे?

हम उस दीन की बात कर रहे हैं जिसने उनकी रूह पर इतना गहरा असर डाला था। क्या ये वास्तव में सिर्फ एक आदमी की कल्पना हो सकती थी? क्या ये सिर्फ मनगढ़ंत कहानियां थीं? क्या ऐसा अक़ीदा जो पूरी तरह सच पर ना टिका हो, लोगों को इतनी ताकत दे सकता है?

मगर कुरैश को इनमे से कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। और इस तरह, कठिन दिनों की शुरुआत हो चुकी थी। इस्लाम के शुरूआती दिनों में, नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने इस दीन का सार्वजनिक एलान नहीं किया था। मगर वो जो ईश्वरीय पैगाम लाए थे, वो खामोशी से फैल रहा था, एक कान से दूसरे कान तक। कुछ लोग इसे समझने की कोशिश कर रहे थे, और कुछ को पता ही नहीं था कि क्या हो रहा है। और दूसरे इसे एक आफत, एक गंभीर खतरे की तरह देख रहे थे। पहले-पहल, कुरैश के सरदारों ने ऐसा दिखाया जैसे उन्हें कोई परवाह नहीं। लेकिन जब उन्होंने देखा कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस्लाम कबूल कर रहे हैं, तो उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। उन्होंने ऐसे इल्ज़ाम लगाकर आपकी छवि खराब करने की कोशिश की जिन पर उन्हें खुद भी यकीन नहीं था। वही शख्स जिसे वो कभी 'अल-अमीन' कहते थे, अब वो उन्हें खुलेआम झूठा, काहिन, और जादूगर कहने लगे थे, माज़ल्लाह। आम तौर पर, किसी की छवि खराब करने का ये सबसे असरदार तरीका हो सकता था। मगर अब, सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता था। तो वो जो कर सकते थे वो था बस मोमिनों पर ज़ुल्म करना। वो इस सच्चाई से बेखबर थे कि इस्लाम उस सूरज की तरह है...

जिसे फूंक मारकर बुझाना, ना कुरैश के बस में था, और ना किसी और के। दिन-ब-दिन, उनके अपने ही लोग अंधेरों को छोड़कर रौशनी की तरफ जमा हो रहे थे। शुरुआती मुसलमानों को खतरे से बचाने के लिए, पहले तीन सालों तक, इस्लाम की दावत छुपकर, बंद दरवाज़ों के पीछे चलती रही। मगर छुपकर भी, एक ऐसी जगह की ज़रूरत थी जहाँ अल्लाह की आयतें सिखाई जा सकें और जहाँ मुसलमान इकट्ठा हो सकें। क्योंकि ऐसी जगह के बिना, नए मुसलमान अपना दीन कैसे सीखते? उन्हें एक मदरसे की, एक स्कूल की ज़रूरत थी, जहाँ वो अपना ईमान सीख सकें। मगर वो जगह कहाँ हो सकती थी?

वो अबू बक्र रज़ियल्लाहू अन्हु का घर नहीं हो सकता था क्योंकि उन्हें सब जानते थे। उनके यहाँ कोई भी आता तो फौरन नज़र में आ जाता। वो ज़ुबैर या तलहा का घर नहीं हो सकता था, और उस्मान का घर तो बिल्कुल भी नहीं। ये सब बहुत मशहूर नाम थे। इनके घरों में जाने से मुसलमान बड़ी मुसीबत में पड़ सकते थे। ये बहुत बड़ा जोखिम था। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दूसरी राहों पर भी गौर किया...

लेकिन हर वो रास्ता जिस पर उन्होंने सोचा, एक बंद गली पर जाकर ख़त्म होता नज़र आया। परिस्थितियाँ बहुत निराशाजनक थीं। सहाबा चाहते थे कि वो अपना दीन ज़्यादा वक्त तक और ज़्यादा आजादी से सीख सकें वो ईमान का इल्म हासिल करने के प्यासे थे,मगर वे मजबूर थे, और उन्हें कोई समाधान नहीं सूझ रहा था। ऐसे ही जब भी ऐसा लगता है कि‏ सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं, तब अल्लाह फिरऔन के महल के अंदर से ही मूसा को निकाल लाता है। और इस उम्मत का फिरऔन कौन था?

जैसा कि अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम ने फरमाया, वो अबू जहल था। तो उसके अपने ही परिवार से, अल्लाह ने एक नायक को खड़ा किया। वो समाधान कोई और नहीं बल्कि एक नौजवान थे, सिर्फ 17 साल की उम्र के अल-अर्कम इब्न अबी अल-अर्कम। वो मुसलमानों में से एक थे और अभी उनकी नई-नई शादी हुई थी। पूरे मक्का शहर में उनका घर सबसे खूबसूरत घरों में से एक था। अपने बड़े से हॉल, शांत बागीचे और बड़ी जगह के साथ, वो घर वाकई बहुत खूबसूरत था। और वो सफा पहाड़ी पर बना था, जिसका मतलब था कि वो नज़रों से दूर था और इसलिए सुरक्षित भी। उसमें वो सब कुछ था जिसकी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तलाश थी। ये जगह वो मदरसा बन सकती थी जिसकी उन्हें तलाश थी. मगर क्या अर्कम इसके लिए राजी होते?

ये बहुत बड़ा जोखिम होता। उन दिनों, जो कोई भी ऐसे काम के लिए अपना घर खोलता, वो फौरन पूरे मक्का के निशाने पर आ जाता। खास तौर पर अगर आपका एक रिश्तेदार अबू जहल' हो। आखिरकार, मूर्ति-पूजकों के लिए, उनके अपने रिश्तेदार ही अत्याचार करने के लिए सबसे आसान शिकार होते थे। और ये देखने के बाद कि वो बाहर मुसलमानों के साथ पहले ही क्या बर्ताव कर रहे थे, ये फैसला करना बिल्कुल भी आसान नहीं था। मगर फिर भी, अर्कम ने 'हाँ' कह दिया। अब ज़रा सोचिये। एक नई शादीशुदा ज़िंदगी वाला नौजवान। वो कह सकते थे, "मुझे बस अपनी पत्नी के साथ यहाँ सुकून की ज़िंदगी जीने दीजिये," मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने बिना झिझके वो जोखिम उठा लिया। और अपने दीन की खातिर, उन्होंने अपना घर खोल दिया। और उस दिन के बाद से, वो सिर्फ एक घर नहीं रहा। वो एक स्कूल बन गया। जिसे इतिहास में 'दार-ए-अर्कम' के नाम से जाना जाएगा। कई सच्चाइयां सीखी जाने वाली थीं, और कई अहम फैसले वहाँ लिए जाने वाले थे। अगर यसरिब को एक दिन मदीना बनना था, अगर इस्लाम को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचना था, तो उसकी नींव उसी जगह रखी जानी थी। वो हर एक खूबी जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनके सहाबा तलाश कर रहे थे, वो उसी घर में मौजूद थी। दूसरी तरफ, किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि अबू जहल के अपने ही परिवार का कोई व्यक्ति ऐसा कुछ करेगा। खास तौर पर 17 साल का एक लड़का। जब हम सहाबा के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर बुजुर्ग और गंभीर पुरुषों की कल्पना करते हैं। मगर हकीकत में, कई बड़े सहाबा नौजवान ही थे, बिल्कुल अर्कम रज़ियल्लाहू अन्हु की तरह। उदाहरण के लिए, जब उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया, अली सिर्फ 10 साल के थे। अब्दुल्लाह इब्न उमर 13 साल के थे। ज़ैद इब्न हारिसा 15 साल के थे। अब्दुल्लाह इब्न मसूद और ज़ुबैर इब्न अल-अव्वाम 16 साल के थे। तलहा इब्न उबैदुल्लाह, अब्दुर-रहमान इब्न औफ, अर्कम इब्न अबी अल-अर्कम, और साद इब्न अबी वक्कास 17 साल के थे। मुसअब इब्न उमैर 18 से 20 साल के बीच थे। और जाफ़र इब्न अबी तालिब 22 साल के थे। वो बिल्कुल भी बूढ़े नहीं थे। तीन साल तक, सहाबा कुरैश की नज़रों से बचकर दार-ए-अर्कम में इकट्ठा होते रहे, और उस दौरान, उन्होंने अपने दिलों को ईमान की सच्चाइयों से भर लिया। मगर क्या इस्लाम की दावत ऐसे ही चलती रहती, हमेशा छुपकर?

बिल्कुल नहीं। तब तक, कुरैश के बीच खबर फैल चुकी थी, और इसे छुपाए रखने की अब कोई वजह नहीं बची थी। इस सच्चाई को सब तक पहुँचाना ज़रूरी था ये गुप्त दावत से निकलकर खुलेआम दावत देने का वक्त था। मगर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शुरुआत कहाँ से करते? और कैसे?

तभी अल्लाह का हुक्म नाज़िल हुआ। "और अपने करीबी रिश्तेदारों को चेतावनी दो।" इस वही (ईश्वरीय संदेश) ने उनके दिल के बोझ को और भी भारी कर दिया। ये कोई आसान काम नहीं था। आप अजनबियों से कई बातें कर सकते हैं, मगर अपने रिश्तेदारों को अपनी बात सुनाना, ये सबसे मुश्किल कामों में से एक होता है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस ज़िम्मेदारी से इतने चिंतित हो गए कि वो कई दिनों तक अपने घर से नहीं निकले। रसूल अलैहिस्सलाम ने अपनी योजना बनाई। और अपने रिश्तेदारों को खाने पर इकट्ठा करने का वक्त आ गया। खाना तैयार किया गया, और अब्दुल मुत्तलिब के बेटे दावत खाने घर पर आए। लगभग 40 लोग जमा हुए, जिनमें अबू लहब भी शामिल था। फिर वो खाने के लिए बैठे। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने गोश्त का एक टुकड़ा काटा और कहा, "चलिए खाते हैं। बिस्मिल्लाह।" मगर उन्होंने खुद खाने को हाथ नहीं लगाया। वो अपनी बात कहने के लिए उन शब्दों को तौलते हुए सही मौके का इंतज़ार कर रहे थे, जो उन्हें कहने थे। जब सबने भरपेट खा लिया, तो जो उन्होंने देखा उससे वो हैरान रह गए। "क्या तुम वो देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ?" "हाँ। आखिर ये हुआ कैसे?" अभी-अभी बरकत का एक मोजिज़ा (चमत्कार) हुआ था। हालाँकि वो पेट भरकर खा चुके थे, मगर खाना बिल्कुल ऐसा लग रहा था, जैसे उसमें से एक निवाला भी ना लिया गया हो। अली, जो वहां मौजूद थे और उस वक्त सिर्फ 13 साल के थे, बाद में बताते थे, "जो खाना मैंने उन सबको परोसा, वो उनमें से कोई एक आदमी भी अकेला ही खा सकता था।" वो समझने की कोशिश कर रहे थे कि अभी हुआ क्या है। और जैसे ही रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बोलने वाले थे, अबू लहब ने बात काटी और चिल्लाया। "हमने ऐसा जादू पहले कभी नहीं देखा!" ये एक स्पष्ट मोजिज़ा था जो ठीक उनकी आंखों के सामने हो रहा था। मगर अबू लहब का दिल और दिमाग इसे समझने से कोसों दूर था। अल्लाह ने उनके पास एक नबी भेजा था। और ज़ाहिर है, लोगों को किसी तरह के सबूत की ज़रूरत थी। हर नबी की तरह, उन्हें भी मोजिज़े (चमत्कार) दिए जाने थे। उदाहरण के लिए, अगर अल्लाह सिर्फ़ उस एक बन्दे के लिए प्रकृति का कोई ऐसा नियम तोड़ दे जो उसने पहले कभी नहीं तोड़ा हो तो यह एक साफ़ प्रमाण होगा कि वो चुने हुए हैं और सच में अल्लाह की तरफ से भेजे गए हैं। इसीलिए मोजिज़े (चमत्कार) ज़रूरी थे। और उनकी नबूवत वाली ज़िंदगी में, कई और मोजिज़े (चमत्कार) होने वाले थे। मगर फिर भी, अबू लहब ने इस मोजिज़े (चमत्कार) को जादू के सिवा कुछ नहीं समझा। उसके शब्द सख्त से सख्त होते जा रहे थे। "मैंने कभी किसी को नहीं देखा जो अपने ही परिवार के लिए इतनी बुराई और मुसीबत लाया हो जैसी कि तुम लाए हो!" वो लगातार चुभने वाली बातें कहता रहा और वो सब कुछ करता रहा जो वो उस मौके को खराब करने के लिए कर सकता था। नतीजा यह हुआ कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बोलने का मौका ही नहीं मिल सका। और एक-एक करके, उनके रिश्तेदार खड़े हुए और खामोशी से घर से चले गए। ज़रा सोचिए। अल्लाह के इस हुक्म की वजह से, वो कई दिनों तक घर से नहीं निकले थे। मिली-जुली भावनाओं के साथ, उन्होंने अपनी तैयारी की थी। जो बात वो कहने वाले थे, उसके हर शब्द पर उन्होंने गौर किया था। मगर एक ही पल में, सब बिखर गया, अबू लहब की बातों से सब टूट गया। और बस ऐसे ही, ये लंबा और थका देने वाला दिन एक निराशाजनक अंत पर खत्म हुआ। अबू लहब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचाओं में से एक था। मगर आने वाले सालों में, वो इस्लाम के सबसे बड़े और कट्टर दुश्मनों में से एक होने वाला था। अल्लाह के रसूल, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, वो शख्सियत थे जो अपनी थकान के सबसे मुश्किल पलों में भी हमेशा उसी पक्के इरादे के साथ दोबारा उठ खड़े होते थे। उन्होंने निराशा को कभी अपने दिल में जगह नहीं बनाने दी। हर बार, वो खुद को संभालते और अपने रास्ते पर पहले से भी ज़्यादा मज़बूती के साथ आगे बढ़ते। बिल्कुल अगले ही दिन, उन्होंने अपने रिश्तेदारों को फिर से दावत दी। जैसे ही मेहमान आने शुरू हुए, अबू लहब भी आ धमका। मगर इस बार, रसूलुल्लाह पूरी तरह चौकन्ने थे। वो बैठे और उन्होंने खाना खाया। और फिर वो घड़ी आ गई। इससे पहले कि अबू लहब एक शब्द भी बोल पाता, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खड़े हुए और फरमाने लगे। अब चलिए हम खुद वहीं होने की कल्पना करते हैं, और अपने आप को उस महफ़िल में मौजूद लोगों में से एक मानते हैं। "सारी तारीफ और शुक्र सिर्फ अल्लाह के लिए है। और मैं भी उसी की हम्द और शुक्र करता हूँ। मैं सिर्फ उसी से मदद मांगता हूँ। मैं उस पर ईमान रखता हूँ और उसी पर भरोसा करता हूँ। मैं आप सबसे पूरे यकीन के साथ एलान करता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। वो अकेला है, और उसका कोई साझी या बराबर नहीं।" ये बातें कहने के बाद, उन्होंने अपना मक़सद इस तरह समझाया: "बेशक, वो शख्स जिसे अपनी कौम का मार्गदर्शन करने भेजा गया हो...

वो अपने ही लोगों को कभी धोखा नहीं देगा। अल्लाह की कसम, अगर मैंने पूरी दुनिया से भी झूठ बोला होता, तो भी मैं आपसे कभी झूठ नहीं बोलता। अगर मैंने सब लोगों को धोखा दिया होता, तो भी मैं आपको कभी धोखा नहीं देता। मैं आपको अल्लाह पर ईमान लाने की दावत दे रहा हूँ, जो एक और अकेला माबूद (पूज्य) है। और मैं उसका रसूल हूँ, जिसे खास आपके और पूरी इंसानियत के पास भेजा गया है।" उन्होंने अपने पैगाम का निचोड़ बताया और फिर आगे फरमाया: "अल्लाह की कसम, जैसे आप सब सो जाते हैं, वैसे ही आप मर जाएंगे। और जैसे आप जागते हैं, वैसे ही आप दोबारा ज़िंदा किए जाएंगे। और आपसे हर उस चीज़ का हिसाब लिया जाएगा जो आपने की है। जो भलाई करेंगे उन्हें भलाई का बदला मिलेगा, और जो बुराई करेंगे उन्हें उसी के मुताबिक सज़ा मिलेगी।" वो जो भी शब्द बोल रहे थे सीधे दिल से निकल रहे थे। उन्होंने जन्नत और जहन्नम की बात की, और अपनी बात को इसी तरह जारी रखा। आखिरकार, उन्होंने अपने रिश्तेदारों को इस्लाम कबूल करने की दावत दी। उन्होंने फरमाया: "मैं आप सबको दो ऐसे कलमे की दावत देता हूँ जो ज़ुबान पर हल्के हैं मगर तराजू में भारी हैं। अश-हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह, व अश-हदु अन्ना मुहम्मदन रसूलुल्लाह। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके रसूल हैं।" फिर उन्होंने पूछा, "तो, आप में से कौन है जो मेरी पुकार का जवाब देगा और मेरा मददगार और साथी बनेगा?" मगर वहां सन्नाटा छाया हुआ था। किसी ने अपना सर नहीं उठाया। एक भी आवाज़ सुनाई नहीं दी। फिर, सिर्फ 13 साल का होने के बावजूद, एक बहादुर आवाज़ ने खामोशी तोड़ी। वो अली की आवाज़ थी। "ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, भले ही मैं इन सब में सबसे छोटा हूँ, मगर मैं आपकी मदद करूँगा।" नबी अलैहिस्सलाम ने दोबारा पूछा। मगर उन 40 लोगों की तरफ़ से, कोई दूसरा जवाब नहीं आया। हर कोई इंतज़ार कर रहा था कि देखें शायद कोई और आगे आए। उन्होंने तीसरी बार पूछा। "आप में से कौन मेरी पुकार का जवाब देगा और मेरा मददगार और साथी बनेगा?" उन्हें उम्मीद थी कि कोई और आवाज़ आएगी। मगर हर बार, सिर्फ अली ही थे जिन्होंने अपना हाथ उठाया। मगर वो एक हाथ, अकेला होकर भी काफी था। वही वो हाथ था जिसकी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ज़रूरत थी। बेशक, अगर आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी देखें, तो आप पायेंगे कि जब भी कोई ज़रूरत पड़ी, तो वो अक्सर अली ही थे जो आगे आए। तो, क्या परिवार में से किसी और ने जवाब नहीं दिया?

उस रात, एक लंबी बातचीत हुई, मगर दो खास रवैये थे जो सबसे अलग थे: अबू तालिब का और अबू लहब का। वो दोनों उनके चाचा थे, मगर उनकी प्रतिक्रिया बिल्कुल उलट थी। अबू लहब का रवैया नहीं बदला। उसने कहा: "ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटों! कसम से यह बुराई है! इससे पहले कि दूसरे लोग उसे हाथों से पकड़ें और रोकें, तुम्हें उसके हाथ पकड़ने चाहिए और उसे खुद रोकना चाहिए! अगर आज तुमने इसकी बात मानी, तो तुम्हें अपमान और रुसवाई झेलनी पड़ेगी! और अगर तुमने इसे बचाने की कोशिश की, तो तुम मारे जाओगे!" वो दावत को खराब करने की कोशिश कर रहा था। मगर उसके सामने अबू तालिब खड़े थे। वो उसकी बातों पर बहुत गुस्सा थे। "ओ बुजदिल! अल्लाह की कसम! जब तक हम ज़िंदा हैं, हम इनकी मदद करेंगे और इनकी हिफाज़त करेंगे!

ऐ मेरे भतीजे, जब तुम लोगों को दावत देना चाहो, हमें बता देना और हम हथियार लेकर तुम्हारे साथ निकलेंगे!" हालाँकि, अबू तालिब की मदद ईमान के ताज से नहीं सजी थी। उन्होंने कहा...

"मैं खुद को अब्दुल मुत्तलिब का दीन छोड़ने के लिए राज़ी नहीं कर पा रहा हूँ। इसलिए मैं उसी दीन पर मरूँगा जिस पर वो मरे थे।" तो रसूलुल्लाह को वो नतीजा नहीं मिला जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी, और मेहमान खामोशी से चले गए। कोई दूसरा रास्ता होना चाहिए था। वो निराशा को जीतने नहीं दे सकते थे। चाहे लोग इसे कबूल करें या ना करें, उनका काम साफ़ था: चेतावनी देना, दावत देना, और जो कुछ भी वो कर सकते थे करना ताकि पैगाम पहुँचाया जा सके। उन्हें बस एक उपाय (तरीका) चाहिए था, मक्का के लोगों को एक जगह इकट्ठा करने का और उन्हें अपनी बात सुनाने का उन्होंने बहुत विचार किया, और आखिरकार, उन्हें वो तरीका मिल गया। एक दिन, मक्का में एक तेज़ आवाज़ गूंजी। "या सबाहा! या सबाहा!" (हाय सुबह की आफत!) वो आवाज़ क्या थी?

वो सफा पहाड़ी से आ रही थी। लोग ये देखने के लिए बाहर दौड़े कि आखिर हो क्या रहा है। देखते ही देखते, एक बड़ी भीड़ जमा हो गई। वहां कुरैश के हर कबीले के लोग मौजूद थे। मगर ऐसी क्या ख़ास बात थी जिसने इतने सारे लोगों को इकट्ठा कर दिया था? इस पुकार का क्या मतलब था?

यह एक तरह का 'खतरे का संकेत' (Emergency Signal) था। जब मक्का के लोग इसे सुनते, तो वो समझ जाते कि कुछ बहुत अहम हुआ है। कोई ज़रूरी खबर है। जब वो जमा हुए, तो उन्होंने देखा कि ये रसूल अलैहिस्सलाम थे जो पुकार रहे थे। अबू लहब भी वहां था। और हर कोई सोच रहा था कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क्या कहेंगे। फिर उन्होंने अपनी वो यादगार और मशहूर बात कही। "अगर मैं आपसे कहूँ कि इस पहाड़ के पीछे या उस घाटी में दुश्मन के घुड़सवार हैं और वो आप पर सुबह या शाम हमला करेंगे, तो क्या आप मेरा यकीन करेंगे?" उन सबने एक सुर में कहा, "हाँ, हम आपका यकीन करेंगे।" फिर उन्होंने फरमाया, "तो जान लो कि मैं यहाँ आपको एक बड़े अज़ाब की चेतावनी देने आया हूँ जो आपके सामने हैं। अल्लाह ने मुझे हुक्म दिया है कि मैं अपने करीबी रिश्तेदारों को आखिरत के अंजाम से सचेत करूँ। मैं आपको ये गवाही देने की दावत देता हूँ कि 'अल्लाह एक है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं।' मैं उसका बंदा और उसका रसूल हूँ। अगर आप मेरी बात मान लें, तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आप जन्नत में दाखिल होंगे। और ये भी जान लीजिए: जब तक आप ये नहीं कहते कि 'अल्लाह एक है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं,' मैं ना तो दुनिया में आपकी कोई मदद कर सकता हूँ और ना ही आखिरत में।" अबू लहब गुस्से से पागल हो गया। वो इस दावत को अपने परिवार के बीच भी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। और अब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सारे कुरैश को संबोधित कर रहे थे। उसने जो अगला काम किया वो हद पार करने वाला था। एक बार फिर, उसने इस्लाम के पैगाम को फैलाने से रोकने की कोशिश की। उसने गुस्से में झुककर ज़मीन से कुछ उठाया, और उसे अपने भतीजे की तरफ फेंका, और चिल्लाया, "तेरे हाथ बर्बाद हों!

क्या इसी के लिए तूने हमें यहाँ बुलाया था?" उसने जो फेंका वो दरअसल अल्लाह के दीन पर फेंका गया था, खुद वही (ईश्वरीय संदेश) पर। वो कड़वे शब्द उस पुकार के जवाब में कहे गए थे जो रहम से भरी थी, और हमेशा रहने वाली जन्नत की दावत थी। क्या आप सोच सकते हैं कि ये नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए कितना तकलीफदेह रहा होगा?

उनके अपने चाचा, वो जिससे उन्हें सबसे ज़्यादा मदद की उम्मीद थी, वही उनके साथ ऐसा बर्ताव कर रहा था। उस पल के बाद से, अबू लहब और उसकी पत्नी दोनों अपनी पूरी ज़िंदगी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तकलीफ देने में गुज़ार देंगे। उस हरकत से, उसने अपनी किस्मत पर मोहर लगा दी। तब सूरह अल-लहब (अल-मसद्) नाज़िल हुई और उसके भयानक अंजाम की खबर दी। इस सूरह में, अल्लाह ने फरमाया: "अबू लहब के दोनों हाथ बर्बाद हो गए और वो खुद बर्बाद हो गया। ना तो उसका माल उसके काम आया और ना वो जो उसने कमाया। वो जल्द ही भड़कती हुई आग में दाखिल होगा। और उसकी पत्नी भी, जो ईंधन उठाती फिरती है। उसकी गर्दन में मूंज की रस्सी होगी।" इन आयतों ने ये बिल्कुल साफ़ कर दिया कि वो जहन्नम में जाएगा। मतलब कि वो कभी ईमान नहीं लाएगा। दरअसल, अगर आप इसे बाहर से देखें, तो ये बहुत बड़ा जोखिम (रिस्क) लग रहा था। क्योंकि अगर अबू लहब ईमान ले आता, तो ये आयतें गलत साबित हो जातीं। अगर वो ईमान लाने का दिखावा भी करता, तब भी वही नतीजा होता। चाहे वो इस्लाम पर सच्चा यकीन करता या सिर्फ इसे गलत साबित करना चाहता, उसे बस इतना कहना था, "मैं ईमान लाता हूँ।" तो क्या हुआ?

इस सूरह के नाज़िल होने के बाद, वो सात साल और ज़िंदा रहा। मगर उसकी नफरत कभी कम नहीं हुई। वो कुफ़्र की हालत में ही मरा। अबू लहब इस्लाम से नफरत करता था और इस दीन को नुकसान पहुँचाने के लिए कुछ भी कर सकता था। तो उसे इतने सुनहरे मौके का फायदा उठाने से किसने रोके रखा? और इससे बढ़कर, अगर रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पैगाम झूठा होता, कुछ मनगढ़ंत होता, तो वो इतना बड़ा जोखिम कैसे ले सकते थे?

जवाब सीधा था। अल्लाह ने ऐसा ही चाहा था। वही है जो भूत, भविष्य और उनके बीच का सब कुछ जानता है। तो एक मोजिज़े के तौर पर, उसने उस खौफनाक अंजाम को उसके होने से पहले ही ज़ाहिर कर दिया जो अबू लहब अपने लिए लाने वाला था। और रसूल अलैहिस्सलाम ने, बिना ज़रा भी झिझके ये पैगाम पहुँचा दिया क्योंकि उन्हें इसे नाज़िल करने वाले पर भरोसा था। मगर अबू लहब ये महसूस भी नहीं कर पाया। रसूल अलैहिस्सलाम की बातों का किसी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने कुछ ऐसा सुना था जो हर उस चीज़ से बिल्कुल अलग था जो उन्होंने पहले कभी सुनी थी। और फिर भी, उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस आपस में कानाफूसी की और चले गए। उस दिन के बाद से, इस्लाम की दावत अब गुप्त नहीं रही। सार्वजनिक दावत का दौर शुरू हो चुका था। यह एक अहम मोड़ था। रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम, एक ऐसा पैग़ाम पहुँचा रहे थे जो हमेशा रहने वाली खुशियों की तरफ़ ले जाता है, सिर्फ़ उनके अपने कबीले के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए। मगर इसकी क़ीमत कम नहीं थी। उन्हें अंतहीन अपमान, ज़ुल्म, अत्याचार और झूठ का सामना करना था। उन्हें उन्हीं लोगों से हर तरह की बेरहमी सहनी थी, जिन्हें वो हमेशा की बर्बादी से बचाने की कोशिश कर रहे थे। हीरे और कोयले, सोने और तांबे को अब एक दूसरे से अलग किया जाने वाला था। ये उन्हीं दिनों की बात है। रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम, काबा के सामने नमाज़ पढ़ रहे थे। उनके आस-पास लोग नफ़रत और गुस्से से भरी नज़रों से उन्हें देख रहे थे। उनके मज़ाक और तानों को नज़रअंदाज़ करते हुए, वो नमाज़ पढ़ते रहे। मगर वो नज़रें उस भयानक चीज़ का इशारा थीं जो होने वाली थी। वो सजदे में थे, शायद अपने सबसे सुकून भरे पलों में से एक में। मगर बेरहम मूर्ति-पूजकों को वो मौक़ा मिल गया था जिसकी उन्हें तलाश थी। जब रसूल अलैहिस्सलाम इस बात से बेख़बर थे कि क्या होने वाला है, उन्होंने ऊंट की ओझड़ी सीधे उनके कंधों पर डाल दी। जलती हुई धूप में, वो गंदी बदबू और भी बर्दाश्त से बाहर हो गई। उन्हें सांस लेना मुश्किल हो रहा था। अबू जहल ज़ोर-ज़ोर से हंस रहा था। ये उसी की साज़िश थी। ऐसे घिनौने तरीके का इस्तेमाल करके, उसने उस सच्चाई को अपमानित करने की कोशिश की थी जिसे वो तर्क से नहीं हरा सका था। सांस लेने में इतनी तकलीफ़ के बावजूद, वो क्या था जिसने अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम को अपनी नमाज़ तोड़ने से रोके रखा?

जब उनके आस-पास मूर्ति-पूजक हंस रहे थे और उनका मज़ाक उड़ा रहे थे, तो किस चीज़ ने उन्हें अपनी नमाज़ जारी रखने की ताक़त दी? क्या वो वही शख़्स नहीं थे जो कुछ साल पहले तक कुरैश के बीच बेहद सम्मानित थे? वो क्या था जिसने उन्हें जोखिम उठाने की ताक़त दी? इतने अपमानों के बावजूद, वो क्या था जिसने उन्हें इतना अटल बनाए रखा? थोड़ी देर बाद, उनकी बेटी फ़ातिमा, जो उस वक़्त बहुत छोटी थीं, उन्होंने उन्हें उस हाल में देखा। वो घबरा गईं, वो चिल्लाईं, "अबाति, अबाति!

(मेरे प्यारे बाबा, मेरे प्यारे बाबा!)" उनका नन्हा सा दिल इस दृश्य से बुरी तरह दहल गया था। वो आंखों में आंसू लिए अपने पिता की तरफ़ दौड़ीं। उन्होंने उनके कंधों से वो गंदगी हटाने की कोशिश की और उन्हें साफ़ करने लगीं। फिर वो उन बेरहम आदमियों पर गुस्से से चिल्लाईं और उन्हें सख़्त बातें सुनाईं। "मुहम्मद ने हमारा नाम लिया और हमें बद-दुआ दी! क्या होगा अगर अल्लाह उनकी दुआ क़ुबूल कर ले और हमें तबाह कर दे?" कोई भी बच्चा अपने पिता को इस भयानक हाल में नहीं देखना चाहेगा। रसूल अलैहिस्सलाम एक आम, आरामदेह ज़िंदगी गुज़ार सकते थे। तो उन्होंने ये सारा दर्द सहना क्यों चुना?

हाँ, वो कोई ऐसे शख़्स नहीं थे जिन्हें अल्लाह कभी व्यर्थ होने देता। सारे सवालों का जवाब बस एक ही था— उनके मक़सद की सच्चाई और समर्पण। काबा ऐसे अत्याचारों का गवाह बन रहा था। बावजूद इसके कि वो वहीं था, बस कुछ ही क़दम की दूरी पर, मुट्ठी भर सहाबा अब भी वहां खुलकर इबादत नहीं कर सकते थे। और जो जाने की हिम्मत करते, उन्हें उन ख़तरों के लिए तैयार रहना पड़ता था जो उनके रास्ते में आते। वो जानते थे कि उनकी तादाद कम है। वो ख़तरे को महसूस करते थे। फिर भी, वो सबके सामने हक़ की आवाज़ बुलंद करना चाहते थे। जिस दिल में ईमान की रोशनी हो, उसके लिए ख़ामोश रहना और कुछ ना करना मुमकिन ही नहीं था। ख़ास तौर पर अगर वो दिल नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के किसी सहाबी का हो। एक दिन, उन्होंने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काबा के पास जाने के लिए मना लिया, और वो बैठ गए। इस्लाम के दुश्मनों का एक गिरोह भी वहां मौजूद था। ये एक ख़तरनाक पल था। मगर अबू बक्र उन गहरी सच्चाइयों को रोक नहीं पाए जो उनके दिल में उतर चुकी थीं। वो अपनी बात कहने की तड़प को रोक ना सके। वो दूसरे गिरोह की तरफ़ मुड़े और ऊंची आवाज़ में बोलने लगे। उन्होंने अल्लाह पर ईमान लाने की बड़ाई बयान की और बताया कि मूर्तियों को पूजने का कोई मतलब, कोई फ़ायदा नहीं है। इन बातों ने मूर्ति-पूजकों को बहुत ज़्यादा भड़का दिया। उनके दिल पहले ही नफ़रत और गुस्से से भरे हुए थे। देखते ही देखते, वो अब और ज़्यादा बर्दाश्त नहीं कर सके और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का घोर अपमान करने लगे। मगर ये उनके लिए काफ़ी नहीं था। वो अपना गुस्सा निकालने के लिए अबू बक्र पर टूट पड़े। उन्होंने उन्हें घेर लिया और हमला शुरू कर दिया। एक के बाद एक वार किए और उन्होंने उन्हें बुरी तरह पीटा। बात यहाँ तक पहुँच गई कि जब वो ज़मीन पर गिर गए, तो उत्बा इब्न रबीआ उनके ऊपर चढ़ बैठा और अपने सख़्त जूते पहने पैरों से उनके सर पर मारने लगा। मगर उसके लिए इतना भी काफ़ी नहीं था। थोड़ा भी रहम ना दिखाते हुए, उसने अबू बक्र रज़ियल्लाहू अन्हु के चेहरे को ज़मीन पर रगड़ दिया। उनका चेहरा ख़ून और रेत से भर गया था। वो मरने के बिल्कुल क़रीब थे। उस भयानक मार-पीट से, वो ख़ून में लथपथ होकर बेहोश हो गए। वो उनसे सिर्फ़ अपने कबीले, 'बनू तैम' के कुछ लोगों की मदद के कारण बच पाए। उन्हें उनके घर ले जाया गया। उन्हें देर शाम तक होश नहीं आया। इतना सब कुछ सहने के बावजूद, उनके पहले शब्द (अल्फ़ाज़) थे: "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कहाँ हैं?

वो कैसे हैं?" जैसे कि वो मार उस दिन उन्होंने नहीं खाई थी। जैसे कि उन्हें कुछ हुआ ही नहीं था। उन्हें सिर्फ़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फ़िक्र थी। वो उन तानों के बारे में सोच रहे थे जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मारे गए थे। वो सोच रहे थे कि कहीं क़ुरैश ने उनके साथ कुछ किया तो नहीं। वो ख़ुद ख़ून और ज़ख़्मों से ढके हुए थे। मगर जब लोगों ने उनसे कहा, 'आप भूखे और प्यासे हैं। क्या कुछ खाएंगे या पिएंगे नहीं?' उन्हें यह सुनने के सिवा किसी चीज़ की परवाह नहीं थी कि अल्लाह के रसूल सुरक्षित हैं। "नहीं, मैं तब तक कुछ नहीं खाऊंगा और पानी की एक बूंद भी नहीं पिऊंगा जब तक मैं रसूल अलैहिस्सलाम के बारे में ना सुन लूँ।" उन दिनों की एक और मिसाल अब्दुल्लाह इब्न मसूद हैं। कुछ सहाबा बहुत उदास थे और इस बात की शिकायत कर रहे थे कि क़ुरैश के सामने क़ुरआन की तिलावत खुलेआम नहीं हो रही थी। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सिवा किसी ने भी ऊंची आवाज़ में क़ुरआन नहीं पढ़ा था। वो सोचते थे कि अगर इसे सबके सामने पढ़ा जाए, तो शायद उनके दिल बदल जाएं। शायद ये मुश्किल दिन ख़त्म हो जाएं। शायद वो आख़िरकार सच्चाई को देख सकें। वो वाक़ई चाहते थे कि ऐसा हो। मगर ऐसा करने की हिम्मत कौन करता?

क़ुरैश का रवैया साफ़ था। इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी कि जो शख़्स तिलावत करेगा वो हमले से बच पाए। जान से मार दिया जाना तय था। जब वो इस बारे में बात कर रहे थे, तो इब्न मसूद शायद उन सब में सबसे कमज़ोर थे। वो अभी नौजवान ही थे। यह अच्छी तरह जानते हुए कि क्या होगा, वो आगे बढ़े और बोले, "ये काम मैं करूँगा।" मगर उनके साथियों ने उन्हें सख़्ती से मना किया। क्योंकि जब क़ुरैश हमला करना चाहें, तो उसे रोकने के लिए किसी ऐसे शख़्स का होना ज़रूरी था जिसका ख़ानदान ताक़तवर हो। मगर अब्दुल्लाह इब्न मसूद के पास ऐसी कोई हिफ़ाज़त नहीं थी। फिर भी, वो यह ज़िम्मा उठाने को तैयार थे। ऐसा कोई नहीं था जिसका सामना करने से वो डरते। फिर अगला दिन आया। वो सच्चाई का ऐलान करने के लिए और इंतज़ार नहीं कर सकते थे। हर चीज़ के बावजूद, उन्हें अब भी उम्मीद थी कि शायद एक और दिल इस्लाम के लिए खुल जाए। शायद बस एक और इंसान सच्चाई को अपना ले। अगर वो सिर्फ़ एक इंसान भी होता, तो भी यह छोटी बात नहीं थी। उस एक रूह के लिए, वो यह जोखिम उठाने को तैयार थे। वो काबा की तरफ़ बढ़े और उन्होंने ऊंची आवाज़ में तिलावत की, "बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम (अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है)।" फिर उन्होंने सूरह अर-रहमान की तिलावत शुरू की। "अर-रहमान (बेहद रहम करने वाला)। अल्ल-मल क़ुरान (जिसने क़ुरान सिखाया)। ख़लकल् इंसान (इंसान को पैदा किया)। अल्ल-महुल बयान (और उसे बोलना सिखाया)।" वो तिलावत, वो अल्फ़ाज़...

ये कुछ ऐसा था जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुना था। मगर फिर भी, क़ुरआन की वो बातें अनसुनी नहीं लग रही थीं। क़ुरैश के सरदार समझ गए कि यह क़ुरआन है। और वो फ़ौरन अब्दुल्लाह इब्न मसूद की तरफ़ लपके। कहीं लोग ये आयतें सुन न लें, क्योंकि अगर उन्होंने सुन लिया, तो उनके दिल पिघल जाएंगे। यहाँ तक कि क़ुरैश ख़ुद भी क़ुरआन की उन बातों का अपनी रूह पर होने वाला गहरा असर रोक नहीं पा रहे थे। वो दूसरे लोगों को ये कैसे समझाते जब वो ख़ुद अपने ही मन की कशमकश से जूझ रहे थे?

इब्न मसूद को मूर्ति-पूजकों ने घेर लिया था। बार-बार मार खाने के बावजूद, वो रुकना नहीं चाहते थे। उन ईश्वरीय बातों में, एक के बाद एक, अल्लाह की नेमतों का ज़िक्र था। और फिर वो आयतें आईं। "फ़-बि अय्यि आला-इ रब्बिकुमा तुकज़्ज़िबान?" उस मार-पीट के बीच, अब्दुल्लाह हक़ की आवाज़ बुलंद कर रहे थे। वो लम्हा, वो मंज़र, एक साफ़ तस्वीर थी कि क़ुरैश कितने बेबस थे। वो आयतें पढ़ते रहे "फ़-बि अय्यि आला-इ रब्बिकुमा तुकज़्ज़िबान?" जब तक कि मजबूरन चुप नहीं हो गए। जब ये सब ख़त्म हुआ, तो अपने उन साथियों को जो उनके लिए उदास और फ़िक्रमंद थे, उनका जवाब ये था: "मेरी नज़रों में इस वक़्त, अल्लाह का कोई दुश्मन ऐसा नहीं जो उन लोगों से ज़्यादा कमज़ोर और उनसे ज़्यादा ज़लील हो। अगर तुम चाहो, तो मैं कल फिर वापस जा सकता हूँ और उन्हें क़ुरआन सुना सकता हूँ, बिल्कुल वैसे ही जैसे मैंने आज किया।" क़ुरैश चाहे जो भी करते, अगले दिन, उन्हें मुसलमान हमेशा पहले से भी ज़्यादा मज़बूत खड़े मिलते। एक भी मोमिन अपने ईमान से नहीं फिरा। और रसूल अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने अपने मिशन को कभी नहीं छोड़ा। अकेले में या साथ में, क़ुरैश बस अपने आप से यही पूछते रहते: "आख़िर वो क्या चीज़ है जो मुहम्मद को इस पैग़ाम से रोक सके?

इसे कौन ख़त्म कर सकता है?

हमने जो भी कोशिश की वो काम क्यों नहीं आई?" जब ये सारे सवाल उनके दिमाग में घूम रहे थे, तो एक नाम सामने आया। एक ऐसा नाम जिस पर वो सब सहमत थे। अगर कोई था जो रसूल अलैहिस्सलाम का इरादा बदल सकता था, तो वो वही थे। वो शख़्स जिसने उन्हें बचपन से लेकर 30 साल से ज़्यादा समय तक एक पिता की तरह पाला था। उनके चाचा, अबू तालिब। अबू तालिब मक्का के सबसे सम्मानित लोगों में से एक थे। वो बुज़ुर्ग थे, और हालाँकि उनके पास बहुत दौलत नहीं थी, फिर भी लोग उनका सम्मान करते थे और उनकी बात सुनते थे। उन्होंने इस्लाम क़बूल नहीं किया था, मगर अपने भतीजे के साथ उनका रिश्ता गहरा था, जो दशकों की मुहब्बत, समर्पण और आपसी सम्मान से बना था। ये पहली बार नहीं था कि क़ुरैश उनके पास इस बारे में बात करने आए थे। पिछली बार, अबू तालिब ने बहुत विनम्रता से जवाब दिया था। उन्होंने उन्हें शांत किया था और प्यार से वापस भेज दिया था। मगर इस बार, वो बहुत ज़्यादा गंभीर थे। वो उनके पास एक साफ़ मांग लेकर आए थे: कि नबी को उनका मिशन छोड़ने पर मजबूर करें। "ऐ अबू तालिब!

आप हमारे बड़ों में से हैं, हमारे सरदारों में से हैं। हम पहले भी आपके पास आए थे और आपसे अपने भतीजे को रोकने के लिए कहा था, मगर आपने वो नहीं किया जो हमने कहा। हमें बेवकूफ़ कहना और हमारे देवी-देवताओं का अपमान करना...

या तो आप उन्हें रोकें, वरना हम आप दोनों से तब तक लड़ेंगे जब तक कि हम में से कोई एक मिट नहीं जाता।" उनकी धमकियों ने बुज़ुर्ग अबू तालिब को हिला कर रख दिया। इस बार, वो बहुत ज़्यादा सख़्त और पक्के इरादे में थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इन लोगों के बीच गुज़ारी थी। वो उनकी इज़्ज़त करते थे, और उनकी साख बरसों में बनी थी। उन्हें उनके साथ जुड़े रहने का गहरा अहसास था। और अपने ही लोगों द्वारा त्यागे जाने का ख़्याल तकलीफ़देह था। मगर दूसरी तरफ़ उनका भतीजा था। वो जिसे वो अपने बच्चों से भी ज़्यादा प्यार करते थे। और वो उनसे मुंह भी नहीं मोड़ सकते थे। वो दुविधा में फंसे हुए और परेशान थे। उनका दिल भारी हो गया। काफ़ी सोचने के बाद, उन्होंने रसूल अलैहिस्सलाम को बुलाया और कहा: "मेरे प्यारे भतीजे, कबीले के प्रमुख लोग मेरे पास आए थे। मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि मुझ पर और ख़ुद पर रहम करो। हम पर ऐसा बोझ मत डालो जिसे हम में से कोई उठा ना सके। मेहरबानी करके, ऐसी बातें कहना बंद कर दो जिससे लोग नाराज़ होते हैं।" उनके चाचा की बातों ने नबी, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, को एक पल के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया। परिस्थितियाँ सच में बहुत मुश्किल थीं। जो मज़बूती अबू तालिब ने तब दिखाई थी जब रसूल अलैहिस्सलाम ने अपने रिश्तेदारों को खाने पर बुलाया था, वो अब कमज़ोर पड़ चुकी थी। उस पल तक, अबू तालिब ही थे जो अपने कबीले में उनकी हिफ़ाज़त कर रहे थे। अब, क्या वो भी उनसे मुंह मोड़ लेंगे?

क्या वो भी उन्हें अकेला छोड़ देंगे?

हालाँकि ये बातें उनके दिल पर भारी और परेशान करने वाली थीं, अल्लाह के रसूल अलैहिस्सलाम को मालूम था कि उनका सच्चा रक्षक सिर्फ़ एक ही है। अल्लाह, जो आसमानों और ज़मीन का रब है। अगर पूरी दुनिया भी उनसे मुंह मोड़ लेती, तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता। आख़िरकार, रसूल अलैहिस्सलाम को पता था कि सब कुछ उसी की मर्ज़ी से होता है, और उसकी इज़ाज़त के बिना कुछ भी नहीं होता। यह अल्लाह का दीन था, और यह किसी इंसान पर निर्भर नहीं था। अल्लाह इसे जिसके ज़रिए चाहे, जैसे चाहे मज़बूत कर सकता था। ये ठीक वही पल था जब रसूल अलहिस्सलातु वस्सलाम ने वो यादगार बातें कहीं। "मेरे प्यारे चाचा, जान लीजिये। अगर वो मेरे दाएं हाथ में सूरज और मेरे बाएं हाथ में चाँद भी रख दें, तब भी मैं इस दीन को, इस मक़सद को कभी नहीं छोड़ूँगा। या तो अल्लाह इस दीन को ग़ालिब (विजयी) करेगा, या मैं इसके लिए अपनी जान दे दूंगा।" जब उन्होंने ये शब्द कहे, उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उनके चाचा का उन्हें अकेला छोड़ना उनके लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। मगर उनका फ़ैसला अटल था। वो खड़े हो गए। और जैसे ही वो जाने के लिए मुड़े, उनकी स्पष्टता और पक्के इरादे ने अबू तालिब के दिल पर गहरा असर डाला। रसूल अलैहिस्सलाम की हिम्मत ने उन्हें प्रभावित किया और उन्हें भी खड़े होने की ताक़त दी। "मेरे भाई के बेटे, तुम जो कर रहे हो उसे करते रहो। जो चाहो वो करो। अल्लाह की क़सम, मैं तुम्हें किसी भी वजह से कभी किसी के हवाले नहीं करूँगा।" और एक बार फिर, मूर्ति-पूजकों की कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकला। निकलता भी कैसे?

वो मौत से ज़रा भी नहीं डरते थे। वो उनकी धमकियों को उन्हीं के मुंह पर मार रहे थे। जब उन्होंने कहा, "अगर वो मेरे दाएं हाथ में सूरज और बाएं हाथ में चाँद भी रख दें," वो सिर्फ़ कह नहीं रहे थे। आसमान और ज़मीन उनकी सच्चाई और ईमानदारी के गवाह थे। अबू तालिब के पास आने के अलावा, क़ुरैश ने नबी अलैहिस्सलाम को हर तरह के प्रलोभन (लालच) दिए। उन्होंने यह प्रस्ताव दिया: "अगर आप दौलत चाहते हैं, तो हम आपको अपने पास से इतना देंगे कि आपके पास हम सबसे ज़्यादा हो जाएगा। अगर आप बड़ा पद और इज़्ज़त चाहते हैं, तो हम आपको अपने से बड़ा मान लेंगे। हम आपके हुक्म को कभी नहीं टालेंगे। अगर आप वाक़ई बादशाह बनना चाहते हैं, तो हम आपको अपना बादशाह बना लेंगे।" मगर उन्होंने जो भी प्रस्ताव दिया, रसूल अलैहिस्सलाम ने उन सब को ठुकरा दिया। अगर वो वाक़ई झूठ बोल रहे होते, जैसा कि वो मानते थे, तो उन्होंने उन प्रस्तावों को क्यों नहीं माना?

इसमें उनका निजी फ़ायदा कहाँ था? मुसीबत और मुश्किलों के अलावा उनके हाथों में क्या था? सच्चाई साफ़ थी। क़ुरआन की आयतें और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बर्ताव दिन-ब-दिन काफ़िरों पर असर कर रहा था। वो जिस रास्ते पर चल रहे थे, उस पर उनका भरोसा कमज़ोर हो रहा था। फिर भी, वो किसी भी क़ीमत पर सच्चाई मानने से इनकार कर रहे थे। मगर वो क्या था जिसने उन्हें इस हद तक सच्चाई को झुठलाने पर अड़ा रखा था? किस चीज़ ने उन्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मज़ाक उड़ाने और उनकी बातों को नकारने पर मजबूर किया? जब क़ुरआन पढ़ा जाता था, तो वो अपने कानों में उंगलियाँ क्यों ठूँस लेते थे? किस चीज़ ने उन्हें रोशनी के लिए अपनी आंखें इतनी सख़्ती से बंद करने पर मजबूर किया?

इस सब की जड़ में उनका गुरूर और अहंकार था। ज़रा सोचिए। अगर वो इस दीन को क़ुबूल कर लेते, तो उन्हें यह मानना पड़ता कि वो जो बरसों से करते आ रहे थे, वो सब ग़लत था। और बड़े अहंकार वाले शख़्स के लिए, अपनी ग़लतियाँ मानना, ख़ास तौर पर इतने अहम मसले पर, बिल्कुल भी आसान नहीं था। वो यह भी नहीं मानना चाहते थे कि उनके पूर्वजों ने मूर्तियों को पूज कर ग़लती की थी, जैसा कि वो कर रहे थे। तो उनका गुरूर सिर्फ़ अपने लिए नहीं था। ये उनके पूर्वजों के तरीकों को बचाने के लिए भी था। याद है जब वो अबू तालिब के पास आए थे तो उन्होंने क्या कहा था?

"ये हमारे पूर्वजों के ख़िलाफ़ बोलता है और हमें बेवकूफ़ बताता है।" बरसों तक, उन्होंने हर एक दिन अपने घरों से निकलने से पहले अपनी मूर्तियों के लिए जानवरों की क़ुर्बानी दी थी, उनके सामने श्रद्धा से अपने हाथ और चेहरे रगड़े थे। वो यह मानने को तैयार नहीं थे कि यह सब बेकार था। बजाय अपने उन पूर्वजों की इज़्ज़त करने के जो ज़मीन के नीचे दफ़न थे, सच्चाई का वफ़ादार होना उनके लिए कम मायने रखता था। हालाँकि वो अपनी क़ब्रों में अकेले दाख़िल होंगे, मगर उन्होंने अक़्ल की आवाज़ के बजाय बीते हुए कल की आवाज़ों के पीछे चलना चुना। उनके अहंकार का एक और पहलू यह था कि वो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख़ानदान को काफ़ी ऊँचा नहीं मानते थे। दरअसल, एक बार, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बात करने के बाद, अबू जहल अपने दोस्त की तरफ़ मुड़ा और बोला: "अल्लाह की क़सम, मैं जानता हूँ कि जो वो कहते हैं वो सच है।" मगर फिर ये मानने के बाद भी वो ईमान क्यों नहीं लाया?

क्योंकि ठीक उसके बाद, उसने रसूल अलैहिस्सलाम के कबीले की तुलना अपने कबीले से करनी शुरू कर दी। उसने हर कबीले की ख़ूबियां गिनाईं और उनकी तुलना साथ-साथ दौड़ने वाले दो घोड़ों से की। और फिर उसने कहा: "और अब वो कहते हैं, 'हमारे कबीले में तो एक नबी भी है।' नहीं, अल्लाह की क़सम, मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता।" एक और मौक़े पर, उमैया इब्न अबी अल-सल्त ने रसूल अलैहिस्सलाम के बारे में अबू सुफ़ियान से कहा: "वो वाक़ई एक नबी हैं। उनकी पैरवी करो।" "तो फिर तुम उनके पीछे क्यों नहीं चलते?" "मुझे डर है कि मुझे शर्मिंदगी होगी अगर सक़ीफ़ की औरतों ने कहा, 'उमैया गया और अब्द मनाफ़ के बेटों में से एक नौजवान के पीछे चलने लगा।'" अरबों के बीच, इंसान का पद जितना ऊँचा होता था, अपनी साख बचाने के लिए वो उतना ही ज़्यादा दबाव महसूस करते थे। वो सोचते थे, "लोग क्या कहेंगे?" और दूसरों की राय के मुताबिक अपनी ज़िंदगी ढालते थे। मगर आख़िरकार, वो एक छोटी और अस्थायी ज़िंदगी की ख़ातिर अपनी हमेशा की ज़िंदगी क़ुर्बान कर रहे थे। तो अबू तालिब को दी गई धमकियाँ काम नहीं आईं। उनके सब्र का पैमाना भर चुका था। अब उनके अंदर इस्लाम के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची थी। गुस्से और नफ़रत में, उन्हें जब भी मौक़ा मिलता वो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश करते। जब वो नमाज़ में होते, वो पीछे से आते और उनका गला घोंटने की कोशिश करते। जब वो सजदे में जाते, तो वो उनका सर पत्थर से कुचलने की कोशिश करते। वो बार-बार उनके दरवाज़े के सामने जानवरों की गंदगी डाल देते और उन रास्तों पर जिन पर वो रोज़ चला करते थे कांटेदार झाड़ियाँ बिखेर देते। वो उन्हें जहाँ भी देखते, उनका अपमान करने की कोशिश करते और ऐसी सख़्त बातें कहते जो उनके मुबारक दिल को दुख देतीं। मगर इस सबके बावजूद, वो सब्र के साथ सब बर्दाश्त करते, और उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। नफ़रत का कोई भी काम, कोई बेइज़्ज़ती, कोई धमकी उन्हें उनके रास्ते से हटा नहीं सकी। दिन और रात वो उसी लगन के साथ इस उम्मीद में लोगों को इस्लाम की दावत देते रहे कि एक और रूह बच जाए। उन्हें अपनी कोई फ़िक्र नहीं थी। हालाँकि, उन दिनों, अपने सहाबा के लिए उनकी फ़िक्र बढ़ती जा रही थी। हर दिन, मक्का में एक मुसलमान की तरह जीना मुश्किल से और मुश्किल होता जा रहा था। दिन के सबसे गर्म हिस्से के दौरान, मक्का सताए हुए मुसलमानों की चीखों से गूंज उठता था— जब तक कि उनमें आवाज़ निकालने की ताक़त ही ना बचती। यहाँ तक कि अर्कम का घर भी अब मुसलमानों की सुरक्षा के लिए काफ़ी नहीं था। अल्लाह के रसूल, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, को कोई ऐसा रास्ता ढूंढना था जिससे मुसलमान अपने दीन पर ज़्यादा आज़ादी से चल सकें। ये नबूवत का पांचवा साल था। एक दिन, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को जमा किया। कोई बहुत अहम बात थी जो वो उन्हें बताना चाहते थे। उन्होंने फ़रमाया, "अब ज़मीन पर फैल जाओ। अल्लाह तुम सबको फिर वापस मिला देगा।" मगर वो कहाँ जा सकते थे?

"ऐ अल्लाह के रसूल, हमें कहाँ जाना चाहिए?" रसूल अलहिस्सलतु वस्सलाम, ने अपने हाथ से इशारा किया और फ़रमाया, "वहाँ।" वो समंदर के पार इशारा कर रहे थे। इसका मतलब था कि उन्हें उस ज़मीन तक जाने के लिए समंदर का सफ़र करना होगा। मगर वो जगह थी कहाँ?

इस्लाम की गूंज का दूर-दराज़ की ज़मीनों तक फैलना— सिर्फ़ मुट्ठी भर मोमिनों के साथ, वो मुश्किलें जिनके बाद आसानी आएगी, इस्लाम की क़तारों में अहम नामों का शामिल होना, ऐसे नाम जो क़ुरैश को अंदर तक हिला कर रख देंगे, वो चोट जो काफ़िरों को एक के बाद एक मिलेगी, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वो महान दुआ, जो क़ुबूल की जाएगी। यह सब अगले एपिसोड में हमारा इंतज़ार कर रहा है। जुड़े रहें। यह सुनने में थोड़ा अलग लग सकता है, लेकिन हम एक ऑनलाइन क़ुरआन कोर्स चलाते हैं, और 43,000 लोग पहले ही इससे ग्रेजुएट हो चुके हैं और क़ुरआन सीखने का अपना सफ़र शुरू कर चुके हैं। जी हाँ, मैं हमारे लामअलिफ़ (Lamalif) क़ुरआन मोबाइल ऐप की बात कर रहा हूँ। यह पूरी तरह से मुफ़्त है और इसमें कोई विज्ञापन (ads) नहीं हैं। यह ऐप, जो तुर्की और अंग्रेजी दोनों में बेहद कामयाब रहा है, अब दुनिया भर के मुसलमानों के लिए इंशाअल्लाह 13 अलग-अलग भाषाओं में उपलब्ध होने जा रहा है। लेकिन इस प्रोजेक्ट के लिए बहुत मेहनत की ज़रूरत है। इसे संभव बनाने के लिए, हमें 2,000 मिनट के एजुकेशनल वीडियोज़ बनाने होंगे। और अभी, हमें ट्रांसलेशन (अनुवाद) और वॉइसओवर के खर्चों में मुश्किल आ रही है। हमारी टीम ने कुल राशि को $30 के हिस्सों (शेयर्स) में बाँटा है, तो आप अपनी क्षमता के अनुसार इंशाअल्लाह एक या एक से ज़्यादा हिस्सों को स्पोंसर करके मदद कर सकते हैं। इस ऐप को पूरा करने के लिए हमें आपकी मदद की ज़रूरत है। अगर आप इसके उपयोगकर्ताओं द्वारा पढ़े जाने वाले हर एक हर्फ़ (अक्षर) के सवाब में हिस्सेदार बनना चाहते हैं, तो आप अभी हमसे संपर्क कर सकते हैं।