Towards Eternity
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"स्टीफन हॉकिंग ने मेरे लिए अल्लाह को साबित कर दिया!" - एक पूर्व-सिख का इस्लाम तक का सफर

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मेरी माँ का परिवार ईसाई पृष्ठभूमि से है, और मेरे पिता का परिवार सिख पृष्ठभूमि से है। ब्रिटेन में सिखों के मन में मुसलमानों के लिए बहुत दुश्मनी है। अमेरिका में नाइन-इलेवन के हमले हुए। कुछ साल बाद सात जुलाई के बम धमाके हुए, जिनमें बसों और लंदन अंडरग्राउंड पर आत्मघाती हमले हुए। मेरे पापा को उसी ट्रेन में जाना था, और फिर मैंने पापा को फ़ोन करने की कोशिश की, तो उनका फ़ोन नहीं लग रहा था। और मैंने कई अलग-अलग धर्मों को खंगाला। मैंने बौद्ध धर्म खंगाला, सिख धर्म, हिंदू धर्म और ईसाइयत। मैं स्टीफ़न हॉकिंग का एक लेक्चर देख रहा था। स्टीफ़न हॉकिंग ने मेरे लिए ख़ुदा को साबित कर दिया। वहाँ से मैंने सोचा, ज़्यादा से ज़्यादा क्या हो जाएगा?

तो मैंने क़ुरआन पढ़ना शुरू किया और मुसलमान बन गया। मेरे पापा को ऐसे पता चला कि मैं स्कूल से घर आया था, और उन्हें मेरे कोट में एक टोपी मिली। 'ये क्या है? तुमने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है। तुमने अपने ख़ून से ग़द्दारी की है, अपनी क़ौम से ग़द्दारी की है।' ख़ूब चीख़-चिल्लाहट हुई, बहुत भला-बुरा कहा गया। मेरे चाचा के जन्मदिन पर एक घटना हुई। चाचा मुझसे बड़े याराना अंदाज़ में पेश आ रहे थे, और उन्होंने मुझे गले लगाया। पर फिर ऐसे गले लगाया, जैसे मेरी गर्दन दबोच ली हो, और वो भी पूरे परिवार के सामने। उनके हाथ में शैंपेन थी, और उन्होंने गिलास मेरे होंठों से लगा दिया, और फिर मुझसे कहा, 'पी इसे।' 'नहीं, मुझे नहीं चाहिए।' 'पी इसे!' 'नहीं!

मुझे नहीं चाहिए!' अस्सलामु अलैकुम भाई रीस बायफ़ील्ड। हमारी दावत क़ुबूल करने का शुक्रिया। हम आपको टुवर्ड्स इटर्निटी में अपने पास पाकर ख़ुश हैं। मैं इससे शुरू करना चाहता हूँ कि रीस बायफ़ील्ड कौन हैं? क्या आप अपनी ज़िंदगी के बारे में थोड़ा बताएँगे? व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू, मेरे भाई!

अलहम्दुलिल्लाह, आपका मेहमान बनना मेरे लिए सम्मान की बात है। मैं एक mixed-race family में पैदा हुआ। मेरे पिता भारत से आकर ब्रिटेन में बसने वाली पहली पीढ़ी के प्रवासी हैं। और मेरी माँ ब्रिटेन की एक अंग्रेज़ महिला हैं। मेरी माँ का परिवार ईसाई पृष्ठभूमि से है। और मेरे पिता का परिवार सिख पृष्ठभूमि से है। और मैंने कई अलग-अलग धर्मों को खंगाला। तो मैंने क़ुरआन पढ़ना शुरू किया। मैंने कलमा पढ़ा और मैं मुसलमान बन गया। तो मैंने दरअसल दो साल तक अपना इस्लाम छुपाकर रखा। आख़िरकार मेरे परिवार को पता चल गया। इस बात पर ख़ूब चीख़-चिल्लाहट हुई, बहुत भला-बुरा कहा गया। अगले तीन-चार सालों में ये सब धीरे-धीरे और बिगड़ता चला गया। मैंने किंग्स कॉलेज लंदन से दर्शनशास्त्र में डिग्री ली। अलहम्दुलिल्लाह, मैं फ़र्स्ट क्लास से पास हुआ। और फिर मैंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से धर्मशास्त्र, धर्म-दर्शन और धर्म में मास्टर्स की डिग्री पूरी की। और आस्था के मामले में आपकी ज़िंदगी कैसी थी?

आप किसमें आस्था रखते थे?

ज़ाहिर है, मैं चर्च में होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में जाता था, जैसे शादियाँ और इसी तरह की चीज़ें। पर बचपन में भी, मैं किसी इंसान के ख़ुदा होने का विचार क़ुबूल नहीं कर पाता था। इसी तरह गुरुद्वारे में भी, जो सिखों का पवित्र स्थान है, यानी सिखों का धर्मस्थल, मैं ऐसे कार्यक्रमों में जाता था। कम उम्र में मैं भी सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक को एक समाज सुधारक ज़्यादा मानता था, बजाय किसी ऐसे इंसान के, जिस पर कोई ईश्वरीय संदेश उतरा हो। उस दौर में आपको कुछ हद तक नस्लवाद झेलना पड़ता था। अंग्रेज़ मुझे अंग्रेज़ नहीं मानते थे। और एशियाई लोग मुझे एशियाई नहीं मानते थे। तो आप एक अजीब सी जगह पर अटके रहते थे। उससे बस एक साल पहले, अमेरिका में नाइन-इलेवन के हमले हुए थे। कुछ साल बाद सात जुलाई के बम धमाके हुए, जिनमें बसों और लंदन अंडरग्राउंड पर आत्मघाती हमले हुए। और ये वो दौर था, जब इस्लाम और मुसलमानों से नफ़रत समाज में आम हो चुकी थी। हुआ ये कि दरअसल जिस दिन ये हमला हुआ, उस दिन मेरे पापा को उसी ट्रेन में जाना था। वही ट्रेन, जिसमें सेंट्रल लाइन पर धमाका हुआ। यही वो ट्रेन थी, जिसमें उन्हें जाना था। और फिर मैंने पापा को फ़ोन करने की कोशिश की, तो उनका फ़ोन नहीं लग रहा था। क्योंकि मैं सोच रहा था कि पापा इसी ट्रेन में हैं। मैंने मम्मी को फ़ोन करके कहा, 'क्या पापा से बात हुई?

क्या आपने ख़बर सुनी?' वो बोलीं, 'मैं फ़ोन करने की कोशिश कर रही हूँ, और फ़ोन कट जा रहा है।' पर हुआ ये था कि वो ट्रेन स्टेशन के अंदर जा चुके थे। और सेंट्रल लाइन तक पहुँचने के लिए वो एक ट्रेन से गए होंगे। और जब वो सेंट्रल लाइन पर थे, तभी हमला हुआ। और अधिकारियों ने पूरे इलाक़े को बंद करके सील कर दिया। Basically quarantine कर दिया था। तो न कोई स्टेशन से निकल सकता था, न अंदर जा सकता था। और इसी वजह से उनके फ़ोन में सिग्नल नहीं था, क्योंकि वो ज़मीन के नीचे फँसे हुए थे। तो अलहम्दुलिल्लाह, उस दिन वो लेट हो गए थे, इसलिए धमाके वाली ट्रेन से वो बस एक-दो ट्रेन के फ़र्क़ से बच गए। उसी दौर में नए नास्तिकवाद का आंदोलन भी ज़ोर पकड़ रहा था। स्टीफ़न हॉकिंग, रिचर्ड डॉकिन्स और उन जैसे लोग उस दौर में ज़ोर-शोर से अपना एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे। जब मैं क़रीब पंद्रह-सोलह साल का था, तभी उन्होंने अपनी किताब निकाली। मैं इन चीज़ों के बीच कहीं फँसा हुआ था। तो एक तरफ़ मैं अपने अंदर ये सोच उतार रहा था। इसे अपने अंदर उतारकर मैं उसी नज़रिए से चीज़ों को देख रहा था, और उन पर सवाल उठा रहा था। पर साथ ही, मेरे अंदर ये एहसास भी बहुत मज़बूत था कि कहीं न कहीं कुछ तो है, जो सच में मौजूद है। मैं स्टीफ़न हॉकिंग का एक लेक्चर देख रहा था, और मैंने पूरा लेक्चर देखा। वो ब्रह्मांड की शुरुआत के बारे में था, और वो अपनी रिसर्च और अपने सिद्धांतों के बारे में बता रहे थे, कि ब्रह्मांड कैसे शुरू हुआ, और वो बिल्कुल बिग बैंग तक पीछे गए। और फिर हम उस मोड़ पर पहुँचे कि ब्रह्मांड आया कहाँ से?

लेक्चर का निष्कर्ष ये था कि ब्रह्मांड की शुरुआत हुई। तो वो शुरुआत कहाँ से हुई? ब्रह्मांड की वजह क्या थी? और फिर उनका जवाब था, 'ये शून्य से आया।' और मैं वहाँ बैठा लैपटॉप की स्क्रीन को देख रहा था, इस आदमी को देख रहा था, और सोच रहा था कि आप ये क्या कह रहे हैं?

और फिर, उन्होंने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि 'हमें नहीं पता।' और फिर आप एक ऐसे मोड़ पर आते हैं, जहाँ एक बात पहले से साबित है, जो हम सब जानते हैं। शून्य से कुछ नहीं आ सकता। ये चीज़ों की एक बुनियादी समझ है। अगर कोई परिणाम है, तो उसका कोई कारण भी है। और आप कह रहे हैं कि ये सब, ये बिग बैंग, हमारे पूरे ब्रह्मांड की रचना शून्य से हुई है। और आप भौतिकी की उन शुरुआती स्थितियों की बात करते हैं, मानो वो स्थितियाँ बस संयोग से वहाँ मौजूद थीं। इतने समझदार आदमी के मुँह से ये बात बेतुकी लगती है, एक ऐसे आदमी के मुँह से, जिसके पास इतना ज्ञान था। मेरा निष्कर्ष ये था कि जो जवाब आपकी ज़ुबान पर है, जो जवाब आपके मुँह से निकलना चाहिए, उसी जवाब को आप अंदर ही रोक रहे हैं। और मुझे सबसे साफ़ तौर पर जो जवाब दिखा, वो यही था। अब मैंने देखा कि जिस आदमी ने तीन घंटे तक मुझे लेक्चर दिया, वो मुझे साइंस नहीं बता रहे थे, वो अपनी विचारधारा आगे बढ़ा रहे थे। यानी असल में साइंस और वह्य के बीच किसी टकराव की कोई ज़रूरत ही नहीं है। टकराव इसलिए है, क्योंकि लोग उसे ज़बरदस्ती बीच में लाते हैं। लोग अपनी विचारधारा उसमें थोपते हैं। वो वीडियो देखने के बाद, और ये बात समझने के बाद, ख़ुदा पर मेरा यक़ीन अब साफ़ तौर पर पक्का हो गया था। एक तरह से मज़ाक़ में आप कह सकते हैं कि स्टीफ़न हॉकिंग ने मेरे लिए ख़ुदा को साबित कर दिया। इसने मेरे दिल में ख़ुदा पर यक़ीन पक्का कर दिया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हम दुनिया में ख़ुदा की झलक देखते हैं। हम रचयिता की कारीगरी देखते हैं। अस्तित्व में एक भी चीज़ ऐसी नहीं, जो किसी दूसरी चीज़ के बिना अस्तित्व में रह सके। तो जब हर चीज़ निर्भर है, तो निर्भरता का एक चक्र बन जाता है। पर बात ये है कि निर्भरता के इन चक्रों को कहीं न कहीं ख़त्म होना ही होगा। इनका एक ऐसा बिंदु होना चाहिए, जो किसी ऐसी चीज़ तक ले जाए जो स्वतंत्र हो, जो इस ढाँचे से बाहर हो, और जो इस पूरी व्यवस्था को थामे हुए हो। यानी पूरे ब्रह्मांड में हर चीज़ किसी और पर निर्भर है। और उसे अस्तित्व में लाने के लिए किसी चीज़ की ज़रूरत है। अब सवाल ये था कि 'ठीक है, अगर ख़ुदा है, तो ख़ुदा कौन है?

ख़ुदा के इस ख़िताब का हक़दार कौन है? और ख़ुदा है क्या?' इसलिए मुझे लगा कि शुरुआत के लिए सबसे स्वाभाविक जगह यही होगी कि सबसे पुराने धर्मों को देखा जाए। और प्राचीन मूर्तिपूजक धर्मों का वो विचार, कि आपको देवताओं से सौदेबाज़ी करनी पड़ती थी, और ये बलियाँ चढ़ानी पड़ती थीं। और मुझे ये बात बिल्कुल ही बेतुकी लगती थी। मतलब, जो सर्वोच्च हस्ती है, जिसने सब कुछ बनाया, जिसका हर चीज़ पर क़ाबू है, आपको उससे सौदेबाज़ी की ज़रूरत क्यों होगी?

ख़ुदा इन सबसे ऊपर है। ख़ुदा इस तरह के मानवीकरण से परे है, कि हम आपस में जैसा बर्ताव करते हैं, वही ख़ुदा पर थोप दें। तो मुझे ये चीज़ बहुत-बहुत खटकी, और मैंने ये बात मूर्तिपूजा के इन सभी प्राचीन रूपों में देखी। या फिर ये सामाजिक नियंत्रण के तरीक़े थे, जहाँ नेता और राजा, अपने ईश्वरीय पदों का, यानी तथाकथित ईश्वरीय अधिकार का इस्तेमाल नियंत्रण बनाए रखने के लिए करते थे। ये मेरी पहली आपत्ति थी, और मैंने कई अलग-अलग धर्मों को खंगाला। जहाँ तक मेरे पिता की तरफ़ के सिख धर्म की बात है, तो सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक हैं। गुरु नानक हिंदू घर में पले बड़े थे, वो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के मतभेदों और झगड़ों से काफ़ी असंतुष्ट थे। और उनके मुताबिक़, वो ध्यान लगाने और इस मसले को साफ़-साफ़ समझने के लिए निकल पड़े। गुरु नानक अपने सफ़र में, दरअसल हज करने भी गए थे। पर जब वो इस सफ़र से वापस आए, तो वो कुछ धार्मिक आदर्शों के साथ लौटे, जो उनके लिए साफ़ हो चुके थे। इसी तरह, बहुत सी भारतीय परंपराएँ, जैसे बौद्ध और सिख धर्म, समन्वयवादी धर्म थे। समन्वयवादी धर्म वो होता है, जो अपने आस-पास की संस्कृतियों और धार्मिक रीतियों को अपनाकर अपने धर्म में शामिल कर लेता है। तो सिख धर्म में इसकी एक बहुत साफ़ मिसाल है। उनकी प्रार्थना का तरीक़ा हिंदू प्रार्थना के ज़्यादा क़रीब है। पर अगर कोई आज के भारत में जाए, तो उसे दिखेगा कि असल में ये बहुत आम बात है। आपको हिंदू मस्जिद जाते दिखेंगे, और शायद कुछ हिंदू किसी सूफ़ी सिलसिले से जुड़ते हुए भी दिखेंगे। मिसाल के तौर पर, भारत में हिंदू नक़्शबंदी भी हैं। वहीं मुसलमान हिंदुओं के धार्मिक स्थलों पर जाते हैं, और उनके पुजारियों से आशीर्वाद लेने की कोशिश करते हैं, और ऐसी चीज़ें करते हैं। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के आपस में इस तरह घुलने-मिलने को समाजशास्त्र की नज़र से हम ग्रामीण धर्म कहते हैं, है न?

इस तरह का ग्रामीण धर्म भारत में बहुत ही आम है। सिख धर्म इंसान का बनाया हुआ धर्म है, और मैंने हिंदू धर्म को भी खंगाला। हिंदू धर्म की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि असल में हिंदू धर्म नाम का कोई धर्म है ही नहीं। पहली समस्या यही है, क्योंकि 'हिंदुइज़्म' एक औपनिवेशिक शब्द है। जब अंग्रेज़ भारत आए थे, तो उन्होंने देखा कि ढेर सारे भूरे लोग पूजा कर रहे हैं और धार्मिक रीतियाँ निभा रहे हैं। और उन्होंने बस कह दिया, 'पता है क्या? ये सब एक ही धर्म है।' उनके अलग-अलग तौर-तरीक़ों के बावजूद, उन्होंने बस सबको एक ही खाँचे में डाल दिया। मतलब, 'हिंदू' शब्द सिंधु नदी से आया है, है न?

तो उन्होंने कहा, कि ये बस इन लोगों का धर्म है। ये बात बिल्कुल साफ़ हो गई कि ये बस सामाजिक नियंत्रण था, और आम लोगों को क़ाबू में रखने का एक तरीक़ा था, और इसी तरह की बातें। और मैंने यहूदियत को खंगाला। पारंपरिक यहूदियत में कोई बाहर से आकर यहूदी नहीं बन सकता। ख़ुदा की चुनी हुई क़ौम का हिस्सा बनने के लिए आपको यहूदी पैदा होना पड़ता है। इस मायने में ये नस्ल पर आधारित धर्म है। अब ये विचार मुझे सही नहीं लगा। दूसरी दिक़्क़त ख़ुद यहूदी परंपरा को देखने पर सामने आई, कि बाइबल के दौर के यहूदियों का अपने नबियों के साथ रिश्ता कैसा था, और ये परंपरा ख़ुद दर्ज करती है कि पूरे इतिहास में, यहूदी लोग अपना वादा निभा नहीं पाए, जैसा कि बाइबल में बताया गया है। बाइबल दर्ज करती है कि यहूदियों ने ख़ुदा से किया हुआ अपना वादा नहीं निभाया। और इसी तरह आप देखते हैं कि बाइबल में कुछ हद तक बिगाड़ आ चुका था, यानी क़िस्सों के साथ छेड़छाड़ की गई थी। एक क़िस्सा है, जिसमें बताया गया है कि उन्होंने एक आदमी को जंग में भेज दिया, ताकि बस वो आदमी मारा जाए, और फिर वो उसकी बीवी से शादी कर सकें। और ऐसे तमाम क़िस्से, जहाँ आपको ये परंपरा समझ में नहीं आती, कि ये वो लोग हैं जिन्हें ख़ुदा ने चुना था। और उसी किताब में नबियों की तारीफ़ की गई है, और बताया गया है कि ख़ुदा के साथ उनका रिश्ता कैसा है, और वो कितने सच्चे हैं। पर साथ ही, वो उन्हें सिर्फ़ इंसानी कमज़ोरी वाला नहीं दिखाते, क्योंकि ग़लती करने में और बहुत बड़ी-बड़ी ग़लतियाँ करने में फ़र्क़ है। और इसमें कुछ विरोधाभास भी हैं। अगला स्वाभाविक क़दम ईसाइयत को देखना था। और जब आप ईसाइयत में गहराई से उतरते हैं, तो आपको दिखता है कि क्या हुआ है। और ट्रिनिटी का विचार, या किसी का सचमुच ख़ुदा का बेटा होना। मतलब ईशा खुदा है, पिता ख़ुदा हैं। पवित्र आत्मा ख़ुदा है। पर ख़ुदा एक है, और व्यक्ति तीन हैं। इसका मतलब है कि हर व्यक्तित्व के अलग विचार, अलग इच्छाएँ होनी चाहिए। क्योंकि अगर आप कहें कि नहीं, उनके विचार एक जैसे हैं। उनकी सोच एक जैसी है। उनकी इच्छा एक जैसी है। तीनों के बीच सब कुछ एक जैसा है। तो गणित के हिसाब से वो एक ही व्यक्ति हैं। आप उन्हें एक ही हस्ती में समेट चुके हैं, है न?

अगर वो सब बराबर हैं, और शाश्वत हैं, तो वो किसी बात पर सहमत कैसे होते हैं? क्या हो, अगर ईसा सूली पर मरना न चाहते हों? क्योंकि बाइबल कहती है कि उन्होंने पुकारा, बाइबल के ही शब्दों में, उन्होंने पुकारकर कहा, 'पिता, पिता, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?' तो ज़ाहिर है, वो नहीं चाहते थे कि उन्हें सूली पर चढ़ाया जाए। तो फिर ये सहमति कैसे बनी?

ये बात समझ में नहीं आती। ईसा ने ख़ुद तौरात पर चलने को कहा, और वो ख़ुद यहूदी थे। वो एक यहूदी इंसान थे। तो जब हम इन बयानों को, 'मैं हूँ' वाले बयानों और ऐसी बातों को, यहूदी धर्मशास्त्र की रोशनी में देखते हैं, तो हमें समझ में आता है कि इन बयानों का मतलब ये नहीं कि ईसा ख़ुदा हैं। इनसे उन्हें ख़ुदा का दर्जा देने जैसा कुछ नहीं निकलता। सबसे पहली बात यहूदी परंपरा में ख़ुदा का बेटा होने का मतलब बस एक नेक इंसान होना है। यहूदी परंपरा में जब कोई इंसान यानी जब कोई इंसान ख़ुदा की तरफ़ से बोल रहा होता है, तो यहूदी परंपरा में उसे ऐसा दर्जा दिया जाता है, मानो वो ख़ुद ख़ुदा हो। हमें एक बात बहुत साफ़ समझनी होगी। पहली बात, बाइबल ख़ुदा के अलावा दूसरी हस्तियों को भी 'एलोहीम' कहती है, जहाँ उन्हें ख़ुदाई की निशानी का दर्जा दिया जाता है। यानी ये इंसान ख़ुदा का प्रतिनिधि है, पर वो ख़ुद ख़ुदा नहीं है। दूसरी बात, जब हम ख़ुद इंजील की किताबों को देखते हैं। एक तरफ़ इंजील में ईसा के ऐसे बयान हैं, जिनमें वो ख़ुदा से दुआ करते हैं, और कहते हैं, 'मेरे पीछे मत चलो, ख़ुदा के पीछे चलो। मैं अच्छा नहीं हूँ। सिर्फ़ ख़ुदा अच्छा है।' इसका मतलब है कि ईसा कह रहे हैं, 'मैं ख़ुदा का प्रतिनिधि हूँ, और मैं ख़ुदा का सच्चा नबी हूँ।' और वो ख़ुद क्या हुक्म देते हैं?

कि ख़ुदा से दुआ करना, ख़ुदा के पीछे चलना, ख़ुदा के क़ानून पर चलना, न कि ख़ुद उनकी बात मानना, बल्कि क़ानून पर चलना और सिर्फ़ ख़ुदा की इबादत करना। आप देखते हैं कि बाइबल में असल में ईसा को ख़ुदा के रूप में पेश नहीं किया गया, बल्कि ये वो चीज़ है, जिसे पौलुस के धर्मशास्त्र ने इस परंपरा पर ऊपर से थोप दिया है। मैं इस सफ़र के आख़िरी पड़ाव पर था, और मुझे तसल्ली नहीं थी, क्योंकि मैं स्टीफ़न हॉकिंग वाले दौर से गुज़र चुका था, और मुझे ख़ुदा पर यक़ीन मिल चुका था। पर साथ ही, मैं इन सब परंपराओं से भी गुज़र चुका था, और मुझे लगा कि इन्होंने मुझे वो जवाब नहीं दिया, जिसकी मुझे तलाश थी। उस वक़्त मेरी क्लास में एक मुसलमान लड़का था, और उसने मुझसे कहा, 'तुम क़ुरआन क्यों नहीं पढ़ लेते?

एक बार पढ़कर तो देखो।' तो वहाँ से मैंने सोचा, कि 'ज़्यादा से ज़्यादा क्या हो जाएगा?' तो मैंने क़ुरआन पढ़ना शुरू किया। और उस वक़्त मैं अपने प्लेस्टेशन, यानी प्लेस्टेशन थ्री के इंटरनेट ब्राउज़र पर छुपकर उसे पढ़ता था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि किसी को पता चले कि मैं क़ुरआन पढ़ रहा हूँ। और मैं इसे पढ़ता गया, और मेरे ख़याल से मैंने सूरह फ़ातिहा से शुरू करके सूरह अन-नास तक पढ़ा। पर जो चीज़ मुझे सबसे अलग लगी थी, वो थी इस्लाम की सादगी, इस्लाम का सीधापन। इस्लाम ज़रूरत से ज़्यादा ब्योरों वाले या बहुत नाटकीय क़िस्से नहीं सुनाता। क़ुरआन आपको साफ़ क़िस्से सुनाता है, जिनकी सीख भी साफ़ होती है। और ये सीधे निशाने पर लगता है। और मैंने क़ुरआन में देखा कि नबियों के क़िस्सों में जो बिगाड़ आ गया था, उसे साफ़ कर दिया गया था। अल्लाह फ़रमाता है कि क़ुरआन 'मुहैमिन' है। यानी वो किताब, जो निगहबान है, हिफ़ाज़त करने वाली है, जो बाक़ी किताबों पर हावी है। और ये उन ग़लतियों को साफ़ करता है, और उन भूलों को दूर करता है। अल्लाह हमसे फ़रमाता है कि जब हम ज़मीन को देखें, 'क्या तुम नहीं देखते कि इसे तुम्हारे लिए कितनी ख़ूबी से बनाया गया है?' आजकल हम इसी को इंटेलिजेंट डिज़ाइन का तर्क कहते हैं। अल्लाह फ़रमाता है, 'अपने आस-पास की दुनिया को देखो। साफ़ दिल और दिमाग़ से सोचो। और तुम देखोगे कि अकेला अल्लाह ही वो है, जो इसे बना सकता था।' यही चीज़ मुझे सच में बहुत भाई। कि इस्लाम एक सादी, तर्कसंगत और संपूर्ण जीवन-पद्धति देता है। क़ुरआन साफ़ और सटीक क़ानून देता है, जो समझ में आते हैं। और आप देख सकते हैं कि अगर समाज इन क़ानूनों पर चले, तो समाज को साफ़ तौर पर फ़ायदे होंगे। अगर इस्लाम के क़ानूनों पर अमल हो। जबकि अगर न हो, और सब बिखर जाए, तो आपको दिखने लगता है कि कैसे कुछ चीज़ें समाज में बुराइयाँ पैदा करती हैं। कैसे इन क़ानूनों पर न चलने से समाज में मसले और बिगाड़ पैदा होते हैं। कैसे इस्लाम लोगों की इज़्ज़त बचाना चाहता है। कैसे वो परिवारों को मज़बूत बनाना चाहता है, ताकि किसी को शर्मिंदगी न उठानी पड़े, या कोई बेसहारा न छोड़ा जाए, और हर इंसान को उसका हक़ मिले। और ये एक ऐसी चीज़ थी, जो मैंने किसी और परंपरा में इतने साफ़ और इतने आसान ढंग से पेश की गई नहीं देखी। और ऐसा क्या हुआ कि आपने कलमा पढ़ने का फ़ैसला किया?

और कलमा पढ़ते वक़्त आपको कैसा महसूस हुआ? क्या आप हमें उन पलों में ले चलेंगे? मैं यूट्यूब पर कुछ लेक्चर देख रहा था, क़यामत की निशानियों पर, यानी हिसाब के दिन की निशानियों पर। और जब मैंने ये सब देखा, तभी मेरे दिल में डर बैठ गया। कि कभी भी, किसी भी पल मेरी मौत हो सकती है। और क्या मैं अल्लाह सुब्हानहू व तआला की बंदगी के अलावा किसी और हालत में मरना चाहता हूँ?

और यही चीज़ मेरे इस्लाम क़ुबूल करने की वजह बनी। कि हम ख़ुद को धोखे में रखते हैं, और मौत के बारे में सोचते ही नहीं। जब वो हक़ीक़त सामने आई, तो मैं समझ गया। अब मैंने देर नहीं की। मैंने फ़ौरन अपने दोस्त को फ़ोन किया और कहा, 'मैं आज ही कलमा पढ़ना चाहता हूँ। वक़्त नहीं है।' और उस पल, जब मुझे एहसास हुआ कि मैं कल मर सकता हूँ, मैं आज ही थोड़ी देर बाद मर सकता हूँ। कोई कल नहीं था, कोई बाद में नहीं था, कुछ भी नहीं था। बस अभी का वक़्त था, कलमा अभी पढ़ना था। तो मैंने अपने दोस्त को फ़ोन किया, और उसने मुझे अपने घर बुलाया। और फिर हम गाड़ी से उसके परिवार के एक दोस्त के पास गए, जो मस्जिद के इमाम थे। और वो आए, और अलहम्दुलिल्लाह, मैंने उनके सामने कलमा पढ़ा। हमने कलमे के मतलब को अच्छी तरह समझा। जिस वक़्त मैं कलमा पढ़ रहा था, हालाँकि कमरे में बस कुछ ही लोग थे, फिर भी ऐसा लग रहा था, जैसे कमरा मुझ पर सिमटता आ रहा हो। जैसे मुझ पर कोई बहुत भारी बोझ हो। पर जिस पल मैंने कहा, 'अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदर्रसूलुल्लाह।' जिस पल मैंने ये कहा, मुझे लगा जैसे दुनिया भर का बोझ मुझ पर से उतर गया है। मुझे लगा जैसे मेरे गुनाहों का बोझ मुझसे अलग हो गया। मुझे लगा मेरी सारी फ़िक्रें दूर हो गईं। वो बिल्कुल ताज़ा हवा जैसा एहसास था। जैसे जब आप हवाई जहाज़ से बाहर निकलते हैं, और आपको फिर से अपने चेहरे पर ताज़ा हवा महसूस होती है। कलमा पढ़कर मुझे बिल्कुल ऐसा ही लगा। आपके इस्लाम क़ुबूल करने पर आपके परिवार और आस-पास के लोगों की, ख़ासकर पिता की, क्या प्रतिक्रिया थी?

जब मैंने शुरू में कलमा पढ़ा, तो मैं जानता था कि ये बहुत मुश्किल होने वाला है। तो मैंने दरअसल दो साल तक अपना इस्लाम छुपाकर रखा। घर पर मैं बस ऐसे पेश आता था, जैसे सब कुछ पहले जैसा हो। पर बाहर मैं मस्जिद में जाता था, नमाज़ पढ़ता था, और शायद अपने कपड़े पहनने का ढंग भी बदल रहा था। आख़िरकार मेरे परिवार को पता चल गया। मेरे पापा को ऐसे पता चला कि मैं स्कूल से घर आया था, और उन्हें मेरे कोट में टोपी, यानी head covering मिली। उन्हें वो मेरी जेब में मिली, और उन्होंने कहा, 'ये क्या है?

तुमने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है। तुमने अपने ख़ून से ग़द्दारी की है, अपनी क़ौम से ग़द्दारी की है। ये मंज़ूर नहीं है।' और इस बात पर ख़ूब चीख़-चिल्लाहट हुई, बहुत भला-बुरा कहा गया। अगले तीन-चार सालों में ये सब धीरे-धीरे और बिगड़ता चला गया, यहाँ तक कि बात मारपीट और बेइज़्ज़ती तक पहुँच गई। मैं सुबह जल्दी उठकर जल्दी स्कूल चला जाता था। और फिर बहुत देर से घर लौटता था, शायद रात के दो-तीन बजे, ताकि मैं बस किसी तरह पापा से बच सकूँ। तो उनकी प्रतिक्रिया ज़्यादातर सांस्कृतिक असर को लेकर थी, कि वो लोगों को कैसे समझाएँगे कि उनका बेटा मुसलमान है। क्योंकि हुआ ये था कि एक बार पापा फिर से मुझसे बहस करना चाहते थे। और फिर मैंने उन्हें बिठाकर बात की। मैंने कहा, 'देखिए, मैं अपना ईमान नहीं छोड़ूँगा। मैं इस्लाम नहीं छोड़ूँगा। तो या तो आपको मुझे एक मुसलमान के तौर पर क़ुबूल करना होगा, या फिर आप मुझे छोड़ दीजिए, और मैं आपको छोड़ दूँगा।' और फिर उस दिन के बाद हमने इस मामले पर कभी बहस नहीं की। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि मेरे पापा ने हार मान ली थी, इसका मतलब ये नहीं था कि पापा की तरफ़ के बाक़ी रिश्तेदारों ने भी हार मान ली थी। मेरे चाचा के जन्मदिन पर एक घटना हुई। पूरा परिवार आया हुआ था। और चाचा मुझसे बड़े याराना अंदाज़ में पेश आ रहे थे, और मुझे सहज महसूस कराने की कोशिश कर रहे थे। हमने कुछ खाना खाया। और फिर, उन्होंने मुझे गले लगाया। पर फिर ऐसे गले लगाया, जैसे मेरी गर्दन दबोच ली हो। और फिर सबके सामने, मतलब पूरे परिवार के सामने, उनके हाथ में शैंपेन थी, और उन्होंने गिलास मेरे होंठों से लगा दिया। और फिर उन्होंने मुझसे कहा, 'पी इसे।' और मैंने कहा, 'मैं शराब नहीं पीता।' फिर वो चिल्लाकर बोले, 'हद है यार, तुम्हें हुआ क्या है?' उनका मक़सद था उस पल मुझे शर्मिंदा करना, ये कहकर कि बस शराब पी लो। और फिर मैंने उनके हाथ से गिलास लिया, और उसे फेंका तो नहीं, पर ज़ोर से मेज़ पर पटक दिया। मैंने कहा, 'मैं शराब नहीं पीता। जो भी शराब पीता है, वो बस अपनी ही बेइज़्ज़ती करता है।' ये मैंने उनसे कहा। और फिर पार्टी के आख़िर में, जब वो लोग नशे में धुत हो चुके थे, और न चल पा रहे थे, न अपनी गाड़ियों में बैठकर घर जा पा रहे थे, तब मैंने उनसे कहा, कि 'जिस इंसान से आप बदतमीज़ी कर रहे थे, और जिसे शर्मिंदा करना चाह रहे थे, वही आपके घर जाने के लिए टैक्सी बुला रहा है।' और ऐसी बहुत सी घटनाएँ बाद में मेरे कज़िन्स के बीच भी हुईं। जैसे एक बार परिवार का एक जमावड़ा था, और बहुत सारे लोग थे। और मुझे बहुत प्यास लगी थी, बहुत गरमी का दिन था। और मेरा एक कज़िन उठा, और उसने सबसे कहा, 'मैं कुछ पीने को लाने जा रहा हूँ। किसी को कुछ चाहिए?' एक कज़िन ने कहा, 'मुझे पेप्सी चाहिए, ये चाहिए, पानी चाहिए'। और मैंने कहा, 'हाँ, क्या तुम मेरे लिए पानी ला दोगे?' और उसने कहा, 'मैं तुम्हारे लिए शराब लाऊँगा, वरना कुछ नहीं।' और मैंने कहा, 'मुझे पानी चाहिए।' मुझे लगा वो मज़ाक़ कर रहा है। और फिर वो गया, और वापस आया, और वो सच में मेरे लिए पानी नहीं लाया। और मैं बस सोचता रह गया कि ये क्या बेहूदगी है?

तो मेरे पापा की एक बड़ी दिक़्क़त ये थी कि इस्लाम को किस नज़र से देखा जाता है। कि उनके नज़रिए से इस्लाम पाकिस्तानी लोगों का धर्म है। हाल ही में, शायद एक-दो साल पहले, मैंने डीएनए टेस्ट करवाया, और मुझे उम्मीद थी कि मेरे पिता की तरफ़ से बस भारतीय ही निकलेगा। जबकि पिता की तरफ़ से, हाँ, ज़्यादातर भारतीय था, पर कुछ हिस्सा पाकिस्तान का, कुछ बांग्लादेश का, और एक बड़ा हिस्सा, मेरे ख़याल से उनके डीएनए का क़रीब चौबीस प्रतिशत, अफ़ग़ानिस्तान से आ रहा था। मैंने उनसे कहा, 'असल में आप उतने भारतीय नहीं हैं। दरअसल आपके डीएनए का ज़्यादातर हिस्सा ग़ैर-भारतीय है। और उसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी और अफ़ग़ानी है।' तो फिर, मैंने उनसे बस यूँ ही मज़ाक़-मज़ाक़ में कहा कि 'क्यों न हम कुछ काबुली पुलाव मँगवा लें?' मैंने कहा, 'ये तो हमारा अपना पकवान है।' क्या आपके साथ कभी कोई ऐसी असाधारण घटना हुई, जिसमें आपको लगा हो कि अल्लाह से आपका ख़ास रिश्ता है?

एक दिन मैं पैदल घर जा रहा था, और बहुत-बहुत तेज़ बारिश होने लगी। मैं ऐसी बारिश की बात कर रहा हूँ, जिससे नाले उफन जाते हैं। तो सारे नाले अब उफनने लगे थे, और सड़कें पानी से लबालब होकर छलकने लगी थीं। पानी फ़ुटपाथ पर चढ़ आया था। बहुत-बहुत तेज़ बारिश थी। और मैं पैदल घर जा रहा था, और फिर मैं एक जगह के नीचे चला गया, वहाँ एक दुकान थी, वो सुपरमार्केट जैसी, और उनके यहाँ वो barrier जैसी चीज़ें होती हैं। तो बारिश से थोड़ी पनाह लेने के लिए मैं उसके नीचे चला गया। मैंने अल्लाह सुब्हानहू व तआला से दुआ की। मैं अल्लाह से सबसे पहले ये माँगना चाहता था कि घर पहुँचने तक बारिश रुक जाए। तो मैंने कहा, 'क्या तू मेरी गली आने तक बारिश रोक देगा?' पता नहीं क्यों। देखिए, मुझे नहीं पता कि मुझे ऐसा माँगने का ख़याल क्यों आया। और मैं उसके नीचे से बाहर निकला। और फिर मैंने देखा कि बारिश नहीं हो रही थी। वो पूरी तरह रुक चुकी थी। और मैं जहाँ था, वहाँ से पैदल अपने घर गया। ये कोई डेढ़ घंटे का पैदल रास्ता था। तो मैं चलता रहा, और जब मैं अपनी गली में पहुँचा, तो बारिश फिर से टपकने लगी। पर ये बस हल्की-हल्की बूँदें थीं। और फिर जिस पल मैं अपने दरवाज़े पर पहुँचा, बारिश ठीक वैसे ही होने लगी, जैसे दुआ करने से पहले हो रही थी। जब आपको कोई परेशानी हो, तो अल्लाह सुब्हानहू व तआला से ऐसे बात कीजिए, जैसे अपने दोस्त से करते हैं। ये मत सोचिए कि मुझे बहुत ज़्यादा औपचारिक होना पड़ेगा। हाँ, दुआ करने की एक सुन्नत है। पर जब आप बात करना शुरू कर दें, तो बस बोलते जाइए। क्योंकि अल्लाह सिर्फ़ एक विचार नहीं है। अल्लाह आपको सुन रहा है, और आपकी बात ध्यान से सुन रहा है। आप इस्लाम से पहले वाले रीस और इस्लाम के बाद वाले रीस में क्या फ़र्क़ देखते हैं?

इस्लाम ने मुझे ये क़ाबिलियत दी कि मैं अपनी ख़ूबियों और गुणों को अच्छे कामों में लगा सकूँ। मैं नहीं बदला हूँ। दुनिया को देखने का मेरा नज़रिया बदल गया है। और इसने मुझे वो चीज़ें दी हैं, जो मुझे लगता था कि कभी नहीं मिलेंगी। मुझे बात करना पसंद है। इस्लाम से पहले लोग मेरी बात सुनना नहीं चाहते थे। वो मुझसे बात नहीं करना चाहते थे। अब लोग मेरी बात सुनना चाहते हैं। लोग मुझे मस्जिद में बुलाते हैं कि मैं उनसे बात करूँ। ये इस्लाम ही है, जो इंसान को ऊँचा उठाता है। जब मैं ग़ैर-मुस्लिम था, और सेकेंडरी स्कूल में था, तो मैं अपने इम्तिहानों पर ज़्यादा मेहनत नहीं करता था। मैं अपनी पढ़ाई पर ज़्यादा मेहनत नहीं करता था। अगर आप मुझसे कहते कि बड़े होकर तुम कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी जाओगे, तो मैं आपसे कहता, 'आप बेकार की बात कर रहे हैं।' अब अगर आप मुझसे पूछें कि आप कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी कैसे पहुँचे?

तो मैं कहूँगा, 'बिइज़्निल्लाह भाई, मेरे लिए फ़र्स्ट क्लास डिग्री लेना आसान था। मेरे लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी जाना आसान था।' जब मैं अपनी डिग्री कर रहा था, तो मेरे दादा गुज़र गए, मेरी दादी गुज़र गईं। वो कोविड का दौर था। मेरा बेटा एक साल का था। मुझे नौकरी करनी थी, और मैं ढाई घंटे का सफ़र करके कैम्ब्रिज जाता था, और ढाई घंटे का सफ़र करके वापस काम पर भी आता था। अल्लाह ने ये सब मेरे लिए आसान कर दिया। इस्लामी जीवनशैली अपनाना आपके लिए कितना चुनौती भरा था? जैसे हराम चीज़ों से बचना, दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ना, या पूरे दिन रोज़ा रखना, क्या ये सब आपके लिए मुश्किल था?

मैं कहूँगा कि रोज़ा, नमाज़, ये मुश्किल नहीं था। चुनौती माहौल की होती है। अगर आप ऐसे लोगों के साथ हैं, जो आपको हमेशा हराम की तरफ़ बुलाते रहते हैं, तो फिर यही होगा कि आप ये ग़लतियाँ करेंगे और ये सब करेंगे। तो जब आप अल्लाह सुब्हानहू व तआला की ख़ातिर ख़ुद को उस माहौल से अलग कर लेते हैं, तब आप उस चक्र से बाहर निकल सकते हैं। पर साथ ही, मैं ये कहूँगा कि कोई भी रातों-रात नहीं बदलता। और आपके लिए सबसे अच्छी चीज़, और सबसे अच्छा रास्ता, ये है कि आप अच्छी संगत चुनें। क्योंकि ऐसे लोग आपकी मदद करेंगे। आपको नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कौन सी बात सबसे ज़्यादा भाई?

जो बात मुझे सबसे ज़्यादा भाई, वो ये है कि वो नेतृत्व की जीती-जागती मिसाल हैं। आप देखते हैं कि वो नरम-दिल हैं। आप देखते हैं कि उन्हें लोगों की फ़िक्र है। आप देखते हैं कि वो सुलझे हुए हैं। आप देखते हैं कि वो हमेशा लोगों पर नज़र रखते हैं, और सोचते हैं कि मैं उनकी मदद कैसे करूँ? उन्हें क्या चाहिए? वो किस परेशानी से जूझ रहे हैं?

और वो लोगों की ज़रूरतों को, लोगों की ख़्वाहिशों को देखते हैं, कि उनकी मदद कैसे हो सकती है। और यही उनके नेतृत्व का अंदाज़ है। पर इतनी नरमी के बावजूद, वो सबसे बहादुर थे। मुझे एक हदीस याद है, जिसमें बताया जाता है कि मदीना के बाहरी इलाक़े में एक आवाज़ आई, जैसे कोई उन पर हमला करने आ रहा हो। लोगों ने ज़ोरदार धमाका और तेज़ आवाज़ें सुनीं। तो वो उठे, उन्होंने जल्दी से अपनी ज़िरहें पहनीं, और बाहर निकल पड़े। और जब वो सवार होकर निकल ही रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अकेले वापस आ रहे हैं। वो पहले ही जा चुके थे, और अकेले वापस आ रहे थे, और उन्होंने फ़रमाया कि कुछ नहीं था। 'सब ठीक है, मैंने देख लिया है। हम वापस जाकर सो सकते हैं।' तो ये सच्ची मर्दानगी और सच्चे नेतृत्व का ऐसा मेल है, जिसमें नरमी है, मुहब्बत है, फ़िक्र है, पर साथ ही बहादुरी है, और अपने उसूलों पर मज़बूती से डटे रहना है। अगर आपको दुनिया के सभी ग़ैर-मुस्लिमों से बात करने का मौक़ा मिले, और आपके पास सिर्फ़ एक मिनट हो, तो आप क्या कहना चाहेंगे?

हम सबको एक पल रुककर ख़ुद से एक सीधा सा सवाल पूछना चाहिए। 'आज मैं जिन चीज़ों पर यक़ीन रखता हूँ, उन पर यक़ीन क्यों रखता हूँ? क्या मैं ईसाई हूँ, इसलिए क्योंकि मेरे माँ-बाप ईसाई हैं? क्या मैं सिख इसलिए हूँ, क्योंकि मेरे माँ-बाप सिख हैं? क्या मैं हिंदू इसलिए हूँ, क्योंकि मेरा परिवार हिंदू है?

आप इन धर्मों और इन परंपराओं पर क्यों चल रहे हैं, जिनसे आप बंधे हुए हैं?' किसी इंसान के लिए ये सुनना आसान नहीं होता कि वो ग़लत है, या ये मानना कि दुनिया को देखने का उसका नज़रिया ग़लत है। दरअसल ये सबसे मुश्किल कामों में से एक है, क्योंकि इससे अहंकार को चोट पहुँचती है, क्योंकि आप ख़ुद से कह रहे होते हैं कि दुनिया के बारे में आपकी समझ ग़लत है। पर एक पल के लिए रुकिए। क्या आप असत्य में जीने के बजाय सच को पाना पसंद नहीं करेंगे? ज़्यादा शर्म की बात क्या है? असत्य में जीना, या अपने अहंकार पर थोड़ी सी चोट सहकर अपने नज़रिए को चुनौती देना और सच को मानना?

क़ुरआन पढ़िए। पढ़िए कि अल्लाह इंसानियत से क्या चाहता है। उसकी हिदायत पढ़िए। पढ़िए कि अल्लाह आपसे क्या चाहता है। नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत पढ़िए। और अगर आपके मन में सवाल हैं, तो किसी से बात कीजिए। बस इससे जुड़कर देखिए। ख़ुद को चुनौती दीजिए और देखिए, कि ये धर्म आख़िर है क्या? कम से कम, आप ये तो जान ही लेंगे कि इस्लाम है क्या। क्या आपने भी इस्लाम क़ुबूल किया है, पर समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें? या फिर आप पैदाइशी मुसलमान तो हैं, पर अब बिल्कुल नए सिरे से इस्लाम सीखना चाहते हैं?

ठीक इसीलिए हमने बनाया है ये स्टेप इस्लाम ऐप। ये एकदम फ्री और बिना ऐड वाला ऐप है, जो आसान और सिलसिलेवार तरीक़े से आपको इस्लाम सिखाता है। इसमें आप आसानी से ईमान की बुनियादी बातें और क़ुरआन की ज़रूरी टर्म्स सीखेंगे, और अपने हिसाब से प्रैक्टिकल टास्क करके ऐसी आदतें अपनाएँगे, जो ज़िंदगी भर काम आएँगी। शैतान के बहकावे में आकर इसे मत टालें। नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें, स्टेप इस्लाम डाउनलोड करें, और हमेशा की ख़ुशियों की तरफ़ आज ही पहला क़दम बढ़ाएँ।